Business Idea: बिना दुकान खोले घर से शुरू करें कैटरिंग का बिजनेस! एक्सपर्ट से समझिए सिर्फ 50000 के बजट से कैसे होगी कमाई

Business Idea: बहुत से लोगों को लगता है कि खाना बनाने जैसे बेसिक काम से बड़ा व्यवसाय शुरू नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह काम जरूरत या शौक से आगे बढ़कर एक फायदेमंद बिजनेस भी बन सकता है। केटरिंग एक ऐसा बिजनेस है, जिसे छोटे स्तर पर छोटे से ऑर्डर के साथ शुरू किया जा सकता है। केटरिंग के काम को शुरू करने के लिए किसी बड़े रेस्तरां या फैंसी सेटअप की जरूरत नहीं होती। कस्टमर और ऑर्डर बढ़ने के साथ कारोबार रफ्तार पकड़ लेता है। दिल्ली के शेफ अजय भल्ला लंबे समय से केटरिंग बिजनेस में काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, केटरिंग बिजनेस शुरू करते समय सबसे जरूरी बात यह है कि खर्चों और ऑर्डर का हिसाब-किताब पहले से समझ लें।

शुरुआत में पैसा कहां लगेगा

कैटरिंग शुरू करने पर आपका पैसा मुख्य रूप से किचन के सामान, गैस, बर्तन, कच्चे माल, पैकेजिंग और जरूरी स्टाफ पर लगेगा। लेकिन शुरुआत में हर सामान खरीदने की बजाय कुछ बर्तन और सर्विंग का सामान किराये पर भी लिया जा सकता है। यह फैसला बड़ी रकम लगाने से बचाता है और आगे के लिए रास्ता भी बनाता है। मान लीजिए शुरुआत में आपको 30-50 लोगों का छोटा ऑर्डर मिलता है। यह ऑर्डर महंगे इक्विपमेंट खरीदे बिना जरूरी सामान से काम शुरू किया जा सकता है। जैसे-जैसे ऑर्डर बढ़ें, वैसे-वैसे किचन और सर्विंग का सेटअप बढ़ाया जा सकता है। तो अगर आप घर से या छोटे किचन सेटअप से 30-50 लोगों के ऑर्डर लेकर शुरुआत करते हैं, तो करीब ₹50,000 से ₹1 लाख का शुरुआती बजट मानकर चल सकते हैं।

सबसे बड़ा खर्च कच्चे माल का

केटरिंग बिजनेस में असली हिसाब सिर्फ यह नहीं है कि एक प्लेट कितने में बिकती है। सबसे पहले उस प्लेट को बनाने की लागत पर ध्यान देना जरूरी है। सब्ज़ियां, दालें, चावल, आटा, मसाले, तेल, दूध, दही, चीज, मीट, या दूसरी चीजों की लागत इन सभी को जोड़ना होगा। इसके अलावा, पैकेजिंग, गैस, डिलीवरी, स्टाफ, बर्तनों, या परोसने के बर्तनों की लागत को भी ध्यान में रखना होगा। उसके बाद ही आपको हर प्लेट का रेट तय करना चाहिए। नहीं तो, आपको ऑर्डर तो मिलेंगे, लेकिन लागत निकालने के बाद मुनाफा बहुत कम हो सकता है।

शुरुआत में मेन्यू छोटा रखें

अजय भल्ला ने बताया कि नए बिजनेस में 20-30 अलग-अलग आइटम रखने की जरूरत नहीं है। शुरू में, एक छोटा मेन्यू रखें जिसमें कुछ ऐसे आइटम हों जिन्हें आप अच्छी क्वालिटी के साथ ज्यादा क्वांटिटी में बना सकें। इससे रॉ मटेरियल खरीदना आसान हो जाएगा और खाने की बर्बादी कम होगी। एक छोटे ऑर्डर में दो सब्जियां, दाल, चावल, रोटी और एक डेजर्ट जैसे सीमित विकल्प हो सकते हैं। बाद में, ग्राहक की मांग के हिसाब से स्टार्टर्स, चाट या लाइव काउंटर जैसे आइटम जोड़े जा सकते हैं।

ग्राहक कैसे मिलेंगे

सबसे बड़ी चुनौती है शुरू में ग्राहक का मिलना। आज सोशल मीडिया का दौर है, यह ग्राहक लाने में मददगार हो सकता है। अपनी सोसाइटी, आस-पास के ऑफिस और जान-पहचान वालों से छोटे ऑर्डर ले सकते हैं। आपका पहला मकसद शादी के बड़े ऑर्डर पाना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसे क्लाइंट बनाना होना चाहिए जो आपके खाने और सर्विस से खुश हों और दोबारा ऑर्डर करें। केटरिंग में साख बहुत जरूरी है। समय पर खाना पहुंचाना, सही क्वांटिटी में खाना रखना और साफ-सफाई बनाए रखना, आने वाले ऑर्डर के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि खाने को स्वादिष्ट बनाना।

दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट

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8th Pay Commission में इस नए फॉर्मूले से बदल जाएगा पूरा सैलरी स्ट्रक्चर! बेसिक पे में होगा बंपर इजाफा

8th Pay Commission Minimum Pay Calculation: 8वें वेतन आयोग फिलहाल देशभर में बैठके कर के विभिन्न कर्मचारी संगठनों से उनकी मांगों का ब्योरा तैयार कर रहा है। इसी बीच केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए एक बड़ा अपडेट है है। आयोग के सामने दशकों से चले आ रहे उस नियम को बदलने की जोरदार मांग उठी है, जिसके आधार पर सरकारी कर्मचारियों की न्यूनतम सैलरी तय की जाती है।

अब तक वेतन आयोग न्यूनतम सैलरी का हिसाब लगाते समय एक परिवार में केवल 3 यूनिट (कर्मचारी, पति/पत्नी और 2 बच्चे) को ही जोड़ता था। लेकिन कर्मचारी यूनियनों और पेंशनभोगी संगठनों ने 8वें वेतन आयोग के समक्ष मांग रखी है कि इस परिवार यूनिट में बुजुर्ग आश्रित माता-पिता को भी शामिल किया जाए।

अगर इस फॉर्मूले को मंजूरी मिलती है, तो कर्मचारियों की बेसिक पे और पेंशन में भारी-भरकम बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। आइए आसान भाषा में समझते हैं इस नए गणित को।

3 यूनिट नहीं, अब 5.2 यूनिट पर तय हो सैलरी!

करीब 10 लाख पेंशनभोगियों का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत पेंशनर्स समाज (BPS) और कर्मचारियों की शीर्ष संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ जेसीएम (NCJCM-Staff Side) ने 8वें वेतन आयोग को सौंपे ज्ञापन में एक समान नया फॉर्मूला पेश किया है:

कर्मचारी (स्वयं): 1.0 यूनिट

पति या पत्नी: 1.0 यूनिट

दो बच्चे: 0.8 + 0.8 = 1.6 यूनिट

दो आश्रित माता-पिता: 0.8 + 0.8 = 1.6 यूनिट

इस हिसाब से कुल परिवार की यूनिट 5.2 (राउंड ऑफ में 5 यूनिट) बनती है। यूनियनों का तर्क है कि भारत में एक कर्मचारी न केवल अपने बच्चों का बल्कि अपने बुजुर्ग माता-पिता का भी मुख्य कमाऊ सहारा होता है। इसके अलावा ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम’ और ‘सोशल सिक्योरिटी कोड 2020’ भी कानूनी रूप से माता-पिता की जिम्मेदारी बच्चों पर डालता है।

सैलरी का नया गणित: ₹19,900 से सीधे ₹69,000 न्यूनतम बेसिक पे?

अगर 5 यूनिट के इस नए फॉर्मूले को 8वां वेतन आयोग स्वीकार कर लेता है, तो न्यूनतम सैलरी की गणना पूरी तरह बदल जाएगी।

NCJCM और BPS द्वारा दिए गए आंकड़े के अनुसार:

फूड बास्केट: 5 यूनिट के परिवार के लिए भोजन (चावल, दाल, सब्जी, दूध, अंडा, मांस आदि) का मासिक खर्च करीब ₹24,443 बैठता है।

अन्य खर्च: इसमें 10% मसाले/पेय पदार्थ, 7.5% मकान किराया, 20% ईंधन व बिजली, 25% स्किल डेवलपमेंट, 25% त्योहार व शादी-ब्याह और 5% टेक्नोलॉजी खर्च जोड़ने पर न्यूनतम सैलरी ₹68,947 (राउंड ऑफ ₹69,000) बनती है।

फिटमेंट फैक्टर: ₹69,000 की न्यूनतम बेसिक पे के आधार पर 3.833 का फिटमेंट फैक्टर निकलकर आता है, जिसे कर्मचारियों और पेंशनभोगियों दोनों पर समान रूप से लागू करने की मांग की गई है।

(नोट: NCJCM के एक अन्य अनुमान के अनुसार, 2025-26 की महंगाई दरों के आधार पर 5 यूनिट का न्यूनतम वेतन ₹80,444 तक भी जा सकता है)।

पिछले वेतन आयोगों में कैसे बदली मिनिमम बेसिक सैलरी?

NCJCM द्वारा 8वें वेतन आयोग को सौंपे गए आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले आयोगों में न्यूनतम वेतन किस तरह बढ़ा:

8th Pay Commission में इस एक नए फॉर्मूले से बदल जाएगा पूरा सैलरी स्ट्रक्चर! बेसिक पे में होगा बंपर इजाफा

पेंशनभोगियों और कर्मचारियों पर क्या होगा इसका बड़ा असर?

रेलवे सीनियर सिटीजन्स वेलफेयर सोसाइटी (RSCWS) ने भी तर्क दिया है कि वर्तमान में भत्तों पर ज्यादा और बेसिक पे पर कम ध्यान दिया जाता है। चूंकि पेंशन और ग्रेच्युटी पूरी तरह से बेसिक पे पर निर्भर करती हैं, इसलिए बेसिक पे कम होने से रिटायर्ड कर्मचारियों को नुकसान होता है।

अगर 8वां वेतन आयोग 5 यूनिट का फॉर्मूला मान लेता है, तो बेसिक सैलरी की शुरुआती सीमा काफी ऊपर चली जाएगी। इसका सीधा फायदा यह होगा कि नए कर्मचारियों की सैलरी के साथ-साथ पुराने पेंशनभोगियों की पेंशन में भी कई गुना का इजाफा होगा।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, परिवार की परिभाषा में माता-पिता को शामिल करने की यह मांग केवल आर्थिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से बेहद जायज लगती है। अब सबकी निगाहें 8वें वेतन आयोग के अंतिम फैसले पर टिकी हैं कि क्या वह इस 5.2 यूनिट वाले फॉर्मूले को स्वीकार करता है या पुराने 3-यूनिट ढर्रे पर ही कायम रहता है। यह फैसला आने वाले एक दशक तक देश के लाखों कर्मचारियों और पेंशनरों का भविष्य तय करेगा।

दुनिया के बड़े नेताओं के स्वागत को तैयार दिल्ली, BRICS Summit में दिखेगा देसी रंग!

दिल्ली में इस बार BRICS Summit बड़ी डिप्लोमैटिक मीटिंग और दुनिया के बड़े नेताओं की मौजूदगी के साथ यहां होने वाली खास मेहमाननवाजी भी लोगों का ध्यान खींच रही है। भारत 12 और 13 सितंबर को 18वें BRICS Leaders Summit की मेजबानी कर रहा है और इसमें विदेशी मेहमानों के लिए दिल्ली के लग्जरी होटलों में खास खाने का इंतजाम किया गया है। इन मेन्यू में भारतीय स्वाद और देश के अलग-अलग हिस्सों की झलक देखने को मिलेगी। यहां मेहमानों को भारत के अलग-अलग स्वादों से रूबरू कराने की तैयारी है।

दिल्ली में BRICS का बड़ा इवेंट

एनडीटीवी (NDTV) की रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली 12 और 13 सितंबर को 18वें BRICS Leaders Summit की मेजबानी कर रहा है। दो दिन चलने वाला यह हाई-प्रोफाइल आयोजन भारत मंडपम में होगा, जहां BRICS मेंबर देशों के नेताओं के साथ सहयोगी देशों और आउटरीच के लिए बुलाए गए मेहमान भी शामिल होंगे। समिट में नेताओं की मीटिंग के अलावा कई दूसरे इवेंट्स भी ऑर्गेनाइज किए जाएंगे। 12 सितंबर को नेताओं के आने के बाद बंद कमरे में मीटिंग, फैमिली फोटो और वृक्षारोपण होगा। 13 सितंबर को समिट का अगला सत्र होगा, जिसमें ग्लोबल डेवलपमेंट, इनोवेशन, कोर्पोरशन और सस्टेनेबिलिटी जैसे टॉपिक्स पर बात होगी।

दुनिया के ये बड़े नेता होंगे शामिल

इस समिट में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी समेत कई ग्लोबल नेता शामिल होंगे। पुतिन नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। नेताओं के साथ उनके स्पाउसेस, डिप्लोमैट और बिजनेस डेलिगेशन भी दिल्ली में मौजूद रहेंगे। ऐसे हाई-प्रोफाइल मेहमानों की मेजबानी के लिए राजधानी के लग्जरी होटलों में खास तैयारियां की गई हैं।

भारत के इन लग्जरी होटलों में होगा खास इंतजाम

BRICS डेलीगेट्स के ठहरने और मेहमाननवाजी के लिए दिल्ली के लग्जरी होटल भी पूरी तैयारी में हैं। जहां सिर्फ रहने और खाने का ध्यान नहीं रखा जा रहा, बल्कि सिक्योरिटी, वेलकम प्रोटोकॉल और मेहमानों की अलग-अलग जरूरतों को भी ध्यान में रखा गया है। होटल की टीमें विदेशी मेहमानों को भारत का एक्सपीरियंस देने के लिए भारतीय संस्कृति और मॉडर्न मेहमाननवाजी का ब्लेंड तैयार कर रही हैं।

ताज महल में होगी घर की रसोई की झलक

भारत का फेमस होटल ताज महल दिल्ली में मेहमानों के लिए ‘Tradition to Table’ थीम पर खास ट्रेडिशनल फूड का इंतजाम किया गया है। जिसमे भारत के अलग-अलग जगहों के ट्रेडिशनल स्नैक्स भी मेन्यू का हिस्सा होंगे। इसमें होटल के शेफ की उन रेसिपीज से इंस्पिरेशन ली गई है, जो उनके घर के किचन और बचपन की यादों से जुड़े हैं। कश्मीर के मसालेदार अखरोट, पुरानी दिल्ली के मैदा काजू, महाराष्ट्र की भाकरवड़ी, राजस्थान की मिनी कचौड़ी, बंगाल की कूचो निमकी और तमिलनाडु के मुरुक्कू के जरिए मेहमानों को देश की अलग-अलग रीजनल फूड की झलक देखने को मिलेगी।

द लीला में दिखेगा भारतीय अंदाज

द लीला पैलेस नई दिल्ली में भारतीय विरासत की झलक मेहमानों को खास अंदाज में देखने को मिलेगी। यहां तैयार किया गया हाथ से बना खाने योग्य कमल सभी का ध्यान खींचेगा। इसे गुलाब, केसर और इलायची के टेस्ट के साथ देसी भारतीय फलों से तैयार किया गया है। इसके अलावा मिलेट कुकीज, हाथ से बनी ग्रेनोला बार और वेलनेस इन्फ्यूजन भी मेहमानों को परोसे जाएंगे। होटल के मेन्यू में जौ, बाजरा, ज्वार और सत्तू जैसी ट्रेडिशनल इंडियन इंग्रीडिएंट को लिया गया है।

द ललित में मिलेंगे लाजवाब ट्रेडिशनल इंडियन फूड

द ललित नई दिल्ली ने भी BRICS मेहमानों के लिए भारतीय और इंटरनेशनल स्वाद को मिलाकर खास मेन्यू तैयार किया है। इसमें गलोटी कबाब और तंदूर में बनी रोटियों जैसे भारतीय व्यंजनों को खास अंदाज में परोसा जाएगा। साथ ही मिलेट से बनी कई डिशेस भी शामिल होंगे। मेहमानों को भारतीय स्वाद के साथ कुछ अलग फ्लेवर देने के लिए मिसो पेस्ट के साथ ब्रेज्ड बैंगन, धीमी आंच पर पकाई गई चाइनीज गोभी और जापानी स्टाइल में तैयार मीठी राजमा जैसे डिशेस भी शामिल की गयी हैं।

BRICS Summit में 12 सितंबर की शाम भारत मंडपम में प्रधानमंत्री की ओर से यह डिनर होस्ट किया जाएगा। इसमें भारत की संस्कृति, खान-पान और मेहमाननवाजी को प्रायोरिटी दी जा रही है। रीजनल स्नैक्स, ट्रेडिशनल अनाज, भारतीय मसाले और मॉडर्न तरीके से तैयार की गयी डिशेस का स्वाद विदेशी मेहमानों को परोसा जाएगा।

एयरपोर्ट पर नहीं होगी चेकिंग में देरी! बस बदलें बैग पैक करने का तरीका और अपनाएं ये आदतें ट्रेवलिंग में

फ्लाइट में ट्रैवल करते समय केबिन बैग में क्या ले जा सकते हैं और क्या नहीं, इसे लेकर कई ट्रैवलर को कन्फ्यूजन रहता है। कुछ खाने-पीने की चीजें, फल, स्नैक्स और जरूरी सामान आसानी से ले जाए जा सकते हैं, लेकिन लिक्विड, बैटरी और कुछ खास चीजों पर एयरपोर्ट सिक्योरिटी के रूल होते हैं। यदि इन रेगुलेशन की जानकारी पहले से हो, तो चेकिंग के समय परेशानी, सामान निकलवाने या महंगी चीजें खोने से बचा जा सकता है। इसलिए फ्लाइट पकड़ने से पहले यह जानना जरूरी है कि केबिन बैग में कौन-सी चीजें रखें और कौन-सी चीजें चेक-इन बैगेज में रखना बेहतर है।

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1. केबिन बैग की लिमिट

ज्यादातर भारतीय एयरलाइंस में इकॉनमी क्लास के पैसेंजर को एक केबिन बैग और एक छोटा पर्सनल बैग ले जाने की परमिशन होती है। केबिन बैग का वजन आम तौर पर 7 किलो तक होता है, जबकि कुछ एयरलाइंस और प्रीमियम क्लास में वेट की लिमिट अलग हो सकती है। बैग का साइज भी तय होता है, इसलिए सिर्फ वेट ही नहीं बल्कि बैग की लंबाई-चौड़ाई भी पहले से चेक कर लें। बड़ा बैग होने पर एयरपोर्ट पर उसे चेक-इन करने के लिए कहा जा सकता है।

2. पर्सनल बैग छोटा रखें

पर्सनल बैग ऐसा होना चाहिए जिसे सामने वाली सीट के नीचे आसानी से रखा जा सके। इसमें छोटा हैंडबैग, लैपटॉप बैग, मैसेंजर बैग या बच्चे का छोटा बैग रखा जा सकता है। इसे बड़े सूटकेस की तरह भरने से बचें, क्योंकि एयरलाइन स्टाफ आपसे इसे अलग से चेक करने के लिए कह सकता है। जरूरी सामान को छोटे और आसानी से रखने वाले बैग में रखना ट्रैवल में भी आसान रहता है।

3. लिक्विड बोतल का रूल

केबिन बैग में लिक्विड, जेल, क्रीम और एरोसोल की हर बोतल 100 ml या उससे कम की होनी चाहिए। यहां बोतल की कुल क्षमता देखी जाती है, उसमें बचा हुआ सामान नहीं। यानी 200 ml की बोतल में सिर्फ 20 ml प्रोडक्ट बचा हो, तब भी उसे 200 ml की बोतल ही माना जाएगा। सभी छोटे लिक्विड कंटेनर एक ट्रांसपेरेंट, दोबारा बंद होने वाले पाउच में रखें, ताकि सिक्योरिटी चेक के समय आसानी हो।

4. जरूरी और एक्सपेंसिव आइटम

पासपोर्ट, पैसे, गहने, महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान, कैमरा, पावर बैंक और एक्स्ट्रा लिथियम बैटरी जैसी चीजें अपने साथ केबिन बैग में रखना बेहतर होता है। पावर बैंक और अलग रखी लिथियम बैटरी को चेक-इन बैगेज में रखने की परमिशन नहीं होती। वहीं चाकू, ब्लेड, प्लायर, रिंच, मेटल नेल फाइल और दूसरे नुकीले या औजार जैसे सामान को केबिन बैग में न रखें, क्योंकि सिक्योरिटी चेकिंग में इन्हें रोका जा सकता है।

5. खाने-पीने की चीजों में सावधानी

बिरयानी, फल और सूखे स्नैक्स जैसी कई खाने की चीजें जर्नी में साथ ले जाई जा सकती हैं, लेकिन एयरपोर्ट और एयरलाइन के रूल अलग हो सकते हैं। मसाले या पाउडर जैसी चीजों की ज्यादा चेकिंग हो सकती है, इसलिए ज्यादा मात्रा में ऐसी चीजें ले जाने पर उन्हें चेक-इन बैगेज में रखना बेहतर हो सकता है। शराब को भी चेक-इन बैगेज में रखना सेफ रहता है, जबकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट से खरीदा गया सील ड्यूटी-फ्री सामान अलग नियमों के तहत ले जाया जा सकता है।

फ्लाइट से पहले अपने सामान और जरूरी चीजों को अच्छी तरह जांच लेना समझदारी है। एयरपोर्ट के रेगुलेशन की थोड़ी जानकारी और सही तरीके से पैकिंग करने से सिक्योरिटी चेक के समय परेशानी नहीं होगी। साथ ही आपका समय बचेगा और सफर भी ज्यादा कम्फर्टेबल और स्ट्रेस फ्री रहेगा।

मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को नहीं मिलेगी बागवानी सब्सिडी; केंद्र सरकार ने बदले NHB के नियम, कितनी मिलती थी सब्सिडी, क्या था नियम?

Horticulture subsidy rules: केंद्र सरकार ने नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) की कमर्शियल हॉर्टिकल्चर और कोल्ड स्टोरेज स्कीम के तहत आर्थिक मदद पाने के लिए योग्यता के नियमों को और सख्त कर दिया है। अब संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के अलावा मौजूदा मंत्रियों, सांसद (MP), विधायक (MLA), मेयर और जिला पंचायत अध्यक्षों समेत कई कैटेगरी के लोग योजना के लाभ से बाहर होंगे। नई गाइडलाइंस 21 अगस्त को जारी की गईं। इसी के साथ ये तुरंत लागू हो गई हैं।

बदली हुई गाइडलाइंस के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रालयों और विभागों, पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स, ऑटोनॉमस बॉडीज और लोकल बॉडीज के कर्मचारियों को भी NHB से आर्थिक मदद पाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

हालांकि, मल्टी-टास्किंग स्टाफ (MTS) और क्लास IV कर्मचारियों को इस नियम से छूट दी गई है। इसके अलावा, ₹10,000 या उससे अधिक की मासिक पेंशन पाने वाले रिटायर्ड कर्मचारी या पेंशनभोगी भी इस स्कीम के तहत योग्य नहीं होंगे।

बदली हुई गाइडलाइंस के तहत, इन कैटेगरी में आने वाले लोगों के परिवार के सदस्य स्कीम के तहत एक बार आर्थिक मदद ले सकते हैं, बशर्ते वे परिवार की नई परिभाषा के तहत योग्यता के नियमों को पूरा करते हों।

‘परिवार’ की इस परिभाषा में आवेदक के जीवनसाथी, माता-पिता, बेटे और बेटियाँ शामिल हैं। NHB स्कीम के तहत आर्थिक मदद के लिए प्रति परिवार केवल एक सदस्य ही योग्य है। गाइडलाइंस के अनुसार, परिवार के किसी भी सदस्य को दी गई आर्थिक मदद को पूरे परिवार को दी गई मदद माना जाएगा।

नियमों में क्यों करने पड़े बदलाव?

NHB ने कहा कि इन बदलावों का मकसद आर्थिक मदद को तर्कसंगत बनाना, फायदों का समान वितरण सुनिश्चित करना, सब्सिडी के दोहराव को रोकना और स्कीम को लागू करने की प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी और असरदार बनाना है। ये बदलाव कुछ हफ्ते पहले यह पता चलने के बाद किए गए हैं कि केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी और BJP सांसद लुंबा राम ने NHB स्कीम के तहत फायदा उठाया था।

मंत्री ने सब्सिडी लौटाया

कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने 28 जुलाई को संसद को बताया था कि चौधरी ने संबंधित बैंक को सब्सिडी की रकम लौटा दी थी। बैंक को निर्देश दिया गया था कि वह फंड NHB को वापस भेज दे। ‘हॉर्टिकल्चर फसलों के उत्पादन और कटाई के बाद के मैनेजमेंट के जरिए कमर्शियल हॉर्टिकल्चर का विकास’ नाम की इस स्कीम का मकसद बड़े पैमाने पर हॉर्टिकल्चर फसलों की कमर्शियल खेती (मुनाफे के लिए) को बढ़ावा देना है।

इस स्कीम में तीन तरह की सब्जियां जैसे शिमला मिर्च, खीरा और टमाटर और आठ तरह के फूल जैसे गुलाब, लिली और गुलदाउदी शामिल हैं। इस स्कीम के तहत प्रोजेक्ट की लागत का 50% सब्सिडी के तौर पर दिया जाता था, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति परिवार 1 करोड़ रुपये तय की गई थी।

केंद्र सरकार की बागवानी सब्सिडी स्कीम का पूरा नाम Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) है। यह केंद्र की अहम योजना है। यह फल, सब्जी, फूल, मसाले, मशरूम, नर्सरी आदि बागवानी गतिविधियों को कवर करती है। सब्सिडी काम और फसल के हिसाब से अलग होती है।

NHC Foods का रेवेन्यू 73% बढ़कर ₹601 करोड़ पहुंचा, एग्री कमोडिटी कारोबार में विस्तार

एग्री कमोडिटी सेक्टर की कंपनी NHC Foods Ltd ने पहली तिमाही में मजबूत नतीजे पेश किए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू सालाना आधार पर 73% बढ़कर ₹601 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में यह ₹348 करोड़ था। कंपनी का बिना ऑडिट वाला कंसोलिडेटेड मुनाफा ₹12 करोड़ से ज्यादा रहा।

कंपनी का EBITDA बढ़कर ₹21.95 करोड़ हो गया। एक साल पहले यह ₹16.42 करोड़ था। यानी इसमें 34% की बढ़ोतरी हुई। बेसिक EPS ₹0.20 प्रति शेयर रहा।

मैनेजमेंट ने क्या कहा?

कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सत्यम शिरीषचंद्र जोशी ने कहा कि पहली तिमाही के नतीजे कंपनी के मजबूत बिजनेस फंडामेंटल्स को दिखाते हैं। उनके मुताबिक ऑपरेशनल दक्षता और क्वालिटी पर फोकस का असर सीधे वित्तीय प्रदर्शन में दिखा है। उन्होंने कहा कि बाजार की प्रतिक्रिया निवेशकों के भरोसे को भी मजबूत करती है।

FCCB कन्वर्जन से बढ़ा कैपिटल बेस

कंपनी ने Global Focus Fund को 10.41 करोड़ पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयर आवंटित किए हैं। यह आवंटन 11 लाख डॉलर के FCCB के आंशिक कन्वर्जन के बाद हुआ। इसके बाद कंपनी की पेड-अप इक्विटी शेयर कैपिटल बढ़कर ₹76.19 करोड़ हो गई।

एग्री कमोडिटी कारोबार में विस्तार

कंपनी के बोर्ड ने AgriConnect Solutions Pvt Ltd में प्रस्तावित निवेश और अधिग्रहण के लिए लेटर ऑफ इंटेंट को मंजूरी दी है। यह कंपनी एग्री कमोडिटीज की सप्लाई और ट्रेडिंग के कारोबार में है। कंपनी का मानना है कि इससे इस सेगमेंट में उसकी मौजूदगी और मजबूत होगी।

कंपनी का बिजनेस क्या है

NHC Foods Ltd एग्री कमोडिटी एक्सपोर्ट और फूड ट्रेडिंग सेक्टर की कंपनी है। यह मसाले, तिलहन, अनाज, दालें, चीनी, चाय, कॉफी और दूसरी कृषि जिंसों की खरीद, प्रोसेसिंग और सप्लाई का काम करती है। कंपनी B2B मॉडल के जरिए कुछ देशों में फूड प्रोडक्ट्स का निर्यात करती है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Tukaram Munde: 24 घंटे के भीतर IAS तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में FDA ने मारे ताबड़तोड़ छापे, होटल के किचन में खुले नाले से घुसते चूहे देखते ही ऐक्शन!

Tukaram Munde: महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने राज्य भर में मिलावटी खाने की सामग्रियों, अनसेफ फूड और बैन गुटखा व पान मसाले के खिलाफ एक बड़ा और आक्रामक अभियान चला रखा है। एफडीए आयुक्त और कड़क मिजाज के लिए मशहूर आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में सेफ फूड सेफ महाराष्ट्र अभियान के तहत पिछले 24 घंटे के दौरान हुई ताबड़तोड़ कार्रवाई से पूरे राज्य के होटल संचालकों, डेयरी कारोबारियों और मिलावटखोरों में हड़कंप मच गया है।

इस राज्यव्यापी छापेमारी के दौरान एफडीए की टीमों ने कुल 25.30 लाख रुपये मूल्य के फूड प्रोडक्ट जब्त किए हैं। इसमें 11.40 लाख रुपये के बैन प्रोडक्ट हैं और करीब 14,552 किलोग्राम दूसरी खाद्य सामग्रियां शामिल हैं।

मालाड के होटल राधा का लाइसेंस निलंबित, किचन में दिखे चूहे और कॉकरोच

जांच टीम जब मुंबई के मालाड स्थित होटल राधा के किचन में पहुंची, तो वहां का नजारा देखकर अधिकारी भी दंग रह गए। किचन में खुले नाले से चूहे सीधे अंदर घुस रहे थे। इतना ही नहीं आटा गूंदने की मशीन पर कॉकरोच रेंगते हुए पाए गए। रसोई में चारों तरफ गंदा और ठहरा हुआ पानी, ग्रीस जमा हुआ था और बेहद अनहेल्दी स्थितियां मौजूद थीं। इन गंभीर कमियों को देख एफडीए अधिकारियों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए होटल राधा का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया।

कुर्ला के ‘जनता तवा एंड ग्रिल’ और इंजीनियरिंग कॉलेज के मेस पर गाज

एफडीए की कार्रवाई यहीं नहीं रुकी। कुर्ला स्थित प्रसिद्ध ‘जनता तवा एंड ग्रिल’ में खाद्य सुरक्षा से जुड़े गंभीर उल्लंघन पाए गए। यहां कच्चे मांस का स्टोरेज ठीक नहीं था। टेंप्रेचर रिकॉर्ड नहीं मिला और पके और कच्चे भोजन को ठीक तरीके से रखा नहीं गया था। बतर्न और मशीनें बेहद गंदी मिलीं तो एफडीए ने इसका FSSAI लाइसेंस सस्पेंड कर दिया।

इसके अलावा नवी मुंबई के खारघर स्थित सरस्वती कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के फूड बिजनेस पर भी गाज गिरी है। जांच में कॉलेज के फूड वेंचर में पेस्ट-कंट्रोल के अपर्याप्त इंतजाम, वेंटिलेशन की कमी, जरूरी प्रयोगशाला जांच का न होना और स्वच्छता संबंधी गंभीर कमियां पाई गईं। इसके बाद इसके संचालन को सस्पेंड कर दिया गया।

कुल 31 होटलों की जांच, वैजापुर से उदगीर तक बैकफुट पर कारोबारी

इस विशेष अभियान के दौरान एफडीए ने कुल 31 होटलों, रेस्तरां और ढाबों का निरीक्षण किया। इनमें से 22 प्रतिष्ठानों को सुधार नोटिस जारी किए गए जबकि 5 खाद्य व्यवसाय लाइसेंसों को सीधे निलंबित कर दिया गया। इसके अलावा राज्य के कई इलाकों में ऐक्शन हुआ। वैजापुर के परमेष्ठी सुपर शॉपी के खिलाफ बिक्री के लिए एक्सपायरी डेट के खाद्य उत्पाद रखने और दुकान में गंदगी पाए जाने पर कार्रवाई की गई।

उदगीर में FDA की टीम ने लैब में जांच के लिए देसी घी के 6 सैंपल लिए, जिनकी कुल मात्रा प्रेस नोट के अनुसार 2,400 यूनिट दर्ज की गई। पुणे और सांगली की कंपनियों से संदिग्ध गुणवत्ता वाले और मिसब्रांडेड खाद्य उत्पाद जब्त किए गए। इनमें खिचड़ी मसाला, डिफैटेड टोस्टेड सोया ग्रिट्स और गुड़ पाउडर शामिल हैं। इन सभी के सैंपल लेकर लैब टेस्ट के लिए भेज दिए गए हैं।

प्रतिबंधित गुटखा और पान मसाले पर क्रैकडाउन: 8 एफआईआर और 10 गिरफ्तारियां

सुरक्षित खाद्य, सुरक्षित महाराष्ट्र अभियान के तहत गुटखा और पान मसाला जैसे प्रतिबंधित पदार्थों की अवैध बिक्री पर भी भारी शिकंजा कसा गया है। एफडीए ने इस क्रैकडाउन में 11.40 लाख रुपये के प्रतिबंधित उत्पाद जब्त किए हैं। इस दौरान पुलिस और एफडीए की संयुक्त कार्रवाई के तहत कुल 8 एफआईआर (FIR) दर्ज की गईं। इसमें 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया, 6 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील किया गया और माल ढुलाई में इस्तेमाल होने वाले 2 वाहनों को जब्त कर लिया गया।

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अंग्रेजों ने भारत से लूटे 200 ट्रिलियन डॉलर! कभी दुनिया की 27% GDP था भारत, जानिए यहां से कितना लेकर गए

भारत और 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिली थी। लेकिन आजादी मिलने के बाद देश को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में थी। अंग्रेजों ने करीब 200 साल तक भारत के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल अपने लिए किया। वहीं करीब 200 साल के ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के संसाधनों और संपदा का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ब्रिटेन के हितों के लिए किया गया।

न्यूज 18 के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों के पुराने आकलनों के मुताबिक, 1765 से 1938 के बीच ब्रिटिश क्राउन और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से करीब 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति बाहर ले गई। लंबे समय तक चले इस आर्थिक शोषण का असर भारत की आर्थिक स्थिति पर पड़ा और आजादी के समय देश को कई बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

नेहरू के सामने बड़ी समस्या

1947 के बाद पीएम जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कमजोर अर्थव्यवस्था को संभालना, उद्योगों को बढ़ावा देना और देश में बुनियादी ढांचे का विकास करना था। लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के बाद भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार को लंबे समय तक बड़े स्तर पर काम करना पड़ा।

करीब 200 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति गई बाहर

पुराने अनुमानों को अगर आज की आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखा जाए और उनमें महंगाई, निवेश पर मिलने वाले रिटर्न और मौजूदा बाजार मूल्य को शामिल किया जाए, तो भारत से बाहर गई संपत्ति की अनुमानित कीमत 2026 में करीब 200 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ये आंकड़ा बताते हैं कि ब्रिटिश शासन में भारत की संपदा बाहर जाती रही, जिससे आजादी के समय देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई।

‘काउंसिल बिल्स’ बड़ा तरीका

भारत से पैसा बाहर ले जाने का एक बड़ा तरीका ‘काउंसिल बिल्स’ व्यवस्था थी। 1765 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कपड़ा, मसाले और शोरा खरीदने के लिए ब्रिटेन से लाया गया सोना-चांदी इस्तेमाल करती थी। लेकिन बंगाल में टैक्स वसूलने का अधिकार मिलने के बाद कंपनी ने तरीका बदल दिया। इसके बाद भारत से मिले टैक्स के पैसे से ही भारतीय सामान खरीदा जाने लगा और इस तरह भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन पहुंचने लगा।

  1. टैक्स वसूली: भारतीय किसानों और व्यापारियों से सीधे टैक्स लिया जाता था।
  2. टैक्स से खरीदारी: ब्रिटिश सरकार टैक्स से जुटाए गए राजस्व का करीब एक-तिहाई हिस्सा भारतीय सामान खरीदने में इस्तेमाल करती थी, जिसे बाद में ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
  3. बिना असली भुगतान: भारतीयों को उनके ही टैक्स के पैसे से भुगतान किया जाता था, जिससे ब्रिटेन को भारत का कीमती सामान लगभग मुफ्त में मिलता था।

GDP में आई गिरावट

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। 1700 के आसपास भारत का वैश्विक GDP में हिस्सा करीब 27% बताया जाता है, लेकिन 1947 तक यह घटकर 3% से भी कम रह गया। ब्रिटिश नीतियों का असर भारत के कपड़ा उद्योग पर भी पड़ा। भारतीय कपड़ों पर ब्रिटेन में भारी टैक्स लगाया गया, जबकि ब्रिटिश सामान भारत में आसानी से बिकने लगा। इससे ढाका, मुर्शिदाबाद और सूरत जैसे पुराने औद्योगिक केंद्रों को बड़ा नुकसान हुआ। काम कम होने के बाद कई कारीगर और बुनकर खेती पर निर्भर हो गए और भारत धीरे-धीरे तैयार सामान के बजाय कपास, अफीम और नील जैसी कच्ची उपज के निर्यातक देश के रूप में बदल गया।

दूसरे विश्व युद्ध में हुआ नुकसान

1858 के बाद भी भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश सरकार से जुड़े खर्चों पर ही लगाया जाता रहा। ‘होम चार्ज’ के तहत भारतीय करदाताओं के पैसों से ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, रेलवे निवेश पर ब्याज और विदेशों में ब्रिटिश सेना के अभियानों का खर्च उठाया जाता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह आर्थिक दबाव और बढ़ गया। युद्ध के खर्च और कर्ज का असर भारत में महंगाई और खाद्य संकट के रूप में दिखाई दिया। लंबे समय तक चले इस आर्थिक बोझ के कारण 1947 में आजादी मिलने तक भारत की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी थी।

आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत

आजादी के समय भारत की नई सरकार के सामने पैसों और संसाधनों की बड़ी कमी थी। देश में गरीबी और खाद्य संकट गंभीर था, उद्योग कमजोर हो चुके थे और विभाजन के बाद बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी सरकार पर थी। सीमित सरकारी खजाने के बावजूद सड़कों, बिजली, सिंचाई और दूसरी जरूरी सुविधाओं के विकास पर काम शुरू करना पड़ा। लेकिन, आजादी के बाद के दशकों में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रगति की और आज वह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश अब लंबे समय के विकास लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए अपनी आर्थिक ताकत को और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

किचन से निकला ये देसी जुगाड़ आएगा काम, घर की हरियाली को हरा-भरा बनाने में!

चावल बनाने या धोने के बाद बचा हुआ पानी हम बिना सोचे सिंक में बहा देते हैं। लेकिन इसे फेंकने के बजाय आप अपने घर के पौधों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। सादे चावल के पानी में थोड़ा स्टार्च और कुछ मिनरल्स होते हैं, जो मिट्टी के लिए काम आ सकते हैं और पौधों की अच्छी ग्रोथ में मदद कर सकते हैं।

पौधों में डालने से पहले चावल के पानी को पूरी तरह ठंडा कर लें और जरूरत हो तो इसमें थोड़ा सादा पानी मिला लें। इसमें नमक, तेल या मसाले नहीं होने चाहिए। इसे पत्तियों पर डालने के बजाय पौधे की जड़ों के आसपास की मिट्टी में डालना बेहतर है। अगर आप भी किचन की चीजों का सही इस्तेमाल करके पौधों की देखभाल करना चाहते हैं, तो आगे जानिए कौन-से पौधों में चावल का पानी इस्तेमाल किया जा सकता है।

स्पाइडर प्लांट और पीस लिली

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स्पाइडर प्लांट को हल्की नमी वाली मिट्टी पसंद होती है। आप कुछ हफ्तों में एक बार इसमें सादा चावल का पानी डाल सकते हैं। इसे पत्तियों पर डालने के बजाय सीधे मिट्टी और जड़ों के पास डालें। साथ ही, जरूरत से ज्यादा पानी देने से बचें।

पीस लिली को बढ़ने के समय हल्का पोषण पसंद होता है। ऐसे में कभी-कभी सादा चावल का पानी मिट्टी में डाला जा सकता है। इसे पत्तियों पर डालने के बजाय सीधे जड़ों के पास डालें। बहुत ज्यादा चावल का पानी इस्तेमाल न करें।

टमाटर के पौधे और पोथोस

टमाटर के पौधों को अच्छी ग्रोथ, फूल और फल के लिए पर्याप्त पोषण चाहिए। कभी-कभी चावल का पानी जड़ों के पास डाला जा सकता है, लेकिन यह फर्टिलाइजर का ऑप्शन नहीं है। टमाटर के लिए कम्पोस्ट और सही फर्टिलाइजर देना ज्यादा जरूरी है।

पोथोस घर के अंदर आसानी से उगने वाला पौधा है। इसमें कभी-कभी सादा चावल का पानी डाला जा सकता है। इससे मिट्टी को कुछ पोषण मिल सकता है और पौधे की ग्रोथ में मदद मिल सकती है। लेकिन मिट्टी को हमेशा गीला न रखें, क्योंकि ज्यादा पानी से जड़ों को नुकसान हो सकता है।

मनी प्लांट और फर्न

मनी प्लांट मिट्टी पानी दोनों में आसानी से बढ़ता है। मिट्टी में लगे मनी प्लांट को कभी-कभी ठंडा और सादा चावल का पानी दिया जा सकता है। इससे मिट्टी में मौजूद अच्छे माइक्रोब्स को मदद मिल सकती है। इसे नार्मल पानी की जगह नहीं, बल्कि कभी-कभी ही इस्तेमाल करें।

फर्न को हल्की नम मिट्टी पसंद होती है, इसलिए कभी-कभी इसमें सादा चावल का पानी दिया जा सकता है। लेकिन पानी बहुत ज्यादा न डालें, क्योंकि फर्न की जड़ों के पास पानी जमा होने से समस्या हो सकती है। गमले में अच्छी ड्रेनेज होना भी जरूरी है।

चावल का पानी इस्तेमाल करने टिप्स

घर के बगीचे में लगे पौधों के लिए कभी-कभी सादे चावल के पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। पौधों की बढ़त के समय थोड़ी मात्रा में चावल का पानी दिया जा सकता है, लेकिन इसे नार्मल पानी की जगह इस्तेमाल न करें। पौधों में चावल का पानी डालते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। हमेशा सादा चावल का पानी इस्तेमाल करें, जिसमें नमक, तेल, मक्खन या मसाले न मिले हों। चावल का पानी पत्तियों पर डालने के बजाय सीधे जड़ों के पास मिट्टी में डालें। पानी देने के रूटीन के साथ हर 2 से 4 हफ्ते में एक बार चावल का पानी देना फायदेमंद है।

खूब खाइए कि आप लखनऊ में हैं…

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“लखनऊ हम पर फ़िदा, हम फ़िदा-ए-लखनऊ…”
यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, बल्कि उस शहर की रूह है जहाँ तहज़ीब भी दस्तरख़्वान पर परोसी जाती है और मोहब्बत भी मसालों में घुली मिलती है।

लखनऊ पहुंचते ही मैंने तय कर लिया था कि इस शहर की पहली सलाम उसकी इमारतों को नहीं, उसके खाने को होगी। एयरपोर्ट से होटल पहुँचा, सामान रखा और रात के साढ़े दस बजे बिना एक पल गंवाए साइकल रिक्शा पकड़ा। मंज़िल थी—अमीनाबाद का मशहूर टुंडे कबाबी।

कहते हैं, “जो लखनऊ आया और टुंडे के कबाब नहीं खाए, उसने शहर को बस देखा है, जिया नहीं।”
रिक्शा पुराने लखनऊ की गलियों से गुज़र रहा था। इत्र की खुशबू, पान की दुकानें, रात में भी जागते बाज़ार, चिकनकारी के शो-रूम और हर नुक्कड़ पर खाने की महक। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर कह रहा हो—

“खूब खाइए कि आप लखनऊ में हैं।”
पहला निवाला… और फिर गिनती भूल जाइए

गरमा-गरम गलावटी कबाब प्लेट में आए। साथ में हरी चटनी, पतले कटे प्याज़ और लखनऊ का मशहूर पराठा। पहला कबाब जैसे ही ज़ुबान पर रखा, समझ आया कि इन्हें “गलावटी” क्यों कहते हैं। चबाने की ज़रूरत ही नहीं। कबाब खुद-ब-खुद घुलते चले जाते हैं।

मसालों का ऐसा संतुलन कि कोई मसाला दूसरे पर हावी नहीं। गोश्त की ऐसी नर्मी कि लगता है जैसे रसोइए ने पकवान नहीं, कोई नज़्म लिखी हो। दो प्लेट कब खत्म हुईं, पता ही नहीं चला।
किसी ने ठीक ही कहा है—

“ज़ुबां पे रखो तो लफ़्ज़ बन जाए,
लखनऊ का कबाब है जनाब, मज़ाक नहीं।”
टुंडे कबाबी सिर्फ़ खाना नहीं, विरासत है

कहानी मशहूर है कि नवाब आसफ़-उद-दौला के लिए ऐसा कबाब बनाया गया जो बिना दाँतों के भी खाया जा सके। फिर एक बावर्ची ने सैकड़ों मसालों का ऐसा मिश्रण तैयार किया कि स्वाद इतिहास बन गया।

आज भी उस रेसिपी को लेकर कई किस्से हैं। कोई कहता है 100 मसाले, कोई 160, कोई उससे भी ज़्यादा। लेकिन सच यह है कि उसकी असली रेसिपी शायद स्वाद से ज़्यादा, सदियों की परंपरा में छिपी है।

लखनऊ सिर्फ़ कबाब नहीं है
अगर आपने सोचा कि लखनऊ की पहचान सिर्फ़ गलावटी कबाब हैं, तो अभी आपकी प्लेट अधूरी है।

सुबह की शुरुआत निहारी-कुलचा से कीजिए। घंटों धीमी आँच पर पका गोश्त और मुलायम कुलचा।

दोपहर में अवधी बिरयानी। हैदराबादी बिरयानी की तरह मसालों का शोर नहीं, बल्कि हर दाने में नफ़ासत।
शाम को शीरमाल और रूमाली रोटी के साथ कोरमा।

और अगर मीठा नहीं खाया तो लखनऊ आपसे थोड़ा नाराज़ हो जाएगा। मक्खन मलाई (निमिष), मलाई गिलौरी, कुल्फी और रबड़ी… हर मिठाई में ऐसा सुकून जैसे सर्दियों की धूप। ये सब अगली बार के लिए बचाए गए हैं।

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नवाबी सिर्फ़ खाने में नहीं, खिलाने में भी है

लखनऊ का सबसे बड़ा स्वाद उसके लोग हैं।
यहाँ वेटर भी प्लेट रखते हुए “हुज़ूर” कहता है। दुकानदार भी मुस्कुराकर पूछता है—”और कुछ पेश करूँ?”

यही वजह है कि यहाँ खाना सिर्फ़ पेट भरने का ज़रिया नहीं, मेहमाननवाज़ी का तरीका है।
शायर ने शायद ऐसे ही शहर के लिए कहा होगा—

“गुल से रंगीतर है ख़ारे-लखनऊ,
नशे से बेहतर है नज़ारे-लखनऊ।”
मेरे हिस्से का लखनऊ

हर शहर अपनी कोई याद साथ भेजता है। कहीं तस्वीरें, कहीं स्मारक, कहीं बाज़ार। लेकिन लखनऊ ने मुझे जो दिया, वह स्वाद था। ऐसा स्वाद जो लौटकर भी ज़ुबान पर रहता है।

ऐसा स्वाद जो याद दिलाता है कि हिंदुस्तान सिर्फ़ भाषाओं और संस्कृतियों का नहीं, बल्कि पकवानों का भी देश है।

लखनऊ से लौटते समय मेरे साथ गलावटी कबाब और बिरयानी के अलावा लेकिन यादों में पुरानी गलियाँ थीं, रिक्शे की घंटी थी और वह एहसास था जिसे सिर्फ़ एक ही वाक्य में समेटा जा सकता है— “खूब खाइए… कि आप लखनऊ में हैं।”