Delhi Traffic Advisory Today: जंतर-मंतर प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस का बड़ा एक्शन, उन 31 पॉइंट्स की लिस्ट जहां ट्रैफिक डायवर्जन लागू

नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार 10 अक्टूबर को प्रस्तावित बड़े विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली पुलिस और ट्रैफिक पुलिस ने राजधानी भर में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा बुलाए गए इस प्रदर्शन के मद्देनजर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने एडवाइजरी जारी की है। पुलिस प्रशासन ने साफ किया है कि यह बिना अनुमति का प्रदर्शन है, इसलिए कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 30 से अधिक प्रमुख स्थानों पर ट्रैफिक डायवर्जन लागू किया जाएगा।

शनिवार सुबह 6:00 बजे से ही ट्रैफिक डायवर्जन की व्यवस्था लागू कर दी गई है। अगर आप आज दिल्ली की सड़कों, विशेषकर मध्य दिल्ली और लुटियंस जोन की तरफ निकलने वाले हैं, तो ट्रैफिक पाबंदियों और डायवर्जन पॉइंट्स की यह पूरी सूची जरूर देख लें।

इन 31 प्रमुख जगहों पर प्रभावित रहेगा ट्रैफिक, लागू होगा डायवर्जन

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस की एडवाइजरी के अनुसार, स्थिति और भीड़ के दबाव को देखते हुए शहर की इन 31 प्रमुख जगहों और उनसे जुड़ी सड़कों पर आवाजाही रोकी जा सकती है या ट्रैफिक का मार्ग बदला जा सकता है:

शंकर रोड गोलचक्कर–वंदे मातरम ‘टी’ पॉइंट (नई दिल्ली की ओर)

धौला कुआं फ्लाईओवर

झंडेवालान गोलचक्कर

पंचकुइयां गोलचक्कर

मंडी हाउस गोलचक्कर

डॉ. दिनेश नंदिनी डालमिया चौक (डब्ल्यू-पॉइंट)

राम चरण अग्रवाल चौक (ए-पॉइंट)

मिंटो रोड / दीनदयाल उपाध्याय मार्ग

गुरु नानक चौक

चेम्सफोर्ड रोड पर कनॉट प्लेस आउटर सर्कल टी-पॉइंट

भैरों रोड पर एमजी मार्ग (रिंग रोड) टी-पॉइंट

लोधी रोड फ्लाईओवर

नीला गुंबद गोलचक्कर

मदरसा टी-पॉइंट

सम्राट होटल गोलचक्कर

सरदार पटेल मार्ग–पंचशील मार्ग क्रॉसिंग

भीकाजी कामा प्लेस अंडरपास

मोती बाग फ्लाईओवर अंडरपास

रिंग रोड–सैन मार्टिन मार्ग टी-पॉइंट

अशोका रोड–जंतर मंतर रोड गोलचक्कर

विंडसर पैलेस गोलचक्कर

टॉलस्टॉय–जनपथ क्रॉसिंग

रेल भवन गोलचक्कर

जय सिंह रोड–संसद मार्ग क्रॉसिंग

कनॉट प्लेस आउटर सर्कल–बाराखंबा रोड टी-पॉइंट

गोल डाक खाना गोलचक्कर

पटेल चौक गोलचक्कर

जय सिंह रोड–अशोका रोड टी-पॉइंट

आरएमएल (RML) अस्पताल गोलचक्कर

कनॉट प्लेस आउटर सर्कल–संसद मार्ग टी-पॉइंट

सेंट्रल दिल्ली और लुटियंस जोन से जुड़ने वाले अन्य मुख्य रास्ते

दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों पर एंट्री-एग्जिट बंद

सड़क ट्रैफिक के अलावा सार्वजनिक परिवहन पर भी बड़ा असर पड़ा है। सुरक्षा कारणों के चलते दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने भी 9 अक्टूबर रात 9:00 बजे से 10 अक्टूबर शाम 6:00 बजे तक दिल्ली मेट्रो के 45 प्रमुख स्टेशनों पर यात्रियों के प्रवेश और निकास को बंद रखने की घोषणा की है। हालांकि बंद स्टेशनों पर मेट्रो बदलने की सुविधा उपलब्ध रहेगी।

बिना जरूरी काम के निकलने से बचें, स्टेशन और एयरपोर्ट जाने वाले रखें अतिरिक्त समय

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने आम जनता और यात्रियों के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जो लोग नई दिल्ली, सेंट्रल दिल्ली या आसपास के रास्तों से होकर रेलवे स्टेशनों, अंतरराज्यीय बस अड्डों (ISBT) या आईजीआई (IGI) एयरपोर्ट जाने वाले हैं, वे घर से अतिरिक्त समय लेकर निकलें ताकि जाम में फंसने की स्थिति में फ्लाइट या ट्रेन न छूटे। जिन इलाकों में ट्रैफिक डायवर्जन या पुलिस की बैरिकेडिंग लागू है, वहां बेहद जरूरी काम न होने पर जाने से बचें। ट्रैफिक पुलिस का कहना है कि ग्राउंड पर स्थिति के हिसाब से पाबंदियों में ढील दी जाएगी या उन्हें सख्त किया जाएगा।

कैसे चेक करें दिल्ली ट्रैफिक का पल-पल का अपडेट?

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने यात्रियों की सहूलियत के लिए रियल-टाइम अपडेट पाने के आधिकारिक माध्यम भी साझा किए हैं। यात्री सड़क पर निकलने से पहले इन प्लेटफॉर्म्स पर जाकर वैकल्पिक रास्तों की जानकारी ले सकते हैं:

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ट्रैफिक हेल्पलाइन: 1095 / 011-25844444

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सीजेपी के डर से दिल्ली बंद!

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के डर से केंद्र सरकार ने पूरी दिल्ली बंद कर दिया है और राजधानी के साथ साथ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भी छावनी में तब्दील कर दिया है। सीजेपी ने शनिवार, 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सीजेपी प्रदर्शन करेगी। लेफ्ट पार्टियों और आम आदमी पार्टी ने इस प्रदर्शन का समर्थन किया है। इस प्रदर्शन को रोकने के लिए मेट्रो, ट्रेन, सड़क, इंटरनेट, स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, दुकानें सब बंद हैं।

पुलिस ने दो टूक अंदाज में कहा है कि सीजेपी ने प्रदर्शन की इजाजत नहीं मांगी है इसलिए उसको प्रदर्शन नहीं करने दिया जाएगा। यह भी कहा गया है कि जंतर मंतर के इलाके में बीएनएस की धारा 163 लागू है। यानी पांच से ज्यादा लोगों के एक साथ इकट्ठा होने की अनुमति नहीं है। दूसरी ओर सीजेपी का कहना है कि जंतर मंतर प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह है इसलिए उनको अनुमति लेने की जरुरत नहीं है। सीजेपी के सौरव दास ने कहा कि उनके संगठन ने नहीं, बल्कि सरकार ने खुद ही दिल्ली बंद करा दी है।

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और पार्टी के अन्य नेताओं ने वीडियो बना कर जंतर मंतर पहुंचने का ऐलान किया है और लोगों से वहां पहुंचने की अपील भी की है। एक दिन पहले कर्नाटक में सीजेपी ने प्रदर्शन किया था लेकिन वहां ज्यादा संख्या में लोग नहीं जुटे थे। सीजेपी के नेता दिल्ली में जुलाई के जैसे प्रदर्शन की उम्मीद कर रहे हैं, जब उनके प्रदर्शन के कारण तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ था।

बहरहाल, सरकार ने इसे रोकने के लिए सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किए हैं। लेकिन साथ ही लगभग पूरी दिल्ली को बंद कर दिया है। शनिवार को दिल्ली के स्कूल, कॉलेजों में ऑनलाइन पढ़ाई होगी। बड़ी संख्या में मेट्रो स्टेशन बंद करने की घोषणा हो गई है। राजधानी दिल्ली पहुंचने वाली और दिल्ली से बाहर जाने वाली कई ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है। कनॉट प्लेस के आसपास की दुकानों को बंद रखने का निर्देश जारी किया गया है। इतना ही कनॉट प्लेस से दूर चांदनी चौक के इलाके में भी कई मार्केट बंद रखने को कहा गया है। अगले दो दिन शराब की दुकानें बंद रहेंगी। दिल्ली पुलिस के जवान होटलों में जाकर ऐसे लोगों की तलाश कर रहे हैं, जो शनिवार के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए बाहर से आए हैं। यह भी खबर है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में कई शहरों में ट्रेनों में लोगों को उतारा जा रहा है।

सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए चप्पे चप्पे पर अर्धसैनिक बलों और पुलिस के जवानों की तैनाती की गई है। अर्धसैनिक बलों की 221 कंपनियां दिल्ली में तैनात हैं। अलग अलग राज्यों से अर्धसैनिक बलों के करीब 23 हजार जवान दिल्ली बुलाए गए हैं। ये जवान आठ से 12 अक्टूबर तक दिल्ली में तैनात रहेंगे। उनके अलावा दिल्ली पुलिस के 15 हजार से ज्यादा जवानों को तैनात किया गया है। जंतर मंतर तक पहुंचने वाले हर रास्ते को शुक्रवार की रात को ही बंद कर दिया गया।

दिल्ली के सभी स्कूलों और कॉलेजों ने 10 अक्टूबर की क्लास ऑनलाइन कर दी हैं। कई स्कूलों में पीटीएम का समय बदला गया है और परीक्षाएं स्थगित कर दी हैं। जनपथ और कर्तव्यपथ क्रॉसिंग के चार किलोमीटर के दायरे में शुक्रवार रात 10 बजे से शनिवार रात 10 बजे तक इंटरनेट बंद रहेगा। दिल्ली पुलिस ने टेलीकॉम कम्पनियों को पत्र लिखकर नेट बंद करने के लिए कहा है। जंतर मंतर, टॉलस्टॉय मार्ग और जनपथ पर पुलिस व आरएएफ के जवानों को तैनात किया गया है।

दिल्ली पुलिस ने दिल्ली में प्रवेश के सारे रास्तों पर बैरिकेडिंग कर दी है। बॉर्डर सील कर दिया गया है। पानीपत से दिल्ली तक रेलवे स्टेशनों के बाहर नाके लगाए गए हैं। टिकरी, बदरपुर, कापसहेड़ा और सिंघु बॉर्डर पर वाहनों की तलाशी के बाद ही आगे जाने दिया जा रहा है। राकेश टिकैत द्वारा इस प्रदर्शन का समर्थन करने की वजह से भी सीमा पर चौकसी बढ़ाई गई है।

प्रदर्शन में शामिल होंगे केजरीवाल

नई दिल्ली। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन का समर्थन किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की ओर से किए गए आंदोलन में केजरीवाल नहीं शामिल हुए थे। लेकिन उन्होंने कहा है कि शनिवार, 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल होंगे।

आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को कहा कि वे 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर मंतर पर होने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में अपने परिवार के साथ शामिल होंगे। उन्होंने देश भर के लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में पहुंचने की अपील की। इस प्रदर्शन को वामपंथी पार्टियों और कुछ किसान संगठनों ने भी समर्थन दिया है।

दिल्ली के लोगों से पुलिस की अपील

दिल्ली की पुलिस कई कमाल के काम करती है। अभी जो नया कमाल उसने किया है वह ये है कि उसने दिल्ली के लोगों से अपील की है कि वे 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन के लिए नहीं जाएं। कहा जा रहा है कि कानून व्यवस्था की चिंता में दिल्ली पुलिस ने यह अपील की है। यह भी कहा जा रहा है कि जंतर मंतर पर बीएनएस की धारा 163, जिसे धारा 144 कहा जाता था, वह लगी हुई है। इसका अर्थ है कि पांच से ज्यादा लोगों के एक जगह इकट्ठा होने की इजाजत नहीं है। इसलिए पुलिस ने लोगों से अपील की है। लेकिन सवाल है कि क्या किसी लोकतांत्रिक प्रदर्शन में शामिल होने से लोगों को रोकने की ऐसी अपील पुलिस कर सकती है?

असल में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी और लेफ्ट पार्टियों के छात्र संगठनों ने 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। बुधवार, सात अक्टूबर को सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें देश भर के लोगों से 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पहुंचने की अपील की। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर प्रदर्शन का ऐलान किया है। जैसे ही सीजेपी और लेफ्ट नेताओं की अपील आई वैसे ही दिल्ली पुलिस सक्रिय हो गई और उसने लोगों से प्रदर्शन के लिए जंतर मंतर नहीं जाने की अपील कर दी। दिल्ली पुलिस पहले से सवालों के घेरे में है। उसकी इस अपील के बाद नई बहस छिड़ गई है।

ज्ञानेश के हटने तक नहीं रूकेंगे: राहुल

नई दिल्ली। लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बुधवार को लगातार दूसरे दिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतरे। उन्होंने जंतर मंतर पर जाने की कोशिश की परंतु पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद राहुल ने कहा कि वे नहीं रूकने वाले हैं। राहुल ने दो टूक अंदाज में कहा, जब तक ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं हो जाता है तब तक हम नहीं रूकने वाले हैं…यह लड़ाई देश की सबसे पवित्र चीज को बचाने के लिए है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह कुछ भी करके हमें रोक नहीं सकते हैं।

इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी पार्टियों के सांसदों को बुधवार को कनॉट प्लेस में ‘सागर रत्ना’ रेस्तरां में दोपहर के भोजन पर बुलाया था। वहां से निकल कर सारे नेता जंतर मंतर की ओर बढ़े लेकिन पुलिस ने उनको रास्ते में रोक दिया। रोके जाने के बाद कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा सड़क पर लेट गईं। उनके हाथ में संविधान की कॉपी थी। प्रियंका ने पुलिस पर बदसलूकी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘क्या यही तरीका है? आप देख सकते हैं कि ये क्या कर रहे हैं’।

कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के नेता बस में बैठ कर जंतर मंतर की ओर जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें रोका तो राहुल सड़क पर धरने पर बैठ गए। थोड़ी देर के बाद पुलिस उनको वहां से उठा कर ले गई। पुलिस ने राहुल और अन्य नेताओं को करीब एक घंटे तक बाराखंभा पुलिस स्टेशन में रखा। शाम में साढ़े सात बजे के करीब पुलिस ने सबको छोड़ दिया। उससे पहले राहुल को हिरासत में लेते समय कांग्रेस कार्यकर्ता की सुरक्षा बलों के साथ धक्कामुक्की भी हुई। पुलिस राहुल गांधी को जिस बस में लेकर जा रही थी, कांग्रेस कार्यकर्ता उसके ऊपर चढ़ गए। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुलिस की बस को भी पंक्चर कर दिया।

गौरतलब है कि एक दिन पहले मंगलवार को ‘इंडिया’ ब्लॉक के दो सौ से ज्यादा सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग के ऑफिस तक मार्च निकाला था, लेकिन उन्हें पहले ही रोक दिया गया। इसके बाद राहुल और प्रियंका ने आकाशवाणी परिसर में आठ घंटे धरना दिया था। आकाशवाणी परिसर में जबरन घुसने पर दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। विपक्षी पार्टियों के नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ऊपर वोट चोरी के आरोप लगा रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

इस बीच नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा ने कहा कि जंतर मंतर पर बीएनएसएस की धारा 163 लागू है। पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को जंतर मंतर पर जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। सचिन शर्मा ने सुरक्षाकर्मियों से सांसदों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने की अपील की। उन्होंने बताया कि सांसद और उनके समर्थक तीन बसों में जंतर मंतर जा रहे थे।

सीजेपी की 10 अक्टूबर को दिल्ली पहुंचने की अपील

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी, सीजेपी ने देश भर के लोगों से खास कर युवाओं से 10 अक्टूबर को दिल्ली पहुंचने की अपील की है। सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने बुधवार को दिल्ली में प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें कहा कि धर्मेंद्र प्रधान को हटाने के लिए उन लोगों ने 36 दिन तक प्रदर्शन किया था। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए भी उनका प्रदर्शन बहुत बड़ा होगा। उन्होंने 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन की जानकारी देते हुए कहा कि सरकार को डर है कि देश का युवा एकजुट हो गया तो इनकी खैर नहीं है।

सीजेपी के सौरव दास ने भाजपा के ऊपर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं से कह रही है कि दिल्ली पहुंच कर पत्थरबाजी करो। लाठियां चलाओ। उन्होंने कहा, ‘क्या सरकार देश में गृहयुद्ध चाहती है? हम सरकार को चेतावनी देते हैं कि सुधर जाइए। देश का युवा जवाबदेही मांग रहा है। पिछली गलती को मत दोहराइए’।

लेफ्ट पार्टियों के छात्र संगठनों के नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए सौरव दास ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सिर्फ हटाया न जाए उन पर केस भी हो और उन्हें सजा मिले। उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र कमेटी ज्ञानेश कुमार और उनके फैसलों की जांच करे। सौरव ने बताया कि 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी दिल्ली के जंतर मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए ही प्रदर्शन करने वाली है।

सीजेपी और लेफ्ट के नेताओं दिल्ली पुलिस के ऊपर भी गंभीर आरोप लगाए और कहा कि पुलिसकर्मी महिला प्रदर्शनकारियों से बदसलूकी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कोई भी दरिंदे जो दिल्ली पुलिस में हैं, जिन्हें पैसों से भर्ती किया गया है उन्हें छोड़ना नहीं है। सौरव दास ने कहा, ‘जब हम धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे थे तब पुलिस ने बर्बरता की। लोगों के सिर फोड़े, लड़कियों के साथ बदसलूकी की, पैलेट गन चलाई, बिहार में तो भाजपा सरकार ने एके 47 तक चला दी। हमें आशंका है कि इस बार दिल्ली में भी ये लोग ऐसा ही कुछ प्लान कर रहे हैं’।

विपक्षी पार्टियां अलग अलग लड़ रही हैं

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को स्थगित कराने के लिए विपक्ष ने साझा कार्य योजना बनाई थी लेकिन तीन दिन के बाद ऐसा दिख रहा है कि सब अलग अलग लड़ रहे हैं। सबके प्रदर्शन अलग अलग हो रहे हैं। पहले दिन यानी दो अक्टूबर को कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के छात्रों ने जंतर मंतर पर लेफ्ट और आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन का समर्थन किया लेकिन किसी ने उनका नाम नहीं लिया। इसलिए अगले दिन यानी तीन अक्टूबर को एनएसयूआई ने जगह बदल दी। लेफ्ट और आप के नेता कुछ सिविल सोसायटी के लोगों के साथ जंतर मंतर पहुंचे तो एनएसयूआई के छात्र और नेता इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने पहुंच गए। तभी ने तो जंतर मंतर के प्रदर्शन का कोई माहौल बना और न इंडिया गेट पर हुए प्रदर्शन को किसी ने तवज्जो दी। ऐसे ही मुंबई में रविवार, चार अक्टूबर को उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की पार्टी मनसे के साथ मिल कर प्रदर्शन किया। दो अक्टूबर को उद्धव सीजेपी के प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे।

सोचें, 30 सितंबर को दिल्ली में हुई ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में कांग्रेस और लेफ्ट दोनों के नेता शामिल थे। उसमें एक साथ दो से आठ अक्टूबर तक प्रदर्शन करने का फैसला किया। यह भी तय किया गया कि छह अक्टूबर को चुनाव आयोग के मुख्यालय निर्वाचन सदन का घेराव किया जाएगा, जिसमें सभी पार्टियों के सभी बड़े नेता शामिल होंगे। इस बैठक में जो पार्टियां नहीं शामिल हुईं या जिनको नहीं बुलाया गया। उनकी बात अलग है। आम आदमी पार्टी को नहीं बुलाया गया था। इसलिए अगर उसके नेता अलग प्रदर्शन करते हैं तो कांग्रेस को आपत्ति नहीं है। इसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी तो अभी पार्टी भी नहीं है। इसलिए उसके लिए लोग अलग प्रदर्शन कर रहे हैं तो उससे भी कांग्रेस को समस्या नहीं है।

लेकिन अगर लेफ्ट पार्टियों के नेता अलग प्रदर्शन करते हैं या उद्धव ठाकरे की शिव सेना अलग प्रदर्शन करती है तो यह विपक्षी एकता के लिए ठीक नहीं है। कांग्रेस नेता इस बात से आहत हैं कि लेफ्ट के बड़े नेता आम आदमी पार्टी के साथ मिल कर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं तो उद्धव व आदित्य ठाकरे ने सीजेपी के आंदोलन में हिस्सा लिया। उद्धव और आदित्य ठाकरे दो अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में हुए प्रदर्शन में शामिल हुए थे। अब तक कांग्रेस का साथ देने वाले सिविल सोसायटी और फिल्म बिरादरी के लोग भी सीजेपी या लेफ्ट के आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। कांग्रेस के प्रदर्शन में उसकी सहयोगी राजद के नेता भी नहीं शामिल हो रहे हैं।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों की शिकायत

दो महीने छह दिन यानी 66 दिन के बाद जंतर मंतर पर नए सिरे से प्रदर्शन हुआ और साथ ही पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी शुरू हुई। इस बार भी पुलिस और प्रदर्शनकारी अपने अपने हिसाब से शिकायत कर रहे हैं। पुलिस की शिकायत है कि प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों के नाम लेकर उनको टारगेट कर रहे हैं। पुलिसकर्मियों के बैज पर लिखे गए नाम को पढ़ कर जोर से बोल रहे हैं और उनको निशाना बना रहे हैं। पुलिस को लग रहा है कि इससे सोशल मीडिया में ट्रोलिंग और परेशान करने का मौका बन रहा है। गौरतलब है कि आईसा की नेता नेहा बोरा को जब पुलिस बस में बैठा रही थी तब वे जोर जोर से एक महिला पुलिसकर्मी का नाम ले रही थीं और आरोप लगा रही थीं कि उसने ज्यादती की है। मीडिया में उस नाम की खूब चर्चा हो गई और सोशल मीडिया में भी यह वायरल हो गया।

इसके बाद बताया जा रहा है कि पुलिसकर्मियों ने अपने बैज उतारने शुरू कर दिए। अब वे प्रदर्शनकारियों को पकड़ कर बस में बैठा रहे हैं तो उससे पहले नाम हटा ले रहे हैं। इसकी शिकायत नेताओं और प्रदर्शनकारियों ने की है। सीपीआई के सांसद पी संदेश कुमार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से शिकायत की है। उन्होंने चिट्ठी लिखी है कि पुलिसकर्मी बैज उतार कर कार्रवाई कर रहे हैं। गौरतलब है कि इससे पहले जून और जुलाई के प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने शिकायत की थी सादी वर्दी में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे, जो कील लगे डंडे से लोगों को मार रहे थे। सादी वर्दी में ऐसे कई लोगों की पहचान की गई थी और सुप्रीम कोर्ट में जब यह मामला पहुंचा तो इसे लेकर काफी विवाद भी हुआ था। सो, इस बार सादी वर्दी की बजाय बिना बैज के पुलिस तैनात है।

मतदाताओं का नहीं पार्टियों का प्रदर्शन है

असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है।

महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर पर देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हाल के महीनों में दूसरी बार राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। दिल्ली से मुंबई तक खूब शोरगुल हुआ। लेकिन जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक बुनियादी अंतर है, जो अलग अलग जगहों पर प्रदर्शनों में दिख भी रहा है। 20 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक जंतर मंतर पर चला आंदोलन पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों और उनके समर्थन में उतरे एक नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का था। बाद में लेफ्ट पार्टियों और समाजवादी पार्टी के अलावा शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के नेता भी इसमें शामिल हुए थे। लेकिन बुनियादी रूप से वह आंदोलन प्रभावित छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।

गौरतलब है कि 2026 की नीट परीक्षा करीब 24 लाख छात्रों ने दी थी, जो पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए थे। उसी समय कई और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिनसे प्रभावितों की संख्या बहुत बड़ी हो गई थी। तभी उस आंदोलन का आयाम बहुत बड़ा हो गया था। हजारों लोग हर दिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोग हर दिन डिजिटल माध्यम से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे। लोगों का एक भावनात्मक लगाव आंदोलन से दिख रहा था। आंदोलन की जगह पर मीडिया और सोशल मीडिया के लोग जब किसी से बात करते थे तो वह प्रभावित परिवार का हिस्सा निकलता था। प्रभावित छात्र या उसके परिजन आंदोलन में शामिल थे इसलिए उसकी तीव्रता बहुत ज्यादा थी। उसमें आक्रोश भी बहुत ज्यादा था।

तभी सरकार ने छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझा और उस हिसाब से कार्रवाई की। सरकार ने दो बड़े मंत्रियों को भेज कर बात कराई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और छात्रों की सारी मांगें मान कर आंदोलन खत्म कराया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए अभी जो आंदोलन हो रहा है वह बुनियादी रूप से छात्रों व युवाओं को आंदोलन से भिन्न है। यह प्रभावित पक्ष का आंदोलन नहीं है। इसमें ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके वोट कट गए हैं। याद करें कैसे जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद सुसाइड किया था। उनके परिजनों को आंदोलन में आमंत्रित किया गया था। इस बार का आंदोलन चाहे दिल्ली का जंतर मंतर हो या मुंबई का शिवाजी पार्क कहीं भी प्रभावित लोग नहीं दिखे।

प्रदर्शनकारियों ने ऐसे लोगों को मंच पर नहीं प्रस्तुत किया, जिनका नाम कट गया है। अगर यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम काटे जाने के खिलाफ है तो इसमें अनिवार्य रूप से उन लोगों को शामिल होना चाहिए, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो उसकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं। लेकिन जब प्रभावितों की संख्या करोड़ों में हो और मुद्दा राजनीतिक अधिकार का हो तब निश्चित रूप से प्रभावित लोग इसमें शामिल होते हैं।

मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कटे हैं। दिल्ली में एसआईआर से पहले 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब 97 लाख ही मतदाता बचे हैं। अगर दिल्ली के साथ एनसीआर मिला लें यानी नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम को जोड़ दें तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। अगर इनमें से एक फीसदी आदमी भी आंदोलन करने उतरे तो वह संख्या एक लाख होगी। लेकिन दो अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10 हजार लोग नहीं जुटे, जबकि आम आदमी पार्टी और लेफ्ट की तीनों पार्टियों ने भीड़ जुटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। लेफ्ट की तीन पार्टियों के छात्र संगठन लगे हुए थे और परदे के पीछे से कांग्रेस के छात्र संगठन के लोग भी जुटे थे। फिर भी भीड़ नहीं जुटी, जबकि जून और जुलाई में हुए आंदोलन में बिना किसी प्रयास के लोग जुट रहे थे।

जाहिर है वोट कटने वाले आंदोलन से आम आदमी का जुड़ाव नहीं बन रहा है। जबकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। यह महंगाई या बेरोजगारी की तरह कोई सार्वभौमिक मुद्दा नहीं है, बल्कि व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है और व्यापक रूप से वैयक्तिक है। तभी इस मुद्दे को लेकर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है, जिसका मकसद धारणा को प्रभावित करना है।

पहले दिन से यह स्पष्ट दिख रहा है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है, जिसका उद्देश्य देश में एक झूठा नैरेटिव स्थापित करना है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उसी समय उनको लग गया था कि इससे जनता का कनेक्ट नहीं है। बाद में नतीजों से यह प्रमाणित भी हुआ। तभी उन्होंने यह मुद्दा छोड़ दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के सफल आंदोलन के बाद राहुल गांधी को यह चिंता सताने लगी है कि राजनीति में नई शक्तियों का उदय हो रहा है।

जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को रिप्लेस किया और टीवीके ने तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों को रिप्लेस किया उस तरह किसी नई शक्ति के उभरने और किसी अन्य राज्य में कांग्रेस को रिप्लेस करने का खतरा भी कांग्रेस को दिख रहा है। इसलिए भी वह ऐसे गढ़े हुए मुद्दों पर आंदोलन कर रही है या उसमें शामिल हो रही है ताकि प्रासंगिकता बनी रहे।

वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी लगातार हो हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है। लेकिन अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और खुद को दिलासा देने के लिए वे चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी और तकनीकी वजहों से कुछ ऐसे लोगों के नाम कटे होंगे, जो वास्तव में मतदाता हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है और उनके पास नाम जुड़वाने के विकल्प हैं। जितनी संख्या में विपक्ष दावा कर रहा है अगर उतनी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे होते तो अब तक देश में क्रांति हो गई होती।

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट के बाद से नए सिरे से आंदोलन शुरू हुए हैं वह रिपोर्ट भी तकनीकी और कानूनी असंगति को ज्यादा दिखाती है। उसमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एसआईआऱ के फैसले से सहमत नहीं हैं। एसआईआर का फैसला पूर्ण चुनाव आयोग का संपूर्ण सहमति से किया गया फैसला है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर है। चुनाव आय़ोग संविधान से मिले अधिकार के तहत ही यह काम कर रहा है। असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए वह इन प्रदर्शनों में शामिल नहीं हो रहा है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

कांग्रेस को अकेला छोड़ रहे हैं सहयोगी

दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर देश के अलग अलग हिस्सो में खूब प्रदर्शन और आंदोलन हुए। दिल्ली से लेकर मुंबई तक हजारों लोग सड़कों पर उतरे। महात्मा गांधी की तस्वीर वाली टीशर्ट पहन कर और तिरंगा हाथ में लेकर लोगों ने प्रदर्शन किया। लेकिन गांधी की विरासत का दावा करने वाली कांग्रेस इससे नदारद रही। कांग्रेस ने अपनी कार्य समिति की बैठक में और उसके अगले दिन विपक्षी गठबंधन की बैठक में यह तय जरूर किया कि दो अक्टूबर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन होगा, जो आठ अक्टूबर तक चलेगा। लेकिन कांग्रेस ने दो अक्टूबर के लिए कोई निश्चित योजना नहीं बनाई। कांग्रेस ने तय कराया कि छह अक्टूबर को दिल्ली में निर्वाचन सदन का घेराव किया जाएगा। हो सकता है कि छह अक्टूबर को भी भीड़ जुटे और कांग्रेस व दूसरी विपक्षी पार्टियां अपने संसाधनों से आंदोलन को सफल बनाने का प्रयास करें। लेकिन दो अक्टूबर का विरोध प्रदर्शन ज्यादा व्यस्थित और स्वंयस्फूर्त दिख रहा था। कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों ने दो अक्टूबर के आंदोलन को कामयाब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता जरूर सक्रियता दिखा रहे थे लेकिन मूल रूप से आंदोलन लेफ्ट का था। लेफ्ट की तीनों पार्टियों सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई माले के छात्र संगठनों ने आंदोलन की प्लानिंग की थी। एक दिन पहले एक अक्टूबर को जंतर मंतर पर जाकर नेहा बोरा ने वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाला। उसके बाद लेफ्ट के छात्र संघों एआईएसएफ, एसएफआई और आईसा ने लोग जुटाए। यह अलग बात है कि आम आदमी पार्टी के सौरव भारद्वाज, संजीव झा आदि सुबह ही जंतर मंतर पहुंच गए और क्रेडिट लेने का प्रयास किया। हो सकता है कि आप के लोग भी जंतर मंतर के आसपास या कनॉट प्लेस में जुटे हों लेकिन मूल रूप से लेफ्ट औऱ सिविल सोसायटी का आंदोलन था। कांग्रेस के छात्र संघ एनएसयूआई के छात्र भी इसमें शामिल थे लेकिन किसी ने उनको क्रेडिट नहीं दिया। इसे सीपीएम महासचिव एमए बेबी की अरविंद केजरीवाल से हुई मुलाकात से भी जोड़ कर देख सकते हैं। आप और लेफ्ट इस समय ज्यादा बॉन्डिंग दिखा रहे हैं।

ऐसे ही मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने आंदोलन का ऐलान किया तो उद्धव ठाकरे की पार्टी उसमें शामिल हो गई। शिवाजी पार्क में सीजेपी ने उद्धव की पार्टी की मदद से अच्छी भीड़ जुटा ली। सुबह दिल्ली में आंदोलन शुरू हुआ तो शाम चार बजे से मुंबई में सीजेपी ने प्रदर्शन किया। उसमें शामिल होने के लिए आदित्य़ ठाकरे कुछ फिल्मी कलाकारों के साथ पहुंचे तो बाद में उद्धव ठाकरे भी पहुंचे। बड़ी संख्या में फिल्मी कलाकार भी आंदोलन का हिस्सा बने। ध्यान रहे 30 सितंबर की बैठक में उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस को नसीहत दी थी कि वह एकला चलो का रवैया छोड़े लेकिन दो अक्टूबर को खुद ही कांग्रेस से अलग सीजेपी के आंदोलन में शामिल हो गए। उनका अपना आंदोलन चार अक्टूबर को होना है, जिसकी घोषणा उन्होंने कांग्रेस के साथ मिल कर नहीं की है, बल्कि मनसे के नेता और अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ मिल कर की है। यह आंदोलन भी विपक्ष की बैठक में तय हुए प्रदर्शन से अलग है। कांग्रेस ने विपक्ष की बैठक में बनी सहमति के आधार पर कई राज्यों में प्रदर्शन किए लेकिन हर जगह वह अकेले ही दिखी। पटना में महागठबंधन के नाम पर प्रदर्शन हुआ, जिसमें कांग्रेस के सारे बड़े नेता शामिल हुए पर राजद के प्रमुख तेजस्वी यादव नदारद रहे।