‘5 साल बाद क्या करूंगी, पता नहीं’ कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ कंटेंट क्रिएशन में आईं महिला, अब टीवी और वेब सीरीज में मिल रही मौके!

आज के समय में ज्यादातर युवा कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में करियर बनाने का सपना देख रहे हैं। वहीं हाल में नौकरी छोड़कर कंटेंट क्रिएशन शुरू करने वाली महिला की कहानी सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही है। डेलॉइट की एक पूर्व कर्मचारी ने कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर कंटेंट क्रिएशन को अपना करियर चुना। उनके इस फैसले ने एक भारतीय फाउंडर को 5 और 10 साल के करियर प्लान की सोच पर सवाल उठाने के लिए मजबूर कर दिया। लिंक्डइन पर ये कहानी जया शक्ति कन्नन ने शेयर की है।

सोशल मीडिया पर किया पोस्ट

डेलॉइट की नौकरी छोड़कर कंटेंट क्रिएशन शुरू करने वाली ऐश्वर्या जीपी की कहानी चर्चा में है। चेन्नई की फाउंडर जया शक्ति कन्नन ने बताया कि ईश्वर्या 5 साल का प्लान बनाने के बजाय अगले 6 महीनों पर फोकस कर रही हैं। लिंक्डइन पर ऐश्वर्या की शेयर की गई कहानी में उन्होंने बताया कि, एक बातचीत के दौरान उन्होंने ऐश्वर्या से पूछा था कि वह अगले पांच सालों में क्या करना चाहती हैं। ऐश्वर्या का जवाब उम्मीद से अलग था। उन्होंने कॉर्पोरेट करियर की तय राह पर आगे बढ़ने के बजाय कंटेंट क्रिएशन को अपना करियर बनाने का फैसला किया था।

अगले 5 साल का प्लान किसे पता

कन्नन ने बताया कि ऐश्वर्या ने कंटेंट क्रिएटर बनने के लिए डेलॉइट की नौकरी छोड़ दी थी। इस पर उन्होंने ऐश्वर्या से पूछा, “अगले 5 सालों के लिए आपका क्या प्लान है?” ऐश्वर्या ने जवाब दिया, “मुझे कोई आइडिया नहीं है।” उन्होंने कहा कि आज वह जिस रास्ते पर हैं, उसके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था। कन्नन ने ईश्वर्या के हवाले से बताया, “एक साल पहले मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं कंटेंट क्रिएटर बनूंगी। ऐसे में मैं कैसे बता सकती हूं कि पांच साल बाद मैं क्या कर रही होऊंगी।” पांच साल का कोई तय करियर प्लान बनाने के बजाय ईश्वर्या फिलहाल अगले छह महीनों पर ध्यान दे रही हैं।

कितने महीने का हैं प्लान

कन्नन के मुताबिक, ईश्वर्या के इस तरीके से उन्हें कंटेंट क्रिएशन के अलावा भी कई नए मौके मिले हैं। इनमें फिल्मों, होस्टिंग, टीवी और वेब सीरीज से जुड़े काम शामिल हैं। ईश्वर्या पांच साल का लंबा और तय करियर प्लान बनाने के बजाय अगले छह महीनों पर ध्यान दे रही हैं। कन्नन ने कहा कि ईश्वर्या के नजरिए ने उन्हें करियर प्लानिंग की आम सोच पर दोबारा विचार करने पर मजबूर किया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या करियर के लिए पहले से लंबा प्लान बनाना जरूरी है। उन्होंने लिखा, “इसके बजाय, ईश्वर्या अगले छह महीनों पर ध्यान दे रही हैं। वह अपना बेस्ट देना चाहती हैं, नई चीजें सीखना चाहती हैं, अलग-अलग चीजों को आजमाना चाहती हैं और जब भी कोई मौका मिले, उसे अपनाना चाहती हैं।”

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हम 5-10 साल का क्यों करते हैं प्लान

कन्नन ने आगे कहा, “हम अक्सर 5 या 10 साल का एक तय प्लान बना लेते हैं और बिना दूसरी तरफ देखे उसी रास्ते पर चलते रहते हैं। लेकिन क्या हो अगर आगे बढ़ने का कोई आसान और छोटा रास्ता मौजूद हो?” उन्होंने कहा, “जैक मा, अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर, विजय और रीड हेस्टिंग्स जैसे लोगों को देखिए। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक काम से की, लेकिन आगे चलकर कुछ और किया और आखिर में उस क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की, जिसके बारे में उन्होंने शुरुआत में शायद सोचा भी नहीं था।”

किसे पता कौन कहां जाएगा

कन्नन ने कहा कि, करियर की प्लानिंग करते समय यह जरूरी नहीं है कि किसी व्यक्ति को पहले से पता हो कि वह कई साल बाद ठीक कहां पहुंचेगा। उन्होंने कहा, “शायद हमें यह जानने की जरूरत नहीं है कि हम 5 साल बाद बिल्कुल कहां होंगे।” उन्होंने कहा, “एक दिशा तय करें। अगले 6 महीनों की योजना बनाएं। अपनी आंखें खुली रखें। सही मौकों का फायदा उठाएं और आगे बढ़ते रहें।”

उन्होंने आखिर में कहा, “आपने करियर की शुरुआत जिस कदम से की है, जरूरी नहीं कि वही आपकी आखिरी मंजिल तय करे। कई बार अनचाहा रास्ता ही आपको किसी ऐसी जगह पहुंचा देता है, जिसके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं होता।” कन्नन ने अपनी पोस्ट के अंत में ईश्वर्या जीपी को उनके आगे के सफर के लिए शुभकामनाएं भी दीं। उन्होंने लिखा, “आगे के सफर के लिए ईश्वर्या जीपी को मेरी शुभकामनाएं!”

सोशल मीडिया यूजर ने दिया रिएक्शन

इस पोस्ट पर सोशल मीडिया पर लोगों ने तरह-तरह के रिएक्शन दे रहे हैं। एक यूजर ने कहा, “यह बात सच में समझ में आती है। कई बार हम अगले 5 साल को लेकर खुद पर इतना दबाव बना लेते हैं कि आज क्या अच्छा किया जा सकता है, इस पर ध्यान देना भूल जाते हैं।” वहीं, एक अन्य यूजर ने लिखा, “6 महीने का माइंडसेट काफी मायने रखता है। आप आने वाले हर मौके का पहले से अंदाजा नहीं लगा सकते, लेकिन आप यह जरूर तय कर सकते हैं कि अभी क्या सीखना है, क्या बनाना है और अपना काम कितनी अच्छी तरह करना है। कई बार यही चीज आपके करियर का अगला रास्ता तय करती है।” उन्होंने ईश्वर्या के आगे के सफर के लिए शुभकामनाएं भी दीं।

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‘नारायण मूर्ति की बात सुनकर ज्यादा घंटे किया ऑफिस में काम, फिर भी 5% मिली हाइक, डेलॉइट के कर्मचारी ने 10 साल बाद छोड़ी नौकरी

लगभग एक दशक तक, अर्जुन सिंह (पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है) को लगता था कि वे अपना पूरा करियर डेलॉइट (Deloitte) में ही बिताएंगे। हैदराबाद के रहने वाले इस टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल ने कॉलेज से निकलते ही इस बड़ी कंसल्टिंग कंपनी में नौकरी शुरू की थी। वे कंपनी के उस मज़बूत लॉन्ग-टर्म विज़न से सहमत थे, जिसमें कड़ी मेहनत करके आगे बढ़ने की बात कही जाती है।

लेकिन कंपनी में 10 साल बिताने के बाद, यह सीनियर कंसल्टेंट बुरी तरह थक-हारकर (बर्नआउट की स्थिति में) और सिर्फ़ पांच प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी के साथ नौकरी छोड़कर चला गया। अपने फ़ैसले के बारे में बात करते हुए, 30-35 साल की उम्र के इस टेक प्रोफेशनल ने ‘मनीकंट्रोल’ को बताया कि बर्नआउट, उम्मीदों का असलियत से दूर होना और मेहनत व इनाम के बीच बढ़ती दूरी ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जबकि वे सालों से कंपनी के प्रति वफ़ादार रहे थे।

सिंह ने कहा, “मैंने नारायण मूर्ति की कही बातों से भी ज़्यादा घंटे काम किया, फिर भी मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और सैलरी में सिर्फ़ पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली।” उन्होंने इन्फोसिस के को-फ़ाउंडर का ज़िक्र किया, जिनके 70 घंटे के वर्क-वीक (हफ़्ते में 70 घंटे काम) वाले बयान ने वर्क कल्चर पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। उन्होंने आगे बताया कि कई बार वे हफ़्ते में 74 घंटे तक काम करते थे।

कई प्रोफेशनल्स के उलट, जो कुछ सालों में कंपनियां बदलते रहते हैं, सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी डेलॉइट (Deloitte) छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कहा, “जब आप युवा होते हैं, तो सीनियर लीडर्स को देखकर यह सोचना आसान होता है कि ‘एक दिन, मैं भी उनकी जगह हो सकता हूं।'”

सिंह के अनुसार, जब वे एक फ्रेशर के तौर पर शामिल हुए, तो डेलॉइट का पार्टनरशिप मॉडल और एक ही ऑर्गनाइज़ेशन में पूरा करियर बिताने की संभावना उन्हें काफी आकर्षक लगी। समय के साथ, सीखने के मौके, बड़े क्लाइंट प्रोजेक्ट्स, प्रमोशन और सीनियर साथियों से मिली मेंटरशिप ने उन्हें कंपनी में बने रहने के लिए काफी वजहें दीं।

उन्होंने कहा, “आप पहले ही दिन यह तय नहीं करते कि आपको कहीं 10 साल तक रहना है। आप हर साल वहां बने रहने का फैसला करते हैं।”सिंह का मानना ​​है कि कंसल्टिंग में सबसे बड़ी चुनौती ज़रूरी नहीं कि क्लाइंट का काम ही हो, बल्कि टाइट डेडलाइन, कम स्टाफ वाले प्रोजेक्ट्स और बिलिंग वाले काम के अलावा अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का मेल है।

उनके अनुसार, जिन प्रोजेक्ट्स के लिए असल में छह महीने में छह लोगों की ज़रूरत होती है, उनसे अब कॉम्पिटिशन के दबाव के कारण कम समय में छोटी टीमों द्वारा पूरा किए जाने की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा, “अचानक छह लोगों की जगह चार लोग हो जाते हैं और समय सीमा भी पांच महीने की हो जाती है।”

हालांकि क्लाइंट के काम का अपना दबाव होता था, लेकिन सिंह ने कहा कि कर्मचारियों से इंटरनल पहलों, हायरिंग गतिविधियों, प्रपोज़ल बनाने और प्रैक्टिस-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में भी योगदान देने की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कर्मचारी पदानुक्रम (hierarchy) में ऊपर बढ़ते हैं, ऐसे कामों में भाग लेने की उम्मीद और मज़बूत होती जाती है।

सिंह ने कहा, “जैसे-जैसे आप रैंक में ऊपर बढ़ते हैं, इस तरह के ‘मुफ़्त’ काम (बिना बिलिंग वाले काम) और भी ज़्यादा होते जाते हैं।” सिंह के अनुसार, बर्नआउट (काम के तनाव से पूरी तरह थक जाने) की एक बड़ी वजह काम से अलग न हो पाना था। उन्हें याद है कि वे सोशल गैदरिंग के दौरान भी काम के फ़ोन कॉल लेते थे, कई काम के डिवाइस साथ रखते थे और ऑफ़िस के समय के बाद भी उपलब्ध रहते थे।

सिंह ने कहा कि कंसल्टिंग मॉडल अक्सर ऐसा माहौल बनाता है जहां कर्मचारियों को क्लाइंट की डेडलाइन, अंदरूनी कमिटमेंट और बिज़नेस बढ़ाने की कोशिशों के बीच लगातार तालमेल बिठाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह होता है कि काम ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्सों पर हावी होने लगता है।

उन्होंने कहा, “आप हर समय काम में ही लगे रहते हैं।”हालांकि लंबे समय तक काम करना मुश्किल था, लेकिन सिंह ने कहा कि उन्हें ज़्यादा निराशा इस सोच से होती थी कि बहुत ज़्यादा मेहनत करने पर भी इनाम में बहुत मामूली फ़र्क ही मिलता था। उनके अनुसार, अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में अक्सर उतनी ही बढ़ोतरी होती थी, जितनी उन साथियों की होती थी जो काम और निजी ज़िंदगी के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखते थे।

उन्होंने कहा, “इस साल लोगों की सैलरी में 5 परसेंट से भी कम बढ़ोतरी हुई।” उन्होंने यह भी कहा कि औसत और बेहतरीन परफॉर्मेंस के बीच का अंतर अक्सर बहुत कम लगता था। “जब काम की पहचान या तारीफ़ नहीं होती, तो इंसान थककर हार मान लेता है (बर्नआउट)।”

उन्होंने क्लाइंट के लिए डिटेल्ड प्रपोज़ल तैयार करने के लिए टेक्निकल स्टाफ़ पर डेलॉइट की निर्भरता की भी आलोचना की। उनका तर्क था कि इसके बजाय डेडिकेटेड सेल्स टीमों को यह काम संभालना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता।

उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता। सिंह ने कहा, “बदलाव किसी एक बुरे प्रोजेक्ट या मुश्किल मैनेजर की वजह से नहीं आया। यह धीरे-धीरे हुआ।”

समय के साथ, उन्हें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या उसी रास्ते पर चलते रहने से उन्हें अपने करियर के अगले चरण में वे अनुभव मिल पाएंगे जिनकी उन्हें तलाश थी। इसके बाद सिंह हैदराबाद की एक दूसरी कंपनी में शामिल हो गए। उनके अनुसार, नई भूमिका में बेहतर सैलरी तो मिलती ही है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उन्हें अपने समय और वर्क-लाइफ़ बैलेंस पर ज़्यादा कंट्रोल मिलता है।

पीछे मुड़कर देखने पर, उन्हें डेलॉइट में बिताए अपने दस सालों का कोई अफ़सोस नहीं है। “बल्कि, उन दस सालों ने मुझे अनुभव, आत्मविश्वास और नज़रिया दिया, जिससे मुझे यह समझ आया कि अब एक अलग रास्ता चुनने का सही समय आ गया है।” सिंह के लिए, नौकरी छोड़ने का मतलब किसी सपने को छोड़ना नहीं था। इसका मतलब यह समझना था कि 22 साल की उम्र में सफलता की जो परिभाषा उनके मन में थी, वह 35 साल की उम्र में वैसी नहीं रही।

‘नारायण मूर्ति की बात सुनकर ज्यादा घंटे किया ऑफिस में काम, फिर भी 5% मिली हाइक, डेलॉइट के कर्मचारी ने 10 साल बाद छोड़ी नौकरी

लगभग एक दशक तक, अर्जुन सिंह (पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है) को लगता था कि वे अपना पूरा करियर डेलॉइट (Deloitte) में ही बिताएंगे। हैदराबाद के रहने वाले इस टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल ने कॉलेज से निकलते ही इस बड़ी कंसल्टिंग कंपनी में नौकरी शुरू की थी। वे कंपनी के उस मज़बूत लॉन्ग-टर्म विज़न से सहमत थे, जिसमें कड़ी मेहनत करके आगे बढ़ने की बात कही जाती है।

लेकिन कंपनी में 10 साल बिताने के बाद, यह सीनियर कंसल्टेंट बुरी तरह थक-हारकर (बर्नआउट की स्थिति में) और सिर्फ़ पांच प्रतिशत सैलरी बढ़ोतरी के साथ नौकरी छोड़कर चला गया। अपने फ़ैसले के बारे में बात करते हुए, 30-35 साल की उम्र के इस टेक प्रोफेशनल ने ‘मनीकंट्रोल’ को बताया कि बर्नआउट, उम्मीदों का असलियत से दूर होना और मेहनत व इनाम के बीच बढ़ती दूरी ने उन्हें नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जबकि वे सालों से कंपनी के प्रति वफ़ादार रहे थे।

सिंह ने कहा, “मैंने नारायण मूर्ति की कही बातों से भी ज़्यादा घंटे काम किया, फिर भी मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और सैलरी में सिर्फ़ पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी मिली।” उन्होंने इन्फोसिस के को-फ़ाउंडर का ज़िक्र किया, जिनके 70 घंटे के वर्क-वीक (हफ़्ते में 70 घंटे काम) वाले बयान ने वर्क कल्चर पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। उन्होंने आगे बताया कि कई बार वे हफ़्ते में 74 घंटे तक काम करते थे।

कई प्रोफेशनल्स के उलट, जो कुछ सालों में कंपनियां बदलते रहते हैं, सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी डेलॉइट (Deloitte) छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने कहा, “जब आप युवा होते हैं, तो सीनियर लीडर्स को देखकर यह सोचना आसान होता है कि ‘एक दिन, मैं भी उनकी जगह हो सकता हूं।'”

सिंह के अनुसार, जब वे एक फ्रेशर के तौर पर शामिल हुए, तो डेलॉइट का पार्टनरशिप मॉडल और एक ही ऑर्गनाइज़ेशन में पूरा करियर बिताने की संभावना उन्हें काफी आकर्षक लगी। समय के साथ, सीखने के मौके, बड़े क्लाइंट प्रोजेक्ट्स, प्रमोशन और सीनियर साथियों से मिली मेंटरशिप ने उन्हें कंपनी में बने रहने के लिए काफी वजहें दीं।

उन्होंने कहा, “आप पहले ही दिन यह तय नहीं करते कि आपको कहीं 10 साल तक रहना है। आप हर साल वहां बने रहने का फैसला करते हैं।”सिंह का मानना ​​है कि कंसल्टिंग में सबसे बड़ी चुनौती ज़रूरी नहीं कि क्लाइंट का काम ही हो, बल्कि टाइट डेडलाइन, कम स्टाफ वाले प्रोजेक्ट्स और बिलिंग वाले काम के अलावा अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का मेल है।

उनके अनुसार, जिन प्रोजेक्ट्स के लिए असल में छह महीने में छह लोगों की ज़रूरत होती है, उनसे अब कॉम्पिटिशन के दबाव के कारण कम समय में छोटी टीमों द्वारा पूरा किए जाने की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा, “अचानक छह लोगों की जगह चार लोग हो जाते हैं और समय सीमा भी पांच महीने की हो जाती है।”

हालांकि क्लाइंट के काम का अपना दबाव होता था, लेकिन सिंह ने कहा कि कर्मचारियों से इंटरनल पहलों, हायरिंग गतिविधियों, प्रपोज़ल बनाने और प्रैक्टिस-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में भी योगदान देने की उम्मीद की जाती थी। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कर्मचारी पदानुक्रम (hierarchy) में ऊपर बढ़ते हैं, ऐसे कामों में भाग लेने की उम्मीद और मज़बूत होती जाती है।

सिंह ने कहा, “जैसे-जैसे आप रैंक में ऊपर बढ़ते हैं, इस तरह के ‘मुफ़्त’ काम (बिना बिलिंग वाले काम) और भी ज़्यादा होते जाते हैं।” सिंह के अनुसार, बर्नआउट (काम के तनाव से पूरी तरह थक जाने) की एक बड़ी वजह काम से अलग न हो पाना था। उन्हें याद है कि वे सोशल गैदरिंग के दौरान भी काम के फ़ोन कॉल लेते थे, कई काम के डिवाइस साथ रखते थे और ऑफ़िस के समय के बाद भी उपलब्ध रहते थे।

सिंह ने कहा कि कंसल्टिंग मॉडल अक्सर ऐसा माहौल बनाता है जहां कर्मचारियों को क्लाइंट की डेडलाइन, अंदरूनी कमिटमेंट और बिज़नेस बढ़ाने की कोशिशों के बीच लगातार तालमेल बिठाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह होता है कि काम ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्सों पर हावी होने लगता है।

उन्होंने कहा, “आप हर समय काम में ही लगे रहते हैं।”हालांकि लंबे समय तक काम करना मुश्किल था, लेकिन सिंह ने कहा कि उन्हें ज़्यादा निराशा इस सोच से होती थी कि बहुत ज़्यादा मेहनत करने पर भी इनाम में बहुत मामूली फ़र्क ही मिलता था। उनके अनुसार, अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में अक्सर उतनी ही बढ़ोतरी होती थी, जितनी उन साथियों की होती थी जो काम और निजी ज़िंदगी के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखते थे।

उन्होंने कहा, “इस साल लोगों की सैलरी में 5 परसेंट से भी कम बढ़ोतरी हुई।” उन्होंने यह भी कहा कि औसत और बेहतरीन परफॉर्मेंस के बीच का अंतर अक्सर बहुत कम लगता था। “जब काम की पहचान या तारीफ़ नहीं होती, तो इंसान थककर हार मान लेता है (बर्नआउट)।”

उन्होंने क्लाइंट के लिए डिटेल्ड प्रपोज़ल तैयार करने के लिए टेक्निकल स्टाफ़ पर डेलॉइट की निर्भरता की भी आलोचना की। उनका तर्क था कि इसके बजाय डेडिकेटेड सेल्स टीमों को यह काम संभालना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता।

उन्होंने कहा कि कर्मचारी अक्सर लाखों डॉलर के प्रपोज़ल तैयार करने में दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उससे होने वाले फ़ायदे का कोई खास हिस्सा उन्हें नहीं मिलता। सिंह ने कहा, “बदलाव किसी एक बुरे प्रोजेक्ट या मुश्किल मैनेजर की वजह से नहीं आया। यह धीरे-धीरे हुआ।”

समय के साथ, उन्हें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि क्या उसी रास्ते पर चलते रहने से उन्हें अपने करियर के अगले चरण में वे अनुभव मिल पाएंगे जिनकी उन्हें तलाश थी। इसके बाद सिंह हैदराबाद की एक दूसरी कंपनी में शामिल हो गए। उनके अनुसार, नई भूमिका में बेहतर सैलरी तो मिलती ही है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि उन्हें अपने समय और वर्क-लाइफ़ बैलेंस पर ज़्यादा कंट्रोल मिलता है।

पीछे मुड़कर देखने पर, उन्हें डेलॉइट में बिताए अपने दस सालों का कोई अफ़सोस नहीं है। “बल्कि, उन दस सालों ने मुझे अनुभव, आत्मविश्वास और नज़रिया दिया, जिससे मुझे यह समझ आया कि अब एक अलग रास्ता चुनने का सही समय आ गया है।” सिंह के लिए, नौकरी छोड़ने का मतलब किसी सपने को छोड़ना नहीं था। इसका मतलब यह समझना था कि 22 साल की उम्र में सफलता की जो परिभाषा उनके मन में थी, वह 35 साल की उम्र में वैसी नहीं रही।