₹1 करोड़ सालाना की नौकरी छोड़कर खेती की राह चुनी, Uber India की पूर्व CMO ने बताया सफल होने का तरीका

कभी करोड़ों रुपये की कॉर्पोरेट दुनिया का हिस्सा रहीं अवनी गुप्ता ने आज अपनी जिंदगी का रास्ता पूरी तरह बदल लिया है। बड़े ब्रांड्स में ऊंचे पदों पर काम करने के बाद अब वह पंचकूला के पास एक पर्माकल्चर फार्म में प्रकृति के बीच रह रही हैं। यहां न चमकदार ऑफिस है, न मीटिंग्स का दबाव और न ही शहर जैसी भागदौड़। चारों तरफ हजारों पेड़, अलग-अलग तरह की फसलें और मिट्टी से बना उनका साधारण घर है। खास बात यह है कि उन्होंने यह बदलाव अचानक नौकरी छोड़कर नहीं किया। इस नई जिंदगी की तैयारी करीब 12 साल पहले शुरू हो गई थी।

कॉर्पोरेट करियर के दौरान ही उन्होंने और उनके पति ने जमीन खरीदी और धीरे-धीरे फार्म लाइफ को समझना शुरू किया। मुंबई से गुरुग्राम और फिर पंचकूला तक का सफर तय करने के बाद उन्होंने आखिरकार शहर की नौकरी वाली जिंदगी को पीछे छोड़कर फार्म को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया।

20 हजार रुपये से शुरू हुआ सफर

गुप्ता ने 1997 में यूनिलीवर से अपने करियर की शुरुआत की थी। उस समय उनकी मासिक कमाई करीब 20 हजार रुपये थी। आगे चलकर उन्होंने Colgate-Palmolive, Axis Bank, Clix Capital और Uber जैसी कंपनियों में बड़े पद संभाले। Uber छोड़ने तक उनकी सालाना कमाई करीब 1 करोड़ रुपये पहुंच चुकी थी।

इसके बावजूद उन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया से दूरी बनाने का फैसला किया। उनका कहना है कि नौकरी छोड़ते समय उन्हें ऐसा नहीं लगा कि वह पैसा छोड़ रही हैं, क्योंकि मानसिक रूप से वह पहले ही उस जीवन से आगे बढ़ चुकी थीं।

नौकरी छोड़ने से पहले जमीन पर शुरू कर दी थी तैयारी

गुप्ता और उनके पति ने 2010 में हरियाणा में जमीन खरीदी। उस वक्त दोनों अपने करियर के अच्छे दौर में थे। उन्होंने तुरंत शहर छोड़ने के बजाय धीरे-धीरे फार्म पर समय बिताना शुरू किया। पहले मुंबई से गुरुग्राम आए, फिर पंचकूला में दो साल रहे और आखिरकार फार्म को अपना स्थायी घर बना लिया। इस दौरान उन्हें यह समझने का मौका मिला कि ग्रामीण जीवन वास्तव में उनके लिए सही है या नहीं।

खेती को सिर्फ कमाई का जरिया समझना बड़ी भूल

गुप्ता का कहना है कि सिर्फ खेती करके कॉर्पोरेट सैलरी जैसी कमाई की उम्मीद करना सही नहीं है। उदाहरण के तौर पर, ऑर्गेनिक पालक का एक बंडल सीधे ग्राहक को करीब 40 रुपये में बिक सकता है, लेकिन थोक बाजार में इसकी कीमत काफी कम हो सकती है। इसीलिए उन्होंने फार्म की कमाई को एक ही स्रोत पर निर्भर नहीं रखा। बीजों की ऑनलाइन बिक्री, फार्म स्टे, टूर, ट्रेनिंग, कंसल्टेंसी, यूट्यूब और अतिरिक्त उपज बेचने समेत कई माध्यमों से आमदनी होती है।

यहां Blinkit-Zomato नहीं, मौसम तय करता है तनाव

फार्म लाइफ बाहर से जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी आसान नहीं है। यहां तुरंत डिलीवरी, आसान कचरा प्रबंधन और शहर जैसी सुविधाएं नहीं हैं। सामाजिक मेल-जोल भी कम हो सकता है। गुप्ता के मुताबिक, कॉर्पोरेट जीवन का तनाव अब मौसम और फसलों से जुड़ गया है। तेज बारिश से बाढ़ की चिंता होती है और बारिश कम हो तो खेती प्रभावित होने का डर रहता है।

उनका मंत्र- पहले आजमाएं, फिर नौकरी छोड़ें

गुप्ता का सबसे अहम संदेश उन लोगों के लिए है जो कॉर्पोरेट जिंदगी छोड़कर गांव या फार्म पर बसने का सपना देखते हैं। उनका कहना है कि इसे अचानक फैसला बनाने के बजाय नौकरी के साथ-साथ धीरे-धीरे तैयार करना चाहिए। उनके मुताबिक, ग्रामीण जीवन को सोशल मीडिया की खूबसूरत तस्वीरों से नहीं, उसकी वास्तविक चुनौतियों के साथ समझना जरूरी है। तभी यह बदलाव किसी पलायन के बजाय सोच-समझकर चुनी गई नई जिंदगी बन सकता है।

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नौकरी के लिए AI का इस्तेमाल कर रहे हैं? ऐनी हैथवे ने बताई वो गलती, जो आपका मौका छीन सकती है

ऑस्कर विजेता अभिनेत्री Anne Hathaway ने नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को AI के इस्तेमाल को लेकर एक अहम सलाह दी है। उन्होंने अपने एक हालिया हायरिंग अनुभव को याद करते हुए बताया कि इंटरव्यू के बाद उम्मीदवारों ने उन्हें Thank-You Notes भेजे, लेकिन सभी संदेश लगभग बिल्कुल एक जैसे थे।

Hathaway के मुताबिक, शुरुआत में एक संदेश उन्हें काफी प्रोफेशनल और सोच-समझकर लिखा हुआ लगा। लेकिन जब बाकी उम्मीदवारों के संदेश भी उसी भाषा और अंदाज में आने लगे, तो उन्हें समझ आ गया कि इनमें AI की मदद ली गई थी।

‘मैं पहचान सकती हूं’

Hathaway ने कहा कि नौकरी पाने के लिए AIपर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने वाले उम्मीदवारों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि सामने वाला इसे पहचान नहीं पाएगा। उनका कहना था कि उम्मीदवार भले ही सोचें कि उन्होंने AI के इस्तेमाल को छिपा लिया है, लेकिन कई बार उनके लिखने के तरीके से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

Meryl Streep ने भी दी सीधी सलाह

इस बातचीत के दौरान मौजूद Meryl Streep ने भी उम्मीदवारों को खुद लिखने की सलाह दी। उनका मानना था कि किसी खास नौकरी या अवसर के लिए भेजे जाने वाले व्यक्तिगत संदेश में उम्मीदवार की अपनी आवाज और व्यक्तित्व नजर आना चाहिए। Streep ने यहां तक कहा कि अगर कोई उम्मीदवार Anne Hathaway को AI से लिखा हुआ Thank-You Note भेजता है, तो यह उसके चयन की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।

नौकरी की तलाश में बढ़ रहा AI का इस्तेमाल

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब नौकरी तलाशने वाले लोग Resume, Cover Letter और Interview के बाद भेजे जाने वाले संदेश तैयार करने के लिए तेजी से AIटूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। AI समय बचाने और भाषा को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन Hathaway और Streep की बात का सार यही है कि नौकरी के लिए भेजे जाने वाले व्यक्तिगत संदेश में आपकी अपनी आवाज सबसे ज्यादा मायने रखती है।

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CEO के देर से आने पर उम्मीदवार ने नहीं दिया इंटरव्यू, कंपनी को किया रिजेक्ट; जानें क्या लिखा ईमेल में

नौकरी के इंटरव्यू में अक्सर उम्मीदवारों से समय पर पहुंचने और प्रोफेशनल व्यवहार की उम्मीद की जाती है। लेकिन अगर इंटरव्यू लेने वाला ही तय समय से काफी देर से पहुंचे तो? सोशल मीडिया पर वायरल एक ईमेल ने इसी सवाल को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक उम्मीदवार ने कथित तौर पर CEOको ईमेल भेजकर इंटरव्यू ही ठुकरा दिया।

2 बजे था इंटरव्यू, उम्मीदवार आधे घंटे पहले पहुंचा

वायरल स्क्रीनशॉट में ईमेल का विषय लिखा है, “Reason for My Rejection of Your Interview”। उम्मीदवार ने दावा किया कि उसका इंटरव्यू दोपहर 2 बजे तय था और वह समय से करीब 30 मिनट पहले ही पहुंच गया था। लेकिन उसके मुताबिक, CEO करीब 3:10 बजे इंटरव्यू के लिए आए। उम्मीदवार का आरोप है कि इतनी देरी के बावजूद CEO ने न तो देरी की वजह बताई और न ही माफी मांगी। इसके बाद सीधे इंटरव्यू शुरू कर दिया गया।

इंटरव्यू शुरू होते ही उम्मीदवार ने किया बड़ा फैसला

उम्मीदवार ने कथित ईमेल में बताया कि उसने इंटरव्यू देने से ही इनकार कर दिया। उसका कहना था कि शुरुआत में ही कंपनी की तरफ से उसके समय को लेकर ऐसा रवैया देखकर उसे कंपनी के काम करने के तरीके पर शक हुआ। उसने यह भी सवाल उठाया कि अगर नौकरी शुरू होने से पहले ही उम्मीदवार के समय को अहमियत नहीं दी जा रही, तो कर्मचारी बनने के बाद क्या स्थिति होगी। इसी सोच के साथ उसने कथित तौर पर इंटरव्यू और कंपनी, दोनों को ही रिजेक्ट करने की बात कही।

सोशल मीडिया पर किसी ने कहा- बिल्कुल सही किया

ईमेल का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया। कई लोगों ने उम्मीदवार के फैसले का समर्थन किया। उनका कहना था कि नौकरी पाने की जरूरत अपनी जगह है, लेकिन उम्मीदवार के समय और मेहनत का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। कुछ यूजर्स ने कहा कि अगर किसी उम्मीदवार से समय पर पहुंचने की उम्मीद की जाती है, तो इंटरव्यू लेने वाले से भी कम से कम समय की पाबंदी और बेहतर संवाद की उम्मीद की जा सकती है।

लेकिन कुछ लोगों ने CEO का बचाव भी किया

दूसरी तरफ, कई यूजर्स ने उम्मीदवार के फैसले को जल्दबाजी बताया। उनका कहना था कि CEO जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के सामने अचानक कोई जरूरी काम या आपात स्थिति आ सकती है, जिसकी वजह से शेड्यूल बिगड़ सकता है। एक यूजर ने कहा कि उम्मीदवार को इंटरव्यू छोड़ने से पहले देरी की वजह पूछनी चाहिए थी। अगर कोई वास्तविक आपात स्थिति रही हो, तो सिर्फ देर होने के आधार पर पूरे संगठन के बारे में राय बनाना सही नहीं होगा।

लोगों ने अपने साथ हुए अनुभव भी बताए

पोस्ट के नीचे कई लोगों ने अपने इंटरव्यू से जुड़े अनुभव साझा किए। एक यूजर ने दावा किया कि उसके साथ भी कई बार ऐसा हुआ जब इंटरव्यू लेने वाले तय समय पर नहीं पहुंचे। कुछ मामलों में बाद में कंपनी के अधिकारियों ने ईमेल के जरिए माफी मांगी, लेकिन आगे की बातचीत बंद हो गई।

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Highest Paying Jobs: सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं, ये लोग कमा रहे लाखों! PG मालिक से चायवाले तक की लिस्ट वायरल

भारत में अक्सर युवाओं को बताया जाता है कि IIT की पढ़ाई, FAANG जैसी बड़ी टेक कंपनियों में नौकरी या Data Structures and Algorithms (DSA) में महारत हासिल करना अच्छी कमाई का सबसे आसान रास्ता है। लेकिन टेक और AI कमेंटेटर साक्षी ने सोशल मीडिया पर एक मजेदार लिस्ट शेयर कर इस सोच को ही उलट दिया। उन्होंने भारत में इस समय सबसे ज्यादा कमाई करने वाले लोगों की एक मजाकिया रैंकिंग साझा की, जिसमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर टॉप पर नहीं, बल्कि काफी पीछे नजर आए। इस लिस्ट में PG मालिक, मकान मालिक, पानी के टैंकर वाले और चाय-सिगरेट की दुकान चलाने वाले शामिल हैं।

नंबर-1 पर PG मालिक, एक कमरे से लाखों की कमाई

साक्षी की इस मजेदार रैंकिंग में सबसे ऊपर PG मालिक को रखा गया। उन्होंने बताया कि शहरों में बढ़ती नौकरी और किराए की मांग का फायदा PG के मालिकों को मिल रहा है। उनके मुताबिक, एक कमरे में तीन लोगों को रखा जाता है और हर व्यक्ति से करीब ₹10,000 से ₹15,000 तक किराया लिया जाता है। इस हिसाब से कुछ PG मालिक किराया और दूसरे खर्च निकालने के बाद भी ₹1 लाख से ₹1.5 लाख महीने तक कमा सकते हैं। यही वजह है कि पोस्ट में PG बिजनेस को आज के दौर के सबसे कमाई वाले कामों में से एक बताया गया।

बेंगलुरु के मकान मालिक भी पीछे नहीं

लिस्ट में तीसरे नंबर पर बेंगलुरु के मकान मालिक का जिक्र किया गया। टेक सिटी में किराए की बढ़ती मांग को लेकर अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चाएं होती रहती हैं। पोस्ट में मजाकिया अंदाज में बताया गया कि दो बेडरूम का फ्लैट खरीदकर उसे करीब ₹50,000 महीने के किराए पर देना, हर साल किराया बढ़ाना और WhatsApp पर सिर्फ ‘last price’ लिखकर बातचीत खत्म करना भी कमाई का शानदार तरीका बन गया है।

पानी के टैंकर वाले भी बने ‘बिजनेस किंग’

बेंगलुरु में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। इसी को लेकर साक्षी ने पानी के टैंकर संचालकों को भी अपनी लिस्ट में जगह दी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में लिखा कि ये लोग बेंगलुरु का ही पानी वापस बेंगलुरु के लोगों को बेचते हैं। पानी की कमी के समय टैंकरों की मांग बढ़ने से इस कारोबार की कमाई भी बढ़ जाती है।

ब्रोकरों की कमाई का भी किया जिक्र

रैंकिंग में प्रॉपर्टी ब्रोकर भी शामिल हैं। पोस्ट के मुताबिक, कुछ ब्रोकर किरायेदारों को कई ऐसे घर दिखाते हैं जो उनकी जरूरत के मुताबिक नहीं होते और आखिर में डील होने पर किरायेदार और मकान मालिक, दोनों से करीब एक महीने के किराए के बराबर कमीशन ले लेते हैं। बेंगलुरु जैसे शहरों में लगातार घर बदलने वाले किरायेदारों की बड़ी संख्या के कारण यह काम भी अच्छी कमाई वाला बताया गया।

टेक पार्क के बाहर चाय-सिगरेट वाला भी हिट

इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर जिस शख्स को रखा गया, वह शायद सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम है टेक पार्क के बाहर चाय, सिगरेट और स्नैक्स बेचने वाला दुकानदार। साक्षी ने उसे टेक इंडस्ट्री का ‘अनसंग हीरो’ बताया। उनके अनुसार, हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोजाना चाय, सिगरेट और स्नैक्स के लिए ऐसी दुकानों पर निर्भर रहते हैं। पोस्ट में अनुमान लगाया गया कि अच्छी लोकेशन वाली ऐसी दुकान से कुछ दुकानदार ₹30,000 से ₹50,000 महीने तक कमा सकते हैं।

न MBA, न फंडिंग, फिर भी कमाई!

इस पूरी पोस्ट का सबसे मजेदार हिस्सा यही था। चाय-सिगरेट की दुकान के लिए न किसी MBA की जरूरत है, न pitch deck की और न ही startup funding की। साक्षी ने इसी अंदाज में टेक इंडस्ट्री पर तंज कसते हुए बताया कि जहां इंजीनियर नौकरी और प्रमोशन के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं, वहीं कुछ छोटे कारोबारी रोजमर्रा की जरूरतों के दम पर अच्छी कमाई कर रहे हैं।

सॉफ्टवेयर इंजीनियरों पर आया सबसे बड़ा तंज

पोस्ट के अंत में सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को लेकर सबसे मजेदार टिप्पणी की गई। साक्षी ने लिखा कि जब बाकी लोग अलग-अलग तरीकों से कमाई कर रहे हैं, तब सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात 2 बजे तक DSA के सवाल हल कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि अगली salary hike अच्छी होगी।

सोशल मीडिया यूजर्स ने भी लिए मजे

साक्षी की पोस्ट को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और इसे खबर लिखने तक 1.5 लाख से ज्यादा व्यूज मिले। यूजर्स ने भी अपने-अपने अंदाज में इस रैंकिंग पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने मजाक करते हुए कहा कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कमाई का सबसे मुश्किल रास्ता चुना है और उन्हें DSA की तैयारी के बजाय पानी का टैंकर खरीद लेना चाहिए था। एक अन्य यूजर ने बेंगलुरु का असली ‘product-market fit’ AI या सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि चाय, प्रॉपर्टी और मेट्रो से दूरी का गणित बताया। एक यूजर ने टैक्स को लेकर भी तंज कसा और कहा कि इन कामों में कमाई करने वालों में शायद सॉफ्टवेयर इंजीनियर ही ऐसा व्यक्ति है जो नियमित रूप से इनकम टैक्स और ITR जैसी चीजों से जूझता है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

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Google में भर्ती करने वाली एक्सपर्ट ने बताया ऐसा सवाल, जो आपको बाकी उम्मीदवारों से बना देगा अलग

कई लोग नौकरी के इंटरव्यू की तैयारी करते समय अपने रिज्यूमे, अनुभव और संभावित सवालों पर पूरा ध्यान देते हैं। वहीं, इंटरव्यू के अंत में जब उम्मीदवार से पूछा जाता है कि “क्या आपके मन में कोई सवाल है?”, तो अधिकतर लोग इसे सिर्फ एक औपचारिकता मानते हैं। ऐसे में वे सैलरी, छुट्टियों, प्रमोशन या ऑफिस की सुविधाओं से जुड़े सामान्य सवाल पूछकर इंटरव्यू खत्म कर देते हैं। हालांकि, करियर विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरव्यू का यह आखिरी हिस्सा आपकी सोच, काम के प्रति नजरिया और प्रोफेशनल एटीट्यूड दिखाने का बेहतरीन मौका होता है।

सही सवाल न केवल इंटरव्यूअर पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, बल्कि ये भी दिखाता है कि आप केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि कंपनी की जरूरतों और अपनी भूमिका को समझने में भी रुचि रखते हैं। कई बार एक अच्छा सवाल आपकी छवि को अन्य उम्मीदवारों से अलग बना सकता है और चयन की संभावनाएं भी बढ़ा सकता है।

10 साल का भर्ती का अनुभव

फराह शारगी ने पिछले एक दशक में Google, Uber और The New York Times जैसी बड़ी कंपनियों में भर्ती की है। उनका कहना है कि इंटरव्यू के अंतिम मिनटों में उम्मीदवारों के सवाल ये बताते हैं कि वो सिर्फ नौकरी चाहते हैं या वास्तव में कंपनी की जरूरत को भी समझना चाहते हैं। उनके मुताबिक, इंटरव्यू के अंत तक रिक्रूटर उम्मीदवार की तकनीकी क्षमता का काफी हद तक आकलन कर चुका होता है। इसके बाद वह उम्मीदवार की सोच और काम करने के नजरिए को समझना चाहता है।

वह एक सवाल जो बना सकता है आपको सबसे अलग

फराह शारगी के अनुसार, सबसे प्रभावशाली सवाल यह है:

“इस समय सबसे बड़ी समस्या क्या है, जिसे हल करने के लिए आप इस पद पर किसी को नियुक्त करना चाहते हैं?” उनका कहना है कि कंपनियां सिर्फ पद भरने के लिए भर्ती नहीं करतीं। हर नई भर्ती के पीछे कोई न कोई समस्या होती है, जिसे कंपनी हल करना चाहती है। जो उम्मीदवार इस नजरिए से सवाल पूछता है, वह दिखाता है कि वो पहले से ही खुद को उस भूमिका में सोच रहा है।

क्यों पसंद आता है यह सवाल?

शारगी के मुताबिक, जब उम्मीदवार इस तरह का सवाल ईमानदारी से पूछता है, तो वह भीड़ से अलग नजर आता है। इससे रिक्रूटर को लगता है कि यह व्यक्ति सिर्फ नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि कंपनी की समस्या सुलझाने के लिए भी तैयार है।

ये 3 सवाल भी छोड़ते हैं अच्छा प्रभाव

फराह शारगी ने इंटरव्यू के दौरान पूछे जाने वाले तीन और उपयोगी सवाल बताए हैं:

एक साल बाद आपको कैसे लगेगा कि इस पद के लिए सही व्यक्ति चुना गया?

आपकी टीम में ऐसा कौन-सा कर्मचारी है, जिसकी तरह आप एक और व्यक्ति चाहते हैं?

इस नौकरी का कौन-सा हिस्सा है, जिसे लोग अक्सर कम आंकते हैं?

इन सवालों से क्या फायदा होगा?

इन सवालों के जरिए उम्मीदवार यह समझ सकता है कि:

कंपनी सफलता को कैसे मापती है।

टीम में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले लोगों की क्या खासियत होती है।

इस भूमिका में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं।

इंटरव्यू को सिर्फ परीक्षा नहीं, सीखने का मौका समझें

फराह शारगी का कहना है कि इंटरव्यू केवल खुद को साबित करने का मंच नहीं है। इसे कंपनी की जरूरतों और उस समस्या को समझने का अवसर भी मानना चाहिए, जिसे हल करने के लिए आपको नियुक्त किया जा सकता है। यही सोच उम्मीदवार को दूसरों से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाती है।

‘नारायण मूर्ति की बात सुनकर ज्यादा घंटे किया ऑफिस में काम, फिर भी 5% मिली हाइक, डेलॉइट के कर्मचारी ने 10 साल बाद छोड़ी नौकरी

लगभग एक दशक तक, अर्जुन सिंह (पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है) को लगता था कि वे अपना पूरा करियर डेलॉइट (Deloitte) में ही बिताएंगे। हैदराबाद के रहने वाले इस टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल ने कॉलेज से निकलते ही इस बड़ी कंसल्टिंग कंपनी में नौकरी शुरू की थी। वे कंपनी के उस मज़बूत लॉन्ग-टर्म विज़न से सहमत थे, जिसमें कड़ी मेहनत करके आगे बढ़ने की बात कही जाती है।

लेकिन कंपनी में 10 साल बिताने के बाद, यह सीनियर कंसल्टेंट बुरी तरह थक-हारकर (बर्नआउट की स्थिति में) और सिर्फ़ पांच प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी के साथ नौकरी छोड़कर चला गया। अपने फ़ैसले के बारे में बात करते हुए, 30-35 साल की उम्र के इस टेक प्रोफेशनल ने ‘मनीकंट्रोल’ को बताया कि बर्नआउट, उम्मीदों का असलियत से दूर होना और मेहनत व इनाम के बीच बढ़ती दूरी ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जबकि वे सालों से कंपनी के प्रति वफ़ादार रहे थे।

सिंह ने कहा, “मैंने नारायण मूर्ति की कही बातों से भी ज़्यादा घंटे काम किया, फिर भी मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और सैलरी में सिर्फ़ पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली।” उन्होंने इन्फोसिस के को-फ़ाउंडर का ज़िक्र किया, जिनके 70 घंटे के वर्क-वीक (हफ़्ते में 70 घंटे काम) वाले बयान ने वर्क कल्चर पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। उन्होंने आगे बताया कि कई बार वे हफ़्ते में 74 घंटे तक काम करते थे।

कई प्रोफेशनल्स के उलट, जो कुछ सालों में कंपनियां बदलते रहते हैं, सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी डेलॉइट (Deloitte) छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कहा, “जब आप युवा होते हैं, तो सीनियर लीडर्स को देखकर यह सोचना आसान होता है कि ‘एक दिन, मैं भी उनकी जगह हो सकता हूं।'”

सिंह के अनुसार, जब वे एक फ्रेशर के तौर पर शामिल हुए, तो डेलॉइट का पार्टनरशिप मॉडल और एक ही ऑर्गनाइज़ेशन में पूरा करियर बिताने की संभावना उन्हें काफी आकर्षक लगी। समय के साथ, सीखने के मौके, बड़े क्लाइंट प्रोजेक्ट्स, प्रमोशन और सीनियर साथियों से मिली मेंटरशिप ने उन्हें कंपनी में बने रहने के लिए काफी वजहें दीं।

उन्होंने कहा, “आप पहले ही दिन यह तय नहीं करते कि आपको कहीं 10 साल तक रहना है। आप हर साल वहां बने रहने का फैसला करते हैं।”सिंह का मानना ​​है कि कंसल्टिंग में सबसे बड़ी चुनौती ज़रूरी नहीं कि क्लाइंट का काम ही हो, बल्कि टाइट डेडलाइन, कम स्टाफ वाले प्रोजेक्ट्स और बिलिंग वाले काम के अलावा अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का मेल है।

उनके अनुसार, जिन प्रोजेक्ट्स के लिए असल में छह महीने में छह लोगों की ज़रूरत होती है, उनसे अब कॉम्पिटिशन के दबाव के कारण कम समय में छोटी टीमों द्वारा पूरा किए जाने की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा, “अचानक छह लोगों की जगह चार लोग हो जाते हैं और समय सीमा भी पांच महीने की हो जाती है।”

हालांकि क्लाइंट के काम का अपना दबाव होता था, लेकिन सिंह ने कहा कि कर्मचारियों से इंटरनल पहलों, हायरिंग गतिविधियों, प्रपोज़ल बनाने और प्रैक्टिस-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में भी योगदान देने की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कर्मचारी पदानुक्रम (hierarchy) में ऊपर बढ़ते हैं, ऐसे कामों में भाग लेने की उम्मीद और मज़बूत होती जाती है।

सिंह ने कहा, “जैसे-जैसे आप रैंक में ऊपर बढ़ते हैं, इस तरह के ‘मुफ़्त’ काम (बिना बिलिंग वाले काम) और भी ज़्यादा होते जाते हैं।” सिंह के अनुसार, बर्नआउट (काम के तनाव से पूरी तरह थक जाने) की एक बड़ी वजह काम से अलग न हो पाना था। उन्हें याद है कि वे सोशल गैदरिंग के दौरान भी काम के फ़ोन कॉल लेते थे, कई काम के डिवाइस साथ रखते थे और ऑफ़िस के समय के बाद भी उपलब्ध रहते थे।

सिंह ने कहा कि कंसल्टिंग मॉडल अक्सर ऐसा माहौल बनाता है जहां कर्मचारियों को क्लाइंट की डेडलाइन, अंदरूनी कमिटमेंट और बिज़नेस बढ़ाने की कोशिशों के बीच लगातार तालमेल बिठाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह होता है कि काम ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्सों पर हावी होने लगता है।

उन्होंने कहा, “आप हर समय काम में ही लगे रहते हैं।”हालांकि लंबे समय तक काम करना मुश्किल था, लेकिन सिंह ने कहा कि उन्हें ज़्यादा निराशा इस सोच से होती थी कि बहुत ज़्यादा मेहनत करने पर भी इनाम में बहुत मामूली फ़र्क ही मिलता था। उनके अनुसार, अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में अक्सर उतनी ही बढ़ोतरी होती थी, जितनी उन साथियों की होती थी जो काम और निजी ज़िंदगी के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखते थे।

उन्होंने कहा, “इस साल लोगों की सैलरी में 5 परसेंट से भी कम बढ़ोतरी हुई।” उन्होंने यह भी कहा कि औसत और बेहतरीन परफॉर्मेंस के बीच का अंतर अक्सर बहुत कम लगता था। “जब काम की पहचान या तारीफ़ नहीं होती, तो इंसान थककर हार मान लेता है (बर्नआउट)।”

उन्होंने क्लाइंट के लिए डिटेल्ड प्रपोज़ल तैयार करने के लिए टेक्निकल स्टाफ़ पर डेलॉइट की निर्भरता की भी आलोचना की। उनका तर्क था कि इसके बजाय डेडिकेटेड सेल्स टीमों को यह काम संभालना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता।

उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता। सिंह ने कहा, “बदलाव किसी एक बुरे प्रोजेक्ट या मुश्किल मैनेजर की वजह से नहीं आया। यह धीरे-धीरे हुआ।”

समय के साथ, उन्हें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या उसी रास्ते पर चलते रहने से उन्हें अपने करियर के अगले चरण में वे अनुभव मिल पाएंगे जिनकी उन्हें तलाश थी। इसके बाद सिंह हैदराबाद की एक दूसरी कंपनी में शामिल हो गए। उनके अनुसार, नई भूमिका में बेहतर सैलरी तो मिलती ही है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उन्हें अपने समय और वर्क-लाइफ़ बैलेंस पर ज़्यादा कंट्रोल मिलता है।

पीछे मुड़कर देखने पर, उन्हें डेलॉइट में बिताए अपने दस सालों का कोई अफ़सोस नहीं है। “बल्कि, उन दस सालों ने मुझे अनुभव, आत्मविश्वास और नज़रिया दिया, जिससे मुझे यह समझ आया कि अब एक अलग रास्ता चुनने का सही समय आ गया है।” सिंह के लिए, नौकरी छोड़ने का मतलब किसी सपने को छोड़ना नहीं था। इसका मतलब यह समझना था कि 22 साल की उम्र में सफलता की जो परिभाषा उनके मन में थी, वह 35 साल की उम्र में वैसी नहीं रही।

‘नारायण मूर्ति की बात सुनकर ज्यादा घंटे किया ऑफिस में काम, फिर भी 5% मिली हाइक, डेलॉइट के कर्मचारी ने 10 साल बाद छोड़ी नौकरी

लगभग एक दशक तक, अर्जुन सिंह (पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है) को लगता था कि वे अपना पूरा करियर डेलॉइट (Deloitte) में ही बिताएंगे। हैदराबाद के रहने वाले इस टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल ने कॉलेज से निकलते ही इस बड़ी कंसल्टिंग कंपनी में नौकरी शुरू की थी। वे कंपनी के उस मज़बूत लॉन्ग-टर्म विज़न से सहमत थे, जिसमें कड़ी मेहनत करके आगे बढ़ने की बात कही जाती है।

लेकिन कंपनी में 10 साल बिताने के बाद, यह सीनियर कंसल्टेंट बुरी तरह थक-हारकर (बर्नआउट की स्थिति में) और सिर्फ़ पांच प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी के साथ नौकरी छोड़कर चला गया। अपने फ़ैसले के बारे में बात करते हुए, 30-35 साल की उम्र के इस टेक प्रोफेशनल ने ‘मनीकंट्रोल’ को बताया कि बर्नआउट, उम्मीदों का असलियत से दूर होना और मेहनत व इनाम के बीच बढ़ती दूरी ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जबकि वे सालों से कंपनी के प्रति वफ़ादार रहे थे।

सिंह ने कहा, “मैंने नारायण मूर्ति की कही बातों से भी ज़्यादा घंटे काम किया, फिर भी मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और सैलरी में सिर्फ़ पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली।” उन्होंने इन्फोसिस के को-फ़ाउंडर का ज़िक्र किया, जिनके 70 घंटे के वर्क-वीक (हफ़्ते में 70 घंटे काम) वाले बयान ने वर्क कल्चर पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। उन्होंने आगे बताया कि कई बार वे हफ़्ते में 74 घंटे तक काम करते थे।

कई प्रोफेशनल्स के उलट, जो कुछ सालों में कंपनियां बदलते रहते हैं, सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी डेलॉइट (Deloitte) छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कहा, “जब आप युवा होते हैं, तो सीनियर लीडर्स को देखकर यह सोचना आसान होता है कि ‘एक दिन, मैं भी उनकी जगह हो सकता हूं।'”

सिंह के अनुसार, जब वे एक फ्रेशर के तौर पर शामिल हुए, तो डेलॉइट का पार्टनरशिप मॉडल और एक ही ऑर्गनाइज़ेशन में पूरा करियर बिताने की संभावना उन्हें काफी आकर्षक लगी। समय के साथ, सीखने के मौके, बड़े क्लाइंट प्रोजेक्ट्स, प्रमोशन और सीनियर साथियों से मिली मेंटरशिप ने उन्हें कंपनी में बने रहने के लिए काफी वजहें दीं।

उन्होंने कहा, “आप पहले ही दिन यह तय नहीं करते कि आपको कहीं 10 साल तक रहना है। आप हर साल वहां बने रहने का फैसला करते हैं।”सिंह का मानना ​​है कि कंसल्टिंग में सबसे बड़ी चुनौती ज़रूरी नहीं कि क्लाइंट का काम ही हो, बल्कि टाइट डेडलाइन, कम स्टाफ वाले प्रोजेक्ट्स और बिलिंग वाले काम के अलावा अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का मेल है।

उनके अनुसार, जिन प्रोजेक्ट्स के लिए असल में छह महीने में छह लोगों की ज़रूरत होती है, उनसे अब कॉम्पिटिशन के दबाव के कारण कम समय में छोटी टीमों द्वारा पूरा किए जाने की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा, “अचानक छह लोगों की जगह चार लोग हो जाते हैं और समय सीमा भी पांच महीने की हो जाती है।”

हालांकि क्लाइंट के काम का अपना दबाव होता था, लेकिन सिंह ने कहा कि कर्मचारियों से इंटरनल पहलों, हायरिंग गतिविधियों, प्रपोज़ल बनाने और प्रैक्टिस-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में भी योगदान देने की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कर्मचारी पदानुक्रम (hierarchy) में ऊपर बढ़ते हैं, ऐसे कामों में भाग लेने की उम्मीद और मज़बूत होती जाती है।

सिंह ने कहा, “जैसे-जैसे आप रैंक में ऊपर बढ़ते हैं, इस तरह के ‘मुफ़्त’ काम (बिना बिलिंग वाले काम) और भी ज़्यादा होते जाते हैं।” सिंह के अनुसार, बर्नआउट (काम के तनाव से पूरी तरह थक जाने) की एक बड़ी वजह काम से अलग न हो पाना था। उन्हें याद है कि वे सोशल गैदरिंग के दौरान भी काम के फ़ोन कॉल लेते थे, कई काम के डिवाइस साथ रखते थे और ऑफ़िस के समय के बाद भी उपलब्ध रहते थे।

सिंह ने कहा कि कंसल्टिंग मॉडल अक्सर ऐसा माहौल बनाता है जहां कर्मचारियों को क्लाइंट की डेडलाइन, अंदरूनी कमिटमेंट और बिज़नेस बढ़ाने की कोशिशों के बीच लगातार तालमेल बिठाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह होता है कि काम ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्सों पर हावी होने लगता है।

उन्होंने कहा, “आप हर समय काम में ही लगे रहते हैं।”हालांकि लंबे समय तक काम करना मुश्किल था, लेकिन सिंह ने कहा कि उन्हें ज़्यादा निराशा इस सोच से होती थी कि बहुत ज़्यादा मेहनत करने पर भी इनाम में बहुत मामूली फ़र्क ही मिलता था। उनके अनुसार, अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में अक्सर उतनी ही बढ़ोतरी होती थी, जितनी उन साथियों की होती थी जो काम और निजी ज़िंदगी के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखते थे।

उन्होंने कहा, “इस साल लोगों की सैलरी में 5 परसेंट से भी कम बढ़ोतरी हुई।” उन्होंने यह भी कहा कि औसत और बेहतरीन परफॉर्मेंस के बीच का अंतर अक्सर बहुत कम लगता था। “जब काम की पहचान या तारीफ़ नहीं होती, तो इंसान थककर हार मान लेता है (बर्नआउट)।”

उन्होंने क्लाइंट के लिए डिटेल्ड प्रपोज़ल तैयार करने के लिए टेक्निकल स्टाफ़ पर डेलॉइट की निर्भरता की भी आलोचना की। उनका तर्क था कि इसके बजाय डेडिकेटेड सेल्स टीमों को यह काम संभालना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता।

उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता। सिंह ने कहा, “बदलाव किसी एक बुरे प्रोजेक्ट या मुश्किल मैनेजर की वजह से नहीं आया। यह धीरे-धीरे हुआ।”

समय के साथ, उन्हें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या उसी रास्ते पर चलते रहने से उन्हें अपने करियर के अगले चरण में वे अनुभव मिल पाएंगे जिनकी उन्हें तलाश थी। इसके बाद सिंह हैदराबाद की एक दूसरी कंपनी में शामिल हो गए। उनके अनुसार, नई भूमिका में बेहतर सैलरी तो मिलती ही है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उन्हें अपने समय और वर्क-लाइफ़ बैलेंस पर ज़्यादा कंट्रोल मिलता है।

पीछे मुड़कर देखने पर, उन्हें डेलॉइट में बिताए अपने दस सालों का कोई अफ़सोस नहीं है। “बल्कि, उन दस सालों ने मुझे अनुभव, आत्मविश्वास और नज़रिया दिया, जिससे मुझे यह समझ आया कि अब एक अलग रास्ता चुनने का सही समय आ गया है।” सिंह के लिए, नौकरी छोड़ने का मतलब किसी सपने को छोड़ना नहीं था। इसका मतलब यह समझना था कि 22 साल की उम्र में सफलता की जो परिभाषा उनके मन में थी, वह 35 साल की उम्र में वैसी नहीं रही।