Delhi Protest: रात के अंधेरे में भी रिकॉर्डिंग करने वाले बॉडी कैमरों से लैस हुए दिल्ली पुलिस के जवान, समझिए क्या है तैयारी

जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए शनिवार 10 अक्टूबर को पूरी राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था के कड़े और हाई-टेक इंतजाम किए गए हैं। इस बार प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस के जवान आधुनिक नाइट-विजन बॉडी-वॉर्न कैमरों (BWCs) से लैस नजर आ रहे हैं। यह विशेष बॉडी कैमरे जवानों की यूनिफॉर्म पर लगाए गए हैं, जो दिन के उजाले के साथ-साथ रात के घने अंधेरे में भी हाई क्वॉलिटी की वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग करने में सक्षम हैं।

यह कैमरे हमारी और जनता दोनों की सुरक्षा के लिए हैं: जवान ने समझाई उपयोगिता

ANI की एक एक्स पोस्ट में दिल्ली में तैनात पुलिस जवान अपनी यूनिफॉर्म पर यह कैमरे पहने हुए दिखाई दिए। सुरक्षा में तैनात दिल्ली पुलिस के जवान दीपक चौधरी ने इन कैमरों की कार्यप्रणाली और उपयोगिता के बारे में बताते हुए कहा कि यह बॉडी कैमरे जवानों के साथ-साथ आम जनता और प्रदर्शनकारियों दोनों की सुरक्षा के लिए लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन या हाथापाई की स्थितियों में अक्सर दिल्ली पुलिस के ऊपर एकतरफा आरोप लगा दिए जाते हैं। ऐसे में यह बॉडी कैमरे निष्पक्ष सबूत के तौर पर काम करेंगे और यह साबित करेंगे कि पुलिस ने किसी के साथ कुछ गलत किया है या नहीं। यह कैमरे मौके पर होने वाली हर एक गतिविधि को लगातार रिकॉर्ड करेंगे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की थी अनिवार्य बॉडी कैमरे लगाने वाली याचिका

बॉडी कैमरों की यह तैनाती ऐसे समय में देखने को मिली है, जब कुछ ही दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों का अनिवार्य और लगातार इस्तेमाल करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया था। 7 अक्टूबर को एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन सांबरे की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को केंद्र सरकार के समक्ष एक प्रतिवेदन के रूप में विचार करने को कहा था। अदालत ने न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की थी कि इस मामले में ऐसा कोई कानूनी पेंच नहीं है जहां कोर्ट को निर्देश जारी करने की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा था कि जब भी विधायिका की कोई मंशा होती है, वे वैधानिक प्रावधानों में नियम तय कर देते हैं।

जुलाई में हुए प्रदर्शन का हवाला देकर दायर की गई थी याचिका

यह याचिका एडवोकेट चाहत राघव द्वारा भारत सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त, सीआरपीएफ के महानिदेशक और बीपीआरएंडडी के खिलाफ दायर की गई थी। इस याचिका में मांग की गई थी कि प्रदर्शनों और भीड़ नियंत्रण में तैनात अधिकारियों के लिए कैमरे पहनना और उन्हें चालू रखना अनिवार्य किया जाए। साथ ही रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने, डेटा सुरक्षा और सबूत के तौर पर उसके इस्तेमाल के लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए।

याचिका में जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर CJP और एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के प्रदर्शनों का जिक्र किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प के अधिकांश वीडियो आम जनता या राहगीरों के मोबाइल फोन से सामने आए थे, न कि किसी आधिकारिक पुलिस रिकॉर्डिंग सिस्टम से। याचिका में कहा गया था कि 21 जुलाई की घटनाओं में पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों दोनों को चोटें आई थीं, जबकि 23 जुलाई की समीक्षा बैठक में आरएएफ के महानिरीक्षक (IG) ने कथित तौर पर माना था कि इस्तेमाल किए गए बल के कुछ तरीके तय मानकों के अनुरूप नहीं थे।

1,500 कैमरों के लिए टेंडर और कानूनी प्रावधानों की मांग

याचिका में कहा गया था कि वर्ष 2020 की बॉडी-वॉर्न कैमरों से जुड़ी एडवाइजरी सिर्फ एक सिफारिश थी, जो अधिकारियों के लिए कैमरे चालू रखना अनिवार्य नहीं बनाती। याचिकाकर्ता ने दिल्ली पुलिस द्वारा गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए लगभग ₹7.4 करोड़ की अनुमानित लागत से 1500 बॉडी कैमरों की खरीद के लिए निकाले गए टेंडर का भी जिक्र किया था, जिसमें प्रति कैमरा लागत करीब ₹49333 बैठती है।

याचिका में मांग की गई थी कि कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित सर्वर पर अपलोड किया जाए जिसे कोई जवान बदल न सके, साथ ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 के तहत प्रमाणीकरण और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों का पालन हो। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह कैमरे किसी भीड़ पर चेहरा पहचानने वाला जाल नहीं, बल्कि पुलिस और नागरिकों के बीच संवाद का एक पारदर्शी रिकॉर्ड हैं जो बैरिकेड के दोनों तरफ मौजूद लोगों की सुरक्षा करते हैं।

छावनी में तब्दील हुई दिल्ली: 25,000 जवान, मेट्रो पाबंदी और इंटरनेट बंद

शनिवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के आह्वान को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने पहले ही अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी दिल्ली में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए पुलिस और पैरामिलिट्री के लगभग 25,000 जवानों को तैनात किया गया है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की 120 से अधिक कंपनियां सुरक्षा में लगाई गई हैं। शनिवार सुबह 6:00 बजे से ही कनॉट प्लेस, मंडी हाउस, जंतर-मंतर, पटेल चौक समेत 30 से ज्यादा पॉइंट्स पर सख्त ट्रैफिक डायवर्जन लागू किया गया है। दिल्ली की सभी सीमाओं पर गाड़ियों की सघन चेकिंग की जा रही है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर असर

सुरक्षा कारणों से दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बैन लागू है, नमो भारत के दो स्टेशन बंद हैं और ट्रेन सेवाओं पर भी असर पड़ा है। राजधानी के संवेदनशील इलाकों में एहतियात के तौर पर 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं। आपको बता दें कि यह पूरा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में अनियमितताओं के आरोपों से जुड़ा है, जिसके विरोध में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर यह प्रदर्शन बुलाया गया है।

सीजेपी के डर से दिल्ली बंद!

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के डर से केंद्र सरकार ने पूरी दिल्ली बंद कर दिया है और राजधानी के साथ साथ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भी छावनी में तब्दील कर दिया है। सीजेपी ने शनिवार, 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सीजेपी प्रदर्शन करेगी। लेफ्ट पार्टियों और आम आदमी पार्टी ने इस प्रदर्शन का समर्थन किया है। इस प्रदर्शन को रोकने के लिए मेट्रो, ट्रेन, सड़क, इंटरनेट, स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, दुकानें सब बंद हैं।

पुलिस ने दो टूक अंदाज में कहा है कि सीजेपी ने प्रदर्शन की इजाजत नहीं मांगी है इसलिए उसको प्रदर्शन नहीं करने दिया जाएगा। यह भी कहा गया है कि जंतर मंतर के इलाके में बीएनएस की धारा 163 लागू है। यानी पांच से ज्यादा लोगों के एक साथ इकट्ठा होने की अनुमति नहीं है। दूसरी ओर सीजेपी का कहना है कि जंतर मंतर प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह है इसलिए उनको अनुमति लेने की जरुरत नहीं है। सीजेपी के सौरव दास ने कहा कि उनके संगठन ने नहीं, बल्कि सरकार ने खुद ही दिल्ली बंद करा दी है।

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और पार्टी के अन्य नेताओं ने वीडियो बना कर जंतर मंतर पहुंचने का ऐलान किया है और लोगों से वहां पहुंचने की अपील भी की है। एक दिन पहले कर्नाटक में सीजेपी ने प्रदर्शन किया था लेकिन वहां ज्यादा संख्या में लोग नहीं जुटे थे। सीजेपी के नेता दिल्ली में जुलाई के जैसे प्रदर्शन की उम्मीद कर रहे हैं, जब उनके प्रदर्शन के कारण तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ था।

बहरहाल, सरकार ने इसे रोकने के लिए सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए हैं। लेकिन साथ ही लगभग पूरी दिल्ली को बंद कर दिया है। शनिवार को दिल्ली के स्कूल, कॉलेजों में ऑनलाइन पढ़ाई होगी। बड़ी संख्या में मेट्रो स्टेशन बंद करने की घोषणा हो गई है। राजधानी दिल्ली पहुंचने वाली और दिल्ली से बाहर जाने वाली कई ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है। कनॉट प्लेस के आसपास की दुकानों को बंद रखने का निर्देश जारी किया गया है। इतना ही कनॉट प्लेस से दूर चांदनी चौक के इलाके में भी कई मार्केट बंद रखने को कहा गया है। अगले दो दिन शराब की दुकानें बंद रहेंगी। दिल्ली पुलिस के जवान होटलों में जाकर ऐसे लोगों की तलाश कर रहे हैं, जो शनिवार के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए बाहर से आए हैं। यह भी खबर है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में कई शहरों में ट्रेनों में लोगों को उतारा जा रहा है।

सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए चप्पे चप्पे पर अर्धसैनिक बलों और पुलिस के जवानों की तैनाती की गई है। अर्धसैनिक बलों की 221 कंपनियां दिल्ली में तैनात हैं। अलग अलग राज्यों से अर्धसैनिक बलों के करीब 23 हजार जवान दिल्ली बुलाए गए हैं। ये जवान आठ से 12 अक्टूबर तक दिल्ली में तैनात रहेंगे। उनके अलावा दिल्ली पुलिस के 15 हजार से ज्यादा जवानों को तैनात किया गया है। जंतर मंतर तक पहुंचने वाले हर रास्ते को शुक्रवार की रात को ही बंद कर दिया गया।

दिल्ली के सभी स्कूलों और कॉलेजों ने 10 अक्टूबर की क्लास ऑनलाइन कर दी हैं। कई स्कूलों में पीटीएम का समय बदला गया है और परीक्षाएं स्थगित कर दी हैं। जनपथ और कर्तव्यपथ क्रॉसिंग के चार किलोमीटर के दायरे में शुक्रवार रात 10 बजे से शनिवार रात 10 बजे तक इंटरनेट बंद रहेगा। दिल्ली पुलिस ने टेलीकॉम कम्पनियों को पत्र लिखकर नेट बंद करने के लिए कहा है। जंतर मंतर, टॉलस्टॉय मार्ग और जनपथ पर पुलिस व आरएएफ के जवानों को तैनात किया गया है।

दिल्ली पुलिस ने दिल्ली में प्रवेश के सारे रास्तों पर बैरिकेडिंग कर दी है। बॉर्डर सील कर दिया गया है। पानीपत से दिल्ली तक रेलवे स्टेशनों के बाहर नाके लगाए गए हैं। टिकरी, बदरपुर, कापसहेड़ा और सिंघु बॉर्डर पर वाहनों की तलाशी के बाद ही आगे जाने दिया जा रहा है। राकेश टिकैत द्वारा इस प्रदर्शन का समर्थन करने की वजह से भी सीमा पर चौकसी बढ़ाई गई है।

मोदी के नाम पर होगा जेवर एयरपोर्ट!

लखनऊ। नोएडा से सटे जेवर में बने नए हवाईअड्डे का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा जाएगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को इसका ऐलान किया। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जेवर हवाईअड्डे का नाम प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर रखने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश की कैबिनेट की बैठक में पास कर दिया गया है। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि नाम बदलने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। वहां से मंजूरी के बाद नाम बदल जाएगा।

गौरतलब है कि अगर जेवर एयरपोर्ट का नाम मोदी के नाम पर होता है तो यह दूसरा मामला होगा, जब किसी सार्वजनिक प्रतिष्ठान का नाम मोदी के नाम पर रखा जाएगा। इससे पहले 24 फरवरी, 2021 को गुजरात के अहमदाबाद में क्रिकेट स्टेडियम का नाम बदलकर नरेंद्र मोदी स्टेडियम किया गया था।

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च 2026 को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पहले चरण का उद्घाटन किया था। एयरपोर्ट के पहले चरण में 33 सौ एकड़ जमीन पर टर्मिनल और रनवे बनाए गए हैं। यहां से हर साल लगभग 1.2 करोड़ यात्री सफर करेंगे। इस पर 11 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में चार महीने के बाद चुनाव होने वाले हैं।

पाकिस्तान का नक्शा बदल अपनी ताकत बढ़ाना चाहते हैं मुनीर:4 प्रांतों को 15 हिस्सों में बांटने की तैयारी; पंजाब-सिंध की सियासी ताकत कमजोर होगी

पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर देश के 4 प्रांतों को 12 से 15 हिस्सों में बांटकर सियासत का पूरा गणित बदलना चाहते हैं। ब्रिटिश मैगजीन ‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम से पंजाब और सिंध में मजबूत राजनीतिक पार्टियों का दबदबा टूट सकता है। अभी इन प्रांतों की सरकारें केंद्र को चुनौती देने की ताकत रखती हैं। छोटे प्रांत बनने पर यह ताकत बंट जाएगी और इस्लामाबाद का दखल बढ़ेगा। इससे पहले से मजबूत सेना को देश की राजनीति और सरकार पर अपनी पकड़ बढ़ाने का मौका मिल सकता है। पंजाब और सिंध की सियासी ताकत कम होगी पाकिस्तान का पंजाब प्रांत पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का गढ़ है, जबकि सिंध में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का दबदबा है। दोनों पार्टियों की ताकत बड़े प्रांतों में उनकी मजबूत पकड़ से आती है। अगर इन प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटा जाता है, तो मौजूदा राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। पार्टियों को अलग-अलग छोटे प्रांतों में अपनी ताकत साबित करनी होगी। इससे बड़े नेताओं का प्रभाव घट सकता है और केंद्र सरकार को प्रांतीय राजनीति में दखल देने का ज्यादा मौका मिल सकता है। प्रांत को छोटे करने के पीछे दलील क्या है ‘द इकोनॉमिस्ट’ के मुताबिक, मुनीर का मानना है कि पाकिस्तान के प्रांत इतने बड़े हैं कि वहां प्रशासन ठीक से नहीं चल पा रहा। पंजाब में करीब 12.8 करोड़ लोग रहते हैं, जबकि क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा बलूचिस्तान है, जहां करीब डेढ़ करोड़ की आबादी है। बड़े इलाकों में लोगों तक सरकारी सुविधाएं पहुंचाना मुश्किल होता है। ग्रामीण पंजाब में लोगों को बुनियादी सेवाओं के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। बलूचिस्तान में भी दूर-दराज के इलाकों तक सुविधाएं पहुंचाना चुनौती है। लेकिन पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था, महंगाई और कर्ज की समस्या सिर्फ प्रांतों के बड़े आकार से पैदा नहीं हुई। ऐसे में सवाल है कि प्रांतों को बांटने से आम लोगों की जिंदगी कितनी बदलेगी और सत्ता का फायदा किसे मिलेगा। पाकिस्तान में सेना पहले से ताकतवर पाकिस्तान में सेना कई बार सीधे सत्ता संभाल चुकी है। आज भी राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मामलों में उसका खासा प्रभाव है। सेना के पास जमीन, कारोबार और बड़े संसाधन भी हैं। ऐसे में प्रांतों को बांटने से अगर मौजूदा राजनीतिक ताकत कमजोर होती है, तो सेना और केंद्र सरकार का दबदबा बढ़ सकता है। बड़े प्रांतों के मजबूत नेताओं के बजाय केंद्र को कई छोटी सरकारों से निपटना होगा। इससे प्रांतीय नेतृत्व की सामूहिक ताकत कम हो सकती है। 15 छोटे प्रांत बनाने या जिलों को ज्यादा ताकत देने पर विचार पाकिस्तान में दो रास्तों पर चर्चा है। पहला, 4 प्रांतों को बांटकर 12 से 15 नए प्रांत बनाना। दूसरा, करीब 160 जिलों को ज्यादा अधिकार देना, ताकि लोगों के काम के लिए उन्हें दूर न जाना पड़े। योजना मंत्री अहसान इकबाल इन दोनों विकल्पों का जिक्र कर चुके हैं।
नए प्रांत बनाने के लिए संविधान बदलना होगा। वहीं, जिलों को ज्यादा अधिकार देने से मौजूदा प्रांतों को बांटे बिना लोगों को सरकारी सुविधाएं आसानी से मिल सकती हैं। कौन-कौन से नए प्रांत बन सकते हैं? पाकिस्तान सरकार की तरफ से अभी आधिकारिक नक्शा जारी नहीं किया गया है, लेकिन जिन इलाकों की चर्चा है, वे कुछ इस तरह हैं- पंजाब: उत्तर पंजाब, मध्य पंजाब, दक्षिण पंजाब सिंध: कराची सिंध, मध्य सिंध, ऊपरला सिंध KP: उत्तरी KP, दक्षिणी KP, आदिवासी KP/फाटा रीजन बलूचिस्तान: पूर्व बलूचिस्तान, पश्चिम बलूचिस्तान, दक्षिणी बलूचिस्तान सिंध में पहले से प्रस्ताव का विरोध हो रहा सिंध विधानसभा ने 3 सितंबर को प्रस्ताव पास कर प्रांत को बांटने और उसके किसी हिस्से को केंद्र के अधीन करने का विरोध किया था। पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक, किसी प्रांत की सीमा बदलने के लिए उसकी विधानसभा के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी जरूरी है। संसद की मंजूरी भी लेनी होगी। सिंध में कराची है, जो पाकिस्तान का प्रमुख कारोबारी केंद्र है। यहां सीमा बदलने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बंटवारे को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है। नक्शा बदलेगा तो सत्ता का गणित भी बदलेगा प्रांत छोटे होने से प्रशासन लोगों के करीब पहुंच सकता है, लेकिन असली सवाल यह है कि नई इकाइयों को कितने अधिकार मिलेंगे। अगर पैसा और फैसले लेने की ताकत केंद्र के पास ही रही, तो छोटे प्रांत सिर्फ नाम के लिए अलग होंगे। इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा राजनीतिक असर पंजाब और सिंध की मौजूदा ताकत पर पड़ सकता है। बड़े प्रांतों की सियासी पकड़ कमजोर होने से केंद्र और सेना को फायदा मिल सकता है। ————————– ये खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान में आटे के संकट से जूझ रहे लोग:20 किलो आटे का बैग 3300 रुपए पहुंचा, रोटी 20 से बढ़कर 30 रुपए हुई पाकिस्तान के पेशावर में आटे की कीमत तेजी से बढ़ने से लोग परेशान हैं। 20 किलो मोटे आटे का बैग 3,300 पाकिस्तानी रुपए तक पहुंच गया है। आटे की कीमत बढ़ने का असर तंदूरों पर भी पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

हर राज्य में भाजपा नेताओं की एक ही शिकायत

भारतीय जनता पार्टी की करीब 20 राज्यों में सरकार चल रही है। लगभग सभी राज्यों में भाजपा के नेताओं की एक ही शिकायत है। वह शिकायत है कि अधिकारी बात नहीं सुनते। मजेदार बात यह है कि भाजपा के बहुत बड़े नेता भी यह शिकायत कर रहे हैं। राज्य सरकार और केंद्र सरकार के मंत्रियों की भी शिकायत है। दूसरी शिकायत यह है कि मुख्यमंत्री मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं और किसी को भरोसे में नहीं ले रहे हैं। पहली शिकायत का ही यह विस्तार है, जिसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री की शह पर अधिकारी दूसरे नेताओं को तवज्जो नहीं दे रहे हैं। सोचें, भाजपा को सबसे ज्यादा अनुशासन वाली पार्टी माना जाता है। ऊपर से नरेंद्र मोदी और अमित शाह का नेतृत्व है, फिर भी पार्टी के नेता खुलेआम एक दूसरे की आलोचना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री बेलगाम हो गए हैं।

यह शिकायत लगभग सभी राज्यों की है लेकिन मध्य प्रदेश का घटनाक्रम सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है। पिछले दिनों चंद्रशेखर को मध्य प्रदेश का संगठन महामंत्री बनाया गया। उनके सामने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने मुख्यमंत्री की जम कर शिकायत की। जानकार सूत्रों का कहना है कि एक समय तो मंत्री के साथ मुख्यमंत्री की नोकझोंक भी हो गई। सीएम और डिप्टी सीएम के इस विवाद को संगठन महामंत्री ने संभाला।

बताया जा रहा है कि चंद्रशेखर ने पार्टी के सभी नेताओं को तीन महीने के अंदर आपसी विवाद के मुद्दे सुलझाने और आंतरिक कलह समाप्त करने को कहा है। सूत्रों का कहना है कि उनकी मौजूदगी में हुई बैठक में प्रदेश के दो सबसे बड़े नेताओं केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी शिकायत की। शिवराज सिंह चौहान 15 साल राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और अभी केंद्र में मंत्री है, उन्होंने कहा कि जिले के कलेक्टर उनकी बात नहीं सुनते हैं। अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया जा रहा है कि संगठन महामंत्री के साथ बैठक में कहा कि 15 दिन तक प्रयास करने के बावजूद मुख्यमंत्री से बात नहीं हो पाती है।

सोचें, पार्टी के साधारण नेताओं की क्या स्थिति होगी, जब इतने बड़े नेताओं की बात सीएम से नहीं हो पाती है और इतने बड़े नेताओं की बात कलेक्टर नहीं सुनते हैं! इस तरह की शिकायत राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार से लेकर ओडिशा तक की भाजपा सरकारों के मंत्री और वरिष्ठ नेता कर रहे हैं। हर जगह गुटबाजी की खबरें आ रही हैं। कई लोग कह रहे हैं कि सचमुच में भाजपा का कांग्रेसीकरण हुआ है।

क्या अंबानी भारत के बॉस? – मस्क

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नई दिल्ली। सेटेलाइट के जरिए इंटरनेट की सेवा देने वाली कंपनी स्टारलिंक को भारत में लाइसेंस मिलने में हो रही देरी पर लगातार दूसरे दिन पोस्ट लिखी है। उन्होंने तंज करते हुए पूछा है कि, ‘क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं’? इससे पहले उन्होंने कहा था कि भारत के कुछ बड़े कारोबारी उनकी कंपनी स्टारलिंक को लाइसेंस मिलने में बाधा डाल रहे हैं। पहले उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था। लेकिन भारत सरकार की ओर से सफाई दिए जाने के बाद उन्होंने दूसरी पोस्ट में देश के सबसे बड़े कारोबारी मुकेश अंबानी का नाम लिया।

उन्होंने गुरुवार को भारत में स्टारलिंक को अब तक लाइसेंस नहीं मिलने पर अपनी दूसरी पोस्ट में लिखा, ‘स्टारलिंक को 165 से अधिक देशों में लाइसेंस मिल चुका है और कंपनी ने भारत सरकार की हर कानूनी और नियामकीय जरूरत को पूरा करने में पांच साल बिताए हैं। इसके बावजूद लाइसेंस क्यों नहीं दिया जा रहा है’? मस्क ने अपने पोस्ट में तंज करते हुए सवाल किया, ‘क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं’?

इससे पहले इलॉन मस्क की ओर से लगाए गए आरोपों पर केंद्र सरकार ने गुरुवार को सफाई दी। भारत सरकार ने मस्क के इस आरोप को खारिज किया है कि कुछ भारतीय उद्योगपति एकाधिकार बनाए रखने के लिए उनकी कंपनी स्टारलिंक को भारत नहीं आने दे रहे। गौरतलब है कि मस्क की कंपनी स्टारलिंक सेटेलाइट के जरिए इंटरनेट की सेवा देती है।

उनके आरोपों का जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने गुरुवार, आठ अक्टूबर को कहा कि देश में सेटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विसेज के लिए तय नियम सभी के लिए एक जैसे हैं। सरकार ने एक बयान जारी करके कहा है, ‘यह कहना बिल्कुल गलत है कि नियमों को किसी के साथ भेदभाव करने के लिए लागू किया जा रहा है’।

असल में बुधवार को इलॉन मस्क ने आरोप लगाया था कि भारत के कुछ बड़े कारोबारी स्टारलिंक को रोक रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा था, ‘भारत के कुछ बड़े बिजनेसमैन नहीं चाहते कि स्टारलिंक का सेटेलाइट इंटरनेट भारत आए, ताकि उनका एकछत्र राज बना रहे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं…’। मस्क ने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि यह भारत के लोगों के खिलाफ एक अपराध है।

Digital India: 35,000 गांवों में हाई-स्पीड नेटवर्क के लिए मोदी सरकार का मास्टर प्लान! खर्च होंगे ₹15,000 करोड़

Govt To Spend ₹15000 Crore Telecom Connectivity: दूरदराज के इलाकों में नेटवर्क की पहुंच बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गुरुवार को ‘इंडिया मोबाइल कांग्रेस (IMC) 2026’ में घोषणा की कि सरकार देश के लगभग 35,000 गांवों में टेलीकॉम टावर लगाने के लिए ₹12,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के बीच खर्च कर रही है।

संचार मंत्री ने स्पष्ट किया कि जिन इलाकों में टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर व्यापारिक दृष्टिकोण से फायदे का सौदा नहीं है, वहां सरकार को खुद आगे आकर निवेश करना पड़ रहा है ताकि कोई भी क्षेत्र कनेक्टिविटी से अछूता न रहे।

जहां फायदा नहीं, वहां सरकार खुद करेगी निवेश

मंत्री सिंधिया ने इंफ्रास्ट्रक्चर शेयरिंग और इंटर-ऑपरेबिलिटी पर जोर देते हुए कहा, ‘हर क्षेत्र रिटर्न या मुनाफा देने वाला नहीं हो सकता। कई दूरदराज के इलाकों में पहुंच एक बड़ी चुनौती है, जहां निजी कंपनियां मुनाफा न होने के कारण नेटवर्क नहीं लगा पातीं। ऐसे क्षेत्रों में सरकार का आगे आना अनिवार्य है और हमने यही काम किया है।’

ग्राहकों को ध्यान में रखकर स्पेक्ट्रम रिफार्मिंग

संचार मंत्री ने कहा कि सरकार स्पेक्ट्रम के बेहतर और सही इस्तेमाल के लिए ‘स्पेक्ट्रम रिफार्मिंग’ पर काम कर रही है। इससे मौजूदा स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल ग्राहकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए किया जाएगा।

हाईवे की तरह बनेगा टेलीकॉम नेटवर्क

नेविगेशन और नेटवर्क कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए ‘मिडिल माइल’ इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर बल दिया गया। सिंधिया ने सरकार की भूमिका की तुलना हाईवे निर्माण से करते हुए कहा, ‘जैसे सरकार का काम हाईवे बनाना है, वैसे ही टेलीकॉम में हमारा काम ‘मिडिल माइल’ तैयार करना है। इसके बाद हमारा अगला कदम यह सुनिश्चित करना है कि लोग इस नेटवर्क हाईवे का सही और प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकें।’

भारतनेट और 4G सैचुरेशन स्कीम का विस्तार

संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के तहत सरकार ने ₹1.40 लाख करोड़ का बजट तय किया है। इसका मकसद केवल ग्राम पंचायतों तक ही नहीं, बल्कि सीधे गांवों और घरों तक ब्रॉडबैंड कनेक्शन पहुंचाना है।

इससे पहले सरकार ने ‘4G सैचुरेशन स्कीम’ के तहत करीब 30,000 गांवों की पहचान की थी, जहां 21,000 टेलीकॉम टावर लगाने का लक्ष्य रखा गया था। इनमें से 17,000 टावर पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुरक्षा के नियम

इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज और AI के प्रभाव पर बात करते हुए सिंधिया ने 2000 के दशक से पहले के आईटी दौर का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी अपने आप में एक जरिया है, लेकिन आप इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं, उसी से आपकी उत्पादकता तय होती है।

सिंधिया ने सचेत करते हुए कहा कि AI के विस्तार से कुछ नकारात्मक परिणाम भी सामने आएंगे। इसके लिए एक ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ की जरूरत है ताकि लोगों को टेक्नोलॉजी के गलत प्रभावों से बचाया और सुरक्षित रखा जा सके।

देश में 4G और 5G की मौजूदा स्थिति

IMC 2026 में डेटा साझा करते हुए सिंधिया ने बताया, भारत के 99% से अधिक गांवों में अब 4G कनेक्टिविटी पहुंच चुकी है। वहीं देश के 99.9% जिलों को 5G नेटवर्क से कवर कर लिया गया है। अब भारत का मुख्य फोकस केवल बुनियादी नेटवर्क देने तक सीमित नहीं है, बल्कि 5G, 6G और AI-सक्षम सेवाओं के लिए मजबूत आधार तैयार करना है।

PM मोदी के 25 साल: ‘गुजरात मॉडल’ से ‘विकसित भारत’ तक, देश में ऐसे बदली विकास की राजनीति

PM Modi 25 Years: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता संभाली थी। उस समय गुजरात भुज भूकंप की तबाही से उबर रहा था। उस वक्त राज्य के सामने सूखा, पानी की कमी, बिजली संकट और राजनीतिक अस्थिरता जैसी कई चुनौतियां थीं। 25 साल बाद पीएम मोदी की विकास राजनीति का दायरा गुजरात मॉडल से निकलकर ‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और अब ‘विकसित भारत @2047’ तक पहुंच चुका है। यह बदलाव सिर्फ नारों का नहीं, बल्कि विकास की पूरी सोच के विस्तार को दिखाता है। प्रधानमंत्री ने आज यानी 7 अक्तूबर को सार्वजनिक जीवन में 25 साल पूरे कर लिए हैं।

गुजरात मॉडल से हुई शुरुआत

गुजरात में मोदी के शुरुआती शासन की प्राथमिकता प्रशासन को ज्यादा जवाबदेह और प्रभावी बनाना, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और निवेश एवं उद्योग के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना था। इसी दौर की चर्चित पहल SWAGAT (State Wide Attention on Grievances by Application of Technology) थी। इसके जरिए आम लोग अपनी शिकायतें सीधे सरकार तक पहुंचा सकते थे। इस पहल को 2010 में संयुक्त राष्ट्र का पब्लिक सर्विस अवॉर्ड भी मिला।

इसी तरह ज्योतिग्राम योजना के जरिए कृषि और घरेलू बिजली आपूर्ति के लिए अलग-अलग फीडर की व्यवस्था की गई। केंद्र सरकार की ओर से पीएम मोदी के 25 साल के शासन को लेकर जारी प्रस्ताव में SWAGAT और ज्योतिग्राम को गुजरात से निकली ऐसी पहलों के तौर पर बताया गया है, जिनका प्रभाव बाद में राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दिया।

SWAGAT से क्या बदला?

SWAGAT में तकनीक के जरिए शिकायतों और प्रशासनिक कामकाज की निगरानी का जो मॉडल अपनाया गया, उसी सोच का विस्तार आगे चलकर PRAGATI में दिखाई दिया। PRAGATI के जरिए केंद्र सरकार की बड़ी परियोजनाओं की समीक्षा और उनके सामने आ रही अड़चनों को दूर करने पर जोर दिया गया।

‘गुजरात मॉडल’ बना राष्ट्रीय चुनावी मुद्दा

धीरे-धीरे गुजरात मॉडल की पहचान औद्योगीकरण, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक विकास से जुड़ गई। 2013 में जब नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने, तब गुजरात मॉडल उनके राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका था। लेकिन 2014 में दिल्ली आने के बाद विकास की यह कहानी और व्यापक हो गई।

विकास के साथ कल्याण योजनाओं पर जोर

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी सरकार ने विकास को सिर्फ उद्योग और निवेश तक सीमित नहीं रखा। जन धन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी के जरिए सीधे लाभ पहुंचाने का ढांचा तैयार किया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और पीएम-किसान जैसी योजनाओं के जरिए सरकार ने ‘लास्ट माइल डिलीवरी’ पर जोर दिया।

सरकार के 25 साल के प्रस्ताव के मुताबिक, देश में करीब 60 करोड़ जन धन खाते खोले गए हैं। 4 करोड़ से ज्यादा घर उपलब्ध कराए गए हैं। करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। वहीं पीएम-किसान के तहत अब तक 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि ट्रांसफर किए जाने का दावा किया गया है। इस तरह विकास का पैमाना भी बदल गया। अब सवाल सिर्फ यह नहीं रहा कि कितने निवेश आए या कितने उद्योग लगे। बल्कि यह भी देखा जाने लगा कि कितने परिवारों को बैंक खाता, घर, शौचालय, गैस, नल का पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलीं।

टेक्नोलॉजी बनी सरकार और जनता के बीच कड़ी

पीएम मोदी की विकास सोच में गुजरात से लेकर केंद्र तक एक चीज लगातार दिखाई देती है और वह है टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल…। SWAGAT की सोच आगे चलकर PRAGATI में दिखाई दी। इसके बाद आधार आधारित सेवाओं, डिजिटल भुगतान और UPI ने तकनीक को आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना दिया।

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के अनुसार, 2014 से अब तक PRAGATI के जरिए 377 प्रोजेक्ट्स की समीक्षा की जा चुकी है। पहचाने गए करीब 94 फीसदी मुद्दों का समाधान किया गया है। सरकार का कहना है कि PRAGATI सिस्टम ने 85 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की परियोजनाओं को गति देने में मदद की है।

‘मेक इन इंडिया’ से ‘आत्मनिर्भर भारत’ तक

2020 में कोरोना महामारी के बाद विकास की भाषा में एक और बड़ा बदलाव आया। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के साथ अब ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा।

वैश्विक सप्लाई चेन में आई मुश्किलों ने घरेलू उत्पादन और रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की जरूरत को और प्रमुख बना दिया। सरकार अब इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस प्रोडक्शन, सेमीकंडक्टर निवेश और बढ़े हुए पूंजीगत खर्च को इसी बदलाव के उदाहरण के तौर पर पेश करती है।

‘विकसित भारत @2047’

पीएम मोदी की विकास यात्रा का मौजूदा सबसे बड़ा लक्ष्य ‘विकसित भारत @2047’ है। इसका उद्देश्य 2047 तक यानी आजादी की 100वीं वर्षगांठ तक भारत को एक विकसित देश बनाना है। इस लक्ष्य के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीक, निवेश, आत्मनिर्भरता और नागरिक-केंद्रित सरकारी सेवाओं को एक बड़े विजन के साथ जोड़ा जा रहा है।

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आयोग और भाजपा पर राहुल का हमला

नई दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ के दौरान संसद मार्ग पर रोके जाने के बाद चुनाव आयोग के साथ साथ केंद्र सरकार और भाजपा पर भी जोरदार हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने वोट चोरी करने में भाजपा की मदद की है। राहुल ने यह भी कहा कि भाजपा, चुनाव आयोग और आरएसएस ने देश में लोकतंत्र को खत्म कर दिया है। राहुल कई घंटे तक धरने पर भी बैठे रहे।

राहुल ने कहा, ‘तीन सौ लोकसभा और राज्यसभा के सांसद आए थे। हम चाहते थे ज्ञानेश कुमार और उनके दो चुनाव आयुक्तों से मिलना चाहते थे। पुलिस ने हमें रोका। चुनाव आयोग से 50 गज दूर बैठाकर रखा है हमें जाने नहीं दे रहे हैं। तीन सौ सांसद ज्ञानेश कुमार से मिलना चाहते हैं। ज्ञानेश कुमार डरे हुए हैं। अगर जनप्रतिनिधियों से चुनाव आयोग नहीं मिलेगा तो लोकतंत्र का क्या मतलब है’।

एक सवाल के जवाब में राहुल ने कहा, ‘मैं लोकतंत्र बचाने यहां खड़ा हूं। अमित शाह, नरेंद्र मोदी, ज्ञानेश कुमार और मोहन भागवत ने देश के लोकतंत्र को खत्म कर दिया है। देश के युवा ये बात जानते हैं’। उन्होंने आगे कहा, ‘चुनाव को मोदी, शाह ने हाइजैक किया है और ज्ञानेश कुमार ने उनकी मदद की है। यहां पुलिस वाले भी यही कर रहे हैं। इनमें से कोई भी बचकर नहीं जाएगा। जो इन्होंने देश के साथ किया है, वह देशद्रोह है’।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि यह आंदोलन देश के युवाओं, महिलाओं, किसानों और गरीबों के अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी सत्ता में बने रहने के लिए लोगों के अधिकार छीन रही है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है। खड़गे ने कहा कि जिस तरह से सत्ता हासिल की गई, वह उचित नहीं था और इसे तुरंत खत्म किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर देश में नौ राज्यों की विधानसभाएं भंग की जा सकती हैं, तो यहां की अवैध व्यवस्था भी खत्म होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि जनता इस मुद्दे पर चुप नहीं रहेगी।

विपक्ष के इस प्रदर्शन में शामिल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, ‘अगर ज्ञानेश कुमार निष्पक्ष हैं तो उन्हें हमारी बात सुननी चाहिए। यह लोकतंत्र बचाने की बात है। पुलिस को बच्चों के साथ और प्रदर्शनकारियों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए’।

पाकिस्तान में इमरान समर्थकों का लॉन्ग मार्च:PM शहबाज ने धरना खत्म करने की शर्त पर बातचीत का न्योता दिया; समर्थकों ने ठुकराया

पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई को लेकर हालात बिगड़ते जा रहे हैं। इमरान समर्थकों का लॉन्ग मार्च अब पेशावर से महज 30 किलोमीटर दूर पहुंच गया है। मार्च को देखते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मंगलवार को इमरान समर्थकों को बातचीत का न्योता दिया। शहबाज का यह बयान इसलिए अहम है, क्योंकि सोमवार को ही उनकी सरकार ने इमरान समर्थकों से बातचीत करने से इनकार किया था। हालांकि, इमरान समर्थकों ने शहबाज के बातचीत के प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया है। उनका कहना है कि वे इमरान खान की रिहाई की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। मार्च की तस्वीरें… शहबाज बोले- आर्थिक सुधार को नुकसान पहुंच सकता है इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के समर्थकों ने 4 अक्टूबर को यह मार्च शुरू किया था। शहबाज शरीफ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि लंबे समय तक चलने वाला प्रदर्शन पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार पिछले ढाई साल से देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए काम कर रही है। उन्होंने कहा कि इन कोशिशों को रोकने की कोई भी कोशिश राज्य से दुश्मनी के बराबर होगी। शहबाज ने कहा, हम ऐसा नहीं होने देंगे। कानून अपना काम करेगा। लोगों की जान और संपत्ति की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है और हम हर हाल में इसे सुनिश्चित करेंगे। मार्च और बढ़ा तो शहबाज की कुर्सी खतरे में आएगी पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग में रहे अविनाश मोहनानी ने कहा कि इमरान समर्थकों का लॉन्ग मार्च खैबर से पंजाब में पहुंचते ही शहबाज सरकार पर दबाव बढ़ाएगा। व्यापक समर्थन मिला तो आर्मी चीफ मुनीर के लिए भी इसे रोकना मुश्किल होगा। इसी वजह से मार्च को रोकने की कोशिश तेज है। इमरान की लोकप्रियता अब भी कायम है और उनकी रिहाई की चाबी मुनीर के पास है। वहीं, सीनियर फैलो और राजनीतिक विश्लेषक सुशांत सरीन के मुताबिक, आसिम मुनीर लॉन्ग मार्च के बहाने शहबाज शरीफ को घेर रहे हैं। सरीन के मुताबिक, मुनीर ने पहले मार्च के रास्ते में खैबर में फ्रंटियर फोर्स तैनात की। इसके बाद मंगलवार को शहबाज से इमरान समर्थकों को बातचीत के लिए बुलाने को कहा। उनका कहना है कि मुनीर शहबाज को कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करना चाहते हैं, जिससे लोगों का सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़े। पाकिस्तान की राजनीति के इतिहास को देखते हुए शहबाज का सत्ता से जाना तय माना जा रहा है। इमरान 2023 से जेल में बंद, पत्नी-बहनें भी कैद हैं 73 साल के इमरान खान 2023 से रावलपिंडी की अडियाला जेल में बंद हैं। उन पर 100 से ज्यादा मामले दर्ज हैं। तीन मामलों में सजा सुनाई गई है। अल कादिर ट्रस्ट केस में 14 साल, दस्तावेज लीक में 10 साल और तोशाखाना केस में 3 साल की सजा है। तोशाखाना केस में इमरान की पत्नी बुशरा भी जेल में है। सितंबर में इमरान की बहन अलीमा, उजमा और नूरीन को भी एहतियातन हिरासत में लिया गया है। 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इमरान को मेडिकल जांच और इलाज के लिए इस्लामाबाद के निजी अस्पताल में शिफ्ट करने का आदेश दिया था। 20 अगस्त की रात उन्हें निजी अस्पताल की बजाय पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PIMS) ले जाया गया। जांच के बाद उन्हें वापस जेल भेज दिया गया। मार्च इस्लामाबाद से पहले रोकने की तैयारी खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने घोषणा की कि मार्च जारी रहेगा। टैंक, डेरा इस्माइल खान, दक्षिण वजीरिस्तान, उत्तर वजीरिस्तान, बन्नू और लक्की मारवत के समर्थक गांधी चौक से मार्च में शामिल हुए। प्रधानमंत्री शरीफ के राजनीतिक सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को इस्लामाबाद में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। केंद्र सरकार ने राजधानी की ओर जाने वाली सड़कों पर अतिरिक्त सुरक्षाबल तैनात किए हैं। सरकार से दो दौर की बातचीत, पर सहमति नहीं बनी सरकार और PTI के बीच शुक्रवार और शनिवार को दो दौर की बातचीत हुई, लेकिन सहमति नहीं बनी। PTI इमरान से तत्काल मुलाकात और उन्हें ऐसे अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की, जहां उनके निजी डॉक्टर जांच और इलाज कर सकें। सरकार की ओर से प्रदर्शन रद्द करने की शर्त रखी गई थी। ————————— यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान का ड्रोन हमलों से बचने के लिए सस्ता तरीका:सेना-पुलिस के ठिकानों पर मछली पकड़ने वाला जाल लगा रहे, दावा- इसमें ड्रोन फंसकर फट जाएंगे पाकिस्तान में ड्रोन हमलों से बचने के लिए पुलिस और सेना अब मछली पकड़ने वाले जाल का इस्तेमाल कर रही है। अल जजीरा के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के संवेदनशील इलाकों में पुलिस चौकियों और सुरक्षा ठिकानों के ऊपर कई मीटर की ऊंचाई पर ये जाल लगाए जा रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…