Highest Paying Jobs: सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं, ये लोग कमा रहे लाखों! PG मालिक से चायवाले तक की लिस्ट वायरल

भारत में अक्सर युवाओं को बताया जाता है कि IIT की पढ़ाई, FAANG जैसी बड़ी टेक कंपनियों में नौकरी या Data Structures and Algorithms (DSA) में महारत हासिल करना अच्छी कमाई का सबसे आसान रास्ता है। लेकिन टेक और AI कमेंटेटर साक्षी ने सोशल मीडिया पर एक मजेदार लिस्ट शेयर कर इस सोच को ही उलट दिया। उन्होंने भारत में इस समय सबसे ज्यादा कमाई करने वाले लोगों की एक मजाकिया रैंकिंग साझा की, जिसमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर टॉप पर नहीं, बल्कि काफी पीछे नजर आए। इस लिस्ट में PG मालिक, मकान मालिक, पानी के टैंकर वाले और चाय-सिगरेट की दुकान चलाने वाले शामिल हैं।

नंबर-1 पर PG मालिक, एक कमरे से लाखों की कमाई

साक्षी की इस मजेदार रैंकिंग में सबसे ऊपर PG मालिक को रखा गया। उन्होंने बताया कि शहरों में बढ़ती नौकरी और किराए की मांग का फायदा PG के मालिकों को मिल रहा है। उनके मुताबिक, एक कमरे में तीन लोगों को रखा जाता है और हर व्यक्ति से करीब ₹10,000 से ₹15,000 तक किराया लिया जाता है। इस हिसाब से कुछ PG मालिक किराया और दूसरे खर्च निकालने के बाद भी ₹1 लाख से ₹1.5 लाख महीने तक कमा सकते हैं। यही वजह है कि पोस्ट में PG बिजनेस को आज के दौर के सबसे कमाई वाले कामों में से एक बताया गया।

बेंगलुरु के मकान मालिक भी पीछे नहीं

लिस्ट में तीसरे नंबर पर बेंगलुरु के मकान मालिक का जिक्र किया गया। टेक सिटी में किराए की बढ़ती मांग को लेकर अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चाएं होती रहती हैं। पोस्ट में मजाकिया अंदाज में बताया गया कि दो बेडरूम का फ्लैट खरीदकर उसे करीब ₹50,000 महीने के किराए पर देना, हर साल किराया बढ़ाना और WhatsApp पर सिर्फ ‘last price’ लिखकर बातचीत खत्म करना भी कमाई का शानदार तरीका बन गया है।

पानी के टैंकर वाले भी बने ‘बिजनेस किंग’

बेंगलुरु में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। इसी को लेकर साक्षी ने पानी के टैंकर संचालकों को भी अपनी लिस्ट में जगह दी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में लिखा कि ये लोग बेंगलुरु का ही पानी वापस बेंगलुरु के लोगों को बेचते हैं। पानी की कमी के समय टैंकरों की मांग बढ़ने से इस कारोबार की कमाई भी बढ़ जाती है।

ब्रोकरों की कमाई का भी किया जिक्र

रैंकिंग में प्रॉपर्टी ब्रोकर भी शामिल हैं। पोस्ट के मुताबिक, कुछ ब्रोकर किरायेदारों को कई ऐसे घर दिखाते हैं जो उनकी जरूरत के मुताबिक नहीं होते और आखिर में डील होने पर किरायेदार और मकान मालिक, दोनों से करीब एक महीने के किराए के बराबर कमीशन ले लेते हैं। बेंगलुरु जैसे शहरों में लगातार घर बदलने वाले किरायेदारों की बड़ी संख्या के कारण यह काम भी अच्छी कमाई वाला बताया गया।

टेक पार्क के बाहर चाय-सिगरेट वाला भी हिट

इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर जिस शख्स को रखा गया, वह शायद सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम है टेक पार्क के बाहर चाय, सिगरेट और स्नैक्स बेचने वाला दुकानदार। साक्षी ने उसे टेक इंडस्ट्री का ‘अनसंग हीरो’ बताया। उनके अनुसार, हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोजाना चाय, सिगरेट और स्नैक्स के लिए ऐसी दुकानों पर निर्भर रहते हैं। पोस्ट में अनुमान लगाया गया कि अच्छी लोकेशन वाली ऐसी दुकान से कुछ दुकानदार ₹30,000 से ₹50,000 महीने तक कमा सकते हैं।

न MBA, न फंडिंग, फिर भी कमाई!

इस पूरी पोस्ट का सबसे मजेदार हिस्सा यही था। चाय-सिगरेट की दुकान के लिए न किसी MBA की जरूरत है, न pitch deck की और न ही startup funding की। साक्षी ने इसी अंदाज में टेक इंडस्ट्री पर तंज कसते हुए बताया कि जहां इंजीनियर नौकरी और प्रमोशन के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं, वहीं कुछ छोटे कारोबारी रोजमर्रा की जरूरतों के दम पर अच्छी कमाई कर रहे हैं।

सॉफ्टवेयर इंजीनियरों पर आया सबसे बड़ा तंज

पोस्ट के अंत में सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को लेकर सबसे मजेदार टिप्पणी की गई। साक्षी ने लिखा कि जब बाकी लोग अलग-अलग तरीकों से कमाई कर रहे हैं, तब सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात 2 बजे तक DSA के सवाल हल कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि अगली salary hike अच्छी होगी।

सोशल मीडिया यूजर्स ने भी लिए मजे

साक्षी की पोस्ट को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और इसे खबर लिखने तक 1.5 लाख से ज्यादा व्यूज मिले। यूजर्स ने भी अपने-अपने अंदाज में इस रैंकिंग पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने मजाक करते हुए कहा कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कमाई का सबसे मुश्किल रास्ता चुना है और उन्हें DSA की तैयारी के बजाय पानी का टैंकर खरीद लेना चाहिए था। एक अन्य यूजर ने बेंगलुरु का असली ‘product-market fit’ AI या सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि चाय, प्रॉपर्टी और मेट्रो से दूरी का गणित बताया। एक यूजर ने टैक्स को लेकर भी तंज कसा और कहा कि इन कामों में कमाई करने वालों में शायद सॉफ्टवेयर इंजीनियर ही ऐसा व्यक्ति है जो नियमित रूप से इनकम टैक्स और ITR जैसी चीजों से जूझता है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

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Google में भर्ती करने वाली एक्सपर्ट ने बताया ऐसा सवाल, जो आपको बाकी उम्मीदवारों से बना देगा अलग

कई लोग नौकरी के इंटरव्यू की तैयारी करते समय अपने रिज्यूमे, अनुभव और संभावित सवालों पर पूरा ध्यान देते हैं। वहीं, इंटरव्यू के अंत में जब उम्मीदवार से पूछा जाता है कि “क्या आपके मन में कोई सवाल है?”, तो अधिकतर लोग इसे सिर्फ एक औपचारिकता मानते हैं। ऐसे में वे सैलरी, छुट्टियों, प्रमोशन या ऑफिस की सुविधाओं से जुड़े सामान्य सवाल पूछकर इंटरव्यू खत्म कर देते हैं। हालांकि, करियर विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरव्यू का यह आखिरी हिस्सा आपकी सोच, काम के प्रति नजरिया और प्रोफेशनल एटीट्यूड दिखाने का बेहतरीन मौका होता है।

सही सवाल न केवल इंटरव्यूअर पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, बल्कि ये भी दिखाता है कि आप केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि कंपनी की जरूरतों और अपनी भूमिका को समझने में भी रुचि रखते हैं। कई बार एक अच्छा सवाल आपकी छवि को अन्य उम्मीदवारों से अलग बना सकता है और चयन की संभावनाएं भी बढ़ा सकता है।

10 साल का भर्ती का अनुभव

फराह शारगी ने पिछले एक दशक में Google, Uber और The New York Times जैसी बड़ी कंपनियों में भर्ती की है। उनका कहना है कि इंटरव्यू के अंतिम मिनटों में उम्मीदवारों के सवाल ये बताते हैं कि वो सिर्फ नौकरी चाहते हैं या वास्तव में कंपनी की जरूरत को भी समझना चाहते हैं। उनके मुताबिक, इंटरव्यू के अंत तक रिक्रूटर उम्मीदवार की तकनीकी क्षमता का काफी हद तक आकलन कर चुका होता है। इसके बाद वह उम्मीदवार की सोच और काम करने के नजरिए को समझना चाहता है।

वह एक सवाल जो बना सकता है आपको सबसे अलग

फराह शारगी के अनुसार, सबसे प्रभावशाली सवाल यह है:

“इस समय सबसे बड़ी समस्या क्या है, जिसे हल करने के लिए आप इस पद पर किसी को नियुक्त करना चाहते हैं?” उनका कहना है कि कंपनियां सिर्फ पद भरने के लिए भर्ती नहीं करतीं। हर नई भर्ती के पीछे कोई न कोई समस्या होती है, जिसे कंपनी हल करना चाहती है। जो उम्मीदवार इस नजरिए से सवाल पूछता है, वह दिखाता है कि वो पहले से ही खुद को उस भूमिका में सोच रहा है।

क्यों पसंद आता है यह सवाल?

शारगी के मुताबिक, जब उम्मीदवार इस तरह का सवाल ईमानदारी से पूछता है, तो वह भीड़ से अलग नजर आता है। इससे रिक्रूटर को लगता है कि यह व्यक्ति सिर्फ नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि कंपनी की समस्या सुलझाने के लिए भी तैयार है।

ये 3 सवाल भी छोड़ते हैं अच्छा प्रभाव

फराह शारगी ने इंटरव्यू के दौरान पूछे जाने वाले तीन और उपयोगी सवाल बताए हैं:

एक साल बाद आपको कैसे लगेगा कि इस पद के लिए सही व्यक्ति चुना गया?

आपकी टीम में ऐसा कौन-सा कर्मचारी है, जिसकी तरह आप एक और व्यक्ति चाहते हैं?

इस नौकरी का कौन-सा हिस्सा है, जिसे लोग अक्सर कम आंकते हैं?

इन सवालों से क्या फायदा होगा?

इन सवालों के जरिए उम्मीदवार यह समझ सकता है कि:

कंपनी सफलता को कैसे मापती है।

टीम में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले लोगों की क्या खासियत होती है।

इस भूमिका में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं।

इंटरव्यू को सिर्फ परीक्षा नहीं, सीखने का मौका समझें

फराह शारगी का कहना है कि इंटरव्यू केवल खुद को साबित करने का मंच नहीं है। इसे कंपनी की जरूरतों और उस समस्या को समझने का अवसर भी मानना चाहिए, जिसे हल करने के लिए आपको नियुक्त किया जा सकता है। यही सोच उम्मीदवार को दूसरों से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाती है।

‘नारायण मूर्ति की बात सुनकर ज्यादा घंटे किया ऑफिस में काम, फिर भी 5% मिली हाइक, डेलॉइट के कर्मचारी ने 10 साल बाद छोड़ी नौकरी

लगभग एक दशक तक, अर्जुन सिंह (पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है) को लगता था कि वे अपना पूरा करियर डेलॉइट (Deloitte) में ही बिताएंगे। हैदराबाद के रहने वाले इस टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल ने कॉलेज से निकलते ही इस बड़ी कंसल्टिंग कंपनी में नौकरी शुरू की थी। वे कंपनी के उस मज़बूत लॉन्ग-टर्म विज़न से सहमत थे, जिसमें कड़ी मेहनत करके आगे बढ़ने की बात कही जाती है।

लेकिन कंपनी में 10 साल बिताने के बाद, यह सीनियर कंसल्टेंट बुरी तरह थक-हारकर (बर्नआउट की स्थिति में) और सिर्फ़ पांच प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी के साथ नौकरी छोड़कर चला गया। अपने फ़ैसले के बारे में बात करते हुए, 30-35 साल की उम्र के इस टेक प्रोफेशनल ने ‘मनीकंट्रोल’ को बताया कि बर्नआउट, उम्मीदों का असलियत से दूर होना और मेहनत व इनाम के बीच बढ़ती दूरी ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जबकि वे सालों से कंपनी के प्रति वफ़ादार रहे थे।

सिंह ने कहा, “मैंने नारायण मूर्ति की कही बातों से भी ज़्यादा घंटे काम किया, फिर भी मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और सैलरी में सिर्फ़ पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली।” उन्होंने इन्फोसिस के को-फ़ाउंडर का ज़िक्र किया, जिनके 70 घंटे के वर्क-वीक (हफ़्ते में 70 घंटे काम) वाले बयान ने वर्क कल्चर पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। उन्होंने आगे बताया कि कई बार वे हफ़्ते में 74 घंटे तक काम करते थे।

कई प्रोफेशनल्स के उलट, जो कुछ सालों में कंपनियां बदलते रहते हैं, सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी डेलॉइट (Deloitte) छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कहा, “जब आप युवा होते हैं, तो सीनियर लीडर्स को देखकर यह सोचना आसान होता है कि ‘एक दिन, मैं भी उनकी जगह हो सकता हूं।'”

सिंह के अनुसार, जब वे एक फ्रेशर के तौर पर शामिल हुए, तो डेलॉइट का पार्टनरशिप मॉडल और एक ही ऑर्गनाइज़ेशन में पूरा करियर बिताने की संभावना उन्हें काफी आकर्षक लगी। समय के साथ, सीखने के मौके, बड़े क्लाइंट प्रोजेक्ट्स, प्रमोशन और सीनियर साथियों से मिली मेंटरशिप ने उन्हें कंपनी में बने रहने के लिए काफी वजहें दीं।

उन्होंने कहा, “आप पहले ही दिन यह तय नहीं करते कि आपको कहीं 10 साल तक रहना है। आप हर साल वहां बने रहने का फैसला करते हैं।”सिंह का मानना ​​है कि कंसल्टिंग में सबसे बड़ी चुनौती ज़रूरी नहीं कि क्लाइंट का काम ही हो, बल्कि टाइट डेडलाइन, कम स्टाफ वाले प्रोजेक्ट्स और बिलिंग वाले काम के अलावा अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का मेल है।

उनके अनुसार, जिन प्रोजेक्ट्स के लिए असल में छह महीने में छह लोगों की ज़रूरत होती है, उनसे अब कॉम्पिटिशन के दबाव के कारण कम समय में छोटी टीमों द्वारा पूरा किए जाने की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा, “अचानक छह लोगों की जगह चार लोग हो जाते हैं और समय सीमा भी पांच महीने की हो जाती है।”

हालांकि क्लाइंट के काम का अपना दबाव होता था, लेकिन सिंह ने कहा कि कर्मचारियों से इंटरनल पहलों, हायरिंग गतिविधियों, प्रपोज़ल बनाने और प्रैक्टिस-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में भी योगदान देने की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कर्मचारी पदानुक्रम (hierarchy) में ऊपर बढ़ते हैं, ऐसे कामों में भाग लेने की उम्मीद और मज़बूत होती जाती है।

सिंह ने कहा, “जैसे-जैसे आप रैंक में ऊपर बढ़ते हैं, इस तरह के ‘मुफ़्त’ काम (बिना बिलिंग वाले काम) और भी ज़्यादा होते जाते हैं।” सिंह के अनुसार, बर्नआउट (काम के तनाव से पूरी तरह थक जाने) की एक बड़ी वजह काम से अलग न हो पाना था। उन्हें याद है कि वे सोशल गैदरिंग के दौरान भी काम के फ़ोन कॉल लेते थे, कई काम के डिवाइस साथ रखते थे और ऑफ़िस के समय के बाद भी उपलब्ध रहते थे।

सिंह ने कहा कि कंसल्टिंग मॉडल अक्सर ऐसा माहौल बनाता है जहां कर्मचारियों को क्लाइंट की डेडलाइन, अंदरूनी कमिटमेंट और बिज़नेस बढ़ाने की कोशिशों के बीच लगातार तालमेल बिठाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह होता है कि काम ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्सों पर हावी होने लगता है।

उन्होंने कहा, “आप हर समय काम में ही लगे रहते हैं।”हालांकि लंबे समय तक काम करना मुश्किल था, लेकिन सिंह ने कहा कि उन्हें ज़्यादा निराशा इस सोच से होती थी कि बहुत ज़्यादा मेहनत करने पर भी इनाम में बहुत मामूली फ़र्क ही मिलता था। उनके अनुसार, अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में अक्सर उतनी ही बढ़ोतरी होती थी, जितनी उन साथियों की होती थी जो काम और निजी ज़िंदगी के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखते थे।

उन्होंने कहा, “इस साल लोगों की सैलरी में 5 परसेंट से भी कम बढ़ोतरी हुई।” उन्होंने यह भी कहा कि औसत और बेहतरीन परफॉर्मेंस के बीच का अंतर अक्सर बहुत कम लगता था। “जब काम की पहचान या तारीफ़ नहीं होती, तो इंसान थककर हार मान लेता है (बर्नआउट)।”

उन्होंने क्लाइंट के लिए डिटेल्ड प्रपोज़ल तैयार करने के लिए टेक्निकल स्टाफ़ पर डेलॉइट की निर्भरता की भी आलोचना की। उनका तर्क था कि इसके बजाय डेडिकेटेड सेल्स टीमों को यह काम संभालना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता।

उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता। सिंह ने कहा, “बदलाव किसी एक बुरे प्रोजेक्ट या मुश्किल मैनेजर की वजह से नहीं आया। यह धीरे-धीरे हुआ।”

समय के साथ, उन्हें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या उसी रास्ते पर चलते रहने से उन्हें अपने करियर के अगले चरण में वे अनुभव मिल पाएंगे जिनकी उन्हें तलाश थी। इसके बाद सिंह हैदराबाद की एक दूसरी कंपनी में शामिल हो गए। उनके अनुसार, नई भूमिका में बेहतर सैलरी तो मिलती ही है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उन्हें अपने समय और वर्क-लाइफ़ बैलेंस पर ज़्यादा कंट्रोल मिलता है।

पीछे मुड़कर देखने पर, उन्हें डेलॉइट में बिताए अपने दस सालों का कोई अफ़सोस नहीं है। “बल्कि, उन दस सालों ने मुझे अनुभव, आत्मविश्वास और नज़रिया दिया, जिससे मुझे यह समझ आया कि अब एक अलग रास्ता चुनने का सही समय आ गया है।” सिंह के लिए, नौकरी छोड़ने का मतलब किसी सपने को छोड़ना नहीं था। इसका मतलब यह समझना था कि 22 साल की उम्र में सफलता की जो परिभाषा उनके मन में थी, वह 35 साल की उम्र में वैसी नहीं रही।

‘नारायण मूर्ति की बात सुनकर ज्यादा घंटे किया ऑफिस में काम, फिर भी 5% मिली हाइक, डेलॉइट के कर्मचारी ने 10 साल बाद छोड़ी नौकरी

लगभग एक दशक तक, अर्जुन सिंह (पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है) को लगता था कि वे अपना पूरा करियर डेलॉइट (Deloitte) में ही बिताएंगे। हैदराबाद के रहने वाले इस टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल ने कॉलेज से निकलते ही इस बड़ी कंसल्टिंग कंपनी में नौकरी शुरू की थी। वे कंपनी के उस मज़बूत लॉन्ग-टर्म विज़न से सहमत थे, जिसमें कड़ी मेहनत करके आगे बढ़ने की बात कही जाती है।

लेकिन कंपनी में 10 साल बिताने के बाद, यह सीनियर कंसल्टेंट बुरी तरह थक-हारकर (बर्नआउट की स्थिति में) और सिर्फ़ पांच प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी के साथ नौकरी छोड़कर चला गया। अपने फ़ैसले के बारे में बात करते हुए, 30-35 साल की उम्र के इस टेक प्रोफेशनल ने ‘मनीकंट्रोल’ को बताया कि बर्नआउट, उम्मीदों का असलियत से दूर होना और मेहनत व इनाम के बीच बढ़ती दूरी ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जबकि वे सालों से कंपनी के प्रति वफ़ादार रहे थे।

सिंह ने कहा, “मैंने नारायण मूर्ति की कही बातों से भी ज़्यादा घंटे काम किया, फिर भी मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और सैलरी में सिर्फ़ पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली।” उन्होंने इन्फोसिस के को-फ़ाउंडर का ज़िक्र किया, जिनके 70 घंटे के वर्क-वीक (हफ़्ते में 70 घंटे काम) वाले बयान ने वर्क कल्चर पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। उन्होंने आगे बताया कि कई बार वे हफ़्ते में 74 घंटे तक काम करते थे।

कई प्रोफेशनल्स के उलट, जो कुछ सालों में कंपनियां बदलते रहते हैं, सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी डेलॉइट (Deloitte) छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कहा, “जब आप युवा होते हैं, तो सीनियर लीडर्स को देखकर यह सोचना आसान होता है कि ‘एक दिन, मैं भी उनकी जगह हो सकता हूं।'”

सिंह के अनुसार, जब वे एक फ्रेशर के तौर पर शामिल हुए, तो डेलॉइट का पार्टनरशिप मॉडल और एक ही ऑर्गनाइज़ेशन में पूरा करियर बिताने की संभावना उन्हें काफी आकर्षक लगी। समय के साथ, सीखने के मौके, बड़े क्लाइंट प्रोजेक्ट्स, प्रमोशन और सीनियर साथियों से मिली मेंटरशिप ने उन्हें कंपनी में बने रहने के लिए काफी वजहें दीं।

उन्होंने कहा, “आप पहले ही दिन यह तय नहीं करते कि आपको कहीं 10 साल तक रहना है। आप हर साल वहां बने रहने का फैसला करते हैं।”सिंह का मानना ​​है कि कंसल्टिंग में सबसे बड़ी चुनौती ज़रूरी नहीं कि क्लाइंट का काम ही हो, बल्कि टाइट डेडलाइन, कम स्टाफ वाले प्रोजेक्ट्स और बिलिंग वाले काम के अलावा अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का मेल है।

उनके अनुसार, जिन प्रोजेक्ट्स के लिए असल में छह महीने में छह लोगों की ज़रूरत होती है, उनसे अब कॉम्पिटिशन के दबाव के कारण कम समय में छोटी टीमों द्वारा पूरा किए जाने की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा, “अचानक छह लोगों की जगह चार लोग हो जाते हैं और समय सीमा भी पांच महीने की हो जाती है।”

हालांकि क्लाइंट के काम का अपना दबाव होता था, लेकिन सिंह ने कहा कि कर्मचारियों से इंटरनल पहलों, हायरिंग गतिविधियों, प्रपोज़ल बनाने और प्रैक्टिस-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में भी योगदान देने की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कर्मचारी पदानुक्रम (hierarchy) में ऊपर बढ़ते हैं, ऐसे कामों में भाग लेने की उम्मीद और मज़बूत होती जाती है।

सिंह ने कहा, “जैसे-जैसे आप रैंक में ऊपर बढ़ते हैं, इस तरह के ‘मुफ़्त’ काम (बिना बिलिंग वाले काम) और भी ज़्यादा होते जाते हैं।” सिंह के अनुसार, बर्नआउट (काम के तनाव से पूरी तरह थक जाने) की एक बड़ी वजह काम से अलग न हो पाना था। उन्हें याद है कि वे सोशल गैदरिंग के दौरान भी काम के फ़ोन कॉल लेते थे, कई काम के डिवाइस साथ रखते थे और ऑफ़िस के समय के बाद भी उपलब्ध रहते थे।

सिंह ने कहा कि कंसल्टिंग मॉडल अक्सर ऐसा माहौल बनाता है जहां कर्मचारियों को क्लाइंट की डेडलाइन, अंदरूनी कमिटमेंट और बिज़नेस बढ़ाने की कोशिशों के बीच लगातार तालमेल बिठाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह होता है कि काम ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्सों पर हावी होने लगता है।

उन्होंने कहा, “आप हर समय काम में ही लगे रहते हैं।”हालांकि लंबे समय तक काम करना मुश्किल था, लेकिन सिंह ने कहा कि उन्हें ज़्यादा निराशा इस सोच से होती थी कि बहुत ज़्यादा मेहनत करने पर भी इनाम में बहुत मामूली फ़र्क ही मिलता था। उनके अनुसार, अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में अक्सर उतनी ही बढ़ोतरी होती थी, जितनी उन साथियों की होती थी जो काम और निजी ज़िंदगी के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखते थे।

उन्होंने कहा, “इस साल लोगों की सैलरी में 5 परसेंट से भी कम बढ़ोतरी हुई।” उन्होंने यह भी कहा कि औसत और बेहतरीन परफॉर्मेंस के बीच का अंतर अक्सर बहुत कम लगता था। “जब काम की पहचान या तारीफ़ नहीं होती, तो इंसान थककर हार मान लेता है (बर्नआउट)।”

उन्होंने क्लाइंट के लिए डिटेल्ड प्रपोज़ल तैयार करने के लिए टेक्निकल स्टाफ़ पर डेलॉइट की निर्भरता की भी आलोचना की। उनका तर्क था कि इसके बजाय डेडिकेटेड सेल्स टीमों को यह काम संभालना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता।

उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता। सिंह ने कहा, “बदलाव किसी एक बुरे प्रोजेक्ट या मुश्किल मैनेजर की वजह से नहीं आया। यह धीरे-धीरे हुआ।”

समय के साथ, उन्हें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या उसी रास्ते पर चलते रहने से उन्हें अपने करियर के अगले चरण में वे अनुभव मिल पाएंगे जिनकी उन्हें तलाश थी। इसके बाद सिंह हैदराबाद की एक दूसरी कंपनी में शामिल हो गए। उनके अनुसार, नई भूमिका में बेहतर सैलरी तो मिलती ही है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उन्हें अपने समय और वर्क-लाइफ़ बैलेंस पर ज़्यादा कंट्रोल मिलता है।

पीछे मुड़कर देखने पर, उन्हें डेलॉइट में बिताए अपने दस सालों का कोई अफ़सोस नहीं है। “बल्कि, उन दस सालों ने मुझे अनुभव, आत्मविश्वास और नज़रिया दिया, जिससे मुझे यह समझ आया कि अब एक अलग रास्ता चुनने का सही समय आ गया है।” सिंह के लिए, नौकरी छोड़ने का मतलब किसी सपने को छोड़ना नहीं था। इसका मतलब यह समझना था कि 22 साल की उम्र में सफलता की जो परिभाषा उनके मन में थी, वह 35 साल की उम्र में वैसी नहीं रही।