दिल्ली में सीजेपी का अलग आंदोलन

विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की 30 सितंबर की बैठक में तय किया गया कि दो से आठ अक्टूबर तो पूरे एक हफ्ते प्रदर्शन होगा और मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगा जाएगा। इस प्रदर्शन के दौरान छह अक्टूबर को सभी विपक्षी पार्टियों के बड़े नेता निर्वाचन सदन की ओर मार्च करेंगे और घेराव करेंगे। इसके अलावा भी बैठक में कई प्रस्ताव मंजूर किए गए। इस बीच अलग अलग हिस्सों में प्रदर्शन चलता रहेगा। इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया है। दो अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में हुए प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने ऐलान किया कि वे 10 अक्टूबर को दिल्ली आ रहे हैं।

हालांकि अभी यह तय नहीं है कि दिल्ली में किसी जगह पर उनको प्रदर्शन करना है या प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी है। अभी तक जंतर मंतर या किसी और जगह पर प्रदर्शन की इजाजत सीजेपी ने नहीं मांगी है। हालांकि उनको प्रदर्शन की इजाजत मिल जाती है। छह जून को भी जब दीपके अमेरिका से लौटे थे तब दिल्ली पुलिस ने हवाईअड्डे पर ही उनसे आवेदन लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दे दी थी। यही शिवाजी पार्क के मामले में भी हुआ। पहले पुलिस ने परमिशन नहीं दी थी। लेकिन सीजेपी ने ऐलान किया कि अगर अनुमति नहीं मिली तो जेल भरो अभियान करेंगे। इसके बाद उनको अनुमति मिल गई।

तभी कहा जा रहा है कि भले लेफ्ट और आम आदमी पार्टी को जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिली लेकिन हो सकता है कि सीजेपी को मिल जाए। बहरहाल, जो हो ऐसा लग रहा है कि पेपर लीक और परीक्षा में ग़ड़बड़ी के मामले में जिस तरह युवाओं की प्रतिनिथि आवाज सीजेपी बन गई थी वैसे ही मतदाताओं के मामले में भी सीजेपी के प्रदर्शन और उनकी अपील को ज्यादा तवज्जो मिल रही है। दिल्ली के मुकाबले मुंबई में ज्यादा व्यवस्थित प्रदर्शन हुआ, जिसका मैसेज पूरे देश में गया। यह कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के लिए चिंता की बात है। खास कर कांग्रेस के लिए, जो सोशल मीडिया में लड़ रही है, जबकि सीजेपी जमीन पर लड़ रही है।

जंतर मंतर पर दूसरे दिन भी प्रदर्शन

नई दिल्ली। शनिवार को लगातार दूसरे दिन जंतर मंतर पर वामपंथी पार्टियों के छात्र संगठनों और सिविल सोसायटी के लोगों ने प्रदर्शन किया। जाने माने वकील  और सपा समर्थित राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल भी शनिवार को प्रदर्शन में शामिल हुए। सिब्बल के अलावा मशहूर वकील प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव भी उनके साथ थे। सीपीआई माले के छात्र संगठन आईसा की नेता नेहा बोरा ने दूसरे दिन भी आंदोलन का नेतृत्व किया। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर स्थगित करने की मांग की।

पुलिस ने शुक्रवार की ही तरह शनिवार को भी जंतर मंतर पर चारों तरफ बैरिकेडिंग कर रखी थी। प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने धरने की जगह तक जाने से रोक दिया। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और नेहा बोरा सहित करीब डेढ़ सौ प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया। इससे पहले प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की झड़प भी हुई। हिरासत में लेने के बाद पुलिस सभी को बस में बैठा कर सेंट्रल दिल्ली से बाहर ले गई। शनिवार के प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी के नेता शामिल नहीं हुए।

इससे पहले शुक्रवार को आम आदमी पार्टी और लेफ्ट के साथ सिविल सोसायटी के लोगों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान सात सौ से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था। जंतर मंतर के आसपास पांच हजार से ज्यादा जवान तैनात थे। बाद में शुक्रवार की शाम को आईसा का नेहा बोरा ने वीडियो संदेश जारी करके कहा था कि प्रदर्शन जारी रहेगा और कार्यकर्ता जंतर मंतर लौटें। बोरा ने कहा था कि हिरासत में लिए जाने से प्रदर्शनकारी डरेंगे नहीं। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के समर्थन में लगातार जुटने की अपील की थी।

उनकी अपील पर शनिवार को भी लेफ्ट के छात्र संगठनों के लोग जंतर मंतर पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया का विरोध किया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक प्रदर्शन जारी रखने का ऐलान किया है। शनिवार के प्रदर्शन में आईसा के अलावा एसएफआई और कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के छात्र भी शामिल हुए।

भारत ने पाकिस्तान को 19 रनों से हराया

अभिषेक शर्मा (61), तिलक वर्मा (नाबाद 51) और शिवम दुबे (27 रन/ दो विकेट) के शानदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने शनिवार को एशियाई खेल 2026 की क्रिकेट प्रतियोगिता के फाइनल में चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 19 रनों से हराकर खिताब अपने नाम किया।

212 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी पाकिस्तान के लिए कप्तान साहिबजादा फरहान और माज सदाकत की सलामी जोड़ी ने पहले विकेट के लिए 33 रन जोड़े। चौथे ओवर में वॉशिंगटन सुदंर ने साहिबजादा फरहान (10) को आउट कर भारत को पहली सफलता दिलाई। अगले ही ओवर में अक्षर पटेल ने उस्मान खान (तीन) रन का शिकार कर लिया। पाकिस्तान का तीसरा विकेट सातवें ओवर में माज सदाकत (23) रन के रूप में गिरा। इसके बाद हसन नवाज और सैम अयूब की जोड़ी ने पाकिस्तान की पारी को संभाला। दोनों बल्लेबाजों ने चौथे विकेट लिए 87 रन जोड़कर पाकिस्तान की मैच में वापसी कराई।

15वें ओवर में शिवम दुबे ने सैम अयूब (29) को आउट कर इस साझेदारी का अंत किया। 18वें ओवर में वॉशिंगटन सुंदर ने अब्दुल समद (नौ) रन को आउट कर पाकिस्तान को पांचवां झटका दिया। इस दौरान हसन नवाज एक छोर थामे तेजी के साथ रन बनाते रहे। शिवम दुबे ने उन्हें मैच की आखिरी गेंद पर विकेटकीपर संजू सैमसन के हाथों कैच आउट कराया। उन्होंने 51 गेंदों में पांच चौके और सात छक्कों की मदद से (96) रनों की पारी खेली। पाकिस्तान की टीम निर्धारित 20 ओवरों में छह विकेट पर 192 रन ही बना सकी और मुकाबला 19 रनों से हार गई। भारत के लिए शिवम दुबे, वॉशिंगटन सुंदर और अक्षर पटेल ने दो-दो विकेट लिये।

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इससे पहले आज यहां अभिषेक शर्मा (61) और तिलक वर्मा (नाबाद 51) की आतिशी अर्धशतकीय पारियों के दम पर भारत ने पाकिस्तान को जीत के लिए 212 रनों का लक्ष्य दिया था। भारतीय कप्तान श्रेयस अय्यर ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। बल्लेबाजी करने उतरी भारतीय टीम को तीसरे ओवर की पहली गेंद पर वैभव सूर्यवंशी (15) रन के रूप में पहला झटका लगा। अगले ही ओवर में संजू सैमसन (दो) रन बनाकर पवेलियन लौट गये। इसके बाद कप्तान श्रेयस अय्यर ने अभिषेक शर्मा के साथ पारी को संभाला। दोनों बल्लेबाजों के बीच तीसरे विकेट के लिए 42 रनों की साझेदारी हुई। आठवें ओवर में अराफात मिन्हास ने अभिषेक शर्मा को स्टंप आउट कराकर इस साझेदारी को तोड़ा। अभिषेक ने 28 गेंदों में तीन चौके और सात छक्के उड़ाते हुए (61) रनों की पारी खेली।

13वें ओवर में इशान किशन (20) रन और अगले ओवर में श्रेयस अय्यर (21) रन बनाकर आउट हुये। शिवम दुबे ने 15 गेंदों में दो चौके और दो छक्के उड़ाते हुए (27) रनों की पारी खेली।भारत ने निर्धारित 20 ओवरों में छह विकेट पर 211 रनों का चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया। तिलक वर्मा ने 22 गेंदों में तीन चौके और चार छक्के उड़ाते हुए (नाबाद 51) रनों की पारी खेली। पाकिस्तान की ओर से अराफात मिन्हास और अहमद दनियाल ने दो-दो विकेट लिये। सैम अयूब और अबरार अहमद ने एक-एक बल्लेबाज को आउट किया।

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मुंबई में जंतर मंतर जैसा प्रदर्शन

मुंबई। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने मुंबई के शिवाजी पार्क को जंतर मंतर में बदल दिया। शुक्रवार, दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग लेकर मुंबई के लोग सड़कों पर उतरे। बड़ी संख्या में लोग शिवाजी पार्क में इकट्ठा हुए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके साथ राजनीति और फिल्म जगत की बड़ी हस्तियां भी शामिल हुईं। देर शाम तक प्रदर्शनकारी शिवाजी पार्क में जमा रहे।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे भी आंदोलन में शामिल हुए। फिल्मी हस्तियों की बात करें तो नसीरूद्दीन शाह से लेकर शबाना आजमी और विशाल ददलानी से लेकर विशाल भारद्वाज तक अनके अभिनेता, गायक, गीतकार, संगीतकार, निर्माता और निर्देशक शिवाजी पार्क पहुंचे और आंदोलन में शामिल हुए। इससे पहले सीजेपी ने ऐलान किया था कि अगर प्रशासन ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी तो जेल भरो अभियान चलेगा। हालांकि उसकी नौबत नहीं आई।

सीजेपी के इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। वे सोशल मीडिया में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे मीम्स के पोस्टर बना कर पहुंचे थे। सब एक सुर में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान मंच पर मौजूद सभी लोगों ने महात्मा गांधी की तस्वीर वाली टीशर्ट पहनी थी। गौरतलब है कि इससे पहल सीजेपी ने 20 जून से 25 जुलाई तक दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था, जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ था।

बहरहाल, शुक्रवार के प्रदर्शन में अभिजीत दीपके ने कहा, ‘जब भारत के प्रधानमंत्री अमेरिका जाते हैं, तब भी वहां कहा जाता है कि ये गांधी के देश से आए हैं। गांधी देश की आत्मा हैं, आंबेडकर रीढ़ की हड्डी और नेहरू दिमाग हैं’। दीपके ने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा ‘एक देश, एक पार्टी’ चाहती है। प्रदर्शन के दौरान सीजेपी ने सरकार के सामने अपनी तीन मांगें रखीं, जिसमें पहली मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की है। इसके बाद जनवरी 2025 की मतदाता सूची बहाल करने और मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को बंद करने की मांग की गई।

सीजेपी के प्रदर्शन में अभिनेत्री शबाना आजमी ने कहा, ‘हमारा वोट हमारा अधिकार है, हमारी आवाज है। जब मतदाता सूची से हमारे नाम हटा दिए जाएं, तो हम क्या करेंगे’? गायक संगीतकार विशाल ददलानी ने प्रदर्शन के दौरान गाना गाया। मशहूर फिल्मकार विशाल भारद्वाज अपनी पत्नी रेखा भारद्वाज के साथ प्रदर्शन में पहुंचे थे। उन्होंने इस दौरान कहा, ‘मैं यहां केवल अपना समर्थन देने आया हूं’। मुंबई में विरोध प्रदर्शन के दौरान सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई का जिक्र किया और कहा, ‘दिल्ली पुलिस ने फिर से बर्बरता की है, सुधर जाओ वरना हम तुम्हें सुधार देंगे’।

दिल्ली पुलिस नहीं रोक सकी प्रदर्शन

नई दिल्ली। जंतर मंतर पर पिछली बार हुए प्रदर्शन से सबक लेकर इस बार दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के भरपूर प्रयास किए। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग करते हुए हजारों की संख्या में लोग नई दिल्ली में अलग अलग जगहों पर जमा हुए। पुलिस ने लोगों को जंतर मंतर पर पहुंचने से रोकने के लिए कई किलोमीटर पहले से रास्ते बंद कर दिए थे और 11 मेट्रो स्टेशन भी बंद कर दिए थे। फिर भी देर शाम तक हजारों लोग कनॉट प्लेस और आसपास के इलाके में जमा रहे। कई जगह पुलिस के साथ लोगों की झड़प हुई और कई जगह जम कर बवाल हुआ।

शुक्रवार की सुबह से ही जंतर मंतर के आसपास हजारों की संख्या में पुलिसकर्मी और अर्धसैनिक बलों के जवान तैनात थे। सुबह सबसे पहले आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और पार्टी के विधायक संजीव झा पहुंचे थे। पुलिस ने उनको तत्काल हिरासत में लेकर बस में बैठाया और वहां से हटा दिया। आप की नेता व पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और आईसा की नेता नेहा बोरा को भी पुलिस ने हिरासत में लेकर वहां से हटाया। पुलिस ने करीब सात सौ लोगों को हिरासत में लिया। सबको जबरदस्ती बसों में भर कर जंतर मंतर से हटाया गया।

पुलिस ने इस प्रदर्शन को रोकने के लिए जंतर मंतर से पांच किलोमीटर दूर कर रास्ते बंद किए थे। लोगों को लोधी रोड पर रोका जा रहा था तो तीन मूर्ति के पास भी रास्ता बंद कर दिया गया था। सेंट्रल दिल्ली के आसपास के सारे मेट्रो स्टेशन बंद थे। कनॉट प्लेस से लेकर पटेल चौक, जीपीओ, टॉल्स्टॉय मार्ग, जंतर मंतर रोड, संसद मार्ग और आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक बंद कर दिया गया था।

गौरतलब है कि 30 सितंबर को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं की बैठक हुई थी, जिसमें दो से आठ अक्टूबर तक चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन का फैसला हुआ था। शुक्रवार को गांधी जयंती के मौके पर युवाओं, छात्रों और अलग अलग समूहों के लोगों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसमें एसआईआर के जरिए वोट काटने से लेकर रोजगार की समस्या तक का मुद्दा उठाया गया। पुलिस ने हालांकि इस प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी थी। तब भी देर शाम तक हजारों नौजवान कनॉट प्लेस और आसपास के इलाके में जमा रहे।

इस प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी और वामपंथी दलों के अलावा सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा, सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई और कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के सदस्य शामिल हुए। इसके अलावा कई और सामाजिक समूहों के लोग प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। प्रदर्शन में लोगों की मुख्य मांग मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की थी। गौरतलब है कि एसआईआर में अब तक 13 करोड़ से ज्यादा नाम कट चुके हैं। राजनीतिक दल इसे चुनौती दे रहे हैं।

राहुल का ज्ञानेश कुमार पर हमला

नई दिल्ली। भले कांग्रेस पार्टी शुक्रवार को हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हुई थी लेकिन जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई की राहुल गांधी ने निंदा की। राहुल ने कहा कि लाठी से लोगों को रोका जा सकता है, सवालों को नहीं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा और कहा कि उनको इस्तीफा देना होगा। राहुल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि हजारों नौजवान वोट चोरी के खिलाफ अपने संवैधानिक अधिकार के साथ शांतिपूर्वक सड़कों पर हैं। उनकी मांग साफ है कि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और लोकतंत्र बचे।

ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि युवाओं को सड़कों पर पीटा जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘आज गांधी जयंती के दिन हजारों नौजवान वोट चोरी के खिलाफ सड़कों पर हैं। ये लोग शांतिपूर्वक, बिना हिंसा के, अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मांग साफ है, ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें। लोकतंत्र बचाओ और मोदी शाह सरकार का जवाब’? उन्होंने आगे लिखा, ‘लड़के, लड़कियों को सड़कों पर घसीटा जा रहा है। सैकड़ों हिरासत में हैं। उनका कसूर सिर्फ ये है कि उन्होंने वोट चोरी पर सवाल पूछा’।

राहुल गांधी ने महात्मा गांधी को उनकी जयंती पर याद करते हुए कहा, ‘बापू ने यही सिखाया था कि सच बोलो, शांति से लड़ो और यही सरकार को सबसे ज्यादा डराता है। क्योंकि लाठी से भीड़ रोकी जा सकती है, सवाल नहीं। ज्ञानेश कुमार जाएंगे और जिस सिस्टम ने उन्हें बिठाया है, वो भी जाएगा’।

विपक्ष बनाम सीजेपी का आंदोलन

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी पार्टियों के गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में होने वाली है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ साझा आंदोलन की रूपरेखा बनेगी। ममता बनर्जी बहुत गंभीरता से इस पर विचार कर रही हैं। तभी उन्होंने करीब 30 साल के बाद सीपीएम के महासचिव एमए बेबी से बात की और राहुल गांधी को भी विपक्षी गठबंधन की मीटिंग के लिए तैयार किया। हालांकि कांग्रेस अपना प्रदर्शन कर रही है। 25 सितंबर को कांग्रेस ने प्रदेश की राजधानियों में प्रदर्शन किया तो 28 सितंबर को जिलों में प्रदर्शन करेगी। दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी भी आंदोलन की तैयारी कर रही है।

ध्यान रहे पिछली बार पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी पर जब सीजेपी ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था, तब विपक्ष एकदम अंधेरे में था और उसकी कोई तैयारी नहीं थी। तभी लेफ्ट और सपा जैसी पार्टियों ने उस आंदोलन का समर्थन किया। अब सपा हो या लेफ्ट या कांग्रेस और टीएमसी सब अपने आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। तब सीजेपी के आंदोलन का क्या होगा? सीजेपी ने ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था, जो शनिवार को समाप्त हो गया। लेकिन उससे पहले ही उसने अल्टीमेटम की सीमा दो अक्टूबर तक बढ़ा दी। अब अगर सीजेपी का आंदोलन हुआ तो उसे कौन समर्थन देगा? क्या भीम आर्मी फिर से अपने लोगों को लेकर उतरेगी? अगर भीम आर्मी या किसी पार्टी ने समर्थन नहीं दिया तो सीजेपी के आंदोलन कामयाब होने के आसार नहीं हैं। हां, भाजपा जरूर उसका महत्व बढ़वा सकती है ताकि विपक्ष के आंदोलन की मैसेजिंग को कमतर किया जा सके। जेपी नड्डा को फिर से तो सीजेपी से बात करने में नहीं लगाया जाएगा?

नेहा बोरा जंतर मंतर पहुंची, सीजेपी का प्रदर्शन टला

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने पहले तो 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था लेकिन अब उसे आगे बढ़ा दिया गया है। सीजेपी के नेताओं ने कहा है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो सीजेपी दो अक्टूबर से देश भर में प्रदर्शन करेगी। पहले सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त को इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था।

इस बीच शुक्रवार को सीपीआई माले की छात्र ईकाई आईसा की नेहा बोरा जंतर मंतर पहुंच गईं। हालांकि उनके प्रदर्शन के ऐलान के बाद जंतर मंतर पर सुरक्षा बढ़ा दी गई। बैरिकेड्स के साथ भारी पुलिस बल तैनात किया गया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया और उन्हें बसों में भर कर ले गई। सीपीआई माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य भी वहां मौजूद थे। उन्हें और मशहूर वकील प्रशांत भूषण को पुलिस ने हिरासत में लिया।

विपक्ष क्या साझा आंदोलन करेगा?

विपक्षी पार्टियों को एक के बाद एक ऐसे मुद्दे मिल रहे हैं, जिन पर वह साझा आंदोलन करे तो सरकार के खिलाफ नाराजगी को दिशा दे सकता है। ताजा मामला चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हुए खुलासे का है। अंग्रेजी के अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने एक खोजी रिपोर्ट में बताया है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर आयोग में एक राय नहीं है और इसे लेकर 10 महीने के अंदर दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज कराई। नाम जोड़ने वाले फॉर्म छह में किए गए बदलाव को तो दो आयुक्तों ने अवैध और अनधिकृत तक बताया। ऐसे ही ईआरओ को चुनाव आयोग का सेंट्रल डाटा बेस इस्तेमाल करने से रोकने और नाम काटने व जोड़ने के उनके मूल अधिकार को ही कमतर करने का आरोप लगाया। यह बहुत बड़ा मुद्दा है और अभी तक विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर जो आरोप लगाती थीं, इस रिपोर्ट से एक तरह से उनकी पुष्टि हुई है।

फिर भी ऐसा नहीं लग रहा है कि विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर इसके खिलाफ आंदोलन करेंगी। जंतर मंतर का प्रदर्शन हो या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला हो सभी पार्टियां अपनी राजनीति अलग कर रही हैं। राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम कर रहे हैं तो अखिलेश यादव अपने राज्य के चुनाव में लगे हैं। ममता बनर्जी अपने राज्य में फंसी हैं तो तेजस्वी यादव को किसी बात से मतलब नहीं है। झारखंड में हेमंत सोरेन सत्ता में हैं तो उनकी चिंताएं अलग हैं। एमके स्टालिन गठबंधन से अलग हो गए हैं तो शरद पवार की पोजिशन स्पष्ट नहीं है कि वे इंडिया ब्लॉक में हैं या तटस्थ हैं और एनडीए में जाने की तैयारी कर रहे हैं। रही बात उद्धव ठाकरे की तो उनके पास बहुत ताकत नहीं बची है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के पास ताकत है और नैरेटिव बनाने की क्षमता भी है लेकिन उनको पंजाब में कांग्रेस से चुनाव लड़ना है और गोवा में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की राजनीति करनी है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के कुछ नेता चाहते हैं कि विपक्षी पार्टियों के साथ बात हो और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर आई रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन छेड़ा जाए। मुश्किल यह है कि साझा आंदोलन का चेहरा कौन होगा? पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के मामले में जैसे राहुल गांधी अभियान चला रहे हैं उसी आधार पर कांग्रेस चाहेगी कि इस आंदोलन का चेहरा भी राहुल हों। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के नेता चाहते हैं कि केजरीवाल आंदोलन का नेतृत्व करें। आप और ममता बनर्जी की पार्टी ने इस मामले में सबसे दो टूक स्टैंड लिया है। दोनों ने हाल के सभी चुनावों को रद्द करने और एसआईआऱ को भी रद्द करने की मांग की है। अगर कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां इन दो मांगों को लेकर एकजुट होती हैं और देशव्यापी आंदोलन शुरू होता है तो उसका बड़ा असर होगा। एसआईआर के बाद मसौदा सूची में 13 करोड़ लोगों के नाम कटे हैं। हालांकि बाद में कुछ लोगों के नाम जुड़े लेकिन फिर भी करोड़ों लोगों के नाम कटे हैं। सो, एसआईआर को रद्द करना एक बड़े आंदोलन का मुद्दा हो सकता है। लेकिन मुश्किल यह है कि जून में बैठक के बाद ‘इंडिया’ ब्लॉक की फिर दोबारा बैठक नहीं हुई है। कौन बैठक की पहल करे, कौन एजेंडा तय करे, खर्च कौन जुटाए और कौन नेतृत्व करे ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं के पास नहीं है। इसलिए ऐसा लग रहा है कि सब अपनी अपनी लड़ाई लड़ेंगे और संसद सत्र का इंतजार करेंगे कि उसमें इस मुद्दे को उठा कर जवाब मांगेंगे। सिर्फ संसद में विरोध प्रदर्शन करने की राजनीति से विपक्ष को कोई लाभ नहीं हो रहा है।

सिर्फ जाति समीकरण कितना काम आएगा!

उत्तर प्रदेश का इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायने में बहुत खास होने वाला है। आजादी के बाद से आज तक कोई भी मुख्यमंत्री लगातार इतने दिन तक पद पर नहीं रहा। जब लगातार कांग्रेस की सरकार बनती थी तब भी मुख्यमंत्री बदलते रहते थे। दूसरी खास बात यह है कि 1990 में कांग्रेस का वर्चस्व खत्म होने के बाद पिछले 36 साल में पहली बार किसी एक पार्टी का 10 साल तक राज रहा है। अगले साल फरवरी में एक पार्टी और एक व्यक्ति के 10 साल के राज के बाद चुनाव होगा। सो, भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है। वैसे तो भाजपा ने सत्ता में रहते हुए सत्ता विरोधी माहौल यानी एंटी इन्कम्बैंसी की गुत्थी काफी हद तक सुलझा ली है। उसकी सरकारों के बार बार सत्ता में लौटने की संभावना दूसरी पार्टियों से ज्यादा होती है। यह भी कह सकते हैं कि भाजपा ने प्रो इन्कम्बैंसी को साध लिया है।

उत्तर प्रदेश का चुनाव इस मायने में भी बहुत खास होने वाला है कि पहली बार मुलायम सिंह का परिवार इतने समय तक सत्ता से बाहर रहा है। 2017 से पहले उनकी पार्टी थोड़े थोड़े अंतराल पर किसी न किसी फॉर्मूले से सरकार में आ जाती थी। कभी बसपा से तालमेल करके तो कभी लोकतांत्रिक कांग्रेस, रालोद या बसपा के बागियों के सहारे तो कभी अकेले। असल में उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का दौर चला था। 1990 से लेकर 2007 तक 17 वर्षों में कई बार सपा की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो पांच साल के बाद सपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आई और अखिलेश यादव सीएम बने। लेकिन 2017 के बाद से सपा लगातार विपक्ष में है। एक और खास बात यह है कि लंबे अरसे के बाद उत्तर प्रदेश में बिल्कुल आमने सामने का विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछली बार यानी 2022 का विधानसभा चुनाव भी भाजपा और सपा के बीच ही था लेकिन तब तक मायावती की बहुजन समाज पार्टी एक ताकत थी। उसके 10 सांसद थे और लगभग 20 फीसदी वोट था। लेकिन अब वह शून्य सांसद, शून्य विधायक और लगभग नौ फीसदी वोट वाली पार्टी है, जिसमें बहुत अंतर्कलह है। पिछले चुनाव में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी। इस बार बसपा पहले ही मुकाबले से बाहर है और यह लगभग तय लग रहा है कि कांग्रेस और सपा मिल कर लड़ेंगे। सो, भाजपा का पांच पार्टियों का गठबंधन सपा के गठबंधन से लड़ेगा।

कम से कम अभी दोनों पार्टियों की जो चुनावी तैयारी दिख रही है वह अपना अपना सामाजिक समीकरण साधने की है। दोनों गठबंधन अपने हिसाब से जातियों का गणित ठीक करने में लगे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वैसे तो हर भाषण में बाबर, औरंगजेब, सालार मसूद गाजी आदि का नाम लेते हैं, पोस्टर में आजम खां, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें लगाई जाती हैं और 80-20 की राजनीति की बात की जाती है। माफिया को पूरी तरह से खत्म कर देने के नैरेटिव से कानून व्यवस्था सुधरने की धारणा तो बनाई जाती है, साथ ही अतीक और मुख्तार के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मैसेजिंग भी बोती है।

इसके साथ ही भाजपा जातियों का प्रबंधन भी कर रही है। वह इस भरोसे में है कि उसके पास सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी है, जो राजभर वोट लाएगी। निषाद पार्टी है, जिसके सहारे मल्लाह वोट मिलेंगे। अपना दल है, जिससे कुर्मी वोट सुनिश्चित है और रालोद है, जिसके सहारे जाट पूरी तरह से एकजुट रहेंगे। सामान्य वर्ग की जातियों यानी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, भूमिहार और कायस्थ का वोट भाजपा पहले से पक्का मान रही है। उसको लग रहा है कि इनमें से अगर किसी जाति में कोई नाराजगी है तो वह रूठने जैसा है और चुनाव तक उसके मान जाने की संभावना सौ फीसदी है। इस तरह हिंदुत्व के अंदर जातियों का परफेक्ट समीकरण भाजपा बना हुआ मान रही है।

दूसरी ओर अखिलेश यादव की उम्मीदें लोकसभा चुनाव के बाद कई गुना बढ़ गई हैं। उनको लग रहा है कि पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का उनका फॉर्मूला कामयाब होगा। असल में उनके पास माई समीकरण यानी मुस्लिम और यादव का लगभग 30 फीसदी वोट है। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होकर मुख्य मुकाबले से बाहर होने और कांग्रेस के सपा के साथ आऩे से मुस्लिम वोट में बिखराव की संभावना समाप्त हो गई है। लेकिन यह 30 फीसदी वोट सपा को कहीं नहीं पहुंचाएगा। तभी अखिलेश गैर यादव पिछड़ा और गैर जाटव दलित को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे है। इसमें कोई बुराई नहीं है। भारत में चुनाव जीतने के लिए जातियों का समीकरण बहुत अहम होता है। लेकिन सिर्फ इस आधार पर कोई भी पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती है।

समाजवादी पार्टी की इस रणनीति में समस्या इसलिए है क्योंकि उसे 10 साल से सत्ता में बैठी भाजपा को हराना है। सरकार चला रही किसी भी पार्टी को सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं हराया जा सकता है। आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कोई भी सरकार तभी हारी है, जब उसके खिलाफ कोई बहुत मजबूत और प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर हो। अगर सरकार के खिलाफ थोड़ी बहुत नाराजगी है या थोड़ी बहुत शिकायतें हैं तो उनके दम पर उस सरकार को नहीं हराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में विपक्षी पार्टी अपने जातीय समीकरण के दम पर ज्यादा से ज्यादा मजबूत विपक्ष का दर्जा बचाए रख पाएंगी। जैसा बिहार में राजद के साथ हो रहा है। ऐसा इसलिए होता है कि जो सत्ता में बैठा है या लगातार चुनाव जीत रहा है उसका एक मजबूत सामाजिक समीकरण बना होता है और वह ऐसा लाभार्थी वर्ग तैयार करता है, जो हर हाल में उसे वोट करता है। यह विपक्ष का एक डिसएडवांटेज है।

सो, अखिलेश यादव को कांग्रेस से तालमेल करने और जातीय समीकरण साधने के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी लहर तैयार करने का प्रयास करना चाहिए था। हालांकि अगर सरकार के खिलाफ स्वाभाविक गुस्सा नहीं है तो सिर्फ प्रयास करने से सत्ता विरोधी लहर नहीं पैदा होगी। सत्ता विरोधी लहर दो तरह से बनती है। पहली, सरकार के कामकाज से नाराज होकर स्वाभाविक रूप से या फिर विपक्षी पार्टी के निरंतर प्रयास से। सरकार से नाराज होने की पर्याप्त वजह होने के बावजूद विपक्ष के निरंतर प्रयास की कमी से उत्तर प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर नहीं बन सकी है। कम से कम अभी सतह के ऊपर ऐसी कोई लहर नहीं दिख रही है। जबकि ऐसा होना चाहिए था। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ युवाओं में नाराजगी है। समाजवादी पार्टी की नेता डिंपल यादव ने इसके खिलाफ जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में हिस्सा भी लिया। लेकिन सपा इस नाराजगी को एक दिशा देने के लिए जरूरी निरंतरता के साथ काम नहीं कर सकी। ऐसे ही राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला है। संसद के मानसून सत्र में सपा ने इसे लेकर खूब राजनीति की लेकिन सत्र समाप्त होने के बाद सपा की ओर से इस मुद्दे पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है।

महंगाई वैसे तो पिछले 10 साल से लगातार बढ़ रही है लेकिन रूस व यूक्रेन युद्ध और इस साल 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका के हमले की वजह से जिस तरह आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है उससे महंगाई में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है। इसे हर आम और खास व्यक्ति महसूस कर रहा है। परंतु मुख्य विपक्षी पार्टी महंगाई को मुद्दा नहीं बना पाई है। रोजगार और लोगों की आर्थिक समस्याओं पर भी विपक्ष का फोकस कम ही रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले ‘संविधान खतरे में है’ और ‘आरक्षण समाप्त हो जाएगा’ का नैरेटिव जन जन तक पहुंच गया था। उसका भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। लेकिन वह नैरेटिव विधानसभा चुनाव में नहीं चल सकता है क्योंकि मतदाता इतना तो समझता है कि राज्य की सरकार संविधान नहीं बदल सकती है और न आरक्षण खत्म कर सकती है। तभी विपक्ष के पास कोई ग्रैंड नैरेटिव नहीं है और न सरकार के खिलाफ बहुत बड़ी सत्ता विरोधी लहर है। तभी सिर्फ जातीय समीकरण साधने से चुनाव जीतना मुश्किल होगा। हालांकि अभी पांच महीने का समय है और राजनीति में पांच महीने को अनंतकाल माना जाता है।