Sword Raas Video: एक हाथ से ड्राइव करती जीप, दूसरे हाथ से भांजती तलवार… क्षत्रिय राजपूत महिलाओं का ये तलवार रास हो गया वायरल

नवरात्रि में गरबा और डांडिया की रौनक तो आपने खूब देखी होगी, लेकिन गुजरात में उत्सव का एक ऐसा नजारा भी देखने को मिला, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया। यहां महिलाएं हाथों में तलवार लेकर मैदान में उतरीं और अपनी पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया। राजकोट और जामनगर में राजपूत समाज की महिलाओं ने तलवार रास के जरिए वीरता और संस्कृति की अनूठी झलक पेश की। पारंपरिक पोशाक, हाथों में चमचमाती तलवारें और आत्मविश्वास से भरी महिलाओं का अंदाज इस आयोजन को खास बनाता है।

यह प्रदर्शन केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को सहेजने की कोशिश भी है। खास बात यह है कि इस कला को सीखने के लिए महिलाओं को बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है और नवरात्रि से पहले लंबे समय तक अभ्यास कराया जाता है।

गरबा के साथ दिखा वीरता और परंपरा का संगम

गुजरात में नवरात्रि का नाम आते ही गरबा और डांडिया की तस्वीर सामने आती है। हालांकि, राजकोट में होने वाला तलवार रास इस उत्सव को एक अलग पहचान देता है। यहां महिलाएं तलवारों के साथ पारंपरिक दांव-पेच और करतब दिखाती हैं। राजकोट पैलेस के ऐतिहासिक मैदान में क्षत्रिय समाज की महिलाएं इस प्रस्तुति के जरिए अपनी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। आयोजकों से जुड़ी जानकारी के अनुसार, यह कार्यक्रम पिछले करीब 18 वर्षों से आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य प्राचीन गरबा और रास संस्कृति को सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।

तलवार चलाना नहीं जानने वाली महिलाओं को भी मिलती है ट्रेनिंग

इस आयोजन की खास बात यह है कि इसमें भाग लेने के लिए पहले से तलवार चलाना आना जरूरी नहीं है। कार्यक्रम से जुड़ी एक महिला ने समाचार एजेंसी आईएएनएस को बताया कि संस्था में महिलाओं को बारीकी से प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जब दूर-दूर से लोग इस अनोखी प्रस्तुति को देखने पहुंचते हैं, तो उन्हें गर्व महसूस होता है। इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं ने काफी मेहनत की है। प्रशिक्षण के दौरान उन महिलाओं को भी सिखाया जाता है, जिन्हें पहले तलवार चलाने का अनुभव नहीं होता।

डेढ़ महीने पहले से शुरू हो जाती है तैयारी

इस कार्यक्रम से करीब 15 वर्षों से जुड़ी एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि तलवार रास में क्षत्रिय समाज की महिलाएं विशेष रूप से हिस्सा लेती हैं। उनके मुताबिक, नवरात्रि शुरू होने से लगभग डेढ़ महीने पहले ही अभ्यास शुरू हो जाता है। पैलेस ग्राउंड में होने वाली इस प्रस्तुति में तलवार के अलग-अलग दांव और स्टंट दिखाए जाते हैं। लगातार अभ्यास के जरिए महिलाएं अपने प्रदर्शन को तैयार करती हैं।

परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश

राजकोट और जामनगर में महिलाओं का यह प्रदर्शन नवरात्रि के पारंपरिक उत्सव में एक अलग रंग जोड़ता है। जहां गरबा और डांडिया भक्ति और सामूहिक उल्लास का प्रतीक हैं, वहीं तलवार रास के जरिए महिलाएं अपनी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक युद्ध-कला से जुड़ी परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास कर रही हैं।

Zoho में इस साल सैलरी हाइक नहीं करने का ऐलान कर इसके फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने मांगी माफी, खस्ता हालत की वजह भी बताई

Zoho में इस साल सैलरी हाइक नहीं करने का ऐलान कर इसके फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने मांगी माफी, खस्ता हालत की वजह भी बताई

नौकरी करने वाले लोगों के लिए सालाना सैलरी हाइक का इंतजार काफी अहम होता है। बढ़ती महंगाई के बीच वेतन में होने वाली बढ़ोतरी से घर का बजट संभालने में मदद मिलती है। लेकिन सॉफ्टवेयर कंपनी Zoho के कर्मचारियों को इस साल निराशा का सामना करना पड़ सकता है। कंपनी के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने बताया है कि इस साल कर्मचारियों की सैलरी में सामान्य सालाना बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। इसके पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े बढ़ते खर्च, सर्वर की महंगी कीमतें और वैश्विक कारोबारी अनिश्चितता जैसे कारण हैं। हालांकि, उन्होंने कर्मचारियों को यह भरोसा भी दिया है कि कंपनी बड़े पैमाने पर छंटनी से बचने की पूरी कोशिश करेगी।

Zoho कर्मचारियों को इस साल नहीं मिलेगा सालाना इंक्रीमेंट

श्रीधर वेम्बू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए कंपनी की मौजूदा स्थिति साझा की। उन्होंने बताया कि सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री का भविष्य फिलहाल अनिश्चित बना हुआ है और AI के बढ़ते इस्तेमाल से कंपनियों का खर्च काफी बढ़ गया है। इसी दबाव के चलते Zoho ने इस साल कर्मचारियों की सामान्य वेतन वृद्धि रोकने का फैसला किया है। वेम्बू ने स्वीकार किया कि यह फैसला लेना आसान नहीं था। उन्होंने कर्मचारियों से माफी भी मांगी कि वह इस साल सैलरी हाइक को जारी नहीं रख सके।

AI के कारण चार गुना बढ़ी सर्वर की कीमतें

कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक डेटा सेंटर के लिए जरूरी सर्वर की बढ़ती लागत है। वेम्बू के मुताबिक, सर्वर की कीमतें चार गुना तक बढ़ गई हैं। इसके अलावा, AI टूल्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने के कारण कंपनी के परिचालन खर्च में भी इजाफा हुआ है। इन बढ़ते खर्चों को नियंत्रित करने के लिए Zoho ने अपने मार्केटिंग बजट में कटौती की है। वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने भी कारोबारी माहौल को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

बड़े पैमाने पर छंटनी से बचने की कोशिश

सैलरी हाइक रोकने के फैसले के बीच कर्मचारियों के लिए राहत की बात यह है कि कंपनी फिलहाल बड़े पैमाने पर छंटनी से बचना चाहती है। वेम्बू ने कहा कि कंपनी कर्मचारियों की बड़े स्तर पर नौकरी जाने की स्थिति से बचने के लिए पूरी मेहनत करेगी।

हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि सॉफ्टवेयर क्षेत्र में नौकरियों का भविष्य चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रहा है। उनके मुताबिक, Zoho ने पिछले 18 महीनों से अपने कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं की है। इससे कंपनी में भर्ती की रफ्तार धीमी रहने का संकेत मिलता है।

अगले 3 से 5 साल Zoho के लिए अहम

वेम्बू ने बताया कि कंपनी इस समय खुद को नए कारोबारी माहौल के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया में है। अगले तीन से पांच साल यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि कंपनी का बदलाव कितना सफल रहता है।

उन्होंने कर्मचारियों के सहयोग के लिए आभार भी जताया। उनके मुताबिक, ज्यादातर कर्मचारी कंपनी की स्थिति को समझ रहे हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब तकनीकी कंपनियां AI में निवेश बढ़ाने के साथ अपने खर्चों पर नियंत्रण रखने की चुनौती का सामना कर रही हैं।

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Ultraviolette receives USD 85 million funding to expand production capacity

Ultraviolette receives USD 85 million funding to expand production capacity
Ultraviolette Automotive F77 Mach 2 Headlight

Bengaluru based EV manufacturer, Ultraviolette had recently announced plans for a new manufacturing facility in Hosur, to increase production capacity up to 5 lakh units a year. The company has now received USD 85 million in a new funding round. The additional capital and the new factory is expected to boost the manufacturing of its current products, the F77 (Mach 2 and Superstreet), X-47, and development of upcoming platforms and products.

  1. The USD 85 million funding was led by Deep Tech Fund Yali Capital and TDK Ventures
  2. New Hosur plant expected to increase production capacity up to 5 lakh units a year
  3. Ultraviolette currently has the means to build battery architecture ranging from 48V to 400V

Ultraviolette plans expansion in India and abroad

Four new products and US entry planned for next year

Currently, Ultraviolette operates in India and 20 European countries. With the fresh round of investment, the company has targeted an US market entry next year, alongside key markets in Latin America and Southeast Asia. The USD 85 million funding round was led by Deep Tech Fund Yali Capital and TDK Ventures and investment from Lip-Bu Tan, Chief Executive Officer of Intel, Chairman of Walden International and Advisor to Ultraviolette, alongside the company’s current and long-term investors. UV says the new and continued support from the investors will help scale production of its current portfolio as well as upcoming products.

Inside image showing Intel CEO checking out a Ultraviolette F77 Mach 2

The investment will also help with the development of UV’s next generation of models. The company currently boasts technical capabilities to build battery architecture spanning 48V to 400V which it says allows for engineering platforms catering to different needs. Its current list of investors include Zoho Corporation, TVS Motors, and Qualcomm Ventures. Besides India, UV currently operates across Europe including Germany, France, Spain, Portugal, the UK, Belgium, Netherlands, Italy, Switzerland and Hungary.
 

Boomer को लेकर शशि थरूर ने अपने बेटे को दिया ऐसा ज्ञान कि मामला वायरल हो गया

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर अपने मजाकिया अंदाज से लोगों का ध्यान खींचा है। इस बार उन्होंने अपने बेटे ईशान थरूर की सोशल मीडिया पोस्ट पर हल्के-फुल्के अंदाज में जवाब दिया। ईशान थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट करते हुए कहा कि छोटे बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना चाहिए। उन्होंने जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू की उस राय का समर्थन किया, जिसमें छोटे बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात कही गई थी।

ईशान ने अपनी पोस्ट में लिखा, “मैं मानता हूं कि छोटे बच्चों को सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए। लेकिन उससे पहले भारत में व्हाट्सऐप इस्तेमाल करने वाले ‘बूमर्स’ पर रोक लगाने की जरूरत है।” इस पर शशि थरूर ने मजेदार अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि भारत की परिस्थितियां पश्चिमी देशों से अलग हैं। इसलिए यहां लगभग हर पीढ़ी को “बेबी बूमर” कहा जा सकता है। उन्होंने मजाक में अपने बेटे से कहा कि इस हिसाब से उसकी पीढ़ी भी इससे अलग नहीं है।

क्या है ‘बूमर’

बूमर’ शब्द, ‘बेबी बूमर’ का छोटा रूप है। आम तौर पर इसका इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है, जिनका जन्म दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1946 से 1964 के बीच हुआ था। हालांकि, भारत में यह शब्द अक्सर ऐसे बुजुर्गों या पुराने विचारों वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो बिना मांगे सलाह देते हैं या पारंपरिक सोच रखते हैं। जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने छोटे बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात उस समय कही थी, जब वह फ्रांस की संसद में पारित एक विधेयक पर प्रतिक्रिया दे रहे थे। इस विधेयक में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया था।

फ्रांस के संसद ने दी मंजूरी

इस सप्ताह फ्रांस की संसद के दोनों सदनों ने इस कानून को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही फ्रांस 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाने वाला यूरोपीय संघ का पहला देश बन गया। नए कानून के तहत स्कूल परिसर में छात्रों के मोबाइल फोन इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि इससे छोटे बच्चों को मोबाइल स्क्रीन से बाहर निकलकर नई चीजें सीखने और वास्तविक दुनिया से जुड़ने का मौका मिलेगा।

उन्होंने कहा, “भारत में भी छोटे बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए। मेरा मानना है कि बच्चों को मोबाइल पर समय बिताने के बजाय किताबें पढ़नी चाहिए, धूप में बाहर खेलना चाहिए और सोशल मीडिया से दूर रहना चाहिए।” हालांकि, वेम्बू के इस सुझाव पर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ लोगों ने उनके विचार का समर्थन किया, जबकि कई लोगों का कहना था कि सरकार को लोगों की निजी जिंदगी और उनके फैसलों में जरूरत से ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए।

WhatsApp और Telegram के Username Feature पर सरकार सख्त, 20 दिनों में आ सकता है बड़ा फैसला

whatsapp users name

केंद्र सरकार WhatsApp और Telegram के यूजरनेम-आधारित मैसेजिंग फीचर को लेकर मिली प्रतिक्रियाओं की समीक्षा कर रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में अगले करीब 20 दिनों के भीतर कोई अधिसूचना या अगला फैसला सामने आ सकता है। सूत्रों के अनुसार, WhatsApp, Telegram और Zoho Bharat Eye ने सरकार द्वारा जारी नोटिस के जवाब मंत्रालय को सौंप दिए हैं।

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कानूनी जांच जारी

मंत्रालय की कानूनी टीम इन जवाबों का विस्तृत परीक्षण कर रही है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कहीं संबंधित फीचर किसी नियम या कानून का उल्लंघन तो नहीं करता। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि यदि आवश्यक हुआ तो नियामकीय कार्रवाई या अन्य कानूनी प्रावधान लागू किए जा सकते हैं या नहीं।

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WhatsApp के जवाब की हो रही समीक्षा

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को सप्ताहांत में WhatsApp का जवाब मिला, जिसकी फिलहाल समीक्षा की जा रही है। मंत्रालय का कहना है कि सभी जवाबों का कानूनी परीक्षण पूरा होने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा। सरकार की यह प्रक्रिया ऐसे समय में चल रही है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यूजरनेम-आधारित मैसेजिंग और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज है। फिलहाल मंत्रालय ने अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं की है।

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WhatsApp का 'Username' फीचर क्या है?

WhatsApp एक नया फीचर लाने की तैयारी कर रहा है, जिसके जरिए लोग अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना एक-दूसरे से जुड़ सकेंगे। यह फीचर Telegram और Signal की तरह काम करेगा। इस फीचर में यूजर अपने लिए एक यूनिक यूजरनेम (Username) चुन सकेंगे और मोबाइल नंबर की जगह उसी यूजरनेम को दूसरे लोगों के साथ साझा करेंगे।

 

Meta का दावा है कि इससे यूजर्स की निजता (Privacy) बेहतर होगी, क्योंकि उन्हें अपनी व्यक्तिगत जानकारी पर अधिक नियंत्रण मिलेगा। हालांकि, भारत सरकार इस फीचर को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। सरकार का मानना है कि यदि मोबाइल नंबर छिप जाएंगे तो ऑनलाइन ठगों और साइबर अपराधियों की पहचान करना और उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है।

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सरकार को किस बात की चिंता है?

सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि साइबर अपराधी यूजरनेम फीचर का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस फीचर का उपयोग करके अपराधी- 

 

  • फिशिंग (Phishing) हमले,
  • फर्जी पहचान (Impersonation) बनाकर ठगी,
  • डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) जैसे साइबर फ्रॉड,
  • और अन्य ऑनलाइन अपराधों को अंजाम दे सकते हैं।

 

इसी वजह से 1 जुलाई को केंद्र सरकार ने Meta से कहा था कि जब तक वह इस फीचर के दुरुपयोग को रोकने की ठोस व्यवस्था नहीं बताता, तब तक इसका रोलआउट आगे न बढ़ाया जाए।

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Meta ने क्या कहा?

Meta ने सरकार को बताया है कि WhatsApp के Username फीचर में सुरक्षा से जुड़े कई उपाय शामिल किए जाएंगे। हालांकि मामला सिर्फ WhatsApp की लोकप्रियता का नहीं है। भारत के आईटी अधिनियम (IT Act) और आईटी नियमों (IT Rules) के तहत एक बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म होने के कारण WhatsApp पर यूजर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कानूनी जिम्मेदारी भी है। सरकार यह भी जांच रही है कि यदि भविष्य में इस फीचर के कारण साइबर अपराध बढ़ते हैं, तो क्या ऐसी स्थिति में Meta की जवाबदेही तय की जा सकती है।

 

WhatsApp Username विवाद बढ़ा, सरकार की रडार पर Telegram और Signal, Arattai भी हटाएगा यूजरनेम फीचर

whatsapp

WhatsApp के नए Username फीचर को लेकर शुरू हुआ विवाद अब और गहरा गया है। भारत सरकार की आपत्तियों के बाद अब सिर्फ WhatsApp ही नहीं, बल्कि Telegram, Signal और भारतीय मैसेजिंग ऐप Arattai भी सरकार की जांच के दायरे में आ गए हैं। इसी बीच Zoho के सह-संस्थापक श्रीधर वेंबु ने घोषणा की है कि उनकी मैसेजिंग ऐप Arattai से भी Username फीचर हटाया जाएगा।  कुछ साइबर एक्सपर्ट्‍स का मानना है कि सही सुरक्षा उपायों के साथ Username फीचर मोबाइल नंबर साझा किए बिना सुरक्षित बातचीत का बेहतर विकल्प भी बन सकता है। WhatsApp को मिला नोटिस, सरकार ने लगाई रोक

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हाल ही में WhatsApp ने घोषणा की थी कि वह अपने यूजर्स के लिए Username फीचर लाने जा रहा है। इस फीचर की मदद से लोग बिना मोबाइल नंबर साझा किए एक-दूसरे से जुड़ सकेंगे। लेकिन फीचर की घोषणा के तुरंत बाद इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने Meta को नोटिस जारी कर इसकी लॉन्चिंग पर फिलहाल रोक लगाने को कहा। सरकार का कहना है कि पहले इस फीचर के प्राइवेसी और साइबर सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर चर्चा और समीक्षा जरूरी है।

अब Telegram और Signal से भी मांगा जाएगा जवाब

WhatsApp के बाद अब सरकार की नजर Telegram और Signal पर भी है। इन दोनों मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर पहले से ही Username फीचर उपलब्ध है, जिससे यूजर बिना मोबाइल नंबर बताए दूसरे व्यक्ति से संपर्क कर सकते हैं। सरकार यह जानना चाहती है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर किसी यूजर की वास्तविक पहचान कैसे सत्यापित की जाती है और क्या कोई व्यक्ति किसी सरकारी संस्था, सेलिब्रिटी या अन्य व्यक्ति जैसा फर्जी यूजरनेम बनाकर लोगों के साथ धोखाधड़ी कर सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों कंपनियों से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया है।

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Arattai भी हटाएगा Username फीचर

Zoho के सह-संस्थापक श्रीधर वेंबु ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि भारतीय मैसेजिंग ऐप Arattai भी अपना Username फीचर बंद करने जा रही है। उन्होंने कहा कि यह फैसला बदलते नियामकीय माहौल और संभावित नियमों के अनुरूप लिया जा रहा है। हालांकि, सरकार ने किसी भी प्लेटफॉर्म पर Username फीचर पर प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन उससे जुड़े सुरक्षा जोखिमों पर जवाब जरूर मांगा है।

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सरकार को किस बात की चिंता है?

 

सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि Username फीचर का गलत इस्तेमाल कर साइबर अपराधी किसी सरकारी विभाग, बैंक, सेलिब्रिटी या प्रसिद्ध संस्था से मिलता-जुलता यूजरनेम बनाकर लोगों को धोखा दे सकते हैं। चूंकि WhatsApp देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले मैसेजिंग ऐप्स में शामिल है, इसलिए इस तरह की धोखाधड़ी का खतरा और बढ़ सकता है।

WhatsApp ने सफाई में क्या कहा

Meta का कहना है कि Username फीचर को सुरक्षित बनाने के लिए कई सुरक्षा उपाय किए गए हैं। सेलिब्रिटी और प्रमुख संस्थाओं से जुड़े यूजरनेम रिजर्व रखे जाएंगे, ताकि उनकी फर्जी पहचान न बनाई जा सके। यूजर चाहें तो Username Key फीचर चालू कर सकते हैं। इसके बाद किसी व्यक्ति को सिर्फ यूजरनेम ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ा चार अंकों का यूनिक कोड भी पता होना जरूरी होगा। WhatsApp पर Username की कोई सार्वजनिक Search Directory नहीं होगी, जिससे अनचाहे मैसेज और स्पैम की संभावना कम होगी।

जापानी कंपनियों को भारत के गांवों तक लेकर आएंगे श्रीधर वेम्बु! इसके लिए वो पहुंच रहे जापान और उनका ये है प्लान

Sridhar Vembu: जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक और सीईओ श्रीधर वेम्बु ने एक बड़ी योजना का ऐलान किया है। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वेम्बु जापान की यात्रा पर जा रहे हैं। उनका मकसद जापान की छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी तलाशना है। इस अनूठी पहल का उद्देश्य जापान की इन कंपनियों को भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों से जोड़ना है ताकि देश के गांवों में कारीगरी व शिल्प कौशल की संस्कृति को फिर से जीवित किया जा सके।

गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट शेयर करते हुए श्रीधर वेम्बु ने अपने इस पूरे एजेंडे की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह जापान के छोटे शहरों में स्थित व्यवसायों के साथ काम करना चाहते हैं और उनकी विशेषज्ञता को भारत के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचाना चाहते हैं। वेम्बु ने लिखा कि मैं कल जापान जा रहा हूं। एजेंडा जापान के छोटे शहरों की छोटी से मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी करना और उन्हें भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लाना है।

शिल्प कौशल और कारीगरी को पुनर्जीवित करने पर फोकस

श्रीधर वेम्बु की मुताबिक इस पहल की जड़ें पारंपरिक शिल्प कौशल को फिर से बहाल करने की इच्छा से जुड़ी हैं। इसे उन्होंने तमिल शब्द आसारी (Aasaari) और संस्कृत शब्द विश्वकर्मा (Vishwakarma) के जरिए भी अपने विजन को समझाने की कोशिश की है।

उन्होंने कहा कि जापान की कई छोटी कंपनियां आज भी इन मूल्यों को संजोए हुए हैं। इन कंपनियों ने प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और अन्य अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले क्षेत्रों में विश्व स्तरीय क्षमताएं विकसित की हैं। वेम्बु ने कहा कि जापानी लोग उन क्षेत्रों में वैश्विक लीडर हैं जिनमें जटिल और बारीक शिल्प कौशल की आवश्यकता होती है।

पुराने दोस्त ब्रिट्टो-सान से मिली इस मिशन की प्रेरणा

वेम्बु ने बताया कि इस पूरे मिशन में उन्हें उनके एक पुराने मित्र ब्रिट्टो से मार्गदर्शन मिल रहा है। मूल रूप से मदुरै के रहने वाले ब्रिट्टो ने जापान में कई दशक बिताए हैं और वहां की व्यावसायिक संस्कृति की उन्हें गहरी समझ है। ब्रिट्टो ने बाद में ताकुमी मोशन कंट्रोल्स की स्थापना की थी। जोहो के संस्थापक ने रेखांकित किया कि जापानी शब्द ताकुमी का अर्थ शिल्पकार होता है। ये जो जापानी विनिर्माण परंपराओं के प्रति उनके साझा सम्मान को दर्शाता है। वेम्बु ने लिखा कि जापानी शिल्प कौशल के प्रति हमारे आदर और प्रशंसा ने ब्रिट्टो-सान और मुझे एक साथ जोड़ा। अब यह हमारे लिए एक मिशन बन गया है।

वेम्बु के रूरल-फर्स्ट विजन से मेल खाती है यह पहल

यह घोषणा ग्रामीण विकास और विकेंद्रीकरण पर वेम्बु के लंबे समय से चले आ रहे फोकस के बिल्कुल अनुकूल है। वे पिछले कई वर्षों से लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि विश्व स्तरीय तकनीक और नवाचार का निर्माण बड़े महानगरों से बाहर भी किया जा सकता है। इसी सोच के तहत जोहो छोटे शहरों और गांवों में अपने परिचालन और प्रशिक्षण पहलों का विस्तार कर रही है।

यह जापान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब कुछ ही दिन पहले वेम्बु ने बताया था कि जोहो के रेवेन्यू का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा भारत के बाहर से आता है। भारतीय सरकार से उन्हें सिर्फ 2 प्रतिशत रेवेन्यू मिलता है। जोहो की वैश्विक स्तर पर बड़ी मौजूदगी है। इसके कार्यालय जापान, अमेरिका, नीदरलैंड, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में हैं।

ग्रामीण भारत के विकास के लिए पहले भी किए हैं बड़े प्रयास

जोहो प्रमुख का यह ताजा जापान मिशन उनके उस ग्रामीण-विकास दर्शन का हिस्सा है जिसकी वे एक दशक से अधिक समय से वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के गांवों और छोटे शहरों में अपार प्रतिभा छिपी है, और यदि उन्हें अवसर व इंफ्रास्ट्रक्चर मिले तो वे नवाचार, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग के बड़े केंद्र बन सकते हैं।

तेनकासी का सफल मॉडल

इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए जोहो ने 2011 में ग्रामीण तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक गांव मथलमपराई में एक टेक्नोलॉजी सेंटर शुरू किया था। उद्योग की इस धारणा को तोड़ते हुए कि हाई-एंड सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल बड़े शहरों में हो सकता है, यह सेंटर आज एक बड़े रूरल टेक इकोसिस्टम में बदल चुका है। यहां सैकड़ों स्थानीय पेशेवर काम करते हैं। चेन्नई जैसे बड़े शहरों में नौकरियों के अत्यधिक संकेंद्रण को रोकने के लिए वेम्बु ने जानबूझकर ग्रामीण क्षेत्रों का रुख किया। इसके तहत तिरुनेलवेली, मदुरै और कुंभकोणम क्षेत्रों सहित पूरे तमिलनाडु में अतिरिक्त ग्रामीण परिसर और सैटेलाइट कार्यालय स्थापित किए गए हैं।

स्थानीय स्टार्टअप्स में निवेश

महानगरों से बाहर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने ड्रोन स्टार्टअप याली एयरोस्पेस और पावर-टूल्स वेंचर करुवी जैसे स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी उपक्रमों में भी निवेश किया है।

गांवों की तरफ रिवर्स माइग्रेशन की अपील

श्रीधर वेम्बु ने हाल ही में गांवों की ओर रिवर्स माइग्रेशन का आह्वान किया है। उनका तर्क है कि दशकों से बड़े शहरों की ओर हो रहे पलायन ने ग्रामीण समुदायों से प्रतिभाओं को पूरी तरह निचोड़ लिया है। वेम्बु के मुताबिक, ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए लोगों के निवास स्थान के करीब ही रोजगार, उद्यमिता और दीर्घकालिक निवेश लाने की सख्त जरूरत है।

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‘जोहो का नाम लिया और 90% कम हो गई कीमत’ Zoho के को-फाउंडर ने शेयर किया किस्सा

माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस लाइसेंस की कीमत को लेकर जोहो के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू का एक दावा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। जोहो के को-फाउंडर और चीफ साइंटिस्ट श्रीधर वेम्बू ने दावा किया कि एक भारतीय कस्टमर को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस लाइसेंस रिन्यूअल की कीमत में 90 परसेंट की कमी मिली, जब उसने सॉफ्टवेयर की बड़ी कंपनी को बताया कि वह जोहो के ऑफिस-सूट प्रोडक्ट्स को देख रही है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर की गई अपनी पोस्ट में श्रीधर वेम्बू ने बताया कि, संबंधित ग्राहक पहले से जोहो के कुछ प्रोडक्ट्स इस्तेमाल कर रहा था। उनके अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट ने लाइसेंस रिन्यूअल साइकिल के दौरान कीमत में तेजी से बढ़ोतरी की थी। इसके बाद ग्राहक ने कंपनी को बताया कि वह जोहो के ऑफिस सॉफ्टवेयर को अपनाने पर विचार कर रहा है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुई पोस्ट

श्रीधर वेम्बू ने कस्टमर के हवाले से कहा, “माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस का एक बड़ा लाइसेंस रिन्यूअल आया और उन्होंने कीमत में भारी बढ़ोतरी कर दी। हमने उन्हें बताया कि हम जोहो ऑफिस सूट देख रहे हैं और उन्होंने कीमत में 90 परसेंट की कमी कर दी।” उन्होंने आगे कहा कि कस्टमर ने बाद में कंपनी के पैसे बचाने में मदद करने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया, “भले ही हमारा ऑफिस सूट खरीदा न हो।” श्रीधर वेम्बू ने अपनी पोस्ट में ग्राहक की पहचान, माइक्रोसॉफ्ट के अनुबंध का आकार या छूट किन शर्तों पर दी गई, इसकी कोई जानकारी शेयर नहीं की।

उन्होंने सुझाव दिया कि जिन संस्थानों या कंपनियों का माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस लाइसेंस नवीनीकरण होने वाला है, वे बातचीत के दौरान जोहो को एक संभावित ऑप्शन के रूप में सामने रख सकते हैं। श्रीधर वेम्बू ने ये एग्जांपल तकनीकी क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर अपनी बात रखते हुए शेयर किया। वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नए मॉडलों को लेकर चर्चा कर रहे थे और उनका कहना था कि चीन के ओपन-सोर्स एआई मॉडल्स से बढ़ते मुकाबले के कारण बड़ी टेक कंपनियों को भी अपनी रणनीति और पेशकश में अधिक आक्रामक बदलाव करने पड़ रहे हैं।

श्रीधर वेम्बू ने कहा कि, सॉफ्टवेयर बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा फायदा ग्राहकों को मिलता है। उनके अनुसार, जब बाजार में कई मजबूत विकल्प मौजूद होते हैं, तो बड़ी कंपनियां मनमाने तरीके से कीमतें तय नहीं कर पातीं और ग्राहकों को बेहतर दाम व विकल्प मिलते हैं। उसी पोस्ट में श्रीधर वेम्बू ने अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट से जुड़े एंटीट्रस्ट मामले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि साल 2000 में एक संघीय अदालत ने कंपनी को मोनोपॉली से जुड़े मामले में दोषी माना था।

वेम्बू के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सॉफ्टवेयर और क्लाउड सेवाओं जैसे क्षेत्रों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रहना जरूरी है, क्योंकि इससे बाजार संतुलित रहता है और ग्राहकों को बेहतर विकल्प मिलते हैं। श्रीधर वेम्बू ने दावा किया कि माइक्रोसॉफ्ट लंबे समय से अपने ग्राहकों से अधिक कीमत वसूलती रही है।