सिर्फ जाति समीकरण कितना काम आएगा!

उत्तर प्रदेश का इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायने में बहुत खास होने वाला है। आजादी के बाद से आज तक कोई भी मुख्यमंत्री लगातार इतने दिन तक पद पर नहीं रहा। जब लगातार कांग्रेस की सरकार बनती थी तब भी मुख्यमंत्री बदलते रहते थे। दूसरी खास बात यह है कि 1990 में कांग्रेस का वर्चस्व खत्म होने के बाद पिछले 36 साल में पहली बार किसी एक पार्टी का 10 साल तक राज रहा है। अगले साल फरवरी में एक पार्टी और एक व्यक्ति के 10 साल के राज के बाद चुनाव होगा। सो, भाजपा के सामने बड़ी चुनौती है। वैसे तो भाजपा ने सत्ता में रहते हुए सत्ता विरोधी माहौल यानी एंटी इन्कम्बैंसी की गुत्थी काफी हद तक सुलझा ली है। उसकी सरकारों के बार बार सत्ता में लौटने की संभावना दूसरी पार्टियों से ज्यादा होती है। यह भी कह सकते हैं कि भाजपा ने प्रो इन्कम्बैंसी को साध लिया है।

उत्तर प्रदेश का चुनाव इस मायने में भी बहुत खास होने वाला है कि पहली बार मुलायम सिंह का परिवार इतने समय तक सत्ता से बाहर रहा है। 2017 से पहले उनकी पार्टी थोड़े थोड़े अंतराल पर किसी न किसी फॉर्मूले से सरकार में आ जाती थी। कभी बसपा से तालमेल करके तो कभी लोकतांत्रिक कांग्रेस, रालोद या बसपा के बागियों के सहारे तो कभी अकेले। असल में उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का दौर चला था। 1990 से लेकर 2007 तक 17 वर्षों में कई बार सपा की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो पांच साल के बाद सपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आई और अखिलेश यादव सीएम बने। लेकिन 2017 के बाद से सपा लगातार विपक्ष में है। एक और खास बात यह है कि लंबे अरसे के बाद उत्तर प्रदेश में बिल्कुल आमने सामने का विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछली बार यानी 2022 का विधानसभा चुनाव भी भाजपा और सपा के बीच ही था लेकिन तब तक मायावती की बहुजन समाज पार्टी एक ताकत थी। उसके 10 सांसद थे और लगभग 20 फीसदी वोट था। लेकिन अब वह शून्य सांसद, शून्य विधायक और लगभग नौ फीसदी वोट वाली पार्टी है, जिसमें बहुत अंतर्कलह है। पिछले चुनाव में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही थी। इस बार बसपा पहले ही मुकाबले से बाहर है और यह लगभग तय लग रहा है कि कांग्रेस और सपा मिल कर लड़ेंगे। सो, भाजपा का पांच पार्टियों का गठबंधन सपा के गठबंधन से लड़ेगा।

कम से कम अभी दोनों पार्टियों की जो चुनावी तैयारी दिख रही है वह अपना अपना सामाजिक समीकरण साधने की है। दोनों गठबंधन अपने हिसाब से जातियों का गणित ठीक करने में लगे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वैसे तो हर भाषण में बाबर, औरंगजेब, सालार मसूद गाजी आदि का नाम लेते हैं, पोस्टर में आजम खां, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरें लगाई जाती हैं और 80-20 की राजनीति की बात की जाती है। माफिया को पूरी तरह से खत्म कर देने के नैरेटिव से कानून व्यवस्था सुधरने की धारणा तो बनाई जाती है, साथ ही अतीक और मुख्तार के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मैसेजिंग भी बोती है।

इसके साथ ही भाजपा जातियों का प्रबंधन भी कर रही है। वह इस भरोसे में है कि उसके पास सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी है, जो राजभर वोट लाएगी। निषाद पार्टी है, जिसके सहारे मल्लाह वोट मिलेंगे। अपना दल है, जिससे कुर्मी वोट सुनिश्चित है और रालोद है, जिसके सहारे जाट पूरी तरह से एकजुट रहेंगे। सामान्य वर्ग की जातियों यानी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, भूमिहार और कायस्थ का वोट भाजपा पहले से पक्का मान रही है। उसको लग रहा है कि इनमें से अगर किसी जाति में कोई नाराजगी है तो वह रूठने जैसा है और चुनाव तक उसके मान जाने की संभावना सौ फीसदी है। इस तरह हिंदुत्व के अंदर जातियों का परफेक्ट समीकरण भाजपा बना हुआ मान रही है।

दूसरी ओर अखिलेश यादव की उम्मीदें लोकसभा चुनाव के बाद कई गुना बढ़ गई हैं। उनको लग रहा है कि पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का उनका फॉर्मूला कामयाब होगा। असल में उनके पास माई समीकरण यानी मुस्लिम और यादव का लगभग 30 फीसदी वोट है। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होकर मुख्य मुकाबले से बाहर होने और कांग्रेस के सपा के साथ आऩे से मुस्लिम वोट में बिखराव की संभावना समाप्त हो गई है। लेकिन यह 30 फीसदी वोट सपा को कहीं नहीं पहुंचाएगा। तभी अखिलेश गैर यादव पिछड़ा और गैर जाटव दलित को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे है। इसमें कोई बुराई नहीं है। भारत में चुनाव जीतने के लिए जातियों का समीकरण बहुत अहम होता है। लेकिन सिर्फ इस आधार पर कोई भी पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती है।

समाजवादी पार्टी की इस रणनीति में समस्या इसलिए है क्योंकि उसे 10 साल से सत्ता में बैठी भाजपा को हराना है। सरकार चला रही किसी भी पार्टी को सिर्फ जातीय समीकरण से नहीं हराया जा सकता है। आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कोई भी सरकार तभी हारी है, जब उसके खिलाफ कोई बहुत मजबूत और प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर हो। अगर सरकार के खिलाफ थोड़ी बहुत नाराजगी है या थोड़ी बहुत शिकायतें हैं तो उनके दम पर उस सरकार को नहीं हराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में विपक्षी पार्टी अपने जातीय समीकरण के दम पर ज्यादा से ज्यादा मजबूत विपक्ष का दर्जा बचाए रख पाएंगी। जैसा बिहार में राजद के साथ हो रहा है। ऐसा इसलिए होता है कि जो सत्ता में बैठा है या लगातार चुनाव जीत रहा है उसका एक मजबूत सामाजिक समीकरण बना होता है और वह ऐसा लाभार्थी वर्ग तैयार करता है, जो हर हाल में उसे वोट करता है। यह विपक्ष का एक डिसएडवांटेज है।

सो, अखिलेश यादव को कांग्रेस से तालमेल करने और जातीय समीकरण साधने के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी लहर तैयार करने का प्रयास करना चाहिए था। हालांकि अगर सरकार के खिलाफ स्वाभाविक गुस्सा नहीं है तो सिर्फ प्रयास करने से सत्ता विरोधी लहर नहीं पैदा होगी। सत्ता विरोधी लहर दो तरह से बनती है। पहली, सरकार के कामकाज से नाराज होकर स्वाभाविक रूप से या फिर विपक्षी पार्टी के निरंतर प्रयास से। सरकार से नाराज होने की पर्याप्त वजह होने के बावजूद विपक्ष के निरंतर प्रयास की कमी से उत्तर प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर नहीं बन सकी है। कम से कम अभी सतह के ऊपर ऐसी कोई लहर नहीं दिख रही है। जबकि ऐसा होना चाहिए था। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ युवाओं में नाराजगी है। समाजवादी पार्टी की नेता डिंपल यादव ने इसके खिलाफ जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में हिस्सा भी लिया। लेकिन सपा इस नाराजगी को एक दिशा देने के लिए जरूरी निरंतरता के साथ काम नहीं कर सकी। ऐसे ही राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला है। संसद के मानसून सत्र में सपा ने इसे लेकर खूब राजनीति की लेकिन सत्र समाप्त होने के बाद सपा की ओर से इस मुद्दे पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है।

महंगाई वैसे तो पिछले 10 साल से लगातार बढ़ रही है लेकिन रूस व यूक्रेन युद्ध और इस साल 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका के हमले की वजह से जिस तरह आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है उससे महंगाई में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है। इसे हर आम और खास व्यक्ति महसूस कर रहा है। परंतु मुख्य विपक्षी पार्टी महंगाई को मुद्दा नहीं बना पाई है। रोजगार और लोगों की आर्थिक समस्याओं पर भी विपक्ष का फोकस कम ही रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले ‘संविधान खतरे में है’ और ‘आरक्षण समाप्त हो जाएगा’ का नैरेटिव जन जन तक पहुंच गया था। उसका भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। लेकिन वह नैरेटिव विधानसभा चुनाव में नहीं चल सकता है क्योंकि मतदाता इतना तो समझता है कि राज्य की सरकार संविधान नहीं बदल सकती है और न आरक्षण खत्म कर सकती है। तभी विपक्ष के पास कोई ग्रैंड नैरेटिव नहीं है और न सरकार के खिलाफ बहुत बड़ी सत्ता विरोधी लहर है। तभी सिर्फ जातीय समीकरण साधने से चुनाव जीतना मुश्किल होगा। हालांकि अभी पांच महीने का समय है और राजनीति में पांच महीने को अनंतकाल माना जाता है।

यूजीसी का दिशानिर्देश कानून नहीं बनेगा

यह बात राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ यानी आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कही है। वे एक जैन धर्मगुरू से मिलने गए थे, जहां उनसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी के समानता वाले दिशानिर्देशों के बारे में पूछा गया था। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा कि यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता बनाने का जो दिशानिर्देश जारी किया है वह अभी कानून नहीं बना है और कभी भी कानून नहीं बनेगा। उनका यह बयान बहुत बड़ा है और इससे दो सवाल उठते हैं। पहला सवाल तो यह है कि क्या मोहन भागवत की सरकार में कोई ऑथोरिटी है, जो वे कह रहे हैं कि यह कभी कानून नहीं बनेगा या सरकार के किसी व्यक्ति ने उनसे ऐसी बात कही है? अनौपचारिक रूप से सब जानते हैं कि भाजपा के ऊपर संघ का क्या असर है। लेकिन क्या औपचारिक रूप से संघ प्रमुख इस तरह की घोषणा कर सकते हैं? दूसरा सवाल यह है कि अभी यह ऐलान करने की जरुरत क्यों पड़ी है?

गौरतलब है कि यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों के कैम्पस में कथित तौर पर समानता बहाल करने के लिए इस साल फरवरी में एक नया दिशानिर्देश जारी किया था। उसे लेकर बहुत तीव्र विरोध हुआ क्योंकि उससे ज्यादा असमानता बनाने वाला और भेदभाव को बढ़ाने वाला सरकारी निर्देश आज तक आजाद भारत में नहीं जारी हुआ था। वह दिशानिर्देश कैम्पस में प्रवेश से पहले ही सामान्य वर्ग के छात्र को अपराधी बना देने वाला है। अगर ये निर्देश लागू हो जाते तो किसी भी सामान्य वर्ग के छात्र को, जिसकी दाखिले के समय 18 साल के आसपास उम्र होगी उसे उत्पीड़न के आरोप में फंसाया जा सकता था। फंसाने वाले के आरोप अगर गलत निकलते तब भी उसके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं होती। सो, जैसे ही ये निर्देश जारी हुए वैसे ही इसका विरोध हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने इस पर रोक लगा दी। पिछले सात महीने से यथास्थिति बनी हुई है और भेदभाव रोकने का 2012 का पुराना दिशानिर्देश लागू है।

इसलिए सात महीने बाद मोहन भागवत ने ऐलान किया है कि यह कभी कानून नहीं बनेगा इसका अर्थ है कि अब सामान्य वर्ग के लोगों की नाराजगी की आंच संघ और भाजपा दोनों को महसूस होने लगी है। उनको लगने लगा है कि वे सामान्य वर्ग को नाराज कर अपनी ताकत गंवा रहे हैं। धारणा के स्तर पर, मीडिया और सोशल मीडिया में समर्थन के स्तर पर और राजनीतिक व चुनावी स्तर पर भी यह दबाव महसूस हो रहा है। तभी भागवत ने यह बात कही है। और तभी ऐसा लग रहा है कि सरकार इसे नहीं लागू करने जा रही है। गौरतलब है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हुई तो केंद्र सरकार ने कहा कि वह इन दिशानिर्देशों पर पुनर्विचार कर रही है। इसके बाद मामला टल गया।

इस बीच सरकार के सूचना सलाहकारों में से एक दिलीप मंडल ने इसे लेकर एक लंबी पोस्ट लिखी। वे दलित, आदिवासी और पिछड़ा उत्पीड़न के लिए सामान्य वर्ग को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन उनका सुर बदला हुआ था। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि रोहित वेमुला मामले के बाद कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट गए थे और कोर्ट ने नए दिशानिर्देश बनाने को कहा था, जिसके बाद यूजीसी के कुछ अधिकारियों ने दिशानिर्देश बना दिए। इसके आगे उन्होंने कहा कि सरकार ने उन्हें लागू नहीं किया है। उन्होंने अपनी तरफ से अधिकारियों पर ठीकरा फोड़ कर राजनीतिक नेतृत्व को बचाने का प्रयास किया। इससे भी लग रहा है कि सरकार इस मसले पर पीछे हट गई है।

राजस्थान के नतीजों से परेशानी

यह बहुत दिलचस्प संयोग है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यूजीसी के दिशानिर्देशों को लेकर बयान उस दिन आया, जिस दिन राजस्थान के स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजे आ रहे थे। सोमवार की सुबह नतीजे आने शुरू हुए तो भाजपा के सारे बड़े नेता हैरान थे। राजस्थान के तमाम बड़े और प्रभावशाली नेताओं के गढ़ में भाजपा हार रही थी। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के अपने भरतपुर इलाके में भाजपा हार गई। वसुंधरा राजे के झालावाड़ इलाके में भाजपा हार गई। अजमेर में पहली बार कांग्रेस पार्टी को बढ़त मिली। इसके बाद मीडिया की रिपोर्ट में खुल कर वहां के रिपोर्टर और जानकार कहने लगे कि कई इलाकों में यूजीसी के दिशानिर्देशों का जवाब सामान्य वर्ग के लोगों ने दिया है। हो सकता है कि संघ प्रमुख के बयान का राजस्थान के नतीजों से कोई लेना देना न हो लेकिन यह भाजपा और संघ दोनों के लिए चिंता की बात है।

ध्यान रहे राजस्थान में भले हर पांच साल पर सत्ता बदलती है और बारी बारी से भाजपा व कांग्रेस सरकार में आते हैं। लेकिन भाजपा को लगता है कि गुजरात और मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान को स्थायी गढ़ बनाया जा सकता है। लेकिन गुजरात और मध्य प्रदेश के मुकाबले पिछले लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में राजस्थान में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा। उसने जीत कर सरकार बना ली लेकिन जीत एकतरफा नहीं थी। भजनलाल शर्मा के मुख्यमंत्री बनने के बाद से संघ और भाजपा दोनों को सरकार के कामकाज की फीडबैक सकारात्मक नहीं है। स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन से सबकी चिंता बढ़ी है।

आमतौर पर स्थानीय निकाय सत्तारूढ़ दल ही जीतते हैं लेकिन भाजपा को 4,179 सीटें मिली हैं, जबकि 36 सौ से ज्यादा सीट जीत कर कांग्रेस उसके बिल्कुल नजदीक रही। 22 सौ से ज्यादा निर्दलीय पार्षद जीत गए। इतनी संख्या में निर्दलीय पार्षद जीतने को कॉकरोच जनता पार्टी के असर के तौर पर देखा जा रहा है। सीजेपी ने स्कूलों का सवाल उठा कर एक तीसरी ताकत के उभरने की संभावना बढ़ा दी है।

Amit Shah UCC: ‘2029 से पहले 21 राज्यों में लागू होगा UCC’: अमित शाह का बड़ा ऐलान, बोले- घुसपैठियों की पहचान कर डिपोर्ट करेंगे

Amit Shah UCC: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार (13) को कहा कि 21 राज्यों की भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकारें 2029 से पहले समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करेंगी। शाह ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान केंद्र सरकार की पिछले 12 वर्षों की उपलब्धियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP की 25 साल की यात्रा का उल्लेख किया।

‘मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिए गए’

अमित शाह ने कहा, “तीन तलाक को समाप्त करके मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिए गए हैं। हमने कई राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की है। मुझे विश्वास है कि भाजपा-राजग शासित 21 राज्यों में 2029 से पहले यूसीसी लागू कर दिया जाएगा।”आपको बता दें कि अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होना है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने भारतीय न्याय संहिता के माध्यम से देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को मजबूत किया है। साथ ही दावा किया कि कई राज्यों में एक साल में दोषसिद्धि दर में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि तीन साल के भीतर न्याय दिलाने के लिए एक व्यवस्था स्थापित की जा रही है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर शाह ने कहा कि आर्टिकल 370 और 35A को बिना एक बूंद खून बहाए या एक गोली चलाए समाप्त किया गया। गृह मंत्री ने दावा किया कि कश्मीर अब भारत के साथ पूरी तरह खड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने पांच दशक से जारी नक्सलवाद को समाप्त किया है और देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में 14 से अधिक शांति समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।

90000 लोगों ने किया सरेंडर

शाह ने कहा, “नौ हजार से अधिक लोगों ने आत्मसमर्पण किया है। आज हम पूर्वोत्तर को विकास के रास्ते पर लाए हैं।” उन्होंने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक, हवाई हमले और ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकवाद को बिल्कुल बर्दाश्त न करने की नीति स्थापित की है। मणिपुर में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) लागू करने के लिए क्या 1951 को आधार वर्ष माना जाएगा? इस सवाल पर शाह ने कहा कि केंद्र इस मुद्दे पर अपने सहयोगियों और राजनीतिक दलों के साथ चर्चा कर रहा है।

उन्होंने कहा, “हम इन मुद्दों पर अपने सहयोगियों और मणिपुर के राजनीतिक दलों के साथ चर्चा कर रहे हैं। जो भी फैसला होगा, हम आपको बताएंगे।” अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों और मुंबई जैसे शहरों में उनकी पहचान किए जाने के बारे में पूछे जाने पर शाह ने कहा कि सरकार उन्हें चिह्नित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों का खुलासा नहीं करेगी।

शाह ने चुटकी लेते हुए कहा, “आप गृहमंत्री से कह रहे हैं कि वह तरीकों को सार्वजनिक कर दें और आपको बता दें कि यह कैसे किया जाएगा। फिर हम उन्हें कैसे पकड़ेंगे? उन्हें भी पता चल जाएगा।”

अवैध घुसपैठियों पर एक्शन

शाह ने देश से अवैध घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें बाहर निकालने के सरकार के संकल्प को दोहराया। उन्होंने कहा, “मैं अपने संकल्प को दोहराता हूं कि हम इस देश के एक-एक अवैध घुसपैठिये की पहचान करेंगे और एक-एक करके उन्हें देश से बाहर भेजेंगे।”

इस दौरान सरकार के एंटी ड्रग्स अभियान पर शाह ने कहा कि उन्होंने हाल में ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ शुरू किया है।इस अभियान के तहत हर राज्य का दौरा करेंगे। शाह ने कहा कि उन्होंने पिछले दिन एक मुख्यमंत्री से बात की थी। अभियान को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए पूरे दिन बैठक की जाएगी।

क्या है UCC?

समान नागरिक संहिता (UCC) का मतलब देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों से जुड़े समान नागरिक कानूनों की व्यवस्था से है। वर्तमान में इन विषयों पर अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। UCC का उद्देश्य इन व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानूनी ढांचा स्थापित करना है।

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