Bonds में निवेश पर रिटर्न की गांरटी! ऐसे ऐड पर लगेगी रोक, SEBI ने लाया प्रस्ताव

बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म प्रोवाइडर्स के लिए विज्ञापनों से जुड़े नियमों पर सख्ती का प्रस्ताव पेश किया है। सेबी का लक्ष्य ये है कि ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगे जो निवेशकों को बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। सेबी ने इससे जुड़ा कंसल्टेशन पेपर शुक्रवार को जारी किया। इसमें डिजिटल विज्ञापन, सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर के जरिए होने वाले प्रचार को ध्यान में रखते हुए नए ऐड कोड का प्रस्ताव दिया गया है। इन प्रस्ताव पर सेबी ने 11 सितंबर तक सभी स्टेकहोल्डर्स से कमेंट्स मंगाए हैं।

किस तरह के विज्ञापनों पर रोक लग सकती है?

सेबी ऐसे विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव कर रहा है जिनसे निवेशकों पर तुरंत फैसला लेने का दबाव बन रहा हो। ऐसे ऐड पर रोक लग सकती है, जिसमें अर्जेंसी, बिहैवियरियल प्रॉम्प्ट्स या FOMO (Fear of Missing Out) यानी छूट जाने का डर जैसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए। सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक ऐसे मैसेजेज पर रोक लगाई जाएगी जिसमें उत्साहित होकर निवेशक बॉन्ड के रिस्क की पर्याप्त जांच किए बिना निवेश कर दें। सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक हाई यील्ड, हाई रेटेड या हाई रिटर्न्स जैसे दावों पर बिना पर्याप्त जानकारी के रोक लगेगी

क्या देनी होगी जानकारी?

सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी विज्ञापन में किसी खास बॉन्ड या सिक्योरिटी का प्रचार किया जा रहा है, तो प्लेटफॉर्म को कुछ खास जानकारी देनी होगी, जैसे कि इसे जारी कौन कर रहा (Issuer), इसकी अवधि कितनी है (Tenor), इसकी क्रेडिट रेटिंग, सिक्योरिटी का प्रकार, क्लीन प्राइस और डर्टी प्राइस, यील्ड टू मेच्योरिटी (YTM), क्रेडिट रिस्स-ओ-मीटर। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निवेशक निवेश करने से पहले बॉन्ड से जुड़ी अहम जानकारी और रिस्क को समझ सकें।

फिक्स्ड रिटर्न को लेकर क्या है प्रस्ताव?

सेबी ने फिक्स्ड रिटर्न्स, प्रेडिक्टेबिल रिटर्न्स और पैसिव इनकम जैसे शब्दों के इस्तेमाल के लिए भी खास निर्देश दिए हैं ताकि ऐसा ना लगे कि निवेश पर खास रिटर्न की गारंटी है। अगर किसी विज्ञापन में ‘फिक्स्ड रिटर्न’ लिखा जा रहा है, तो उसमें प्रमुखता से यह डिस्क्लेमर देना होगा कि फिक्स्ड रिटर्न्स की गारंटी नहीं होती और डेट सिक्योरिटीज में मार्केट रिस्क, क्रेडिट रिस्क और डिफॉल्ट का रिस्क होता है यानी कि बॉन्ड्स से रिटर्न पूरी तरह सुरक्षित या गारंटीड है, ऐसा विज्ञापन के जरिए नहीं बताया जा सकेगा।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

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मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने दो एंटिटीज़ को सिक्योरिटीज़ मार्केट से प्रतिबंधित कर दिया। इसके साथ ही इनके द्वारा गलत तरीके से कमाए गए 3.68 करोड़ रुपये जब्त करने के भी आदेश दिए हैं। यह कार्रवाई एक अंतरिम जांच के बाद की गई है जिसमें 13 अगस्त, 2026 को इंडेक्स की एक्सपायरी के दिन क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के दौरान सेंसेक्स में हेरफेर के शुरुआती सबूत मिले थे।

सेबी ने 19 अगस्त को JP मॉर्गन की कंपनी कॉप्थॉल मॉरीशस इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (Copthall Mauritius Investment Limited) से 2.96 करोड़ रुपये और मानसी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड (Mansi Share and Stock Broking Private Limited) से 71.65 लाख रुपये ज़ब्त करने का आदेश दिया है।

SEBI के सर्विलांस सिस्टम ने 13 अगस्त को दोपहर 3:20 से 3:30 बजे के बीच CAS विंडो में सेंसेक्स की इंडिकेटिव इक्विलिब्रियम प्राइस (IEP) में तीन बड़े उतार-चढ़ाव देखे। इनमें 362.02 प्वाइंट, 132.67 प्वाइंट और 405.08 प्वाइंट के उतार-चढ़ाव शामिल थे,जो 2 सेकंड से लेकर 28 सेकंड के अंदर हुए थे। इस दिन आखिर में सेंसेक्स 78,080 पर बंद हुआ,जो निफ्टी में हुई वैसी ही हलचल के आधार पर SEBI के हिसाब से तय लेवल से लगभग 240 प्वाइंट ज़्यादा था। इससे सेबी को गड़बड़ी की आशंका हुई।

कॉप्थॉल ने कैसे किया खेल?

सेबी की जांच से पता चला कि कॉप्थॉल ने आक्रामक खरीदारी से सेंसेक्स को ऊपर चढ़ाया। सेंसेक्स के सभी शेयरों में एग्रेसिव तरीके से 126 करोड़ रुपए के BUY ऑर्डर लगाए। ये ऑर्डर रेफरेंस प्राइस से करीब 3% ऊपर लगाए गए थे। CAS के दौरान कुल Buy ऑर्डर वैल्यू में इनकी 99.91% हिस्सेदारी थी। बाद में खरीदारी के सभी ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए। इस तरह कॉप्थॉल ने ऑप्शंस के जरिये की 2.96 करोड़ रुपए कमाए।

कॉप्थॉल की ऑप्शंस पोजिशन

कॉप्थॉल की ऑप्शंस पोजिशन पर नजर डाले तो इसने जांच वाले दिन के 1 दिन पहले 26560 सेंसेक्स 77500 के कॉल खरीदे और 26560 सेंसेक्स 77500 पुट बेचे। वहीं, उसी दिन इंट्राडे में इसने 84200 सेंसेक्स 78000 के कॉल खरीदे और 84200 सेंसेक्स 78000 पुट बेचे। इसी तरह इसने इसने जांच वाले दिन के 1 दिन पहले 12640 सेंसेक्स 78500 के कॉल खरीदे और 12640 सेंसेक्स 78500 के पुट बेचे।

SEBI ने कहा कि कीमत में बदलाव होने के बाद कॉप्थॉल ने इन ऑर्डर्स का एक बड़ा हिस्सा रद्द कर दिया। उनकी डेरिवेटिव्स पोजीशन में सेंसेक्स ऑप्शंस में लॉन्ग कॉल और शॉर्ट पुट पोजीशन शामिल थीं,जिन्हें इंडेक्स के ऊंचे स्तर पर बंद होने से फायदा होता।

मानसी शेयर ने कैसे किया खेल?

इसने सेंसेक्स के 8 शेयरों में ऑर्डर लगाए। कुल 12.65 लाख शेयरों के Sell ऑर्डर लगाए गए। 7.05 लाख शेयर 2.5% नीचे के भाव पर लगाए गए। ये ऑर्डर रेफरेंस प्राइस से 2.5% नीचे थे। इसके बाद मानसी ने पूरे Sell ऑर्डर कैंसिल कर दिए। इस तरह मानसी ने पुट ऑप्शंस खरीदकर 71.64 लाख रुपए कमाए।

मानसी शेयर की ऑप्शंस पोजिशन

मानसी ने इंट्राडे में 5000 सेंसेक्स 77800 के कॉल खरीदे। इसके साथ ही इसने इंट्राडे में ही 42020 सेंसेक्स 77800 के पुट खरीदे। दूसरी किस्त में इसने इंट्राडे में 83320 सेंसेक्स 77900 पुट खरीदे। फिर इसने तीसरी किस्त में इंट्राडे में ही 44000 सेंसेक्स 78000 पुट खरीदे।

सेबी ने अपनी जांच में पाया कि मानसी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकिंग ने रेफरेंस प्राइस से काफी कम कीमत पर बड़े सेल ऑर्डर दिए थे। SEBI के अनुसार,इन ऑर्डरों ने लगभग पांच मिनट तक इंडेक्स पर दबाव बनाए रखा और फिर लगभग सभी ऑर्डर कैंसिल कर दिए गए। मानसी की डेरिवेटिव्स पोजीशन में पुट ऑप्शन शामिल थे,जिनसे सेंसेक्स के निचले स्तर पर बंद होने से फायदा होता।

SEBI ने कहा है कि Copthall ने इस गलत तरीके से ₹2.96 करोड़ और Mansi ने ₹71.64 लाख की कमाई की। हालांकि,आदेश में यह नहीं कहा गया है कि इन दोनों एंटिटीज ने मिलीभगत के साथ काम किया। SEBI का शुरुआती आकलन यह है कि इन एंटिटीज ने स्वतंत्र रूप से इंडेक्स को अपनी-अपनी डेरिवेटिव्स पोजीशन का फ़ायदा उठाने के लिए प्रभावित किया।

SEBI ने आगे की जांच होने तक दोनों संस्थाओं को सिक्योरिटीज़ मार्केट में ट्रेड करने और CAS में सीधे या परोक्ष रूप से भाग लेने से रोक दिया है। मानसी के मामले में ये पाबंदियां उसके प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग अकाउंट पर लागू होंगी।

सेबी ने इनके बैंक और डीमैट अकाउंट से पैसे निकालने पर भी रोक लगा दी है,SEBI की मंज़ूरी के बिना एसेट्स को बेचने या ट्रांसफर करने पर भी पाबंदी लगा दी गई है और उन्हें 15 दिनों के अंदर अपने एसेट्स,बैंक अकाउंट,डीमैट अकाउंट,सिक्योरिटीज़ और इन्वेस्टमेंट की पूरी लिस्ट जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। SEBI ने कहा कि इस मामले की विस्तृत जांच जारी रहेगी।

 

 

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4 नियम पड़े रिटेल इंवेस्टर्स पर भारी, SEBI ने लाया था खास वजह से और पड़ा ऐसा असर

पिछले दो वर्षों में मार्केट रेगुलेटर सेबी देश के कैपिटल मार्केट को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और लेस स्पेक्यूलेटिव यानी कम सट्टेबाजी वाला बनाने के लिए कई नियम लागू किए हैं। इसका उद्देश्य रिटेल इंवेस्टर्स को बचाना, लेवरेज कम करना और रिस्क मैनेजमेंट को मजबूत करना है। ब्रोकरेज फर्म सैम्को सिक्योरिटीज के सीईओ और फाउंडर जिमीत मोदी के मुताबिक सेबी की यह पहल बेहतर तो है रेगुलेशन के साथ-साथ मार्केट की एफिसिएंसी, लिक्विडिटी और फेयर एक्सेस भी बनी रहनी चाहिए। यहां ऐसे ही 4 नियमों के बारे में बताया जा रहा है, जिनसे रिटेल इंवेस्टर्स काफी प्रभावित हुए और जिमीत मोदी ने रिटेलर्स पर इसके असर को लेकर जिक्र किया है।

4 नियम और उनके असर

1.F&O पर लगाम से घटी सट्टेबाजी लेकिन एक्सेस भी हुआ कम

सेबी ने सबसे बड़ा दखल इक्विटी डेरिवेटिव्स में दिया है। इसके तहत कॉन्ट्रैक्ट का साइज बढ़ाया गया, वीकली एक्सपायरी के ऑप्शन कम किए गए, एक्सपायरी-डे पर रिस्क कवर बढ़ाया गया, ऑप्शन प्रीमियम पहले से जमा करना जरूरी किया गया और पोजिशन लिमिट की इंट्रा-डे मॉनिटरिंग शुरू की गई। इसका उद्देश्य बहुत अधिक शॉर्ट-टर्म स्पेक्यूलेटिव को रोकना और रिटेल इन्वेस्टर्स को बड़े नुकसान से बचाना था।

हालांकि वित्त वर्ष 2026 में F&O में रिटेलर्स का नुकसान 18% घटकर ₹91,685 करोड़ रह गया लेकिन F&O में हिस्सेदारी भी लगभग 20% घटकर 78.6 लाख रह गई। रिटेलर्स का नुकसान कम तो हुआ लेकिन प्रति ट्रेडर औसत नुकसान ₹1.14 लाख से बढ़कर ₹1.17 लाख हो गया। इससे एक अहम सवाल उठता है कि क्या हम समस्या को हल कर रहे हैं, या हिस्सेदारी कम करके एक्सपोजर को कम कर रहे हैं?

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2.लॉट साइज में बढ़ोतरी: सुरक्षित मार्केट या हाई एंट्री बैरियर्स?

मिनिमम कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू बढ़ाने का मकसद छोटे निवेशकों को बहुत बड़ी स्पेक्यूलेटिव वाली पोजिशन लेने से रोकना था। हालांकि डेरिवेटिव्स रिस्क-मैनेजमेंट टूल का भी एक बड़ा जरिया है, खासतौर से उन निवेशकों के लिए जो अपने कैश-मार्केट एक्सपोजर को हेज करना चाहते हैं। लॉट साइज बड़ा होने से ऐसे हेज के लिए अधिक कैपिटल की जरूरत पड़ने लगी जिससे अंडरलाइंग पोजिशन के साथ हेज का तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में निवेशकों के लिए मार्केट में हिस्सा लेना मुश्किल बनाने करने की बजाय इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि वे रिस्क को कैसे मैनेज करते हैं।

3.एक्सपायरी और मार्जिन के नियम

सेबी ने एक्सपायरी के समय मिलने वाले कई मार्जिन बेनेफिट्स को हटा दिया और वीकली इंडेक्स डेरिवेटिव्स के नियमों को तार्किक बनाया। इसका उद्देश्य बहुत अधिक रिस्क वाली पोजिशन और एक्सपायरी के दिन होने वाले भारी उतार-चढ़ाव को कम करना था, लेकिन इनसे ट्रेडिंग और हेजिंग की चली आ रही स्ट्रैटेजीज भी बदल गई हैं। सेबी की साल 2025 की स्टडी से पता चला कि इससे इक्विटी डेरिवेटिव्स में यूनिक इंडिविजुअल ट्रेडर्स की संख्या सालाना आधार पर 20% गिर गई तो प्रीमियम के हिसाब से इंडिविजुअल टर्नओवर 11% घट गया। ऐसे में सेबी का नियम सिर्फ खराब तरीके ही नहीं हटा रहा, बल्कि मार्केट के तरीके को भी बदल रहा है।

4.क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS): बेहतर प्राइस डिस्कवरी लेकिन

3 अगस्त 2026 से सेबी ने F&O स्टॉक्स के लिए ‘क्लोजिंग ऑक्शन सेशन’ (CAS) शुरू किया, जिसने पहले के 30 मिनट वाले VWAP-बेस्ड क्लोजिंग सिस्टम की जगह ली। इसका उद्देश्य कीमत तय करने के तरीके को बेहतर बनाना, आखिरी मिनट के ट्रेड के असर को कम करना और भारतीय मार्केट को ग्लोबल तौर-तरीकों से जोड़ना। हालांकि शुरुआती कुछ सेशन में स्पॉट और फ्यूचर्स की कीमतों में असामान्य अंतर दिखा और शुरुआत में लोगों की भागीदारी कम रही। सेबी के मुताबिक इसमें कोई मैनिपुलेशन नहीं मिला है, और तब से भागीदारी में सुधार भी हुआ है। हालांकि इससे यह सबक मिलता है कि अच्छे ढंग से बनाए गए सुधार भी मार्केट में हिस्सा लेने वालों के लिए थोड़े समय के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

कहां आई दिक्कत?

सेबी के नियमों से एफएंडओ एक्टिविटी कम हुई। इसकी वित्त वर्ष 2026 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स 51.5% और फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स 17.7% घट गया। इसकी वजह एसटीटी में बढ़ोतरी के साथ-साथ सेबी के नियम भी हैं। जिमीत के मुताबिक स्पेक्यूलेशन में कमी तब अच्छी है, जब इससे अच्छा रुख दिखे लेकिन अगर वॉल्यूम भी गिरे क्योंकि मार्केट में एंट्री बहुत महंगी या कठिन हो गई है तो इससे लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी पर असर पड़ सकता है। उनका मानना है कि लक्ष्य सड़क को सुरक्षित बनाना होना चाहिए, सड़क को खाली करना नहीं। जिमीत के मुताबिक भारतीय मार्केट को देशी-विदेशी संस्थागत निवेशकों के मजबूत निवेश की जरूरत है। जिमीत के मुताबिक बैरियर बढ़ाने की तुलना में बेहतर डिस्क्लोजर, इंवेस्टर एडुकेशन, सूटेबिलिटी चेक्स और रिस्क-बेस्ड सेफगार्ड्स अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।

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निफ्टी में हेरफेर से आखिरी समय में जोरदार तेजी आई? 3 और 4 अगस्त के ट्रेड्स की जांच कर रहा SEBI

मार्केट रेगुलेटर SEBI 3 और 4 अगस्त को क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के दौरान हुए ट्रेड्स की जांच कर रहा है। रेगुलेटर यह पता लगाना चाहता है कि कहीं क्लोजिंग प्राइस या इंडेक्स में हेरफेर तो नहीं किया गया। मामले से जुड़े सूत्रों ने यह जानकारी दी है।

सूत्रों के मुताबिक, SEBI ने दोनों दिनों का ट्रेडिंग डेटा स्टॉक एक्सचेंजों से मांगा था। एक्सचेंज डेटा दे चुके हैं। अब नियामक उसकी जांच कर रहा है।

क्या देख रहा है SEBI?

SEBI यह समझना चाहता है कि CAS शुरू होने से पहले और उसके बाद इंडेक्स में जो बड़ा अंतर दिखा, वह सामान्य था या किसी ने जानबूझकर क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित किया।

3 अगस्त को CAS के पहले दिन निफ्टी 3:28 बजे करीब 24,573 पर था। सिर्फ दो मिनट में यह 201 अंक उछलकर 24,774 पर पहुंच गया।

इसी तरह 4 अगस्त को 3 बजे निफ्टी 24,463 के आसपास था। 3:15 बजे तक यह 152 अंक चढ़कर 24,615 पर पहुंच गया। इन तेज बदलावों के बाद बाजार में सवाल उठने लगे।

हेरफेर की आशंका क्यों?

बाजार के जानकारों का कहना है कि CAS के दौरान ट्रेडिंग कम होती है। ऐसे में कम कारोबार वाले शेयरों या इंडेक्स में बड़ी खरीद-बिक्री करके क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित करना आसान हो सकता है।

उदाहरण के लिए, कोई बड़ा निवेशक पहले इंडेक्स में पोजिशन बना सकता है। फिर CAS के दौरान बड़ी खरीदारी करके इंडेक्स को ऊपर धकेलने की कोशिश कर सकता है। एक्सपायरी वाले दिन ऐसा जोखिम और बढ़ सकता है।

लेकिन साबित करना आसान नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ किसी ट्रेड से इंडेक्स ऊपर-नीचे हुआ, इससे हेरफेर साबित नहीं होता। SEBI को यह भी दिखाना होगा कि क्लोजिंग प्राइस को प्रभावित करने की मंशा थी और इसमें एक से ज्यादा पक्ष शामिल थे।

SEBI ने क्या कदम उठाए?

SEBI ने ब्रोकरों से कहा है कि वे रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाएं। साथ ही अपने ट्रेडिंग ऐप पर Indicative Price को साफ तौर पर दिखाएं।

सूत्रों का कहना है कि यह निगरानी पहले से तय योजना का हिस्सा है। इसका मकसद सामान्य निवेशकों को रोकना नहीं, बल्कि बाजार में निष्पक्ष और व्यवस्थित कारोबार सुनिश्चित करना है।

Closing Auction Session (CAS) क्या है?

Closing Auction Session यानी CAS शेयर बाजार में 3:15 बजे से 3:30 बजे तक चलने वाली 15 मिनट की प्रक्रिया है। इस दौरान खरीद और बिक्री के ऑर्डर मिलाए जाते हैं। फिर ऐसा क्लोजिंग प्राइस तय होता है, जिस पर सबसे ज्यादा ट्रेड हो सकें।

SEBI ने यह व्यवस्था इसलिए लागू की है ताकि क्लोजिंग प्राइस ज्यादा सटीक और पारदर्शी हो। साथ ही क्लोजिंग के समय हेरफेर की गुंजाइश कम हो और भारतीय शेयर बाजार वैश्विक मानकों के और करीब पहुंचे।

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Share Market New Timing: एक-दो नहीं, तीन क्लोजिंग टाइम; आज 3 अगस्त से बदल रही पूरी ट्रेडिंग

Share Market New Timing: आज तीन अगस्त है और आज से शेयर मार्केट की टाइमिंग पूरी तरह से बदल रही है। अब शाम 03:30 PM पर ही इक्विटी मार्केट में शेयरों का लेन-देन बंद नहीं होगा बल्कि 10 मिनट और मिलेंगे। हालांकि यह सुविधा सभी स्टॉक्स के लिए नहीं होगी। बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने मार्केट की एफिसिएंसी और ट्रांसपैरेंसी बढ़ाने और लिक्विडिटी को बेहतर करने के साथ-साथ भारतीय शेयर मार्केट को वैश्विक मानकों के हिसाब से बनाने के लिए नया ट्रेडिंग फ्रेमवर्क लागू किया है। इसके तहत एफएंडओ (F&O) डेरिवेटिव्स सेगमेंट का समय बढ़ाकर 3:40 PM तक कर दिया गया है। हालांकि मॉर्निंग टाइम में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इस नए बदलाव से निवेशकों से लेकर ट्रे़डर्स तक सभी पर असर पड़ेगा।

Share Market New Timing: क्या हुआ है बदलाव

नए नियमों के तहत सेबी ने F&O (फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस) सेगमेंट के ट्रेडिंग टाइम को 10 मिनट के लिए बढ़ा दिया है। स्टॉक और इंडेक्स डेरिवेटिव्स यानी एफएंडओ सेगमेंट में अब सुबह 9:15 AM से 3:40 PM तक ट्रेडिंग की जा सकेगी। हालांकि जो स्टॉक्स एफएंडओ सेगमेंट में नहीं हैं, उनकी ट्रेडिंग का समय पहले की तरह ही रहेगा और उनका लेन-देन 3:30 PM तक ही हो सकेगा। नए नियमों के तहत F&O वाली कंपनियों के शेयरों का आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस सिर्फ आखिरी 30 मिनट के औसत भाव से तय नहीं होगा, बल्कि एक नीलामी प्रक्रिया के जरिए तय होगा।

अब ये है नियम

मार्केट में सबसे बड़ा बदलाव तो ये है कि अब एक नहीं बल्कि तीन क्लोजिंग टाइम होगा।

जो स्टॉक्स एफएंडओ सेगमेंट से बाहर हैं, उनकी सामान्य ट्रे़डिंग 03:30 तक होगी। इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।

F&O स्टॉक्स (कैश मार्केट) 03:15 PM तक जारी रहेगी और उसके बाद 03:35 PM तक CAS (क्लोजिंग ऑक्शन सेशन) चलेगा।

स्टॉक और इंडेक्स एफएंडओ ट्रे़डिंग 03:40 PM तक चालू रहेगी।

क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए क्यों पड़ी CAS की जरूरत

ब्रोकरेज फर्म जीरोधा के मुताबिक किसी शेयर का क्लोजिंग प्राइस और उसका आखरी ट्रेड प्राइस (LTP) एक नहीं होता। मान लीजिए एक शेयर पूरे दिन ₹1,000 से ₹1,010 के बीच ट्रेड हो रहा था लेकिन 3:29 PM पर किसी ने जल्दबाजी में 10 शेयर ₹980 में बेच दिए। अगर ₹980 को ही क्लोजिंग प्राइस मान लिया जाए, तो यह उस शेयर की असली वैल्यू नहीं दिखाएगा। अब तक इससे बचने के लिए VWAP (वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस) मेथड का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन अब आज 3 अगस्त 2026 से सेबी इसे और ज्यादा पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लाया है।

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

2 और कंपनियों के IPO को SEBI से मंजूरी, BSE और NSE पर होंगे लिस्ट

2 और कंपनियों को अपना पब्लिक इश्यू लाने के लिए कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सेबी से मंजूरी मिल गई है। ये कंपनियां हैं- नित्यास जेम्स एंड ज्वेलरी लिमिटेड और इंटेलियस रिकोड लिमिटेड। दोनों IPO को BSE और NSE पर लिस्ट कराने की तैयारी है। नित्यास जेम्स एंड ज्वेलरी सूरत, गुजरात की कंपनी है। इसने मार्च में IPO के ड्राफ्ट पेपर जमा किए थे और उसे 23 जुलाई को सेबी की मंजूरी मिली। इसके ड्राफ्ट के अनुसार, कंपनी के प्रस्तावित IPO में 1.44 करोड़ नए शेयर जारी किए जाएंगे। प्रमोटर्स या मौजूदा निवेशकों की ओर से ऑफर फॉर सेल (OFS) नहीं होगा।

कंपनी अपने IPO से हासिल पैसों का इस्तेमाल वर्किंग कैपिटल जरूरतों को पूरा करने और सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए करेगी। इस पब्लिक इश्यू के लिए चॉइस कैपिटल एडवाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड, बुक रनिंग लीड मैनेजर है। रजिस्ट्रार Bigshare Services Private Limited है।

Intellius Recode IPO

वहीं, इंटेलियस रिकोड ने मार्च में IPO के लिए ड्राफ्ट पेपर जमा किए थे। उसे 24 जुलाई को सेबी से मंजूरी मिली। ड्राफ्ट के अनुसार, कंपनी के प्रस्तावित IPO में 117 करोड़ रुपये तक के नए शेयर जारी होंगे। साथ ही 12.9 लाख शेयरों का OFS रहेगा। इस IPO के लिए Inga Ventures Pvt.Ltd. बुक रनिंग लीड मैनेजर है। रजिस्ट्रार MUFG Intime India Pvt.Ltd. है।

नए शेयरों को जारी कर हासिल होने वाले पैसों का इस्तेमाल कंपनी के डिजिटल वर्कर्स के डेवलपमेंट, इससे जुड़ी सब-कॉन्ट्रैक्टिंग फीस के पेमेंट और सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।इंटेलियस रिकोड एक टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस प्रोवाइडर है। यह कॉरपोरेट ग्राहकों के डिजिटल ट्रांसफॉरमेशन में मदद करती है। कंपनी टेक्नोलॉजी कंसल्टिंग और आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस बेस्ड सॉल्यूशंस की पेशकश करती है। इनमें प्रोपराइटरी एजेंटिक AI बेस्ड डिजिटल वर्कर भी शामिल हैं।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Mutual Fund SIF: म्यूचुअल फंड बेचने वालों के लिए आएगी नई परीक्षा, SEBI और NISM कर रहे तैयारी

Mutual Fund SIF: सेबी (SEBI) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटीज मार्केट्स (NISM) मिलकर नई परीक्षा लाने की तैयारी कर रहे हैं। यह परीक्षा म्यूचुअल फंड और स्पेशलाइज्ड इनवेस्टमेंट फंड (SIF) बेचने वाले डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए होगी।

यह जानकारी सेबी के होल टाइम मेंबर अमरजीत सिंह ने नई दिल्ली में ASSOCHAM के 17वें म्यूचुअल फंड समिट में दी।

नई परीक्षा क्यों लाई जा रही है?

अमरजीत सिंह ने कहा कि इस परीक्षा का मकसद डिस्ट्रीब्यूटर्स की समझ को और बेहतर बनाना है।

उनका कहना है कि जो लोग म्यूचुअल फंड और SIF बेचते हैं, उन्हें इन प्रोडक्ट्स की पूरी जानकारी होनी चाहिए। नई परीक्षा इसी बात को सुनिश्चित करेगी।

SIF को मिला अच्छा रिस्पॉन्स

अमरजीत सिंह ने बताया कि पिछले साल शुरू स्पेशलाइज्ड इनवेस्टमेंट फंड (SIF) को निवेशकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है।

31 मई 2026 तक SIF का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) 13,500 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया। इस दौरान 56,000 से ज्यादा फोलियो खुले।

21 नई इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजी लॉन्च

SIF के तहत अब तक 21 इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजी लॉन्च की जा चुकी हैं।

इनमें Hybrid Long Short Strategy में सबसे ज्यादा निवेश आया है। इससे पता चलता है कि निवेशकों की दिलचस्पी नए तरह के निवेश विकल्पों में बढ़ रही है।

Life Cycle Fund पर भी जोर

अमरजीत सिंह ने सेबी के नए Life Cycle Fund फ्रेमवर्क का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन फंड्स में समय के साथ निवेश का बंटवारा अपने-आप बदलता रहता है। जैसे-जैसे आपका लक्ष्य करीब आता है, वैसे-वैसे जोखिम कम होता जाता है।

उनका कहना है कि ऐसे फंड लोगों को लंबे समय तक लक्ष्य के हिसाब से निवेश करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

सोशल मीडिया देखकर निवेश न करें

अमरजीत सिंह ने कहा कि सिर्फ सोशल मीडिया पर चल रहे ट्रेंड देखकर निवेश नहीं करना चाहिए।

उन्होंने सलाह दी कि निवेश हमेशा अपने वित्तीय लक्ष्य, जोखिम उठाने की क्षमता और कितने समय के लिए निवेश करना है, इन बातों को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

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पुनरोद्धार की उम्मीदों के बीच कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज के शेयरों में तेजी,लेकिन एक्सपर्ट्स को इसकी सफलता को लेकर शक, जानिए क्यों

Calcutta Stock Exchange Revival : वेस्ट बंगाल सरकार ने एक सदी पुराने कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) को फिर से शुरू करने का इरादा ज़ाहिर किया है। इसके बाद अनलिस्टेड शेयर प्लेटफॉर्म्स पर कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज के शेयरों में ज़बरदस्त तेज़ी आई है। हालांकि,मार्केट एक्सपर्ट्स को इस एक्सचेंज के फिर से चालू होने की संभावना पर अभी भी शक है। एक्सचेंज के अनलिस्टेड शेयरों की कीमत 21 जून को लगभग 1,500 रुपये थी। 30 जून तक बढ़कर यह लगभग 1,800 रुपये पर पहुंच गई। कुछ प्लेटफॉर्म पर इस शेयर की कीमत 2,000 रुपये के करीब भी बताई जा रही है। हालांकि,इसका ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत कम है।

एक्सचेंज की प्रति शेयर बुक वैल्यू 3,000 रुपये से ज़्यादा है। बता दें कि 22 जून को पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री डॉ. स्वपन दासगुप्ता ने राज्य के बजट में CSE को फिर से शुरू करने की घोषणा की थी।

उम्मीद है कि राज्य सरकार के प्रस्ताव के बाद,CSE के अधिकारी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (SEBI)के पास जमा किए गए एक्सचेंज के वॉलंटरी एग्जिट (स्वेच्छा से बाहर निकलने) के आवेदन को वापस ले लेंगे। एक्सचेंज ने फरवरी 2025 में वॉलंटरी एग्जिट के लिए आवेदन किया था,जिसके बाद SEBI ने एग्जिट प्रोसेस के तहत एक वैल्यूअर नियुक्त किया था। हालांकि,इस आवेदन पर अभी कोई अंतिम आदेश जारी नहीं किया गया है।

यह तेजी सरकार के रिवाइवल प्रपोजल को लेकर बनी उम्मीद दिखाती है। हालांकि,बाजार के जानकारों का कहना है कि किसी भी रिवाइवल के लिए SEBI की मंज़ूरी और बड़ी रेगुलेटरी,टेक्नोलॉजिकल और कमर्शियल दिक्कतों से पार पाने की जरूरत होगी।

क्या हैं बड़ी चुनौतियां?

बाजार जानकारों का कहना है कि आज किसी स्टॉक एक्सचेंज को फिर से शुरू करने के लिए सिर्फ़ रेगुलेटरी मंज़ूरी से कहीं ज्यादा की ज़रूरत होती है। कम से कम 100 करोड़ रुपये की नेट वर्थ की शर्त पूरी करने के अलावा,एक आधुनिक एक्सचेंज के लिए एडवांस्ड टेक्नोलॉजी प्लेटफ़ॉर्म,सर्विलांस सिस्टम, साइबर सिक्योरिटी क्षमताएं,क्लियरिंग और सेटलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर और खास तौर पर ट्रेंड स्टाफ़ की ज़रूरत होती है।

हालांकि कम से कम पूंजी की शर्त को पूरा करना शायद सबसे बड़ी बाधा न हो,लेकिन क्लियरिंग कॉरपोरेशन बनाना या क्लियरिंग की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती है। मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार,CSE ने पहले देश के प्रमुख क्लियरिंग कॉरपोरेशन के साथ क्लियरिंग व्यवस्थाओं पर करार करने का प्रयास किया था,लेकिन वह कोशिश सफल नहीं हो पाई।

हालांकि,सबसे बड़ी बाधा लिक्विडिटी यानी अलग-अलग प्राइस लेवल पर पर्याप्त खरीदारों और विक्रेताओं की मौजूदगी है,ताकि आसानी से और कुशलता से ट्रेडिंग हो सके।

बाजार जानकारों का कहना है कि मजबूत टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर होने के बावजूद,कुछ मौजूदा एक्सचेंज भी ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बड़े इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर और ब्रोकर आम तौर पर ऐसे एक्सचेंज को पसंद करते हैं जहां लिक्विडिटी सबसे ज़्यादा होती है। इसके चलते किसी दोबारा शुरू किए गए एक्सचेंज के लिए बड़ी ट्रेडिंग एक्टिविटी को आकर्षित करना मुश्किल हो सकता है।

ANMI के नेशनल प्रेसिडेंट कमलेश श्रॉफ का कहना है कि भारत के कैपिटल मार्केट अब टेक्नोलॉजी और लिक्विडिटी पर आधारित इकोसिस्टम बन गए हैं। भले ही कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज की विरासत सम्मान के काबिल है,लेकिन इसे फिर से शुरू करने का आधार पुरानी शान के बजाय भविष्य की ज़रूरतें होनी चाहिए। अगर यह SME फाइनेंसिंग,रीजनल एंटरप्रेन्योरशिप,नए एसेट क्लास या मार्केट इनोवेशन के क्षेत्र में अपनी खास जगह बना पाता है,तो यह भारत की विकास यात्रा में अहम योगदान दे सकता है।

CSE के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO माधव रेड्डी कहते हैं कि इस एक्सचेंज को फिर से सफल बनाने के लिए,उसे एक ऐसा आकर्षक वैल्यू प्रपोज़िशन देना होगा जो अनोखा हो,किफायती हो और मौजूदा प्लेयर्स से काफी अलग हो। अगर इसमें साफ़ तौर पर कोई अलग औक खास बात नहीं होगी,तो इसके सफल पुनरुद्धार की संभावनाएं सीमित ही रहेंगी।

इसे बंद करना भी साबित हुआ मुश्किल

अजीब बात यह है कि इस एक्सचेंज को बंद करना भी उसे फिर से शुरू करने जितना ही मुश्किल साबित हुआ है। CSE ने इस साल की शुरुआत में SEBI की एग्जिट पॉलिसी के तहत स्वेच्छा से बाहर निकलने(वॉलंटरी एग्जिट)के लिए आवेदन किया था और इसके बाद रेगुलेटर ने एक वैल्यूअर नियुक्त किया। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि SEBI की 2012 की एग्जिट पॉलिसी के तहत,जो स्टॉक एक्सचेंज स्वेच्छा से बाहर निकलना चाहता है,उसे एग्जिट प्रोसेस पूरी होने से पहले ब्रोकर्स की ओर से आए दावों और देनदारियों का निपटारा करना होगा। मार्केट एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि ये देनदारियां कुछ सौ करोड़ रुपये तक हो सकती हैं।

एक्सर्ट्स आगे कहते हैं कि हालांकि SEBI कुछ रेगुलेटरी बकाया राशि माफ़ कर सकता है,लेकिन कानूनी जुर्माने सरकारी बकाया राशि के दायरे में आते हैं और उन्हें अकेले SEBI माफ़ नहीं कर सकता। इससे एग्ज़िट की प्रक्रिया और भी जटिल हो जाती है।

फिलहाल,CSE के अनलिस्टेड शेयरों में तेजी राज्य के रिवाइवल प्रपोज़ल को लेकर बनी उम्मीद दिखाती है,लेकिन जानकारों का कहना है कि एक्सचेंज का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या वह NSE और BSE के दबदबे वाले बाजार में लिक्विडिटी लाने में सक्षम एक अलग बिजनेस प्लेटफ़ॉर्म बना पाता है या नहीं।

क्यों बंद हुआ CSE?

1923 में स्थापित कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज में अप्रैल 2013 के बाद से इक्विटी ट्रेडिंग नहीं हुई है। SEBI ने मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों के लिए ज़रूरी नियमों का पालन न करने के कारण इस एक्सचेंज पर ट्रेडिंग रोक दी थी। रेगुलेटर ने इसका कारण ऑपरेशनल और रेगुलेटरी नियमों का पालन न करना बताया था। साथ ही,CSE काट्रेडिंग वॉल्यूम धीरे-धीरे NSE और BSE की ओर शिफ्ट हो गया,क्योंकि ये दोनों एक्सचेंज बेहतर टेक्नोलॉजी,देश भर में कनेक्टिविटी और काफी ज़्यादा लिक्विडिटी की सुविधा देते हैं।

जब ब्रोकर्स और इन्वेस्टर्स ने ऐसे एक्सचेंज को प्राथमिकता दी जहां बेहतर मार्केट और कीमतों का सही पता लगाने की सुविधा थी,तो CSE में ट्रेडिंग लगभग खत्म हो गई। हालांकि एक्सचेंज ने कानूनी रास्ते अपनाए और बाद में SEBI के एग्जिट फ्रेमवर्क के तहत स्वेच्छा से बाहर निकलने की कोशिश की। एक दशक से भी ज़्यादा समय से यहां कोई एक्टिव इक्विटी ट्रेडिंग नहीं हुई है।

 

 

 

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Upcoming IPOs: AGS Health समेत 4 और कंपनियों के IPO कतार में, SEBI ने दिया ग्रीन सिग्नल

कैपिटल मार्केट रेगुलेटर SEBI ने 4 और कंपनियों के IPO को मंजूरी दे दी है। ये कंपनियां हैं- एजीएस हेल्थ, पीजीपी ग्लास, श्रेणी शेयर्स और SRIT इंडिया। एजीएस हेल्थ और पीजीपी ग्लास ने मार्च 2026 में सेबी के पास कॉन्फिडेंशियल तरीके से IPO का ड्राफ्ट जमा किया था। कॉन्फिडेंशियल रूट कंपनियों को लिस्टिंग पर अंतिम फैसले पर पहुंचने तक गोपनीयता की सुविधा देता है। अगर जरूरी हो तो वे बाद में बाजार की स्थितियों के आधार पर महत्वपूर्ण जानकारी का खुलासा किए बिना ड्राफ्ट को वापस भी ले सकती हैं।

कॉन्फिडेंशियल प्री-फाइलिंग कंपनियों को सेंसिटिव बिजनेस डिटेल्स या फाइनेंशियल मेट्रिक्स और रिस्क्स को गोपनीय रखने की इजाजत देती है, खासकर कॉम्पिटीटर्स से। दूसरी ओर स्टैंडर्ड DRHP (ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस) फाइलिंग के बाद एक पब्लिक डॉक्युमेंट बन जाता है।

एजीएस हेल्थ 4500 करोड़ रुपये और पीजीपी ग्लास 4,100 करोड़ रुपये का पब्लिक इश्यू लाना चाहती है। इस तरह ये दोनों कंपनियां कुल मिलाकर 8600 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी में हैं।

बाकी दोनों कंपनियों का क्या प्लान

ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) के अनुसार, स्टॉक ब्रोकिंग फर्म श्रेणी शेयर्स के प्रस्तावित पब्लिक इश्यू में 69 लाख तक नए शेयर जारी होंगे। साथ ही मौजूदा शेयरधारकों की ओर से 82 लाख तक शेयरों का ऑफर फॉर सेल (OFS) रहेगा। कंपनी नए शेयर जारी कर हासिल होने वाली रकम का इस्तेमाल वर्किंग कैपिटल जरूरतों को पूरा करने, कुछ कर्ज चुकाने और सामान्य कॉर्पोरेट कामों के लिए करने की योजना बना रही है।

ड्राफ्ट पेपर के अनुसार, SRIT इंडिया के IPO में 1.68 करोड़ नए इक्विटी शेयर जारी होंगे। ऑफर फॉर सेल नहीं होगा। IPO से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल मौजूदा प्रोडक्ट्स को आधुनिक बनाने और उनके रीडेवलपमेंट, वर्किंग कैपिटल जरूरतों को पूरा करने, पहले से न पता अधिग्रहणों (Acquisitions) के जरिए इनऑर्गेनिक ग्रोथ हासिल करने और सामान्य कॉर्पोरेट कामों के लिए किया जाएगा।

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जियो प्लेटफॉर्म्स ने भी जमा किया IPO ड्राफ्ट

जियो प्लेटफॉर्म्स ने भी अपने पब्लिक इश्यू के लिए ड्राफ्ट सेबी के पास जमा कर दिया है। यह देश का सबसे बड़ा पब्लिक इश्यू साबित हो सकता है। कंपनी करीब 4 अरब डॉलर (लगभग 37,700 करोड़ रुपये) जुटाने की योजना बना रही है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

SEBI ने ओपन मार्केट बायबैक फिर से शुरू करने की इजाजत दी, 1 अगस्त से नए नियम लागू

सेबी ने स्टॉक एक्सचेंजों के जरिए ओपन मार्केट शेयर बायबैक दोबारा शुरी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। शेयर बायबैक के इस तरीके को अप्रैल 2025 में बंद कर दिया था। टैक्स के नियमों में बदलाव के बाद ऐसा किया गया था। 1 अगस्त से शेयर बायबैक का यह तरीका फिर से शुरू हो जाएगा।

ओपन मार्केट बायबैक एक अतिरिक्त विकल्प होगा

ओपन मार्केट बायबैक को 66 दिनों में पूरा करना होता है। बायबैक के लिए एलॉटेड कम से कम 40 फीसदी फंड का इस्तेमाल होना जरूरी है। सेबी ने कहा है कि स्टॉक एक्सचेंजों के जरिए ओपन मार्केट बायबैक पहले से मौजूद बायबैक फ्रेमवर्क के तहत एक अतिरिक्त विकल्प होगा।

टैक्स को लेकर अब बायबैक के तरीकों में फर्क नहीं रह गया है

रेगुलेटर ने यह भी कहा है कि बायबैक के अलग-अलग तरीकों के बीच टैक्स को लेकर फर्क अब खत्म हो गया है। टैक्स के संसोधित नियमों में इस फर्क को दूर कर दिया गया है। इससे उन कंपनियों को शेयर बायबैक का ऐलान करने में आसानी होगी, जिनके पास पर्याप्त कैश है। वे अपने शेयरहोल्डर्स को बायबैक ऑफर कर सकती हैं।

बायबैक के वैकल्पिक तरीके का दुरूपयोग नहीं होने देगा सेबी

रेगुलेटर यह सुनिश्चित करेगा कि बायबैक के वैकल्पिक तरीके का दुरूपयोग नहीं किया जाए। इसके लिए बायबैक पीरियड के दौरान ISIN लेवल पर प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप की होल्डिंग्स फ्रिज कर दी जाएगी। हालांकि, टेंडर ऑफर के जरिए बायबैक में प्रमोटर्स को पार्टिसिपेट करने की इजाजत होगी। सेबी ने यह भी फैसला किया है कि शेयर बायबैक करने वाली कंपनी को पब्लिक अनाउंसमेंट के एक वर्किंग दिन के अंदर शेयरहोल्डर्स को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से नोटिफाय करना होगा।

बायबैक के लिए अलग ट्रेडिंग विंडों की भी नहीं पड़ेगी जरूरत

सेबी ने स्टॉक एक्सचेंजों के जरिए होने वाले शेयर बायबैक के लिए अलग से ट्रेडिंग विंडो की जरूरत खत्म करने का भी फैसला किया है। पहले टैक्स के मामले में फर्क होने की वजह से अलग विंडो की शुरुआत की गई थी। सेबी का मानना है कि अब इसकी जरूरत नहीं रह गई है। अब बायबैक के ट्रांजेक्शंस स्टॉक एक्सचेंजों के रेगुलर ट्रेडिंग मैकेनिज्म के तहत पूरे होंगे।

मर्चेंट बैंकर्स की अनिवार्य नियुक्ति की जरूरत भी खत्म

रेगुलेटर ने बायबैक ट्रांजेक्शंस के लिए मर्चेंट बैंकर्स की अनिवार्य नियुक्ति की जरूरत भी खत्म कर दी है। अब प्रोसिजर से संबंधित कई जिम्मेदारियां लिस्टेड कंपनियों, स्टॉक एक्सचेंजों, कंप्लायंस ऑफिसर्स और सेक्रेटेरियल ऑडिटर्स पर डाल दी गई है।