एक दांत के इलाज के ₹2.37 लाख! NRI ने जब भारत की फ्लाइट का किराया देखा तो खुद ही रह गया हैरान

अमेरिका में 15 साल से रह रहे भारतीय नितिन मल्होत्रा इन दिनों सोशल मीडिया पर अपने एक अनुभव की वजह से चर्चा में हैं। दांत में दर्द होने पर वह इलाज के लिए डेंटिस्ट के पास पहुंचे थे, लेकिन वहां उन्हें जो खर्च बताया गया, उसने उन्हें हैरान कर दिया। इंश्योरेंस होने के बावजूद करीब 2,500 डॉलर यानी लगभग ₹2.37 लाख अपनी जेब से देने की बात सामने आई। इसके बाद नितिन ने अमेरिका और भारत में डेंटल ट्रीटमेंट की लागत की तुलना करते हुए एक सवाल अपने फॉलोअर्स के सामने रख दिया।

दांत में दर्द हुआ तो पहुंचे डॉक्टर के पास

नितिन ने इंस्टाग्राम पर शेयर किए वीडियो में बताया कि दांत में तकलीफ होने के बाद वह जांच के लिए डेंटिस्ट के पास गए। क्लिनिक में सबसे पहले उनसे पूछा गया कि उनके पास कौन सा डेंटल इंश्योरेंस है। इंश्योरेंस कार्ड दिखाने के बाद उनके दांत का एक्स-रे किया गया।

नितिन के मुताबिक, सिर्फ एक्स-रे के लिए उनसे 180 डॉलर यानी करीब ₹17 हजार चार्ज किए गए। इसके बाद डॉक्टर ने जांच करके इलाज का अनुमानित खर्च बताया।

इंश्योरेंस के बाद भी देना था ₹2.37 लाख

नितिन का कहना है कि क्लिनिक ने उन्हें बताया कि सामान्य तौर पर इलाज का बिल करीब 8,000 डॉलर यानी लगभग ₹7.60 लाख हो सकता है। हालांकि, इंश्योरेंस के तहत एडजस्टमेंट के बाद उनकी जेब से 2,500 डॉलर देने की बात कही गई। इतनी बड़ी रकम सुनकर नितिन ने भारत में होने वाले डेंटल ट्रीटमेंट की कीमत से इसकी तुलना की। उनका कहना था कि भारत में दांतों की सफाई, रूट कैनाल और दूसरे इलाज अपेक्षाकृत कम खर्च में हो सकते हैं।

इलाज से सस्ती लगी भारत की फ्लाइट

नितिन ने बताया कि उन्होंने अमेरिका से भारत की फ्लाइट का किराया भी चेक किया। उनके मुताबिक, टिकट करीब 1,200 डॉलर यानी लगभग ₹1.14 लाख में मिल रही थी। यहीं से उनके मन में सवाल आया कि अगर भारत की फ्लाइट का खर्च ही करीब 1.14 लाख रुपये है और अमेरिका में सिर्फ डेंटल ट्रीटमेंट के लिए 2.37 लाख रुपये देने पड़ रहे हैं, तो क्यों न भारत जाकर इलाज कराया जाए।

‘क्या मुझे भारत जाकर इलाज कराना चाहिए?’

नितिन ने वीडियो में अपने फॉलोअर्स से पूछा कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए। अमेरिका में इलाज कराएं या भारत आकर दांतों का इलाज करवाएं? उन्होंने दावा किया कि भारत में रूट कैनाल, दांतों की सफाई और अन्य डेंटल केयर करीब ₹10 हजार से ₹15 हजार में हो सकती है। हालांकि, इलाज की वास्तविक कीमत डॉक्टर, शहर, प्रक्रिया और मरीज की स्थिति के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है।

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सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

नितिन के वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स की भी खूब प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोगों ने अमेरिका में डेंटल केयर को बेहद महंगा बताया। एक यूजर ने लिखा कि ऐसी स्थिति में भारत की फ्लाइट बुक करना ही बेहतर है। एक अन्य यूजर ने कहा कि अमेरिका में दांतों का इलाज वाकई काफी महंगा पड़ता है। वहीं एक कमेंट में नितिन की तुलना पर सहमति जताते हुए लिखा गया कि यहां तो फ्लाइट का खर्च ही इलाज से कम नजर आ रहा है।

Success Story: छत पर शुरू की ड्रैगन फ्रूट की खेती, ऐसे होने लगी लाखों की कमाई, महिला ने अपनाया ये तरीका

Success Story: छत पर शुरू की ड्रैगन फ्रूट की खेती, ऐसे होने लगी लाखों की कमाई, महिला ने अपनाया ये तरीका

रिटायरमेंट के बाद आमतौर पर लोग आराम और परिवार के साथ समय बिताने की योजना बनाते हैं। लेकिन केरल की पूर्व हेडमिस्ट्रेस रेमाभाई एस की जिंदगी में रिटायरमेंट के बाद एक अलग ही अध्याय शुरू हुआ। अकेलेपन से निपटने के लिए घर में पौधे लगाने से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे ऐसे बिजनेस में बदल गया, जिससे अब वह करीब ₹4 लाख महीने की कमाई कर रही हैं।

मां की मौत के बाद बढ़ गया था अकेलापन

रेमाभाई ने 31 मई 2022 को 30 साल से ज्यादा समय तक जूलॉजी पढ़ाने के बाद रिटायरमेंट लिया। उनके पति रिटायर्ड सीनियर बैंक मैनेजर हैं और उस समय भी एक इंजीनियरिंग कॉलेज में काम कर रहे थे। वहीं उनका बेटा और बहू दोनों डॉक्टर हैं और दिल्ली में रहते थे। उसी साल उनकी मां का निधन हो गया। रिटायरमेंट और मां की मौत के बाद घर में अकेलापन उन्हें ज्यादा महसूस होने लगा। इसी दौरान उन्होंने खुद को व्यस्त रखने के लिए घर में पौधे उगाने का फैसला किया।

52 विदेशी फलों पर की रिसर्च, फिर चुना ड्रैगन फ्रूट

रेमाभाई ने शुरुआत किसी जल्दबाजी में नहीं की। उन्होंने जर्नल, ऑनलाइन जानकारी और अलग-अलग फार्म की यात्राओं के जरिए करीब 52 विदेशी फलों के बारे में जानकारी जुटाई। काफी रिसर्च के बाद उन्होंने Malaysian King Red Dragon Fruit किस्म को चुना। सीमित जगह में ज्यादा पौधे लगाने के लिए उन्होंने हाई-डेंसिटी फार्मिंग का तरीका अपनाया।

1,750 वर्ग फुट में लगाए 360 पौधे

घर के करीब 1,750 वर्ग फुट के हिस्से में उन्होंने 360 ड्रैगन फ्रूट पौधे लगाए। इसके लिए 90 स्थानीय स्तर पर बने कंक्रीट पोल लगाए गए और हर पोल पर चार पौधों को सहारा दिया गया। उन्होंने खर्च कम रखने के लिए GI पाइप और पुराने टायरों का भी इस्तेमाल किया। शुरुआती दौर में एक पौधे की स्टेम करीब ₹100 में खरीदी गई थी। मेहनत का नतीजा जल्दी दिखा। करीब छह महीने में पौधों में फूल आने लगे और मार्च 2023 से उन्होंने फल की पहली फसल लेना शुरू कर दिया।

शुरुआत में ₹50 हजार, फिर बढ़कर ₹1.5 लाख महीना

पहले 360 पौधों से उन्हें हर महीने ₹50 हजार से ज्यादा की आमदनी हुई। पौधों के बड़े होने के साथ कमाई बढ़कर करीब ₹1.5 लाख महीने तक पहुंच गई। उत्पादन के चरम समय में वह लगभग 750 किलो ड्रैगन फ्रूट हर महीने तैयार करने लगीं। वह फल करीब ₹175 प्रति किलो की दर से बेचती थीं। खास बात यह रही कि थोक खरीदार और ऑर्गेनिक स्टोर उनके घर से ही फल उठा लेते थे।

नई जमीन नहीं खरीदी, छत को बनाया अगला फार्म

बिजनेस बढ़ाने के लिए रेमाभाई के सामने अगली चुनौती थी बिना जमीन खरीदे उत्पादन बढ़ाना। घर की छत पर बड़ी मात्रा में मिट्टी ले जाना उन्हें सही नहीं लगा। इसलिए उन्होंने सोइल-लेस यानी कम मिट्टी वाली खेती के विकल्प पर प्रयोग शुरू किया। उन्होंने सामान्य मिट्टी और घर में तैयार किए गए कंपोस्ट की तुलना की। कंपोस्ट में पौधों की ग्रोथ बेहतर दिखने के बाद उन्होंने इसी तरीके को आगे बढ़ाया।

बैरल में लगाए 100 और पौधे

रेमाबाई ने छत पर 50 बैरल लगाए। इनमें कंपोस्ट और गोबर की खाद का मिश्रण इस्तेमाल किया गया और हर बैरल में दो पौधे लगाए गए। इस तरह छत पर 100 और ड्रैगन फ्रूट पौधे तैयार हो गए। करीब पांच महीने में इन पौधों पर फल आने लगे। अक्टूबर 2023 तक छत की खेती भी उत्पादन देने लगी थी। एक पौधे पर एक समय में करीब 10 से 20 फल तक दिखाई देते थे।

घर के कचरे से तैयार करती हैं खाद और लिक्विड फर्टिलाइजर

रेमाबाई की खेती की खासियत सिर्फ ड्रैगन फ्रूट उगाना नहीं है। वह घर और बगीचे से निकलने वाले जैविक कचरे का इस्तेमाल भी खेती में करती हैं। किचन वेस्ट, पत्तियां, कटहल का बचा हिस्सा, प्याज और सब्जियों के अवशेष जैसी चीजों से वह कंपोस्ट तैयार करती हैं। उनके पास तीन कंपोस्टिंग यूनिट हैं और वह 15 से ज्यादा तरह के लिक्विड प्रिपरेशन भी तैयार करती हैं। मछली के कचरे से वह फिश अमीनो एसिड भी बनाती हैं। उनके मुताबिक, अब तक 5,000 लीटर से ज्यादा यह तैयारी तैयार की जा चुकी है।

साल में ज्यादा लंबे समय तक मिलता है फल

उनके खेती के तरीके का एक फायदा यह भी है कि ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन लंबे समय तक चलता है। जहां आमतौर पर इसकी मुख्य फसल करीब पांच से छह महीने तक रहती है, वहीं रेमाबाई लगभग 10 महीने तक फल प्राप्त कर लेती हैं। जनवरी और फरवरी में उत्पादन में मुख्य अंतराल रहता है। उनके बगीचे में महीने में करीब तीन बार फसल होती है और हर बार लगभग 250 किलो फल निकलता है।

अब पौधों की कटिंग भी बन गई कमाई का जरिया

समय के साथ रेमाभाई के ड्रैगन फ्रूट पौधों की स्टेम कटिंग की मांग भी बढ़ने लगी। उन्होंने इसे अलग आय के स्रोत के रूप में विकसित कर लिया। वह एक कटिंग करीब ₹70 में बेचती हैं और अब तक भारत, मालदीव और श्रीलंका में उनके 2,500 से ज्यादा ग्राहक बताए जाते हैं। बड़े ऑर्डर कुरियर के जरिए भेजे जाते हैं। एक दिन में तेलंगाना के लिए 5,500 स्टेम कटिंग का ऑर्डर भी भेजा गया।

सिर्फ पौधे नहीं बेचतीं, तरीका भी सिखाती हैं

रेमाबाई अपने ग्राहकों को सिर्फ कटिंग देकर नहीं छोड़तीं। वह उन्हें पौधे लगाने और उनकी देखभाल के बारे में जानकारी देती हैं और आगे की ग्रोथ पर भी नजर रखती हैं। उनके मुताबिक, सही परिस्थितियों में स्टेम से करीब छह महीने में फल मिलना शुरू हो सकता है।

रिटायरमेंट का शौक बना पूरा बिजनेस

रेमाबाई की कहानी की खास बात यह है कि उन्होंने बिजनेस शुरू करने के लिए न बड़ी जमीन खरीदी और न ही भारी निवेश किया। घर के आंगन और छत जैसी सीमित जगह का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने पहले पौधे लगाए, फिर रिसर्च की, प्रयोग किए और धीरे-धीरे खेती को कमाई के मॉडल में बदल दिया।

आज ड्रैगन फ्रूट, छत पर खेती और स्टेम कटिंगइन अलग-अलग स्रोतों से उनकी कुल मासिक कमाई करीब ₹4 लाख बताई जाती है। रिटायरमेंट के बाद अकेलेपन से बचने के लिए शुरू हुआ पौधों का शौक अब उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता की कहानी बन चुका है।

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आजीविका मिशन की सहायता से सालाना ढाई लाख कमा रहीं मजदूर रहीं सोनभद्र की निर्मला

आजीविका मिशन की सहायता से सालाना ढाई लाख कमा रहीं मजदूर रहीं सोनभद्र की निर्मला

Sonbhadra Nirmala Success Story

Sonbhadra Nirmala Success Story: प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए योगी सरकार राज्यव्यापी स्तर पर आजीविका मिशन को मजबूती से लागू कर रही है। इन प्रयासों का ही नतीजा है कि अब आदिवासी और पिछड़े अंचल की महिलाएं उद्यमी बन रही हैं। सोनभद्र जिले के राबर्ट्सगंज ब्लॉक के बिचपई गांव की अनुसूचित जाति की निर्मला इसकी एक जीवंत मिसाल हैं। कभी परिवार का खर्च चलाने के लिए मजदूरी करने वाली निर्मला अब सफल उद्यमी बन चुकी हैं।

 

स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने हुनर सीखा और योगी सरकार से मिली आर्थिक मदद ने उन्हें अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। रंग-बिरंगी डिजाइनर मोमबत्तियों से शुरू हुआ उनका सफर अब जूस, पॉपकॉर्न, गुलाब का गुलकंद, शर्बत और गाजर के मुरब्बे तक पहुंच चुका है। उनकी सालाना कमाई करीब ढाई लाख रुपये हो गई है। उनकी सफलता से प्रेरित होकर गांव की 12 से 15 महिलाएं भी आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ी हैं।

स्वयं सहायता समूह ने खोला नया रास्ता

राबर्ट्सगंज ब्लॉक के बिचपई गांव की निर्मला बीए तक पढ़ी हैं। पति-पत्नी, तीन बेटियों और एक बेटे वाले छह सदस्यीय परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। घर की जिम्मेदारियों के साथ उन्हें मजदूरी करनी पड़ती थी। बच्चों की बेहतर परवरिश और परिवार की आय बढ़ाने की कोशिश में वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। यहीं से उनकी जिंदगी बदलने का रास्ता खुला। मोमबत्ती बनाने का प्रशिक्षण लिया और अपने हुनर को कारोबार में बदलने का निर्णय लिया।

60 हजार की सीड मनी से शुरू हुआ उद्यम

उद्यमिता विकास परियोजना की टीम ने निर्मला के प्रयास को देखते हुए 60 हजार रुपए की सीड मनी (प्रारंभिक सहायता राशि) उपलब्ध कराई। इससे उन्होंने अलग-अलग डिजाइन की मोमबत्तियों के सांचे खरीदे। दीपावली और अन्य त्योहारों पर मोमबत्तियां बनाकर उनकी बिक्री शुरू की। मांग बढ़ने पर इसे नियमित कारोबार बना लिया। खादी ग्रामोद्योग विभाग के सहयोग से पॉपकॉर्न मशीन मिली तो आमदनी का एक और जरिया जुड़ गया। इसके बाद खाद्य सुरक्षा एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग से दो माह का प्रशिक्षण लेकर उन्होंने गुलाब से गुलकंद, शर्बत और गाजर का मुरब्बा बनाना भी सीख लिया। अब मौसम के अनुसार इनका उत्पादन करती हैं। फूल, पेड़ और दूसरी सजावटी आकृतियों वाली उनकी रंगीन मोमबत्तियां बाजार में अपनी जगह बना रही हैं। उनका अगला लक्ष्य उत्पादों को ऑनलाइन बाजार तक पहुंचाना है।

Sonbhadra Nirmala Success Story

गांव की महिलाओं में भी जाग रहा आत्मविश्वास

निर्मला की सफलता का असर गांव की दूसरी महिलाओं पर भी पड़ा है। उनके उद्यम से प्रेरित होकर गांव की 15 महिलाएं काम से जुड़ने और अपना रोजगार शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ी हैं। पिछड़े और आदिवासी बहुल बिचपई में यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी सीमित थी, वे अब स्वयं सहायता समूहों के जरिए कारोबार की ओर कदम बढ़ा रही हैं। निर्मला बताती हैं कि पहले महिलाएं घर और घूंघट तक सीमित रहती थीं। अब वे बाहर निकलकर काम कर रही हैं। आमदनी बढ़ने से बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाने का रास्ता खुला है। कभी लोगों से बात करने में झिझकने वाली निर्मला अब आत्मविश्वास से अपने कारोबार की बात करती हैं। उनके पति भी उद्यम को आगे बढ़ाने में साथ दे रहे हैं।

पूरे प्रदेश में महिलाओं को सशक्त बना रहा आजीविका मिशन

उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से पूरे प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। स्वयं सहायता समूहों और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़कर महिलाएं प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग के सहारे अपने उद्यम खड़े कर रही हैं। निर्मला की कहानी इसी व्यापक बदलाव की एक तस्वीर है, जहां कभी मजदूरी परिवार की मजबूरी थी और आज अपना कारोबार उसकी आर्थिक ताकत बन गया है।

टायर 2 सिटी के इस लड़के ने 25 की उम्र में बनाया ₹1.6 करोड़ का नेटवर्थ, बैंक में पड़े हैं 45 लाख रुपये! डिजिटल की ताकत से मिली ये सक्सेस

Tier 2 City Story: इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के दौर में सही सोच और सही समय पर शुरुआत किसी की भी जिंदगी बदल सकती है। ऐसी ही एक कहानी रेडिट पर सामने आई है। भारत के एक टायर-2 शहर के रहने वाले 25 वर्षीय युवक ने महज 18 साल की उम्र में फ्रीलांसिंग से शुरुआत की और देखते ही देखते अपना खुद का डिजिटल-मीडिया बिजनेस खड़ा कर लिया। अपनी मेहनत के बल पर इस युवक ने 25 साल की उम्र में करीब ₹1.6 करोड़ का नेटवर्थ हासिल कर लिया है। रेडिट पर अपनी इस सफलता की कहानी साझा करते हुए युवक ने अपने पूरे पोर्टफोलियो का ब्योरा दिया है।

18 की उम्र में फ्रीलांसिंग, फिर खड़ा किया अपना बिजनेस

युवक ने बताया है कि उसने 18 साल की उम्र से ही फ्रीलांस काम करना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे अनुभव हासिल करने के बाद उसने एक डिजिटल-मीडिया कंपनी की नींव रखी। आज उसकी इनकम का मेन सोर्स उसका बिजनेस ही है। बिजनेस होने की वजह से उसकी कमाई फिक्स नहीं है बल्कि उतार-चढ़ाव भरी है। इसके बावजूद उसका पोर्टफोलियो उसकी सफलता की कहानी बयान कर रहा है।

जानिए कहां-कहां इन्वेस्ट है ₹1.6 करोड़

25 साल के इस युवा एंटरप्रेन्योर ने अपने पैसों को अलग-अलग एसेट क्लासेज में डाइवर्सिफाई किया हुआ है:-

भारतीय शेयर: ₹85 लाख

कैश/बैंक अकाउंट: ₹45 लाख

रियल एस्टेट: ₹15 लाख

यूएस स्टॉक्स: ₹7.5 लाख

म्यूचुअल फंड्स: ₹5 लाख

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड: ₹5 लाख

क्रिप्टोकरेंसी: ₹3 लाख

गोल्ड ईटीएफ: ₹2 लाख

फिक्स्ड डिपॉजिट: ₹1 लाख

बैंक में पड़े हैं ₹45 लाख, आगे की स्ट्रैटिजी पर मांगी राय

युवक के बैंक खाते में पिछले काफी समय से ₹30 से ₹45 लाख की बड़ी राशि जमा है। उसका मानना है कि बचत खाते में इतना पैसा रखना काम का सौदा नहीं है। वह पिछले 1-2 सालों से रियल एस्टेट प्रॉपर्टी तलाश रहा है, लेकिन उसे अभी तक कोई ऐसा विकल्प नहीं मिला जहां कीमत और रिस्क/रिवॉर्ड का तालमेल सही बैठता हो। सुरक्षा के लिहाज से उसके पास ₹50 लाख का टर्म इंश्योरेंस तो है, लेकिन फिलहाल उसने अपने या अपने माता-पिता के लिए हेल्थ इंश्योरेंस नहीं लिया है।

FIRE गोल हासिल करने की चाहत

युवक का मुख्य उद्देश्य अपने डिजिटल मीडिया बिजनेस को आगे बढ़ाना, फाइनेंशियल स्थिति को मजबूत करना और किसी एक बिजनेस या एसेट पर निर्भरता कम करके फाइनेंशियल फ्रीडम हासिल करना है ताकि वह जल्द से जल्द फायर (FIRE- Financial Independence, Retire Early) का टारगेट हासिल कर सके।

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उसने रेडिट कम्युनिटी से सुझाव मांगते हुए पूछा कि अगर 25 साल की उम्र में किसी के पास ₹1.5 से ₹2 करोड़ का नेटवर्थ हो और ₹40-45 लाख कैश में हो, तो उसे अपने अगले कदम के रूप में किन चीजों पर फोकस करना चाहिए?

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

Bihar Board Class 10 Compartment: बिहार बोर्ड ने 10वीं कक्षा का कंपार्टमेंट की मार्कशीट जारी, छात्रों को स्कूल से मिलेंगे स्कोरकार्ड

Bihar Board Class 10 Compartment: बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड (BSEB) से बिहार बोर्ड कक्षा 10 कंपार्टमेंट परीक्षा और मध्यमा स्पेशल एग्जाम देने वाले छात्र अपने मार्कशीट और अन्य दस्तावेज जारी होने का इंतजार कर रहे हैं। बीएसईबी ने मैट्रिक कंपार्टमेंट परीक्षा 2026 का रिजल्ट 23 मई 2026 को घोषित किया था।इसके बाद से छात्रों को मूल मार्कशीट नहीं मिली है। अब बीएसईबी ने मैट्रिक कंपार्टमेंट परीक्षा के छात्रों के लिए एक जरूरी नोटिस जारी किया है।

नोटिस के अनुसार बीएसईबी मैट्रिक कंपार्टमेंट परीक्षा 2026 की मार्कशीट, प्रोविजनल सर्टिफिकेट और दूसरे संबंधित डॉक्यूमेंट अब लेने के लिए उपलब्ध हैं। स्कूल अधिकारी संबंधित डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर (DEO) के ऑफिस से डॉक्यूमेंट ले सकते हैं। इन्हें मिलने के बाद, स्कूल योग्य छात्रों को बिहार बोर्ड कक्षा 10 कंपार्टमेंट मार्कशीट और सर्टिफिकेट बांटेंगे। ऑफिशियल नोटिफिकेशन के अनुसार, डॉक्यूमेंट 20 अगस्त, 2026 से संबंधित डीईओ ऑफिस में उपलब्ध होंगे।

बिहार बोर्ड 10वीं कंपार्टमेंट मार्कशीट 2026 कैसे लें?

स्टूडेंट्स को सीधे डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर के ऑफिस जाने की जरूरत नहीं है। उन्हें यह जानने के लिए अपने संबंधित स्कूलों से संपर्क कर जानना होगा कि मार्कशीट और सर्टिफिकेट कब बांटे जाएंगे। इसकी प्रक्रिया यह है :

  • स्कूल हेड संबंधित डीईओ ऑफिस से डॉक्यूमेंट लेंगे।
  • स्कूलों को बिहार बोर्ड क्लास 10 कंपार्टमेंट मार्कशीट और प्रोविजनल सर्टिफिकेट मिलेंगे।
  • इसके बाद स्टूडेंट्स अपने संबंधित स्कूलों से अपने डॉक्यूमेंट ले सकते हैं।

बिहार बोर्ड मैट्रिक कम्पार्टमेंट एग्जाम 2026 रिजल्ट डिटेल्स

बिहार बोर्ड ने उन विद्यार्थियों के लिए कक्षा 10 कम्पार्टमेंट और विशेष परीक्षा कराई थी, जिन्हें विषय क्लियर करने या अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए एक और मौका चाहिए था। कम्पार्टमेंट परीक्षा में योग्य छात्र ज्यादा से ज्यादा दो विषयों की परीक्षा दे सकते थे। बीएसईबी मैट्रिक कम्पार्टमेंट रिजल्ट 2026, 23 मई, 2026 को घोषित किया गया था। बिहार बोर्ड कक्षा 10 की कम्पार्टमेंट परीक्षा 2 मई से 6 मई 2026 तक दो शिफ्ट में निर्धारित परीक्षा केंद्रों पर आयोजित की गई थीं। 20 अगस्त 2026 से छात्रों के अंकपत्र उनके संबंधित स्कूलों में उपलब्ध करा दिए गए हैं।

मौजूद डॉक्यूमेंट्स में बिहार बोर्ड कक्षा 10 कम्पार्टमेंट मार्कशीट, प्रोविजनल सर्टिफिकेट और दूसरे जरूरी रिकॉर्ड शामिल हैं। कुछ छात्रों के स्कोर भी स्क्रूटनी प्रक्रिया के बाद संशोधित किए गए थे। उनकी मार्कशीट भी कलेक्ट करने के लिए उपलब्ध हैं।

MPPSC Manoj Pal success story: 12वीं में 50% और 40 प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता भी नहीं तोड़ पाई मनोज का हौसला, आखिर फतह किया एमपीपीएससी

MPPSC Manoj Pal success story: 12वीं में 50% और 40 प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता भी नहीं तोड़ पाई मनोज का हौसला, आखिर फतह किया एमपीपीएससी

MPPSC Manoj Pal success story: मध्य प्रदेश में असिस्टेंट डायरेक्टर (फाइनेंस) बनने तक मनोज पाल का सफर ऐसी झकझोर देने वाली कहानी है, जो सिर्फ प्रेरणा नहीं देती। यह कहानी उनके दर्द और अथक परिश्रम को भी बयां करती है। नर्मदापुरम जिले के खपरिया गांव के रहने वाले मनोज ने लगभग 12 साल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की। इस दौरान उन्हें बार-बार मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन 2024 वो सुनहरा साल था, जब उन्हें अपनी बरसों की मेहनत का फल मिला, जब उन्होंने मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन (MPPSC) का स्टेट सर्विस एग्जाम पास कर लिया। उनके सफर में आर्थिक तंगी, परिवार का दबाव और कई नाकाम कोशिशें शामिल थीं। फिर भी, उन्होंने कभी अपनी किताबों का साथ नहीं छोड़ा।

12वीं कक्षा में 50% से असिस्टेंट डायरेक्ट (वित्त) तक

मनोज ने अपनी स्कूल की पढ़ाई अपने गांव में पूरी की और कक्षा 12 में लगभग 50% अंकों से पास हुए। घर में आर्थिक तंगी की वजह से उच्च शिक्षा हासिल करना मुश्किल था। वह कॉलेज के लिए नर्मदापुरम चले गए और सरकारी परीक्षा की तैयारी करने के साथ ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपना गुजारा किया।

कोविड 19 महामारी के दौरान उनके जीवन का सबसे मुश्किल दौर आया, जब हालात की वजह से उनकी आय रुक गई। वह अपने गांव लौट आए और पढ़ाई जारी रखने के लिए मजदूरी करते हुए पैसों की कमी को पूरा किया। बाद में वे इंदौर चले गए और एक कोचिंग सेंटर में काम करते हुए अपनी तैयारी जारी रखी।

40 असफलताओं की लंबी लिस्ट

इन सालों में, मनोज ने लगभग 40 प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, जिनमें पुलिस कांस्टेबल, फॉरेस्ट गार्ड, पटवारी, ऑडिटर और एडमिनिस्ट्रेटर के पद शामिल थे। उन्होंने कई एमपीपीएससी भर्ती के अलावा एसएससी के एमटीएस, सीएचएसएल और सीजीएल परीक्षाएं भी दीं। इनमें से कई परीक्षाओं में उन्हें आंशिक सफलता मिली, लेकिन अंतिम चयन से दूर रहे।

मुश्किल रहा एमपीपीएससी का सफर

उनका एमपीपीएससी का सफर खास तौर पर मुश्किल था। वह 9 बार परीक्षा में बैठे, हर बार प्रीलिम्स पास किया और आठ बार मेन्स स्टेज तक पहुंचे। वे सात इंटरव्यू के लिए बैठे लेकिन फाइनल लिस्ट में जगह नहीं बना सके।

डिसिप्लिन के आस-पास बना रूटीन

बार-बार फेल होने के बावजूद, पाल ने पढ़ाई का एक सख्त रूटीन बनाए रखा। वे सुबह 6 बजे लाइब्रेरी पहुंचते और घंटों पढ़ते, दिन में घर लौटकर खाना बनाते, खाते और फिर वापस चले जाते। वे अक्सर आधी रात या 1 बजे तक पढ़ते थे। उनकी तैयारी में रोजाना छह से आठ घंटे पढ़ाई, रेगुलर मॉक टेस्ट और अपनी गलतियों का डिटेल्ड एनालिसिस शामिल था। इसके अलावा, दोस्तों के साथ मुश्किल टॉपिक पर चर्चा और अपनी परीक्षा की रणनीति बनाने के लिए पिछले सालों के प्रश्नपत्र भी हल किए।

खुद पर भरोसा

मनोज का परिवार एक निम्न मध्यम वर्गीय किसान परिवार है। हालांकि उनके परिवार ने उनकी तैयारी में काफी मदद की, लेकिन लंबे समय तक बिना नौकरी के रहना एक बड़ी चिंता थी। उनका परिवार उनकी उम्र और जिम्मेदारियों को लेकर भी परेशान था, जिसमें उनकी बहनों की शादियां भी शामिल थीं। उन्होंने कहा कि गडरिया (गड़रिया) कम्युनिटी से होने का मतलब यह भी था कि उनके आस-पास के लोग उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं करते थे। फिर भी, उन्होंने तैयारी जारी रखी।

वह चयन जिसने खत्म किया 12 साल का इंतजार

राज्य सेवा परीक्षा 2024 में उनके चयन से आखिरकार सालों की अनिश्चितता खत्म हुई। उनके परिवार के लिए, यह पल बहुत इमोशनल था। पाल ने अपनी सफलता का क्रेडिट अपने माता-पिता के आशीर्वाद, अपने परिवार के सपोर्ट और मां नर्मदा की कृपा को दिया। उनके परिवार का रिएक्शन उनके प्रयासों में उनके भरोसे को दिखाता है: “भगवान का न्याय देर से मिल सकता है, लेकिन उसे कभी नकारा नहीं जा सकता।”

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Single Father ने सिखाया कि प्यार किसी Gender का मोहताज नहीं | Father raised her daughter alone

Single Father ने सिखाया कि प्यार किसी Gender का मोहताज नहीं | Father raised her daughter alone

“तुम अकेले बेटी नहीं पाल पाओगे”
ये बात विराज़ ने कई बार सुनी।
लेकिन उन्होंने जवाब शब्दों से नहीं दिया।
हर रात कुछ नया सीखा।
हर सुबह एक बेहतर पिता बनने की कोशिश की।
आज उनकी 6 साल की बेटी स्कूल से लौटकर सबसे पहले अपने पापा को ही ढूँढती है, क्योंकि उसके लिए वही उसकी सबसे सुरक्षित जगह हैं।

कुछ कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि प्यार किसी रिश्ते का नाम नहीं, निभाने का नाम है।

क्या आपको लगता है कि Parenting किसी एक Gender की ज़िम्मेदारी है? कमेंट में बताइए।

Single Father Raising Daughter, Parenting Story By Single Father, Single Parent Success Story

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7 साल में ₹5 लाख से बनाया ₹1.30 करोड़ का पोर्टफोलियो! ट्रेडर की इस एक सीक्रेट ट्रिक ने बदली किस्मत, जानिए पूरा फॉर्मूला

Share Market Success Story: शेयर बाजार और ट्रेडिंग को लोग अक्सर रातों-रात अमीर बनने की ‘जैकपॉट मशीन’ समझते हैं। लेकिन बिना सोचे-समझे लगाया गया दांव आपको अमीर बनाने के बजाय कंगाल भी कर सकता है! इसी धारणा को पूरी तरह से झुठलाते हुए एक ट्रेडर ने साबित कर दिया कि बाजार में असली पैसा तुक्के से नहीं, बल्कि अनुशासन और सही सिस्टम से बनता है।

महज ₹5 लाख की शुरुआती पूंजी से सफर शुरू करने वाले इस ट्रेडर ने 7 सालों के उतार-चढ़ाव, भारी घाटे और अपनी गलतियों से सीखते हुए ₹1.30 करोड़ का विशाल पोर्टफोलियो खड़ा कर दिया। आइए आपको बताते हैं बिना किसी शॉर्टकट के शेयर बाजार में मिली इस शानदार कामयाबी की पूरी इनसाइड स्टोरी।

₹5 लाख से शुरुआत और ‘स्टॉक टिप्स’ की शुरुआती नाकामी

ट्रेडर ने अपने बाजार के सफर की शुरुआत साल 2018-19 में करीब ₹5 लाख के साथ की थी। नए निवेशकों की तरह वे भी शुरुआत में लोगों के दिए ‘स्टॉक टिप्स’ पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे और मार्केट खुलते ही शेयर्स में शॉर्टिंग करते थे। हालांकि इस रणनीति से कुछ पैसे जरूर बने, लेकिन ब्रोकरेज और टैक्स चुकाने के बाद हाथ में कुछ खास नहीं बचा।

ऑप्शन बाइंग से सेलिंग का सफर और ₹10 लाख के कर्ज का झटका

शुरुआती दौर के बाद उन्होंने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में कदम रखा और ऑप्शन बाइंग शुरू की। यूट्यूब पर वित्तीय एक्सपर्ट्स का वीडियो देखने के बाद उनके सोचने का तरीका बदला और वे ‘ऑप्शन बायर’ से ‘ऑप्शन सेलर’ बनने की तरफ बढ़े।

ऑप्शन सेलिंग के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने अपने दोस्त से ₹10 लाख उधार लिए। दुर्भाग्य से यह रणनीति पूरी तरह से फेल हो गई और उन्हें भारी नुकसान हुआ। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, दोस्त का पूरा कर्ज चुकाया और अपनी गलतियों से सीख लेकर नए सिरे से पढ़ाई शुरू की।

‘StockMock’ पर बैकटेस्टिंग ने बदली पूरी किस्मत

उनकी ट्रेडिंग जर्नी में असली टर्निंग प्वाइंट तब आया जब उन्होंने StockMock प्लेटफॉर्म पर अपने ट्रेडिंग सिस्टम की नियमबद्ध बैकटेस्टिंग शुरू की। उन्होंने ‘टाइम-बेस्ड शॉर्ट स्ट्रैडल्स’ का टेस्टिंग किया और बिना किसी इमोशन में बहे कड़े अनुशासन से नियमों का पालन किया:

    • 2020 का रिटर्न: 86% का बंपर मुनाफा।
    • 2021 का रिटर्न: 83% का शानदार रिटर्न हासिल किया।
    • उन्होंने जेरोधा का 60-डे चैलेंज लगातार 17 विन के साथ अपने नाम किया।

‘सफल ट्रेडिंग रोमांचक नहीं, बल्कि बोरिंग होती है’

ओवरट्रेडिंग और लालच से बचने के लिए उन्होंने किताबें पढ़ना शुरू किया। जोएल ग्रीनब्लाट की मशहूर किताब ‘The Little Book That Beats the Market’ से प्रेरणा लेकर उन्होंने सिस्टमैटिक इन्वेस्टिंग का तरीका समझा।

आज वे F&O से मिलने वाले मुनाफे को इक्विटी में अपने बनाए सिस्टमैटिक फ्रेमवर्क के जरिए लंबे समय के लिए इन्वेस्ट करते हैं। पिछले 7 सालों में उनका वास्तविक CAGR लगभग 48% रहा है। उनका सबसे बड़ा गुरुमंत्र है, ‘मैंने सब कुछ किताबों, यूट्यूब, वेबिनार और आर्टिकल्स से सीखा है, सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।’

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़

X पर उनकी यह कहानी सामने आते ही लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रियाएं आने लगीं। एक यूजर ने लिखा, ‘₹10 लाख के कर्ज में फेल होने के बाद आम तौर पर लोग ट्रेडिंग छोड़ देते हैं, लेकिन इन्होंने कर्ज चुकाया और सीखते रहे। यही असली कहानी है।’ दूसरे यूजर ने कहा, ‘ऑप्शन बाइंग के जाल से निकलकर सिस्टमैटिक ऑप्शन सेलिंग और बैकटेस्टिंग अपनाना ही सबसे समझदारी भरा कदम था।’

नए निवेशकों के लिए क्या है सीख?

ट्रेडर का यह सफर यह साबित करता है कि शेयर बाजार में टिके रहने के लिए ‘टिप्स’ नहीं, बल्कि ‘सिस्टम और अनुशासन’ काम आता है। अगर आप भी बाजार में लंबे समय के लिए टिकना चाहते हैं, तो बिना सीखे दांव लगाने के बजाय बैकटेस्टिंग, रिस्क मैनेजमेंट और सब्र को अपनी ताकत बनाएं।

Disclaimer: मनीकंट्रोल ने संबंधित व्यक्ति द्वारा किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है। यह जानकारी पूरी तरह से  X पर उनके बयानों/पोस्ट पर आधारित है और केवल सूचना के उद्देश्यों के लिए है, इसे निवेश की सलाह न माना जाए।

गाँव की लड़की ने YouTube से बदली किस्मत | Poonam Kushwaha | Desi Food Creator | Madhya Pradesh

गाँव की लड़की ने YouTube से बदली किस्मत | Poonam Kushwaha | Desi Food Creator | Madhya Pradesh

मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव शिवपुरी की रहने वाली पूनम कुशवाहा ने YouTube और Instagram पर देसी खाना बनाकर अपनी किस्मत बदल दी।
200 वीडियो तक सिर्फ 1000 views मिलने के बाद भी हार नहीं मानी और एक दिन 35 Million views के साथ Viral हो गई।
आज वीडियो पर व्यूज भी आते है और लोगों का प्यार भी। इस सफर में उनका साथ दिया उनके छोटे भाई नरेंद्र ने जिन्होंने हर मुश्किल वक्त पर भी बहन का साथ नहीं छोड़ा।

@poonamk.official

Desi Food Vlogger, Brother Sister Bond, Small Village Success Story

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