5 मिनट में 1 एकड़ में छिड़काव, खर्च सिर्फ 100 रुपये! गुजरात के वडोदरा में कृषि ड्रोन ने बदली किसानों की तकदीर

वडोदरा (गुजरात) (ANI)। गुजरात के वडोदरा जिले में किसान अब ड्रोन से फसलों पर खाद का छिड़काव कर रहे हैं। इससे कम समय में खेत का काम पूरा हो जाता है और किसानों की मेहनत भी कम लगती है। सरकार की मदद से किसान कम खर्च में इस सुविधा का फायदा उठा रहे हैं।

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ड्रोन की मदद से कम समय में खेत में छिड़काव किया जा सकता है। इससे किसानों को भारी मशीनें लेकर खेत में घूमना नहीं पड़ता। ड्रोन से नैनो यूरिया और नैनो DAP का छिड़काव भी किया जा रहा है। किसान रस्मिकभाई बिनुभाई पटेल ने बताया कि ड्रोन से एक एकड़ खेत में करीब पांच मिनट में छिड़काव हो जाता है। इससे किसानों का समय बचता है और खर्च भी कम होता है।

वडोदरा जिला पंचायत के कृषि सहायक निदेशक हिरेन पी. थंकी ने बताया कि ड्रोन से छिड़काव करवाने पर किसानों को हर एकड़ के लिए 500 रुपये की मदद मिलती है। किसानों को इसके लिए सिर्फ 100 रुपये प्रति एकड़ खर्च करने होते हैं।

इस सुविधा के मुख्य फायदे हैं:

• कम समय में खेत पर छिड़काव।

• भारी सामान उठाने और ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती।

• सरकारी सब्सिडी से कम खर्च में सेवा।

• नैनो यूरिया और नैनो DAP के छिड़काव में मदद।

सरकार की मदद से लोगों को ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। किसान केवल कुमार चौधरी ने बताया कि उन्हें ट्रेनिंग के साथ ड्रोन भी मिला है। अब वह इससे किसानों के खेतों में नैनो यूरिया और नैनो DAP का छिड़काव करते हैं। ड्रोन ऑपरेटर अचल पटेल कहते है कि इससे कम समय में ज्यादा खेतों में छिड़काव हो जाता है।

गुजरात सरकार खेती के लिए ड्रोन खरीदने वालों को 5 लाख रुपये की मदद दे रही है। इसके लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होती है। इनमें वेलिड ड्रोन पायलट लाइसेंस होना भी जरूरी है।

जिले में 5 से 7 हजार किसानों को फायदा

नितिन वसावा के मुताबिक, वडोदरा जिले में करीब पांच ऑर्गेनाइजेशन ड्रोन से छिड़काव की सर्विस दे रही हैं। लगभग 5,000 से 7,000 किसान अब तक इसका लाभ ले चुके हैं।

ड्रोन से छिड़काव होने से किसानों का काम आसान हो रहा है। इसके साथ ही गांव के युवाओं को ड्रोन चलाने और किसानों की मदद करने का काम भी मिल रहा है।

20 लाख खर्च कर MBA ग्रेजुएट ने शुरू की शिमला मिर्च की खेती, सालाना 2.25 करोड़ का कमा रही मुनाफा

MBA ग्रेजुएट प्रणिता वामन ने कोरोना काल में 20 लाख का एक समझदारीभरा निवेश किया था, जिसके बाद से आज वह करोड़ों का प्रोफिट कमा रही हैं। उन्होंने COVID-19 लॉकडाउन के दौरान शिमला मिर्च की खेती करनी शुरू की थी। एक एकड़ से शुरू हुआ काम आज 25 एकड़ के फार्म तक पहुंच चुका है। उनका टर्नओवर 4 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

30Stades की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी ये जर्नी फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में इंटर्नशिप के साथ शुरू हुई थी, जहां उन्होंने मॉर्डन एग्रीकल्चर (आधुनिक खेती) में संभावनाओं को खोजा । 2020 में एक एकड़ पॉलीहाउस खेती से शुरू हुआ यह काम अब 25 एकड़ के खेती के कारोबार में तक पहुंच गया है, जिससे प्रणिता वामन का सालाना ₹4 करोड़ का टर्नओवर होता है।

MBA से खेती तक का सफर

प्रणिता वामन महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नार तालुका के कलवाड़ी गांव से ताल्लुक रखती हैं। वह एक किसान परिवार में पली-बढ़ी हैं। उनके पिता टीचर थे, लेकिन वॉलंटरी रिटायरमेंट लेने के बाद भी वे फलों और सब्जियों की खेती से जुड़े रहे। उन्होंने 2019 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज पुणे से एग्री बिजनेस मैनेजमेंट में MBA किया है। अपनी डिग्री करने के बाद उन्होंने एक फूड प्रोसेसिंग कंपनी में इंटर्नशिप करनी शुरू किया था।

इंटरर्नशिप से मिले एक्सपीरिएंस ने वामन को हाई-टेक खेती, खासकर पॉलीहाउस खेती के बारे में जानने के लिए काफी मोटीवेट किया। कम संसाधन में किसान फसल उगाने की स्थितियों को कैसे मैनेज कर सकते हैं, फसल की पैदावार और क्वालिटी बेहतर कैसे बना सकते हैं और पौधों को खराब मौसम से कैसे बचा सकते हैं? यह सब उन्होंने सीखा। बदलते मौसम के पैटर्न को देखते हुए कंट्रोल किए गए माहौल में सही तरीके से खेती आसानी से की जा सकती है।

वामन ने बताया कि हम तेजी से बदलते मौसम का सामना करते रहते हैं। आज लगातार अच्छी कमाई करने का एकमात्र तरीका हाई-टेक खेती है। यह बेहद फायदेमंद भी है।

प्रणिता ने शिमला मिर्च की खेती को ही क्यों चुना?

MBA ग्रेजुएट ने कहा खेती करने की प्लानिंग तो करली गई, लेकिन फिर हमारे सामने अगला सवाल यह था कि क्या उगाया जाए? वामन ने शिमला मिर्च (कैप्सिकम) को चुनने से पहले लेट्यूस और ब्रोकली जैसी कई सब्जियों को उगाने के बारे में भी विचार किया था। आखिरकार फिर उन्होंने शिमला मिर्च की फसल को चुना क्योंकि इसकी मांग हर मौसम में बनी रहती है।

वामन ने कहा कि “मैंने लेट्यूस, ब्रोकली और दूसरी विदेशी सब्जियों की खेती करने के बारे में विचार किया था। लेकिन शिमला मिर्च की मांग की डिमांड को देखते हुए हमने इसे फाइनल किया। शिमला मिर्च सालभर डिमांड में रहती है। इसका कोई खास सीजन नहीं होता है।

सालभर बाजार में रहती है डिमांड

ये शहरों के बाजारों में सालभर बिकती है। शिमला का यूज होटल, रेस्टोरेंट और फूड बिजनेस में बड़े पैमाने पर किया जाता है। खासकर लाल और पीली शिमला मिर्च अक्सर हरी शिमला मिर्च के मुकाबले ज्यादा महंगी बिकती हैं। इस फसल का एक बड़ा इंटरनेशनल मार्केट भी है।

वामन के मुताबिक उन्होंने मार्च 2020 में वामन ने 50% सरकारी सब्सिडी के साथ 20 लाख रुपये का निवेश करके एक पॉलीहाउस में एक एकड़ ज़मीन पर शिमला मिर्च की खेती शुरू की थी। उन्होंने KVK बारामती से लाए गए 12,000 पौधे लगाए थे। फसल जून-जुलाई में पूरी तरह से तैयार हो गई थी। लेकिन उनकी पहली फसल कटने का समय कोविड-19 लॉकडाउन लग गया था, जिससे बाजार बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।

खरीदार ढूंढना था चुनौती

कमर्शियल खेती में नए होने की वजह से खरीदार ढूंढना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी। वामन ने माना “फील्ड में नई होने के नाते मुझे ये पता नहीं था कि अपनी फसल को कहां बेचना है। इसके बाद उन्होंने ऑनलाइन थोक सब्जी खरीदारों को ढूंढना शुरू किया। अपनी फसल बेचने के लिए उन्होंने नासिक से लेकर मुंबई तक के व्यापारियों से संपर्क किया। वामन ने बताया कि काफी मशक्कत के बाद मुझे शिमला मिर्च खरीदने के लिए एक व्यापारी मिला था। लॉकडाउन के दौरान कई किसानों ने इसकी खेती बंद कर दी थी।”

उनकी पहली फसल में 40 टन लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च हुई, जो 80 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकी थी। इससे उन्होंने 32 लाख रुपये कमाए थे। अपना 20 लाख रुपये का इंवेस्टमेंट निकालने के बाद वामन ने 2021 तक खेती का दायरा बढ़ाकर 1 से 25 एकड़ कर लिया था। इसमें छह एकड़ में पॉलीहाउस और 19 एकड़ में शेड नेट का इस्तेमाल किया, जिनसे अलग-अलग पैदावार और कीमतें मिलीं।

जानकारी के लिए बता दें कि पॉलीहाउस खेती से सालाना प्रति एकड़ लगभग 30-32 टन पैदावार मिलती है, जबकि शेड नेट के तहत यह 22-24 टन होती है। वामन ने बताया कि पॉलीहाउस से उन्हें प्रति एकड़ 30 लाख रुपये का टर्नओवर होता है, जिसमें 8-10 लाख रुपये का खर्च आता है। 25 एकड़ में वह सालाना 4 करोड़ रुपये का टर्नओवर और लगभग 2.25 करोड़ रुपये का मुनाफा आराम से कमा लेती हैं।

सूखे में भी चमकी किस्मत! कम पानी, कम खर्च… फिर भी बंपर कमाई, सहजन की खेती ने किसान की बदल दी तकदीर

महाराष्ट्र के किसान संदीप कदम के लिए कई सालों तक खेती करना आसान नहीं रहा। सूखा, बढ़ती खेती की लागत और मौसम की मार की वजह से उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा था। लेकिन एक छोटे से फैसले ने उनकी किस्मत बदल दी। घाटे वाली फसलों की जगह उन्होंने अपने खेत में सिर्फ 40 सहजन (मुनगा) के पेड़ लगाए और इसके बाद उनकी खेती की तस्वीर बदल गई।

30Stades की रिपोर्ट के अनुसार, बार-बार फसल खराब होने के बाद संदीप ने अपने परिवार की खेती को नए तरीके से करने का फैसला किया। महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित सांगोला क्षेत्र में कम पानी और कम खर्च में होने वाली फसल की तलाश के दौरान उन्होंने सहजन की खेती शुरू की। हालांकि शुरुआत में उन्हें यह भरोसा नहीं था कि यह प्रयोग सफल होगा, लेकिन उनका यह फैसला आगे चलकर उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ। लेकिन यह फैसला भी उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। संदीप कदम ने बताया कि अनार की खेती में भी उन्हें लगातार नुकसान हुआ। बेमौसम बारिश की वजह से फसल में बैक्टीरियल ब्लाइट और विल्ट जैसी बीमारियां फैलने लगीं। इन बीमारियों से बचाने के लिए बार-बार दवाओं का छिड़काव करना पड़ता था, जिससे खेती का खर्च लगातार बढ़ता गया। आखिरकार उन्हें किसी नई फसल की तलाश करनी पड़ी।

लगातार हो रहे नुकसान के बाद संदीप ने खेती का तरीका बदलने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि सांगोला इलाके में भूजल का स्तर पहले से ही कम है और बारिश का कोई भरोसा नहीं रहता। इसलिए उन्हें ऐसी फसल चाहिए थी जो कम पानी में भी अच्छी तरह उग सके और जिसमें दवाओं व देखभाल पर ज्यादा खर्च न आए। इसी दौरान उन्हें सहजन की खेती का विकल्प मिला और उन्होंने इसे अपनाने का फैसला किया।

सहजन की खेती क्यों चुनी?

संदीप कदम की तलाश आखिरकार सहजन (मुनगा) की खेती पर जाकर खत्म हुई। सहजन एक ऐसी फसल है, जिसका इस्तेमाल भारत के कई हिस्सों में सब्जी, सांभर, दाल और दूसरी कई डिश बनाने में किया जाता है। स्वाद के साथ-साथ यह पोषक तत्वों से भी भरपूर होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि दूसरी कई बागवानी फसलों के मुकाबले सहजन को बहुत कम पानी की जरूरत होती है। यही वजह है कि यह सूखा प्रभावित इलाकों के लिए एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इन खूबियों ने संदीप को सहजन की खेती शुरू करने के लिए प्रेरित किया।

संदीप ने एक साथ पूरी खेती बदलने का जोखिम नहीं लिया। उन्होंने पहले छोटे स्तर पर इसकी शुरुआत की। साल 2010 में उन्होंने तमिलनाडु से ओडीसी (ODC) किस्म के बीज मंगवाए और अपने अनार के बाग में खाली पड़ी जगह पर सिर्फ 40 सहजन के पेड़ लगाए।

40 पौधों से शुरु हुआ सफर 

संदीप कदम ने एक साथ पूरी खेती बदलने की बजाय पहले छोटे स्तर पर सहजन की खेती शुरू की। साल 2010 में उन्होंने तमिलनाडु से ओडीसी (ODC) किस्म के बीज मंगवाए और अपने अनार के बाग की खाली जगह में सिर्फ 40 सहजन के पौधे लगाए। संदीप बताते हैं, “सिर्फ 40 पौधों से मुझे करीब 40 हजार रुपये की कमाई हुई। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मुझे लगा कि सूखा प्रभावित इलाकों के किसानों के लिए सहजन की खेती एक अच्छा विकल्प बन सकती है।” जैसे-जैसे पौधे बड़े हुए, हर पेड़ से सालाना औसतन करीब 60 किलो सहजन मिलने लगा।

पहले प्रयोग की सफलता के बाद संदीप ने दिसंबर 2012 में एक एकड़ जमीन पर बड़े पैमाने पर सहजन की खेती शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपनी पहली फसल से तैयार किए गए बीजों का इस्तेमाल किया। उन्होंने करीब 680 पौधे लगाए। पौधों की कतारों के बीच 10 फीट और एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच करीब 6 फीट की दूरी रखी गई। इसके बाद मई में पहली व्यावसायिक फसल तैयार हुई, जिसमें हर पौधे से औसतन करीब 25 किलो सहजन मिला।

25 लाख की आमदनी 

आज संदीप कदम के खेत में हर साल करीब 4.2 लाख किलो (420 टन) सहजन का उत्पादन होता है। बाजार में मौसम के अनुसार सहजन की कीमत 40 से 100 रुपये प्रति किलो तक रहती है, लेकिन उन्हें औसतन 60 रुपये प्रति किलो का भाव मिल जाता है। संदीप अपनी फसल का निर्यात दुबई भी करते हैं। इसके अलावा उनके पास खरीदारों का अच्छा नेटवर्क है, जिससे उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं और उनकी कमाई लगातार बनी रहती है। सहजन की खेती पर उनका सालाना खर्च करीब 1.5 लाख रुपये प्रति एकड़ आता है, जबकि एक एकड़ से करीब 25 लाख रुपये की आमदनी होती है। इस तरह उन्हें लगभग 23.5 लाख रुपये प्रति एकड़ का मुनाफा मिलता है।