Rakhi Sawant: यूपी की अदालत में राखी सावंत नहीं हुईं पेश, एक्ट्रेस के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया

Rakhi Sawant: उत्तर प्रदेश के झांसी की एक अदालत ने अभिनेत्री राखी सावंत के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। यह मामला 2010 में हुई एक आत्महत्या से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि राखी ने अपने टीवी शो के दौरान एक स्थानीय निवासी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी। सरकारी वकील ने शनिवार को यह जानकारी दी।

जिला सरकारी वकील (अपराध) मृदुल कांत श्रीवास्तव ने बताया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) अंजलि ने शुक्रवार को यह वारंट जारी किया है। क्योंकि राखी कई बार बुलाए जाने के बावजूद अदालत में पेश नहीं हुईं।

राखी सावंत से जुड़ा मामला

पीटीआई के अनुसार यह मामला झांसी के हंसारी प्रेम नगर इलाके के रहने वाले लक्ष्मण अहिरवार से जुड़ा है। वकील ने बताया कि 10 नवंबर 2010 को लक्ष्मण ने आत्महत्या कर ली थी। आरोप है कि राखी ने अपने टीवी शो ‘राखी का इंसाफ’ में कुछ ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिनसे लक्ष्मण को अपमानित महसूस हुआ।

लक्ष्मण की मां सावित्री ने प्रेम नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि अक्टूबर 2010 में प्रसारित शो के एक एपिसोड के दौरान राखी ने उनके बेटे के खिलाफ अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार लक्ष्मण और उनकी पत्नी अनीता (जो राजगढ़ की रहने वाली थीं) को उनके वैवाहिक विवाद के चलते शो में बुलाया गया था। पति-पत्नी के बीच झगड़े के बाद अनीता अपने मायके लौट गई थीं। श्रीवास्तव ने बताया कि इस मामले की अगली सुनवाई 1 दिसंबर को तय की गई है।

राखी सावंत चर्चा में

हाल ही में राखी सावंत, गोविंदा और सुनीता आहूजा की शादी को लेकर की गई अपनी टिप्पणियों की वजह से चर्चा में थीं। उन्होंने गोविंदा के अपनी को-स्टार कोमल रानी स्वर्णकार के साथ कथित संबंधों पर भी प्रतिक्रिया दी। इस महीने की शुरुआत में पैपराजी से बात करते हुए राखी ने कहा कि वह गोविंदा से इसलिए नाराज हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी को नजरअंदाज किया है। उन्होंने कहा- “गोविंदा जी पूरा देश आपसे नाराज है। जिस महिला ने आपसे शादी की आपके दो बच्चों को जन्म दिया और जो 40 सालों से आपके साथ रही आपने उसे छोड़ दिया। यह कोमल कौन है?”

इसके बाद राखी ने दावा किया कि कोमल उनके बारे में बुरा-भला कह रही हैं और उन्होंने कोमल को चेतावनी दी कि वह उनके सामने न आएं। उन्होंने हिंदी में कहा- “वह मेरी बुराई कर रही है और बाकी सेलिब्रिटीज के बारे में भी बकवास कर रही है। चिची भैया ने ही उसे इतनी छूट दी है। सुन लो मुझसे पंगा मत लेना। मैं सुनीता नहीं हूं, मैं तुम्हारी धज्जियां उड़ा दूंगी।” राखी ने कोमल को “पति चोर” भी कहा।

इससे पहले राखी के साथ फोन पर बातचीत के दौरान सुनीता ने आरोप लगाया था कि गोविंदा और कोमल शादी करने की योजना बना रहे हैं। सुनीता का दावा था कि इसी वजह से उन्होंने कोर्ट जाकर अपनी तलाक की अर्जी वापस ले ली थी। हालांकि बाद में गोविंदा के मैनेजर शशि सिन्हा ने दूसरी शादी के इन दावों को पूरी तरह से गलत बताते हुए खारिज कर दिया।

जब हाउसवाइफ हो सकती है तो हाउस-हसबैंड क्यों नहीं? मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर इंटरनेट पर छिड़ी जंग

मद्रास: हाई कोर्ट में वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान मदुरै बेंच के सामने घर और परिवार की जिम्मेदारियों से जुड़ा एक अहम मामला सामने आया। इस मामले में पति-पत्नी की भूमिका और परिवार को संभालने से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा हुई।

यह मामला तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर दंपति का था। दोनों की शादी 2011 में हुई थी और उस समय वे पुडुचेरी के एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करते थे। 2012 में उनके पहले बच्चे का जन्म हुआ। इसके बाद पत्नी बच्चों की देखभाल के लिए अपने माता-पिता के साथ रहने लगी, जबकि पति ने कार्डियोलॉजी की आगे की पढ़ाई जारी रखी। फिर 2016 में दोनों का दूसरा बच्चा हुआ।

COVID-19 महामारी के बाद दोनों साथ रहने लगे, लेकिन कुछ समय बाद उनके बीच विवाद हो गया। पत्नी ने साथ रहने के लिए फैमिली कोर्ट का रुख किया, जबकि पति ने तलाक की मांग की। फैमिली कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों ने हाई कोर्ट में अपील की।

कोर्ट ने हाउस-हसबैंड के रोल का जिक्र कुछ इस तरह किया

सुनवाई के दौरान बेंच ने परिवार में अलग-अलग जिम्मेदारियों को लेकर बात की। कोर्ट ने कहा कि परिवार बहुत जरूरी है और घर संभालने के काम को भी कमाई जितनी अहमियत मिलनी चाहिए। साथ ही कहा कि यदि हाउसवाइफ का रोल हो सकता है तो हाउस-हसबैंड का रोल भी हो सकता है। बेंच ने यह भी कहा कि ‘होममेकर’ (Homemaker) शब्द किसी एक जेंडर को नहीं बताता है। कोर्ट ने घर के काम की कीमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कही बात का भी जिक्र किया।

सुनवाई के दौरान पति ने बच्चों की भलाई को ध्यान में रखते हुए पत्नी को 2.5 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई। पत्नी ने भी इस समझौते को स्वीकार कर लिया। इसके बाद हाई कोर्ट ने आपसी सहमति से दोनों को तलाक दे दिया। कोर्ट के आदेशानुसार पति को तीन महीने के भीतर पत्नी को 1.5 करोड़ रुपये देने हैं। इसके अलावा दोनों बच्चों के नाम पर एक साल के भीतर 50-50 लाख रुपये जमा करने हैं।

कोर्ट की बात सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों के अलग-अलग रिएक्शन आए। इसके साथ ही इस मामले ने एक बार फिर यह चर्चा सामने ला दी है कि परिवार में घर और बाहर की जिम्मेदारियां पति-पत्नी दोनों की हो सकती हैं। घर संभालने के काम को भी परिवार की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा माना जाना चाहिए।

Thalapathy Vijay: सीएम विजय की वाइफ संगीता ने मार यू टर्न, तालक की अर्जी को लिया वापस

Thalapathy Vijay: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पत्नी संगीता ने शुक्रवार को चेंगलपट्टू (जो यहां के पास है) की फैमिली कोर्ट में दायर अपनी तलाक की अर्जी वापस ले ली। खबरों के मुताबिक, विजय की पत्नी संगीता ने एक्टर से राजनेता बने विजय के साथ अपनी शादी खत्म करने के लिए दायर तलाक की अर्जी वापस ले ली है। यह तब हुआ जब चेंगलपट्टू फैमिली वेलफेयर कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई शुरू की, जहां कपल के वैवाहिक विवाद को लेकर कार्यवाही चल रही थी।

इससे पहले, दोनों के बीच मतभेदों की खबरों के बाद संगीता ने विजय से तलाक के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद मामले में कई बार सुनवाई हुई और कोर्ट ने दोनों पक्षों को पेश होकर अपना-अपना पक्ष रखने को कहा। पिछली सुनवाई के दौरान, विजय और संगीता में से कोई भी कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं था। खबरों के मुताबिक, दोनों के वकीलों ने उनकी परिस्थितियों को देखते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल होने की अनुमति मांगी थी।

लंदन से पेश हुईं संगीता

7 अगस्त को हुई हालिया सुनवाई में, संगीता लंदन से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए कोर्ट के सामने पेश हुईं। जब उनकी अर्जी पर सुनवाई हुई तो संगीता वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट के सामने पेश हुईं और उन्होंने अपना केस आगे न बढ़ाने के कारण बताए।

जब संगीता की अर्ज़ी पर सुनवाई हुई तो वह वीडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए कोर्ट के सामने पेश हुईं और उन्होंने अपना केस आगे न बढ़ाने की वजहें बताईं। कोर्ट के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद कोर्ट ने उनकी याचिका को ‘वापस ली गई’ मानकर निपटा दिया।

यह कार्यवाही निजी तौर पर हुई, जिसमें संगीता ने जज के सामने अपना पक्ष रखा। खबरों के मुताबिक, उन्होंने करीब 20 मिनट तक बात की और तलाक की याचिका से जुड़े सवालों के जवाब दिए। कार्यवाही फिर से शुरू होने से पहले सुनवाई में थोड़ी रुकावट भी आई थी।

हालांकि, इस मामले में एक अहम मोड़ आया है। खबरों के मुताबिक, संगीता ने अब उस तलाक की याचिका को वापस लेने का फ़ैसला किया है, जो उन्होंने स्थानीय फ़ैमिली कोर्ट में दायर की थी। याचिका वापस लेने के उनके फ़ैसले की सटीक वजह का खुलासा नहीं किया गया है। यह भी तुरंत साफ नहीं है कि याचिका वापस लेने का मतलब कपल के निजी रिश्तों में कोई बदलाव है या यह फ़ैसला कानूनी या प्रक्रियात्मक वजहों से लिया गया है।

विजय-संगीता की शादी

सिनेमा में विजय के दशकों लंबे करियर और उसके बाद राजनीति में आने के बावजूद, विजय और संगीता ने अपनी पारिवारिक ज़िंदगी को ज़्यादातर लोगों की नज़रों से दूर ही रखा है। जब ऐसी खबरें आईं कि संगीता ने तलाक के लिए फ़ैमिली कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है, तो उनके वैवाहिक रिश्ते पर लोगों का ध्यान ज़्यादा गया।

पति के ऑफिस में शिकायत करना पड़ सकता है भारी! सुप्रीम कोर्ट ने पत्नियों को दी बड़ी नसीहत

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पत्नियों द्वारा अपने पतियों के एम्प्लॉयर (कंपनियों/संस्थानों) को पत्र लिखने के बढ़ते चलन पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसी शिकायतों से नौकरी खतरे में पड़ सकती है और आखिरकार गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) के दावों पर भी असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने पिछले हफ्ते ये टिप्पणियां कीं। वे एक महिला द्वारा दायर ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें मानहानि के मुकदमे को असम से गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ट्रांसफर करने की मांग की गई थी।

यह याचिका पति के एक दोस्त द्वारा दायर मानहानि के मामले से जुड़ी थी। महिला ने ट्रांसफर की मांग इसलिए की थी क्योंकि वह गाजियाबाद में अपने पति के साथ पहले से ही कई कानूनी मामलों में उलझी हुई थी।

सुनवाई के दौरान, बेंच ने मामले को सुप्रीम कोर्ट मेडिएशन सेंटर (मध्यस्थता केंद्र) भेज दिया ताकि समझौते की संभावना तलाशी जा सके। जस्टिस नागरत्ना ने महिला के वकील से यह भी कहा कि वे उसे सभी विवाद सुलझाने और आरोप वापस लेने की सलाह दें।

बता दें कि यह मानहानि का मामला उस शिकायत से शुरू हुआ, जो महिला ने दिल्ली में एयर फोर्स अधिकारियों से की थी। उसने आरोप लगाया था कि उसके पति, जो एयर फोर्स में अफसर हैं, सर्विस के नियमों का उल्लंघन करके अपना अलग बिजनेस चला रहे हैं।

महिला के वकील ने दलील दी कि यह शिकायत तब की गई थी जब पति ने महिला और उसके भाई पर एयर फोर्स का हेलमेट चुराने का झूठा आरोप लगाया था।

वकील के अनुसार, इस शिकायत का मकसद उस सामान (हेलमेट) का पता लगाना था, जो उसके पति को मिला था। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि मानहानि की शिकायत पति ने खुद नहीं, बल्कि उनके दोस्त ने की थी।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कई पत्नियां वैवाहिक विवाद चलने के दौरान अपने पतियों के एम्प्लॉयर को पत्र लिखने का रास्ता अपनाती हैं।

उन्होंने कहा कि तलाक मांगना एक अलग बात है, लेकिन जीवनसाथी की आजीविका (रोजगार) छिनवाना उससे भी बुरा है।

जज ने आगे कहा कि वैवाहिक विवादों के दौरान जीवनसाथी के नियोक्ता (employer) को पत्र लिखना उन “सबसे बुरी चीजों” में से एक है जो एक पत्नी कर सकती है, क्योंकि इससे पति की नौकरी जा सकती है और भविष्य में गुजारा-भत्ता (maintenance) के दावे का आधार भी कमजोर हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह कोई नई बात नहीं है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बताया कि पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

हालांकि, ऐसी शिकायतों की कोई सटीक संख्या नहीं है, लेकिन पहले भी महिलाएं व्यभिचार या दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए नियोक्ताओं के पास गई हैं और कुछ मामलों में अपने पतियों की नौकरी खत्म करने की मांग भी की हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि नौकरी जाने से बाद में गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) देने में मुश्किल हो सकती है।

पहले भी कोर्ट ने ऐसे कानूनी मुद्दों पर की है सुनवाई

कोर्ट ने कहा, अदालतों ने पहले भी ऐसी शिकायतों के कानूनी प्रभावों पर विचार किया है। ऐसे मामलों में सबसे पुराने मामलों में से एक दिल्ली हाई कोर्ट के सामने आया था। यह मामला 1972 का है, जब एक वैवाहिक विवाद के दौरान अलग रह रही पत्नी ने लोकसभा को पत्र लिखा था। उसने अपने पति, जो वहां काम करते थे, पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था और दावा किया था कि पति ने उसके माता-पिता से पैसों और अन्य चीजों की मांग की थी।

बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अगर पत्नी भरण-पोषण की मांग करना चाहती थी, तो उसे केवल यह बताने की जरूरत थी कि उसे मेंटेनेंस नहीं मिल रहा है। इसके लिए उसे ऐसे आरोप लगाने की जरूरत नहीं थी।

1980 के अपने आदेश में कोर्ट ने कहा था, “इस तरह की झूठी शिकायत अगर किसी कर्मचारी के नियोक्ता से की जाती है, तो यह निश्चित रूप से मानसिक क्रूरता (मेंटल क्रुएल्टी) के बराबर होगी। इससे कर्मचारी की छवि उसके नियोक्ता की नजरों में खराब होगी और उसके करियर व प्रमोशन के अवसरों पर भी असर पड़ सकता है। यह स्थिति उसके मानसिक शांति को प्रभावित कर सकती है।” पत्नी के पूरे व्यवहार पर विचार करने के बाद कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर शादी खत्म करने के फैसले को सही ठहराया था।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बाद में अदालतों ने भी इसी तरह का नजरिया अपनाया है। इसमें मद्रास हाई कोर्ट का जून का एक फैसला भी शामिल है, जिसमें कहा गया था कि “”बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए ऐसे आरोप, जो पति या पत्नी की प्रतिष्ठा और सम्मान को नुकसान पहुंचाते हैं, खासकर नियोक्ता या वरिष्ठ अधिकारियों के सामने लगाए गए आरोप, वैवाहिक रिश्ते को पूरी तरह नुकसान पहुंचा सकते हैं और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता माने जा सकते हैं।”

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एम्प्लॉयर, खासकर प्राइवेट कंपनियां, सिर्फ आरोपों के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाल सकते और उन्हें कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के अनुसार जांच करनी पड़ सकती है, जबकि सरकारी कर्मचारियों के मामले में अलग सर्विस नियम लागू होते हैं।

इसमें यह भी कहा गया है कि प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में ‘भारतीय न्याय संहिता’ की धारा 356 के तहत आपराधिक मानहानि की कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है।

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