Bond Investment: PB Money पर खरीद सकेंगे बॉन्ड्स, मिल गया SEBI से लाइसेंस

पीबी मनी (PB Money) को मार्केट रेगुलेटर सेबी से ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म प्रोवाइडर (OBPP) के रूप में काम करने का लाइसेंस मिल गया है। यह पैसाबाजार (Paisabazaar) के साथ रणनीतिक साझेदारी वाला एक निवेश प्लेटफॉर्म है। अब इसे ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म का लाइसेंस मिला है तो कंपनी अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए निवेशकों को बॉन्ड में निवेश करने की सुविधा दे सकेगी। बॉन्ड्स फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं, जिसमें उनके टर्म्स के आधार पर ब्याज मिलता है। हालांकि इसमें हर मामले में रिटर्न की गारंटी नहीं होती है बल्कि कुछ रिस्क भी होते हैं। इसमें निवेशकों को बॉन्ड इश्यू करने वाले यानी इश्यूअर के डिफॉल्ट होने, मार्केट में ब्याज दरों में बदलाव और लिक्विडिटी से जुड़ी चिंताओं जैसे रिस्क हैं।

PB Money को लाइसेंस का क्या है मतलब?

कंपनी ने 14 अक्टूबर को जो बयान जारी किया है, उसके मुताबिक सेबी से लाइसेंस मिलने के बाद पीबी मनी बॉन्ड इंवेस्टमेंट के पूरे प्रोसेस को ऑपरेट कर सकेगी। इससे कंपनी निवेशकों का रजिस्ट्रेशनस केवाईसी वेरिफिकेशन, बॉन्ड डिस्कवरी, ऑर्डर प्लेसमेंट, पेमेंट कोऑर्डिनेशन, और पोस्ट-इंवेस्टमेंट सर्विसिंग ऑफर कर सकेगी। साथ ही निवेशक प्लेटफॉर्म पर यील्ड यानी रिटर्न, क्रेडिट रेटिंग और इंवेस्टमेंट अमाउंट जैसे मानकों के आधार पर बॉन्ड तलाश सकेंगे। इससे उन्हें उपलब्ध विकल्पों की तुलना करने में मदद मिलेगी।

कब से शुरू कर सकेंगे बॉन्ड्स में निवेश

घरेलू स्टॉक मार्केट में लिस्टेड पीबी फिनटेक (PB Fintech) की पैसाबाजार के निवेश प्लेटफॉर्म पीबी मनी को बॉन्ड प्लेटफॉर्म के तौर पर काम करने का लाइसेंस मिला है। पीबी मनी के डायरेक्टर और पैसाबाजार के सीईओ संतोष अग्रवाल का कहना है कि इस लाइसेंस से बॉन्ड्स में निवेश आसान होगा और खुदरा निवेशकों की फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट्स तक पहुंच बढ़ेगी। कंपनी को यह लाइसेंस ऐसे समय में मिला है जब पीबी मनी डिजिटल माध्यमों से अपने निवेश विकल्पों का विस्तार करने की योजना बना रही है। हालांकि कंपनी ने यह नहीं बताया है कि इस लाइसेंस के तहत प्लेटफॉर्म पर निवेश की सुविधा कब से शुरू होगी, या शुरुआत में कौन-से बॉन्ड उपलब्ध होंगे।

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BRICS Summit 2026: ‘कमजोर कड़ी’ से ग्रोथ इंजन तक: 14 साल में कैसे बदली भारत की BRICS कहानी

BRICS Summit 2026: जब भारत ने 2012 में नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी, तब देश की अर्थव्यवस्था आज के मुकाबले काफी अलग स्थिति में थी। उस समय BRICS समूह भी काफी नया था। इसकी शुरुआत BRIC के रूप में हुई थी, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हो गया।

गौरतलब है कि भारत पहले से ही इस ऐसे समूह का हिस्सा था, जिसे 21वीं सदी की उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधि माना जाता था। लेकिन उस समय यह सवाल भी उठ रहे थे कि क्या भारत वास्तव में इस उम्मीद पर खरा उतर पाएगा?

14 साल बाद, जब भारत 2026 में एक बार फिर BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, तो स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

अब भारत ऐसा देश नहीं है, जो BRICS में अपनी जगह साबित करने की कोशिश कर रहा हो। बल्कि अब भारत को इस समूह की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक और BRICS की आर्थिक और रणनीतिक ताकत का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है।

2012 और 2026 के इन दोनों मौकों के बीच का अंतर यह समझने का अच्छा तरीका है कि इन 14 सालों में भारत कितना बदल गया है।

जब भारत BRICS की ‘कमजोर कड़ी’ था

2012 में सवाल यह नहीं था कि क्या भारत BRICS को आकार दे सकता है, बल्कि यह था कि क्या वह इस समूह का सबसे कमजोर सदस्य बनता जा रहा है।

क्या भारत सच में BRICS में अपनी जगह का हकदार था? क्या BRIC में “I” (इंडिया) की जगह इंडोनेशिया को ले लेना चाहिए था? क्या भारत इस समूह की सबसे कमजोर कड़ी था? ये सवाल उस समय के आर्थिक माहौल को दिखाते थे।

भारत की विकास दर तेजी से धीमी हो गई थी, महंगाई ज्यादा थी, रुपया दबाव में था और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की सरकार की क्षमता को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं।

जून 2012 में, Standard & Poor’s (S&P) ने चेतावनी दी थी कि भारत अपनी इन्वेस्टमेंट-ग्रेड सॉवरेन रेटिंग खोने वाला पहला BRIC देश बन सकता है। इसके पीछे धीमी विकास दर और पॉलिसी बनाने में आ रही राजनीतिक रुकावटों का हवाला दिया गया था। उस समय भारत की रेटिंग BBB- थी, जो स्पेक्युलेटिव ग्रेड से बस एक पायदान ऊपर थी।

यह चेतावनी उस समय भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर फैली निराशा का एक अहम संकेत बन गई थी।

Goldman Sachs के अर्थशास्त्री Jim O’Neill, जिन्होंने BRIC (ब्रिक) शब्द गढ़ा था, भारत के वैल्यूएशन को लेकर भी बहुत उत्साहित नहीं थे। अगस्त 2012 के एक इंटरव्यू में, उन्होंने वैल्यूएशन के मामले में भारत को चार BRIC अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम आकर्षक बताया था; उन्होंने चीन को पहले स्थान पर रखा, जिसके बाद ब्राज़ील, रूस और फिर भारत का नंबर था।

उस समय भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति भी उतनी ही मुश्किल थी। 2012-13 में विकास दर 5 प्रतिशत से नीचे गिर गई थी, जबकि महंगाई का स्तर ऊंचा बना रहा। भारत के बारे में धारणा बदलने लगी थी; अब उसे एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के बजाय ऐसी अर्थव्यवस्था के तौर पर देखा जाने लगा था जो पॉलिसी पैरालिसिस (नीतिगत गतिरोध), महंगाई और धीमी होती विकास दर से जूझ रही थी।

दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत BRICS का हिस्सा तो था, लेकिन इस बात पर संदेह था कि क्या वह दूसरी उभरती हुई ताकतों के साथ कदम मिलाकर चल पाएगा।

2026 की ओर आगे बढ़ते हुए

आज स्थिति काफी अलग है।

भारत 2026 के ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में एक ऐसी अर्थव्यवस्था के साथ शामिल हो रहा है जिसने प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज विकास दर बनाए रखी है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी (GDP) में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सरकार ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था ने अपनी विकास की गति बनाए रखी है।

यह 2010 के दशक की शुरुआत में मंदी के दौरान भारत की 5 प्रतिशत से कम विकास दर के मुकाबले एक बड़ा अंतर है।

बता दें कि यह बदलाव सिर्फ एक तिमाही के जीडीपी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। भारत के आर्थिक आधार और वैश्विक संस्थानों द्वारा उनके मूल्यांकन के तरीके में भी बदलाव आया है।

‘फॉलन एंजेल’ (Fallen Angel) के डर से ‘A-‘ रेटिंग तक का सफर

शायद इस बदलाव को समझने का एक सबसे साफ उदाहरण भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग है।

2012 में S&P की चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी थी कि भारत इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग खोने वाला पहला BRIC देश बन सकता है। इससे भारत की अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को लेकर सवाल उठने लगे थे।

लेकिन सितंबर 2026 में Japan Credit Rating Agency (JCR) ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को एक पायदान बढ़ाकर BBB+ से A- कर दिया। रेटिंग के साथ Stable Outlook भी दिया गया। JCR ने इसकी वजह भारत की मजबूत और मुश्किल परिस्थितियों में भी टिके रहने वाली आर्थिक विकास दर, वित्तीय स्थिति में सुधार, मजबूत बैंकिंग सिस्टम और बेहतर बाहरी आर्थिक स्थिति को बताया।

JCR ने भारत की लगातार तेज आर्थिक विकास दर, मजबूत निजी खपत और सरकारी निवेश को भी अहम कारण माना। इसके अलावा GST और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे नीतिगत कदमों का भी उल्लेख किया गया।

एजेंसी ने सरकारी खर्च की गुणवत्ता में सुधार की भी तारीफ की। खास तौर पर पूंजीगत खर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते निवेश को भारत की आर्थिक मजबूती का अहम हिस्सा बताया गया।

इस रेटिंग में बढ़ोतरी की अहमियत सिर्फ रेटिंग बढ़ने तक सीमित नहीं है। असली बदलाव यह है कि 2012 के मुकाबले आज भारत की अर्थव्यवस्था और उसके जोखिम को लेकर चर्चा पूरी तरह बदल गई है।

2012 में चिंता इस बात की थी कि क्या भारत अपनी इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग बचा पाएगा? वहीं आज चर्चा इस बात पर हो रही है कि क्या भारत की तेज आर्थिक विकास दर उसे आने वाले समय में दुनिया की एक बहुत बड़ी आर्थिक ताकत बनने में मदद कर सकती है।

BRICS में बदलाव आया है और इसमें भारत की जगह भी बदली है

जिस ग्रुप में भारत BRIC के तौर पर शामिल हुआ था, उसमें भी जबरदस्त बदलाव आया है।

BRICS का दायरा इसके शुरुआती चार सदस्यों से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। 2010 में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ और बाद में हुए विस्तार में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसमें जुड़ गए।

अब यह ग्रुप दुनिया की आबादी और अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, यह सिर्फ एक आर्थिक नाम से बदलकर उभरते और विकासशील देशों के लिए एक व्यापक राजनीतिक और कूटनीतिक मंच बन गया है।

इस विस्तार ने BRICS में भारत की स्थिति को और भी अहम बना दिया है।

ध्यान दें कि भारत BRICS की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से काफी बड़ी है, लेकिन आर्थिक विकास, बड़ी आबादी, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और दूसरे देशों के साथ मजबूत कूटनीतिक संबंधों का मेल भारत को BRICS में काफी महत्वपूर्ण बनाता है।

वहीं, 2012 के BRICS की तुलना में आज स्थिति अलग है। तब भारत को मुख्य रूप से BRICS के दूसरे देशों से तुलना करके देखा जाता था। लेकिन अब भारत सिर्फ समूह के दूसरे सदस्यों के साथ अपनी स्थिति की तुलना नहीं कर रहा है, बल्कि यह भी कोशिश कर रहा है कि बदला हुआ BRICS आगे किस दिशा में जाए और उसका स्वरूप कैसा हो।

आर्थिक कहानी से रणनीतिक अहमियत तक

BRICS में भारत का उभार सिर्फ GDP तक सीमित नहीं है। यह भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दूसरे देशों से संबंध बनाए रखने की भारत की क्षमता के बारे में भी है।

जानकारी के मुताबिक, 2026 का यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका-चीन की प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया का संकट और व्यापक भू-राजनीतिक बंटवारा अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नए सिरे से आकार दे रहे हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) के प्रति भारत की लंबे समय से चली आ रही प्राथमिकता और उन देशों के साथ एक ही समय में जुड़ने की उसकी क्षमता—जिनके हित हमेशा एक जैसे नहीं होते—इस माहौल में और भी अहम हो गई है।

चैथम हाउस ने रणनीतिक स्वायत्तता को भारत की विदेश नीति की एक पुरानी विशेषता बताया है। साथ ही, यह भी कहा है कि भारत का यह नजरिया नई दिल्ली को उन देशों के साथ संबंध बनाए रखने में मदद करता है जिनके साथ पश्चिम के संबंध मुश्किल भरे रहे हैं। संस्थान ने अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा से तेजी से बदलती दुनिया में ‘मध्यम शक्तियों’ (middle powers) के लिए ‘रणनीतिक हेजिंग’ (strategic hedging) के बढ़ते महत्व पर भी जोर दिया है।

बता दें कि भारत के लिए, इसका मतलब है कि ब्रिक्स सिर्फ एक आर्थिक ग्रुप नहीं है। यह उन कई मंचों में से एक है जिनके जरिए नई दिल्ली किसी एक बड़े पावर ब्लॉक के साथ औपचारिक रूप से जुड़े बिना अपने हितों को आगे बढ़ा सकती है।

2026 के समिट का महत्व भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अन्य बड़े नेता नई दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं क्योंकि भारत इस ग्रुप की मेजबानी कर रहा है। भू-राजनीतिक बंटवारे के दौर में इन नेताओं का भारत आना ही नई दिल्ली की बढ़ती ‘इकट्ठा करने की क्षमता’ (convening power) को दिखाता है।

इन देशों के साथ भारत के रिश्ते जटिल हैं और अक्सर उनमें काफी मतभेद भी रहे हैं। चीन भारत का रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है; रूस भारत के रक्षा और ऊर्जा हितों से गहराई से जुड़ा है; ईरान भारत की कनेक्टिविटी और पश्चिम एशिया से जुड़ी रणनीतियों के लिए अहम है। फिर भी, भारत इन सभी के साथ एक ही कूटनीतिक ढांचे के भीतर काम करने में सक्षम है।

भारत की आर्थिक कहानी में गुणात्मक बदलाव भी आया है।

पहले भारत की BRIC वाली छवि मुख्य रूप से उसके सर्विस सेक्टर, IT इंडस्ट्री, बढ़ते कंज्यूमर मार्केट और डेमोग्राफिक क्षमता से जुड़ी थी। आज, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उभरती हुई टेक्नोलॉजी देश की आर्थिक कहानी का बहुत बड़ा हिस्सा बन गई हैं।

UPI और आधार जैसे प्लेटफॉर्म के विकास ने भारत को डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का एक खास मॉडल दिया है, जबकि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली पहलों का मकसद आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक वैकल्पिक जगह के तौर पर स्थापित करना रहा है।

JCR ने खास तौर पर भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और GST का जिक्र उन नीतियों के तौर पर किया है जिन्होंने देश की आर्थिक नींव को मजबूत किया है।

आसान शब्दों में कहें तो, 2012 में जब भारत BRICS समिट में शामिल हुआ, तो सवाल यह था कि क्या वह दूसरी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाएगा। 2026 में, भारत एक बड़े हो चुके BRICS की मेजबानी कर रहा है। ऐसे समय में जब वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, उसे JCR से ‘A-‘ सॉवरेन रेटिंग मिली है, और वह उस ग्रुप के एजेंडे को आकार देने की कोशिश कर रहा है जिसका आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है।

इस अंतर ने सवाल को ही बदल दिया है। 2012 में बहस यह थी कि—क्या भारत BRICS में शामिल होने के लायक है? 2026 में, ज्यादा अहम सवाल यह है कि: भारत BRICS के भविष्य को किस हद तक आकार दे सकता है?

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Bonds में निवेश पर रिटर्न की गांरटी! ऐसे ऐड पर लगेगी रोक, SEBI ने लाया प्रस्ताव

बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म प्रोवाइडर्स के लिए विज्ञापनों से जुड़े नियमों पर सख्ती का प्रस्ताव पेश किया है। सेबी का लक्ष्य ये है कि ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगे जो निवेशकों को बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। सेबी ने इससे जुड़ा कंसल्टेशन पेपर शुक्रवार को जारी किया। इसमें डिजिटल विज्ञापन, सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर के जरिए होने वाले प्रचार को ध्यान में रखते हुए नए ऐड कोड का प्रस्ताव दिया गया है। इन प्रस्ताव पर सेबी ने 11 सितंबर तक सभी स्टेकहोल्डर्स से कमेंट्स मंगाए हैं।

किस तरह के विज्ञापनों पर रोक लग सकती है?

सेबी ऐसे विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव कर रहा है जिनसे निवेशकों पर तुरंत फैसला लेने का दबाव बन रहा हो। ऐसे ऐड पर रोक लग सकती है, जिसमें अर्जेंसी, बिहैवियरियल प्रॉम्प्ट्स या FOMO (Fear of Missing Out) यानी छूट जाने का डर जैसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए। सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक ऐसे मैसेजेज पर रोक लगाई जाएगी जिसमें उत्साहित होकर निवेशक बॉन्ड के रिस्क की पर्याप्त जांच किए बिना निवेश कर दें। सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक हाई यील्ड, हाई रेटेड या हाई रिटर्न्स जैसे दावों पर बिना पर्याप्त जानकारी के रोक लगेगी

क्या देनी होगी जानकारी?

सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी विज्ञापन में किसी खास बॉन्ड या सिक्योरिटी का प्रचार किया जा रहा है, तो प्लेटफॉर्म को कुछ खास जानकारी देनी होगी, जैसे कि इसे जारी कौन कर रहा (Issuer), इसकी अवधि कितनी है (Tenor), इसकी क्रेडिट रेटिंग, सिक्योरिटी का प्रकार, क्लीन प्राइस और डर्टी प्राइस, यील्ड टू मेच्योरिटी (YTM), क्रेडिट रिस्स-ओ-मीटर। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निवेशक निवेश करने से पहले बॉन्ड से जुड़ी अहम जानकारी और रिस्क को समझ सकें।

फिक्स्ड रिटर्न को लेकर क्या है प्रस्ताव?

सेबी ने फिक्स्ड रिटर्न्स, प्रेडिक्टेबिल रिटर्न्स और पैसिव इनकम जैसे शब्दों के इस्तेमाल के लिए भी खास निर्देश दिए हैं ताकि ऐसा ना लगे कि निवेश पर खास रिटर्न की गारंटी है। अगर किसी विज्ञापन में ‘फिक्स्ड रिटर्न’ लिखा जा रहा है, तो उसमें प्रमुखता से यह डिस्क्लेमर देना होगा कि फिक्स्ड रिटर्न्स की गारंटी नहीं होती और डेट सिक्योरिटीज में मार्केट रिस्क, क्रेडिट रिस्क और डिफॉल्ट का रिस्क होता है यानी कि बॉन्ड्स से रिटर्न पूरी तरह सुरक्षित या गारंटीड है, ऐसा विज्ञापन के जरिए नहीं बताया जा सकेगा।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

जना स्मॉल फाइनेंस बैंक की होल्डिंग कंपनी को मिल सकती है ‘डिफॉल्ट’ रेटिंग, कर्ज चुकाने में की देरी : सूत्र

जना स्मॉल फाइनेंस बैंक की होल्डिंग कंपनी Jana Holdings Limited (JHL) की क्रेडिट रेटिंग घटकर ‘डिफॉल्ट’ कैटेगरी में जा सकती है। CNBC-TV18 को मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने बताया कि इसकी वजह नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) की रकम तय समय पर नहीं चुका पाना है।

NCD भुगतान में हुई देरी

सूत्रों के मुताबिक, JHL ने NCD की भुगतान अवधि 30 जून 2026 से बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 कर दी है। यानी कंपनी को भुगतान के लिए छह महीने का अतिरिक्त समय मिला है।

बताया जा रहा है कि यह फैसला डिबेंचर-होल्डर्स की सहमति से लिया गया है। इनमें प्रमुख निवेशक TPG Asia VI India Markets Pte भी शामिल है। ऐसे में इसे टेक्निकल डिफॉल्ट माना जा रहा है।

 Jana Holdings को क्यों आई दिक्कत?

सूत्रों के अनुसार, JHL को उम्मीद थी कि वह Jana Small Finance Bank में अपनी हिस्सेदारी बेचकर NCD का भुगतान कर देगी। लेकिन हिस्सेदारी का समय पर मोनेटाइजेशन नहीं हो पाया, जिससे भुगतान में देरी हुई।

JHL की हिस्सेदारी पहले 44% थी, जो TVS Venu Group को आंशिक हिस्सेदारी बेचने के बाद घटकर करीब 16.95% रह गई है। सूत्रों का कहना है कि अगर रीफाइनेंसिंग की जरूरत पड़ी, तो कंपनी अपनी बची हुई हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा भी बेच सकती है।

Jana Small Finance Bank पर कितना असर?

सूत्रों के मुताबिक, इस घटनाक्रम का Jana Small Finance Bank के कारोबार पर सीधा असर सीमित रहने की उम्मीद है। बैंक को जून 2022 के बाद से JHL की ओर से कोई नई पूंजी नहीं मिली है। फंडिंग के मामले में बैंक स्वतंत्र रूप से काम करता है।

इसके अलावा JHL और बैंक के बोर्ड में कोई साझा प्रतिनिधित्व नहीं है। दोनों के कर्ज भी आपस में जुड़े नहीं हैं। इसलिए होल्डिंग कंपनी की रेटिंग में गिरावट का सीधा वित्तीय असर बैंक पर पड़ने की संभावना कम मानी जा रही है।

हालांकि, अगर JHL आगे अपनी बची हुई हिस्सेदारी भी बेचती है, तो इससे Jana Small Finance Bank के शेयर पर शॉर्ट टर्म में दबाव बन सकता है। फिलहाल इस मामले पर Jana Holdings और Jana Small Finance Bank की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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