दो साल का अनुभव लेकर 600 जगह भेजा आवेदन, फिर भी नहीं मिली नौकरी, Reddit पर छिड़ी बहस

भारत के तकनीकी क्षेत्र में नौकरी पाना इन दिनों कई युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी बीच रेडिट पर एक नौकरी तलाश रहे शख्स की पोस्ट ने लोगों का ध्यान खींचा है। करीब दो साल के अनुभव वाले इस व्यक्ति ने दावा किया कि वह सैकड़ों नौकरियों के लिए आवेदन कर चुका है, लेकिन उसे बहुत कम जगहों से जवाब मिला। शख्स ने बताया कि करीब 500-600 आवेदन भेजने के बावजूद उसकी स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ। इसके उलट, सोशल मीडिया और रेडिट पर उसे लगातार ऐसी कहानियां दिखाई दे रही थीं, जिनमें लोगों को नौकरी से निकाले जाने के कुछ ही महीनों बाद बड़ी तकनीकी कंपनियों से नए प्रस्ताव मिल रहे थे।

किसी को अमेजन के बाद गूगल, तो किसी को मेटा के बाद कई ऑफर

रेडिट उपयोगकर्ता ने कुछ ऐसी पोस्ट का जिक्र किया, जिन्हें देखकर वह खुद को दूसरों से बिल्कुल अलग स्थिति में महसूस करने लगा। एक व्यक्ति ने दावा किया कि अमेजन से नौकरी जाने के करीब पांच महीने बाद उसे गूगल में नौकरी मिल गई। एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि नौकरी जाने के सिर्फ तीन महीने के भीतर उसे 25 प्रतिशत अधिक वेतन वाली नई नौकरी मिल गई। इतना ही नहीं, नौकरी की तलाश के दौरान वह विदेश यात्रा पर भी गया।

सबसे ज्यादा हैरानी एक अन्य दावे से हुई, जिसमें एक व्यक्ति ने बताया कि मेटा से नौकरी जाने के बाद उसने गूगल, एप्पल और ओपनएआई में साक्षात्कार दिए और तीनों जगह से उसे नौकरी के प्रस्ताव मिले। आखिर में उसने गूगल को चुना।

दूसरी तरफ 500-600 आवेदन के बाद भी इंतजार

इन कहानियों की तुलना करते हुए मूल पोस्ट लिखने वाले शख्स ने सवाल किया कि क्या वह किसी अलग ही दुनिया में रह रहा है। उसके मुताबिक, जहां कुछ लोग बड़ी तकनीकी कंपनियों के प्रस्ताव आसानी से हासिल कर रहे हैं, वहीं उसे सैकड़ों आवेदन भेजने के बाद भी मुश्किल से कोई प्रतिक्रिया मिल रही है। उसने बताया कि अब तक उसका सबसे अच्छा नतीजा एक अस्थायी छह महीने की नौकरी के लिए बातचीत तक पहुंचना रहा है।

क्या बड़ी कंपनियों का अनुभव ही सबसे बड़ा फर्क है?

पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए एक उपयोगकर्ता ने सवाल उठाया कि क्या नौकरी तलाश रहे व्यक्ति का दो साल का अनुभव भी मेटा या अमेजन जैसी कंपनियों में रहा है। उसका तर्क था कि बड़ी तकनीकी कंपनियों में पहले से काम कर चुके लोगों के लिए नई नौकरी पाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, क्योंकि ऐसी कंपनियों में चयन अपने आप में कठिन माना जाता है। एक अन्य व्यक्ति ने इसी चर्चा के बीच नौकरी के लिए मदद और संदर्भ की मांग भी कर दी।

कुछ लोगों ने सोशल मीडिया की सफलता की कहानियों पर उठाए सवाल

हर किसी ने इन सफलता की कहानियों को सच नहीं माना। कुछ रेडिट उपयोगकर्ताओं ने कहा कि इंटरनेट पर दिखाई जाने वाली ऐसी पोस्ट पूरी तस्वीर नहीं दिखातीं। एक टिप्पणी में इन्हें प्रभावशाली लोगों द्वारा लोगों को झूठी उम्मीद देने वाला प्रचार तक बताया गया। यानी ऑनलाइन कुछ लोगों की तेज सफलता देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर तकनीकी पेशेवर के लिए नौकरी का बाजार एक जैसा है।

एक जवाब ने कहा- समस्या औसत होने की भी हो सकती है

चर्चा में एक टिप्पणी ने सबसे सीधा जवाब दिया। उपयोगकर्ता ने तर्क दिया कि अत्यधिक कुशल लोग अक्सर कई कंपनियों के लिए आकर्षक उम्मीदवार होते हैं। ऐसे लोग कम समय में जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखते हैं, इसलिए उन्हें नौकरी के ज्यादा अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, उस टिप्पणी में यह भी कहा गया कि औसत होना कोई बुरी बात नहीं है। कौशल को लगातार मेहनत और सीखने के जरिए बेहतर बनाया जा सकता है। यही वजह है कि इस पूरी चर्चा ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है क्या तकनीकी क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए सिर्फ अनुभव काफी है, या सही कौशल और क्षमता भी उतनी ही जरूरी है?

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Apple Layoffs: iPhone मेकर ने फिर की छंटनी, 200 लोगों की नौकरी पर खतरा; इस बार कौन सी टीम्स प्रभावित

आईफोन मेकर एपल इंक अपने सिरी डिजिटल असिस्टेंट और विजन प्रो हेडसेट से जुड़ी टीमों में नौकरियां कम कर रही है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वालों के हवाले से कहा गया है कि Apple अपनी ‘इंटेलिजेंट सिस्टम्स एक्सपीरियंस’ टीम के कर्मचारियों की भी छंटनी कर रही है। यह टीम सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग विभाग का हिस्सा है और डिवाइसेज के कुछ AI फीचर्स की जिम्मेदारी इस पर है।

बदलावों के तहत, कंपनी Vision Pro के लिए गेमिंग पर फोकस्ड टीम को काफी हद तक शट डाउन कर रही है और डिवाइस के लिए इमर्सिव वीडियो कंटेंट बनाने वाली यूनिट का साइज भी घटा रही है। कुल मिलाकर, इस जॉब कट से 200 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। Vision Pro विभाग से लगभग 100 पद खत्म किए गए हैं। Siri व सॉफ्टवेयर टीमों से भी 100 पद हटाए गए हैं।

लॉन्च के समय से ही इमर्सिव वीडियो Vision Pro की बिक्री का एक मुख्य आकर्षण रहा है। लेकिन हर 3D वीडियो बनाने के लिए Apple कर्मचारियों और कॉन्ट्रैक्टर्स की कई टीमों की जरूरत होती है। इमर्सिव वीडियो सीरीज के एक एपिसोड को शूट करने में कई मिलियन डॉलर का खर्च आ सकता है। Vision Pro के एक्टिव यूजर्स की कम संख्या को देखते हुए, इन खर्चों ने बिजनेस पर दबाव डाला है।

किस टीम में किस तरह की रीस्ट्रक्चरिंग

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, Siri में बदलाव, इस असिस्टेंट के आने वाले AI-इनफ्यूज्ड वर्जन से जुड़े हैं। इस बदलाव के लिए जरूरी विशेषज्ञता में बदलाव की जरूरत है, जिसके कारण कंपनी को कुछ मौजूदा भूमिकाओं को खत्म करना पड़ा। साथ ही रिसोर्सेज को को फिर से एलोकेट करना पड़ा और अपडेटेड Siri को सपोर्ट करने वाली नई भूमिकाएं क्रिएट करनी पड़ीं।

‘इंटेलिजेंट सिस्टम्स एक्सपीरियंस’ टीम में बदलाव AI-संचालित क्षमताओं पर काम को फिर से व्यवस्थित करने के प्रयास को दर्शाते हैं। जैसे-जैसे और अधिक ग्रुप्स की ओर से ऐप्स, फीचर्स और सर्विसेज में AI फंक्शन लाए जा रहे हैं, Apple प्राथमिकताओं के अनुरूप टीमों को फिर से व्यवस्थित कर रही है। इस रीस्ट्रक्चरिंग से कुछ मौजूदा पद खत्म होंगे और नई भूमिकाएं क्रिएट होंगी।

Vision Pro में बदलावों के बारे में कर्मचारियों को बताया गया है कि यह ग्राहकों द्वारा डिवाइस के इस्तेमाल के तरीके के आधार पर प्राथमिकताओं को फिर से व्यवस्थित करने और भविष्य के अन्य उत्पादों की ओर रिसोर्सेज को बेहतर ढंग से निर्देशित करने का प्रयास है।

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Vision Pro और visionOS ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं हो रहा बंद

Apple इमर्सिव वीडियो को पूरी तरह से बंद नहीं कर रही है। कंपनी की योजना है कि वह खुद कम संख्या में वीडियो बनाएगी। साथ ही थर्ड-पार्टी कंपनियों को इस डिवाइस के लिए कंटेंट बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी। कंपनी ने कर्मचारियों से कहा है कि Vision Pro और इसका visionOS ऑपरेटिंग सिस्टम बंद नहीं होने वाला है। ब्लूमबर्ग न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी 2028 के आखिर तक एक नया Vision Pro मॉडल लॉन्च करने पर भी विचार कर रही है।

एक बयान में एपल ने माना कि वह कुछ टीमों को फिर से व्यवस्थित कर रही है ताकि अपने यूजर्स को बेहतरीन अनुभव देने के लिए बिजनेस को आगे बढ़ा सके। कंपनी के मुताबिक, “हालांकि इस बदलाव के तहत हम नए जॉब रोल क्रिएट करेंगे, लेकिन इसका असर कुछ मौजूदा रोल्स पर भी पड़ेगा। हम इन टीम मेंबर्स के योगदान के लिए आभारी हैं और इस बदलाव के दौरान उनकी मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसमें Apple में अन्य भूमिकाओं के लिए आवेदन करने के अवसर भी शामिल हैं।”

14 महीने तक किसी को नहीं हुआ शक, दो कंपनियों में चुपचाप करता रहा नौकरी; लेकिन मर्जर ने ऐसा फंसाया कि अब समझ नहीं आ रहा क्या करे!

एक टेक प्रोफेशनल करीब 14 महीने से दो कंपनियों में एक साथ रिमोट जॉब कर रहा था और अब तक उसकी यह ‘डबल जॉब’ वाली व्यवस्था बिना किसी बड़ी परेशानी के चल रही थी। दोनों कंपनियां अलग थीं, काम का तरीका और टेक्नोलॉजी स्टैक भी अलग था, इसलिए उसे लगता था कि दोनों नौकरियों का राज आसानी से छिपा रहेगा। लेकिन अचानक एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उसकी पूरी प्लानिंग हिला दी। उसे पता चला कि उसकी दोनों कंपनियां अब मर्ज होने जा रही हैं।

इसके बाद सबसे बड़ा डर यह है कि कंपनियों के सिस्टम और कर्मचारी रिकॉर्ड आपस में जुड़ते ही उसकी पहचान दोनों जगह सामने आ सकती है। खास बात यह है कि वह दोनों संस्थानों के कर्मचारियों के संपर्क में भी रहता है और दोनों कंपनियों की Slack डायरेक्टरी में उसका नाम मौजूद है। अब वह सोच रहा है कि नौकरी छोड़े या जोखिम लेकर इंतजार करे।

14 महीने तक आराम से चल रही थी दोहरी नौकरी

रेडिट पर शेयर की गई पोस्ट के मुताबिक, टेक कर्मचारी करीब 14 महीने से दो कंपनियों में एक साथ काम कर रहा था। दोनों नौकरियां पूरी तरह रिमोट थीं और दोनों में अलग-अलग टेक्नोलॉजी स्टैक इस्तेमाल होते थे।

उसका मानना था कि दोनों कंपनियों के कामकाज और टीमों के बीच इतना अंतर है कि किसी को उसके दूसरे रोजगार के बारे में पता चलने की संभावना बेहद कम है। इसी भरोसे के साथ वह दोनों नौकरियां संभालता रहा।

छोटी कंपनी को चुना था, ताकि न हो कोई टकराव

कर्मचारी के मुताबिक, उसकी एक कंपनी मिड-साइज SaaS कंपनी थी, जबकि दूसरी उसी सेक्टर में काम करने वाली अपेक्षाकृत छोटी कंपनी थी। उसने दूसरी कंपनी को इसलिए चुना था क्योंकि उसे लगता था कि छोटी कंपनी होने के कारण दोनों संस्थानों के बीच भविष्य में किसी तरह का कारोबारी संपर्क होने की संभावना काफी कम है। लेकिन जिस चीज को उसने सबसे कम संभावित माना था, वही आखिरकार उसके सामने आ गई।

CEO का एक ईमेल और बदल गया पूरा खेल

मुश्किल तब शुरू हुई जब उसे पहली कंपनी के CEO की ओर से ईमेल मिला। ईमेल में बताया गया था कि उसकी कंपनी दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करने जा रही है। यानी जिस कंपनी में वह दूसरी नौकरी कर रहा था, अब वही उसकी पहली कंपनी के कॉरपोरेट दायरे में आने वाली थी। इसके बाद कर्मचारी को सबसे बड़ा डर अपने दोनों रोजगार रिकॉर्ड के आपस में जुड़ने का सताने लगा।

Slack डायरेक्टरी बनी सबसे बड़ी चिंता

टेक प्रोफेशनल ने बताया कि वह दोनों कंपनियों के कर्मचारियों के साथ नियमित रूप से बातचीत करता है। ऐसे में मर्जर के बाद उसके लिए छिपे रहना और मुश्किल हो सकता है। दोनों कंपनियों की Slack डायरेक्टरी में उसका नाम मौजूद है। हालांकि दूसरी कंपनी में उसने अपने नाम का थोड़ा अलग फॉर्मेट इस्तेमाल किया था, लेकिन उसे खुद भी शक है कि सिस्टम और कर्मचारी डेटाबेस के एकीकरण के बाद यह अंतर उसे बचाने के लिए काफी नहीं होगा।

असली डर

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि दोनों कंपनियों का इंटीग्रेशन कितनी जल्दी शुरू होगा। कर्मचारी को अंदाजा नहीं था कि पूरी प्रक्रिया में कई महीने लगेंगे या सिस्टम और कर्मचारी रिकॉर्ड का एकीकरण शुरुआत में ही शुरू हो जाएगा। अगर दोनों कंपनियों के HR सिस्टम, डायरेक्टरी और डेटाबेस जल्दी आपस में जुड़ गए, तो एक ही व्यक्ति का दो जगह कर्मचारी के तौर पर मौजूद होना आसानी से सामने आ सकता है।

नौकरी छोड़ दे या जोखिम लेकर इंतजार करे?

यहीं से कर्मचारी की सबसे बड़ी दुविधा शुरू हुई। उसके सामने दो रास्ते थे दूसरी नौकरी से खुद इस्तीफा दे दे या फिर कुछ समय तक दोनों नौकरियां जारी रखकर हालात पर नजर रखे। पहला विकल्प उसे तुरंत संभावित जोखिम से बाहर निकाल सकता था। वहीं दूसरा विकल्प ज्यादा अनिश्चित था, लेकिन इसमें वह मर्जर की दिशा देखकर आगे फैसला लेने की उम्मीद कर रहा था।

Layoff हुआ तो Severance का भी सवाल

कर्मचारी के दिमाग में एक और संभावना आई। मर्जर के दौरान कंपनियां अक्सर restructuring करती हैं और कुछ पदों को खत्म भी किया जा सकते हैं। ऐसे में उसे लगा कि अगर वह इंतजार करता है और उसकी नौकरी restructuring में चली जाती है, तो शायद उसे severance मिल सके। हालांकि वह यह भी समझ रहा था कि इस रणनीति में बड़ा जोखिम है। अगर उससे पहले ही दोनों कंपनियों को उसके डबल एम्प्लॉयमेंट का पता चल गया, तो स्थिति उसके खिलाफ जा सकती है।

तनाव इतना बढ़ा कि सुबह 10 बजे ही खाने लगा Goldfish

अपनी पोस्ट के आखिर में टेक कर्मचारी ने अपनी स्थिति को मजाकिया अंदाज में बताते हुए कहा कि वह सुबह 10 बजे ही अपनी डेस्क पर बैठकर “stress eating goldfish” कर रहा था। उसने Reddit यूजर्स से पूछा कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। पोस्ट सामने आते ही लोगों ने इसे गंभीर सलाह के साथ-साथ मजाकिया नजरिए से भी लेना शुरू कर दिया।

इंटरनेट ने कहा

पोस्ट पर कई यूजर्स ने उसकी स्थिति पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने इसे “suffering from success” वाला मामला बताया। दूसरे ने मजाक करते हुए कहा कि वह दोनों कंपनियों की टीमों का परिचय कराने वाला व्यक्ति बन सकता है। किसी ने तो यहां तक सुझाव दे दिया कि वह अपना कानूनी नाम ही बदल ले। एक अन्य यूजर ने बेहद सीधे अंदाज में सलाह दी दूसरी नौकरी से इस्तीफा देकर भगवान से प्रार्थना करो। वहीं कुछ लोगों ने कहा कि वे भी ऐसी ही “समस्या” झेलना चाहेंगे।

मर्जर ने खोल दिया Overemployment का सबसे बड़ा जोखिम

इस पूरे मामले की दिलचस्प बात यही है कि करीब 14 महीने तक दो रिमोट नौकरियां करने वाले इस कर्मचारी के लिए सबसे बड़ा खतरा काम का दबाव नहीं, बल्कि कंपनियों का आपस में जुड़ना बन गया। जब तक दोनों संस्थान अलग थे, अलग टेक स्टैक, अलग टीम और अलग सिस्टम ने उसकी दोहरी नौकरी को छिपाए रखा। लेकिन मर्जर के बाद वही अलग-अलग सिस्टम एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। अब उसकी पूरी चिंता इसी बात पर टिकी है कि यह इंटीग्रेशन कितनी जल्दी होता है और दोनों कंपनियों के रिकॉर्ड कब एक-दूसरे के सामने आते हैं।

Gold Silver price Today: सोने की कीमतों में मामूली बढ़त, चांदी 1.5% उछली, इन अहम आंकड़ों पर रहेगी बाजार की नजर

Gold Silver price Today: देश और दुनिया में सोने-चांदी की कीमतों में जोरदार उछाल देखने को मिला। COMEX पर, सोने के वायदा (futures) $4,319.30 प्रति औंस पर ट्रेड कर रहे थे, जो $19.70 या 0.46% ज़्यादा थे। शुरुआती कारोबार में चांदी के वायदा 1.48% बढ़कर $62.515 प्रति औंस हो गए, जिससे उसने सोने से बेहतर प्रदर्शन किया।

निवेशक फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों के बारे में नए संकेत पाने के लिए US की ‘नॉन-फार्म पेरोल’ रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे थे, जिस पर सबकी नजरें टिकी हैं। सबकी नजरें US की जुलाई की जॉब्स रिपोर्ट पर टिकी हैं,जो आज बाद में आने वाली है।

इस डेटा से बाजार की उम्मीदें तय होने की संभावना है कि क्या फेडरल रिज़र्व सितंबर में अपनी पॉलिसी मीटिंग में ब्याज दरें बढ़ाएगा या नहीं।

क्रूड में गिरावट ने सोने को दिया सपोर्ट

सोना जनवरी के बाद से अपनी सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त की ओर बढ़ रहा है। इस कीमती धातु को कच्चे तेल की कीमतों में कमी से सहारा मिला है, जिससे महंगाई की चिंताएं कम हुई हैं। ऊर्जा की कम कीमतों से इस उम्मीद में कमी आ सकती है कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहेंगी; यह एक ऐसा कारक है जो आम तौर पर सोने जैसी बिना रिटर्न वाली संपत्तियों की मांग को बढ़ाता है।

हालांकि, बढ़त सीमित रही क्योंकि ट्रेडर्स US में एक और बार ब्याज दरें बढ़ने की संभावना को ध्यान में रख रहे हैं।

इन डेटा पर होगी नजर

CME फेडवॉच टूल के अनुसार, बाज़ार अभी सितंबर में ब्याज दरें बढ़ने की संभावना लगभग 55% मान रहा है। फेडरल रिज़र्व के अधिकारियों की हालिया टिप्पणियों ने भी ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें ऊंची रखी हैं। सेंट लुइस फेड के प्रेसिडेंट अल्बर्टो मुसालेम ने कहा कि सेंट्रल बैंक को जुलाई की मीटिंग में दरें बढ़ानी चाहिए थीं, जबकि पॉलिसी बनाने वालों ने बेंचमार्क ब्याज दर को 3.5%-3.75% पर ही बनाए रखा, भले ही महंगाई फेड के 2% के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई थी।

इस बीच, रात में जारी US लेबर मार्केट डेटा ने मिली-जुली तस्वीर पेश की। पिछले हफ़्ते शुरुआती बेरोज़गारी दावों (initial jobless claims) में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, जबकि जुलाई में छंटनी (layoffs) दो साल के निचले स्तर पर आ गई, जिससे पता चलता है कि लेबर मार्केट मोटे तौर पर मज़बूत बना हुआ है।

निवेशक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी नजर रख रहे हैं, क्योंकि US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्हें लगता है कि ईरान के साथ टकराव जल्द ही खत्म हो सकता है, हालांकि उन्होंने कुछ सैन्य उपकरणों को प्रभावित करने वाली सप्लाई की समस्याओं को भी स्वीकार किया।

US की रोज़गार रिपोर्ट, साथ ही वेतन वृद्धि और बेरोजगारी के डेटा के निकट भविष्य में सोने और चांदी की कीमतों के लिए मुख्य कारक होने की उम्मीद है। उम्मीद से बेहतर जॉब डेटा से ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदें और मजबूत हो सकती हैं, जबकि कमज़ोर आंकड़े मॉनेटरी टाइटनिंग (मौद्रिक सख्ती) में रोक लगने की उम्मीद बढ़ाकर बुलियन (कीमती धातुओं) को बढ़ावा दे सकते हैं।

Gold Rate Today: सोने का भाव और बढ़ा; मुंबई, कोलकाता में ₹137260 पर 22 कैरेट

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Microsoft Layoff News: पिछले साल 15000 की छंटनी के बाद अब फिर तैयारी, माइक्रोसॉफ्ट के इन एंप्लॉयीज पर तलवार

Microsoft Layoff News: माइक्रोसॉफ्ट बड़े पैमाने पर एक बार फिर छंटनी की तैयारी कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक माइक्रोसॉफ्ट अपने वर्कफोर्स से करीब 2.5% एंप्लॉयीज के छुट्टी की तैयारी कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से किए गए दावे के मुताबिक माइक्रोसॉफ्ट इसके बारे में अगले हफ्ते तक ऐलान कर सकती है। बता दें कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी कंपनियों ने ताबड़तोड़ छंटनी शुरू की है। टेक, मीडिया और फाइनेंस सेक्टर में इसकी एक नई लहर शुरू हुई है क्योंकि ये कंपनियां अपना लागत कम कर रही हैं और साथ ही एआई इंफ्रा में भारी निवेश भी कर रही हैं।

Microsoft Layoff: किन एंप्लॉयीज पर पड़ेगा असर?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक माइक्रोसॉफ्ट में जो छंटनी होनी है, उसमें हजारों एंप्लॉयीज की छुट्टी होगी। इसकी मार सेल्स और कंसल्टिंग के साथ-साथ Xbox गेमिंग डिविजन पर भी पड़ेगी। एसईसी फाइलिंग के मुताबिक पिछले साल 30 जून 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक माइक्रोसॉफ्ट के करीब 2.28 लाख फुल-टाइम एंप्लॉयीज थे।

पिछले साल दो बार में 15000 की छुट्टी

इस महीने की शुरुआत में आई ब्लूमबर्ग न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार Xbox ने वैश्विक स्तर पर पार्ट्स की कमी के चलते दुनिया भर में अपने गेमिंग कंसोल की कीमतें बढ़ा दी। कंपनी ने बड़े पैमाने पर एंप्लॉयीज की छंटनी करने के साथ-साथ मार्केटिंग और अन्य चीजों पर खर्च में भारी कटौती की योजना बनाई। एक और मीडिया रिपोर्ट में सामने आया था कि माइक्रोसॉफ्ट अपने Xbox गेमिंग यूनिट को अलग करने (स्पिन ऑफ) या इसे पूरी तरह अपनी सब्सिडरी कंपनी के तौर पर रीस्ट्रक्चर करने पर विचार कर रही है। पिछले साल जुलाई 2025 में कंपनी ने कहा था कि वह अपने करीब 4% एंप्लॉयीज की छुट्टी करेगी। बता दें कि पिछले साल मई 2025 में कंपनी ने 6 हजार एंप्लॉयीज की छंटनी की थी, जिसके बाद जुलाई में भी करीब 9 हजार एंप्लॉयीज की छंटनी का ऐलान और हुआ। अब एक बार फिर इसमें छंटनी की तैयारी हो रही है।

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Byju’s के लेंडर्स सेटलमेंट के लिए तैयार, लेकिन बदले में आकाश एजुकेशनल सर्विसेज में चाहते हैं 30% हिस्सा

एडटेक प्लेटफॉर्म Byju’s के ग्लोबल लेंडर्स (कर्ज देने वाले) फाउंडर बायजू रवींद्रन के खिलाफ सभी कानूनी कार्रवाई वापस लेने को तैयार हैं। लेकिन बदले में कंपनी की हिस्सेदारी वाली आकाश एजुकेशनल सर्विसेज में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी चाहते हैं। इस प्रस्ताव पर बातचीत चल रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि Byju’s के लेंडर्स विवाद को सुलझाने के अंतिम चरण में हैं और संभावना है कि वे ऑफलाइन कोचिंग संस्थान आकाश एजुकेशनल सर्विसेज में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी लें।

समझौते के तहत सभी पक्ष एक साथ सभी मामले वापस ले लेंगे। Byju’s ने 2021 में 1 अरब डॉलर की डील में आकाश एजुकेशनल सर्विसेज को खरीदा था। लेकिन तब से अब तक इसमें Byju’s की हिस्सेदारी काफी कम हो चुकी है और अब यह माइनॉरिटी स्टेकहोल्डर है। अब आकाश में मणिपाल हेल्थ सबसे बड़ी शेयरहोल्डर है।

Aakash पूरे भारत में 300 से ज्यादा सेंटर चलाती है, जो मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के साथ-साथ स्कूल परीक्षाओं के लिए तैयारी कराते हैं। इसमें 5,000 से ज्यादा एक्सपर्ट्स की फैकल्टी है और इसकी पिछली रिपोर्ट के अनुसार सालाना रेवेन्यू लगभग 25.4 करोड़ डॉलर था। रॉयटर्स के सूत्रों का कहना है कि सेटलमेंट की बातचीत में बायजू रवींद्रन, ग्लास ट्रस्ट, आकाश और मणिपाल हेल्थ शामिल हैं। आकाश की वैल्यू लगभग 2 अरब डॉलर आंकी गई है।

Byju’s: अर्श से यूं आई फर्श पर

Byju’s एक समय 21 से ज्यादा देशों में ऑपरेशनल थी और COVID-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन कोर्सेज के जरिए लोकप्रिय हुई थी। लेकिन 2023 की शुरुआत में हालात बदल गए, जब अमेरिका स्थित लेंडर्स के साथ कंपनी का बड़ा विवाद शुरू हुआ। अमेरिका स्थित ग्लास ट्रस्ट ने बायजू रवींद्रन पर कुप्रबंधन का आरोप लगाया और 2024 में Byju’s के भारत में दिवालियापन के लिए आवेदन करने के बाद 1 अरब डॉलर के बकाया की मांग की।

Volkswagen Layoffs: 1 लाख तक लोगों की जा सकती है नौकरी, 4 फैक्ट्रियां बंद करने का भी प्लान

हालांकि रवींद्रन और Byju’s ने किसी भी गलत काम से इनकार किया है। लेकिन इस विवाद के चलते Byju’s ढह गई और 2024 में रवींद्रन ने कहा कि कंपनी की वैल्यू शून्य है। कानूनी विवाद Byju’s के दिवालिया होने के बाद से जारी है और भारत, सिंगापुर और अमेरिका की अदालतों में चल रहा है।

Volkswagen Layoffs: 1 लाख तक लोगों की जा सकती है नौकरी, 4 फैक्ट्रियां बंद करने का भी प्लान

यूरोप की सबसे बड़ी कार मेकर फॉक्सवैगन AG कुछ फैक्ट्रियां बंद कर सकती है और नौकरियों में कटौती के आंकड़े को लाख तक पहुंचा सकती है। कंपनी के CEO ओलिवर ब्लूम कंपनी को ज्यादा कॉम्पिटिटिव बनाने की तैयारी में हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मैनेजर मैगजीन को मामले की जानकारी रखने वालों से पता चला है कि इस हफ्ते की शुरुआत में बोर्ड की मीटिंग हुई।

इसमें CEO ने जो प्लान पेश किए, उनमें कर्मचारियों की छंटनी को दोगुना करके 1,00,000 तक करने की बात शामिल है। कंपनी में अभी लगभग 6,57,000 लोग काम करते हैं। फॉक्सवैगन AG, Porsche और Audi की भी मालिक है। ब्लूम की नई रीस्ट्रक्चरिंग योजना को चर्चा के लिए अगले महीने सुपरवाइजरी बोर्ड के सामने पेश किया जाएगा।

जर्मनी की 4 फैक्ट्रियां हो सकती हैं बंद

मैनेजर मैगजीन के अनुसार, रणनीति में इस दशक के अंत तक जनरल ओवरहेड कॉस्ट में 11 अरब यूरो (12.5 अरब डॉलर) तक की कटौती करना और मीडियम टर्म में जर्मनी में 4 फैक्ट्रियां बंद करना भी शामिल है। इनमें नेकरसल्म में Audi के प्लांट के साथ-साथ हनोवर, ज्विकौ और एमडेन में फॉक्सवैगन के प्लांट शामिल हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्लूम कंपोनेंट प्लांट्स और सबसे अहम, फॉक्सवैगन ब्रांड को अलग करने पर भी विचार कर रहे हैं। यह ब्रांड लंबे समय से कम मुनाफे की समस्या से जूझ रहा है। ब्लूम Volkswagen को छोटा और ज्यादा कुशल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी वजह है कि कंपनी अमेरिकी टैरिफ, चीन में लगातार कमजोरी और यूरोप में BYD Co. और Stellantis NV जैसी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों से बढ़ते कॉम्पिटिशन का सामना कर रही है।

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28,000 कर्मचारी Volkswagen छोड़ने के लिए राजी

लगभग 28,000 कर्मचारी फॉक्सवैगन छोड़ने के लिए सहमत हो गए हैं। यह 2030 तक पूरे ग्रुप में 50,000 कर्मचारियों की संख्या कम करने की पहले से घोषित योजना का हिस्सा है। लेबर लीडर्स ने फॉक्सवैगन की नई योजनाओं का विरोध किया है। फॉक्सवैगन में नौकरियों में कटौती करना मुश्किल है। कंपनी के सुपरवाइजरी बोर्ड में आधी सीटें कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के पास हैं, और जर्मनी के लोअर सैक्सनी राज्य के पास 2 और सीटें हैं। यह राज्य अक्सर कर्मचारी यूनियनों का साथ देता है।

60% सैलरी हाइक के ऑफर पर जॉब बदलने में इस शख्स ने की ऐसी गलती कि अब पछता रहा! Job स्विच करते वक्त आप भी रखें ये ख्याल

आज के अनिश्चित जॉब मार्केट में जब भी किसी को बड़ी सैलरी हाइक का ऑफर मिलता है तो वह बिना ज्यादा सोचे-समझे तुरंत कंपनी बदल लेता है। सवाल ये है कि क्या सिर्फ भारी-भरकम पैकेज देखकर नौकरी बदलना हमेशा सही होता है? बेंगलुरु के एक टेक प्रोफेशनल के सोशल मीडिया पोस्ट ने इस विषय पर इंटरनेट पर एक नई बहस छेड़ दी है। सनी कुमार नाम के एक शख्स ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है। ये काफी वायरल हो रहा है। उन्होंने अपने एक दोस्त की आपबीती सुनाते हुए दावा किया है कि आज के दौर में किसी छोटी कंपनी में ज्यादा सैलरी पाने से बेहतर है कि आप किसी बड़ी कंपनी में थोड़ी कम सैलरी पर काम करें। आइए जानते हैं कि उनके दोस्त ने 60% हाइक के चक्कर में क्या गलती की और नौकरी बदलते समय आपको किन बातों का ख्याल रखना चाहिए।

60% हाइक का ऑफर और फिर लग गया बड़ा झटका

हमारी सहयोगी वेबसाइट न्यूज 18 ने इस वायरल वीडियो पर डिटेल्ड रिपोर्ट की है। इसके मुताबिक सनी कुमार ने वीडियो में बताया कि उनका एक दोस्त पुणे में मास्टरकार्ड जैसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था। वहां उसकी सैलरी अच्छी थी, वर्क प्रोफाइल पूरी तरह स्टेबल था और वह अपने करियर में काफी अच्छा कर रहा था। इसी बीच उसे एक कंसल्टेंसी फर्म से 60 फीसदी सैलरी हाइक का बड़ा ऑफर मिला। इतने बड़े पैकेज के लालच में आकर उसने मास्टरकार्ड की स्टेबल नौकरी छोड़ दी और नई कंपनी जॉइन कर ली।

6 महीने में ही पलट गई बाजी

सनी के मुताबिक यह फैसला उनके दोस्त के लिए सही साबित नहीं हुआ। नई कंसल्टेंसी कंपनी को जॉइन किए हुए अभी महज छह महीने ही हुए थे कि कंपनी के हाथ से वो प्रोजेक्ट ही फिसल गया जिसके लिए उनके दोस्त को हायर किया गया था। इसके तुरंत बाद कंपनी ने उसके दोस्त से कहा कि या तो वह खुद इस्तीफा दे दे या फिर उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा।

आईटी सेक्टर में अस्थिरता: सनी कुमार की सलाह

इस घटना का उदाहरण देते हुए सनी कुमार ने प्रोफेशनल्स को सलाह दी है कि वे सिर्फ बड़ा पे-चेक देखकर नौकरी बदलने से पहले दो बार जरूर सोचें। उन्होंने वीडियो में कहा कि अगर आप एक अच्छी और स्टेबल कंपनी में हैं, जहां आपकी सैलरी अच्छी है तो मेरा सुझाव यही होगा कि भले ही आपको 60-70% या 100% तक की हाइक भी क्यों न मिल रही हो, कम से कम अगले 6 महीने से एक साल तक जॉब स्विच न करें। इन दिनों आईटी सेक्टर काफी वोलटाइल यानी अस्थिर है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

सनी कुमार का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और इस पर नौकरीपेशा लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक यूजर ने सनी की बात से सहमति जताते हुए कहा कि जॉब सिक्योरिटी जरूरी है लेकिन मेट्रो शहरों की हकीकत भी देखनी होगी। यूजर ने लिखा कि कम सैलरी में मेट्रो शहर के कमरे का किराया और राशन का खर्च उठाना मुश्किल होता है। इसलिए किसी के बहकावे में आने के बजाय अपना फैसला खुद लें। मास्टरकार्ड अच्छी कंपनी है और हमें समझना चाहिए कि हर बार बात सिर्फ हाइक की नहीं, स्टेबिलिटी की होती है।

एक दूसरे यूजर ने कुमार के विचार का समर्थन करते हुए लिखा कि मैं हमेशा सुनिश्चित करता हूं कि जब भी जॉब बदलूं तो एक बड़ी कंपनी से दूसरी बड़ी कंपनी में ही जाऊं। मैं किसी छोटी कंपनी में नौकरी खोने का रिस्क और उसका रोज का तनाव नहीं झेल सकता।

दूसरा पक्ष: बड़ी कंपनियां भी नहीं हैं लेऑफ से सुरक्षित

कई सोशल मीडिया यूजर्स ने सनी के इस तर्क का विरोध किया कि बड़ी कंपनियां पूरी तरह सुरक्षित होती हैं। उन्होंने इसके लिए उदाहरण भी दिए। एक यूजर ने कमेंट किया कि कोई भी कंपनी सुरक्षित नहीं है।। मुझे बीती 15 जून को ही HSBC से लेऑफ (नौकरी से निकालना) कर दिया गया। दूसरे यूजर ने लिखा कि क्या गारंटी है कि मास्टरकार्ड से भी उसे नहीं निकाला जाता… आजकल बड़ी कंपनियां भी बहुत ज्यादा रीस्ट्रक्चरिंग कर रही हैं। एक तीसरे शख्स ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘निकाले तो आप बड़ी कंपनी से भी जा सकते हैं और छोटी से भी। अंतर बस इतना है कि छोटी कंपनी ने कम से कम वहां रहने के दौरान आपको 60% ज्यादा पैसे तो दिए।’

जॉब स्विच करते वक्त केवल कंपनी का साइज न देखें, इन बातों का रखें ख्याल

बहस के बीच एक यूजर ने बहुत ही काम की सलाह दी कि फैसला सिर्फ कंपनी के छोटे या बड़े होने के आधार पर नहीं होना चाहिए बल्कि आज के दौर में कुछ अन्य महत्वपूर्ण चीजों का एनालिसिस करना जरूरी है:

SaaS कंपनियों से बचें: यूजर के मुताबिक इन दिनों SaaS (सॉफ्टवेयर एज अ सर्विस) कंपनियों में जाने से बचना चाहिए। नौकरी बदलने से पहले कंपनी के ग्लोबल हेडकाउंट और भारत में उनके कर्मचारियों की संख्या की जांच करें। कंपनी का कुल रेवेन्यू कितना है और उसका नेट प्रॉफिट क्या है, इसकी जानकारी जरूर जुटाएं। कंपनी के भविष्य के प्लान क्या हैं और वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में कितना निवेश कर रहे हैं, इन सभी पहलुओं को चेक करने के बाद ही कोई फैसला लें।

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