DDU-GKY Success: सीवान के चंदन को सीधे मिली दुबई की नौकरी! इस ग्रामीण कौशल योजना ने बदली 12.35 लाख युवाओं की किस्मत

DDU-GKY Success: गांवों में आज भी कई परिवारों की कमाई खेती और फसल पर निर्भर करती है। लेकिन अगर फसल अच्छी न हो या खेती से कमाई कम हो जाए, तो परिवार के सामने आमदनी का दूसरा जरिया तलाशने की चुनौती खड़ी हो जाती है। ऐसे में किसी युवा के पास कोई काम की स्किल होना उसके लिए कमाई के नए रास्ते खोल सकता है। इसी सोच के साथ सरकार की दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) ग्रामीण युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देकर रोजगार के अवसरों से जोड़ने का काम करती है।

बता दें कि इस योजना की शुरुआत 25 सितंबर 2014 को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत की गई थी। यह योजना ग्रामीण इलाकों के गरीब और कमजोर परिवारों के युवाओं पर ध्यान देती है। इस योजना के तहत युवाओं को ऐसी स्किल की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे उन्हें नौकरी पाने और लंबे समय तक रोजगार से जुड़े रहने में मदद मिल सके। इसमें 15 से 35 साल की उम्र के युवाओं को ट्रेनिंग दी जाती है और उन्हें रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाता है।

वहीं, बदलते समय और रोजगार की जरूरतों को देखते हुए DDU-GKY में भी बदलाव किए गए हैं। अब योजना के नए DDU-GKY 2.0 फ्रेमवर्क में ऐसी ट्रेनिंग पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जिसकी जरूरत कंपनियों और इंडस्ट्री को है। इसका मकसद युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग देना नहीं, बल्कि उन्हें टिकाऊ रोजगार से जोड़ना है।

इसके तहत नौकरी मिलने के बाद भी युवाओं को मदद देने, नई स्किल सीखने और पहले से सीखी स्किल को बेहतर करने पर ध्यान दिया जा रहा है। ट्रेनिंग, असेसमेंट, सर्टिफिकेट, निगरानी और रोजगार की जानकारी रखने की पूरी प्रक्रिया को भी डिजिटल सिस्टम से जोड़ा गया है।

मकसद साफ है: ट्रेनिंग से नौकरी मिलनी चाहिए, और नौकरी लंबे समय तक चलनी चाहिए। जून 2026 तक, DDU-GKY के तहत 18.45 लाख ग्रामीण युवाओं को ट्रेनिंग दी गई है, जबकि 12.35 लाख लोगों को नौकरी मिली है।

इन आंकड़ों के पीछे उन लोगों की कहानियां भी हैं, जिनकी जिंदगी तब बदल गई जब सीखने-सिखाने की प्रक्रिया ने उनके लिए नौकरी और रोजी-रोटी के रास्ते खोल दिए।

सपने को जिंदा रखना

नागालैंड की विमेथानो सखरी ने सालों तक अपनी मां को दस लोगों के परिवार का पेट पालने के लिए दिन-रात मेहनत करते देखा। हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, विमेथानो आगे की पढ़ाई करना चाहती थीं, लेकिन पैसों की तंगी के कारण उनका यह सपना पूरा करना मुश्किल हो रहा था।

जब उन्हें DDU-GKY के बारे में पता चला, तो सब कुछ बदल गया। अपने सपनों को छोड़ने से इनकार करते हुए, उन्होंने DDU-GKY के टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया। कुछ महीनों बाद, विमेथानो ने ‘द डेन बेंगलुरु’ में फूड एंड बेवरेज सर्विस में अपनी पहली नौकरी शुरू की। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी। यह उनके और उनके परिवार के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत थी।

अपनी यात्रा को याद करते हुए विमेथानो कहती हैं, “मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय और नागालैंड सरकार के NSRLM का शुक्रिया अदा करती हूं कि उन्होंने DDU-GKY को लागू किया, जिससे पूरे भारत में कई बेरोजगार युवाओं को मदद मिली है। यह मौका मेरे लिए एक वरदान था, और मुझे उम्मीद है कि और भी कई युवा इससे फायदा उठा सकेंगे, ठीक वैसे ही जैसे मैंने उठाया।”

विमेथानो के लिए, DDU-GKY ने बीच में छूटी हुई पढ़ाई को करियर के लिए एक लॉन्चपैड में बदल दिया।

लेकिन हर युवा की कहानी एक जैसी नहीं होती। चंदन शाह के लिए यह मौका उन्हें अपने घर से बहुत दूर ले गया।

छोटे-मोटे कामों से विदेश में करियर तक का सफर

एक समय ऐसा था जब चंदन शाह के परिवार के लिए बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल था। बिहार के सिवान जिले के तेतहली गांव में रहने के कारण, उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने की बहुत कम उम्मीद थी। हाई स्कूल के बाद उन्होंने खेतों में अपने पिता की मदद करने के लिए स्कूल छोड़ दिया। आस-पास ज्यादा मौके न होने की वजह से, चंदन ने गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम शुरू किए। फिर भी, उस काम से इतनी कमाई नहीं हो पाती थी कि एक अच्छा जीवन जी सकें।

उनकी मां, जो ‘गेंदा जीविका स्वयं सहायता समूह’ (Genda JEEViKA Self Help Group) की सदस्य थीं, की वजह से उनके लिए एक नया मौका सामने आया। उन्होंने चंदन को DDU-GKY के बारे में जानने और उसे आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया। चंदन ने काउंसलिंग करवाई और असिस्टेंट इलेक्ट्रीशियन के तौर पर ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। इस ट्रेनिंग ने उन्हें करियर की ओर पहला कदम बढ़ाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाए। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें बद्दी में एक डिस्टिलरी में हेल्पर की पहली नौकरी मिली, जहां वे हर महीने ₹10,500 कमाते थे। इस शुरुआती अनुभव ने उन्हें आगे पेशेवर तरक्की के लिए एक मजबूत आधार दिया। इन्हीं हुनर ​​और अनुभव के दम पर, चंदन ने बाद में विदेश में काम करने का मौका तलाशा और दुबई चले गए, जहां वे ‘अल शफा जनरल कॉन्ट्रैक्टिंग’ (Al Shafa General Contracting) में इलेक्ट्रीशियन के तौर पर शामिल हुए।

तब तक, उनकी महीने की कमाई बढ़कर ₹35,000 हो गई थी। इसका असर सिर्फ उनके करियर तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे उनके परिवार को भी बेहतर आर्थिक सुरक्षा मिली। चंदन अपने परिवार का खर्च उठाने और अपने भाई-बहनों की प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम हो गए। उनके इस सफर ने उन्हें गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना दिया।

चंदन की कहानी दिखाती है कि कैसे नौकरी का पहला मौका लगातार तरक्की करने वाले करियर की नींव बन सकता है। DDU-GKY ने उन्हें वह पहला कदम उठाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाया, जबकि उनके पक्के इरादे और अनुभव ने उन्हें आगे के मौकों को पाने में मदद की। इन सबके मेल से उन्हें अपने और अपने परिवार के लिए एक ज्यादा सुरक्षित भविष्य बनाने में मदद मिली।

हालांकि, DDU-GKY से जुड़ी हर कहानी घर से दूर जाने की नहीं है। कुछ युवाओं के लिए यह योजना उन्हें बेहतर अवसरों की तलाश में बाहर ले जाती है, तो कुछ के लिए यही मौका उन्हें अपने घर और गांव वापस लौटने का रास्ता देता है। ऐसी ही कहानी है रूपाली हांसदा की।

नौकरी को एक बिनेस में बदलना

आर्थिक तंगी के कारण असम के चराइदेव की रहने वाली रूपाली हासदा को 9वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और उनके पिता ही घर में कमाने वाले अकेले व्यक्ति थे। उनकी मां, जो एक स्वयं-सहायता समूह (Self-Help Group) की सक्रिय सदस्य थीं, ने उनके सपनों को हमेशा बढ़ावा दिया। रूपाली को एक ‘जीविका सखी’ के जरिए DDU-GKY के बारे में पता चला और दिसंबर 2022 में उन्होंने ‘सिलाई मशीन ऑपरेटर’ ट्रेड में दाखिला लिया।

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, उन्हें तमिलनाडु के तिरुपुर में KPR अपैरल मिल्स में नौकरी मिल गई। 5 महीने तक उन्होंने एक अनजान शहर में काम किया और नए माहौल में खुद को ढाला। फिर भी, उनका मन घर पर ही लगा रहता था। नौकरी से हुई बचत के साथ वह हाथीबंधा लौट आईं और सिलाई और कटाई केंद्र (Sewing and Cutting Centre) में 50,000 रुपये का निवेश किया। जो काम शुरू में सिर्फ उनकी अपनी आजीविका का जरिया था, उसने जल्द ही किसी और के लिए भी रोजगार का मौका बना दिया। उन्होंने केंद्र में एक युवा लड़की को काम पर रखा और अपने समुदाय में एक बिजनेस खड़ा करना शुरू किया। सालाना लगभग 1.10 लाख रुपये की कमाई के साथ, रूपाली का सफर स्किलिंग (कौशल विकास) का एक अलग पहलू दिखाता है। नौकरी ने उन्हें एक शुरुआत दी, लेकिन उन्होंने उस अनुभव को अपने खुद के काम में बदलने का फैसला किया।

रूपाली ने घर के पास ही अपनी आजीविका बनाने का फैसला किया। वहीं, हीरालाल ने एक अलग रास्ता चुना—ऐसा रास्ता जो उन्हें अपने सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए करियर बनाने में मदद करे।

अपना खुद का करियर

झारखंड के हीरालाल पंडित ने बचपन से ही देखा था कि कैसे हर फसल यह तय करती थी कि उनके परिवार का गुजारा कितने समय तक चलेगा। चार लोगों का उनका परिवार उनके पिता की मौसमी खेती पर निर्भर था, जिससे महीने में लगभग 5,000 रुपये की कमाई होती थी।

10वीं कक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने हर संभव तरीके से अपने पिता की मदद करना शुरू किया। दिव्यांग होने के कारण उनके लिए नौकरी पाना आसान नहीं था, लेकिन हीरालाल ने अपनी परिस्थितियों को अपने भविष्य पर हावी नहीं होने दिया।

वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में योगदान देते हुए अपना खुद का करियर बनाना चाहते थे। विकल्पों की तलाश करते समय, हीरालाल को DDU-GKY के बारे में पता चला। इस प्रोग्राम की मुफ्त ट्रेनिंग और प्लेसमेंट सहायता ने उन्हें हुनर ​​सीखने और नौकरी पाने का मौका दिया। उन्होंने झारखंड के दुमका में एक ट्रेनिंग सेंटर में ‘हेल्थकेयर मल्टीपर्पज’ ट्रेड में दाखिला लिया।

यह ट्रेनिंग हीरालाल के सफर का एक अहम मोड़ साबित हुई। उन्हें एक ऐसे माहौल में नई स्किल्स सीखने को मिलीं जहां उनके साथ सम्मान और बराबरी का व्यवहार किया गया। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें नासिक के SMBT हॉस्पिटल में ‘जनरल ड्यूटी असिस्टेंट’ के तौर पर नौकरी मिल गई। इस मौके ने उन्हें अपने परिवार की भलाई में योगदान देने के साथ-साथ खुद भी पैसे कमाने में मदद की। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अनुभव ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें अपनी काबिलियत के बारे में नई सोच दी।

आज, हीरालाल दूसरे युवाओं को भी अपनी मुश्किल हालात से आगे देखने और मिले हुए मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके लिए, यह सफर पहला कदम उठाने की हिम्मत से शुरू हुआ था। DDU-GKY ने उन्हें उस पहले कदम को एक करियर और ज्यादा सुरक्षित भविष्य की राह में बदलने में मदद की।

जब कोई हुनर ​​आजीविका का जरिया बन जाए

कोई हुनर ​​ग्रामीण परिवार की हर मुश्किल को दूर नहीं कर सकता, लेकिन यह बेहतर संभावनाओं के दरवाजे जरूर खोल सकता है। विमेथानो के लिए, इसने रोजगार का रास्ता तब बनाया जब आर्थिक तंगी की वजह से उसकी पढ़ाई रुक गई थी। चंदन के लिए, इसने एक ऐसे करियर की शुरुआत की जो उसे दुबई तक ले गया। रूपाली ने अपने हुनर ​​और अनुभव का इस्तेमाल करके अपना खुद का कारोबार शुरू किया, जबकि हीरालाल को रोजगार का जरिया और अपने परिवार की मदद करने का मौका मिला।

उनकी राहें अलग-अलग थीं, लेकिन उनमें एक बात समान थी: हुनर ​​सीखने, उसे आजमाने और आजीविका कमाने का मौका। DDU-GKY इसी पहले कदम को मुमकिन बनाना चाहता है, ताकि ग्रामीण युवा ट्रेनिंग से रोजगार की ओर और रोजगार से ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ आजीविका की ओर बढ़ सकें।

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सिर्फ 100 रुपये का पौधा और 20 साल बाद बड़ा फायदा? लाल चंदन की खेती से कमाई का तरीका जानिए

आज के समय में गार्डनिंग और पौधों की खेती को लोग सिर्फ शौक तक सीमित नहीं रख रहे हैं, बल्कि इसे भविष्य की कमाई से जोड़कर भी देख रहे हैं। इसी वजह से लाल चंदन (रेड सैंडर्स) जैसे कीमती पेड़ों की ओर किसानों और बागवानी प्रेमियों का आकर्षण बढ़ रहा है। अपनी खास लाल रंग की लकड़ी और बाजार में मांग के कारण यह पेड़ लंबे समय के निवेश के तौर पर चर्चा में है। हालांकि, लाल चंदन लगाना आसान कमाई का रास्ता नहीं है, क्योंकि इसके लिए कई वर्षों तक धैर्य, देखभाल और सुरक्षा की जरूरत होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, सही परिस्थितियों में विकसित होने वाला यह पेड़ भविष्य में अच्छी आर्थिक संभावनाएं दे सकता है। यही कारण है कि अब कई लोग खाली जमीन या बगीचे में लाल चंदन लगाने की योजना बना रहे हैं।

कम खर्च में शुरुआत, लेकिन मुनाफे के लिए लंबा इंतजार

लाल चंदन का एक पौधा करीब 50 से 100 रुपये की लागत में लगाया जा सकता है। हालांकि, इसे लगाकर तुरंत कमाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक लंबी अवधि की खेती है, जिसमें धैर्य और लगातार देखभाल सबसे जरूरी होती है।

15-20 साल की मेहनत के बाद मिल सकता है बड़ा फायदा

जानकारों के मुताबिक, लाल चंदन के पेड़ को पूरी तरह तैयार होने में लगभग 15 से 20 साल लग सकते हैं। इस दौरान सही मौसम, मिट्टी, सुरक्षा और नियमित देखभाल पेड़ के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। एक स्वस्थ पेड़ से अच्छी मात्रा में कीमती हार्टवुड मिलने की संभावना रहती है।

लाखों तक पहुंच सकती है लकड़ी की कीमत

लाल चंदन की लकड़ी की कीमत उसकी गुणवत्ता, वजन, बाजार मांग और सरकारी नियमों पर निर्भर करती है। अच्छी गुणवत्ता वाली लकड़ी कई बार काफी महंगी बिक सकती है। हालांकि, इसकी कमाई का अंदाजा पेड़ की स्थिति और उस समय के बाजार भाव के आधार पर ही लगाया जा सकता है।

समस्तीपुर में भी मिल रहे हैं पौधे

बिहार के समस्तीपुर जिले में लाल चंदन के पौधों को लेकर लोगों की रुचि बढ़ रही है। स्थानीय स्तर पर किसान और बागवानी प्रेमी कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बिरौली और रोसड़ा क्षेत्र की कुछ नर्सरियों से पौधे प्राप्त कर सकते हैं। यहां पौधों की कीमत लगभग 50 से 100 रुपये बताई जा रही है।

खेती से पहले नियमों की जानकारी जरूरी

लाल चंदन की खेती शुरू करने से पहले इसकी प्रजाति, पौधे की गुणवत्ता और कानूनी नियमों की जानकारी लेना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़ की कटाई, परिवहन और बिक्री से जुड़े वन कानूनों का पालन करना अनिवार्य है। सही जानकारी और नियमों के साथ ही इसकी खेती भविष्य में लाभकारी साबित हो सकती है।

बारिश से गिरा आंगन का पेड़ और 85 साल के बुजुर्ग एनजी केसरी को बना गया 28 लाख रुपये का मालिक! कैसे लगाएं चंदन का ये बेशकीमती पेड़?

अक्सर आपने सुना होगा कि एक ही रातों-रात किसी की किस्मत बदल गई, बेंगलुरु में ये कहावत सच होती नजर आई है। बेंगलुरु के रहने 85 वर्षीय एन. जी. केसरी की किस्मत रातों-रात बारिश ने बदल दी। बेंगलुरु में जब भी मॉनसून की तेज बारिश होती है, तो ज्यादातर लोग जलभराव, ट्रैफिक जाम और नुकसान की चिंता करने लगते हैं। एन. जी. केसरी के लिए एक तेज तूफान उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशकिस्मती बन गया।

एक बीज ने बदली किस्मत

यह कहानी करीब 40 साल पहले की है। एक दिन तेज हवा और बारिश के बाद एक अनजान बीज उनके घर के आंगन में आकर गिर गया। कुछ समय बाद वहां एक छोटा पौधा उग आया। केसरी ने उसे अपने बगीचे के बाकी पौधों की तरह ही संभाला और उसकी देखभाल की। बाद में उन्हें पता चला कि यह कोई साधारण पौधा नहीं, बल्कि कर्नाटक का बहुमूल्य चंदन का पेड़ है। समय के साथ पेड़ बड़ा और मजबूत होता गया और उसकी मनमोहक खुशबू पूरे इलाके में फैलने लगी।

मल्लेश्वरम के 17वें क्रॉस स्थित उनके घर के आंगन में लगा चंदन का पेड़ करीब 40 साल तक खामोशी से बढ़ता रहा। जब यह पूरी तरह तैयार हुआ, तो इसी एक पेड़ ने उन्हें करीब 28 लाख रुपये की कमाई कराई। यह दिखाता है कि धैर्य और सही देखभाल का फल कितना बड़ा हो सकता है। हालांकि, चंदन के पेड़ की खुशबू और उसकी कीमत ने सिर्फ लोगों का ही नहीं, बल्कि लकड़ी चोरों का भी ध्यान खींचा। बीते कई वर्षों में चोरों ने इस कीमती पेड़ को काटने की कई बार कोशिश की। पेड़ की सुरक्षा के लिए केसरी ने उसके चारों ओर मजबूत लोहे का जाल लगवा दिया और हमेशा उस पर नजर बनाए रखी।

बारिश से गिरा पेड़

इस साल जून के दूसरे सप्ताह में हुई तेज बारिश और आंधी ने चंदन के पेड़ को नुकसान पहुंचा दिया। तेज हवा के कारण पास का एक बड़ा पेड़ उखड़कर सीधे चंदन के पेड़ और उसके चारों ओर लगे लोहे के सुरक्षा जाल पर गिर गया। इससे चंदन का पेड़ भी गिर गया। शुरुआत में यह एक बड़ा नुकसान लगा, लेकिन बाद में यही घटना उनके लिए बड़ी खुशकिस्मती साबित हुई। केसरी ने कोई गलत रास्ता अपनाने के बजाय तुरंत वन विभाग को इसकी जानकारी दी। वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर पेड़ का निरीक्षण किया और उसे मैसूरु स्थित सरकारी चंदन डिपो ले जाने की अनुमति दे दी। जांच के बाद पता चला कि चंदन के पेड़ का वजन करीब एक मीट्रिक टन था।

बुजुर्ग के मिले 28 लाख

आखिरकार इस चंदन के पेड़ को कर्नाटक सोप्स एंड डिटर्जेंट्स लिमिटेड (केएसडीएल) ने खरीद लिया। इससे एन. जी. केसरी को करीब 28 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। कई वर्षों तक चंदन के पेड़ की सुरक्षा और देखभाल करने के लिए सरकारी कंपनी ने उन्हें ‘चंदन शिरोमणि’ सम्मान से भी नवाजा। यह अनोखी घटना एक बार फिर बताती है कि कर्नाटक में चंदन की खेती कितनी फायदेमंद हो सकती है। चंदन के पेड़ की गुणवत्ता और उसमें मौजूद तेल की मात्रा के आधार पर उसकी कीमत लाखों रुपये तक पहुंच सकती है। एक छोटे से पौधे से शुरू हुई यह कहानी आज धैर्य, मेहनत और अच्छी किस्मत की मिसाल बन गई है।

कैसे लगाएं चंदन का बेशकीमती पेड़?

चंदन का पेड़ दुनिया के सबसे कीमती पेड़ों में गिना जाता है। इसकी लकड़ी और तेल का उपयोग इत्र, दवाइयों, पूजा-पाठ और सौंदर्य प्रसाधनों में होता है। अगर आप चंदन का पौधा लगाना चाहते हैं, तो सबसे पहले अच्छी गुणवत्ता वाला पौधा किसी प्रमाणित नर्सरी से खरीदें। चंदन का पौधा अच्छी जल निकासी वाली दोमट या हल्की लाल मिट्टी में बेहतर बढ़ता है। इसे ऐसी जगह लगाएं जहां भरपूर धूप आती हो। पौधा लगाने के लिए लगभग 2 से 3 फीट गहरा गड्ढा तैयार करें और उसमें गोबर की सड़ी हुई खाद मिलाकर पौधा लगाएं।

चंदन एक अर्ध-परजीवी (Semi-Parasitic) पौधा है। इसका मतलब है कि इसकी अच्छी वृद्धि के लिए पास में कोई सहायक पौधा, जैसे अरहर, करंज, नीम, बबूल या अन्य उपयुक्त पेड़ होना जरूरी है। चंदन अपनी जड़ों के माध्यम से इन पौधों से कुछ पोषक तत्व प्राप्त करता है। शुरुआती दिनों में नियमित सिंचाई करें, लेकिन पानी का जमाव बिल्कुल न होने दें। समय-समय पर खरपतवार हटाएं और जैविक खाद का इस्तेमाल करें। उचित देखभाल के साथ चंदन का पेड़ धीरे-धीरे मजबूत होता है और कई वर्षों बाद अच्छी गुणवत्ता की लकड़ी देता है। अगर लंबी अवधि का निवेश करना चाहते हैं, तो चंदन की खेती एक अच्छा विकल्प हो सकती है। हालांकि, इसे लगाने से पहले अपने राज्य के नियमों और चंदन के पेड़ों से जुड़े कानूनी प्रावधानों की जानकारी जरूर लें।