जापानी कंपनियों को भारत के गांवों तक लेकर आएंगे श्रीधर वेम्बु! इसके लिए वो पहुंच रहे जापान और उनका ये है प्लान

Sridhar Vembu: जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक और सीईओ श्रीधर वेम्बु ने एक बड़ी योजना का ऐलान किया है। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वेम्बु जापान की यात्रा पर जा रहे हैं। उनका मकसद जापान की छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी तलाशना है। इस अनूठी पहल का उद्देश्य जापान की इन कंपनियों को भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों से जोड़ना है ताकि देश के गांवों में कारीगरी व शिल्प कौशल की संस्कृति को फिर से जीवित किया जा सके।

गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट शेयर करते हुए श्रीधर वेम्बु ने अपने इस पूरे एजेंडे की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह जापान के छोटे शहरों में स्थित व्यवसायों के साथ काम करना चाहते हैं और उनकी विशेषज्ञता को भारत के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचाना चाहते हैं। वेम्बु ने लिखा कि मैं कल जापान जा रहा हूं। एजेंडा जापान के छोटे शहरों की छोटी से मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी करना और उन्हें भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लाना है।

शिल्प कौशल और कारीगरी को पुनर्जीवित करने पर फोकस

श्रीधर वेम्बु की मुताबिक इस पहल की जड़ें पारंपरिक शिल्प कौशल को फिर से बहाल करने की इच्छा से जुड़ी हैं। इसे उन्होंने तमिल शब्द आसारी (Aasaari) और संस्कृत शब्द विश्वकर्मा (Vishwakarma) के जरिए भी अपने विजन को समझाने की कोशिश की है।

उन्होंने कहा कि जापान की कई छोटी कंपनियां आज भी इन मूल्यों को संजोए हुए हैं। इन कंपनियों ने प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और अन्य अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले क्षेत्रों में विश्व स्तरीय क्षमताएं विकसित की हैं। वेम्बु ने कहा कि जापानी लोग उन क्षेत्रों में वैश्विक लीडर हैं जिनमें जटिल और बारीक शिल्प कौशल की आवश्यकता होती है।

पुराने दोस्त ब्रिट्टो-सान से मिली इस मिशन की प्रेरणा

वेम्बु ने बताया कि इस पूरे मिशन में उन्हें उनके एक पुराने मित्र ब्रिट्टो से मार्गदर्शन मिल रहा है। मूल रूप से मदुरै के रहने वाले ब्रिट्टो ने जापान में कई दशक बिताए हैं और वहां की व्यावसायिक संस्कृति की उन्हें गहरी समझ है। ब्रिट्टो ने बाद में ताकुमी मोशन कंट्रोल्स की स्थापना की थी। जोहो के संस्थापक ने रेखांकित किया कि जापानी शब्द ताकुमी का अर्थ शिल्पकार होता है। ये जो जापानी विनिर्माण परंपराओं के प्रति उनके साझा सम्मान को दर्शाता है। वेम्बु ने लिखा कि जापानी शिल्प कौशल के प्रति हमारे आदर और प्रशंसा ने ब्रिट्टो-सान और मुझे एक साथ जोड़ा। अब यह हमारे लिए एक मिशन बन गया है।

वेम्बु के रूरल-फर्स्ट विजन से मेल खाती है यह पहल

यह घोषणा ग्रामीण विकास और विकेंद्रीकरण पर वेम्बु के लंबे समय से चले आ रहे फोकस के बिल्कुल अनुकूल है। वे पिछले कई वर्षों से लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि विश्व स्तरीय तकनीक और नवाचार का निर्माण बड़े महानगरों से बाहर भी किया जा सकता है। इसी सोच के तहत जोहो छोटे शहरों और गांवों में अपने परिचालन और प्रशिक्षण पहलों का विस्तार कर रही है।

यह जापान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब कुछ ही दिन पहले वेम्बु ने बताया था कि जोहो के रेवेन्यू का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा भारत के बाहर से आता है। भारतीय सरकार से उन्हें सिर्फ 2 प्रतिशत रेवेन्यू मिलता है। जोहो की वैश्विक स्तर पर बड़ी मौजूदगी है। इसके कार्यालय जापान, अमेरिका, नीदरलैंड, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में हैं।

ग्रामीण भारत के विकास के लिए पहले भी किए हैं बड़े प्रयास

जोहो प्रमुख का यह ताजा जापान मिशन उनके उस ग्रामीण-विकास दर्शन का हिस्सा है जिसकी वे एक दशक से अधिक समय से वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के गांवों और छोटे शहरों में अपार प्रतिभा छिपी है, और यदि उन्हें अवसर व इंफ्रास्ट्रक्चर मिले तो वे नवाचार, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग के बड़े केंद्र बन सकते हैं।

तेनकासी का सफल मॉडल

इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए जोहो ने 2011 में ग्रामीण तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक गांव मथलमपराई में एक टेक्नोलॉजी सेंटर शुरू किया था। उद्योग की इस धारणा को तोड़ते हुए कि हाई-एंड सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल बड़े शहरों में हो सकता है, यह सेंटर आज एक बड़े रूरल टेक इकोसिस्टम में बदल चुका है। यहां सैकड़ों स्थानीय पेशेवर काम करते हैं। चेन्नई जैसे बड़े शहरों में नौकरियों के अत्यधिक संकेंद्रण को रोकने के लिए वेम्बु ने जानबूझकर ग्रामीण क्षेत्रों का रुख किया। इसके तहत तिरुनेलवेली, मदुरै और कुंभकोणम क्षेत्रों सहित पूरे तमिलनाडु में अतिरिक्त ग्रामीण परिसर और सैटेलाइट कार्यालय स्थापित किए गए हैं।

स्थानीय स्टार्टअप्स में निवेश

महानगरों से बाहर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने ड्रोन स्टार्टअप याली एयरोस्पेस और पावर-टूल्स वेंचर करुवी जैसे स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी उपक्रमों में भी निवेश किया है।

गांवों की तरफ रिवर्स माइग्रेशन की अपील

श्रीधर वेम्बु ने हाल ही में गांवों की ओर रिवर्स माइग्रेशन का आह्वान किया है। उनका तर्क है कि दशकों से बड़े शहरों की ओर हो रहे पलायन ने ग्रामीण समुदायों से प्रतिभाओं को पूरी तरह निचोड़ लिया है। वेम्बु के मुताबिक, ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए लोगों के निवास स्थान के करीब ही रोजगार, उद्यमिता और दीर्घकालिक निवेश लाने की सख्त जरूरत है।

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ऑक्सफोर्ड MBA ग्रेजुएट ने छोड़ी नौकरी, गांव में एवोकाडो उगाकर कमाए 8 लाख

आखिर क्या वजह है कि कोई व्यक्ति विदेश में मिली शिक्षा और कॉर्पोरेट की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गांव में खेती करने का फैसला करता है? जयपाल नाइक के लिए यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि कॉर्पोरेट की एक जैसे रूटीन से परेशान और गांव की जिंदगी के प्रति बढ़ते लगाव के कारण धीरे-धीरे हुआ बदलाव था।

उनका सफर लंदन से शुरू हुआ, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मार्केटिंग में MBA किया। इसके बाद उन्होंने हीथ्रो एयरपोर्ट के कस्टम्स डिपार्टमेंट में और फिर हैदराबाद में कॉर्पोरेट नौकरी की। इतने अच्छे करियर के बावजूद, धीरे-धीरे उनका ध्यान हैदराबाद से लगभग 45 किलोमीटर दूर अपने गाँव, डेबडागुडा की ओर मुड़ने लगा।

क्या खेती से होने वाली कमाई, समय के साथ कॉर्पोरेट नौकरी से मिलने वाली स्थिर आय की बराबरी कर सकती है?

जयपाल को इसका जवाब कई सालों की कोशिशों, नुकसान और बदलावों के बाद मिला। ’30Stades’ के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया, “एक साल बाद मैंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि मुझे 9-से-5 वाली कॉर्पोरेट जिंदगी का एक जैसापन पसंद नहीं आ रहा था। मैंने खेती में अपने परिवार का साथ देने का फैसला किया।”

उस समय, उनका परिवार पारंपरिक खेती करता था और केमिकल का इस्तेमाल करके मक्का, ज्वार, सब्जियां और अरहर की दाल उगाता था। लेकिन, बढ़ती लागत और अस्थिर कीमतों की वजह से मुनाफा कम हो रहा था। उन्होंने बताया, “बाजार में कीमतें अस्थिर थीं और खेती की लागत बढ़ती जा रही थी, जिससे मुनाफ़े पर असर पड़ रहा था। मिट्टी में केमिकल का इस्तेमाल करना अब फ़ायदेमंद नहीं रह गया था।”

जब आमदनी कम होने लगी, तो जयपाल ने बागवानी में दूसरे विकल्पों पर विचार करना शुरू किया। लेकिन उन्होंने देखा कि कई पारंपरिक फल उगाने वाले किसान पहले से ही ज़्यादा सप्लाई और कीमतों में भारी गिरावट के कारण नुकसान उठा रहे थे। उन्होंने कहा, “यह साफ़ था कि विदेशी फलों की खेती करना सही रहेगा क्योंकि इसमें कॉम्पिटिशन कम है और मांग ज़्यादा है।”

2013 में, उन्होंने एवोकाडो की खेती की दिशा में अपना पहला बड़ा कदम उठाया। उन्होंने इज़राइल से 200 ‘हस’ (Hass) एवोकाडो के पौधे 1,200 रुपये प्रति पौधे की दर से मंगवाए। यह प्रयोग नाकाम रहा। उन्होंने याद करते हुए कहा, “हस एवोकाडो ठंडी जलवायु के लिए उपयुक्त होते हैं और 30°C से ज़्यादा तापमान में जीवित नहीं रह सकते। तेलंगाना में ये पौधे ठीक से नहीं पनपे और सारा निवेश डूब गया।”

इस झटके के बाद, वह सिविल कॉन्ट्रैक्टिंग के काम में लौट आए, लेकिन COVID-19 महामारी के दौरान वह काम भी बंद हो गया। इसके बाद वह फिर से खेती की ओर मुड़े, लेकिन इस बार बेहतर प्लानिंग और हालात की बेहतर समझ के साथ। जयपाल ने बताया कि एवोकाडो इसलिए खास थे क्योंकि भारतीय बाज़ार अभी विकसित हो रहा था, जबकि पारंपरिक फलों के मामले में अक्सर ज़्यादा सप्लाई के कारण कीमतें गिर जाती हैं।

पौधों के बीच जगह की समस्या के बावजूद, बागान के पौधे अच्छी तरह से पनपे और लगातार बढ़ते रहे। शुरुआत में, हर पेड़ से लगभग 5 से 10 किलो फल मिलते थे। शुरुआती बिक्री एक एक्सपोर्टर के जरिए होती थी जो उपज को कुवैत भेजता था। उन्होंने याद करते हुए कहा, “मैंने अपने एक दोस्त के ज़रिए इन्हें कुवैत भेजा, जो एक एक्सपोर्टर था।”

एक दुर्घटना के कारण एक्सपोर्ट रुकने पर, जयपाल ने घरेलू बाजार में बिक्री शुरू कर दी। उन्होंने स्थानीय स्तर पर लगभग 250 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचना शुरू किया, जहां मांग स्थिर बनी रही। जैसे-जैसे बागान के पेड़ बड़े हुए, पैदावार में काफ़ी सुधार हुआ। उन्होंने बताया, “अब, जब पौधे अपने छठे साल में हैं, तो पैदावार बढ़कर लगभग 20 किलो प्रति पेड़ हो गई है।”

1.2 एकड़ ज़मीन पर फल देने वाले लगभग 250 पेड़ों से उन्हें एवोकाडो से सालाना लगभग 8 लाख रुपये की कमाई होती है। उन्होंने आगे कहा, “यही ऑर्गेनिक एवोकाडो खेती की मुख्य खूबी है। इससे प्रति एकड़ अच्छा मुनाफ़ा मिलता है और जैसे-जैसे पेड़ बड़े होते हैं, पैदावार भी बढ़ती जाती है।”

उनके खेती के मॉडल में एक अहम बात ऑर्गेनिक खेती है। वह केमिकल वाले फ़र्टिलाइज़र और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि गाय के गोबर, गोमूत्र, नीम की खली और ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। जयपाल ने बताया, “आप 1 किलो ऑर्गेनिक एवोकाडो को ₹1,000 प्रति किलो के भाव से भी बेच सकते हैं। वहीं, केमिकल का इस्तेमाल करके उगाए गए एवोकाडो से ₹100 प्रति किलो भी नहीं मिलते। केमिकल से पैदावार तो बढ़ सकती है, लेकिन इससे कीमत कम हो जाती है, साथ ही मिट्टी को नुकसान पहुxचता है और लागत भी बढ़ती है।”

वे मंडियों या बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय, फसल कटने से पहले ही WhatsApp और सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे ग्राहकों को अपना माल बेचते हैं। खेती के साथ-साथ जयपाल ने नर्सरी का बिज़नेस भी शुरू किया है। वे एवोकाडो के पौधे बेचते हैं; बल्ब वैरायटी के पौधे ₹300 और पिंकर्टन वैरायटी के पौधे ₹400 में मिलते हैं। वे हर साल 5,000 से 10,000 पौधे बेचते हैं, जिससे उनकी कमाई में लगभग ₹5 लाख का योगदान होता है।

जयपाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि खेती में कामयाबी सिर्फ़ फ़सल चुनने से नहीं, बल्कि प्लानिंग, बाज़ार की समझ और स्थानीय हालात के हिसाब से काम करने से मिलती है। उन्होंने कहा, “खेती में कामयाबी का मतलब सिर्फ़ कोई विदेशी फल उगाना नहीं है। इसका मतलब है बाज़ार की मांग के हिसाब से फ़सल चुनना, स्थानीय मौसम के अनुकूल ढलना और लागत कम रखते हुए ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा कमाना।”

उन्होंने यह भी माना कि विदेशी फलों की खेती में शुरुआत में जोखिम होते हैं, लेकिन उनका कहना था कि जो लोग डटे रहते हैं, उन्हें लंबे समय में बहुत फ़ायदा हो सकता है। उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “विदेशी फलों की खेती में शुरू में ज़्यादा जोखिम होता है, लेकिन लंबे समय में मिलने वाला फ़ायदा काफ़ी ज़्यादा हो सकता है।”