PM मोदी के 25 साल: ‘गुजरात मॉडल’ से ‘विकसित भारत’ तक, देश में ऐसे बदली विकास की राजनीति

PM Modi 25 Years: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता संभाली थी। उस समय गुजरात भुज भूकंप की तबाही से उबर रहा था। उस वक्त राज्य के सामने सूखा, पानी की कमी, बिजली संकट और राजनीतिक अस्थिरता जैसी कई चुनौतियां थीं। 25 साल बाद पीएम मोदी की विकास राजनीति का दायरा गुजरात मॉडल से निकलकर ‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और अब ‘विकसित भारत @2047’ तक पहुंच चुका है। यह बदलाव सिर्फ नारों का नहीं, बल्कि विकास की पूरी सोच के विस्तार को दिखाता है। प्रधानमंत्री ने आज यानी 7 अक्तूबर को सार्वजनिक जीवन में 25 साल पूरे कर लिए हैं।

गुजरात मॉडल से हुई शुरुआत

गुजरात में मोदी के शुरुआती शासन की प्राथमिकता प्रशासन को ज्यादा जवाबदेह और प्रभावी बनाना, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और निवेश एवं उद्योग के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना था। इसी दौर की चर्चित पहल SWAGAT (State Wide Attention on Grievances by Application of Technology) थी। इसके जरिए आम लोग अपनी शिकायतें सीधे सरकार तक पहुंचा सकते थे। इस पहल को 2010 में संयुक्त राष्ट्र का पब्लिक सर्विस अवॉर्ड भी मिला।

इसी तरह ज्योतिग्राम योजना के जरिए कृषि और घरेलू बिजली आपूर्ति के लिए अलग-अलग फीडर की व्यवस्था की गई। केंद्र सरकार की ओर से पीएम मोदी के 25 साल के शासन को लेकर जारी प्रस्ताव में SWAGAT और ज्योतिग्राम को गुजरात से निकली ऐसी पहलों के तौर पर बताया गया है, जिनका प्रभाव बाद में राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दिया।

SWAGAT से क्या बदला?

SWAGAT में तकनीक के जरिए शिकायतों और प्रशासनिक कामकाज की निगरानी का जो मॉडल अपनाया गया, उसी सोच का विस्तार आगे चलकर PRAGATI में दिखाई दिया। PRAGATI के जरिए केंद्र सरकार की बड़ी परियोजनाओं की समीक्षा और उनके सामने आ रही अड़चनों को दूर करने पर जोर दिया गया।

‘गुजरात मॉडल’ बना राष्ट्रीय चुनावी मुद्दा

धीरे-धीरे गुजरात मॉडल की पहचान औद्योगीकरण, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक विकास से जुड़ गई। 2013 में जब नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने, तब गुजरात मॉडल उनके राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका था। लेकिन 2014 में दिल्ली आने के बाद विकास की यह कहानी और व्यापक हो गई।

विकास के साथ कल्याण योजनाओं पर जोर

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी सरकार ने विकास को सिर्फ उद्योग और निवेश तक सीमित नहीं रखा। जन धन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी के जरिए सीधे लाभ पहुंचाने का ढांचा तैयार किया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और पीएम-किसान जैसी योजनाओं के जरिए सरकार ने ‘लास्ट माइल डिलीवरी’ पर जोर दिया।

सरकार के 25 साल के प्रस्ताव के मुताबिक, देश में करीब 60 करोड़ जन धन खाते खोले गए हैं। 4 करोड़ से ज्यादा घर उपलब्ध कराए गए हैं। करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं। वहीं पीएम-किसान के तहत अब तक 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि ट्रांसफर किए जाने का दावा किया गया है। इस तरह विकास का पैमाना भी बदल गया। अब सवाल सिर्फ यह नहीं रहा कि कितने निवेश आए या कितने उद्योग लगे। बल्कि यह भी देखा जाने लगा कि कितने परिवारों को बैंक खाता, घर, शौचालय, गैस, नल का पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलीं।

टेक्नोलॉजी बनी सरकार और जनता के बीच कड़ी

पीएम मोदी की विकास सोच में गुजरात से लेकर केंद्र तक एक चीज लगातार दिखाई देती है और वह है टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल…। SWAGAT की सोच आगे चलकर PRAGATI में दिखाई दी। इसके बाद आधार आधारित सेवाओं, डिजिटल भुगतान और UPI ने तकनीक को आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना दिया।

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के अनुसार, 2014 से अब तक PRAGATI के जरिए 377 प्रोजेक्ट्स की समीक्षा की जा चुकी है। पहचाने गए करीब 94 फीसदी मुद्दों का समाधान किया गया है। सरकार का कहना है कि PRAGATI सिस्टम ने 85 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की परियोजनाओं को गति देने में मदद की है।

‘मेक इन इंडिया’ से ‘आत्मनिर्भर भारत’ तक

2020 में कोरोना महामारी के बाद विकास की भाषा में एक और बड़ा बदलाव आया। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के साथ अब ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा।

वैश्विक सप्लाई चेन में आई मुश्किलों ने घरेलू उत्पादन और रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की जरूरत को और प्रमुख बना दिया। सरकार अब इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस प्रोडक्शन, सेमीकंडक्टर निवेश और बढ़े हुए पूंजीगत खर्च को इसी बदलाव के उदाहरण के तौर पर पेश करती है।

‘विकसित भारत @2047’

पीएम मोदी की विकास यात्रा का मौजूदा सबसे बड़ा लक्ष्य ‘विकसित भारत @2047’ है। इसका उद्देश्य 2047 तक यानी आजादी की 100वीं वर्षगांठ तक भारत को एक विकसित देश बनाना है। इस लक्ष्य के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीक, निवेश, आत्मनिर्भरता और नागरिक-केंद्रित सरकारी सेवाओं को एक बड़े विजन के साथ जोड़ा जा रहा है।

ये भी पढ़ें- Heatwave Alert: भीषण गर्मी से गर्भवती महिलाओं और नवजातों पर बढ़ा खतरा, सर्वे में सामने आई चौंकाने वाली तस्वीर

Bank Holiday: आज शुक्रवार को बंद रहेंगे बैंक, जानिए RBI ने क्यों दी है छुट्टी

Bank Holiday 2 October: आज शुक्रवार, 2 अक्टूबर को देशभर के सभी सरकारी, प्राइवेट, क्षेत्रीय और ग्रामीण बैंक बंद रहेंगे। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की छुट्टियों की आधिकारिक सूची के अनुसार, 2 अक्टूबर को राष्ट्रीय अवकाश होने के कारण पूरे भारत में बैंकों में कामकाज नहीं होगा। अगर आपको आज बैंक से जुड़ा कोई जरूरी काम निपटाना है, तो यह खबर आपके लिए बेहद काम की है।

क्यों बंद रहेंगे बैंक?

2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती है। यह देश के तीन प्रमुख राष्ट्रीय अवकाशों में से एक है। इस अवसर पर आरबीआई के नियमों के तहत देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बैंक पूरी तरह से बंद रहते हैं।

अक्टूबर में छुट्टियों की भरमार

अक्टूबर का महीना त्योहारों से भरा हुआ है। दुर्गा पूजा, दशहरा और महालया जैसे बड़े त्योहारों के चलते अक्टूबर में अलग-अलग राज्यों में बैंकों की कई दिनों की छुट्टियां रहेंगी। आरबीआई द्वारा जारी अक्टूबर 2026 की छुट्टियों की लिस्ट:

  • 2 अक्टूबर (शुक्रवार): गांधी जयंती (पूरे भारत में बंद)
  • 10 अक्टूबर (शनिवार): महालया अमावस्या / दूसरा शनिवार (बेंगलुरु, कोलकाता और देशभर में)
  • 11 अक्टूबर (रविवार): साप्ताहिक अवकाश (पूरे भारत में बंद)
  • 17 अक्टूबर (शनिवार): महा सप्तमी (अगरतला)
  • 18 अक्टूबर (रविवार): साप्ताहिक अवकाश (पूरे भारत में बंद)
  • 19 अक्टूबर (सोमवार): महाष्टमी / महानवमी / दुर्गा पूजा (कोलकाता, पटना, गुवाहाटी, रांची आदि)
  • 20 अक्टूबर (मंगलवार): दशहरा – विजयादशमी (अधिकांश राज्यों में बंद)
  • 21-23 अक्टूबर (बुधवार से शुक्रवार): दुर्गा पूजा – दशैं / विजया दशमी (गंगटोक, कोलकाता, अगरतला आदि)
  • 24 अक्टूबर (शनिवार): चौथा शनिवार (पूरे भारत में बंद)
  • 25 अक्टूबर (रविवार): साप्ताहिक अवकाश (पूरे भारत में बंद)
  • 26 अक्टूबर (सोमवार): लक्ष्मी पूजा / महर्षि वाल्मीकि जयंती (शिमला, जम्मू, श्रीनगर, अगरतला)
  • 29 अक्टूबर (गुरुवार): करवा चौथ (शिमला)
  • 31 अक्टूबर (शनिवार): सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती (अहमदाबाद)

(नोट: राज्यों के स्थानीय त्योहारों के आधार पर बैंक छुट्टियों में अंतर हो सकता है।)

ऑनलाइन और डिजिटल सेवाएं रहेंगी चालू

बैंक शाखाएं बंद रहने के बावजूद ग्राहकों को वित्तीय लेनदेन में कोई परेशानी नहीं होगी। डिजिटल और ऑनलाइन सेवाएं 24/7 चालू रहेंगी। फंड ट्रांसफर (NEFT, RTGS, IMPS) की सुविधा सुचारू रूप से चलती रहेगी। Google Pay, PhonePe, Paytm जैसी यूपीआई सेवाओं के जरिए डिजिटल भुगतान सामान्य रूप से होगा। कैश निकालने या जमा करने के लिए एटीएम मशीनें चालू रहेंगी।

अगर आपको चेक क्लियरिंग या शाखा में जाकर कोई कैश डिपॉजिट/विड्रॉल जैसी सेवाएं लेनी हैं, तो इसके लिए अब आपको शनिवार, 3 अक्टूबर को बैंक खुलने का इंतजार करना होगा।

PhonePe Rural India Plan: फोनपे में निकलेंगी 20000 नौकरियां! भारत के गांव-देहात में विस्तार के लिए कंपनी का बड़ा प्लान

PhonePe Rural India Plan: डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म फोनपे ने गुरुवार को अगले साल भारत के छोटे शहरों और गांवों में अपने बुनियादी ढांचे को और गहराई तक पहुंचाने की योजना की घोषणा की। इसके तहत डिजिटल पेमेंट कंपनी अपने मर्चेंट नेटवर्क को बढ़ाने के लिए 20,000 ऑन-रोल सेल्स कर्मचारियों की भर्ती करेगी। कंपनी अगले 12 महीनों में 50 लाख से अधिक पेमेंट डिवाइस भी लगाएगी। इनमें स्मार्टस्पीकर और पीओएस डिवाइस शामिल होंगे। इनमें से करीब 50% डिवाइस ग्रामीण भारत में लगाए जाएंगे। इससे टियर-6 कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की सुविधा और गहराई तक पहुंचेगी।

वॉलमार्ट के समर्थन वाली कंपनी फोनपे का यह कदम भारत के एनपीसीआई के उस फैसले के बाद आया है जिसमें चुनिंदा यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4% शुल्क लगाने का फैसला किया गया है। इसका एक हिस्सा कम सेवा वाले इलाकों में छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल पेमेंट की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए रखा जाएगा। फोनपे ने कहा, “हाल ही में घोषित एमडीआर ढांचा कंपनी को लंबे समय का नजरिया रखने और मर्चेंट बढ़ाने में निवेचश करने की इजाजत देता है।” अगस्त तक, फोनपे के भुगतान नेटवर्क में 72 करोड़ से अधिक पंजीकृत यूजर और 5 करोड़ से ज्यादा मर्चेंट शामिल थे।

पिछले साल लागू किए गए नए श्रम संहिताएं भी कंपनी को प्रक्रियाओं को सरल बनाकर तेजी से भर्ती करने में सक्षम बना रही हैं। इससे बड़ी संख्या में ऑन-रोल कर्मचारियों को आसानी से कंपनी में शामिल करने में मदद मिल रही है। भारत ने दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम में से एक तैयार किया है। इस यात्रा के अगले चरण में देश के हर हिस्से के छोटे कारोबारियों को डिजिटल अर्थव्यवस्था में भाग लेने में सक्षम बनाने वाले मर्चेंट पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार निवेश की जरूरत होगी।

फोनपे का प्रस्तावित विस्तार इसी अवसर को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। काफी बड़े फ्रंटलाइन ऑन-रोल कार्यबल की मदद से फोनपे छोटे कस्बों और गांवों में कारोबारियों तक पहुंच सकेगा, उन्हें डिजिटल भुगतान से जोड़ सकेगा, केवाईसी प्रक्रिया पूरी कर सकेगा, पेमेंट डिवाइस लगा सकेगा और कारोबारियों को लगातार सहायता प्रदान कर सकेगा।

इस विस्तार से लाखों छोटे कारोबारियों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से और अधिक जोड़ने में भी मदद मिलेगी। डिजिटल रूप से सक्रिय और केवाईसी-अनुपालन वाला मर्चेंट नेटवर्क कारोबारी गतिविधियों को अधिक स्पष्ट रूप से सामने ला सकता है और पात्र कारोबारियों को औपचारिक वित्तीय सेवाओं की व्यापक रेंज तक पहुंच उपलब्ध करा सकता है। इसमें ऋण देने वाली संस्थाओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले कर्ज भी शामिल हैं।

NEET PG 2026 Result: 2.5 लाख से ज्यादा परीक्षार्थियों का इंतजार हुआ खत्म, एनबीईएमएस ने तय समय से पहले जारी किया नीट पीजी रिजल्ट

यूपीआई पर शुल्क जनविरोधी

नई दिल्ली। 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाने का मुद्दा बुधवार को संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की बैठक में भी उठा। विपक्षी सदस्यों ने नई व्यवस्था पर चिंता जताते हुए इसे ‘जनविरोधी’ बताया। बैठक में जीडीपी वृद्धि दर की गणना की पद्धति पर भी सवाल उठाए गए।

नई व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के निर्धारित व्यापारिक यूपीआई भुगतान पर व्यापारी से 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लिया जाएगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर अधिकतम शुल्क 300 रुपये होगा। व्यवस्था 15 अक्टूबर, 2026 से लागू होनी है।

समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब ने बैठक के बाद कहा कि यूपीआई का मुद्दा बुधवार की बैठक की निर्धारित कार्यवाही का हिस्सा नहीं था, लेकिन सदस्यों ने इस संबंध में अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि अक्टूबर में नई समिति के अस्तित्व में आने के बाद इस विषय पर विचार किया जा सकता है।

समिति के सदस्य और आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने कहा कि 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक भुगतान पर शुल्क लगाने के फैसले का व्यापक असर होगा। उन्होंने इसे ‘पूरी तरह जनविरोधी फैसला’ बताया।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि संसदीय समितियों की कार्यवाही विशेषाधिकार प्राप्त होती है और उस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि यूपीआई लेनदेन पर शुल्क की आशंका को लेकर देशभर में चिंता और नाराजगी है और जनता को प्रभावित करने वाले ऐसे मुद्दों का प्रतिबिंब संसदीय कार्यवाही में भी स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है।

सरकार ने मंगलवार को बड़े डिजिटल भुगतान के लिए नई व्यवस्था जारी की थी। इसके साथ जनवरी 2020 से लागू शून्य-एमडीआर व्यवस्था में बदलाव हो जाएगा। शून्य-एमडीआर नीति डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए लागू की गई थी। हालांकि बैंक और वित्तीय-प्रौद्योगिकी यानी फिनटेक कंपनियां लंबे समय से यूपीआई व्यवस्था चलाने की लागत और उसके वित्तपोषण का मुद्दा उठाती रही हैं।

नई व्यवस्था में शुल्क व्यापारी पर होगा, ग्राहक पर नहीं। 2,000 रुपये तक के यूपीआई व्यापारिक भुगतान शुल्क-मुक्त रहेंगे।  बैठक में जीडीपी की गणना का मुद्दा भी उठा। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है। मनीष तिवारी ने कहा कि सरकार को जीडीपी की गणना की पद्धति स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि आधार वर्ष में बदलाव किया गया है।

सरकार सीधे टैक्स मंत्रालय ही बना ले!

अब समय आ गया है कि वित्त, वाणिज्य, उद्योग आदि से अलग सरकार एक टैक्स का मंत्रालय बनाए। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई के जरिए होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की सरकार की घोषणा के बाद यह आवश्यकता ज्यादा अनिवार्य रूप से प्रकट हुई है। सरकार इसे शुल्क कह रही है लेकिन असल में यह टैक्स ही है, जिसका भुगतान किसी न किसी रूप में आम नागरिक को करना है। सोचें, कितना दूरदर्शी था वह व्यक्ति, जिसने कहा था कि दुनिया में दो ही चीजें सत्य हैः एक मृत्यु और दूसरा टैक्स। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस वाक्य को अमर कर दिया है। टैक्स ही अंतिम सत्य है। अब कोई चीज ऐसी नहीं बची है, जिस पर टैक्स नहीं है।

सरकार कहती है कि उसने एक देश, एक टैक्स का नियम यानी जीएसटी लागू कर दिया है लेकिन वास्तविकता यह है कि देश के हर नागरिक को अब भी दर्जनों टैक्स देने होते हैं। चाहे वह आयकर के रूप में हो, जीएसटी के रूप में हो, वैट के रूप में, सेस या सरचार्ज के रूप में हो या टोल के रूप में हो या किसी सेवा शुल्क के रूप में हो।

सोचें, सरकार ने यूपीआई को एक तकनीकी मार्बल के रूप में कितना प्रचारित किया था! इसे भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया गया और इसे शुल्क मुक्त रखने का ऐलान भी किया गया। लेकिन सरकार ने अब इस पर भी शुल्क लगा दिया है। इसके लिए आंकड़ों को जिस तरह से तोड़ा मरोड़ा गया है वह अभूतपूर्व है। कहा गया कि यूपीआई से होने वाला 96 फीसदी लेनदेन दो हजार रुपए से कम का होता है, जिस पर सरकार कोई शुल्क नहीं लगा रही है। सिर्फ चार फीसदी लेनदेन पर शुल्क लगेगा, वह भी सिर्फ 0.40 फीसदी होगा और उसकी भी अथिकतम सीमा तीन सौ रुपए होगी।

हालांकि वास्तविकता यह है कि चार फीसदी लेनदेन का मूल्य 66 फीसदी है। जो 96 फीसदी लेनदेन होता है उसका मूल्य केवल 34 फीसदी है। कुल 314 लाख करोड़ रुपए के ट्रांजेक्शन में 207 लाख करोड़ का लेनदेन चार फीसदी ट्रांजेक्शन से हुआ है। इस रकम के ऊपर शुल्क या टैक्स लगाया जाएगा।

सवाल है कि चार फीसदी ट्रांजेक्शन पर 0.40 फीसदी की दर से और तीन सौ रुपए की अधिकतम सीमा लगा कर भी शुल्क क्यों लगाना है? इसकी जरुरत बताते हुए सवाल उठाया जा रहा है कि कोई भी सेवा कितने समय तक मुफ्त में दी जा सकती है? कहा जा रहा है कि इसके रखरखाव पर और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करने पर खर्च होता है। इसलिए ज्यादा समय तक मुफ्त में सेवा नहीं दी जा सकती है। सवाल है कि क्या यूपीआई की सेवा मुफ्त है? ऐसा नहीं है। यूपीआई का संचालन करने वाली संस्था नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यीनी एनपीसीआई मुनाफा कमाने वाली संस्था है।

उसे यूपीआई के संचालन में घाटा नहीं होता है। उसे कई तरह की डिजिटल भुगतान सेवाओं के लिए बैंकों, एप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से पैसा मिलता है। लेकिन चूंकि एनपीसीआई एक गैर लाभकारी संस्था यानी नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन के तौर पर बनी है इसलिए उसकी कमाई को मुनाफा नहीं, बल्कि सरप्लस कहा जाता है। सिर्फ यूपीआई को लें तो एनपीसीआई का खर्च तीन हजार करोड़ रुपए से कुछ कम है और उसकी कमाई इससे ज्यादा है। पिछले साल तो उसने अपनी कमाई पर केंद्र सरकार को एक हजार करोड़ रुपए का टैक्स दिया है। अगर पूरी डिजिटल बैंकिंग को शामिल करें तो खर्च 20 हजार करोड़ रुपए के करीब होता है। लेकिन बैंकों को होने वाली कमाई के मुकाबले यह रकम कुछ भी नहीं है।

देश के सभी बैंकों की एक वित्तीय वर्ष की साझा कमाई लगभग 4.11 लाख करोड़ रुपए है। रिजर्व बैंक की कमाई का आंकड़ा कितना बड़ा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रिजर्व बैंक ने इस साल अपनी कमाई से केंद्र सरकार को जो लाभांश दिया है वह 2.87 लाख करोड़ रुपए का है। इस प्रत्यक्ष कमाई के अलावा इकोनॉमी के ऑर्गेनाइज्ड होने से ज्यादा लेनदेन आधिकारिक रूप से हो रहा है, जिस पर सरकार को टैक्स मिल रहा है। नकद लेनदेन में बहुत पैसा काले धन की अर्थव्यवस्था में चला जाता था। तभी सवाल है कि जब लाखों करोड़ रुपए की कमाई बैंकों को है और टैक्स की कमाई सरकार को है तो फिर डिजिटल बैंकिंग पर होने वाले खर्च के लिए अलग से नागरिकों से पैसा वसूलने की क्या तुक है?

सरकार कह रही है कि चार फीसदी ट्रांजेक्शन पर जो 0.40 फीसदी शुल्क है वह भी जनता को नहीं देना है, बल्कि व्यापारी देगा। सोचें, कभी ऐसा हुआ है कि सरकार किसी उत्पाद या सेवा पर शुल्क लगाए तो उसका भुगतान व्यापारी करे? व्यापारी हर शुल्क ग्राहक से ही वसूलता है। चाहे वह सरचार्ज लगा कर वसूले या वस्तु व सेवा की कीमत बढ़ा कर वसूले। अंततः भुगतान जनता को ही करना होता है। सो, यह जनता के ऊपर एक नया टैक्स है। असल में सरकार को हर उत्पाद और हर सेवा पर टैक्स वसूलना है। उसे लग रहा है कि हर देश में औसतन 24 हजार करोड़ ट्रांजेक्शन हो रहे हैं और भारत की पूरी जीडीपी से थोड़ा ही कम ट्रांजेक्शन यूपीआई के जरिए हो रहा है तो इसका मतलब है कि लोगों के पास पैसे हैं इसलिए लोगों से टैक्स वसूला जाए। ध्यान रहे भारत की जीडीपी 360 लाख करोड़ रुपए के करीब है और यूपीआई का सालाना ट्रांजेक्शन 314 लाख करोड़ है।

यूपीआई के ट्रांजेक्शन पर शुल्क लगाना व्यापक रूप से भारत सरकार के जन विरोधी रुख को दिखाता है और साथ ही यह भी दिखाता है कि उसके पास राजस्व बढ़ाने का टैक्स लगाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। सरकार कोई और उपाय नहीं कर पा रही है। बाहर से निवेश नहीं आ रहा है। सारे प्रयास के बावजूद विनिर्माण सेक्टर मजबूत नहीं हो रहा है। निर्यात का इकोसिस्टम बहुत कमजोर है और दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा है। अकेले चीन और रूस को मिला कर करीब 15 लाख करोड़ रुपए का व्यापार घाटा है। तभी घूम फिर कर सरकार टैक्स लगा देती है। एक व्यक्ति को कई कई बार टैक्स देना पड़ता है। आय़कर चुकाने के बाद की आमदनी से कुछ भी खरीदने पर कई तरह के टैक्स देने होते हैं। किसी भी उत्पाद या सेवा को लें तो दिखाई देगा कि एक सेवा या एक उत्पाद पर कितने टैक्स देने होते हैं।

मिसाल के तौर पर कोई व्यक्ति गाड़ी खरीदता है तो उसे जीएसटी, रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन शुल्क, पेट्रोल या डीजल का शुल्क, रोड इंफ्रास्ट्रक्टर सेस और फिर टोल टैक्स देना होगा। ऐसे ही किसी व्यक्ति के बिजली का बिल देखें तो पता चलेगा कि जितना एनर्जी चार्ज है लगभग उतना ही टैक्स है। वह टैक्स कई तरह का होगा। एनर्जी चार्ज पर तो जीएसटी देना ही है उसके अलावा मीटर का फिक्स्ड चार्ज और पावर परचेज एग्रीमेंट का चार्ज और इन दोनों पर जीएसटी अलग है। किसी भी उत्पाद या सेवा के बिल में इस तरह टैक्स की मौजूदगी को देखा जा सकता है। तभी सरकार को गंभीरता से इस पर विचार करना चाहिए कि जब सब कुछ टैक्स ही है तो एक टैक्स मंत्रालय बना दिया जाए और वहां ऐसा मंत्री नियुक्त किया जाए, जो खुर्दबीन लेकर यह खोजे कि कहां कहां अभी तक टैक्स नहीं लगा है और वहां टैक्स लगाए।

UPI MDR Charge: क्या आप एमडीआर चार्ज को लेकर चिंतित हैं? 42 FAQ से समझें कि क्यों चिंता करने की जरूरत नहीं है

UPI MDR Charge: यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर चार्ज के ऐलान के बाद कई लोग चिंतित हैं। उन्हें लग रहा है कि अब यूपीआई से पेमेंट करने पर उन्हें फीस चुकानी होगी। यूपीआई पर एमडीआर चार्ज 15 अक्टूबर से लागू होगा। सच यह है कि इसके लागू होने के बाद भी यूजर्स को यूपीआई से पेमेंट पर कोई फीस नहीं चुकानी होगी। एमडीआर चार्ज मर्चेंट यानी दुकानदार को देना होगा। इस पूरे मामले को समझने के लिए मनीकंट्रोल ने 42 FAQ तैयार किए हैं। इसकी मदद से आपकी पूरी उलझन दूर हो जाएगी।

 मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) अभी क्यों लागू किया जा रहा है?

यूपीआई के जरिए हर महीने अरबों रुपये के ट्रांजेक्शन होते हैं। एमडीआर चार्ज से वसूला गया पैसा सिर्फ यूपीआई इकोसिस्टम में डिस्ट्रिब्यूट होता है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने, इनोवेशन, साइबर सुरक्षा (बैंकों और नॉन-बैंकों के साथ यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा) और सर्विस बेहतर बनाने में मदद मिलती है। यूपीआई का शुल्क (एमडीआर) क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, वॉलेट आदि जैसे अन्य भुगतान साधनों के मुकाबले काफी कम हैं। शुल्क बहुत ही उचित रखे गए हैं और केवल ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर ही लागू होंगे, जिससे यूपीआई भुगतान स्वीकार करने हेतु सबसे किफायती जरिया बना रहे।

क्या कम राशि वाले यूपीआई लेनदेन प्रभावित होंगे?

₹2,000 तक की राशि वाले यूपीआई लेनदेन पर MDR का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जो कुल यूपीआई (पी2एम) लेनदेन के 95% से अधिक हैं। उचित एमडीआर लगाने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यूपीआई रोजमर्रा के लेनदेन के लिए सुलभ और सुविधाजनक बना रहे, साथ ही दीर्घकालिक इकोसिस्टम की स्थिरता को भी मजबूती मिले।

यूपीआई लेनदेन पर व्यापारियों के लिए कितना एमडीआर लागू किया जा रहा है?

₹2,000/- से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर 0.4% लागू होगा। ₹75,000/- और उससे अधिक के लेनदेन के लिए, एमडीआर प्रति लेन-देन ₹300 तक सीमित होगा।

यूपीआई एमडीआर की तुलना पारंपरिक डेबिट और क्रेडिट कार्ड एमडीआर से कैसे की जा सकती है?

यूपीआई एमडीआर सभी पारंपरिक कार्ड-आधारित लेनदेन शुल्कों की तुलना में काफी कम है। सामान्य क्रेडिट कार्ड एमडीआर आमतौर पर प्रति लेनदेन 1.5% से 2.5% तक होता है, जबकि डेबिट कार्ड एमडीआर 0.90% तक सीमित होता है। ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर यूपीआई एमडीआर को 0.4% और उच्च राशि की खरीदारी पर इसे ₹300 तक सीमित किया गया है।

अपडेटेड एमडीआर संबंधी प्रावधान कब से प्रभावी होंगे?

अपडेटेड एमडीआर 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगा। यह समयसीमा अधिग्रहण करने वाले बैंकों, भुगतान एग्रीगेटरों, फिनटेक अनुप्रयोगों और कॉरपोरेट लेखा प्लेटफॉर्मों को अपने सॉफ्टवेयर इंजन और बिलिंग सिस्टम को अपडेट करने के लिए पर्याप्त समय प्रदान करती है।

इसकी तुलना अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों से किस प्रकार की जा सकती है?

दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसे आर्थिक मॉडल हैं जो इंफ्रास्ट्रक्चर और नवाचार को सहयोग करते हैं। भारत का दृष्टिकोण सुगमता, विस्तार और समावेशन को प्राथमिकता देता है।

एमडीआर की लिमिट के अंतिम कार्यान्वयन और प्रवर्तन का निर्णय कौन करता है?

परिचालन संबंधी मापदंड, शुल्क वितरण मॉडल और श्रेणी सीमाएं भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) की अध्यक्षता वाली यूपीआई और सेवा संचालन समिति की ओर से तय किए जाते हैं।

एमडीआर के अंतर्गत प्रस्तावित छोटे व्यापारियों के लिए समर्पित निधि क्या है?

टियर-3 में पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू एवं कश्मीर तथा लद्दाख को मिलाकर कुल 6 केंद्रों और टियर-1 व 2 केंद्रों, जिनमें केंद्र सरकार की ओर से किसी अधिसूचित योजना (जैसे कि पीएम स्वनिधि, पीएम विश्वकर्मा इत्यादि) भी शामिल हैं, में डिजिटल भुगतान इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी बनाए रखने और सब्सिडी दिए जाने हेतु एक समर्पित कोष का निर्माण किया जाएगा। इस कोष का इस्तेमाल व्यापारियों को जोड़ने के लिए इकोसिस्टम के सदस्यों को वित्तीय मदद प्रदान करने और मौजूदा छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई लेन-देन को प्रोत्साहन देने के लिए भी किया जाएगा।

प्रस्तावित समर्पित कोष से छोटे व्यापारियों को किस प्रकार मदद मिलेगी?

प्रस्तावित किया गया समर्पित कोष से छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई की स्वीकार्यता बढ़ाने में सहायता मिलेगी। इसके लिए अधिग्रहण बैंकों/ भुगतान एग्रीगेटरों को व्यापारी जुड़ाव पहलों के लिए वित्तीय मदद प्रदान की जाएगी और छोटे व्यापारियों की ओर से, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों, टियर-III केंद्रों और उससे आगे के क्षेत्रों में, किए गए यूपीआई लेन-देन हेतु प्रोत्साहन दिया जाएगा। इससे निरंतर इस्तेमाल को प्रोत्साहन मिलेगा, डिजिटल भुगतान की पहुंच बढ़ेगी और छोटे व्यवसायों को डिजिटल भुगतान प्रणाली में शामिल करने की प्रक्रिया में तेजी आएगी। विस्तृत रूपरेखा को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की सलाह से अगले तीन महीनों के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा।

यूपीआई के लिए केवल सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहना पर्याप्त क्यों नहीं है?

वार्षिक सरकारी प्रोत्साहन/ सब्सिडी, हालांकि शुरुआती समय में डिजिटल को अपनाने में तेजी लाने में मददगार है, लेकिन इसे भुगतान इंडस्ट्री की ओर से किए गए खर्चों की भरपाई के लिए स्थायी उपाय के बजाय अल्पकालिक मदद के तौर पर तैयार किया गया था। इंडस्ट्री के अनुमानों के आधार पर, यूपीआई भुगतान के संचालन, सर्वर बैंडविथ, धोखाधड़ी रोकथाम प्रणालियों और बैंक तकनीकी सहायता को बनाए रखने में सालाना लगभग ₹20,000 करोड़ का खर्च आता है। केवल राजकोषीय बजट आवंटन पर निर्भर रहने से वित्तपोषण में अनिश्चितता पैदा होती है और बैंकों और फिनटेक कंपनियों की ओर से दीर्घकालिक प्रौद्योगिकी निवेश सीमित हो जाते हैं। एक वाणिज्यिक, सीमा-आधारित मॉडल में बदलाव निरंतर तकनीकी नवाचार के लिए विश्वसनीय पूंजी प्रदान करता है।

यह कदम पेमेंट ऐप ऑपरेटरों के बीच बाजार प्रतिस्पर्धा को कैसे प्रोत्साहन देगा?

एक संपोषित व्यावसायिक फ्रेमवर्क स्थापित करने से नए फिनटेक स्टार्टअप और प्रौद्योगिकी कंपनियों को डिजिटल भुगतान क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। जब भुगतान प्रोसेसिंग शून्य-एमडीआर (डिजिटल डिलीवरी रेट) शर्तों के अंतर्गत संचालित होती है, तो केवल उच्च पूंजी वाली तकनीकी कंपनियां ही दीर्घकालिक परिचालन घाटे को वहन कर सकती हैं। एक पूर्वानुमानित व्यावसायिक राजस्व मॉडल सभी के लिए समान अवसर प्रदान करता है, जिससे छोटे, नवोन्मेषी स्टार्टअप प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, विशेषीकृत भुगतान सॉफ्टवेयर तैयार कर सकते हैं और वित्तीय पहुंच का विस्तार कर सकते हैं। बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा आखिरकार बेहतर सेवाओं, ऐप की बेहतर विश्वसनीयता और उपभोक्ताओं के लिए अधिक विकल्पों की ओर ले जाती है।

यह नीति उभरते खतरों के खिलाफ साइबर सुरक्षा लचीलापन कैसे सुनिश्चित करती है?

एमडीआर के माध्यम से प्राप्त राजस्व का इस्तेमाल साइबर सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई-आधारित धोखाधड़ी का पता लगाने, एन्क्रिप्शन अपग्रेड आदि में निवेश हेतु किया जा सकता है।

2026 तक यूपीआई का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितना विस्तार हो चुका है?

2026 तक, यूपीआई का वैश्विक विस्तार काफी बढ़ चुका है और दुनिया के 11 देशों में इसकी भुगतान सेवाएं सक्रिय हैं। एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर घरेलू आधार का निर्माण भारत को डिजिटल वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर में वैश्विक नेतृत्व के तौर पर अपनी भूमिका को मजबूत करने में मददगार होगा।

वर्तमान में यूपीआई का लेन-देन की मात्रा और मूल्य का स्तर क्या है और इसे आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता क्यों है?

अभूतपूर्व जन स्वीकृति का प्रदर्शन करते हुए, यूपीआई ने अकेले अगस्त 2026 में कुल ₹29.9 लाख करोड़ राशि के 2,451 करोड़ लेन-देन संसाधित किए। यह भारी मात्रा भारतीय अर्थव्यवस्था के प्राथमिक वित्तीय इंजन के रूप में यूपीआई की भूमिका को उजागर करती है, जो प्रतिदिन करोड़ों भुगतानों का प्रबंधन करता है। इस पैमाने को संभालने के लिए भारी संख्या में सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर, तेज गति वाली दूरसंचार लाइनें, बहुस्तरीय साइबर सुरक्षा निगरानी और विशेष बैंकिंग सॉफ्टवेयर की जरूरत होती है। लेन-देन के ये आंकड़े इस बात को पुष्ट करते हैं कि प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक आत्मनिर्भर वित्तपोषण फ्रेमवर्क स्थापित करना क्यों जरूरी था।

क्या यूपीआई के माध्यम से भुगतान करने पर सामान्य उपभोक्ताओं से शुल्क लिया जाएगा?

नहीं, यूपीआई सेवाएं उपभोक्ताओं के लिए निःशुल्क जारी रहेंगी। उपभोक्ता अब तक की तरह ही यूपीआई का इस्तेमाल करके निःशुल्क लेन-देन कर सकते हैं। यूपीआई के माध्यम से भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं को कोई शुल्क नहीं देना होगा। व्यक्तिगत खाताधारक बिना किसी शुल्क की चिंता किए अपने सभी नियमित दैनिक खर्चों के लिए यूपीआई एप्लिकेशन का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं। एमडीआर नीति यह सुनिश्चित करती है कि यूपीआई पूरे भारत में सभी नागरिकों के लिए निःशुल्क और सुलभ बनी रहे।

क्या यूपीआई के पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी) लेन-देन जैसे दोस्तों, परिवार या व्यक्तिगत संपर्कों को पैसे भेजने पर कोई शुल्क लगता है?

नहीं, पी2पी लेन-देन भुगतानकर्ता और प्राप्तकर्ता दोनों के लिए निःशुल्क रहेंगे। यूपीआई का इस्तेमाल कर किसी भी व्यक्ति की ओर से किसी अन्य व्यक्ति को कोई भी राशि हस्तांतरित करने या प्राप्त करने (या स्वयं को हस्तांतरित करने) पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। फिर चाहे आप परिवार के किसी सदस्य को पैसे भेज रहे हों, दोस्तों के साथ बिल बांट रहे हों, या अपने लिंक किए गए बैंक खातों में स्वयं को हस्तांतरित कर रहे हों, इन पर कोई शुल्क लागू नहीं होगा। नागरिक बिना किसी लेन-देन शुल्क के यूपीआई पर किसी भी स्वीकृत राशि का हस्तांतरण कर सकते हैं।

क्या यूपीआई ऐप यूपीआई भुगतान पर प्लेटफॉर्म शुल्क लेना शुरू कर देंगे?

नहीं, यूपीआई ऐप प्रदाता यूपीआई के माध्यम से किए गए किसी भी भुगतान पर प्लेटफॉर्म शुल्क या कोई अन्य शुल्क नहीं लेंगे। यूपीआई एप्लिकेशन को यूपीआई लेन-देन पर प्लेटफॉर्म शुल्क लगाने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।

क्या व्यापारियों की ओर से नाममात्र शुल्क का भुगतान शुरू करने पर दुकानों में उपभोक्ता कीमतों में बढ़ोतरी होगी?

नहीं, बाजार की गतिशीलता और ऐतिहासिक भुगतान रुझान दर्शाते हैं कि व्यापारी अधिक कारोबार बढ़ाने के लिए डिजिटल प्रोसेसिंग की मामूली लागत वहन करते हैं। भुगतान स्वीकार करने की लागत को मानक परिचालन खर्च माना जाता है, जिसकी भरपाई ग्राहकों की बढ़ती संख्या, उच्च औसत टिकट मूल्य और नकदी प्रबंधन के कम जोखिम से हो जाती है। चूंकि प्रस्तावित यूपीआई एमडीआर क्रेडिट कार्ड शुल्क से काफी कम है और केवल विशिष्ट लेन-देन सीमा से ऊपर ही लागू होता है, इसलिए दुकानदारों के पास खुदरा कीमतों को बढ़ाने का कोई आर्थिक प्रोत्साहन नहीं है। उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के लिए निश्चित मूल्य का ही भुगतान करते रहेंगे।

क्या मुझे स्थानीय विक्रेता पर क्यूआर कोड स्कैन करते समय शुल्क देना होगा?

नहीं, स्थानीय बाजारों, स्ट्रीट वेंडरों या छोटी खुदरा दुकानों पर क्यूआर कोड स्कैन करना उपभोक्ताओं के लिए पूरी तरह से निःशुल्क रहेगा। क्यूआर लेन-देन के ग्राहक के सामने वाले हिस्से में कोई शुल्क नहीं लगेगा, चाहे खरीदारी की राशि कितनी भी हो। यह नीति चाय की दुकानों और स्थानीय परिवहन जैसी दैनिक छोटी-मोटी खरीदारी को किसी भी प्रकार के अतिरिक्त शुल्क से बचाने के लिए बनाई गई है। उपभोक्ता पूरी तरह से आश्वस्त होकर क्यूआर कोड स्कैन करना जारी रख सकते हैं कि उनसे कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा।

क्या उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई लेन-देन के लिए कोई मासिक सीमा है?

नहीं, व्यक्तिगत उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई लेन-देन पर कोई मासिक कोटा, मात्रा सीमा या स्तरित सीमा नहीं है। यूजर्स पूरे महीने में बिना किसी शुल्क सीमा तक पहुंचे, जितने चाहें उतने वैध पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी) या पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) लेन-देन कर सकते हैं। हालांकि निजी बैंक और एनपीसीआई कुल लेन-देन राशि पर मानक दैनिक सुरक्षा सीमाएं लागू करते हैं (आमतौर पर लेनदेन श्रेणी के आधार पर ₹1 लाख से ₹5 लाख तक), ये जोखिम प्रबंधन मापदंड हैं, न कि व्यावसायिक शुल्क स्तर पर। किसी भी स्थिति में, उपभोक्ता यूपीआई का कितनी भी बार इस्तेमाल करें, उन्हें कोई लेन-देन शुल्क नहीं देना पड़ेगा।

सामान्य यूजर्स यूपीआई शुल्क के संबंध में आधिकारिक अपडेट कहां से सत्यापित कर सकते हैं?

नागरिकों को वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) या भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) की ओर से सीधे प्रकाशित आधिकारिक सूचनाओं को देखने की सलाह दी जाती है। भुगतान शुल्कों के संबंध में सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों और भ्रामक रिपोर्टों के कारण, सरकार ने जनता से असत्यापित संदेशों को आगे न भेजने का आग्रह किया है। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी), आरबीआई या एनपीसीआई की ओर से जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियां प्रामाणिक नियामक नीति का प्राथमिक स्रोत हैं। यूजर्स अपने प्राथमिक बैंकिंग एप्लिकेशन में भी सत्यापित सूचनाओं की जांच कर सकते हैं।

क्या एमडीआर की शुरुआत से ऑटो-डेबिट रिकरिंग पेमेंट जैसे यूटिलिटी बिल या ओटीटी/ म्यूचुअल फंड सब्सक्रिप्शन पर असर पड़ता है?

नहीं, स्वचालित रिकरिंग स्थायी निर्देश, जिन्हें यूपीआई मैंडेट या ऑटोपे के नाम से जाना जाता है, पर निर्धारित एमडीआर लेन-देन शुल्क नहीं लगता है। मासिक उपयोगिता बिल, ओटीटी स्ट्रीमिंग सब्सक्रिप्शन, सभी रिकरिंग निवेश आदि के लिए स्वचालित रिकरिंग हस्तांतरण का इस्तेमाल किए गए भुगतानों पर कोई निर्धारित एमडीआर शुल्क नहीं लगेगा।

क्या छोटे स्थानीय विक्रेताओं (पी2पीएम) से यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क लिया जाएगा?

नहीं। पी2पीएम फ्रेमवर्क के अंतर्गत काम करने वाले छोटे व्यापारियों के लिए शून्य एमडीआर (एमडीआर) लागू रहेगा। ये वे छोटे विक्रेता हैं जिन्हें यूपीआई क्यूआर के माध्यम से सीधे उनके खातों में प्रति माह 1 लाख रुपये तक की राशि प्राप्त होती है। पी2पीएम श्रेणी असंगठित खुदरा क्षेत्र में छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता को प्रोत्साहन देती है। इसके साथ ही, छोटे विक्रेता विशेष सूक्ष्म व्यापारी खाता वर्गीकरण (पी2पीएम) के अंतर्गत काम करते हैं, जो उन्हें वाणिज्यिक शुल्कों से सुरक्षा प्रदान करता है। एमडीआर फ्रेमवर्क विशेष रूप से इस तरह से तैयार किया गया है कि असंगठित खुदरा क्षेत्र के छोटे व्यवसाय बिना किसी मार्जिन कटौती के डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकें।

पी2पीएम फ्रेमवर्क क्या है और यह छोटे व्यापारियों की सुरक्षा कैसे करता है?

पर्सन-टू-पर्सन-मर्चेंट (पी2पीएम) फ्रेमवर्क एनपीसीआई की ओर से तैयार की गई एक विशेष खाता श्रेणी है, जिसका उद्देश्य छोटे विक्रेताओं को सीधे उनके निजी बैंक खातों में भुगतान प्राप्त करने में मदद करना है। पी2पीएम दिशानिर्देशों के अंतर्गत, यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से प्रति माह ₹1 लाख तक का भुगतान प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को अनिवार्य रूप से शून्य एमडीआर का लाभ मिलता है। यह वर्गीकरण अनौपचारिक स्ट्रीट वेंडर सेटअप और औपचारिक वाणिज्यिक मर्चेंट एक्वायरिंग खातों के बीच एक सेतु का काम करता है, जिससे सूक्ष्म व्यवसायों के लिए कोई लागत नहीं आती है। यह असंगठित क्षेत्र में डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन देता है।

क्या छोटे व्यापारियों को अपने मौजूदा क्यूआर कोड को अपग्रेड करने या बदलने की जरूरत है?

नहीं। मौजूदा क्यूआर इंफ्रास्ट्रक्चर सामान्य तरीके से काम करता रहेगा। व्यापारियों को अपने मौजूदा क्यूआर स्टैंड या साउंडबॉक्स को बदलने, पुनः पंजीकृत करने या उनमें कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं है। दुकानों में लगे हुए सभी यूपीआई क्यूआर कोड बिना किसी रुकावट के भुगतान प्रक्रिया जारी रखेंगे। व्यापारी बैंक शाखा में जाए बिना या सॉफ्टवेयर अपडेट किए बिना अपने मौजूदा सेटअप के माध्यम से ग्राहकों से भुगतान प्राप्त कर सकते हैं।

यदि किसी छोटे व्यापारी को ₹2,000 से अधिक का भुगतान प्राप्त होता है तो क्या होता है?

एमडीआर की प्रयोज्यता समग्र व्यापारी खाता वर्गीकरण के माध्यम से निर्धारित की जाती है। ₹2,000 से अधिक का भुगतान प्राप्त करने पर पी2पीएम जैसे छूट प्राप्त श्रेणियों के अंतर्गत काम करने वाले छोटे व्यापारियों पर कोई शुल्क नहीं लगता है। ₹2,000 से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेन-देन पर 0.4% का एमडीआर लागू होगा। ₹75,000 और उससे अधिक के लेन-देन के लिए, एमडीआर प्रति लेन-देन ₹300 तक सीमित रहेगा।

समर्पित लघु व्यापारी कोष के लिए विस्तृत रूपरेखा को कब अंतिम रूप दिया जाएगा?

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ सलाह मशविरा करके लघु व्यापारी निधि के लिए विस्तृत परिचालन फ्रेमवर्क को अगले तीन महीने के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा। इस सहयोगात्मक प्रक्रिया के माध्यम से पूंजी आवंटन के सटीक मानदंड, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और व्यापारी प्रोत्साहन संरचनाएं निर्धारित की जाएंगी। हितधारकों के साथ परामर्श से यह सुनिश्चित होगा कि योजना जमीनी स्तर पर वितरण संबंधी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान करे।

क्या शून्य एमडीआर का लाभ उठाने के लिए छोटे व्यापारी को जीएसटी के लिए पंजीकरण कराना जरूरी है?

नहीं, यूपीआई लेन-देन पर शून्य एमडीआर सुरक्षा का लाभ उठाने के लिए छोटे व्यापारियों को जीएसटी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। पी2पीएम श्रेणी के अंतर्गत शून्य-रेटेड प्रोसेसिंग की पात्रता मासिक संग्रहण सीमा (प्रति माह ₹1 लाख तक) और बैंक खाता वर्गीकरण की ओर से निर्धारित की जाती है, चाहे कर पंजीकरण की स्थिति कुछ भी हो। अनिवार्य वैधानिक कर सीमा से नीचे काम करने वाले सूक्ष्म उद्यम जीएसटी दस्तावेज प्रदान किए बिना डिजिटल भुगतान संसाधित कर सकते हैं। इससे अनौपचारिक सूक्ष्म व्यवसायों को डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ने में आने वाली नियामक अनुपालन संबंधी बाधाओं से छूट मिलती है।

अधिग्रहण करने वाले बैंक शून्य एमडीआर के लिए पात्र छोटे व्यापारियों (पी2पीएम) की पहचान कैसे करेंगे?

अधिग्रहण करने वाले बैंक और भुगतान सेवा प्रदाता, पी2पीएम श्रेणी के अंतर्गत आने वाले व्यापारियों के लिए प्रति माह ₹1 लाख की आने वाले लेन-देन सीमा की निगरानी के लिए लेन-देन गति जांच का इस्तेमाल करते हैं। लगातार 3 महीने तक प्रति माह ₹1 लाख से अधिक यूपीआई भुगतान का आने वाला क्रेडिट प्राप्त करने वाले व्यापारियों को औपचारिक रूप से पी2एम श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

क्या ग्रामीण क्षेत्रों में स्वीकार किए जाने वाले क्यूआर कोड भुगतानों पर शून्य एमडीआर लागू होता है?

हां, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पी2पीएम व्यापारियों की ओर से स्वीकार किए जाने वाले क्यूआर कोड भुगतानों पर शून्य एमडीआर लागू होता है। ग्रामीण भारत में डिजिटल तकनीक को प्रोत्साहन देना एक प्रमुख नीतिगत उद्देश्य बना हुआ है। सभी ग्रामीण दुकानदारों को सीमा छूट (₹2,000 से कम के भुगतान पर शून्य एमडीआर) का लाभ मिलेगा और प्रस्तावित समर्पित भुगतान प्रोत्साहन कोष के माध्यम से उन्हें अतिरिक्त मदद भी मिलेगी। इसके साथ ही, अधिग्रहण करने वाले बैंकों को ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे क्षेत्रीय दुकानदारों पर लागत का बोझ काफी कम हो जाएगा।

बड़े वाणिज्यिक लेन-देन के लिए कौन सा एमडीआर लागू होता है?

₹2,000/- से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेन-देन पर 0.4% का मामूली एमडीआर लागू किया जाएगा। ₹75,000/- और उससे अधिक के लेन-देन पर एमडीआर प्रति लेन-देन ₹300 तक सीमित रहेगा। यह 0.4% की दर क्रेडिट कार्ड या पेमेंट गेटवे जैसे वैकल्पिक भुगतान माध्यमों की तुलना में काफी कम है। इसके साथ ही, ₹2,000 की सीमा से कम के लेन-देन स्थापित व्यावसायिक संस्थाओं के लिए भी निःशुल्क रहेंगे। यह संतुलित दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि उद्यम व्यापारी सिस्टम के रखरखाव में उचित योगदान दें, साथ ही दैनिक लेन-देन लागत को भी बेहद कम रखें।

क्या बहुत अधिक राशि वाले यूपीआई भुगतान पर अधिकतम शुल्क की कोई सीमा है?

हां, बड़े लेन-देन करने वाले उद्यमों की सुरक्षा के लिए, ₹75,000 और उससे अधिक के भुगतानों पर प्रति लेन-देन पर ₹300 की अधिकतम शुल्क सीमा निर्धारित की गई है। उदाहरण के लिए, ₹1,00,000 के लेन-देन पर ₹400 का प्रतिशत-आधारित शुल्क नहीं लगेगा; बल्कि, शुल्क ₹300 की निर्धारित सीमा पर ही समाप्त हो जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होता है कि उच्च मूल्य के लेन-देन की लागत पूर्वानुमानित और प्रतिस्पर्धी बनी रहे।

प्रतिशत दर के बजाय निश्चित एमडीआर के लिए कौन सी विशिष्ट श्रेणियां पात्र हैं?

रेलवे, दूरसंचार सेवाएं, बीमा और ईंधन जैसी विशिष्ट व्यापारी श्रेणियों के लिए, 2,000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर प्रति लेन-देन 5 रुपये का एक समान मासिक दर (एमडीआर) लागू होगा। 0.4% की परिवर्तनीय दर लागू करने के बजाय, ये विशिष्ट क्षेत्र लेन-देन राशि की परवाह किए बिना 5 रुपये का निश्चित शुल्क अदा करेंगे। यह एक समान दर मॉडल महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाओं, उपयोगिता बिल संग्रह और ईंधन खुदरा जैसे कम लाभ वाले क्षेत्रों में लागत बढ़ोतरी को रोकता है। यह सुनिश्चित करता है कि आवश्यक उपभोक्ता सेवाएं कम लागत वाली और डिजिटल रूप से कुशल बनी रहें।

क्या एंटरप्राइज मर्चेंट एमडीआर का बोझ खरीददार पर डाल सकते हैं?

नहीं, यूपीआई के माध्यम से भुगतान स्वीकार करते समय पंजीकृत व्यापारी एमडीआर शुल्क ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि उपभोक्ता केवल निर्धारित मूल्य का ही भुगतान करें।

सटीक लेन-देन (जैसे, ₹5,000 बनाम ₹1,00,000) पर एमडीआर की गणना कैसे की जाती है?

एमडीआर की गणना लेन-देन मूल्य सीमा के आधार पर एक स्पष्ट और अनुमानित सूत्र का पालन करती है। ₹3,000 की खरीदारी पर, 0.4% की दर लागू करने पर व्यापारी की ओर से अपने अधिग्रहण बैंक को ₹12 का एमडीआर शुल्क देना होता है। ₹50,000 की खरीदारी पर, 0.4% शुल्क ₹200 के बराबर होता है। हालांकि, ₹1,00,000 की उच्च-मूल्य वाली खरीदारी के लिए, 0.4% की गणना (जो ₹400 के बराबर है) ₹300 की निश्चित अधिकतम सीमा से अधिक हो जाती है (₹75,000 और उससे अधिक के भुगतान के लिए प्रति लेन-देन ₹300 की निश्चित अधिकतम सीमा है। ₹2,000 से कम के किसी भी लेन-देन पर कोई एमडीआर नहीं लगता है)।

मर्चेंट को भुगतान की गई राशिलागू एमडीआरमर्चेंट की ओर से भुगतान किया गया एमडीआर
₹ 2,000₹ 0
₹ 3,0000.40% ₹ 12
₹ 50,000 0.40% ₹ 200
₹ 75,000 और उससे अधिकनिश्चित ₹ 300 ₹ 300

क्या एमडीआर यूपीआई या क्रेडिट लाइन से जुड़े क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किए गए लेन-देन पर लागू होता है?

क्रेडिट-लिंक्ड यूपीआई भुगतान, जैसे कि यूपीआई से जुड़े रुपे क्रेडिट कार्ड या पूर्व-स्वीकृत बैंक क्रेडिट लाइनें, अलग क्रेडिट उत्पाद नियमों के अंतर्गत संचालित होते हैं। चूंकि क्रेडिट-लिंक्ड लेन-देन में जारीकर्ता बैंकों की ओर से वित्तपोषित अल्पकालिक लोन शामिल होते हैं, इसलिए वे मानक क्रेडिट कार्ड दिशानिर्देशों का पालन करते हैं। इस संशोधन में चर्चा की गई एमडीआर विशेष रूप से यूजर्स खाते से व्यापारी खाते में सीधे किए जाने वाले यूपीआई लेन-देन पर लागू होती है।

यूपीआई के माध्यम से पूंजी बाजार लेन-देन पर कौन सी विशिष्ट एमडीआर दरें और सीमाएं लागू होती हैं?

म्यूचुअल फंड, प्रतिभूतियों, स्टॉकब्रोकरों और डीलरों को किए जाने वाले भुगतानों सहित पूंजी बाजार लेन-देन के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लेन-देन मूल्य का नाममात्र 0.02% निर्धारित किया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 है। औपचारिक वित्तीय बाजारों में खुदरा भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए यह शुल्क मानक वाणिज्यिक लेन-देन दरों से कम है।

इस पूंजी बाजार एमडीआर फ्रेमवर्क के अंतर्गत कौन सी संस्थाएं और लेन-देन के प्रकार शामिल हैं?

यह विशिष्ट एमडीआर श्रेणी पूंजी बाजारों में कार्यरत सभी विनियमित संस्थाओं को स्पष्ट रूप से कवर करती है, जिनमें एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (म्यूचुअल फंड), एसईबीआई-पंजीकृत स्टॉकब्रोकर, सिक्योरिटीज डीलर और निवेश प्लेटफॉर्म शामिल हैं। यह इक्विटी खरीद, डेट बाजार निवेश, म्यूचुअल फंड खरीद और ब्रोकर वॉलेट टॉप-अप के लिए यूपीआई के माध्यम से किए गए फंड ट्रांसफर पर लागू होता है। इस श्रेणी को अलग से परिभाषित करके, यह सुनिश्चित किया जाता है कि पूंजी बाजार ट्रांसफर नियमित खुदरा खरीदारी या सामान्य सेवा भुगतानों से अलग हों।

यह भी पढ़ें: 2000, 3000, 50000 से लेकर 75000 रुपये तक के UPI पेमेंट पर कितना लगेगा MDR, यहां जानिए पूरा कैलकुलेशन

क्या बीमा प्रीमियम भुगतान विशेष एमडीआर रियायतों के लिए पात्र हैं?

हां, यूपीआई के माध्यम से स्वीकार किए गए बीमा प्रीमियम भुगतान विशेष निश्चित-दर की छूट के पात्र हैं। ₹2,000 से अधिक के बीमा प्रीमियम भुगतान पर, प्रतिशत-आधारित शुल्क के बजाय प्रति लेन-देन ₹5 का निश्चित एमडीआर लागू होता है। यह रियायती मॉडल सुनिश्चित करता है कि उच्च मूल्य के वार्षिक या अर्ध-वार्षिक बीमा भुगतान करने वाले पॉलिसीधारकों को भारी बैकएंड शुल्क का सामना न करना पड़े। बीमा कंपनियों को कम लागत वाले डिजिटल संग्रह से लाभ होता है, जिससे पूरे भारत में बीमा कवरेज का विस्तार करने में मदद मिलती है।

यूपीआई के माध्यम से पेट्रोल पंपों पर ईंधन की खरीद के लिए एमडीआर कैसे काम करता है?

यूपीआई के माध्यम से पेट्रोल पंपों पर की गई ईंधन खरीद पर ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर ₹5 की एक समान रियायती दर लागू होती है। यह ₹5 की एक समान फीस पेट्रोल पंप संचालकों को टैंक रिफिल पर लगने वाले उच्च प्रोसेसिंग शुल्क से बचाती है। ₹2,000 से कम के सभी ईंधन भुगतानों पर एमडीआर 0% रहता है, जिससे रोजमर्रा के यात्रियों के लिए ईंधन भरना पूरी तरह से शुल्क-मुक्त हो जाता है, जबकि ईंधन स्टेशन संचालकों को ऐसे लेन-देन पर कोई एमडीआर नहीं देना पड़ता है।

क्या सरकारी उपयोगिता बिल संग्रह (बिजली, पानी) पर प्रतिशत एमडीआर लागू होगा?

बिजली वितरण, नगरपालिका जल शुल्क और पाइपलाइन की ओर से आपूर्ति की जाने वाली प्राकृतिक गैस जैसे सार्वजनिक उपयोगिता भुगतान निर्दिष्ट उद्योग कार्यक्रम श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। ₹2,000 से अधिक के उपयोगिता बिल भुगतानों पर 0.4% बदलाव दर के बजाय ₹5 का एक समान रियायती मासिक दर एमडीआर लागू होता है। ₹2,000 से कम के उपयोगिता लेन-देन पर कोई एमडीआर लागू नहीं होता है। यह फ्रेमवर्क सुनिश्चित करता है कि राज्य उपयोगिता बोर्ड और नगर निगम उच्च प्रसंस्करण शुल्क लगाए बिना बिल संग्रह को डिजिटल बना सकें, जिससे सार्वजनिक उपयोगिता सेवाएं सस्ती बनी रहें।

क्या शैक्षणिक संस्थान मानक एमडीआर प्रतिशत शुल्क से मुक्त हैं?

स्कूल ट्यूशन, विश्वविद्यालय सत्र शुल्क और संस्थागत प्रवेश परीक्षाओं सहित शैक्षणिक शुल्क संग्रह, निर्दिष्ट उद्योग कार्यक्रम श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर निश्चित-फीस संरचना या सीमित प्रोसेसिंग दरें लागू होती हैं, जिससे बड़ी राशि पर लगने वाले उच्च प्रतिशत-आधारित शुल्कों से बचा जा सकता है। ₹2,000 तक के शैक्षणिक लेन-देन पूरी तरह से एमडीआर से मुक्त हैं। यह उपाय सुनिश्चित करता है कि स्कूल, कॉलेज और छात्र भारी प्रशासनिक शुल्कों के बिना डिजिटल रूप से ट्यूशन फीस का भुगतान कर सकें।

MDR Charges Row: 96% मर्चेंट पेमेंट पर नहीं लगेगा कोई शुल्क! वित्त मंत्रालय ने बताया- UPI ट्रांजैक्शन पर कहां लगेगा चार्ज और कहां नहीं लगेगा?

UPI Charges Row: सरकार ने 15 अक्टूबर 2026 से बड़े व्यापारी भुगतान के लिए UPI लेनदेन पर नई शुल्क व्यवस्था लागू करने की घोषणा कर दी है। इसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर व्यापारियों से 0.4 प्रतिशत शुल्क लिया जाएगा। जबकि 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी। हालांकि, भुगतान करने वाले ग्राहकों को यह शुल्क नहीं देना होगा। सरकार का कहना है कि इसका बोझ दुकानदार या व्यापारी को उठाना पड़ेगा।

दो व्यक्तियों के बीच होने वाले पीयर-टू-पीयर (P2M) यूपीआई भुगतान पर किसी भी राशि के लिए कोई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR)शुल्क नहीं लगेगा। इसके अलावा 2,000 रुपये तक के छोटे व्यापारी लेनदेन भी शुल्क से बाहर रहेंगे। ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (MCR) वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले किसी व्यापारी से लिया जाता है।

96% मर्चेंट पेमेंट पर नहीं लगेगा कोई शुल्क!

सरकार के मुताबिक, व्यक्तियों से व्यापारियों को होने वाले कुल पी2एम लेनदेन की मात्रा में 2,000 रुपये से कम राशि वाले लेनदेन 95 प्रतिशत से भी अधिक हैं। वित्त मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए कहा, “96 प्रतिशत मर्चेंट ट्रांजैक्शन भी रकम की परवाह किए बिना शुल्क से मुक्त रहेंगे। ₹2,000 तक के मर्चेंट पेमेंट और छोटे व्यापारियों के लिए Zero-MDR व्यवस्था के तहत आने वाले ट्रांजैक्शन पर भी कोई शुल्क नहीं लगेगा।”

मंत्रालय के मुताबिक, इसका मतलब है कि लगभग 96 प्रतिशत Person-to-Merchant (P2M) ट्रांजैक्शन पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा। MDR केवल निर्धारित श्रेणी के ₹2,000 से अधिक मूल्य वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लागू होगा। वित्त मंत्रालय ने बयान में कहा, “यह शुल्क केवल 2,000 रुपये से अधिक के पी2एम लेनदेन पर ही 0.4 प्रतिशत की दर से लागू होगा।”

यहां लगेगा 5 रुपये का शुल्क

रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, फ्यूल और खेती के कच्चे माल जैसे जरूरी और कम मार्जिन वाले सेक्टर में 2,000 रुपये से अधिक के प्रत्येक लेनदेन पर पांच रुपये का एक समान शुल्क लगेगा। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण सेवाओं की लागत को विश्वसनीय बनाए रखना है। इन कैटेगरी की हिस्सेदारी पी2एम लेनदेन की मात्रा में करीब 17 प्रतिशत है। जबकि लेनदेन के मूल्य में लगभग 46 प्रतिशत है।

यही समान शुल्क व्यवस्था सरकारी उपयोगिता बिलों (बिजली, पानी और पाइप वाली गैस) के भुगतान तथा स्कूल फीस और विश्वविद्यालय शुल्क जैसे शैक्षणिक भुगतान पर भी लागू होगी। हालांकि 2,000 रुपये तक के ऐसे भुगतान इस शुल्क से मुक्त रहेंगे।

अधिकतम सीमा ₹300 होगी

म्यूचुअल फंड, सिक्योरिटीज और शेयर ब्रोकर एवं डीलर के जरिए किए गए पेमेंट पर 0.02% का MDR लगाया जाएगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 होगी। सरकार ने कहा है कि UPI ऐप प्रोवाइडर्स को डिजिटल प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए चार्ज लगाने की इजाजत नहीं होगी। बैंकों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे सुनिश्चित करें कि मर्चेंट इस नई फीस का बोझ ग्राहकों पर न डालें। इसके अलावा, पर्सनल UPI ट्रांजैक्शन के लिए मुफ्त ट्रांजैक्शन की संख्या पर कोई मासिक कोटा या सीमा नहीं होगी।

छोटे व्यापारियों को राहत!

यूपीआई क्यूआर कोड के जरिएहर महीने एक लाख रुपये तक पाने वाले छोटे व्यापारी नई व्यवस्था के तहत शून्य एमडीआर का लाभ लेते रहेंगे। यदि कोई व्यापारी लगातार तीन महीने तक एक लाख रुपये से अधिक का मासिक लेनदेन करता है, तो उसे सामान्य पी2एम कैटेगरी में रखा जाएगा। सरकार के अनुसार, नई व्यवस्था से केवल करीब चार प्रतिशत व्यापारी लेनदेन ही प्रभावित होंगे। इसकी वजह है कि अधिकांश लेनदेन या तो 2,000 रुपये की सीमा से कम हैं या पी2एम छूट के दायरे में आते हैं।

ऑटोपे पर कोई MDR नहीं

नया MDR नियम सिर्फ उन UPI ​​पेमेंट पर लागू होगा जो सीधे यूजर के बैंक अकाउंट से मर्चेंट के अकाउंट में किए जाते हैं। RuPay क्रेडिट कार्ड या पहले से मंजूर ‘क्रेडिट लाइन’ का इस्तेमाल करके UPI से किए गए पेमेंट के लिए अलग नियम होंगे। वहीं, यूटिलिटी बिल, OTT सब्सक्रिप्शन और रेगुलर इन्वेस्टमेंट के लिए ऑटोमेटेड बार-बार होने वाले पेमेंट जैसे UPI मैंडेट या ‘ऑटोपे पर कोई MDR नहीं लगेगा।

2020 से लागू है MDR चार्ज

MDR चार्ज व्यवस्था जनवरी, 2020 से लागू थी। इसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना था। हालांकि, बैंक और फिनटेक कंपनियां इसे टिकाऊ नहीं बताते हुए शुल्क फिर से लागू करने की लंबे समय से मांग कर रही थीं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) भी पहले सरकार से इस नीति की समीक्षा करने का आग्रह कर चुके हैं।

MDR सरकार या NPCI द्वारा वसूला जाने वाला टैक्स नहीं

वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि MDR को टैक्स या सरकार/NPCI द्वारा वसूला जाने वाला शुल्क नहीं समझना चाहिए। मंत्रालय के अनुसार, यह राशि पेमेंट इकोसिस्टम में शामिल विभिन्न पक्षों, जैसे बैंकों और पेमेंट ऐप प्रोवाइडर्स के बीच वितरित की जाती है। मंत्रालय ने कहा कि इसका उद्देश्य UPI सिस्टम के संचालन और उसके लगातार विस्तार को समर्थन देना है।

UPI को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने की कोशिश

मंत्रालय के मुताबिक, यह व्यवस्था Payment and Settlement Systems Act, 2007 के तहत ‘यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी’ में विस्तृत विचार-विमर्श के बाद लाई गई है। इसका उद्देश्य UPI इकोसिस्टम की स्थिरता और विस्तार सुनिश्चित करना है। साथ ही आम लोगों और छोटे व्यापारियों को अतिरिक्त शुल्क से बचाना है।

ये भी पढ़ें- UPI पर फीस से किसकी भरेगी तिजोरी? PhonePe, GPay और बैंकों में कैसे बंटेगा हिस्सा, जानें

UPI ट्रांजैक्शन पर कहां लगेगा चार्ज और कहां नहीं लगेगा?  

  • 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन पर कोई एमडीआर नहीं लगाया जाएगा।
  • 2,000 रुपये से अधिक के ग्राहक-से-व्यापारी लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा।
  • 3,000 रुपये की खरीदारी पर 0.4 प्रतिशत की दर से व्यापारी द्वारा जमाकर्ता बैंक को 12 रुपये का शुल्क देना होगा।
  • यह कमीशन बैंकों सहित पूरे पेमेंट इकोसिस्टम के पार्टनर्स के बीच बांटा जाएगा।
  • लेनदेन मूल्य की परवाह किए बिना व्यक्तियों के बीच होने वाले (पी2पी) लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।
  • ₹75,000 और उससे ज्यादा के बड़े पेमेंट के लिए MDR की सीमा हर ट्रांजैक्शन पर अधिक से अधिक ₹300 तय की जाएगी।
  • टेलीकॉम, इंश्योरेंस और फ्यूल जैसे जरूरी सेक्टर के लिए हर ट्रांजैक्शन पर ₹5 का फ़्लैट MDR लागू होगा।
  • म्यूचुअल फंड और स्टॉक ब्रोकर को किए जाने वाले भुगतान पर अधिकतम 300 रुपये की सीमा के साथ 0.02 प्रतिशत एमडीआर लगेगा।
  • प्रति माह एक लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों के लिए सभी लेनदेन पर अनिवार्य रूप से शून्य एमडीआर की सुविधा मिलेगी।
  • UPI ऐप सेवाओं पर स्टेज फीस या किसी भी तरह के छिपे हुए शुल्क लगाने पर रोक होगी।
  • बैंकों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि व्यापारी यूपीआई भुगतान के लिए उपभोक्ताओं पर एमडीआर शुल्क का बोझ न डालें।
  • व्यक्तियों के लिए मुफ्त यूपीआई लेनदेन पर कोई मासिक कोटा, मात्रा की सीमा नहीं होगी।
  • बैंकों और NPCI की ओर से लागू की गई रोजाना ट्रांज़ैक्शन की सीमाएं कैटेगरी के आधार पर ₹1 लाख से ₹5 लाख के दायरे में रहेंगी।
  • कुल एमडीआर कलेक्शन के पांच प्रतिशत योगदान के साथ छोटे व्यापारियों द्वारा यूपीआई के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष कोष स्थापित किया जाएगा।
  • एमडीआर लागू होने से केवल चार प्रतिशत मर्चेंट लेनदेन ही प्रभावित होंगे।
  • नया एमडीआर ढांचा 15 अक्टूबर, 2026 से प्रभावी होगा।

शेयर बाजारों में लगातार दूसरी गिरावट, सेंसेक्स 778 अंक लुढ़का

Stock Market

विदेशों से मिले नकारात्मक संकेतों के बीच घरेलू शेयर बाजारों में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन गिरावट रही और बीएसई का सेंसेक्स 778 अंक नीचे बंद हुआ।

सेंसेक्स करीब 588 अंक ऊपर 75,369.63 अंक पर खुला और एक समय 655 अंक चढ़ गया था। हालांकि कुछ ही देर बाद बाजार में बिकवाली शुरू हो गई और सेंसेक्स 73,994 अंक तक टूट गया। इस प्रकार इसमें 1,375 अंकों का उतार-चढ़ाव देखा गया। अंत में सेंसेक्स 777.94 अंक (1.04 प्रतिशत) नीचे 74,003.82 अंक पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी-50 सूचकांक भी कारोबार की समाप्ति पर 279.50 अंक यानी 1.19 प्रतिशत नीचे 23,118.60 अंक पर रहा।

बाजार में चौतरफा बिकवाली के बीच आईटी सेक्टर में लिवाली रही। निफ्टी आईटी सूचकांक 2.19 प्रतिशत ऊपर रहा। अन्य सभी सेक्टरों में बिकवाली का जोर रहा। रियल्टी समूह का सूचकांक 4.04 प्रतिशत, रसायन समूह का 3.42, धातु का 2.54 टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद का 2.41, मीडिया का 2.17, ऑटो का 2.01, वित्त का 1.83, बैंकिंग का 1.43, फार्मा का 1.30, तेल एवं गैस का 1.29 और स्वास्थ्य समूह का 1.17 प्रतिशत टूट गया। वृहत बाजार में मिडकैप-50 सूचकांक 2.08 फीसदी और स्मॉलकैप-100 सूचकांक 2.43 प्रतिशत नीचे बंद हुआ। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर बढ़ाने की आशंका में लगभग सभी प्रमुख एशियाई शेयर बाजार लाल निशान में रहे। यूरोपीय बाजार भी गिरावट में खुले।

Also Read : डिजिटल भुगतान पर मोदी सरकार का सबसे बड़ा यू टर्न: राहुल

सेंसेक्स की कंपनियों में बीईएल का शेयर सबसे ज्यादा छह प्रतिशत, इंडिगो का चार प्रतिशत और टाइटन, बजाज फिनसर्व तथा अडानी पोर्ट्स के तीन-तीन प्रतिशत लुढ़क गए। महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारतीय स्टेट बैंक, ट्रेंट, एशियन पेंट्स, बजाज फाइनेंस, इटरनल, अल्ट्राटेक सीमेंट, एक्सिस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक और पावरग्रिड के शेयर दो से तीन प्रतिशत नीचे बंद हुए। आईसीआईसीआई बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज, एलएंडटी और मारुति सुजुकी के शेयर एक से दो प्रतिशत तक गिरे। एनटीपीसी, आईटीसी और सन फार्मा के शेयर भी नुकसान में रहे।

सूचना एवं प्रौद्योगिकी कंपनी एचसीएल टेक्नोलॉजीज का शेयर करीब चार प्रतिशत और इंफोसिस का साढ़े तीन प्रतिशत से ज्यादा चढ़ा। टेक महिंद्रा और टीसीएस के शेयर दो प्रतिशत से ज्यादा मजबूत हुए। एचडीएफसी बैंक का शेयर सवा फीसदी मजबूत हुआ। हिंदुस्तान यूनीलिवर और टाटा स्टील के शेयर भी हरे निशान में रहे।

Pic Credit : ANI

डिजिटल भुगतान पर मोदी सरकार का सबसे बड़ा यू टर्न: राहुल

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के संसद में यूपीआई भुगतान पर कोई टैक्स या शुल्क नहीं लगाने के आश्वासन के बावजूद मोदी सरकार ने दो हजार रुपये से अधिक के यूपीआई कारोबारी लेनदेन पर शुल्क लगाने का रास्ता खोल दिया है।

श्री खरगे ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर लिखा ‘नो फीस ऑन यूपीआई’ को बदलकर अब ‘दो हजार रुपये तक के यूपीआई लेनदेन पर नो फीस’ कर दिया गया है। गगनचुंबी महंगाई से आम आदमी की जेब पहले ही खाली है और थोक महंगाई 10 प्रतिशत के करीब है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार जनता पर ‘डिजिटल पेमेंट्स टैक्स’ लगाकर उसकी बची-खुची बचत को भी तबाह करने की योजना बना रही है।

Also Read : ‘प्रेम कीटाणु’ का संगीत आज के दौर की प्लेलिस्ट जैसा: गौरव वर्मा

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि कई खबरों के मुताबिक पांच हजार रुपये के लेनदेन पर 25 रुपये और 10 हजार रुपये पर 50 रुपये तक की संभावित वसूली की जाएगी। उन्होंने सरकार से सवाल किया है कि ये खबरें क्या सही हैं।

श्री गांधी ने कहा कि अब दो हजार रुपये से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर लगाया जा सकता है। इन लेनदेन की संख्या भले ही केवल पांच प्रतिशत हो लेकिन यूपीआई के कुल लेनदेन मूल्य का करीब 65 प्रतिशत इन्हीं में है।

उन्होंने कहा “सरकार कहती है कि ग्राहक से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा लेकिन दुकानदार पर लगने वाली फीस आखिर आएगी कहां से-कीमतों में जुड़कर ग्राहक की जेब से। अमेरिकी भुगतान कंपनियां लंबे समय से भारत की शून्य-एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं और अब मोदी सरकार ने ठीक उसी दिशा में नीति बदलने का रास्ता खोल दिया है।

Pic Credit : ANI

₹2,000 तक के RuPay डेबिट कार्ड और UPI पेमेंट पर नहीं लगेगा कोई चार्ज, सरकार ने बैंकों को दिया निर्देश

Digital payments News: डिजिटल पेमेंट करने वाले लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। केंद्र सरकार ने निर्देश दिया है कि ₹2,000 तक के RuPay डेबिट कार्ड और UPI लेनदेन पर ग्राहकों से किसी भी तरह का शुल्क नहीं लिया जा सकता। यह रोक सीधे तौर पर ही नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से लगाए जाने वाले चार्ज पर भी लागू होगी। वित्त मंत्रालय के अनुसार, यह फैसला Payment and Settlement Systems Act, 2007 की धारा 10A के तहत लिया गया है। इसके तहत केंद्र सरकार ने बैंकों और सिस्टम प्रोवाइडर्स को निर्देश दिया है कि वे RuPay डेबिट कार्ड के जरिए भुगतान करने या भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्ति से कोई शुल्क न वसूलें।

न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक वित्त मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 (2007 का 51) की धारा 10A के अनुसार, केंद्र सरकार ने बैंकों और सिस्टम प्रोवाइडर्स को RuPay-पावर्ड डेबिट कार्ड और UPI के जरिए 2,000 रुपये तक के पेमेंट करने या लेने वाले व्यक्ति पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई भी चार्ज लगाने से रोक दिया है।”

UPI ट्रांजैक्शन पर भी लागू होगा नियम

सरकार का यह प्रावधान ₹2,000 तक के UPI लेनदेन पर भी लागू है। यानी इस लिमिट तक UPI के जरिए पैसे भेजने या प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर किसी प्रकार का चार्ज नहीं लगाया जा सकता।

इसका मकसद डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना। साथ ही छोटे मूल्य के लेनदेन को लोगों के लिए आसान और कम लागत वाला बनाए रखना है। खास तौर पर दुकानदारों, छोटे कारोबारियों और आम ग्राहकों के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटी रकम के डिजिटल भुगतान में एक्स्ट्रा चार्ज लगने से लोग कैश का इस्तेमाल करने की ओर वापस जा सकते हैं।

सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से चार्ज लेने पर भी रोक

वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि चार्ज पर रोक केवल सीधे तौर पर लगाए जाने वाले शुल्क तक सीमित नहीं है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी तरीके से शुल्क वसूलने की अनुमति नहीं होगी। इसका मतलब है कि बैंक या संबंधित सिस्टम प्रोवाइडर किसी अन्य चार्ज के नाम पर भी इस तरह के भुगतान की लागत ग्राहक पर डालने की कोशिश नहीं कर सकते।

छोटे डिजिटल पेमेंट को मिलेगा बढ़ावा

भारत में UPI और कार्ड के जरिए डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है। खासकर छोटी दुकानों, किराना स्टोर, रेहड़ी-पटरी और रोजमर्रा की खरीदारी में UPI का इस्तेमाल काफी बढ़ चुका है। ऐसे में ₹2,000 तक के भुगतान पर शुल्क नहीं होने से डिजिटल लेनदेन को और बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। सरकार की यह व्यवस्था डिजिटल भुगतान को सस्ता, सुविधाजनक और अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे ग्राहकों के साथ-साथ छोटे कारोबारियों को भी फायदा हो सकता है और कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा मिलेगा।

भारत में कितना होता डिजीटल ट्रांजेक्शन?

भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI) के जरिए डिजिटल ट्रांजैक्शन हर रोज नया रिकॉर्ड बना रहा है। NPCI (National Payments Corporation of India) के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक भारत में अगस्त 2026 में UPI पर 24,508.96 मिलियन यानी करीब 2,450.9 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए। यानी औसतन करीब 79 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन रोज हुए। इनकी कुल वैल्यू लगभग ₹29.82 लाख करोड़ रही। आपको जानकारी के लिए बता दें कि डिजिटल पेमेंट सिर्फ UPI नहीं होदा है। इसमें IMPS, NEFT, RTGS, कार्ड, FASTag आदि भी शामिल होते हैं।

ये भी पढ़ें- Monsoon Update: मानसून की विदाई के संकेत के बीच यूपी से गुजरात तक भारी बारिश का अलर्ट, IMD ने जारी की ये चेतावनी