Tata Trusts: टाटा ट्रस्ट्स ने दरियादिली में खोला खजाना! FY26 में 70% बढ़ा चैरिटी खर्च, ₹1,556 करोड़ किए दान

Tata Trusts Charity Spending: देश के सबसे बड़े धर्मार्थ संगठनों में से एक टाटा ट्रस्ट्स ने वित्त वर्ष 2026 में अपनी चैरिटी खर्च में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है। नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स द्वारा दिया जाने वाला कुल दान पिछले दो वर्षों से लगातार बढ़ रहा है और FY26 में इसमें 70 प्रतिशत से अधिक का भारी उछाल आया है।

आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में टाटा ट्रस्ट्स ने ₹1,556 करोड़ के अनुदान वितरित किए, जबकि इससे पिछले साल (FY25) यह आंकड़ा ₹902 करोड़ था। पिछले दो सालों का कुल खर्च मिलाकर ₹2,458 करोड़ पहुंच गया है, जो कि FY21 से FY24 के चार सालों में किए गए कुल आवंटन के लगभग बराबर है।

महामारी के बाद फिर पकड़ी रफ्तार

टाटा ट्रस्ट्स ने कोविड-19 महामारी के समय अपना फंड आवंटन काफी बढ़ाया था:

  • FY21: ₹841 करोड़
  • FY22: ₹860 करोड़

महामारी के बाद इसमें थोड़ी गिरावट देखी गई थी। FY23 में ₹400 करोड़ और FY24 में ₹523 करोड़ का खर्च हुआ था। वैसे FY25 और FY26 में ट्रस्ट ने एक बार फिर सामाजिक कल्याण के लिए फंड में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की है।

कहां और कैसे खर्च हुआ ₹1,556 करोड़ का फंड?

FY26 में बांटे गए ₹1,556 करोड़ के कुल फंड को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

संस्थागत अनुदान और प्रत्यक्ष क्रियान्वयन खर्च: कुल फंड का 80% से अधिक हिस्सा शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों जैसी संस्थाओं को सीधे तौर पर दिया गया।

व्यक्तिगत अनुदान: शेष ₹200 करोड़ का उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन जैसे व्यक्तिगत कारणों के लिए जरूरतमंदों को सहायता देने में हुआ।

सेक्टर-वाइज खर्च का ब्योरा

टाटा ट्रस्ट्स ने देश के अलग-अलग क्षेत्रों के विकास के लिए भारी फंड जारी किया है:

ग्रामीण उत्थान: सबसे बड़ा हिस्सा यानी ₹450 करोड़ ग्रामीण विकास परियोजनाओं को दिया गया। इसमें आजीविका के साधन उपलब्ध कराने और वित्तीय समावेशन के कार्यक्रम शामिल हैं।

शिक्षा क्षेत्र: शिक्षा से जुड़ी योजनाओं और पहलों पर ₹270 करोड़ खर्च किए गए।

कैंसर देखभाल: कैंसर के इलाज और सुविधाओं के लिए ₹178 करोड़ की वित्तीय सहायता दी गई। टाटा ट्रस्ट्स ‘टाटा कैंसर केयर फाउंडेशन’ (TCCF) को फंड देता है, जो कई अस्पतालों का संचालन करता है और वंचित मरीजों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

चेयरमैन नोएल टाटा का विजन: हेल्थकेयर रहेगा मुख्य फोकस

वित्त वर्ष 2026 के लिए जारी चेयरमैन लेटर में टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने स्पष्ट किया कि निकट भविष्य में हेल्थकेयर ट्रस्ट की सबसे बड़ी प्राथमिकता बना रहेगा।

उन्होंने कहा, ‘हम चिकित्सा संकट का सामना कर रहे परिवारों का समर्थन करना जारी रखेंगे। इसके साथ ही, कैंसर देखभाल के ऐसे मॉडल को मजबूत कर रहे हैं जिससे इलाज मरीजों के घर के करीब लाया जा सके। हम देशभर में 40 से 50 गैर-लाभकारी जनरल अस्पतालों का एक नेटवर्क तैयार करने पर काम कर रहे हैं। यह मॉडल ऐसा होगा कि जो लोग इलाज का खर्च उठा सकते हैं, वे उन लोगों की मदद करेंगे जो इसका खर्च नहीं उठा सकते।’

उन्होंने भारत में विश्वस्तरीय संस्थानों के निर्माण पर जोर देते हुए आगे कहा, ‘भारतीय मूल के विद्वान और पेशेवर दुनिया के बेहतरीन संस्थानों में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। भारत को ऐसे और संस्थानों की जरूरत है जो इस प्रतिभा को तराश सकें, ताकि युवाओं को बाहर देखे बिना यहीं सीखने, खोजने और योगदान देने का अवसर मिले।’

Tata Sons AGM: टाटा संस में चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल की असली लड़ाई अभी बाकी, शेयरहोल्डर्स के वोट पर टिकी नजर

Tata Sons AGM: एन चंद्रशेखरन ने 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्डरूम में वोट जीत लिया था। लेकिन उनका बतौर CEO तीसरा कार्यकाल अभी पक्का नहीं है। अब असली फैसला टाटा संस की सालाना आम बैठक यानी AGM में होगा। यहां शेयरहोल्डर्स वोट करेंगे।

बोर्ड के वोट और शेयरहोल्डर्स के वोट में बड़ा फर्क है। बोर्डरूम में चंद्रशेखरन के पक्ष में फैसला हो चुका है। लेकिन AGM का वोट अभी खुला है। अगले कुछ हफ्ते इस पूरे मामले में काफी अहम रहने वाले हैं।

महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर भी टाटा ट्रस्ट्स के विवाद पर कोई फैसला या रुख अपना सकता है। कुछ ट्रस्टियों का कार्यकाल खत्म होने वाला है। वहीं टाटा संस में करीब 13% हिस्सेदारी रखने वाली टाटा ग्रुप की कंपनियों को भी अपना वोट तय करना होगा।

टाटा ट्रस्ट्स के वोट सबसे अहम

इस पूरी लड़ाई के बीच टाटा ट्रस्ट्स सबसे बड़ा खिलाड़ी है। उसके पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है। लेकिन यह हिस्सेदारी सात अलग-अलग ट्रस्ट्स में बंटी है। इसलिए यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि सभी ट्रस्ट एक साथ एक ही तरफ वोट करेंगे।

SDTT और SRTT सबसे अहम ट्रस्ट हैं। दोनों के पास मिलकर टाटा संस की 51.54% हिस्सेदारी है। ऐसे में इन दोनों ट्रस्ट्स के भीतर चल रहा विवाद सीधे AGM की वोटिंग को प्रभावित कर सकता है।

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9 नवंबर को बदल सकता है पहला समीकरण

9 नवंबर एक अहम तारीख है। इसी दिन वरिष्ठ वकील दारियस खंबाटा का सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट यानी SDTT में तीन साल का कार्यकाल खत्म होगा। SDTT के पास टाटा संस की 27.98% हिस्सेदारी है।

SDTT में छह ट्रस्टी हैं। इनमें नोएल टाटा, दारियस खंबाटा, भास्कर भट्ट, नेविल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह शामिल हैं। ट्रस्ट के भीतर मतभेद अब खुलकर सामने आ चुके हैं।

खंबाटा, भट्ट और नेविल टाटा मौजूदा विवाद में मोटे तौर पर नोएल टाटा के साथ हैं। 5 अक्टूबर को इन चारों ने श्रीनिवासन और विजय सिंह के रुख का विरोध किया था। मामला टाटा संस के प्रस्तावित पुनर्गठन और ट्रस्ट्स के अधिकारों से जुड़ा है।

खंबाटा का कार्यकाल 9 नवंबर को खत्म हो रहा है। खबर से जुड़े लोगों के मुताबिक, वह शायद दूसरा कार्यकाल न मांगें। अगर वह दोबारा ट्रस्टी बनना चाहते हैं तो सभी ट्रस्टियों की सहमति जरूरी होगी।

SRTT में दिसंबर में बड़ा बदलाव संभव

सर रतन टाटा ट्रस्ट यानी SRTT के पास टाटा संस की 23.56% हिस्सेदारी है। यहां किसी नए ट्रस्टी को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा ट्रस्टियों की सहमति जरूरी है। इसलिए यहां साधारण बहुमत से काम नहीं चलता।

यह नियम पहले भी परेशानी पैदा कर चुका है। नेविल टाटा को SRTT में शामिल करने की कोशिश हुई थी। लेकिन 2024 के आखिर में प्रस्तावित बैठक टाल दी गई थी। श्रीनिवासन ने इस पर आपत्ति जताई थी।

अब श्रीनिवासन का SRTT में कार्यकाल दिसंबर में खत्म हो रहा है। अगर उनका कार्यकाल आगे नहीं बढ़ता है तो ट्रस्ट के भीतर समीकरण बदल सकते हैं। इससे SRTT का रुख नोएल टाटा के करीब जा सकता है।

हालांकि, इसके लिए ट्रस्ट को अपना कामकाज ठीक से चलाने और AGM में वोट करने की स्थिति में होना जरूरी होगा। SRTT पर महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की तरफ से कुछ पाबंदियां भी लागू हैं।

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SRTT की वजह से टाटा संस की AGM टली थी

SRTT की स्थिति का असर पहले ही टाटा संस की AGM पर पड़ चुका है। 18 अगस्त की AGM टालनी पड़ी थी। वजह यह थी कि SRTT SDTT के साथ मिलकर AGM के लिए प्रतिनिधि नामित करने की जरूरी प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका था।

इसके बाद रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज ने टाटा संस को AGM कराने के लिए 31 दिसंबर तक का समय दिया। अब AGM की तारीख खुद इस पूरे विवाद में काफी अहम हो गई है।

वहीं श्रीनिवासन और विजय सिंह ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के सामने SDTT के कामकाज को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने टाटा संस के मामलों में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका को लेकर चिंता जताई है।

नोएल टाटा गुट का क्या कहना है?

नोएल टाटा, खंबाटा, भट्ट और नेविल टाटा ने इस रुख का विरोध किया है। उनका कहना है कि ट्रस्ट्स टाटा संस का मैनेजमेंट अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

उनके मुताबिक, ट्रस्ट्स सिर्फ उन अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो उन्हें टाटा संस के कंट्रोलिंग शेयरहोल्डर होने के नाते मिले हैं। इस विवाद पर चैरिटी कमिश्नर ने SDTT से जवाब भी मांगा है।

66% हिस्सेदारी दिखती एकजुट, लेकिन है नहीं

टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है। लेकिन यह सात अलग-अलग चैरिटेबल ट्रस्ट्स में बंटी हुई है। हर ट्रस्ट में ट्रस्टियों की संरचना भी अलग है।

नोएल टाटा और उनके तीन बच्चे नेविल, लिया और माया इन सात ट्रस्ट्स में कुल 36 में से 17 ट्रस्टी पदों पर हैं। लेकिन इस ताकत का बड़ा हिस्सा छोटे ट्रस्ट्स में है। असली वजन SDTT और SRTT के पास है।

इसलिए AGM में सभी ट्रस्ट्स का एक ही लाइन पर आना जरूरी नहीं है। हर ट्रस्ट को अपनी बैठक करके अपने वोट पर फैसला करना पड़ सकता है।

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टाटा ग्रुप की कंपनियों के वोट भी अहम

टाटा ट्रस्ट्स के अलावा टाटा ग्रुप की नौ कंपनियों के पास टाटा संस की कुल 12.83% हिस्सेदारी है। इनमें सात लिस्टेड कंपनियां हैं। इन सात की कुल हिस्सेदारी 11.92% है। टाटा स्टील और टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स के पास 3.06-3.06% हिस्सेदारी है। टाटा केमिकल्स के पास 2.53% और टाटा पावर के पास 1.65% हिस्सेदारी है।

इंडियन होटल्स के पास 1.11%, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के पास 0.43% और टाटा इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन के पास 0.08% हिस्सेदारी है। इन कंपनियों के वोट को अभी किसी एक पक्ष के साथ जोड़ना मुश्किल है। हर कंपनी का अपना बोर्ड है। उसे अपनी हिस्सेदारी को लेकर अलग फैसला करना होगा।

चंद्रशेखरन और नोएल टाटा दोनों का असर

चंद्रशेखरन कई ऐसी टाटा कंपनियों के चेयरमैन हैं, जिनके पास टाटा संस में हिस्सेदारी है। इनमें टाटा स्टील, टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स, टाटा पावर, इंडियन होटल्स और टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स शामिल हैं। वहीं नोएल टाटा टाटा स्टील के वाइस चेयरमैन हैं। वह टाटा इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन और टाटा इंटरनेशनल के चेयरमैन भी हैं।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ये कंपनियां किसी एक व्यक्ति के पक्ष में वोट करेंगी। इन कंपनियों के बोर्ड को अपनी-अपनी हिस्सेदारी को लेकर फैसला करना होगा।

शापूरजी पलोनजी ग्रुप भी बड़ा शेयरहोल्डर

टाटा ट्रस्ट्स के अलावा शापूरजी पलोनजी ग्रुप के पास भी टाटा संस की 18% से ज्यादा हिस्सेदारी है। इसलिए AGM में उसके वोट भी काफी अहम हो सकते हैं।

खासकर तब, जब टाटा ट्रस्ट्स के भीतर किसी एक रुख पर सहमति नहीं बनती है। ऐसी स्थिति में दूसरे बड़े शेयरहोल्डर्स की भूमिका बढ़ सकती है।

अब AGM की तारीख सबसे अहम

जब AGM होगी, तब तक टाटा ट्रस्ट्स की स्थिति कुछ बदल सकती है। खंबाटा का SDTT में कार्यकाल खत्म हो चुका होगा। वहीं दिसंबर में श्रीनिवासन का SRTT में कार्यकाल भी खत्म होना है।

चैरिटी कमिश्नर की कार्रवाई भी दोनों बड़े ट्रस्ट्स की स्थिति पर असर डाल सकती है। दूसरी तरफ टाटा ग्रुप की कंपनियों के बोर्ड को अपनी हिस्सेदारी के वोट पर फैसला करना होगा।

इसलिए मामला अब सिर्फ चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल का नहीं है। असली सवाल यह है कि AGM से पहले टाटा संस के शेयरहोल्डर्स के बीच ताकत का संतुलन किस तरफ जाता है।

यही वजह है कि AGM की तारीख बेहद अहम होगी। उस समय तक ट्रस्ट्स की संरचना, नियामकीय स्थिति और टाटा ग्रुप की कंपनियों के रुख में बदलाव इस वोट को पूरी तरह बदल सकता है।

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टाटा संस की लिस्टिंग टालने के लिए टाटा ट्रस्ट का बड़ा कदम, दो कंपनियों के मर्जर का प्रस्ताव रखा

टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) ने टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को टालने के लिए बड़ा प्रस्ताव रखा है। इसके तहत Tata Electronics Systems Solutions Private Limited (TESS) और Tata Consulting Engineers (TCE) का Tata Sons में मर्जर किया जाएगा।

इसका मकसद Tata Sons को NBFC और कोर इनवेस्टमेंट कंपनी यानी CIC की नियामकीय कैटेगरी से बाहर लाना है। प्रस्ताव को Tata Sons के बोर्ड और RBI की मंजूरी मिलना जरूरी है।

Tata Sons को क्या फायदा होगा?

Tata Trusts के पास Tata Sons की करीब 66% हिस्सेदारी है। ट्रस्ट ने कंपनी के बोर्ड से इस प्रस्ताव को मंजूरी देने और RBI से जरूरी NOC लेने के लिए आवेदन करने को कहा है।

अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो Tata Sons अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी बनी रह सकेगी। यह इसलिए अहम है क्योंकि RBI ने इसी महीने Tata Sons की CIC के तौर पर रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी खारिज कर दी थी।

अपर लेयर NBFC के तौर पर Tata Sons पर कई अतिरिक्त नियम लागू होते हैं। इसमें कंपनी की शेयर मार्केट में अनिवार्य लिस्टिंग भी शामिल है।

दो कंपनियों के विलय से क्या बदलेगा?

यह Tata Sons का ब्रेकअप या डीमर्जर नहीं है। इसके उलट दो ऑपरेटिंग कंपनियों को Tata Sons में मिलाया जाएगा।

Tata Trusts के मुताबिक, 31 मार्च 2026 के आंकड़ों के आधार पर विलय के बाद Tata Sons की ऑपरेटिंग रेवेन्यू ₹1,05,043 करोड़ होता। वहीं, फाइनेंशियल एसेट्स से इनकम ₹40,072 करोड़ होती।

इस तरह कुल इनकम में ऑपरेटिंग रेवेन्यू की हिस्सेदारी 64.3% होती। Tata Trusts का कहना है कि इस स्थिति में टाटा संस RBI के प्रिंसिपल बिजनेस क्राइटेरिया के तहत NBFC नहीं होगी।

CIC की कैटेगरी से भी बाहर आएगी

इस प्रस्ताव का दूसरा मकसद Tata Sons को CIC की परिभाषा से बाहर लाना है। मर्जर के बाद कंपनी की कुल नेट एसेट्स ₹2,00,158 करोड़ होंगी। इसमें ₹1,77,120 करोड़ यानी करीब 88.5% हिस्सा ग्रुप कंपनियों में निवेश का होगा।

CIC के लिए 90% की सीमा लागू होती है। प्रस्तावित ढांचे में यह अनुपात 90% से नीचे रहेगा। इसलिए Tata Trusts के मुताबिक, Tata Sons CIC की कैटेगरी में नहीं आएगी।

Tata Sons फिर सीधे कारोबार करेगी

मर्जर के बाद Tata Sons सिर्फ होल्डिंग कंपनी नहीं रहेगी। वह सीधे कारोबार भी करेगी। Tata Trusts का कहना है कि इससे Tata Sons अपने पुराने मॉडल की तरफ लौटेगी। कंपनी के करीब 100 साल के इतिहास में लगभग 80 साल तक Tata Sons के पास अपने ऑपरेटिंग बिजनेस और रेवेन्यू थे।

इसी रेवेन्यू से ग्रुप के नए कारोबारों को आगे बढ़ाने में मदद मिलती थी। Tata Consultancy Services यानी TCS भी 2004 में अलग कंपनी बनने से पहले Tata Sons की ही एक डिविजन थी।

RBI की मंजूरी जरूरी

इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं होगा। इसके लिए RBI की मंजूरी जरूरी है। ऑपरेटिंग और नॉन-फाइनेंशियल कंपनियों का NBFC के साथ विलय होने की वजह से RBI के Non-Banking Financial Companies-Voluntary Amalgamation Directions, 2025 के नियम लागू होंगे।

Tata Sons को पहले RBI से NOC लेना होगा। मर्जर पूरा होने के बाद अगर कंपनी CIC की कैटेगरी में नहीं रहती है तो उसे अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर करना होगा।

Tata Trusts ने क्या कहा?

Tata Trusts का कहना है कि यह रीस्ट्रक्चरिंग टाटा ग्रुप और उसके शेयरहोल्डर्स के हित में है। ट्रस्ट के मुताबिक, इससे Tata Sons को अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी के तौर पर बनाए रखने का रास्ता खुल सकता है।

ट्रस्ट ने जुलाई 2025 में Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust के बोर्ड से पास हुए प्रस्तावों का भी जिक्र किया है। दोनों ट्रस्ट के बोर्ड ने Tata Sons का अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी का दर्जा बनाए रखने के लिए हर मुमकिन प्रयास करने की बात कही थी।

Tata Trusts के मुताबिक, इस बदलाव से टाटा ग्रुप की करीब 100 साल पुरानी संरचना बनी रहेगी। साथ ही, लंबे समय के निवेश, राष्ट्र निर्माण और परोपकारी कामों पर ग्रुप का फोकस भी जारी रहेगा।

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Tata Sons ने नोएल टाटा की आपत्ति खारिज की, चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को वैध बताया

टाटा ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी Tata Sons ने चेयरमैन पद पर एन चंद्रशेखरन की तीसरी बार नियुक्ति का विरोध करने वाले नोएल टाटा की आपत्ति खारिज कर दी है। कंपनी ने कहा है कि 17 सितंबर को बोर्ड ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का जो फैसला लिया था, वह वैध है।

Tata Sons ने इसके लिए दो नई कानूनी राय का हवाला दिया है। ये राय पूर्व चीफ जस्टिस उदय यू ललित और रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज बीएन श्रीकृष्ण ने दी हैं।

24 सितंबर को भेजा जवाब

Tata Sons ने 24 सितंबर को नोएल टाटा और Tata Trusts को जवाब भेजा। यह जवाब 20 सितंबर को भेजी गई उनकी चिट्ठी के बाद आया है। उस चिट्ठी में नोएल टाटा और Tata Trusts ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को कानूनी तौर पर गलत बताया था।

Tata Sons के कंपनी सेक्रेटरी सुप्रकाश मुखोपाध्याय ने यह पत्र जारी किया। इसके साथ दोनों कानूनी राय भी भेजी गईं। इसकी कॉपी Tata Sons के सभी डायरेक्टर्स को भी दी गई।

पूरा विवाद किस बात पर है?

विवाद Tata Sons के Article 121 को लेकर है। इसमें बोर्ड के फैसले के लिए डायरेक्टर्स के बहुमत की जरूरत बताई गई है। साथ ही Tata Trusts की ओर से नियुक्त डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन भी जरूरी है।

इस आर्टिकल में चेयरमैन को कास्टिंग वोट देने का अधिकार भी है। कास्टिंग वोट का मतलब है… जब किसी फैसले पर वोट बराबर-बराबर बंट जाएं, तब मीटिंग की अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति को एक अतिरिक्त निर्णायक वोट देने का अधिकार।

अब विवाद यह है कि अगर Tata Trusts के दोनों नॉमिनी डायरेक्टर्स के वोट अलग-अलग हो जाएं, तो क्या चेयरमैन कास्टिंग वोट दे सकता है? पूरे बोर्ड के वोट बराबर नहीं होने पर भी इस अधिकार का इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं, यही मुख्य सवाल है।

चंद्रशेखरन ने खुद वोट नहीं दिया

चंद्रशेखरन ने अपनी दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव पर खुद वोट नहीं किया। कुल पांच डायरेक्टर्स ने वोट किया था। इनमें से चार ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इनमें Tata Trusts के नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन भी शामिल थे। वहीं, दूसरे Trust नॉमिनी डायरेक्टर नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया।

बैठक की अध्यक्षता कर रहे हरीश मनवानी ने इसके बाद कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया। यह वोट दोनों Trust नॉमिनी डायरेक्टर्स के बीच 1-1 की स्थिति बनने के बाद दिया गया।

उदय ललित ने क्या कहा?

पूर्व चीफ जस्टिस उदय यू ललित ने Tata Sons के पक्ष में राय दी है। उनका कहना है कि Article 104B के तहत नियुक्त डायरेक्टर्स के बीच वोट बराबर होने पर चेयरमैन कास्टिंग वोट दे सकता था।

उनके मुताबिक, इस स्थिति में चेयरमैन के पास कास्टिंग वोट इस्तेमाल करने का आधार था। उन्होंने कहा कि 17 सितंबर को चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का प्रस्ताव वैध तरीके से पास हुआ।

बीएन श्रीकृष्ण की राय क्या है?

रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज बीएन श्रीकृष्ण ने भी बैठक में अपनाई गई प्रक्रिया को सही माना। उनका कहना है कि Article 121 को जिस तरह लागू किया गया, वह उसके नियमों और भावना के मुताबिक है।

उन्होंने कहा कि Trust के नॉमिनी डायरेक्टर्स के बीच मतभेद होने पर बोर्ड का काम रुकना नहीं चाहिए। नियम की ऐसी व्याख्या होनी चाहिए, जिससे बोर्ड अपना काम पूरा कर सके।

वेणु श्रीनिवासन के वोट पर भी सवाल

नोएल टाटा के विरोध के बावजूद वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट किया। इस पर भी सवाल उठाए गए।

बीएन श्रीकृष्ण ने कहा कि किसी डायरेक्टर की कंपनी के प्रति कानूनी जिम्मेदारी उस संस्था के प्रति जिम्मेदारी से ऊपर होती है, जिसने उसे नॉमिनेट किया है। अगर दोनों के बीच टकराव हो, तो कंपनी के प्रति कानूनी जिम्मेदारी को प्राथमिकता मिलेगी। उनके मुताबिक, इस मामले में वेणु श्रीनिवासन ने अपनी कानूनी जिम्मेदारी के तहत सही तरीके से काम किया।

पहले भी आ चुकी है कानूनी राय

Tata Sons के पास वरिष्ठ वकील सुदीप्तो सरकार की कानूनी राय भी पहले से थी। यह राय 17 सितंबर की बोर्ड बैठक वाले दिन ही बोर्ड के साथ साझा की गई थी।

सुदीप्तो सरकार की राय में Article 121 की ऐसी व्याख्या की गई थी, जिसके तहत दो स्थितियों में कास्टिंग इस्तेमाल किया जा सकता है। पहली स्थिति तब, जब Trust के नॉमिनी डायरेक्टर्स के वोट बराबर हो जाएं। दूसरी स्थिति तब, जब पूरे बोर्ड के वोट बराबर हों। उन्होंने Article 118 पर भी राय दी थी। यह प्रावधान नए चेयरमैन के चयन के लिए सेलेक्शन कमेटी की बात करता है।

सरकार के मुताबिक, Article 118 चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर लागू नहीं होगा। चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होगा। हालांकि, इससे पहले उन्होंने एक और कार्यकाल लेने की इच्छा नहीं जताई थी।

Tata Trusts की राय अलग

दूसरी तरफ, Tata Trusts इस मामले में अलग राय रखता है। 20 सितंबर को Trusts ने कहा था कि दो Trust नॉमिनी डायरेक्टर्स का बहुमत तभी माना जाएगा, जब दोनों चंद्रशेखरन के पक्ष में वोट करें।

Trusts का कहना है कि Article 121 में कास्टिंग वोट का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब पूरे बोर्ड के वोट बराबर हों। नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था। इसलिए Trusts के मुताबिक, यह प्रस्ताव शुरुआत से ही अमान्य था।

Tata Trusts ने अपने पक्ष में पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय का भी हवाला दिया है। इस तरह चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर Tata Sons और Tata Trusts की कानूनी व्याख्या अलग-अलग है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Stocks to Watch: 23 सितंबर को फोकस में रहेंगे ये 7 शेयर, अदाणी और टाटा ग्रुप के स्टॉक्स पर भी रहेगी नजर

Stocks to Watch:  बुधवार 23 सितंबर को शेयर बाजार में कई कंपनियां अहम खबरों के चलते फोकस में रह सकती हैं। अदाणी और टाटा ग्रुप की कंपनियों से जुड़े अहम अपडेट आए हैं। साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का असर भी कुछ शेयरों पर दिख सकता है। वहीं, हिस्सेदारी बढ़ाने, प्रमोटर सेल और नए स्टोर से जुड़े अपडेट भी हैं।

Adani Group Stocks

अडानी ग्रुप की कंपनियां फोकस में रहेंगी। SEBI ने Adani Enterprises, Adani Total Gas, AWL Agri Business, Adani Green Energy और Adani Energy Solutions से जुड़े मामलों को ₹1.51 करोड़ के सेटलमेंट के साथ निपटाया है। मामला हिंडनबर्ग रिपोर्ट में उठाए गए RPT और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों से जुड़ा था।

OMCs Stocks

सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां यानी OMCs फोकस में रहेंगी। कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली है। Brent क्रूड 98 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत की खबरों से तेल बाजार पर असर पड़ा है।

Tata Group Stocks

टाटा ग्रुप की कंपनियों के शेयरों पर भी नजर रहेगी। Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद जारी है। NCP (SP) प्रमुख शरद पवार ने Tata Trusts की भूमिका और ग्रुप की मौजूदा ट्रस्ट-आधारित व्यवस्था को बनाए रखने की बात कही है।

Persistent Systems

आईटी सेक्टर की कंपनी Persistent Systems ने Nagarro में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है। कंपनी ने 61.15% अतिरिक्त हिस्सेदारी हासिल की है। इसके साथ Nagarro में उसकी कुल हिस्सेदारी 83.25% हो गई है। अतिरिक्त शेयरों के लिए स्वीकृति अवधि 23 सितंबर से 6 अक्टूबर तक चलेगी।

HDFC Bank

प्राइवेट सेक्टर के बैंक HDFC Bank में नए MD और CEO के फैसले पर नजर रहेगी। बैंक के बोर्ड ने RBI को दो नाम भेजे हैं। दोनों नाम तीन साल के कार्यकाल के लिए मंजूरी के लिए भेजे गए हैं। बैंक ने अभी आधिकारिक तौर पर नामों का खुलासा नहीं किया है।

Allied Blenders & Distillers

शराब बनाने वाली कंपनी Allied Blenders & Distillers के प्रमोटर बीना किशोर छाबड़िया 55 लाख तक शेयर बेच सकती हैं। यह कंपनी की करीब 1.97% हिस्सेदारी है। बिक्री का मकसद न्यूनतम पब्लिक शेयरहोल्डिंग की जरूरत पूरी करना है।

Allcargo Terminals

लॉजिस्टिक्स सेक्टर की कंपनी Allcargo Terminals के अगस्त के कुल वॉल्यूम में बढ़ोतरी हुई है। कंपनी का कुल वॉल्यूम 65.6 हजार TEUs रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 6% और जुलाई के मुकाबले 5% ज्यादा है।

360 ONE WAM

वेल्थ मैनेजमेंट सेक्टर की कंपनी 360 ONE WAM ने Aashish Agarwal को CEO नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति 15 फरवरी 2027 से प्रभावी होगी। इसी तारीख से MD Karan Bhagat को Vice Chairman की जिम्मेदारी भी दी जाएगी।

IRB Infrastructure Developers

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कंपनी IRB Infrastructure Developers के बोर्ड ने कुछ संपत्तियों को बेचकर रकम जुटाने की मंजूरी दी है। बोर्ड ने इस प्रक्रिया के लिए कंपनी को अधिकृत भी किया है। अब कंपनी इन एसेट्स के मॉनेटाइजेशन की दिशा में आगे बढ़ सकती है।

Shoppers Stop

रिटेल सेक्टर की कंपनी Shoppers Stop ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। कंपनी ने अहमदाबाद के Sindhu Bhavan और जबलपुर के Mall 11 में नए स्टोर खोले हैं। इसके साथ 31 अगस्त 2026 तक कंपनी के डिपार्टमेंट स्टोर्स की कुल संख्या 117 हो गई है।

अदाणी और GMR के लिए खुल सकता है एयरलाइन कारोबार का रास्ता, सरकार नियम बदलने पर कर रही विचार

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

नोएल टाटा के पक्ष में उतरे शरद पवार, टाटा ग्रुप की विरासत को प्रोटेक्ट करने को लेकर कही बड़ी बात

टाटा संस के चेयरमैन एन.चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति से टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के बीच मतभेद पैदा हो गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरद चंद्र पवार) के प्रेसिडेंट शरद पवार ने सोशल मीडिया मीडियम X पर एक पोस्ट किया है। इस पोस्ट में टाटा ग्रुप के संगठनात्मक ढ़ाचे पर टिप्पणी करते हुए शरद पवार ने कहा कि टाटा ग्रुप की परंपरा और टाटा ट्रस्ट्स के सामाजिक प्रतिबद्धता को बचाकर रखना चाहिए।

शरद पवार ने 22 सितंबर को टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चल रहे विवाद पर अपनी राय रखते हुए नोएल टाटा के रुख का समर्थन किया और महाराष्ट्र व भारत के विकास में टाटा ग्रुप की भूमिका की तारीफ की। उन्होंने जमशेदजी टाटा के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि टाटा परिवार ने इंडस्ट्री को समाज सेवा की दिशा दी है। उन्होंने लिखा कि इस सोच का मूल यह है कि इंडस्ट्री से पैदा हुई संपत्ति का इस्तेमाल समाज के हित के लिए किया जाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी एक सोचा-समझा स्ट्रक्चर है। इस ओनरशिप स्ट्रक्चर की वजह से ही टाटा ग्रुप के बिज़नेस से मिलने वाले डिविडेंड का इस्तेमाल हेल्थ,एजुकेशन,रिसर्च और ग्रामीण इलाकों की रोज़ी-रोटी जैसे सामाजिक कल्याण के कामों के लिए किया जाता है।

टाटा ग्रुप की विरासत को बचाकर रखना आज की जरूरत

शरद पवार ने अपने एक्स पोस्ट में कहा है कि टाटा ग्रुप की लीडरशिप के बारे में फैसले लेते समय इंस्टीट्यूशनल प्रोसेस और टाटा ट्रस्ट की भूमिका का सम्मान किया जाना चाहिए। टाटा ग्रुप का देश और खासकर महाराष्ट्र के विकास से पुराना नाता रहा है। इसलिए, टाटा ग्रुप के अंदर के झगड़ों को बातचीत और सही कानूनी प्रक्रिया से सुलझाने की जरूरत है। इसके लिए शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा करते हुए कंपनी के बायलॉज में बताए गए प्रोसेस का सम्मान करना जरूरी है।

बताते चलें कि 17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने एन.चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 से अगले पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर फिर से अपॉइंट करने का फैसला लिया था। यह फैसला 4 के मुकाबले 1 वोट से हुआ था। उसी मीटिंग में टाटा संस को स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट करने का भी फैसला किया गया।

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के दोबारा अपॉइंटमेंट का विरोध किया था। हालांकि,ट्रस्ट के दूसरे नॉमिनेटेड डायरेक्टर,वेणु श्रीनिवासन ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है और कहा है कि ट्रस्ट के नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स की भूमिका पर कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ़ एसोसिएशन के मुताबिक ठीक से विचार किया जाना चाहिए।

टाटा ग्रुप की विरासत को संजोना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

शरद पवार ने यह भी कहा कि अगर टाटा ट्रस्ट्स की सामाजिक और संस्थागत भूमिका कमजोर होती है तो इसका असर हेल्थ,एजुकेशन और रिसर्च सेक्टर के अलग-अलग संस्थाओं पर पड़ सकता है। उन्होंने इस बात का ज़िक्र किया कि टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल,TIFR और TISS जैसी प्रतिष्ठित संथाओं के ज़रिए लंबे समय तक सामाजिक क्षेत्र में काम किया है। इसलिए,यह सबकी ज़िम्मेदारी है कि हम इस ग्रुप के संस्थागत स्वरूप और मूल्य आधारित परंपरा को बचाकर रखें,जिसने खुद को भारत के विकास के लिए समर्पित कर दिया है।

Top News 21 September: केरल में बारिश से तबाही, टाटा में चंद्रशेखरन पर घमासान; क्या ट्रंप बदलेंगे AI का नाम?

Top News 21 September: केरल में बारिश से तबाही, टाटा में चंद्रशेखरन पर घमासान; क्या ट्रंप बदलेंगे AI का नाम?

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Top News 21 September: केरल में भारी बारिश से तबाही। टाटा संस में चेयरमैन पद पर एन. चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर टाटा ट्रस्ट ने उठाए सवाल। ट्रंप बदल सकते हैं एआई का नाम। ट्रंप और जेलेंस्की की मुलाकात तय। जॉर्जिया मेलोनी स्कूलों में बुर्का और नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगाएगी। 21 सितंबर की बड़ी खबरें : 

 

केरल में भारी बारिश से तबाही

केरल में भारी बारिश से भारी तबाही हुई। वर्षा जन्य हादसों में 5 लोगों की मौत हो गई। मलप्पुरम, इडुक्की और कोट्टायम में बारिश से हाल बेहाल है। मौसम विभाग ने अगले चार दिनों में राज्य के कुछ हिस्सों में भारी बारिश का अनुमान जताया है। मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन ने राज्य के हालात का हर घंटे आकलन करने का निर्देश दिया है।

 

एन. चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर टाटा ट्रस्ट का सवाल

Tata Trusts ने टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी है। ट्रस्ट ने कहा कि उनकी पुनर्नियुक्ति के समर्थन में कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की जो व्याख्या दी जा रही है, वो सही नहीं है। Tata Trusts ने टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर दी जा रही दलीलों को भी खारिज किया है। ALSO READ: Tata Trust ने एन. चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर उठाए सवाल, खारिज किया बोर्ड का फैसला, री-अपॉइंटमेंट को दी चुनौती

 

क्या ट्रंप बदल देंगे AI का नाम?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के नाम को बदलने की चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर एक ऑनलाइन पोल शुरू किया और लोगों से एआई के लिए नया नाम चुनने को कहा। ट्रंप ने सुपीरियर इंटेलिजेंस, एक्सट्रीम इंटेलिजेंस और सुप्रीम इंटेलिजेंस तीन विकल्प दिए हैं। ALSO READ: डोनाल्‍ड ट्रंप का बड़ा ऐलान, अमेरिका में बनेगी एआई फोर्स, क्‍या अब बदलेंगे AI का नाम?

 

ट्रंप-जेलेंस्की की मुलाकात तय

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की है। जेलेंस्की ने इसे बेहद अहम बातचीत बताया। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं ने कई मुद्दों पर चर्चा की और अब न्यूयॉर्क में मुलाकात करने पर सहमति बनी है।

 

बुर्के-नकाब पर मेलोनी का बड़ा फैसला

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने घोषणा की कि उनकी सरकार जल्द ही एक उपाय पेश करेगी। इसके तहत इटली के स्कूलों में बुर्का और नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। साथ ही, कक्षाओं में विदेशी छात्रों की संख्या भी सीमित की जाएगी।

टाटा ट्रस्ट ने चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट पर निशाना साधा, कहा- 100 साल पुराने ढांचे से छेड़छाड़ ठीक नहीं

टाटा ग्रुप में अंदरूनी विवाद गहरा गया है। Tata Trusts ने Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का खुलकर विरोध किया है। 20 सितंबर को जारी बयान में ट्रस्ट ने कहा कि उनकी पुनर्नियुक्ति के समर्थन में कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की जो व्याख्या दी जा रही है, वो सही नहीं है।

ट्रस्ट ने कहा कि 100 साल पुराने टाटा ग्रुप ढांचे को सिर्फ एक कथित कमी दूर करने के लिए बदलना ठीक नहीं होगा। उसने इसे ‘छोटी समस्या के लिए बहुत बड़ा हथौड़ा चलाने’ जैसा बताया।

Tata Trusts ने कहा कि Tata Sons कॉरपोरेट गवर्नेंस के मामले में पहले से ऊंचे मानकों का पालन करती है। ऐसे में आर्टिकल्स की ऐसी व्याख्या के आधार पर चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति का दावा करना उचित नहीं है।

Tata Sons की लिस्टिंग पर भी सवाल

Tata Trusts ने Tata Sons की संभावित लिस्टिंग को लेकर दी जा रही दलीलों को भी खारिज किया है। ट्रस्ट ने कहा कि लिस्टिंग से गवर्नेंस बेहतर होने की बात कहने का मतलब यह है कि Tata Sons में गवर्नेंस की कमी है। ट्रस्ट के मुताबिक ऐसा नहीं है।

Tata Trusts का कहना है कि Tata Sons कई साल से उन नियमों का पालन करती रही है, जो आम तौर पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू होते हैं। कंपनी भले ही खुद शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं है।

Tata Sons के आर्टिकल्स में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति का प्रावधान है। कंपनी में ऑडिट कमेटी और नामांकन एवं पारिश्रमिक कमेटी भी है। संबंधित पक्षों के साथ लेनदेन को लेकर भी नियम हैं। निदेशकों के बारी-बारी से रिटायर होने की व्यवस्था भी मौजूद है।

कंपनी ने अंदरूनी कारोबार पर रोक लगाने के लिए कोड ऑफ कंडक्ट भी बना रखा है। Tata Trusts के मुताबिक, इन सभी व्यवस्थाओं का जिक्र कंपनी की सालाना रिपोर्ट और कॉरपोरेट गवर्नेंस रिपोर्ट में होता रहा है।

ट्रस्ट ने कहा कि ये नियम मौजूदा विवाद शुरू होने से काफी पहले ही Tata Sons ने खुद अपनाए थे। इसका मकसद पारदर्शिता और बेहतर गवर्नेंस था।

विवाद सिर्फ गवर्नेंस का नहीं

Tata Trusts ने कहा कि पूरा मामला सिर्फ गवर्नेंस के नियमों तक सीमित नहीं है। ट्रस्ट के मुताबिक, असली सवाल यह है कि Tata ग्रुप के ढांचे में उन लोगों की आवाज कौन उठाएगा, जिनके लिए Tata Trusts 130 साल से ज्यादा समय से काम करता आया है।

ट्रस्ट ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि Tata Sons को कौन सा गवर्नेंस मॉडल बेहतर तरीके से चलाएगा। सवाल यह है कि लाखों जरूरतमंद और वंचित भारतीयों के हितों की बात कौन करेगा।

चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर क्या विवाद है?

विवाद 17 सितंबर को हुई Tata Sons की बोर्ड बैठक के बाद और बढ़ गया। इस बैठक में चंद्रशेखरन को चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त करने के प्रस्ताव पर विचार हुआ था।

Tata Trusts ने इस प्रस्ताव की वैधता पर सवाल उठाया है। ट्रस्ट का कहना है कि कंपनी के आर्टिकल्स के मुताबिक, इस नियुक्ति के लिए Tata Trusts के नामित निदेशकों का जरूरी समर्थन मिलना चाहिए।

Tata Sons के बोर्ड में Tata Trusts के दो नामित निदेशक हैं। ट्रस्ट का तर्क है कि दो सदस्यों में बहुमत का मतलब दोनों का समर्थन होना चाहिए। लेकिन एक नामित निदेशक ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया।

इसी वजह से Tata Trusts का कहना है कि जरूरी समर्थन नहीं मिला। ट्रस्ट ने इस प्रस्ताव को वैध नहीं माना है।

चेयरमैन के निर्णायक वोट पर भी विवाद

Tata Trusts ने चेयरमैन के निर्णायक वोट को लेकर भी अपनी स्थिति साफ की है। ट्रस्ट का कहना है कि यह वोट तभी इस्तेमाल किया जा सकता है, जब पूरे बोर्ड में वोट बराबर हों।

उसके मुताबिक, निर्णायक वोट का इस्तेमाल Tata Trusts के नामित निदेशकों से जरूरी समर्थन नहीं मिलने की स्थिति को दूर करने के लिए नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर Tata Trusts का कहना है कि Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव सही तरीके से पास नहीं हुआ। ट्रस्ट ने इसे शुरू से ही अमान्य बताया है और कहा है कि इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है।

Tata Sons की लिस्टिंग भी बना मुद्दा

Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति के अलावा Tata Sons की संभावित लिस्टिंग को लेकर भी खींचतान चल रही है। Tata Trusts का कहना है कि गवर्नेंस सुधारने के लिए लिस्टिंग को जरूरी बताना सही नहीं है।

ट्रस्ट के मुताबिक, Tata Sons पहले से ही कई ऐसे गवर्नेंस नियमों का पालन करती है, जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू होते हैं। इसलिए सिर्फ शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से गवर्नेंस में कोई बड़ी कमी दूर होगी, ऐसा मानने का आधार नहीं है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Tata vs Tata: एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर टाटा ग्रुप में रार! ट्रस्ट ने दी अभिषेक मनु सिंघवी को कमान

Tata Trusts vs Tata Sons Conflict: टाटा ग्रुप में महासंग्राम छिड़ा हुआ है। टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल की नियुक्ति और कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर विवाद चरम पर पहुंच गया है। इस मुद्दे पर टाटा संस और टॉप शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स आमने-सामने हैं।

इस हाई-प्रोफाइल कॉरपोरेट जंग को जीतने के लिए टाटा ट्रस्ट्स ने देश के दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतार दिया है। सिंघवी की एंट्री से इस कानूनी लड़ाई के तेवर और तीखे हो गए हैं।

आइए समझते हैं इस बड़े विवाद की असली वजह क्या है और अभिषेक मनु सिंघवी के उन बयानों के पीछे का गणित क्या है, जिसने कॉरपोरेट जगत से लेकर शेयर बाजार तक में हड़कंप मचा दिया है:

क्यों भड़का टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस में विवाद?

विवाद की मुख्य वजह 17 सितंबर को हुई टाटा संस के बोर्ड की बैठक है। टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को अगले 5 सालों के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पास किया। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में लगभग 66% हिस्सेदारी है। ट्रस्ट्स ने इस प्लान को ‘गैर-कानूनी’ और ‘कानूनी रूप से शून्य’ करार दिया।

विवाद की एक और वजह टाटा संस की लिस्टिंग बनी हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की याचिका खारिज होने के बाद, कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने को लेकर भी दोनों धड़ों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है।

अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतारा 

दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी बात रखते हुए कहा कि वे दिवंगत रतन टाटा और दोनों पक्षों के प्रमुख लोगों के करीब रहे हैं, इसलिए वे भारी मन से यह केस लड़ रहे हैं। इस मामले में सिंघवी ने कॉरपोरेट गवर्नेंस और शेयरधारकों के अधिकारों पर कई गंभीर सवाल उठाए।

सिंघवी ने कहा, ‘मौजूदा मामले में शेयरधारक-मालिकों के मौलिक अधिकारों को खारिज नहीं किया जा सकता। शेयरधारिता अधिकारों को दबाना देश की सैकड़ों कंपनियों के कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए कयामत जैसा होगा।’

उन्होंने टाटा-मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले की याद दिलाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के साथ संबंधों में टाटा ट्रस्ट्स की प्रधानता को साफ तौर पर स्वीकार किया था, जिसे अब चुनिंदा तरीके से भुलाया जा रहा है।

सिंघवी ने कहा कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के 100 साल से भी पुराने रिश्ते को एक-दूसरे से अलग करना अकल्पनीय है। जब आपसी भाईचारा और सौहार्द खत्म हो जाता है, तो ऐसे मामलों का समाधान केवल कानूनी रास्ते से ही निकल सकता है।

टाटा संस की ओर से हरीश साल्वे करेंगे पैरवी

दूसरी तरफ, टाटा संस की ओर से भी दिग्गज वकीलों की फौज तैयार है। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस गतिरोध पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी कंपनी लगातार गतिरोध की स्थिति में काम नहीं कर सकती। निदेशक मंडल और शेयरधारकों को कंपनी के दैनिक कामकाज और दीर्घकालिक रणनीतियों के लिए एक व्यावहारिक रास्ता खोजना ही होगा।

शेयर बाजार और टाटा ग्रुप की कंपनियों पर असर

दोनों धड़ों के बीच जारी इस जंग का असर टाटा ग्रुप की लिस्टिड कंपनियों पर भी देखने को मिल रहा है। इस विवाद की खबर बाहर आते ही टाटा ग्रुप के शेयरों के मार्केट कैप में करीब ₹40,000 करोड़ तक की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो टाटा ग्रुप के बड़े निवेश फैसलों, फंडिंग और भविष्य की रणनीतियों पर बुरा असर पड़ सकता है।