जब हाउसवाइफ हो सकती है तो हाउस-हसबैंड क्यों नहीं? मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर इंटरनेट पर छिड़ी जंग

मद्रास: हाई कोर्ट में वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान मदुरै बेंच के सामने घर और परिवार की जिम्मेदारियों से जुड़ा एक अहम मामला सामने आया। इस मामले में पति-पत्नी की भूमिका और परिवार को संभालने से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा हुई।

यह मामला तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर दंपति का था। दोनों की शादी 2011 में हुई थी और उस समय वे पुडुचेरी के एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करते थे। 2012 में उनके पहले बच्चे का जन्म हुआ। इसके बाद पत्नी बच्चों की देखभाल के लिए अपने माता-पिता के साथ रहने लगी, जबकि पति ने कार्डियोलॉजी की आगे की पढ़ाई जारी रखी। फिर 2016 में दोनों का दूसरा बच्चा हुआ।

COVID-19 महामारी के बाद दोनों साथ रहने लगे, लेकिन कुछ समय बाद उनके बीच विवाद हो गया। पत्नी ने साथ रहने के लिए फैमिली कोर्ट का रुख किया, जबकि पति ने तलाक की मांग की। फैमिली कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों ने हाई कोर्ट में अपील की।

कोर्ट ने हाउस-हसबैंड के रोल का जिक्र कुछ इस तरह किया

सुनवाई के दौरान बेंच ने परिवार में अलग-अलग जिम्मेदारियों को लेकर बात की। कोर्ट ने कहा कि परिवार बहुत जरूरी है और घर संभालने के काम को भी कमाई जितनी अहमियत मिलनी चाहिए। साथ ही कहा कि यदि हाउसवाइफ का रोल हो सकता है तो हाउस-हसबैंड का रोल भी हो सकता है। बेंच ने यह भी कहा कि ‘होममेकर’ (Homemaker) शब्द किसी एक जेंडर को नहीं बताता है। कोर्ट ने घर के काम की कीमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कही बात का भी जिक्र किया।

सुनवाई के दौरान पति ने बच्चों की भलाई को ध्यान में रखते हुए पत्नी को 2.5 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई। पत्नी ने भी इस समझौते को स्वीकार कर लिया। इसके बाद हाई कोर्ट ने आपसी सहमति से दोनों को तलाक दे दिया। कोर्ट के आदेशानुसार पति को तीन महीने के भीतर पत्नी को 1.5 करोड़ रुपये देने हैं। इसके अलावा दोनों बच्चों के नाम पर एक साल के भीतर 50-50 लाख रुपये जमा करने हैं।

कोर्ट की बात सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों के अलग-अलग रिएक्शन आए। इसके साथ ही इस मामले ने एक बार फिर यह चर्चा सामने ला दी है कि परिवार में घर और बाहर की जिम्मेदारियां पति-पत्नी दोनों की हो सकती हैं। घर संभालने के काम को भी परिवार की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा माना जाना चाहिए।

McLaren plans to discontinue the GTS, Artura by end of 2028

McLaren plans to discontinue the GTS, Artura by end of 2028
McLaren logo

McLaren is planning to discontinue the GTS and Artura models by the end of 2028, which are two of its core models. The decision comes as McLaren seeks to introduce new models to its line-up, which will also include the brand’s first-ever SUV.

  • GTS to go first, followed by the Artura.
  • McLaren working on new hybrid powertrain options.
  • Upcoming SUV’s platform could be used for other future models.

Two McLaren models to be axed in two years

McLaren GTS
McLaren GTS

First arriving in December 2023, the GTS was the facelifted McLaren GT. The Ferrari Amalfi and Aston Marti DB12 rival is powered by a 4.0-litre twin-turbo V8 producing 635hp and 630Nm of torque. This will be the first of the company’s core models to be discontinued, possibly in 2027.

McLaren Artura
McLaren Artura

The GTS is to be followed by the Artura, whose 3.0-litre twin-turbo V6 is paired with an electric motor for a combined output of 700hp and 720Nm. The Ferrari 296 rival was revealed globally in February 2021 during the COVID-19 pandemic, resulting in semiconductor shortages and supply-chain-related issues that impacted the development of the hybrid supercar. While the Artura has been one of McLaren’s most popular models, it is to bow out by the end of 2028.

Upcoming McLaren models

Successor to the venerable 720S, the 750S is another one of McLaren’s core models in its current line-up. However, it could be gone in 2027 as the recently unveiled limited-run 788HS being the last iteration of this supercar. McLaren is not expected to stray away from the concept of a rear-engine supercar as it embarks on expanding its line-up, though. Powering these upcoming models will be a range of new hybrid powertrains, though further details on them are unavailable as of now.

McLaren 750S
McLaren 750S

The British automaker will develop its own powertrain for these new models. “No longer will we be only rear-engined, rear-wheel-drive cars. There’s going to be front-engined and either four-wheel drive or perhaps rear-wheel drive in the future. We don’t have to be constrained by a V6 and a V8 in the future”, McLaren Chief Operating Officer Michael Straughan said in a statement.

Meanwhile, a new McLaren supercar is slated to break cover by 2028, though the brand is yet to clarify if this would be an Artura successor or an entirely new addition to the line-up. It is to be powered by a twin-turbo V6 hybrid setup capable of developing 1,085Nm of torque, Automotive News reported citing insider information. The front-engine platform used for the first-ever McLaren SUV, meanwhile, could make its way into several of the brand’s upcoming models, including a four-seat grand tourer.

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20 लाख खर्च कर MBA ग्रेजुएट ने शुरू की शिमला मिर्च की खेती, सालाना 2.25 करोड़ का कमा रही मुनाफा

MBA ग्रेजुएट प्रणिता वामन ने कोरोना काल में 20 लाख का एक समझदारीभरा निवेश किया था, जिसके बाद से आज वह करोड़ों का प्रोफिट कमा रही हैं। उन्होंने COVID-19 लॉकडाउन के दौरान शिमला मिर्च की खेती करनी शुरू की थी। एक एकड़ से शुरू हुआ काम आज 25 एकड़ के फार्म तक पहुंच चुका है। उनका टर्नओवर 4 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

30Stades की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी ये जर्नी फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में इंटर्नशिप के साथ शुरू हुई थी, जहां उन्होंने मॉर्डन एग्रीकल्चर (आधुनिक खेती) में संभावनाओं को खोजा । 2020 में एक एकड़ पॉलीहाउस खेती से शुरू हुआ यह काम अब 25 एकड़ के खेती के कारोबार में तक पहुंच गया है, जिससे प्रणिता वामन का सालाना ₹4 करोड़ का टर्नओवर होता है।

MBA से खेती तक का सफर

प्रणिता वामन महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नार तालुका के कलवाड़ी गांव से ताल्लुक रखती हैं। वह एक किसान परिवार में पली-बढ़ी हैं। उनके पिता टीचर थे, लेकिन वॉलंटरी रिटायरमेंट लेने के बाद भी वे फलों और सब्जियों की खेती से जुड़े रहे। उन्होंने 2019 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज पुणे से एग्री बिजनेस मैनेजमेंट में MBA किया है। अपनी डिग्री करने के बाद उन्होंने एक फूड प्रोसेसिंग कंपनी में इंटर्नशिप करनी शुरू किया था।

इंटरर्नशिप से मिले एक्सपीरिएंस ने वामन को हाई-टेक खेती, खासकर पॉलीहाउस खेती के बारे में जानने के लिए काफी मोटीवेट किया। कम संसाधन में किसान फसल उगाने की स्थितियों को कैसे मैनेज कर सकते हैं, फसल की पैदावार और क्वालिटी बेहतर कैसे बना सकते हैं और पौधों को खराब मौसम से कैसे बचा सकते हैं? यह सब उन्होंने सीखा। बदलते मौसम के पैटर्न को देखते हुए कंट्रोल किए गए माहौल में सही तरीके से खेती आसानी से की जा सकती है।

वामन ने बताया कि हम तेजी से बदलते मौसम का सामना करते रहते हैं। आज लगातार अच्छी कमाई करने का एकमात्र तरीका हाई-टेक खेती है। यह बेहद फायदेमंद भी है।

प्रणिता ने शिमला मिर्च की खेती को ही क्यों चुना?

MBA ग्रेजुएट ने कहा खेती करने की प्लानिंग तो करली गई, लेकिन फिर हमारे सामने अगला सवाल यह था कि क्या उगाया जाए? वामन ने शिमला मिर्च (कैप्सिकम) को चुनने से पहले लेट्यूस और ब्रोकली जैसी कई सब्जियों को उगाने के बारे में भी विचार किया था। आखिरकार फिर उन्होंने शिमला मिर्च की फसल को चुना क्योंकि इसकी मांग हर मौसम में बनी रहती है।

वामन ने कहा कि “मैंने लेट्यूस, ब्रोकली और दूसरी विदेशी सब्जियों की खेती करने के बारे में विचार किया था। लेकिन शिमला मिर्च की मांग की डिमांड को देखते हुए हमने इसे फाइनल किया। शिमला मिर्च सालभर डिमांड में रहती है। इसका कोई खास सीजन नहीं होता है।

सालभर बाजार में रहती है डिमांड

ये शहरों के बाजारों में सालभर बिकती है। शिमला का यूज होटल, रेस्टोरेंट और फूड बिजनेस में बड़े पैमाने पर किया जाता है। खासकर लाल और पीली शिमला मिर्च अक्सर हरी शिमला मिर्च के मुकाबले ज्यादा महंगी बिकती हैं। इस फसल का एक बड़ा इंटरनेशनल मार्केट भी है।

वामन के मुताबिक उन्होंने मार्च 2020 में वामन ने 50% सरकारी सब्सिडी के साथ 20 लाख रुपये का निवेश करके एक पॉलीहाउस में एक एकड़ ज़मीन पर शिमला मिर्च की खेती शुरू की थी। उन्होंने KVK बारामती से लाए गए 12,000 पौधे लगाए थे। फसल जून-जुलाई में पूरी तरह से तैयार हो गई थी। लेकिन उनकी पहली फसल कटने का समय कोविड-19 लॉकडाउन लग गया था, जिससे बाजार बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।

खरीदार ढूंढना था चुनौती

कमर्शियल खेती में नए होने की वजह से खरीदार ढूंढना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी। वामन ने माना “फील्ड में नई होने के नाते मुझे ये पता नहीं था कि अपनी फसल को कहां बेचना है। इसके बाद उन्होंने ऑनलाइन थोक सब्जी खरीदारों को ढूंढना शुरू किया। अपनी फसल बेचने के लिए उन्होंने नासिक से लेकर मुंबई तक के व्यापारियों से संपर्क किया। वामन ने बताया कि काफी मशक्कत के बाद मुझे शिमला मिर्च खरीदने के लिए एक व्यापारी मिला था। लॉकडाउन के दौरान कई किसानों ने इसकी खेती बंद कर दी थी।”

उनकी पहली फसल में 40 टन लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च हुई, जो 80 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकी थी। इससे उन्होंने 32 लाख रुपये कमाए थे। अपना 20 लाख रुपये का इंवेस्टमेंट निकालने के बाद वामन ने 2021 तक खेती का दायरा बढ़ाकर 1 से 25 एकड़ कर लिया था। इसमें छह एकड़ में पॉलीहाउस और 19 एकड़ में शेड नेट का इस्तेमाल किया, जिनसे अलग-अलग पैदावार और कीमतें मिलीं।

जानकारी के लिए बता दें कि पॉलीहाउस खेती से सालाना प्रति एकड़ लगभग 30-32 टन पैदावार मिलती है, जबकि शेड नेट के तहत यह 22-24 टन होती है। वामन ने बताया कि पॉलीहाउस से उन्हें प्रति एकड़ 30 लाख रुपये का टर्नओवर होता है, जिसमें 8-10 लाख रुपये का खर्च आता है। 25 एकड़ में वह सालाना 4 करोड़ रुपये का टर्नओवर और लगभग 2.25 करोड़ रुपये का मुनाफा आराम से कमा लेती हैं।

देहरादून में स्वाइन फ्लू और कोरोना का बढ़ता कहर, H1N1 के 105 मामले, 5 मरीजों की मौत

देहरादून में स्वाइन फ्लू और कोरोना का बढ़ता कहर, H1N1 के 105 मामले, 5 मरीजों की मौत

swine flue

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्वाइन फ्लू (Influenza H1N1) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। जिले में सोमवार को 24 नए स्वाइन फ्लू के मामले सामने आए। इसके साथ ही कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 105 हो गई है। अब तक इस संक्रमण से 5 मरीजों की मौत हो चुकी है।

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खबरों के मुताबिक स्वाइन फ्लू के साथ-साथ कोरोनावायरस (Covid-19) के नए मामले भी सामने आ रहे हैं। रविवार को एम्स ऋषिकेश में 1 और श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में 2 नए कोविड मामले दर्ज किए गए। देहरादून के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने बताया कि जिले में सामने आए कुल 105 मामलों में 71 मरीज देहरादून जिले के, जबकि 34 मरीज दूसरे राज्यों और जिलों से हैं।

 

देहरादून में 36 एक्टिव केस

 

सीएमओ के मुताबिक, सोमवार को सामने आए 24 नए मामलों में 16 देहरादून और 8 अन्य राज्यों व जिलों से हैं। फिलहाल जिले में 36 एक्टिव केस हैं।

 

इनमें से 22 मरीज श्री महंत इंदिरेश अस्पताल, 7 मरीज एम्स ऋषिकेश, 4 मरीज हिमालयन अस्पताल, 1 मरीज कैलाश अस्पताल, 1 मरीज राजकीय दून मेडिकल कॉलेज (GDMC) अस्पताल और 1 मरीज ग्राफिक एरा अस्पताल में भर्ती है।

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3-4 दिन से बुखार तो तुरंत कराएं जांच

 

डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को तीन से चार दिनों तक लगातार बुखार रहता है और इसके साथ सीने में दर्द या सांस लेने में परेशानी होती है, तो उसे तुरंत स्वाइन फ्लू की जांच करानी चाहिए।

 

उन्होंने लोगों से संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए जरूरी सावधानियां बरतने की अपील की है।

 

कोरोना के मामलों पर भी नजर

 

देहरादून में स्वाइन फ्लू के साथ कोरोना संक्रमण के मामलों को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग सतर्क है। विभाग की ओर से स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और अस्पतालों में भर्ती मरीजों की स्थिति पर नजर बनाए रखी जा रही है।

Delhi-NCR में H1N1 और डेंगू का बढ़ा खतरा, डॉक्टरों ने बताया किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

दिल्ली-NCR के अस्पतालों में इन दिनों बुखार, फ्लू और डेंगू जैसी मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। ओपीडी (OPD) और इमरजेंसी में इनकी संख्या काफी ज्यादा देखी जा रही है। डॉक्टरों ने बताया है कि पिछले कुछ हफ्तों में इन्फ्लूएंजा A या H1N1 के मामलों में तेजी से उछाल आया है।

डॉक्टरों ने News18 को बताया कि मॉनसून के दौरान ज्यादा नमी और रुक-रुक कर होने वाली बारिश, साथ ही भीड़-भाड़ वाली बंद जगहें और फ्लू का टीका लगवाने वालों की कम संख्या इस बढ़ोतरी की वजह हैं।

हालांकि, ज्यादातर मरीज घर पर आराम और देखभाल से ठीक हो जाते हैं। लेकिन डॉक्टरों ने सलाह दी है कि सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द या ऑक्सीजन लेवल गिरने जैसे लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

मौसम और घर के अंदर भीड़-भाड़ की वजह से बढ़ीं बीमारियां

दिल्ली के BLK-Max सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन विभाग के हेड और वाइस चेयरमैन डॉ. राजिंदर कुमार सिंघल ने कहा, “पिछले कुछ हफ्तों में, पूरे इलाके में तेज बुखार वाली बीमारियों के लिए आउटपेशेंट (OPD) आने वालों और इमरजेंसी में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है।”

उन्होंने कहा कि मामलों में रेस्पिरेटरी वायरस इन्फेक्शन और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का मिला-जुला असर दिख रहा है। उन्होंने आगे कहा, “मौसम का बदलना, ज्यादा नमी और बीच-बीच में होने वाली बारिश से कम्युनिटी में पैथोजन (बीमारी फैलाने वाले कीटाणु) के जिंदा रहने और फैलने की रफ्तार काफी बढ़ जाती है।”

सिंघल ने कहा कि H1N1 के मामलों में बढ़ोतरी तीन वजहों से हो रही है: पहला, नमी वाला गर्म मौसम, जिससे इन्फेक्शन वाली बूंदें हवा में ज्यादा देर तक बनी रहती हैं। दूसरा, ” लोगों का बंद और एयर कंडीशन वाले कमरों में ज्यादा समय बिताना जहां हवा का बहाव ठीक नहीं होता और वायरस तेजी से फैलता है। और तीसरा, “फ्लू का सालाना वैक्सीनेशन कम होना और साफ-सफाई की आदतों में लापरवाही बरतना, जिससे बहुत से लोग बीमारी की चपेट में आ सकते हैं।”

दिल्ली में H1N1 के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी

फरीदाबाद के अमृता हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अर्जुन खन्ना ने हाल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि इस साल दिल्ली में H1N1 के 1,449 मामले सामने आए हैं, जो पिछले साल इसी समय के मुकाबले लगभग छह गुना ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि संक्रमण शुरू में हल्का लग सकता है, लेकिन कमजोर मरीजों में यह निमोनिया, खून में ऑक्सीजन का खतरनाक स्तर तक गिरना और कभी-कभी फेफड़ों के गंभीर रूप से फेल होने जैसी स्थिति में बदल सकता है।

खन्ना ने कहा, “बात साफ है: हर बार बुखार होने पर घबराएं नहीं, लेकिन इन्फ्लूएंजा को हल्के में भी न लें।” उन्होंने आगे कहा, “हम ऐसे बहुत से मरीज देख रहे हैं जिन्हें तेज बुखार, शरीर में तेज दर्द, खांसी, गले में खराश और बहुत ज्यादा थकान है। हमें चिंता है कि कुछ मरीजों की हालत उतनी तेजी से बिगड़ रही है, जितनी आम वायरल बुखार में उम्मीद नहीं की जाती।”

खन्ना ने बढ़ते मामलों के पीछे मानसून का मौसम, स्कूलों, ऑफिस और सार्वजनिक परिवहन जैसी भीड़भाड़ वाली बंद जगहों में खराब वेंटिलेशन और फ्लू वायरस में लगातार होने वाले बदलाव को जिम्मेदार बताया। उनका मतलब है कि पिछले संक्रमण या वैक्सीन से मिली सुरक्षा हमेशा के लिए नहीं रहती।

फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग में रेस्पिरेटरी मेडिसिन और रेस्पिरेटरी क्रिटिकल केयर के HOD, डॉ. विकास मौर्य ने भी कहा कि पिछले साल की तुलना में इस साल H1N1 पॉजिटिव पाए जाने वाले मरीजों की संख्या में “भारी उछाल” आया है। उन्होंने बताया कि फ्लू जैसे लक्षणों वाले मरीजों में से लगभग 70-80% H1N1 पॉजिटिव पाए जा रहे हैं, और इसके बाद इन्फ्लूएंजा के अन्य स्ट्रेन और रेस्पिरेटरी वायरस का नंबर आता है।

मौर्य ने कहा, “मानसून के दौरान होने वाला हर बुखार H1N1 की वजह से नहीं होता। हम अन्य वायरल रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन भी देख रहे हैं, जिनमें इन्फ्लूएंजा के अन्य स्ट्रेन जैसे H3N2 के साथ-साथ राइनोवायरस, एडेनोवायरस और COVID-19 जैसे इन्फेक्शन शामिल हैं। चिंता की एक और बात वे वायरस हैं जिनकी पहचान अभी उपलब्ध टेस्ट से नहीं हो पाती, लेकिन मरीज के लक्षणों से लगता है कि यह वायरल इन्फेक्शन है।”

लक्षण और खतरे के संकेत

डॉक्टरों ने News18 को बताया कि H1N1 का असर आम सर्दी-जुकाम की तुलना में अचानक और ज्यादा गंभीर होता है। इसमें तेज बुखार और कंपकंपी, शरीर में तेज दर्द, सिरदर्द और बहुत ज्यादा थकान, सूखी खांसी और गले में खराश जैसे लक्षण होते हैं। बच्चों में उल्टी या दस्त जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं।

खन्ना ने कहा, “सिर्फ 102 या 103 डिग्री बुखार खतरनाक नहीं है। खतरे के संकेत तब होते हैं जब इसके साथ सांस लेने में तकलीफ, सीने में बेचैनी, असामान्य रूप से बहुत ज्यादा नींद आना, उलझन या ऑक्सीजन का स्तर कम होना जैसे लक्षण दिखें।”

उन्होंने कहा, “ऐसे में इसका इलाज घर पर नहीं किया जाना चाहिए।”

खन्ना ने आगे कहा कि अगर कोई मरीज ठीक होता हुआ दिखे और फिर अचानक उसे दोबारा तेज बुखार आ जाए और खांसी बढ़ जाए, तो इसे निमोनिया या किसी दूसरी गंभीर समस्या का संभावित संकेत मानकर इलाज किया जाना चाहिए।

किन्हें और कब टेस्ट करवाना चाहिए?

डॉ. सिंघल के अनुसार, हल्के मामलों में फ्लू के लिए रूटीन टेस्टिंग की जरूरत नहीं होती, लेकिन ज्यादा जोखिम वाले ग्रुप्स के लिए इसकी पुरजोर सलाह दी जाती है — जैसे 65 साल से ज्यादा उम्र के लोग, 5 साल से कम उम्र के बच्चे, गर्भवती महिलाएं, और डायबिटीज, फेफड़ों की पुरानी बीमारी, अस्थमा, किडनी की बीमारी, दिल की बीमारी या कमजोर इम्यूनिटी (जैसे कैंसर के इलाज या ऑर्गन ट्रांसप्लांट की वजह से) वाले लोग।

ऐसे लोगों के लिए भी टेस्टिंग की सलाह दी जाती है जिनकी हालत बिगड़ रही हो, जैसे सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द या ऐसा बुखार जो ठीक न हो रहा हो।

खन्ना ने अस्पताल में भर्ती 29,000 से ज्यादा H1N1 मरीजों पर हुई एक बड़ी स्टडी का भी जिक्र किया, जिसमें पाया गया कि एंटीवायरल दवाएं जल्दी शुरू करने से मौतें कम हुईं। उन्होंने कहा कि डॉक्टर बहुत ज्यादा बीमार और ज्यादा जोखिम वाले मरीजों में टेस्ट के नतीजे आने से पहले ही एंटीवायरल इलाज शुरू कर सकते हैं।

सिंघल ने कहा कि ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) जैसी एंटीवायरल दवाएं तब सबसे अच्छा काम करती हैं जब उन्हें लक्षण शुरू होने के 48 घंटों के अंदर शुरू किया जाए।

मानसून के दौरान डेंगू के मामले भी बढ़ रहे हैं

दिल्ली के श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉ. अरविंद अग्रवाल ने कहा, “हमारी OPD सेवाओं में हर दिन डेंगू या H1N1 के शक वाले 15 से 20 मामले सामने आ रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “इनमें से 2 से 3 मरीजों को गंभीर पेट दर्द, लगातार उल्टी या ब्लड प्लेटलेट काउंट में तेजी से गिरावट जैसे गंभीर लक्षणों के कारण भर्ती करना पड़ता है।” उन्होंने आगे कहा कि बाकी मरीजों का इलाज OPD में ही हो जाता है, जिसमें वे खुद अपनी सेहत पर नजर रखते हैं और ओरल रिहाइड्रेशन (मुंह से तरल पदार्थ लेना) का तरीका अपनाते हैं।

अग्रवाल ने कहा, “हम लोगों को सलाह देते हैं कि वे अपने आस-पास पानी जमा न होने दें, मच्छर भगाने वाली चीजों का इस्तेमाल करें, साफ-सफाई बनाए रखें और लगातार बुखार होने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।”

डॉक्टरों की सलाह और सावधानियां

डॉक्टरों ने गंभीर बीमारी से बचने के लिए सालाना फ्लू वैक्सीन लगवाने की सलाह दी है, खासकर ज्यादा जोखिम वाले लोगों और हेल्थकेयर वर्कर्स के लिए। इसके साथ ही, खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढकने, कम से कम 20 सेकंड तक साबुन और पानी से हाथ धोने या हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने, और बिना बुखार की दवा लिए बुखार उतरने के कम से कम 24 घंटे बाद तक घर पर रहने की भी सलाह दी गई है।

उन्होंने खुद से एंटीबायोटिक्स लेने के खिलाफ भी चेतावनी दी है, क्योंकि ये फ्लू जैसे वायरल इन्फेक्शन पर असर नहीं करतीं और भविष्य में होने वाले इन्फेक्शन का इलाज मुश्किल बना सकती हैं। जब तक डॉक्टर खास तौर पर एंटीवायरल दवा न लिखें, तब तक पैरासिटामोल जैसी बुखार कम करने वाली दवाएं लेना और खूब तरल पदार्थ (fluids) लेना पहला कदम होना चाहिए।

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वेस्टइंडीज को बदहाल क्रिकेट को सुधारने के लिए मिली 1.28 करोड़ डॉलर की बड़ी राशि

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) द्वारा घोषित अभिशासन, सदस्यता और सदस्यों की सहायता में में बदलावों के तहत कैरिबियाई क्रिकेट को लोन मिलेगा। एडिनबर्ग में हुई सिलसिलेवार वार्षिक बैठक के बाद सदस्यों से जुड़े कई फ़ैसले लिए गए, जिनमें वेस्टइंडीज़ क्रिकेट को आर्थिक मदद देना भी शामिल रहा।

अफ्रीकी देश मॉरिशस को ICC का 111वां मेंबर बनाया गया है, जिससे इसके 12 स्थायी सदस्य और 98 अन्य एसोसिएट सदस्य की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है। इसके अलावा, ICC ने घोषणा की कि क्रिकेट कनाडा के लिए बहाली की शर्तें मंज़ूर कर ली गई हैं; इस बोर्ड पर लगे मौजूदा निलंबन को हटाने से पहले इन शर्तों को पूरा करना ज़रूरी है।

वहीं दूसरी ओर ICC को श्रीलंका क्रिकेट से संशोधित संविधान के बारे में अपडेट मिला है। फ़िलहाल, चुनाव होने तक श्रीलंका क्रिकेट ICC बोर्ड की बैठकों में प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा। इस बीच, ICC सदस्यता मानदंड का उल्लंघन करने के कारण फ़्रांस क्रिकेट को नोटिस दिया गया है।

वेस्टइंडीज़ क्रिकेट के लिए समर्थन

ICC ने क्रिकेट वेस्टइंडीज़ को समर्थन के तौर पर 1.28 करोड़ डॉलर का लोन दिया है। यह बोर्ड, जो कई सालों से आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहा है, आईसीसी से मदद की मांग करता रहा है। यह बात समय-समय पर कई पूर्व क्रिकेटरों ने भी उठाया है।

30 सितंबर, 2025 को समाप्त हुए साल के वित्तीय विवरण के अनुसार, CWI को 28 मिलियन डॉलर का शुद्ध घाटा हुआ, जबकि पिछले साल उसे 24 मिलियन डॉलर का शुद्ध लाभ हुआ था। 2026 चक्र में 26 मिलियन डॉलर के लॉस के अनुमान के साथ, CWI के स्टेटमेंट में अनुदान की कमी को पूरा करने के लिए ICC से Loan Financing और Commercial Banking क्रेडिट सुविधाओं का ज़िक्र किया गया था। अब यह हकीकत बन गया है।

इससे पहले 2012 में, तत्कालीन वेस्टइंडीज़ क्रिकेट बोर्ड को ज़िम्बाब्वे के साथ ICC से सहायता फ़ंडिंग मिली थी। 2020 में, COVID-19 महामारी के दौरान, क्रिकेट वेस्टइंडीज़ को ECB से 3 मिलियन अमेरिकी डॉलर का लोन मिला था, जिसे समय पर चुका दिया गया।

COVID 19 Case Mumbai: ‘चीन से आया मेरा दोस्त…’, कुमार सानू के बेटे जान को हुआ कोरोना, दिया हेल्थ अपडेट

COVID 19 Case Mumbai: सिंगर और ‘बिग बॉस’ के पूर्व कंटेस्टेंट जान कुमार सानू को COVID-19 पॉजिटिव पाए जाने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। सिंगर ने रविवार, 12 जुलाई को कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में रिकॉर्ड किए गए एक वीडियो के जरिए यह जानकारी दी। उन्होंने फैंस के साथ यह अपडेट हल्के-फुल्के अंदाज में शेयर किया।

मशहूर प्लेबैक सिंगर कुमार सानू के बेटे जान ने सोशल मीडिया पर कोविड 19 की पुष्टी करते हुए वीडियो डाला है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनके लक्षण कब शुरू हुए या उन्हें कितने समय तक मेडिकल निगरानी में रहना होगा। वीडियो शेयर करते हुए जान ने चिंता के बजाय मजाक किया और लिखा, “चीन से आया मेरा दोस्त। कोविड को सलाम करो।”

उन्होंने अस्पताल में रहने और अपने कपड़ों के बारे में भी मजाक किया और कहा, “फिट चेक – अपने पसंदीदा डिजाइनर। कोकिलाबेन के कपड़े पहने हैं। किसलिए भर्ती हुआ- वुहान से आए COVID के कारण।”

यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और फैंस ने कमेंट सेक्शन में उनके जल्द ठीक होने की कामना की। एक यूजर ने लिखा, “क्या जबरदस्त लुक है। भाई, जल्दी ठीक हो जाओ,” वहीं दूसरे ने कमेंट किया, “जल्द ठीक हो जाओ, जान। अपना ख्याल रखना।”

कुमार सानू बॉलीवुड के सबसे मशहूर प्लेबैक सिंगर्स में से एक हैं, जो 1990 के दशक में कई सुपरहिट गाने देने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने करियर में कई अवॉर्ड जीते हैं और इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री में एक लोकप्रिय हस्ती बने हुए हैं। उनके बेटे, जान कुमार सानू ने भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलना चुना।

जान ने भी एक सिंगर के तौर पर अपना करियर बनाया है और अक्सर सोशल मीडिया पर फैंस के साथ अपने म्यूजिक और पर्सनल लाइफ से जुड़ी बातें शेयर करते रहते हैं। बिग बॉस 14 में हिस्सा लेने के बाद उन्हें काफी पहचान मिली।

Volkswagen Group to cut model line-up by up to 50 percent by 2030

VW

The Volkswagen Group plans to reduce its global model line-up by up to 50 percent by 2030 as part of a wider restructuring of its business. The Group will also cut the number of variant options offered across its portfolio by up to 75 percent and reduce production capacity, as it looks to lower costs and simplify its operations. Volkswagen has not named the models that will be discontinued.

  1. Future line-up to focus on the ‘most attractive market segments’
  2. Annual production capacity to fall to around 9 million vehicles, from 10 million
  3. Platforms and electronic architectures will also be consolidated

Volkswagen Group to halve model line-up by 2030

The product changes form part of 12 initiatives that the Volkswagen Group plans to implement by 2030. The company said it will gradually “streamline” its model line-up by up to 50 percent, concentrating its portfolio on “the most attractive market segments”.

Volkswagen is also targeting a 75 percent reduction in what it calls “offering complexity”, which includes the number of equipment options available across its models. The company said this will allow it to focus investment and development resources on products that deliver the “greatest added value for customers and the highest value contribution” to the Group.

The Group has not confirmed which models will be affected by the reduction. Its portfolio spans Volkswagen, Skoda, Seat, Cupra, Audi, Porsche, Bentley and Lamborghini, among other brands.

“We are making the Volkswagen Group faster, more resilient and more competitive, through less complexity, focused technologies, and an even stronger alignment of products, development and production with regional markets,” said Volkswagen Group CEO Oliver Blume.

VW Group to reduce platforms, production capacity

Volkswagen also plans to reduce the number of platforms and electronic architectures used across the Group, with the aim of increasing the use of common technologies across its brands. The company will focus on technologies with what it describes as “high scaling potential”.

Annual production capacity will be reduced to around 9 million vehicles. Before the Covid-19 pandemic, the Group had established capacity to produce around 12 million vehicles annually and has already reduced this by about 2 million units. Volkswagen said further reductions are planned in Europe and China.

The restructuring comes as Volkswagen faces increased competition from Chinese carmakers, regulatory pressures, tariffs and geopolitical tensions. These factors have contributed to the Group’s profits falling by around half since 2021.

Up to 100,000 Volkswagen Group job cuts reported

The restructuring could also result in further workforce and factory reductions. Around 50,000 job cuts had already been outlined under earlier restructuring measures. Reports suggest Volkswagen could increase its planned workforce reduction to a total of 100,000 jobs and close four plants in Germany. However, the Group has not confirmed further job cuts or factory closures. 

The plants reportedly under consideration for closure are Hanover, Emden, Zwickau and Audi’s Neckarsulm facility. It remains unclear whether the sites would be closed or whether Volkswagen could seek buyers for them.

ऑक्सफोर्ड MBA ग्रेजुएट ने छोड़ी नौकरी, गांव में एवोकाडो उगाकर कमाए 8 लाख

आखिर क्या वजह है कि कोई व्यक्ति विदेश में मिली शिक्षा और कॉर्पोरेट की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गांव में खेती करने का फैसला करता है? जयपाल नाइक के लिए यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि कॉर्पोरेट की एक जैसे रूटीन से परेशान और गांव की जिंदगी के प्रति बढ़ते लगाव के कारण धीरे-धीरे हुआ बदलाव था।

उनका सफर लंदन से शुरू हुआ, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मार्केटिंग में MBA किया। इसके बाद उन्होंने हीथ्रो एयरपोर्ट के कस्टम्स डिपार्टमेंट में और फिर हैदराबाद में कॉर्पोरेट नौकरी की। इतने अच्छे करियर के बावजूद, धीरे-धीरे उनका ध्यान हैदराबाद से लगभग 45 किलोमीटर दूर अपने गाँव, डेबडागुडा की ओर मुड़ने लगा।

क्या खेती से होने वाली कमाई, समय के साथ कॉर्पोरेट नौकरी से मिलने वाली स्थिर आय की बराबरी कर सकती है?

जयपाल को इसका जवाब कई सालों की कोशिशों, नुकसान और बदलावों के बाद मिला। ’30Stades’ के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया, “एक साल बाद मैंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि मुझे 9-से-5 वाली कॉर्पोरेट जिंदगी का एक जैसापन पसंद नहीं आ रहा था। मैंने खेती में अपने परिवार का साथ देने का फैसला किया।”

उस समय, उनका परिवार पारंपरिक खेती करता था और केमिकल का इस्तेमाल करके मक्का, ज्वार, सब्जियां और अरहर की दाल उगाता था। लेकिन, बढ़ती लागत और अस्थिर कीमतों की वजह से मुनाफा कम हो रहा था। उन्होंने बताया, “बाजार में कीमतें अस्थिर थीं और खेती की लागत बढ़ती जा रही थी, जिससे मुनाफ़े पर असर पड़ रहा था। मिट्टी में केमिकल का इस्तेमाल करना अब फ़ायदेमंद नहीं रह गया था।”

जब आमदनी कम होने लगी, तो जयपाल ने बागवानी में दूसरे विकल्पों पर विचार करना शुरू किया। लेकिन उन्होंने देखा कि कई पारंपरिक फल उगाने वाले किसान पहले से ही ज़्यादा सप्लाई और कीमतों में भारी गिरावट के कारण नुकसान उठा रहे थे। उन्होंने कहा, “यह साफ़ था कि विदेशी फलों की खेती करना सही रहेगा क्योंकि इसमें कॉम्पिटिशन कम है और मांग ज़्यादा है।”

2013 में, उन्होंने एवोकाडो की खेती की दिशा में अपना पहला बड़ा कदम उठाया। उन्होंने इज़राइल से 200 ‘हस’ (Hass) एवोकाडो के पौधे 1,200 रुपये प्रति पौधे की दर से मंगवाए। यह प्रयोग नाकाम रहा। उन्होंने याद करते हुए कहा, “हस एवोकाडो ठंडी जलवायु के लिए उपयुक्त होते हैं और 30°C से ज़्यादा तापमान में जीवित नहीं रह सकते। तेलंगाना में ये पौधे ठीक से नहीं पनपे और सारा निवेश डूब गया।”

इस झटके के बाद, वह सिविल कॉन्ट्रैक्टिंग के काम में लौट आए, लेकिन COVID-19 महामारी के दौरान वह काम भी बंद हो गया। इसके बाद वह फिर से खेती की ओर मुड़े, लेकिन इस बार बेहतर प्लानिंग और हालात की बेहतर समझ के साथ। जयपाल ने बताया कि एवोकाडो इसलिए खास थे क्योंकि भारतीय बाज़ार अभी विकसित हो रहा था, जबकि पारंपरिक फलों के मामले में अक्सर ज़्यादा सप्लाई के कारण कीमतें गिर जाती हैं।

पौधों के बीच जगह की समस्या के बावजूद, बागान के पौधे अच्छी तरह से पनपे और लगातार बढ़ते रहे। शुरुआत में, हर पेड़ से लगभग 5 से 10 किलो फल मिलते थे। शुरुआती बिक्री एक एक्सपोर्टर के जरिए होती थी जो उपज को कुवैत भेजता था। उन्होंने याद करते हुए कहा, “मैंने अपने एक दोस्त के ज़रिए इन्हें कुवैत भेजा, जो एक एक्सपोर्टर था।”

एक दुर्घटना के कारण एक्सपोर्ट रुकने पर, जयपाल ने घरेलू बाजार में बिक्री शुरू कर दी। उन्होंने स्थानीय स्तर पर लगभग 250 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचना शुरू किया, जहां मांग स्थिर बनी रही। जैसे-जैसे बागान के पेड़ बड़े हुए, पैदावार में काफ़ी सुधार हुआ। उन्होंने बताया, “अब, जब पौधे अपने छठे साल में हैं, तो पैदावार बढ़कर लगभग 20 किलो प्रति पेड़ हो गई है।”

1.2 एकड़ ज़मीन पर फल देने वाले लगभग 250 पेड़ों से उन्हें एवोकाडो से सालाना लगभग 8 लाख रुपये की कमाई होती है। उन्होंने आगे कहा, “यही ऑर्गेनिक एवोकाडो खेती की मुख्य खूबी है। इससे प्रति एकड़ अच्छा मुनाफ़ा मिलता है और जैसे-जैसे पेड़ बड़े होते हैं, पैदावार भी बढ़ती जाती है।”

उनके खेती के मॉडल में एक अहम बात ऑर्गेनिक खेती है। वह केमिकल वाले फ़र्टिलाइज़र और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि गाय के गोबर, गोमूत्र, नीम की खली और ऑर्गेनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। जयपाल ने बताया, “आप 1 किलो ऑर्गेनिक एवोकाडो को ₹1,000 प्रति किलो के भाव से भी बेच सकते हैं। वहीं, केमिकल का इस्तेमाल करके उगाए गए एवोकाडो से ₹100 प्रति किलो भी नहीं मिलते। केमिकल से पैदावार तो बढ़ सकती है, लेकिन इससे कीमत कम हो जाती है, साथ ही मिट्टी को नुकसान पहुxचता है और लागत भी बढ़ती है।”

वे मंडियों या बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय, फसल कटने से पहले ही WhatsApp और सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे ग्राहकों को अपना माल बेचते हैं। खेती के साथ-साथ जयपाल ने नर्सरी का बिज़नेस भी शुरू किया है। वे एवोकाडो के पौधे बेचते हैं; बल्ब वैरायटी के पौधे ₹300 और पिंकर्टन वैरायटी के पौधे ₹400 में मिलते हैं। वे हर साल 5,000 से 10,000 पौधे बेचते हैं, जिससे उनकी कमाई में लगभग ₹5 लाख का योगदान होता है।

जयपाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि खेती में कामयाबी सिर्फ़ फ़सल चुनने से नहीं, बल्कि प्लानिंग, बाज़ार की समझ और स्थानीय हालात के हिसाब से काम करने से मिलती है। उन्होंने कहा, “खेती में कामयाबी का मतलब सिर्फ़ कोई विदेशी फल उगाना नहीं है। इसका मतलब है बाज़ार की मांग के हिसाब से फ़सल चुनना, स्थानीय मौसम के अनुकूल ढलना और लागत कम रखते हुए ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा कमाना।”

उन्होंने यह भी माना कि विदेशी फलों की खेती में शुरुआत में जोखिम होते हैं, लेकिन उनका कहना था कि जो लोग डटे रहते हैं, उन्हें लंबे समय में बहुत फ़ायदा हो सकता है। उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “विदेशी फलों की खेती में शुरू में ज़्यादा जोखिम होता है, लेकिन लंबे समय में मिलने वाला फ़ायदा काफ़ी ज़्यादा हो सकता है।”

Crude Oil Price: US-ईरान बातचीत में अनिश्चितता के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, ब्रेंट क्रूड $73 के पास

US-ईरान युद्ध: बुधवार, 1 जुलाई को शुरुआती कारोबार में तेल की कीमतों में तेजी आई, जब ईरान ने कहा कि वह US अधिकारियों के साथ सीधी बातचीत नहीं करेगा, जिससे दोनों देशों के बीच चार महीने से चल रहे संघर्ष को कुछ समय के लिए रोकने वाले नाज़ुक सीज़फ़ायर को लेकर नई चिंताएं बढ़ गई।

ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 50 सेंट, या 0.69% बढ़कर $73.45 प्रति बैरल हो गया, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 63 सेंट, या 0.91% बढ़कर $70.13 प्रति बैरल हो गया।

आज कच्चे तेल की कीमतों में क्या तेजी है?

US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के दामाद, जेरेड कुशनर, और स्पेशल दूत स्टीव विटकॉफ मंगलवार को दोहा पहुँचे, जिसे व्हाइट हाउस ने हाई-लेवल बातचीत बताया। हालाँकि, ईरान और मेज़बान देश कतर ने साफ़ किया कि US डेलीगेशन सीधे ईरानी प्रतिनिधियों के बजाय मीडिएटर्स से बात करेगा। कतर ने कहा कि प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी उन अधिकारियों में शामिल थे जो विटकॉफ और कुशनेर से मिले थे।

बुधवार की बढ़त के बावजूद, तिमाही आधार पर भारी गिरावट के बाद तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। ब्रेंट क्रूड साल की पहली और दूसरी तिमाही के बीच लगभग $45 प्रति बैरल गिरा, जो 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल संकट के बाद सबसे बड़ी तिमाही गिरावट है। इसी दौरान US क्रूड फ्यूचर्स लगभग $31 प्रति बैरल गिरा, जो 2020 के बाद सबसे बड़ी गिरावट है, जब COVID-19 महामारी ने ग्लोबल फ्यूल डिमांड को बुरी तरह प्रभावित किया था।

यह तेज गिरावट तब आई जब मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में हुई प्रगति ने उस रिस्क प्रीमियम को उलट दिया जिसने संघर्ष के दौरान कीमतों को बढ़ा दिया था।

मंगलवार को जारी रॉयटर्स के एक पोल से पता चला कि एनालिस्ट्स ने ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद पहली बार 2026 के लिए अपने तेल कीमतों के अनुमान को कम किया, जिससे लगातार पांच महीनों से ऊपर की ओर बदलाव का सिलसिला खत्म हो गया। होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने से ग्लोबल तेल सप्लाई में लंबे समय से रुकावटों की चिंता कम हो गई है। इस बीच, US के वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने फिर कहा कि वॉशिंगटन ईरान को होर्मुज स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाजों पर ट्रांज़िट फीस लगाने की इजाज़त नहीं देगा। उन्होंने कहा कि यह स्थिति ईरान के स्ट्रेटेजिक रूप से ज़रूरी इस पानी के रास्ते का इस्तेमाल करने वाले “जहाजों पर टोल वसूलने” से खत्म नहीं होगी।

Crude Oil Price: US-ईरान बातचीत की संभावना से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, ब्रेंट $72 प्रति बैरल के करीब

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