Nana Patekar Death: जब बॉलीवुड छोड़ नाना पाटेकर पहुंच गए थे कारगिल बॉर्डर, 60 दिन सेना के साथ रहे; 76 से 56 किलो हो गया था वजन

Nana Patekar Death: नाना पाटेकर को आपने पर्दे पर पुलिस अफसर, गैंगस्टर, सैनिक और आम आदमी जैसे तमाम किरदारों में देखा होगा। लेकिन उनकी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय भी है जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान नाना पाटेकर करीब 60 दिनों तक भारतीय सेना के जवानों के साथ रहे थे। नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कारगिल युद्ध के दौरान वह सेना के साथ जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से इजाजत मांगी।

शुरुआत में उन्हें बताया गया कि एक आम नागरिक को इस तरह सेना में शामिल नहीं किया जा सकता। लेकिन नाना ने बताया कि उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग की है। वह राष्ट्रीय स्तर पर राइफल शूटिंग में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

फिर सेना के साथ जाने की मिली इजाजत

नाना पाटेकर के मुताबिक, जॉर्ज फर्नांडिस से बातचीत के बाद उन्हें सेना के साथ जाने की अनुमति मिल गई। वह करीब 60 दिन तक सेना के जवानों के साथ रहे और द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला और सोपोर जैसे इलाकों में गए। उन्होंने यह भी बताया कि वह एक Quick Reaction Team (QRT) का हिस्सा बने थे। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने वहां वास्तव में क्या काम किया, तो नाना ने ऑपरेशनल जानकारी बताने से इनकार कर दिया।

76 किलो से 56 किलो रह गया था वजन

कारगिल में बिताए उन करीब दो महीनों का असर नाना के शरीर पर भी पड़ा। उन्होंने बताया था कि जब वह वहां गए थे, तब उनका वजन करीब 76 किलो था। लेकिन लौटने तक यह घटकर 56 किलो रह गया था। यानी करीब 20 किलो वजन कम हो गया था। नाना के लिए यह सिर्फ रोमांच या प्रचार का हिस्सा नहीं था। उन्होंने कहा था कि उन्हें खुशी थी कि वह देश के लिए कुछ छोटा-सा योगदान कर सके।

फिल्मों में सैनिक का किरदार निभाने से पहले असल ट्रेनिंग

नाना पाटेकर की सेना से यह दिलचस्प जुड़ाव फिल्म ‘प्रहार’ से भी रहा। फिल्म के लिए उन्होंने करीब तीन साल की सैन्य ट्रेनिंग ली थी। उन्हें मानद तौर पर कैप्टन की रैंक भी दी गई थी। यही वजह है कि पर्दे पर सैनिक या पुलिस अधिकारी के किरदार निभाते समय उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी में एक अलग वास्तविकता दिखाई देती थी।

गरीबी में पोस्टर और सड़क की लाइनें भी पेंट कीं

नाना पाटेकर की जिंदगी का एक और पहलू बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। फिल्मों में आने से पहले वह फिल्मों के पोस्टर और सड़क की जेब्रा क्रॉसिंग तक पेंट करने का काम कर चुके थे। एक दौर में वह रोजाना करीब 35 रुपये कमाते थे। उसी में गुजारा करते थे। यही संघर्ष आगे चलकर उनके अभिनय में भी दिखाई दिया। उनकी फिल्मों के किरदारों में आम आदमी का गुस्सा, दर्द और संघर्ष बेहद स्वाभाविक नजर आया।

किसानों के लिए भी उठाया बड़ा कदम

नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ अभिनेता के तौर पर नहीं रही। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘NAAM Foundation’ की शुरुआत की। इसका फोकस महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित गांवों और संकट से जूझ रहे किसानों की मदद करना है। संस्था पानी, गांवों के विकास और किसानों की आजीविका से जुड़े काम करती है। पर्दे पर जिस अभिनेता ने सैनिकों और आम आदमी के किरदारों में जान फूंकी, असल जिंदगी में भी उनकी कहानी संघर्ष, सेना और किसानों से जुड़ी रही।

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Hanuman Ansh: ‘हनुमान अंश’ के बाद स्टार सिंगर बने सुनील लोधी, फ्लाइट में फैंस की फरमाइश पर गाया भजन, वायरल हुआ वीडियो

Sunil Lodhi: फिल्म ‘हनुमान अंश’ की कहानी, कास्ट, भजन से लेकर हर छोटी चीज की दर्शक जमकर तारीफ कर रहे हैं। 2 करोड़ के बजट में तैयार हुई ये फिल्म 2026 की ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर बन गई है। इंडियन बॉक्स ऑफिस पर इसने 5 हफ्ते में 90 करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन किया है। रिलीज के महीनेभर बाद भी सिनेमाघरों में इसके शो हाउसफुल चल रहे हैं। फिल्म की पॉपुलैरिटी के साथ-साथ इससे जुड़े कलाकार भी स्टार बन गए हैं। सोशल मीडिया पर ‘हनुमान अंश’ के सिंगर का एक लेटेस्ट वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह फ्लाइट में ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ भजन गाते नजर आ रहे हैं।

सुनील लोधी ने फ्लाइट में गाया भजन

वायरल हुए इस लेटेस्ट वीडियो में आप सुनील लोधी को एक फ्लाइट के अंदर देख सकते हैं। यात्रियों ने फिल्म के हिट भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ के गायक सुनील लोधी को जैसे ही देखा घेर लिया। फ्लाइट में अलग ही नजारा देखने को मिला। लोगों के उनसे रिक्वेस्ट की और उन्होंने जैसे ही गाना शुरू किया तो पूरी फ्लाइट का माहौल भक्तिमय नजर आया।

फ्लाइट में गूंजी ‘हनुमान अंश’ की धुन

सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे वीडियो में सिंगर सुनील लोधी भोपाल से मुंबई की फ्लाइट में सवार हैं। जैसे ही वहां मौजूद यात्रियों ने उन्हें देखा तो उनसे भजन गाने के लिए कहने लगे। सुनील की आवाज सुनाते ही वहां लोगों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया। हर कोई हिट भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान’ सुनकर खुश हो गया। ऐसे में सिंगर सुनील ने भी किसी को निराश नहीं किया और बिना आनाकानी किए गाना शुरू कर दिया। अब सोशल मीडिया पर यह खूबसूरत पल लोगों का दिल जीत रहा है।

लता मंगेशकर के गाने सुन सुनील लोधी ने सिखा संगीत

हाल ही में दूरदर्शन को सुनील ने इंटरव्यू दिया था। इसमें उन्होंने बताया कि उन्हें कभी कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं मिली है। न ही उनका कोई म्यूजिक टीचर रहा है। सुनील ने कहा कि लता मंगेशकर के गाने सुनने और फिर अपने गांव के कार्यक्रमों में भजन गानकर उन्होंने थोड़ा बहुत सीख लिया। संगीत उन्हें क्लासरूम में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में मिला है। बता दें कि हनुमान अंश फिल्म 11 सितंबर को विदेश में भी रिलीज हो चुकी है।

भारतीय बॉक्सर ने PM को बताया पाकिस्तानी बॉक्सर को नरेंद्र नाम से है नफरत (Video)

राष्ट्रमंडल खेलों में झंडा गाढ़ के आए भारतीय बॉक्सर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सम्मान समारोह में मिले तो एक दिलचस्प किस्सा सुनाया जिसको सुनकर सब हंसने लगे। रजत पदक विजेता बॉक्सर नरेंद्र बेरवाल ने कहा कि उनकी पाकिस्तानी प्रतिद्वंदी से मुलाकात हुई और उन्होंने बताया कि वह नरेंद्र नाम से बहुत नफरत करता था क्योंकि उसका (बॉक्सर का) नाम  नरेंद्र  था, उसके कोच का नाम नरेंद्र था यहां तक की प्रधानमंत्री तक का नाम नरेंद्र था।

हालांकि यह किस्सा 2015 विश्व मिलिट्री गेम्स का है जब नरेंद्र बेरवाल के कोच नरेंद्र राणा थे। इन खेलों में बेरवाल के प्रतिद्वंदी पाकिस्तानी बॉक्सर थे। बेरवाल पहला राउंंड 4-1 से और दूसरा राउंड 3-2 से जीते थे। लेकिन दोनों के सिर पर चोट लग गई थी। यह बात पाकिस्तानी प्रतिद्वंदी ने बेरवाल को टांके लगने के दौरान बताई थी।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में भारत के कॉमनवेल्थ गेम्स मेडल विजेताओं से मुलाकात की और ग्लासगो गेम्स में उनके शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें बधाई दी। भारत ने मेडल तालिका में चौथा स्थान हासिल किया, जिसमें 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और नौ ब्रॉन्ज़ मेडल शामिल थे।

बॉक्सिंग भारत के लिए सबसे ज़्यादा मेडल दिलाने वाला खेल बनकर उभरा, जिसमें टीम ने 10 मेडल जीते, जिनमें सात गोल्ड शामिल थे। राष्ट्रमंडल खेल में यह भारत का अब तक का सबसे अच्छा बॉक्सिंग प्रदर्शन था, जिसमें भारतीय महिला खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सात में से पाँच गोल्ड मेडल जीते।

श्री मोदी ने मेडल विजेताओं से बातचीत की और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए उनकी कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और प्रतिबद्धता की सराहना की। उन्होंने देश से सभी खेलों में एथलीटों का समर्थन जारी रखने का आग्रह किया और एक ऐसा खेल कल्चर बनाने के महत्व पर जोर दिया जो अधिक युवाओं को खेल अपनाने के लिए प्रेरित करे।

“जो खेलेगा वो खिलेगा” खेल के महत्व और भारत के युवाओं की अधिक भागीदारी के बारे में श्री मोदी के लगातार दिए जाने वाले संदेशों में से एक रहा है। प्रधानमंत्री ने पहले भी भारत के बदलते खेल संस्कृति और युवा खिलाड़ियों के लिए अधिक अवसर पैदा करने की आवश्यकता के बारे में बात करते हुए इस वाक्यांश का इस्तेमाल किया है।

Mahesh Bhatt retirement: अब फीचर फिल्मों का निर्देशन नहीं करेंगे फिल्ममेकर, महेश भट्ट ने रिटायमेंट की खबरों पर लगाई मुहर!

Mahesh Bhatt retirement: महेश भट्ट ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि करते हुए कहा कि वे अब फीचर फिल्मों के निर्देशन में वापसी नहीं करेंगे। दशकों से हिंदी सिनेमा की सबसे बेबाक और निडर रचनात्मक आवाजों में से एक रहे इस अनुभवी फिल्म निर्माता ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपने इस फैसले के बारे में बात की और साफ कर दिया कि निर्देशक के तौर पर कैमरे के पीछे उनके दिन अब बीत चुके हैं।

77 वर्षीय फिल्म निर्माता ने पिछले 25 वर्षों में मुख्य रूप से प्रोडक्शन पर ध्यान केंद्रित किया है। हालांकि, 2020 में ‘सड़क 2’ के साथ निर्देशन में उनकी वापसी ने कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि वे शायद एक बार फिर किसी फीचर फिल्म की कमान संभाल सकते हैं। भट्ट ने अब इन अटकलों पर विराम लगा दिया है।

हिंदुस्तान टाइम्स के साथ एक इंटरव्यू में महेश भट्ट से पूछा गया कि क्या वे फिर से डायरेक्शन करने का कोई प्लान बना रहे हैं। फिल्ममेकर ने साफ तौर पर “नहीं” कहा और आगे कहा, “फिल्मों के बारे में इतने जोश के साथ बात करना बहुत अच्छा लगता है।” भट्ट का यह बयान विक्रम भट्ट द्वारा फिल्ममेकर के डायरेक्शन से रिटायरमेंट की चर्चा शुरू करने के कुछ दिनों बाद आया है। भले ही महेश भट्ट शायद कोई और फीचर फिल्म डायरेक्ट न करें, लेकिन वे प्रोड्यूसर, राइटर और प्रेजेंटर के तौर पर क्रिएटिव रूप से एक्टिव बने हुए हैं।

मौजूदा क्रिएटिव माहौल के बारे में बात करते हुए, भट्ट ने इस बात पर गौर किया कि पिछले कुछ सालों में फिल्ममेकिंग कैसे बदली है। अपने खास फिलॉसॉफिकल अंदाज में उन्होंने कहा, “जहां ज़िंदगी है, वहां जोश भी है।” ‘डुप्लिकेट’ के डायरेक्टर ने कहा कि जब कलाकारों को पहले से तय डिजाइनों को मानने के लिए मजबूर किया जाता है, तो क्रिएटिविटी पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा, “जब आपको बताया जाता है कि क्या करना है, तो आप सावधान हो जाते हैं। और फिर, जब आपको पहले से तय डिज़ाइनों के हिसाब से कंटेंट बनाना होता है, तो एक कलाकार की क्या भूमिका रह जाती है?”

भट्ट ने एल्गोरिदम और नंबर्स के पीछे भागने वाले प्लेटफॉर्म्स के दबाव के बारे में भी बात की। उनके मुताबिक, फिल्ममेकर्स पर पहले से तय उम्मीदों के दायरे में फिट होने का दबाव बढ़ता जा रहा है। हालांकि, उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि सिस्टम के बाहर से भी हिम्मत दिखाने वाली आवाज़ें उठती रहेंगी। उन्होंने कहा, “हमेशा कोई न कोई बाहर ऐसा होगा, कोई हिम्मत वाला इंसान जो नया ‘पाइड पाइपर’ बनेगा।”

इंटरव्यू के दौरान, महेश भट्ट ने इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊंगा’ की तारीफ की और इसे एक अहम मोड़ बताया। उन्होंने कहा कि यह फिल्म एक बड़े क्रिएटिव विद्रोह को दिखाती है, ऐसे समय में जब कहानियां अक्सर कैलकुलेशन और मार्केट की मांगों के आधार पर बनाई जाती हैं। भट्ट ने कहा, “मुझे लगता है कि यह विद्रोह का समय है।”

उन्होंने आगे कहा, “जब आप इसमें अपना दिल लगाते हैं और समय की नब्ज़ को समझते हैं, तो आप लोगों में कुछ ऐसा संवेदनशील और दर्दनाक पाने की चाहत या प्यास देखते हैं जो उनकी जिंदगी से जुड़ा हो। रात चाहे कितनी भी अंधेरी क्यों न हो, कुछ बागी और विद्रोही जरूर होंगे जो आकर कहानी को नए सिरे से लिखेंगे।”

हालांकि महेश भट्ट ने अब कोई और फीचर फिल्म डायरेक्ट न करने का फैसला किया है, फिर भी वे अलग-अलग तरह से सिनेमा से जुड़े हुए हैं। हाल ही में वे ‘नाम’ फ़िल्म के साथ एक प्रेजेंटर के तौर पर जुड़े हैं। इस फ़िल्म को 1986 में आई उनकी मशहूर एक्शन-ड्रामा फिल्म ‘नाम’ का ही एक तरह से spiritual sequel माना जा रहा है।

महेश भट्ट ने कई सालों में ‘अर्थ’, ‘सारांश’, ‘नाम’, ‘डैडी’, ‘आशिकी’, ‘सड़क’, ‘ज़ख्म’ और ‘डुप्लिकेट’ जैसी फ़िल्में डायरेक्ट की हैं। उनकी फ़िल्मों में अक्सर दर्द, बगावत, रिश्तों, यादों और नैतिक उलझनों के प्रति उनका लगाव झलकता रहा है। अपने हालिया बयान से भट्ट ने भले ही फीचर फिल्म डायरेक्ट करने का अध्याय बंद कर दिया हो, लेकिन सिनेमा, कहानी कहने की कला और कलात्मक आजादी के बदलते स्वरूप पर होने वाली चर्चाओं में उनकी आवाज अब भी सक्रिय है।