Gold ETF FoF में अब नहीं डाल सकेंगे पैसे! आज से बदल गई ये चीजें

Gold Investment: कुछ म्यूचुअल फंड हाउसेज ने अस्थायी तौर पर गोल्ड ईटीएफ फंड ऑफ फंड्स (FoFs) में नए निवेश पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है। यह रोक आज 16 अक्टूबर से ही लागू हो चुकी है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड, एचडीएफसी म्यूचुअल फंड, आदित्य बिड़ला सन लाइफ म्यूचुअल फंड, इनवेस्को इंडिया म्यूचुअल फंड, डीएसपी म्यूचुअल फंड, टाटा म्यूचुअल फंड और श्रीराम म्यूचुअल फंड जैसे कई फंड हाउसों ने निवेशकों को नोटिस जारी कर के इसकी जानकारी भेज दी है। इस पाबंदी के बाद अब ये इन म्यूचुअल फंड्स के पास गोल्ड ईटीएफ FoF में नया एकमुश्त निवेश नहीं कर सकेंगे, नई एसआईपी नहीं शुरू कर सकेंगे और न ही मौजूदा एसआईपी में टॉप अप कर सकेंगे। कुछ में तो स्विच-इन ट्रांजैक्शन और नए सिस्टेमैटिक ट्रांसफर प्लान (STP) रजिस्ट्रेशन पर भी रोक लगाई गई है।

क्या है इन नोटिसों में

श्रीराम म्यूचुअल फंड ने नोटिस में कहा कि यह रोक सेबी के के निर्देशों के तहत लगाई गई हैं, जिसे AMFI (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के जरिए सूचित किया गया है। हालांकि कोई वजह नहीं बताई गई है। फंड हाउस का कहना है कि 16 अक्टूबर से नए एकमुश्त निवेश, नए एसआईपी रजिस्ट्रेशन और मौजूदा एसआईपी में निवेश की राशि बढ़ाने यानी स्टेप-अप की मंजूरी नहीं होगी।

डीएसपी म्यूचुअल फंड ने 15 अक्टूबर के अपने नोटिस में कहा है कि 15 अक्टूबर को दोपहर 3 बजे के कट-ऑफ समय के बाद के सभी एप्लीकेशन खारिज हो सकते हैं और पैसा निवेशकों को वापस कर दिया जाएगा।

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की 15 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक कोटक महिंद्रा म्यूचुअल फंड, यूटीआई म्यूचुअल फंड और एचडीएफसी म्यूचुअल फंड समेत कई बड़े भारतीय म्यूचुअल फंडों ने गोल्ड ईडीएफ में बल्क सब्सक्रिप्शन यानी एक साथ भारी निवेश रोकने के लिए नोटिस जारी किए हैं।

दशहरा-दिवाली से ठीक पहले रोक

गोल्ड ईटीएफ एफओएफ में निवेश पर रोक दशहरा और दिवाली से ठीक पहले लगाई गई हैं, जब आमतौर पर सोने की मांग बढ़ जाती है। गोल्ड ईटीएफ एफओएफ म्यूचुअल फंड की वह स्कीम है, जिसका पैसा गोल्ड ईटीएफ में लगाया जाता है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल त्योहारी सीजन के दौरान गोल्ड और सिल्वर ETF में निवेश बढ़ा था, क्योंकि स्टॉक मार्केट से कमजोर रिटर्न मिलने के कारण सोने-चांदी का क्रेज बढ़ गया। वहीं इस साल मांग थोड़ी सुस्त पड़ी और भारत में सोने का आयात अगस्त के $230 करोड़ से घटकर सितंबर में $180 करोड़ रह गया।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Bond Investment: PB Money पर खरीद सकेंगे बॉन्ड्स, मिल गया SEBI से लाइसेंस

पीबी मनी (PB Money) को मार्केट रेगुलेटर सेबी से ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म प्रोवाइडर (OBPP) के रूप में काम करने का लाइसेंस मिल गया है। यह पैसाबाजार (Paisabazaar) के साथ रणनीतिक साझेदारी वाला एक निवेश प्लेटफॉर्म है। अब इसे ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म का लाइसेंस मिला है तो कंपनी अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए निवेशकों को बॉन्ड में निवेश करने की सुविधा दे सकेगी। बॉन्ड्स फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं, जिसमें उनके टर्म्स के आधार पर ब्याज मिलता है। हालांकि इसमें हर मामले में रिटर्न की गारंटी नहीं होती है बल्कि कुछ रिस्क भी होते हैं। इसमें निवेशकों को बॉन्ड इश्यू करने वाले यानी इश्यूअर के डिफॉल्ट होने, मार्केट में ब्याज दरों में बदलाव और लिक्विडिटी से जुड़ी चिंताओं जैसे रिस्क हैं।

PB Money को लाइसेंस का क्या है मतलब?

कंपनी ने 14 अक्टूबर को जो बयान जारी किया है, उसके मुताबिक सेबी से लाइसेंस मिलने के बाद पीबी मनी बॉन्ड इंवेस्टमेंट के पूरे प्रोसेस को ऑपरेट कर सकेगी। इससे कंपनी निवेशकों का रजिस्ट्रेशनस केवाईसी वेरिफिकेशन, बॉन्ड डिस्कवरी, ऑर्डर प्लेसमेंट, पेमेंट कोऑर्डिनेशन, और पोस्ट-इंवेस्टमेंट सर्विसिंग ऑफर कर सकेगी। साथ ही निवेशक प्लेटफॉर्म पर यील्ड यानी रिटर्न, क्रेडिट रेटिंग और इंवेस्टमेंट अमाउंट जैसे मानकों के आधार पर बॉन्ड तलाश सकेंगे। इससे उन्हें उपलब्ध विकल्पों की तुलना करने में मदद मिलेगी।

कब से शुरू कर सकेंगे बॉन्ड्स में निवेश

घरेलू स्टॉक मार्केट में लिस्टेड पीबी फिनटेक (PB Fintech) की पैसाबाजार के निवेश प्लेटफॉर्म पीबी मनी को बॉन्ड प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करने का लाइसेंस मिला है। पीबी मनी के डायरेक्टर और पैसाबाजार के सीईओ संतोष अग्रवाल का कहना है कि इस लाइसेंस से बॉन्ड्स में निवेश आसान होगा और खुदरा निवेशकों की फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट्स तक पहुंच बढ़ेगी। कंपनी को यह लाइसेंस ऐसे समय में मिला है जब पीबी मनी डिजिटल माध्यमों से अपने निवेश विकल्पों का विस्तार करने की योजना बना रही है। हालांकि कंपनी ने यह नहीं बताया है कि इस लाइसेंस के तहत प्लेटफॉर्म पर निवेश की सुविधा कब से शुरू होगी, या शुरुआत में कौन-से बॉन्ड उपलब्ध होंगे।

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Cars24 IPO: लिस्टिंग की तैयारी, अप्रैल तक फाइल होगा ड्राफ्ट, अभी गुजर रही इस लंबे प्रोसेस से

Cars24 IPO: पुराने कारों की बिक्री के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ऑफर करने वाली कार्स24 सात महीने में आईपीओ के लायक हो सकती है। कंपनी के सीएफओ Shivanshu Makkar का कहना है कि सिंगापुर से भारत में अपने रिवर्स फ्लिप की प्रक्रिया पूरी करने के बाद वह अप्रैल तक आईपीओ का ड्राफ्ट यानी DRHP (ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस) दाखिल कर सकेगी। रिवर्स फ्लिप में छह से नौ महीने तक का समय लग सकता है। शिवांशु ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से इंटरव्यू में बताया कि 2015 में सिंगापुर में बनी कार्स24 को रिवर्स फ्लिप के लिए मंजूरी मिल चुकी है और अब यह भारत में अपने आईपीओ का ड्राफ्ट फाइल कर सकती है।

कब तक आ सकता है आईपीओ?

शिवांशु ने कहा था कि अभी कार्स24 सिंगापुर सिंगापुर की कंपनी है लेकिन अब इसे भारतीय कंपनी बनाने की तैयारी है। यह रिवर्स फ्लिप प्रक्रिया है, जैसा कि फ्लिकार्ट (Flipkart) और मिंत्रा (Myntra) ने किया था। शिवांशु की कहना है कि कंपनी को सिंगापुर से मंजूरी मिल चुकी है और भारत में दाखिल करने की प्रक्रिया चल रही है। इसमें 6 से 9 महीने लग सकते हैं। आधिकारिक तौर पर भारतीय कंपनी बनने के बाद ही यह आईपीओ का ड्राफ्ट दाखिल कर सकेगी। शिवांश को उम्मीद है कि अप्रैल तक कंपनी ऐसा करने के योग्य हो जाएगी। इसके बाद सेबी की मंजूरी, आईपीओ की प्राइस तय करने और बुक-बिल्डिंग जैसी प्रक्रियाओं में करीब 3 से 4 महीने लग सकते हैं।

कैसी है Cars24 की स्थिति

कार्स24 ने आखिरी बार साल 2022 में फंडिंग जुटाई थी, जिसके बाद कंपनी का वैल्यूएशन करीब $330 करोड़ हो गया। शिवांशु के मुताबिक इसके बाद से शिवांशु ने बाहर से कोई नया निवेश नहीं जुटाया, क्योंकि उसे अतिरिक्त पूंजी की जरूरत नहीं पड़ी। उन्होंने कहा कि कंपनी के पास अभी भी पर्याप्त पूंजी मौजूद है और वह फिलहाल कैश बर्न नहीं कर रही है। ऐसे में शिवांशु का कहना है कि अगर कंपनी आईपीओ लाती है तो इसका मुख्य उद्देश्य तत्काल पैसों की जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि भारत में विस्तार और देश के बाहर दूसरे बाजारों में एंट्री के लिए पूंजी तैयार करना होगा।

उनका कहना है कि फिलहाल भारत में 100 में से सिर्फ 5 भारतीयों के पास कार है, तो इस मार्केट में विस्तार की काफी संभावनाएं हैं। शिवांशु का कहना है कि कार्स24 का रिटेल कारोबार इस समय देश के करीब 25 शहरों में है, जिसे बढ़ाकर लगभग 200 शहरों तक ले जाने और करीब 50,000 कारों तक विस्तार करने पर विचार चल रहा है।

शिवांशु का कहना है कि भारत के अलावा कार्स24 खाड़ी के देशों और ऑस्ट्रेलिया में भी अपने कारोबार को बढ़ाने पर विचार कर रही है। अभी यूएई में पुरानी कारों के बाजारों में कार्स24 की लगभग 7% हिस्सेदारी है और यह लगभग 30% की दर से बढ़ रही है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में इसने तीन शहरों तक अपना विस्तार किया है।

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SEBI ने अदाणी ग्रुप की पांच कंपनियों का केस ₹1.51 करोड़ में निपटाया, हिंडनबर्ग रिपोर्ट से जुड़ा था मामला

कैपिटल मार्केट रेगुलेटर SEBI ने अदाणी ग्रुप की पांच कंपनियों के खिलाफ चल रहे मामले को सेटल कर दिया है। इन कंपनियों ने कुल ₹1.51 करोड़ का भुगतान किया है। यह मामला अमेरिकी शॉर्ट सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के खुलासे से जुड़ा था। उसमें रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शंस (RPT) और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवाल उठाए गए थे।

SEBI ने हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आरोपों की जांच के दौरान इन मामलों की पड़ताल की थी। इसमें SEBI के Listing Obligations and Disclosure Requirements (LODR) नियमों, पुराने Listing Agreement और दूसरे लागू नियमों के संभावित उल्लंघन को देखा गया था।

इन पांच कंपनियों ने कितनी रकम दी?

सेटलमेंट के तहत Adani Enterprises ने ₹76.05 लाख दिए हैं। Adani Green Energy ने ₹45.50 लाख का भुगतान किया है। वहीं, Adani Total Gas, AWL Agri Business और Adani Energy Solutions ने ₹9.75 लाख-₹9.75 लाख दिए हैं।

इन पांचों रकम को जोड़ें तो कुल भुगतान करीब ₹1.51 करोड़ बैठता है।

Adani Enterprises पर क्या मामला था?

SEBI की कार्यवाही में Adani Enterprises पर अपनी एनुअल रिपोर्ट में कुछ रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शंस यानी ग्रुप कंपनियों के बीच लेनदेन की जानकारी नहीं देने का आरोप था। इसके अलावा कंपनी की ऑडिट और लिमिटेड रिव्यू रिपोर्ट्स ऐसी ऑडिट फर्मों ने साइन की थीं, जिनके पास वैध Peer Review Certificate नहीं था।

यह सर्टिफिकेट ऑडिट फर्म की क्वालिटी रिव्यू प्रक्रिया से जुड़ा प्रमाणपत्र है। SEBI ने इसी से जुड़े नियमों के संभावित उल्लंघन को भी कार्यवाही में शामिल किया था।

बाकी कंपनियों पर क्या आरोप थे?

Adani Total Gas, AWL Agri Business और Adani Green Energy के मामले में भी ऑडिट या लिमिटेड रिव्यू रिपोर्ट्स से जुड़ा मुद्दा था। इन रिपोर्ट्स पर ऐसी ऑडिट फर्म ने हस्ताक्षर किए थे, जिसके पास वैध सर्टिफिकेट नहीं था।

Adani Energy Solutions के मामले में जून 2015 की तिमाही की लिमिटेड रिव्यू रिपोर्ट को लेकर इसी तरह की आपत्ति थी।

कंपनियों ने आरोप स्वीकार नहीं किए

इन कंपनियों ने SEBI के साथ मामले को सेटल करने का रास्ता चुना। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनियों ने SEBI के जांच के नतीजों को स्वीकार कर लिया।

सेटलमेंट के तहत कंपनियों ने तथ्यों से जुड़े निष्कर्षों या कानूनी निष्कर्षों को न तो स्वीकार किया और न ही खारिज किया।

सितंबर में पूरा हुआ सेटलमेंट

SEBI की हाई पावर्ड एडवाइजरी कमेटी ने जून 2026 में संशोधित सेटलमेंट टर्म्स की सिफारिश की थी। इसके बाद अगस्त में SEBI के होलटाइम मेंबर्स के पैनल ने इन शर्तों को मंजूरी दी।

कंपनियों ने 5 सितंबर को SEBI को बताया कि सेटलमेंट की रकम जमा कर दी गई है। SEBI ने भी भुगतान मिलने की पुष्टि की। इसके बाद 22 सितंबर को SEBI ने इन मामलों को खत्म कर दिया।

क्या अब SEBI दोबारा कार्रवाई नहीं कर सकता?

ऐसा नहीं है। सेटलमेंट ऑर्डर में SEBI ने अपने अधिकार सुरक्षित रखे हैं। अगर सेटलमेंट के दौरान कंपनियों की ओर से दी गई कोई जानकारी बाद में गलत पाई जाती है, सेटलमेंट की शर्तों का उल्लंघन होता है या रकम तय करने में कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो SEBI आगे कार्रवाई कर सकता है।

ऐसी स्थिति में SEBI पुरानी कार्यवाही को फिर से शुरू कर सकता है या नया एक्शन शुरू कर सकता है।

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बदल जाएगी एक्सपायरी के दिन की ट्रेडिंग, SEBI का प्रस्ताव एक्सपर्ट्स को आया पसंद

बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने एक्सपायरी के दिन ट्रेडिंग के फ्रेमवर्क में बदलाव का जो प्रस्ताव पेश किया है, वह मार्केट एक्सपर्ट्स को पसंद आया है। न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन बदलावों से क्लोजिंग ऑक्शन यानी वोलैटिलिटी यानी भारी उठा-पटक और मैनिपुलेशन यानी हेरफेर की प्रमुख वजहों को दूर किया जा सकता है। इसके अलावा सेटलमेंट प्रोसेस अधिक आसान और पारदर्शी बन सकती है। मार्केट एक्सपर्ट्स का यह रुझान तब सामने आया, जब सेबी ने शनिवार को एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया, जिसमें CAS (Closing Auction Session) ने मार्केट टाइमिंग्स और डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट के तरीके में बदलाव का प्रस्ताव पेश किया है।

क्या है मुख्य बातें SEBI के प्रस्ताव में

डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस को कैश मार्केट के क्लोजिंग प्राइस से अलग करना।

CAS के दौरान लाइव इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू को बंद करना।

1% बैंड से बाहर लगाए गए ऑर्डर्स को अधिक बाइंडिंग बनाना।

क्या कहना है एक्सपर्ट्स का?

आनंद राठी वेल्थ के जॉइंट सीईओ फिरोज अजीज का कहना है कि सेबी ने तीन प्रमुख दिक्कतों पर ध्यान दिया है- कैश मार्केट के क्लोजिंग प्राइस और डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस के बीच संबंध, इंडिकेटिव ऑक्शन प्राइस से होने वाली गड़बड़ियां और ऑक्शन प्रोसेस के दौरान ऑर्डर कैंसिल करने की दिक्कत। फिरोज के मुताबिक सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि किसी डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट का सेटलमेंट बिल्कुल कैश मार्केट के क्लोजिंग प्राइस पर होना जरूरी नहीं होगा। इस तरह सेबी का मानना कि कैश और डेरिवेटिव्स मार्केट अलग-अलग उद्देश्यों पर काम करते हैं।

इसके अलावा फिरोज के मुताबिक क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू नहीं दिखाए जाने एक्जीक्यूट नहीं हुए ऑर्डर्स के कारण होने वाली उठा-पटक कम होगी तो 1% से बाहर लगाए गए आक्रामक ऑर्डर्स को अधिक बाध्यकारी बनाने से ऑर्डर्स को बार-बार कैंसिल करके बाजार में हेरफेर करने की संभावना भी कम होगी। उन्होंने सीएएस में आइसबर्ग ऑर्डर्स को मंजूरी देने, ट्रांजिशन पीरियड को कम करने और सीएएस के बाद डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग विंडो को घटाकर पांच मिनट करने को उचित और व्यावहारिक बदलाव बताया।

ट्रे़डजिनी के सीओओ त्रिवेश दिनेश ने सेबी के इस इस प्रस्ताव का सपोर्ट किया है कि एक्सपायरी-डे का सेटलमेंट प्राइस ट्रेडिंग के आखिरी 30 मिनट के VWAP (Volume-Weighted Average Price) के आधार पर तय किया जाएगा। उनका कहना है कि यह आसान तरीका है और उद्देश्य भी सेटलमेंट का ऐसा तरीका तैयार करने पर होना चाहिए, जो आसान हो और मार्केट में शामिल सभी पर एक तरह से लागू हो। उन्होंने सेबी के उस प्रस्ताव का भी सपोर्ट किया जिसमें नियमित ट्रेडिंग को दोपहर 3:30 बजे तक जारी रखने और उसके बाद क्लोजिंग ऑक्शन शुरू करने की बात कही गई है। उनके अनुसार इससे मार्केट स्ट्रक्चर और आसान होगा।

त्रिवेश ने क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान इंडकेटिव इंडेक्स वैल्यू को लाइव दिखाना बंद करने के प्रस्ताव का भी सपोर्ट किया है। उनका कहना है कि इससे गैरजरूरी उठा-पटक और भ्रम की स्थिति कम करने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू लाइव नहीं दिखेगी लेकिन अलग-अलग सिक्योरिटीज के इंडिकेटिव प्राइस को जारी रखने से ऑक्शन में हिस्सा लेने वाले लोगों को जरूरी जानकारी मिलती रहेगी।

फीडबैक के बाद आए हैं प्रस्ताव

सेबी ने मार्केट पार्टिसिपेंट्स से मिले फीडबैक के आधार पर प्रस्ताव पेश किए हैं। यह फीडबैक एक्सपायरी पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट के लिए सीएएस से तय क्लोजिंग प्राइस के इस्तेमाल के बारे में था। सेबी को मिले फीडबैक में एक अहम मुद्दा डेरिवेटिव सेटलमेंट प्राइस को सीएएस से तय क्लोजिंग प्राइस के आधार पर तय करने को लेकर था। बता दें कि सीएएस को 3 अगस्त से उन इक्विटी कैश सेगमेंट के शेयरों के लिए लागू किया गया, जिनके डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की ट्रेडिंग होती है। इसे पारदर्शी तरीके से क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए लाया गया था। इसके लागू होने से पहले क्लोजिंग प्राइस आखिरी 30 मिनट में हुए ट्रेड्स के VWAP के आधार पर तय किया जाता था और इसे ऑक्शन के दौरान कुल खरीद और बिक्री ऑर्डर्स को ध्यान में रखकर एक बीच का भाव निकाला जाता है, जिस पर अधिक से अधिक ट्रेड हो सके।

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Inox Clean Energy बनेगी ₹100000 करोड़ की कंपनी! ₹10000 करोड़ के आईपीओ का ड्राफ्ट एक महीने में होगा जमा

Inox Clean Energy IPO: आईनॉक्स क्लीन एनर्जी इस महीने के आखिरी या अक्टूबर की शुरुआत तक करीब ₹10,000 करोड़ के आईपीओ का ड्राफ्ट सेबी के पास दाखिल कर सकती है। मनीकंट्रोल को यह जानकारी सूत्रों के हवाले से मिली है। सूत्रों के मुताबिक आईनॉक्सजीएफएल ग्रुप (InoxGFL Group) की ग्रीन एनर्जी इकाई आईनॉक्स क्लीन एनर्जी के आईपीओ के लिए इंवेस्टमेंट बैंक- नुवामा, जेएमफाइनेंशियल और एमिरेट्स एनबीडी सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं। कंपनी की कोशिश प्रमोटर्स की करीब 10% हिस्सेदारी बेचकर करीब ₹1 लाख करोड़ का वैल्यूएशन हासिल करने की है। पिछले एक साल में इसने कई बड़ी रिन्यूएबल एनर्जी और सोलर कंपनियों का अधिग्रहण किया है, जिससे कारोबार तेजी से बड़ा हुआ है।

बता दें कि आईनॉक्सजीएफएल आईनॉक्स ग्रुप से अलग है। आईनॉक्स ग्रुप के पास आईनॉर्स एयर प्रोडक्ट्स और लिस्टेड क्रायोजेनिक इक्विपमेंट कंपनी आईनॉक्स इंडिया जैसी कंपनियां हैं। साल 2021 में हुए एक पारिवारिक समझौते के बाद दोनों कारोबारी ग्रुप अलग हुए थे। विवेक जैन के पास स्पेशलिटी केमिकल्स और रिन्यूएबल एनर्जी बिजनेस आया, जबकि उनके भाई पवन जैन और भतीजे सिद्धार्थ जैन के पास इंडस्ट्रियल गैस, क्रायोजेनिक इक्विपमेंट और मल्टीप्लेक्स कारोबार रहा।

क्या है Inox Clean Energy की योजना

आईनॉक्स क्लीन एनर्जी में प्रमोटर्स की हिस्सेदारी 95% है और वे आईपीओ के जरिए 10% हिस्सेदारी हल्की करने वाले हैं। सूत्रों के मुताबिक कंपनी की योजना ₹1 लाख करोड़ का वैल्यूएशन हासिल करने की है। सूत्रों के मुताबिक आईपीओ के जरिए कंपनी को जो पैसा मिलेगा, उसे अधिग्रहण और कर्ज हल्का करने में इस्तेमाल किया जा सकता है। आईनॉक्स क्लीन एनर्जी को विवेक जैन की आईनॉक्सजीएफएल ग्रुप प्रमोट करती है और विवेक के बेटे देवांश जेन इसके एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं।

कंपनी के बारे में

आईनॉक्स क्लीन एनर्जी एक इंटीग्रेटेड रिन्यूएबल एनर्जी प्लेटफॉर्म है जो पावर जेनेरेशन औ सोलर मैन्युफैक्चरिंग पर काम करता है। अपनी एक सब्सिडरी आईनॉक्स नियो एनर्जीज के जरिए यह विंड, सोलर और हाइब्रिड पावर प्रोजेक्ट्स को डेवलप, एक्विजिशन और ऑपरेट करने का काम करती है तो आईनॉक्स सोलर के जरिए यह भारत और अमेरिका में सोलर मॉड्यूल और सोलर सेल बनाती है।

कंपनी के विस्तार की बात करें तो ताबड़तोड़ अधिग्रहण के बाद यह काफी बड़ी हो चुकी है। एक साल में देश-विदेश में इसने 10 रणनीतिक अधिग्रहणों को या तो ऐलान किया, या उन्हें पूरा किया। हाल ही में इसका सबसे बड़ा अधिग्रहण ₹6000 करोड़ का था जिसमें इसने ब्लैकरॉक की ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स से वेना एनर्जी इंडिया को हासिल किया। इस सौदे के बाद आईनॉक्स क्लीन एनर्जी का चालू और चालू होने के करीब वाला पोर्टफोलियो लगभग 4 GW हो गया, जबकि डेवलपमेंट पाइपलाइन में 12 GW से ज्यादा सोलर और विंड कैपेसिटी और 2.5 GWh की BESS कैपेसिटी शामिल है।

Gold-Silver ETF में लगाते हैं पैसे? बदल गई निवेशकों के लिए ये तीन चीजें

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Bonds में निवेश पर रिटर्न की गांरटी! ऐसे ऐड पर लगेगी रोक, SEBI ने लाया प्रस्ताव

बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म प्रोवाइडर्स के लिए विज्ञापनों से जुड़े नियमों पर सख्ती का प्रस्ताव पेश किया है। सेबी का लक्ष्य ये है कि ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगे जो निवेशकों को बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। सेबी ने इससे जुड़ा कंसल्टेशन पेपर शुक्रवार को जारी किया। इसमें डिजिटल विज्ञापन, सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर के जरिए होने वाले प्रचार को ध्यान में रखते हुए नए ऐड कोड का प्रस्ताव दिया गया है। इन प्रस्ताव पर सेबी ने 11 सितंबर तक सभी स्टेकहोल्डर्स से कमेंट्स मंगाए हैं।

किस तरह के विज्ञापनों पर रोक लग सकती है?

सेबी ऐसे विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव कर रहा है जिनसे निवेशकों पर तुरंत फैसला लेने का दबाव बन रहा हो। ऐसे ऐड पर रोक लग सकती है, जिसमें अर्जेंसी, बिहैवियरियल प्रॉम्प्ट्स या FOMO (Fear of Missing Out) यानी छूट जाने का डर जैसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए। सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक ऐसे मैसेजेज पर रोक लगाई जाएगी जिसमें उत्साहित होकर निवेशक बॉन्ड के रिस्क की पर्याप्त जांच किए बिना निवेश कर दें। सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक हाई यील्ड, हाई रेटेड या हाई रिटर्न्स जैसे दावों पर बिना पर्याप्त जानकारी के रोक लगेगी

क्या देनी होगी जानकारी?

सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी विज्ञापन में किसी खास बॉन्ड या सिक्योरिटी का प्रचार किया जा रहा है, तो प्लेटफॉर्म को कुछ खास जानकारी देनी होगी, जैसे कि इसे जारी कौन कर रहा (Issuer), इसकी अवधि कितनी है (Tenor), इसकी क्रेडिट रेटिंग, सिक्योरिटी का प्रकार, क्लीन प्राइस और डर्टी प्राइस, यील्ड टू मेच्योरिटी (YTM), क्रेडिट रिस्स-ओ-मीटर। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निवेशक निवेश करने से पहले बॉन्ड से जुड़ी अहम जानकारी और रिस्क को समझ सकें।

फिक्स्ड रिटर्न को लेकर क्या है प्रस्ताव?

सेबी ने फिक्स्ड रिटर्न्स, प्रेडिक्टेबिल रिटर्न्स और पैसिव इनकम जैसे शब्दों के इस्तेमाल के लिए भी खास निर्देश दिए हैं ताकि ऐसा ना लगे कि निवेश पर खास रिटर्न की गारंटी है। अगर किसी विज्ञापन में ‘फिक्स्ड रिटर्न’ लिखा जा रहा है, तो उसमें प्रमुखता से यह डिस्क्लेमर देना होगा कि फिक्स्ड रिटर्न्स की गारंटी नहीं होती और डेट सिक्योरिटीज में मार्केट रिस्क, क्रेडिट रिस्क और डिफॉल्ट का रिस्क होता है यानी कि बॉन्ड्स से रिटर्न पूरी तरह सुरक्षित या गारंटीड है, ऐसा विज्ञापन के जरिए नहीं बताया जा सकेगा।

CAS में गड़बड़ी पर SEBI का तगड़ा एक्शन, जेपी मॉर्गन की इकाई मानसी शेयर पर लगी रोक, जानिए कैसे हुआ ये पूरा खेल

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CAS में गड़बड़ी पर SEBI का तगड़ा एक्शन, जेपी मॉर्गन की इकाई मानसी शेयर पर लगी रोक, जानिए कैसे हुआ ये पूरा खेल

मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने दो एंटिटीज़ को सिक्योरिटीज़ मार्केट से प्रतिबंधित कर दिया। इसके साथ ही इनके द्वारा गलत तरीके से कमाए गए 3.68 करोड़ रुपये जब्त करने के भी आदेश दिए हैं। यह कार्रवाई एक अंतरिम जांच के बाद की गई है जिसमें 13 अगस्त, 2026 को इंडेक्स की एक्सपायरी के दिन क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के दौरान सेंसेक्स में हेरफेर के शुरुआती सबूत मिले थे।

सेबी ने 19 अगस्त को JP मॉर्गन की कंपनी कॉप्थॉल मॉरीशस इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (Copthall Mauritius Investment Limited) से 2.96 करोड़ रुपये और मानसी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड (Mansi Share and Stock Broking Private Limited) से 71.65 लाख रुपये ज़ब्त करने का आदेश दिया है।

SEBI के सर्विलांस सिस्टम ने 13 अगस्त को दोपहर 3:20 से 3:30 बजे के बीच CAS विंडो में सेंसेक्स की इंडिकेटिव इक्विलिब्रियम प्राइस (IEP) में तीन बड़े उतार-चढ़ाव देखे। इनमें 362.02 प्वाइंट, 132.67 प्वाइंट और 405.08 प्वाइंट के उतार-चढ़ाव शामिल थे,जो 2 सेकंड से लेकर 28 सेकंड के अंदर हुए थे। इस दिन आखिर में सेंसेक्स 78,080 पर बंद हुआ,जो निफ्टी में हुई वैसी ही हलचल के आधार पर SEBI के हिसाब से तय लेवल से लगभग 240 प्वाइंट ज़्यादा था। इससे सेबी को गड़बड़ी की आशंका हुई।

कॉप्थॉल ने कैसे किया खेल?

सेबी की जांच से पता चला कि कॉप्थॉल ने आक्रामक खरीदारी से सेंसेक्स को ऊपर चढ़ाया। सेंसेक्स के सभी शेयरों में एग्रेसिव तरीके से 126 करोड़ रुपए के BUY ऑर्डर लगाए। ये ऑर्डर रेफरेंस प्राइस से करीब 3% ऊपर लगाए गए थे। CAS के दौरान कुल Buy ऑर्डर वैल्यू में इनकी 99.91% हिस्सेदारी थी। बाद में खरीदारी के सभी ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए। इस तरह कॉप्थॉल ने ऑप्शंस के जरिये की 2.96 करोड़ रुपए कमाए।

कॉप्थॉल की ऑप्शंस पोजिशन

कॉप्थॉल की ऑप्शंस पोजिशन पर नजर डाले तो इसने जांच वाले दिन के 1 दिन पहले 26560 सेंसेक्स 77500 के कॉल खरीदे और 26560 सेंसेक्स 77500 पुट बेचे। वहीं, उसी दिन इंट्राडे में इसने 84200 सेंसेक्स 78000 के कॉल खरीदे और 84200 सेंसेक्स 78000 पुट बेचे। इसी तरह इसने इसने जांच वाले दिन के 1 दिन पहले 12640 सेंसेक्स 78500 के कॉल खरीदे और 12640 सेंसेक्स 78500 के पुट बेचे।

SEBI ने कहा कि कीमत में बदलाव होने के बाद कॉप्थॉल ने इन ऑर्डर्स का एक बड़ा हिस्सा रद्द कर दिया। उनकी डेरिवेटिव्स पोजीशन में सेंसेक्स ऑप्शंस में लॉन्ग कॉल और शॉर्ट पुट पोजीशन शामिल थीं,जिन्हें इंडेक्स के ऊंचे स्तर पर बंद होने से फायदा होता।

मानसी शेयर ने कैसे किया खेल?

इसने सेंसेक्स के 8 शेयरों में ऑर्डर लगाए। कुल 12.65 लाख शेयरों के Sell ऑर्डर लगाए गए। 7.05 लाख शेयर 2.5% नीचे के भाव पर लगाए गए। ये ऑर्डर रेफरेंस प्राइस से 2.5% नीचे थे। इसके बाद मानसी ने पूरे Sell ऑर्डर कैंसिल कर दिए। इस तरह मानसी ने पुट ऑप्शंस खरीदकर 71.64 लाख रुपए कमाए।

मानसी शेयर की ऑप्शंस पोजिशन

मानसी ने इंट्राडे में 5000 सेंसेक्स 77800 के कॉल खरीदे। इसके साथ ही इसने इंट्राडे में ही 42020 सेंसेक्स 77800 के पुट खरीदे। दूसरी किस्त में इसने इंट्राडे में 83320 सेंसेक्स 77900 पुट खरीदे। फिर इसने तीसरी किस्त में इंट्राडे में ही 44000 सेंसेक्स 78000 पुट खरीदे।

सेबी ने अपनी जांच में पाया कि मानसी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकिंग ने रेफरेंस प्राइस से काफी कम कीमत पर बड़े सेल ऑर्डर दिए थे। SEBI के अनुसार,इन ऑर्डरों ने लगभग पांच मिनट तक इंडेक्स पर दबाव बनाए रखा और फिर लगभग सभी ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए। मानसी की डेरिवेटिव्स पोजीशन में पुट ऑप्शन शामिल थे,जिनसे सेंसेक्स के निचले स्तर पर बंद होने से फायदा होता।

SEBI ने कहा है कि Copthall ने इस गलत तरीके से ₹2.96 करोड़ और Mansi ने ₹71.64 लाख की कमाई की। हालांकि,आदेश में यह नहीं कहा गया है कि इन दोनों एंटिटीज ने मिलीभगत के साथ काम किया। SEBI का शुरुआती आकलन यह है कि इन एंटिटीज ने स्वतंत्र रूप से इंडेक्स को अपनी-अपनी डेरिवेटिव्स पोजीशन का फ़ायदा उठाने के लिए प्रभावित किया।

SEBI ने आगे की जांच होने तक दोनों संस्थाओं को सिक्योरिटीज़ मार्केट में ट्रेड करने और CAS में सीधे या परोक्ष रूप से भाग लेने से रोक दिया है। मानसी के मामले में ये पाबंदियां उसके प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग अकाउंट पर लागू होंगी।

सेबी ने इनके बैंक और डीमैट अकाउंट से पैसे निकालने पर भी रोक लगा दी है,SEBI की मंज़ूरी के बिना एसेट्स को बेचने या ट्रांसफर करने पर भी पाबंदी लगा दी गई है और उन्हें 15 दिनों के अंदर अपने एसेट्स,बैंक अकाउंट,डीमैट अकाउंट,सिक्योरिटीज़ और इन्वेस्टमेंट की पूरी लिस्ट जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। SEBI ने कहा कि इस मामले की विस्तृत जांच जारी रहेगी।

 

 

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4 नियम पड़े रिटेल इंवेस्टर्स पर भारी, SEBI ने लाया था खास वजह से और पड़ा ऐसा असर

पिछले दो वर्षों में मार्केट रेगुलेटर सेबी देश के कैपिटल मार्केट को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और लेस स्पेक्यूलेटिव यानी कम सट्टेबाजी वाला बनाने के लिए कई नियम लागू किए हैं। इसका उद्देश्य रिटेल इंवेस्टर्स को बचाना, लेवरेज कम करना और रिस्क मैनेजमेंट को मजबूत करना है। ब्रोकरेज फर्म सैम्को सिक्योरिटीज के सीईओ और फाउंडर जिमीत मोदी के मुताबिक सेबी की यह पहल बेहतर तो है रेगुलेशन के साथ-साथ मार्केट की एफिसिएंसी, लिक्विडिटी और फेयर एक्सेस भी बनी रहनी चाहिए। यहां ऐसे ही 4 नियमों के बारे में बताया जा रहा है, जिनसे रिटेल इंवेस्टर्स काफी प्रभावित हुए और जिमीत मोदी ने रिटेलर्स पर इसके असर को लेकर जिक्र किया है।

4 नियम और उनके असर

1.F&O पर लगाम से घटी सट्टेबाजी लेकिन एक्सेस भी हुआ कम

सेबी ने सबसे बड़ा दखल इक्विटी डेरिवेटिव्स में दिया है। इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट का साइज बढ़ाया गया, वीकली एक्सपायरी के ऑप्शन कम किए गए, एक्सपायरी-डे पर रिस्क कवर बढ़ाया गया, ऑप्शन प्रीमियम पहले से जमा करना जरूरी किया गया और पोजिशन लिमिट की इंट्रा-डे मॉनिटरिंग शुरू की गई। इसका उद्देश्य बहुत अधिक शॉर्ट-टर्म स्पेक्यूलेटिव को रोकना और रिटेल इन्वेस्टर्स को बड़े नुकसान से बचाना था।

हालांकि वित्त वर्ष 2026 में F&O में रिटेलर्स का नुकसान 18% घटकर ₹91,685 करोड़ रह गया लेकिन F&O में हिस्सेदारी भी लगभग 20% घटकर 78.6 लाख रह गई। रिटेलर्स का नुकसान कम तो हुआ लेकिन प्रति ट्रेडर औसत नुकसान ₹1.14 लाख से बढ़कर ₹1.17 लाख हो गया। इससे एक अहम सवाल उठता है कि क्या हम समस्या को हल कर रहे हैं, या हिस्सेदारी कम करके एक्सपोजर को कम कर रहे हैं?

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2.लॉट साइज में बढ़ोतरी: सुरक्षित मार्केट या हाई एंट्री बैरियर्स?

मिनिमम कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू बढ़ाने का मकसद छोटे निवेशकों को बहुत बड़ी स्पेक्यूलेटिव वाली पोजिशन लेने से रोकना था। हालांकि डेरिवेटिव्स रिस्क-मैनेजमेंट टूल का भी एक बड़ा जरिया है, खासतौर से उन निवेशकों के लिए जो अपने कैश-मार्केट एक्सपोजर को हेज करना चाहते हैं। लॉट साइज बड़ा होने से ऐसे हेज के लिए अधिक कैपिटल की जरूरत पड़ने लगी जिससे अंडरलाइंग पोजिशन के साथ हेज का तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में निवेशकों के लिए मार्केट में हिस्सा लेना मुश्किल बनाने करने की बजाय इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि वे रिस्क को कैसे मैनेज करते हैं।

3.एक्सपायरी और मार्जिन के नियम

सेबी ने एक्सपायरी के समय मिलने वाले कई मार्जिन बेनेफिट्स को हटा दिया और वीकली इंडेक्स डेरिवेटिव्स के नियमों को तार्किक बनाया। इसका उद्देश्य बहुत अधिक रिस्क वाली पोजिशन और एक्सपायरी के दिन होने वाले भारी उतार-चढ़ाव को कम करना था, लेकिन इनसे ट्रेडिंग और हेजिंग की चली आ रही स्ट्रैटेजीज भी बदल गई हैं। सेबी की साल 2025 की स्टडी से पता चला कि इससे इक्विटी डेरिवेटिव्स में यूनिक इंडिविजुअल ट्रेडर्स की संख्या सालाना आधार पर 20% गिर गई तो प्रीमियम के हिसाब से इंडिविजुअल टर्नओवर 11% घट गया। ऐसे में सेबी का नियम सिर्फ खराब तरीके ही नहीं हटा रहा, बल्कि मार्केट के तरीके को भी बदल रहा है।

4.क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS): बेहतर प्राइस डिस्कवरी लेकिन

3 अगस्त 2026 से सेबी ने F&O स्टॉक्स के लिए ‘क्लोजिंग ऑक्शन सेशन’ (CAS) शुरू किया, जिसने पहले के 30 मिनट वाले VWAP-बेस्ड क्लोजिंग सिस्टम की जगह ली। इसका उद्देश्य कीमत तय करने के तरीके को बेहतर बनाना, आखिरी मिनट के ट्रेड के असर को कम करना और भारतीय मार्केट को ग्लोबल तौर-तरीकों से जोड़ना। हालांकि शुरुआती कुछ सेशन में स्पॉट और फ्यूचर्स की कीमतों में असामान्य अंतर दिखा और शुरुआत में लोगों की भागीदारी कम रही। सेबी के मुताबिक इसमें कोई मैनिपुलेशन नहीं मिला है, और तब से भागीदारी में सुधार भी हुआ है। हालांकि इससे यह सबक मिलता है कि अच्छे ढंग से बनाए गए सुधार भी मार्केट में हिस्सा लेने वालों के लिए थोड़े समय के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

कहां आई दिक्कत?

सेबी के नियमों से एफएंडओ एक्टिविटी कम हुई। इसकी वित्त वर्ष 2026 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स 51.5% और फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स 17.7% घट गया। इसकी वजह एसटीटी में बढ़ोतरी के साथ-साथ सेबी के नियम भी हैं। जिमीत के मुताबिक स्पेक्यूलेशन में कमी तब अच्छी है, जब इससे अच्छा रुख दिखे लेकिन अगर वॉल्यूम भी गिरे क्योंकि मार्केट में एंट्री बहुत महंगी या कठिन हो गई है तो इससे लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी पर असर पड़ सकता है। उनका मानना है कि लक्ष्य सड़क को सुरक्षित बनाना होना चाहिए, सड़क को खाली करना नहीं। जिमीत के मुताबिक भारतीय मार्केट को देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों के मजबूत निवेश की जरूरत है। जिमीत के मुताबिक बैरियर बढ़ाने की तुलना में बेहतर डिस्क्लोजर, इंवेस्टर एडुकेशन, सूटेबिलिटी चेक्स और रिस्क-बेस्ड सेफगार्ड्स अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।

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निफ्टी में हेरफेर से आखिरी समय में जोरदार तेजी आई? 3 और 4 अगस्त के ट्रेड्स की जांच कर रहा SEBI

मार्केट रेगुलेटर SEBI 3 और 4 अगस्त को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के दौरान हुए ट्रेड्स की जांच कर रहा है। रेगुलेटर यह पता लगाना चाहता है कि कहीं क्लोजिंग प्राइस या इंडेक्स में हेरफेर तो नहीं किया गया। मामले से जुड़े सूत्रों ने यह जानकारी दी है।

सूत्रों के मुताबिक, SEBI ने दोनों दिनों का ट्रेडिंग डेटा स्टॉक एक्सचेंजों से मांगा था। एक्सचेंज डेटा दे चुके हैं। अब नियामक उसकी जांच कर रहा है।

क्या देख रहा है SEBI?

SEBI यह समझना चाहता है कि CAS शुरू होने से पहले और उसके बाद इंडेक्स में जो बड़ा अंतर दिखा, वह सामान्य था या किसी ने जानबूझकर क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित किया।

3 अगस्त को CAS के पहले दिन निफ्टी 3:28 बजे करीब 24,573 पर था। सिर्फ दो मिनट में यह 201 अंक उछलकर 24,774 पर पहुंच गया।

इसी तरह 4 अगस्त को 3 बजे निफ्टी 24,463 के आसपास था। 3:15 बजे तक यह 152 अंक चढ़कर 24,615 पर पहुंच गया। इन तेज बदलावों के बाद बाजार में सवाल उठने लगे।

हेरफेर की आशंका क्यों?

बाजार के जानकारों का कहना है कि CAS के दौरान ट्रेडिंग कम होती है। ऐसे में कम कारोबार वाले शेयरों या इंडेक्स में बड़ी खरीद-बिक्री करके क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित करना आसान हो सकता है।

उदाहरण के लिए, कोई बड़ा निवेशक पहले इंडेक्स में पोजिशन बना सकता है। फिर CAS के दौरान बड़ी खरीदारी करके इंडेक्स को ऊपर धकेलने की कोशिश कर सकता है। एक्सपायरी वाले दिन ऐसा जोखिम और बढ़ सकता है।

लेकिन साबित करना आसान नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ किसी ट्रेड से इंडेक्स ऊपर-नीचे हुआ, इससे हेरफेर साबित नहीं होता। SEBI को यह भी दिखाना होगा कि क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित करने की मंशा थी और इसमें एक से ज्यादा पक्ष शामिल थे।

SEBI ने क्या कदम उठाए?

SEBI ने ब्रोकरों से कहा है कि वे रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाएं। साथ ही अपने ट्रेडिंग ऐप पर Indicative Price को साफ तौर पर दिखाएं।

सूत्रों का कहना है कि यह निगरानी पहले से तय योजना का हिस्सा है। इसका मकसद सामान्य निवेशकों को रोकना नहीं, बल्कि बाजार में निष्पक्ष और व्यवस्थित कारोबार सुनिश्चित करना है।

Closing Auction Session (CAS) क्या है?

Closing Auction Session यानी CAS शेयर बाजार में 3:15 बजे से 3:30 बजे तक चलने वाली 15 मिनट की प्रक्रिया है। इस दौरान खरीद और बिक्री के ऑर्डर मिलाए जाते हैं। फिर ऐसा क्लोजिंग प्राइस तय होता है, जिस पर सबसे ज्यादा ट्रेड हो सकें।

SEBI ने यह व्यवस्था इसलिए लागू की है ताकि क्लोजिंग प्राइस ज्यादा सटीक और पारदर्शी हो। साथ ही क्लोजिंग के समय हेरफेर की गुंजाइश कम हो और भारतीय शेयर बाजार वैश्विक मानकों के और करीब पहुंचे।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।