मुंबई में जंतर मंतर जैसा प्रदर्शन

मुंबई। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने मुंबई के शिवाजी पार्क को जंतर मंतर में बदल दिया। शुक्रवार, दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग लेकर मुंबई के लोग सड़कों पर उतरे। बड़ी संख्या में लोग शिवाजी पार्क में इकट्ठा हुए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके साथ राजनीति और फिल्म जगत की बड़ी हस्तियां भी शामिल हुईं। देर शाम तक प्रदर्शनकारी शिवाजी पार्क में जमा रहे।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे भी आंदोलन में शामिल हुए। फिल्मी हस्तियों की बात करें तो नसीरूद्दीन शाह से लेकर शबाना आजमी और विशाल ददलानी से लेकर विशाल भारद्वाज तक अनके अभिनेता, गायक, गीतकार, संगीतकार, निर्माता और निर्देशक शिवाजी पार्क पहुंचे और आंदोलन में शामिल हुए। इससे पहले सीजेपी ने ऐलान किया था कि अगर प्रशासन ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी तो जेल भरो अभियान चलेगा। हालांकि उसकी नौबत नहीं आई।

सीजेपी के इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। वे सोशल मीडिया में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे मीम्स के पोस्टर बना कर पहुंचे थे। सब एक सुर में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान मंच पर मौजूद सभी लोगों ने महात्मा गांधी की तस्वीर वाली टीशर्ट पहनी थी। गौरतलब है कि इससे पहल सीजेपी ने 20 जून से 25 जुलाई तक दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था, जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ था।

बहरहाल, शुक्रवार के प्रदर्शन में अभिजीत दीपके ने कहा, ‘जब भारत के प्रधानमंत्री अमेरिका जाते हैं, तब भी वहां कहा जाता है कि ये गांधी के देश से आए हैं। गांधी देश की आत्मा हैं, आंबेडकर रीढ़ की हड्डी और नेहरू दिमाग हैं’। दीपके ने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा ‘एक देश, एक पार्टी’ चाहती है। प्रदर्शन के दौरान सीजेपी ने सरकार के सामने अपनी तीन मांगें रखीं, जिसमें पहली मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की है। इसके बाद जनवरी 2025 की मतदाता सूची बहाल करने और मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को बंद करने की मांग की गई।

सीजेपी के प्रदर्शन में अभिनेत्री शबाना आजमी ने कहा, ‘हमारा वोट हमारा अधिकार है, हमारी आवाज है। जब मतदाता सूची से हमारे नाम हटा दिए जाएं, तो हम क्या करेंगे’? गायक संगीतकार विशाल ददलानी ने प्रदर्शन के दौरान गाना गाया। मशहूर फिल्मकार विशाल भारद्वाज अपनी पत्नी रेखा भारद्वाज के साथ प्रदर्शन में पहुंचे थे। उन्होंने इस दौरान कहा, ‘मैं यहां केवल अपना समर्थन देने आया हूं’। मुंबई में विरोध प्रदर्शन के दौरान सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई का जिक्र किया और कहा, ‘दिल्ली पुलिस ने फिर से बर्बरता की है, सुधर जाओ वरना हम तुम्हें सुधार देंगे’।

‘लस्ट स्टोरीज़ 3’: कामना के उस पार

सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है।

पंकज दुबे

सेक्स के बारे में हमारी सबसे बड़ी दिक्कत शायद यह नहीं कि हम उसके बारे में कम जानते हैं। दिक्कत यह है कि हम उसके बारे में खुलकर सोचते भी कम हैं।

हमारे समाज में सेक्स या तो नैतिकता का विषय रहा है, या अपराध बोध का, या फिर चुपचाप उपभोग की जाने वाली चीज़। प्रेम पर कविता लिखी जा सकती है, विरह पर गीत बनाया जा सकता है, लेकिन इच्छा पर बात आते ही भाषा धीमी पड़ जाती है। इसलिए ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ को सिर्फ चार कामुक कहानियों की तरह देखना उसके साथ नाइंसाफी होगी।

विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज की चार कहानियां दरअसल एक ही मानवीय इलाके में घूमती हैं कि ‘हम आखिर चाहते क्या हैं’? और उससे भी बड़ा सवाल कि हम जो चाहते हैं, क्या उसके बारे में अपने साथी से बात कर पाते हैं? यही वह जगह है जहां सेक्स धीरे-धीरे रिश्ते का विषय बन जाता है।

मोटवानी की कहानी में दो विवाहित स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन में आई ऊब को तोड़ने के लिए एक असामान्य रास्ता सोचती हैं। कहानी में हास्य है, लेकिन उसके पीछे एक गंभीर प्रश्न है, “क्या विवाह में साथ रहना अपने आप अंतरंग बने रहना भी है?”

विवाह की शुरुआत में दूसरा व्यक्ति रहस्य होता है। फिर वह परिचित होता है। फिर बहुत परिचित। और कभी-कभी इतना परिचित कि जिज्ञासा ही खत्म हो जाती है। शायद इच्छा का एक हिस्सा नवीनता नहीं, दूसरे को फिर से देखने की क्षमता है। मोटवानी की कहानी इसी खोई हुई दृष्टि को हल्के-फुल्के ढंग से पकड़ती है। खास बात यह है कि यहां स्त्री की कामना किसी पुरुष की इच्छा के जवाब में नहीं, अपने आप में मौजूद मानवीय इच्छा है। यह फ़र्क़ छोटा नहीं है।

किरण राव इस इच्छा को और भीतर ले जाती हैं। उनकी कहानी में आकर्षण सिर्फ़ उस व्यक्ति का नहीं है जो सामने मौजूद है; उसमें उस व्यक्ति की हमारी बनाई हुई कल्पना भी शामिल है। हम किसी को देखते हैं और फिर अपने मन में उसका एक संस्करण बना लेते हैं। कभी-कभी हम इंसान से नहीं, उसके बारे में अपनी कल्पना से आकर्षित होते हैं। यानी कामना की पहली मंज़िल शरीर नहीं बल्कि कल्पना है।

शकुन बत्रा के यहां यह कल्पना विवाह के टूटने के बाद भी शरीर में बनी रहती है। रिश्ता खत्म करने का फैसला हो चुका है, लेकिन आकर्षण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।यह असुविधाजनक स्थिति इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जीवन में भावनाएं अनुबंधों की तरह समाप्त नहीं होतीं। तलाक का कागज़ कह सकता है कि रिश्ता ख़त्म। शरीर शायद कहे, अभी नहीं। यहीं फ़िल्म सेक्स को एक ऐसी भाषा की तरह देखती है जो उस समय भी बोल सकती है जब शब्दों ने जवाब देना बंद कर दिया हो।

और विशाल भारद्वाज कामना को लगभग पूरी तरह मन के हवाले कर देते हैं। साहित्य, कल्पना, आवाज़ और स्मृति मिलकर एक ऐसा संसार बनाते हैं जहां इच्छा को किसी शारीरिक घटना की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है। इस विचार को ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ पर रखें तो चारों कहानियां एक दिलचस्प नक्शा बनाती हैं।

कहीं इच्छा को विवाह की ऊब से मुक्ति चाहिए। कहीं वह कल्पना में अपना संसार बना रही है। कहीं रिश्ता खत्म हो चुका है, लेकिन शरीर पीछे छूट गया है।

कहीं साहित्य और कल्पना देह से पहले इच्छा को जगा रहे हैं। तो फिर सेक्स आखिर है क्या? शायद इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। कभी वह सुख है। कभी रोमांच। कभी ये पुष्टि कि मैं अभी भी आकर्षक हूं। और कभी पलायन कि कुछ देर के लिए अपनी ज़िंदगी की दूसरी सारी परेशानियां भूल सकूं। और कभी-कभी वह उस अकेलेपन के खिलाफ मनुष्य का सबसे पुराना प्रतिरोध है, जिसे शब्दों में स्वीकार करना मुश्किल होता है। यहीं ओशो का ‘ध्यान’ वाला विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।

यदि ध्यान का अर्थ पूरी तरह वर्तमान क्षण में होना है, तो अंतरंगता में भी ऐसी ही उपस्थिति की संभावना है। जब दो लोग सचमुच एक-दूसरे के साथ होते हैं, तब कुछ समय के लिए सामाजिक भूमिकाएं, चिंता, प्रदर्शन और आत्म-संदेह पीछे हट सकते हैं। लेकिन इसमें एक बड़ा फ़र्क़ है। सेक्स अपने आप ध्यान नहीं है। जागरूकता उसे एक अलग अनुभव बना सकती है। और जागरूकता का अर्थ है कि मैं सिर्फ़ अपनी इच्छा को नहीं देख रहा; मैं सामने वाले मनुष्य को भी देख रहा हूं।

यहीं से कामना और अंतरंगता अलग हो जाती हैं। कामना पूछती है, ‘मुझे क्या चाहिए?’ अंतरंगता पूछती है, ‘हम दोनों के बीच अभी क्या हो रहा है?’ यह फ़र्क़ विवाह के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि विवाह में सबसे बड़ा संकट हमेशा सेक्स की कमी नहीं होता। कभी-कभी संकट यह होता है कि हम अपने साथी के बारे में नई चीज़ें जानना बंद कर देते हैं। उसे देखकर हमें कुछ नया महसूस नहीं होता। उसकी चुप्पी पढ़ने की कोशिश नहीं करते। उसके बदलते शरीर को नहीं देखते। उसकी बदलती इच्छाओं के बारे में नहीं पूछते। हम व्यक्ति को उसकी भूमिका में बदल देते हैं मसलन पति, पत्नी, मां, पिता, कमाने वाला, घर संभालने वाला। और जिस दिन व्यक्ति की जगह भूमिका ले लेती है, उस दिन अंतरंगता धीरे-धीरे कम होने लगती है।

यहीं ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ अपने शीर्षक से कहीं बड़ा हो जाता है। यह सिर्फ ‘लस्ट’ की कहानी नहीं है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो चाहा जाना चाहता है, देखा जाना चाहता है और अपने भीतर अभी भी जीवित किसी हिस्से को महसूस करना चाहता है। चारों फ़िल्मों में कामना के रूप अलग हैं, लेकिन उनकी जड़ में पहचान का प्रश्न है। क्या मैं अभी भी आकर्षक हूं? क्या कोई मुझे देखता है? क्या मेरे भीतर अभी भी कुछ ऐसा है जिसे कोई पाना चाहता है? क्या मैं अपने साथी को अब भी वैसे देख सकता हूं? और शायद सबसे कठिन सवाल कि ‘क्या मैं खुद को अब भी वैसे देख सकता हूं’?

यही वजह है कि फ़िल्म में सेक्स जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज्यादा अनुपस्थित चीज़ें महत्वपूर्ण हैं जैसे बातचीत, जिज्ञासा, असुरक्षा, कल्पना, स्मृति और वह भावनात्मक दूरी जिसे कोई शारीरिक निकटता हमेशा भर नहीं सकती।

 

सभी निर्देशक इन चीज़ों को अलग-अलग सुरों में छूते हैं। मोटवानी के यहां हास्य है, किरण राव के यहां भ्रम, शकुन बत्रा के यहां रिश्ते के टूटने की बेचैनी और विशाल भारद्वाज के यहां कल्पना का सम्मोहन।

इनमें कोई एक कहानी दूसरी पर निर्णायक रूप से भारी नहीं पड़ती; असली दिलचस्पी इन चार दृष्टियों को साथ देखने में है। क्योंकि तब ‘लस्ट’ एक शारीरिक शब्द नहीं रह जाता। वह एक मनोवैज्ञानिक शब्द बन जाता है। हम किस चीज़ के लिए तरस रहे हैं? और शायद इस सवाल का जवाब सेक्स से बहुत बड़ा है।

कभी हम स्पर्श के लिए तरसते हैं। कभी ध्यान के लिए। कभी स्वीकार किए जाने के लिए। कभी पुराने प्रेम में नई रोशनी के लिए। और कभी सिर्फ़ इस आश्वासन के लिए कि हमारी ज़िंदगी अभी पूरी तरह आदत नहीं बनी है।

इसलिए सेक्स की सबसे बड़ी ताकत शायद उसका चरम सुख नहीं, बल्कि उसकी क्षमता है कि कुछ देर के लिए वह हमें अपनी बनाई हुई दुनिया से बाहर निकाल सके। लेकिन विडंबना देखिए कि हम सेक्स का इस्तेमाल कभी-कभी अकेलेपन से बचने के लिए करते हैं, जबकि सच्ची अंतरंगता हमें अकेलेपन के कारण से सामना कराती है।

मेरे भीतर ऐसा क्या खाली है, जिसे मैं दूसरे की देह से भरना चाहता हूं? यह सवाल आसान नहीं है। शायद इसी कारण हम इसे पूछना भी नहीं चाहते।

‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ की असली दिलचस्पी इसी असुविधा में है। यह हमें सेक्स के बारे में सोचने के बहाने रिश्तों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। और ओशो को संदर्भ में रखें तो शायद यात्रा कुछ ऐसी बनती है- दमन से मुक्ति तक। कामना से जागरूकता तक। शरीर से उपस्थिति तक। और उपस्थिति से अंतरंगता तक।

क्योंकि अंततः किसी रिश्ते का सबसे कामुक हिस्सा शायद शरीर नहीं होता। वह क्षण होता है जब सामने वाला मनुष्य आपको महसूस कराता है कि मैं तुम्हें देख रहा हूं।
तुम मेरे लिए अभी भी एक रहस्य हो।शायद प्रेम का भविष्य इसी छोटे-से रहस्य में छिपा है। और शायद कामना का भी। कामना के उस पार सेक्स नहीं, एक-दूसरे को फिर से खोज लेने की संभावना है।

देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)

Lust Stories 3 Movie Review: चार बड़े फिल्ममेकर, चाहत को देखने के चार बिल्कुल अलग नजरिए

Lust Stories 3 Movie Review: एंथोलॉजी बनाना आसान नहीं होता। दर्शक अभी एक कहानी में पूरी तरह डूब भी नहीं पाता कि उसे दूसरी दुनिया में पहुंचना पड़ता है। लेकिन’लस्ट स्टोरी 3′ इस फॉर्मेट की इसी खासियत को अपनी ताकत बना लेती है। चारों कहानियों को एक जैसा बनाने की कोशिश करने के बजाय हर निर्देशक को अपनी आवाज और अपना अंदाज रखने की पूरी जगह दी गई है।

विक्रमादित्य मोटवाने की कहानी चारों में सबसे अलग है। राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, विजय वर्मा और अभिषेक शर्मा एक ऐसी कहानी का हिस्सा हैं, जो कोरियन फिक्शन से प्रभावित अंदाज में पति-पत्नी के पार्टनर बदलने जैसे विषय को एक्सप्लोर करती है। विषय अपने आप में असहज है, लेकिन फिल्म इस असहजता से भागती नहीं बल्कि इसी को कहानी का हिस्सा बना लेती है।

किरण राव गुरफतेह पीरजादा और सना थंपी के साथ माहौल को पूरी तरह बदल देती हैं। उनकी कहानी में हल्की-फुल्की ठगी वाली थ्रिलर का अंदाज है, जिसमें ड्रग्स, पैसे और इतने ट्विस्ट हैं कि मनोरंजन बना रहता है। जब आपको लगता है कि अब कहानी समझ आ गई है, तभी एक मजेदार फिल्मी सरप्राइज सामने आ जाता है।

शकुन बत्रा का सेगमेंट रिश्तों पर बनी ड्रामा कहानी के लिहाज से शायद सबसे ज्यादा जाना-पहचाना महसूस होता है। अली फजल और राधिका मदान एक ऐसे रिश्ते को सामने लाते हैं, जो चाहत, थेरेपी, परिवार की उम्मीदों और अधूरी भावनाओं के बोझ तले दबा हुआ है। कहानी शारीरिक रिश्ते से आगे जाकर यह समझने की कोशिश करती है कि जब भावनात्मक उलझनें हावी होने लगती हैं तो क्या होता है।

विशाल भारद्वाज की कहानी एक खूबसूरत बदलाव लेकर आती है। अदिति राव हैदरी, सिद्धार्थ और गजराज राव हमें 1987 में ले जाते हैं, जहां सेक्स एजुकेशन जैसे विषय को उस दौर की पृष्ठभूमि में पेश किया गया है। कहानी का रिदम बाकी से अलग है और नक्स वोमिका व बेलाडोना जैसे क्वर्की संदर्भ इसे और खास बनाते हैं। चारों कहानियां एक-दूसरे से मुकाबला नहीं करतीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि चाहत को समझने और देखने के कितने अलग-अलग तरीके हो सकते हैं।

लस्ट स्टोरीज 3 यह साबित करती है कि किसी फ्रेंचाइज़ी को अपनी पहचान बनाए रखने के लिए खुद को बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं होती। यह नजदीकियों और रिश्तों को एक्सप्लोर करती रहती है, लेकिन चारों फिल्ममेकरों को चार बिल्कुल अलग कहानियां कहने की आजादी देती है। दो सफल अध्यायों के बाद भी यह फॉर्मेट फ्रेश महसूस होता है और अपनी अलग पहचान बनाए रखता है।

Fresh Bollywood Couple 2026: पीरियड ड्रामा से लेकर थ्रिलर तक, 2026 की 5 नई ऑन-स्क्रीन जोड़ियों ने जीता दर्शकों का दिल, यहां देखें पूरी लिस्ट

Fresh Bollywood Couple 2026: हर साल भारतीय सिनेमा और ओटीटी पर नई कहानियां देखने को मिलती हैं। लेकिन जब दो कलाकार पहली बार पर्दे पर साथ आते हैं तो दर्शकों का ध्यान सबसे ज्यादा उनकी केमिस्ट्री पर जाता है। दो कलाकारों की पहली फिल्म या सीरीज में उनकी सहज केमिस्ट्री कई बार पूरे प्रोजेक्ट की खासियत बन जाती है।

साल 2026 भी इससे अलग नहीं रहा और इस साल अलग-अलग जॉनर में कुछ ऐसी नई जोड़ियां देखने को मिलीं, जिन्होंने दर्शकों को खूब प्रभावित किया। आइए नजर डालते हैं ऐसी 5 नई जोड़ियों पर, जिन्होंने इस साल पर्दे पर कुछ नया और खास पेश किया।

रोहित सराफ और प्रतिभा रांटा – द रिवोल्यूशनरीज

रोहित सराफ अपनी सहज और आम लड़के जैसी पसंद आने वाली छवि के लिए जाने जाते हैं। लेकिन निखिल आडवाणी की फिल्म द रिवोल्यूशनरीज में वह एक बिल्कुल अलग किरदार में नजर आ रहे हैं। वह स्वतंत्रता सेनानी सचिंद्र नाथ सान्याल की भूमिका निभा रहे हैं। उनके साथ प्रतिभा रांटा हैं, जिन्होंने लापता लेडीज और हीरामंडी में अपने शानदार अभिनय से अपनी पहचान बनाई। फिल्म में वह प्रतिभा लाहिड़ी का किरदार निभा रही हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के गुप्त संघर्ष की पृष्ठभूमि पर बनी इस कहानी में दोनों की साथ वाली मौजूदगी कहानी को भावनात्मक मजबूती देती है। 11 सितंबर से प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है फिल्म।

शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी – ओ रोमियो

विशाल भारद्वाज की ओ रोमियो में दो ऐसे कलाकार पहली बार साथ आए, जो अपने दमदार अभिनय के लिए जाने जाते हैं। इस एक्शन-थ्रिलर के लिए शाहिद कपूर ने एक बार फिर विशाल भारद्वाज के साथ काम किया और इस बार उनके साथ तृप्ति डिमरी नजर आईं। दोनों की जोड़ी ने कहानी में जुनून और जोश भरा। हाई-ऑक्टेन ड्रामा के साथ भावनात्मक गहराई ने इस जोड़ी को खास बनाया। दोनों दमदार कलाकारों की एनर्जी जब पर्दे पर एक साथ देखने को मिली, तो इस डार्क रोमांटिक थ्रिलर को एक अलग ही धार मिली।

वेदांग रैना और शरवरी – मैं वापस आऊंगा

मैं वापस आऊंगा में आज के दौर के दो शानदार युवा कलाकार वेदांग रैना और शरवरी पहली बार साथ नजर आए। पहली ही झलक से दोनों की जोड़ी बेहद सहज लगी। युवा जोश, भावनाओं और सच्ची गर्मजोशी के मेल के साथ दोनों की केमिस्ट्री ने फिल्म में एक प्यारा और आसान आकर्षण कपल दिखा। उनकी स्वाभाविक बॉन्डिंग ने खासकर यंग दर्शकों को तुरंत अपनी ओर खींचा।

सिद्धांत गुप्ता और संस्कृति जयान – कृष्णावतारम

कृष्णावतारम में सिद्धांत गुप्ता के साथ नई अभिनेत्री संस्कृति जयान की जोड़ी बनी। दोनों ने पर्दे पर एक ऐसा संतुलन बनाया, जो काफी सहज लगा। सिद्धांत के अभिनय के साथ संस्कृति की मासूमियत ने उनके किरदारों के बीच एक प्यारा और भरोसेमंद रिश्ता दिखाया। दोनों के बीच के छोटे-छोटे और सहज पल कहानी को एक अलग मजबूती देते हैं, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के साथ बनी रहती है।

इमरान हाशमी और दिशा पाटनी – आवारापन 2

आवारापन 2 में इमरान हाशमी और दिशा पाटनी की जोड़ी देखने को मिली, जो अपने आप में काफी अलग और दिलचस्प है। प्यार और अपने किए का प्रायश्चित करने की एक गहरी और गंभीर दुनिया में इमरान का दमदार और गंभीर अंदाज, दिशा के खूबसूरत और सहज अभिनय के साथ बखूबी मेल खाता है। इस जोड़ी ने सीक्वल की कहानी में एक नई दिलचस्प परत जोड़ी। यह जोड़ी साबित करती है कि कई बार अलग और अनोखी कास्टिंग ही पर्दे पर सबसे यादगार केमिस्ट्री लेकर आती है।

Lust Stories 3: ‘लस्ट स्टोरी 3’ का पोस्टर हुआ रिलीज, ओटीटी रिलीज डेट से लेकर स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, कास्ट तक जानें सब कुछ

Lust Stories 3: नेटफ्लिक्स की एंथोलॉजी फ्रैंचाइजी ‘लस्ट स्टोरीज’ वापस आ रही है और इस बार यह चार नए डायरेक्टरों को साथ ला रही है। ‘लस्ट स्टोरीज 3’ का प्रीमियर दुनिया भर में 18 सितंबर, 2026 को होगा। यह पहली बार है जब नेटफ्लिक्स इंडिया की इस एंथोलॉजी का तीसरा सीजन आ रहा है।

‘लस्ट स्टोरीज 3’ कब और कहां देखें

‘लस्ट स्टोरीज 3’ सिर्फ नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होगी और इसके चारों हिस्से एक साथ रिलीज होंगे न कि अलग-अलग समय पर। यह एंथोलॉजी अपने फॉर्मेट पर ही बनी रहेगी। ये ऐसी शॉर्ट फिल्में जो इच्छा, इंटीमेसी और मॉडर्न रिश्तों के पेचीदा पहलुओं को दिखाती हैं।

डायरेक्टरों की नई टीम

इस सीजन में पूरी तरह से नई टीम है- विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज। हर कोई एक अलग और पूरी कहानी को डायरेक्ट करेगा। ओरिजिनल 2018 सीजन अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बनर्जी और करण जौहर ने बनाया था। इसके बाद सीजन 2 में कोंकणा सेन शर्मा, आर बाल्की, सुजॉय घोष और अमित रवींद्रनाथ शर्मा शामिल थे। हर सीजन में नए कहानीकारों को लाना इस फ़्रैंचाइज़ी की पहचान बन गई है।

‘लस्ट स्टोरीज 3’ की कास्ट

इस बड़ी कास्ट में राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, अदिति राव हैदरी, राधिका मदान, सना थम्पी, विजय वर्मा, अभिषेक बनर्जी, सिद्धार्थ, अली फजल और गुरफतेह पीरजादा शामिल हैं। खबरों के मुताबिक, मोटवाने के हिस्से में राधिका आप्टे और कोंकणा सेन शर्मा, बत्रा के हिस्से में अली फजल और राधिका मदान, राव के हिस्से में गुरफतेह पीरजादा और नई एक्ट्रेस सना थम्पी, और भारद्वाज की फिल्म में अदिति राव हैदरी मुख्य भूमिका में होंगी।

मेकर्स का क्या कहना है

नेटफ्लिक्स इंडिया की रुचिका कपूर शेख ने इस फ्रैंचाइजी की कामयाबी का श्रेय हर नए वर्जन के साथ खुद को नए सिरे से ढालने की आदत को दिया है। उन्होंने कहा कि हर चैप्टर एक जैसी इंसानी भावना से शुरू होता है, लेकिन इमोशनली अलग मोड़ पर खत्म होता है। RSVP के प्रोड्यूसर रॉनी स्क्रूवाला ने कहा कि यह एंथोलॉजी अलग-अलग सोच वाले फ़िल्ममेकर्स को लाकर पारंपरिक तरीकों को चुनौती देती रहती है, वहीं फ़्लाइंग यूनिकॉर्न एंटरटेनमेंट की आशी दुआ ने इस सीज़न में अलग-अलग तरह के टोन और नज़रिए के मेल की बात कही।

2018 से, ‘लस्ट स्टोरीज़’ ने बेवफ़ाई, सेक्स और पर्सनल एजेंसी जैसे उन विषयों पर बात करने के लिए अपनी पहचान बनाई है जिनसे मेनस्ट्रीम बॉलीवुड अक्सर बचता है; इस दौरान इसे इंटरनेशनल एमी नॉमिनेशन भी मिला। अलग-अलग स्टाइल के लिए मशहूर चार डायरेक्टर्स और अनुभवी कलाकारों के साथ नई कलाकार सना थम्पी की कास्टिंग को देखते हुए उम्मीदें काफ़ी ज़्यादा हैं। अभी तक कोई ट्रेलर रिलीज़ नहीं हुआ है, इसलिए कहानी की डीटेल्स अभी सामने नहीं आई हैं।