फ्लाइट में बैठे दादाजी कर रहे थे ChatGPT से ये काम, तस्वीर वायरल हुई तो लोगों ने जमकर की तारीफ

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर अक्सर युवाओं की चर्चा होती है, लेकिन एक 77 साल के भारतीय दादाजी ने इस धारणा को ही बदल दिया। वह फ्लाइट में बैठकर ChatGPT की मदद से वर्टिकल फार्मिंग का बिजनेस आइडिया तैयार कर रहे थे। खास बात यह थी कि वह AI से बात करते समय उसे बार-बार बेहद सम्मान से ‘सर’ कह रहे थे। उनकी यही बात सोशल मीडिया यूजर्स को इतनी पसंद आई कि तस्वीर वायरल हो गई।

फ्लाइट में चल रही थी बिजनेस की तैयारी

हैदराबाद के रहने वाले VBR प्रसाद इंडिगो की फ्लाइट में सफर कर रहे थे। उनके पास बैठे एक युवा यात्री की नजर उनके फोन पर पड़ी। प्रसाद ChatGPT के साथ बिजनेस प्लान पर चर्चा कर रहे थे। युवा यात्री ने उनकी तस्वीर लेकर X पर शेयर कर दी। पोस्ट में बताया गया कि 77 साल की उम्र में भी प्रसाद बिजनेस आइडिया पर इतनी गंभीरता से काम कर रहे थे। देखते ही देखते पोस्ट को लाखों व्यूज मिल गए।

ChatGPT को तीन बार कहा ‘सर’

प्रसाद की बातचीत का सबसे मजेदार हिस्सा उनका अंदाज था। उन्होंने कुछ ही वाक्यों में ChatGPT को तीन बार ‘सर’ कहकर संबोधित किया। उन्होंने AI को धन्यवाद देते हुए कहा कि वह दो फाइल डाउनलोड करेंगे और जरूरत पड़ने पर दोबारा मदद लेंगे। सोशल मीडिया पर लोगों को उनका यह शालीन अंदाज बेहद पसंद आया। आज जहां लोग AI को सीधे आदेश देने के आदी हो चुके हैं, वहीं प्रसाद का विनम्र तरीका इंटरनेट पर चर्चा का विषय बन गया।

77 की उम्र में नया बिजनेस आइडिया

प्रसाद सिर्फ ChatGPT से बातचीत नहीं कर रहे थे, बल्कि उससे अपने वर्टिकल फार्मिंग के आइडिया को बेहतर बनाने में मदद ले रहे थे। यानी उम्र बढ़ने के साथ सीखने और कुछ नया करने का उनका उत्साह कम नहीं हुआ। उनकी तस्वीर शेयर करने वाले यूजर ने भी उनकी तारीफ करते हुए लिखा कि वह 77 की उम्र में कई युवाओं से ज्यादा फोकस्ड नजर आ रहे थे।

वायरल होने के बाद दादाजी ने खुद दिया जवाब

पोस्ट वायरल होने के बाद प्रसाद खुद X पर आए और लोगों के प्यार का जवाब दिया। उन्होंने खुशी जताई कि उनकी तस्वीर और बातचीत को इतनी लोकप्रियता मिली। उन्होंने AI को लेकर भी एक बात कही तकनीक का इस्तेमाल इंसान के हाथ में है और इसे अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

सोशल मीडिया ने कहा- ‘ऐसे ही रहिए सर!’

प्रसाद की कहानी पर लोगों ने मजेदार से लेकर भावुक प्रतिक्रियाएं तक दीं। किसी ने उनकी विनम्रता की तारीफ की तो किसी ने मजाक में कहा कि अगर कभी AI इंसानों से नाराज हुआ, तो प्रसाद को उनकी शालीनता के कारण छोड़ देगा। कई लोगों ने यह भी कहा कि उनकी कहानी दिखाती है कि AI सीखने की कोई उम्र नहीं होती। सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो तकनीक बुजुर्गों के लिए भी सीखने, काम करने और नए आइडिया आजमाने का साथी बन सकती है।

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20 लाख खर्च कर MBA ग्रेजुएट ने शुरू की शिमला मिर्च की खेती, सालाना 2.25 करोड़ का कमा रही मुनाफा

MBA ग्रेजुएट प्रणिता वामन ने कोरोना काल में 20 लाख का एक समझदारीभरा निवेश किया था, जिसके बाद से आज वह करोड़ों का प्रोफिट कमा रही हैं। उन्होंने COVID-19 लॉकडाउन के दौरान शिमला मिर्च की खेती करनी शुरू की थी। एक एकड़ से शुरू हुआ काम आज 25 एकड़ के फार्म तक पहुंच चुका है। उनका टर्नओवर 4 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

30Stades की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी ये जर्नी फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में इंटर्नशिप के साथ शुरू हुई थी, जहां उन्होंने मॉर्डन एग्रीकल्चर (आधुनिक खेती) में संभावनाओं को खोजा । 2020 में एक एकड़ पॉलीहाउस खेती से शुरू हुआ यह काम अब 25 एकड़ के खेती के कारोबार में तक पहुंच गया है, जिससे प्रणिता वामन का सालाना ₹4 करोड़ का टर्नओवर होता है।

MBA से खेती तक का सफर

प्रणिता वामन महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नार तालुका के कलवाड़ी गांव से ताल्लुक रखती हैं। वह एक किसान परिवार में पली-बढ़ी हैं। उनके पिता टीचर थे, लेकिन वॉलंटरी रिटायरमेंट लेने के बाद भी वे फलों और सब्जियों की खेती से जुड़े रहे। उन्होंने 2019 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज पुणे से एग्री बिजनेस मैनेजमेंट में MBA किया है। अपनी डिग्री करने के बाद उन्होंने एक फूड प्रोसेसिंग कंपनी में इंटर्नशिप करनी शुरू किया था।

इंटरर्नशिप से मिले एक्सपीरिएंस ने वामन को हाई-टेक खेती, खासकर पॉलीहाउस खेती के बारे में जानने के लिए काफी मोटीवेट किया। कम संसाधन में किसान फसल उगाने की स्थितियों को कैसे मैनेज कर सकते हैं, फसल की पैदावार और क्वालिटी बेहतर कैसे बना सकते हैं और पौधों को खराब मौसम से कैसे बचा सकते हैं? यह सब उन्होंने सीखा। बदलते मौसम के पैटर्न को देखते हुए कंट्रोल किए गए माहौल में सही तरीके से खेती आसानी से की जा सकती है।

वामन ने बताया कि हम तेजी से बदलते मौसम का सामना करते रहते हैं। आज लगातार अच्छी कमाई करने का एकमात्र तरीका हाई-टेक खेती है। यह बेहद फायदेमंद भी है।

प्रणिता ने शिमला मिर्च की खेती को ही क्यों चुना?

MBA ग्रेजुएट ने कहा खेती करने की प्लानिंग तो करली गई, लेकिन फिर हमारे सामने अगला सवाल यह था कि क्या उगाया जाए? वामन ने शिमला मिर्च (कैप्सिकम) को चुनने से पहले लेट्यूस और ब्रोकली जैसी कई सब्जियों को उगाने के बारे में भी विचार किया था। आखिरकार फिर उन्होंने शिमला मिर्च की फसल को चुना क्योंकि इसकी मांग हर मौसम में बनी रहती है।

वामन ने कहा कि “मैंने लेट्यूस, ब्रोकली और दूसरी विदेशी सब्जियों की खेती करने के बारे में विचार किया था। लेकिन शिमला मिर्च की मांग की डिमांड को देखते हुए हमने इसे फाइनल किया। शिमला मिर्च सालभर डिमांड में रहती है। इसका कोई खास सीजन नहीं होता है।

सालभर बाजार में रहती है डिमांड

ये शहरों के बाजारों में सालभर बिकती है। शिमला का यूज होटल, रेस्टोरेंट और फूड बिजनेस में बड़े पैमाने पर किया जाता है। खासकर लाल और पीली शिमला मिर्च अक्सर हरी शिमला मिर्च के मुकाबले ज्यादा महंगी बिकती हैं। इस फसल का एक बड़ा इंटरनेशनल मार्केट भी है।

वामन के मुताबिक उन्होंने मार्च 2020 में वामन ने 50% सरकारी सब्सिडी के साथ 20 लाख रुपये का निवेश करके एक पॉलीहाउस में एक एकड़ ज़मीन पर शिमला मिर्च की खेती शुरू की थी। उन्होंने KVK बारामती से लाए गए 12,000 पौधे लगाए थे। फसल जून-जुलाई में पूरी तरह से तैयार हो गई थी। लेकिन उनकी पहली फसल कटने का समय कोविड-19 लॉकडाउन लग गया था, जिससे बाजार बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।

खरीदार ढूंढना था चुनौती

कमर्शियल खेती में नए होने की वजह से खरीदार ढूंढना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी। वामन ने माना “फील्ड में नई होने के नाते मुझे ये पता नहीं था कि अपनी फसल को कहां बेचना है। इसके बाद उन्होंने ऑनलाइन थोक सब्जी खरीदारों को ढूंढना शुरू किया। अपनी फसल बेचने के लिए उन्होंने नासिक से लेकर मुंबई तक के व्यापारियों से संपर्क किया। वामन ने बताया कि काफी मशक्कत के बाद मुझे शिमला मिर्च खरीदने के लिए एक व्यापारी मिला था। लॉकडाउन के दौरान कई किसानों ने इसकी खेती बंद कर दी थी।”

उनकी पहली फसल में 40 टन लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च हुई, जो 80 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकी थी। इससे उन्होंने 32 लाख रुपये कमाए थे। अपना 20 लाख रुपये का इंवेस्टमेंट निकालने के बाद वामन ने 2021 तक खेती का दायरा बढ़ाकर 1 से 25 एकड़ कर लिया था। इसमें छह एकड़ में पॉलीहाउस और 19 एकड़ में शेड नेट का इस्तेमाल किया, जिनसे अलग-अलग पैदावार और कीमतें मिलीं।

जानकारी के लिए बता दें कि पॉलीहाउस खेती से सालाना प्रति एकड़ लगभग 30-32 टन पैदावार मिलती है, जबकि शेड नेट के तहत यह 22-24 टन होती है। वामन ने बताया कि पॉलीहाउस से उन्हें प्रति एकड़ 30 लाख रुपये का टर्नओवर होता है, जिसमें 8-10 लाख रुपये का खर्च आता है। 25 एकड़ में वह सालाना 4 करोड़ रुपये का टर्नओवर और लगभग 2.25 करोड़ रुपये का मुनाफा आराम से कमा लेती हैं।

90 लाख की नौकरी छोड़ी, माइक्रोग्रीन्स की खेती शुरू की, आज खड़ा कर दिया 1.44 करोड़ का बिजनेस

हर महीने लाखों रुपये की सैलरी, शानदार कॉर्पोरेट करियर और सुरक्षित नौकरी छोड़कर खेती की राह चुनना आसान नहीं होता। लेकिन चंडीगढ़ के मोहित निजहावन ने इसी चुनौती को स्वीकार किया। करीब 90 लाख रुपये सालाना की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने माइक्रोग्रीन्स की खेती को अपना नया करियर बनाया। खास बात यह है कि उन्होंने इस बिजनेस की शुरुआत किसी बड़े निवेश या बड़ी जमीन से नहीं की थी। महज 30,000 रुपये और करीब 100 वर्ग फुट की जगह से शुरू हुआ उनका प्रयोग धीरे-धीरे एक कारोबार में बदल गया। मोहित ने इंडोर फार्मिंग के जरिए माइक्रोग्रीन्स उगाए और समय के साथ ग्राहकों, उत्पादन और बिक्री को समझते हुए अपने काम को आगे बढ़ाया।

आज सार्वजनिक रूप से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, उनके कारोबार का सालाना रेवेन्यू करीब 1.44 करोड़ रुपये बताया जाता है। उनकी यह कहानी नौकरी से बिजनेस तक के अनोखे सफर और जोखिम उठाने की मिसाल बन गई है।

B.Tech के बाद शुरू हुआ कॉर्पोरेट सफर

मोहित निजहावन कंप्यूटर साइंस में B.Tech ग्रेजुएट हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में शानदार करियर बनाया और अच्छी खासी सैलरी वाली नौकरी हासिल की।

हालांकि, दिसंबर 2020 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना, जो उनकी पुरानी कॉर्पोरेट जिंदगी से बिल्कुल अलग था।

सिर्फ 30 हजार रुपये से शुरू किया काम

माइक्रोग्रीन्स की खेती का आइडिया मोहित के लिए शुरुआत में एक प्रयोग जैसा था। उन्होंने बड़े निवेश के बजाय सिर्फ 30,000 रुपये से अपना काम दोबारा शुरू किया।

इसके लिए चंडीगढ़ में करीब 100 वर्ग फुट की छोटी-सी जगह ली गई। इसी सीमित जगह में उन्होंने इंडोर माइक्रोग्रीन्स उगाना शुरू किया और धीरे-धीरे खेती के साथ-साथ मार्केटिंग और ग्राहकों की जरूरतों को समझना शुरू किया।

छोटे कमरे से बना Greenu Microgreens

शुरुआती प्रयोग धीरे-धीरे एक बिजनेस मॉडल में बदल गया। मोहित ने उत्पादन बढ़ाने, ग्राहकों तक पहुंच बनाने और माइक्रोग्रीन्स की बिक्री को बेहतर तरीके से मैनेज करने पर काम किया।

इसी सफर से Greenu Microgreens का कारोबार खड़ा हुआ। छोटी जगह और कम पूंजी से शुरू हुआ यह वेंचर आज काफी बड़ा बिजनेस बन चुका है।

हर महीने 12 लाख रुपये का रेवेन्यू!

सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के मुताबिक, Greenu Microgreens का कारोबार अब करीब 12 लाख रुपये प्रति महीने का रेवेन्यू जेनरेट करता है। यानी सालाना कारोबार लगभग 1.44 करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट्स में कंपनी का सालाना मुनाफा करीब 60 लाख रुपये बताया गया है। हालांकि, बिजनेस का रेवेन्यू और किसी व्यक्ति की नौकरी की सैलरी अलग-अलग चीजें हैं, इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना सही नहीं होगा।

सिर्फ अपना बिजनेस नहीं, दूसरों को भी दे रहे ट्रेनिंग

मोहित की कहानी सिर्फ अपना फार्म चलाने तक सीमित नहीं है। Greenu Microgreens के जरिए वह किसानों और उन लोगों को भी माइक्रोग्रीन्स फार्मिंग की ट्रेनिंग देते हैं, जो इसे बिजनेस के तौर पर शुरू करना चाहते हैं। इस तरह उनका लक्ष्य केवल माइक्रोग्रीन्स उगाना ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों को भी इस क्षेत्र में अवसर तलाशने में मदद करना है।

90 लाख की नौकरी से 30 हजार की खेती तक का सफर

मोहित की कहानी इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने करीब 90 लाख रुपये सालाना की नौकरी छोड़कर सिर्फ 30,000 रुपये से अपना नया सफर शुरू किया। एक तरफ कॉर्पोरेट नौकरी की बड़ी सैलरी थी, तो दूसरी तरफ छोटी जगह में खेती का अनिश्चित रास्ता। इसके बावजूद उन्होंने अपने नए आइडिया पर भरोसा किया और धीरे-धीरे इसे बिजनेस में बदल दिया।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

मोहित की कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों के बीच अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे नौकरी से अलग रास्ता चुनने और अपने दम पर बिजनेस खड़ा करने की प्रेरणादायक कहानी बताया। वहीं, कुछ यूजर्स ने 90 लाख रुपये की सैलरी और 1.44 करोड़ रुपये के बिजनेस रेवेन्यू की तुलना पर सवाल उठाए। एक यूजर ने इसे भ्रामक तुलना बताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की सालाना सैलरी और बिजनेस का टर्नओवर एक जैसी चीजें नहीं हैं।

दूसरी ओर, कुछ लोगों ने मोहित के फैसले को जिंदगी और सफलता को अलग नजरिए से देखने वाली कहानी बताया। एक यूजर ने इसे “वास्तव में प्रेरणादायक सफर” कहा, जबकि दूसरे ने उनकी यात्रा की तारीफ की।

क्या सीख देती है मोहित की कहानी?

मोहित की कहानी दिखाती है कि सफलता का रास्ता हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। बड़ी नौकरी और अच्छी सैलरी के बावजूद कोई व्यक्ति अपना अलग रास्ता चुन सकता है। हालांकि, किसी भी बिजनेस की सफलता को समझने के लिए सिर्फ रेवेन्यू नहीं, बल्कि निवेश, खर्च, मुनाफा और कारोबार की स्थिरता जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

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Success Story: छत पर शुरू की ड्रैगन फ्रूट की खेती, ऐसे होने लगी लाखों की कमाई, महिला ने अपनाया ये तरीका

रिटायरमेंट के बाद आमतौर पर लोग आराम और परिवार के साथ समय बिताने की योजना बनाते हैं। लेकिन केरल की पूर्व हेडमिस्ट्रेस रेमाभाई एस की जिंदगी में रिटायरमेंट के बाद एक अलग ही अध्याय शुरू हुआ। अकेलेपन से निपटने के लिए घर में पौधे लगाने से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे ऐसे बिजनेस में बदल गया, जिससे अब वह करीब ₹4 लाख महीने की कमाई कर रही हैं।

मां की मौत के बाद बढ़ गया था अकेलापन

रेमाभाई ने 31 मई 2022 को 30 साल से ज्यादा समय तक जूलॉजी पढ़ाने के बाद रिटायरमेंट लिया। उनके पति रिटायर्ड सीनियर बैंक मैनेजर हैं और उस समय भी एक इंजीनियरिंग कॉलेज में काम कर रहे थे। वहीं उनका बेटा और बहू दोनों डॉक्टर हैं और दिल्ली में रहते थे। उसी साल उनकी मां का निधन हो गया। रिटायरमेंट और मां की मौत के बाद घर में अकेलापन उन्हें ज्यादा महसूस होने लगा। इसी दौरान उन्होंने खुद को व्यस्त रखने के लिए घर में पौधे उगाने का फैसला किया।

52 विदेशी फलों पर की रिसर्च, फिर चुना ड्रैगन फ्रूट

रेमाभाई ने शुरुआत किसी जल्दबाजी में नहीं की। उन्होंने जर्नल, ऑनलाइन जानकारी और अलग-अलग फार्म की यात्राओं के जरिए करीब 52 विदेशी फलों के बारे में जानकारी जुटाई। काफी रिसर्च के बाद उन्होंने Malaysian King Red Dragon Fruit किस्म को चुना। सीमित जगह में ज्यादा पौधे लगाने के लिए उन्होंने हाई-डेंसिटी फार्मिंग का तरीका अपनाया।

1,750 वर्ग फुट में लगाए 360 पौधे

घर के करीब 1,750 वर्ग फुट के हिस्से में उन्होंने 360 ड्रैगन फ्रूट पौधे लगाए। इसके लिए 90 स्थानीय स्तर पर बने कंक्रीट पोल लगाए गए और हर पोल पर चार पौधों को सहारा दिया गया। उन्होंने खर्च कम रखने के लिए GI पाइप और पुराने टायरों का भी इस्तेमाल किया। शुरुआती दौर में एक पौधे की स्टेम करीब ₹100 में खरीदी गई थी। मेहनत का नतीजा जल्दी दिखा। करीब छह महीने में पौधों में फूल आने लगे और मार्च 2023 से उन्होंने फल की पहली फसल लेना शुरू कर दिया।

शुरुआत में ₹50 हजार, फिर बढ़कर ₹1.5 लाख महीना

पहले 360 पौधों से उन्हें हर महीने ₹50 हजार से ज्यादा की आमदनी हुई। पौधों के बड़े होने के साथ कमाई बढ़कर करीब ₹1.5 लाख महीने तक पहुंच गई। उत्पादन के चरम समय में वह लगभग 750 किलो ड्रैगन फ्रूट हर महीने तैयार करने लगीं। वह फल करीब ₹175 प्रति किलो की दर से बेचती थीं। खास बात यह रही कि थोक खरीदार और ऑर्गेनिक स्टोर उनके घर से ही फल उठा लेते थे।

नई जमीन नहीं खरीदी, छत को बनाया अगला फार्म

बिजनेस बढ़ाने के लिए रेमाभाई के सामने अगली चुनौती थी बिना जमीन खरीदे उत्पादन बढ़ाना। घर की छत पर बड़ी मात्रा में मिट्टी ले जाना उन्हें सही नहीं लगा। इसलिए उन्होंने सोइल-लेस यानी कम मिट्टी वाली खेती के विकल्प पर प्रयोग शुरू किया। उन्होंने सामान्य मिट्टी और घर में तैयार किए गए कंपोस्ट की तुलना की। कंपोस्ट में पौधों की ग्रोथ बेहतर दिखने के बाद उन्होंने इसी तरीके को आगे बढ़ाया।

बैरल में लगाए 100 और पौधे

रेमाबाई ने छत पर 50 बैरल लगाए। इनमें कंपोस्ट और गोबर की खाद का मिश्रण इस्तेमाल किया गया और हर बैरल में दो पौधे लगाए गए। इस तरह छत पर 100 और ड्रैगन फ्रूट पौधे तैयार हो गए। करीब पांच महीने में इन पौधों पर फल आने लगे। अक्टूबर 2023 तक छत की खेती भी उत्पादन देने लगी थी। एक पौधे पर एक समय में करीब 10 से 20 फल तक दिखाई देते थे।

घर के कचरे से तैयार करती हैं खाद और लिक्विड फर्टिलाइजर

रेमाबाई की खेती की खासियत सिर्फ ड्रैगन फ्रूट उगाना नहीं है। वह घर और बगीचे से निकलने वाले जैविक कचरे का इस्तेमाल भी खेती में करती हैं। किचन वेस्ट, पत्तियां, कटहल का बचा हिस्सा, प्याज और सब्जियों के अवशेष जैसी चीजों से वह कंपोस्ट तैयार करती हैं। उनके पास तीन कंपोस्टिंग यूनिट हैं और वह 15 से ज्यादा तरह के लिक्विड प्रिपरेशन भी तैयार करती हैं। मछली के कचरे से वह फिश अमीनो एसिड भी बनाती हैं। उनके मुताबिक, अब तक 5,000 लीटर से ज्यादा यह तैयारी तैयार की जा चुकी है।

साल में ज्यादा लंबे समय तक मिलता है फल

उनके खेती के तरीके का एक फायदा यह भी है कि ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन लंबे समय तक चलता है। जहां आमतौर पर इसकी मुख्य फसल करीब पांच से छह महीने तक रहती है, वहीं रेमाबाई लगभग 10 महीने तक फल प्राप्त कर लेती हैं। जनवरी और फरवरी में उत्पादन में मुख्य अंतराल रहता है। उनके बगीचे में महीने में करीब तीन बार फसल होती है और हर बार लगभग 250 किलो फल निकलता है।

अब पौधों की कटिंग भी बन गई कमाई का जरिया

समय के साथ रेमाभाई के ड्रैगन फ्रूट पौधों की स्टेम कटिंग की मांग भी बढ़ने लगी। उन्होंने इसे अलग आय के स्रोत के रूप में विकसित कर लिया। वह एक कटिंग करीब ₹70 में बेचती हैं और अब तक भारत, मालदीव और श्रीलंका में उनके 2,500 से ज्यादा ग्राहक बताए जाते हैं। बड़े ऑर्डर कुरियर के जरिए भेजे जाते हैं। एक दिन में तेलंगाना के लिए 5,500 स्टेम कटिंग का ऑर्डर भी भेजा गया।

सिर्फ पौधे नहीं बेचतीं, तरीका भी सिखाती हैं

रेमाबाई अपने ग्राहकों को सिर्फ कटिंग देकर नहीं छोड़तीं। वह उन्हें पौधे लगाने और उनकी देखभाल के बारे में जानकारी देती हैं और आगे की ग्रोथ पर भी नजर रखती हैं। उनके मुताबिक, सही परिस्थितियों में स्टेम से करीब छह महीने में फल मिलना शुरू हो सकता है।

रिटायरमेंट का शौक बना पूरा बिजनेस

रेमाबाई की कहानी की खास बात यह है कि उन्होंने बिजनेस शुरू करने के लिए न बड़ी जमीन खरीदी और न ही भारी निवेश किया। घर के आंगन और छत जैसी सीमित जगह का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने पहले पौधे लगाए, फिर रिसर्च की, प्रयोग किए और धीरे-धीरे खेती को कमाई के मॉडल में बदल दिया।

आज ड्रैगन फ्रूट, छत पर खेती और स्टेम कटिंगइन अलग-अलग स्रोतों से उनकी कुल मासिक कमाई करीब ₹4 लाख बताई जाती है। रिटायरमेंट के बाद अकेलेपन से बचने के लिए शुरू हुआ पौधों का शौक अब उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता की कहानी बन चुका है।

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सूखे में भी चमकी किस्मत! कम पानी, कम खर्च… फिर भी बंपर कमाई, सहजन की खेती ने किसान की बदल दी तकदीर

महाराष्ट्र के किसान संदीप कदम के लिए कई सालों तक खेती करना आसान नहीं रहा। सूखा, बढ़ती खेती की लागत और मौसम की मार की वजह से उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा था। लेकिन एक छोटे से फैसले ने उनकी किस्मत बदल दी। घाटे वाली फसलों की जगह उन्होंने अपने खेत में सिर्फ 40 सहजन (मुनगा) के पेड़ लगाए और इसके बाद उनकी खेती की तस्वीर बदल गई।

30Stades की रिपोर्ट के अनुसार, बार-बार फसल खराब होने के बाद संदीप ने अपने परिवार की खेती को नए तरीके से करने का फैसला किया। महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित सांगोला क्षेत्र में कम पानी और कम खर्च में होने वाली फसल की तलाश के दौरान उन्होंने सहजन की खेती शुरू की। हालांकि शुरुआत में उन्हें यह भरोसा नहीं था कि यह प्रयोग सफल होगा, लेकिन उनका यह फैसला आगे चलकर उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ। लेकिन यह फैसला भी उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। संदीप कदम ने बताया कि अनार की खेती में भी उन्हें लगातार नुकसान हुआ। बेमौसम बारिश की वजह से फसल में बैक्टीरियल ब्लाइट और विल्ट जैसी बीमारियां फैलने लगीं। इन बीमारियों से बचाने के लिए बार-बार दवाओं का छिड़काव करना पड़ता था, जिससे खेती का खर्च लगातार बढ़ता गया। आखिरकार उन्हें किसी नई फसल की तलाश करनी पड़ी।

लगातार हो रहे नुकसान के बाद संदीप ने खेती का तरीका बदलने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि सांगोला इलाके में भूजल का स्तर पहले से ही कम है और बारिश का कोई भरोसा नहीं रहता। इसलिए उन्हें ऐसी फसल चाहिए थी जो कम पानी में भी अच्छी तरह उग सके और जिसमें दवाओं व देखभाल पर ज्यादा खर्च न आए। इसी दौरान उन्हें सहजन की खेती का विकल्प मिला और उन्होंने इसे अपनाने का फैसला किया।

सहजन की खेती क्यों चुनी?

संदीप कदम की तलाश आखिरकार सहजन (मुनगा) की खेती पर जाकर खत्म हुई। सहजन एक ऐसी फसल है, जिसका इस्तेमाल भारत के कई हिस्सों में सब्जी, सांभर, दाल और दूसरी कई डिश बनाने में किया जाता है। स्वाद के साथ-साथ यह पोषक तत्वों से भी भरपूर होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि दूसरी कई बागवानी फसलों के मुकाबले सहजन को बहुत कम पानी की जरूरत होती है। यही वजह है कि यह सूखा प्रभावित इलाकों के लिए एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इन खूबियों ने संदीप को सहजन की खेती शुरू करने के लिए प्रेरित किया।

संदीप ने एक साथ पूरी खेती बदलने का जोखिम नहीं लिया। उन्होंने पहले छोटे स्तर पर इसकी शुरुआत की। साल 2010 में उन्होंने तमिलनाडु से ओडीसी (ODC) किस्म के बीज मंगवाए और अपने अनार के बाग में खाली पड़ी जगह पर सिर्फ 40 सहजन के पेड़ लगाए।

40 पौधों से शुरु हुआ सफर 

संदीप कदम ने एक साथ पूरी खेती बदलने की बजाय पहले छोटे स्तर पर सहजन की खेती शुरू की। साल 2010 में उन्होंने तमिलनाडु से ओडीसी (ODC) किस्म के बीज मंगवाए और अपने अनार के बाग की खाली जगह में सिर्फ 40 सहजन के पौधे लगाए। संदीप बताते हैं, “सिर्फ 40 पौधों से मुझे करीब 40 हजार रुपये की कमाई हुई। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मुझे लगा कि सूखा प्रभावित इलाकों के किसानों के लिए सहजन की खेती एक अच्छा विकल्प बन सकती है।” जैसे-जैसे पौधे बड़े हुए, हर पेड़ से सालाना औसतन करीब 60 किलो सहजन मिलने लगा।

पहले प्रयोग की सफलता के बाद संदीप ने दिसंबर 2012 में एक एकड़ जमीन पर बड़े पैमाने पर सहजन की खेती शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपनी पहली फसल से तैयार किए गए बीजों का इस्तेमाल किया। उन्होंने करीब 680 पौधे लगाए। पौधों की कतारों के बीच 10 फीट और एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच करीब 6 फीट की दूरी रखी गई। इसके बाद मई में पहली व्यावसायिक फसल तैयार हुई, जिसमें हर पौधे से औसतन करीब 25 किलो सहजन मिला।

25 लाख की आमदनी 

आज संदीप कदम के खेत में हर साल करीब 4.2 लाख किलो (420 टन) सहजन का उत्पादन होता है। बाजार में मौसम के अनुसार सहजन की कीमत 40 से 100 रुपये प्रति किलो तक रहती है, लेकिन उन्हें औसतन 60 रुपये प्रति किलो का भाव मिल जाता है। संदीप अपनी फसल का निर्यात दुबई भी करते हैं। इसके अलावा उनके पास खरीदारों का अच्छा नेटवर्क है, जिससे उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं और उनकी कमाई लगातार बनी रहती है। सहजन की खेती पर उनका सालाना खर्च करीब 1.5 लाख रुपये प्रति एकड़ आता है, जबकि एक एकड़ से करीब 25 लाख रुपये की आमदनी होती है। इस तरह उन्हें लगभग 23.5 लाख रुपये प्रति एकड़ का मुनाफा मिलता है।