Video: दिल्ली पुलिसकर्मी की AAP कार्यकर्ताओं ने सरेआम कर दी पिटाई, केजरीवाल के दौरे के दौरान सादे कपड़ों में था हेड कांस्टेबल

Video: राजधानी के तिलक नगर इलाके में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दौरे के दौरान एक पुलिसकर्मी के साथ कथित तौर पर मारपीट और धक्का-मुक्की करने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस का एक हेड कॉन्स्टेबल सादे कपड़ों में मोबाइल फोन से केजरीवाल के दौरे की रिकॉर्डिंग कर रहा था। इसी दौरान कुछ आम आदमी पार्टी (AAP) कार्यकर्ताओं ने उसे घेर लिया। इस दौरान उसके साथ कथित तौर पर हाथापाई और मारपीट की।

घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है। इसमें सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मी को भीड़ के बीच घिरा हुआ देखा जा सकता है। वीडियो में लोग उसे धक्का देते और उसके साथ बहस करते नजर आ रहे हैं। पुलिसकर्मी ने जींस और शर्ट पहन रखी थी। इससे एक दिन पहले ही दिल्ली के मंत्री प्रवेश वर्मा और AAP से जुड़े एक युवक के बीच हुई झड़प ने इलाके में राजनीतिक और पुलिस विवाद खड़ा कर दिया था।

फ्लाईओवर के नीचे घेरकर जाने नहीं दिया

बताया गया है कि AAP कार्यकर्ताओं की भीड़ पुलिसकर्मी को घेरते हुए फ्लाईओवर के नीचे तक ले गई। आरोप है कि भीड़ ने कथित तौर पर उसे वहां से निकलने नहीं दिया। स्थिति बिगड़ने पर वर्दी में मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों ने मौके पर पहुंचकर अपने साथी को भीड़ से बाहर निकालने की कोशिश की।

पुलिस ने हेड कॉन्स्टेबल की मेडिकल जांच कराई है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसे किसी तरह की चोट लगी है या नहीं। पुलिसकर्मी के साथ ड्यूटी के दौरान कथित मारपीट को लेकर FIR दर्ज करने पर भी विचार किया जा रहा है।

तिलक नगर में सड़क की क्वालिटी पर केजरीवाल ने उठाए सवाल

यह घटना पश्चिमी दिल्ली के तिलक नगर में सोमवार (28 सितंबर) को अरविंद केजरीवाल के दौरे के दौरान हुई। केजरीवाल के साथ AAP सांसद संजय सिंह, स्थानीय विधायक जरनैल सिंह और पार्टी के अन्य नेता भी मौजूद थे। केजरीवाल ने इलाके में हाल ही में बनी सड़क की क्वालिटी को लेकर दिल्ली की BJP सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि सड़क निर्माण के कुछ ही दिनों बाद उसकी हालत खराब हो गई है।

केजरीवाल ने कहा कि सड़क को हाथ से ही उखाड़ा जा सकता है। उन्होंने दिल्ली में इस तरह का निर्माण पहले कभी नहीं देखा। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी पिछली AAP सरकार के दौरान इस तरह के सड़क निर्माण पर पांच साल की गारंटी होती थी।

एक दिन पहले मंत्री प्रवेश वर्मा का वीडियो हुआ था वायरल

अरविंद केजरीवाल का तिलक नगर दौरा ऐसे समय हुआ, जब इससे एक दिन पहले दिल्ली के मंत्री प्रवेश वर्मा का एक वीडियो सामने आया था। वायरल वीडियो में उन्हें इलाके में नई बनी सड़क का निरीक्षण करते समय एक व्यक्ति को कथित तौर पर थप्पड़ मारते हुए देखा गया था।

हालांकि, बाद में पुलिस से जुड़ी जानकारी में सामने आया कि थप्पड़ खाने वाला व्यक्ति भी एक मामले में आरोपी है। 22 वर्षीय साहिब सिंह पर इस साल की शुरुआत में दिल्ली नगर निगम (MCD) के एक कर्मचारी के साथ कथित मारपीट के संबंध में पुलिस शिकायत और एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई।

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राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सामने आई घटना

तिलक नगर की घटना ने दिल्ली में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और विपक्षी AAP के बीच चल रहे राजनीतिक टकराव के बीच एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक तरफ केजरीवाल ने सड़क निर्माण की क्वालिटी पर सवाल उठाए। वहीं, उनके दौरे के दौरान पुलिसकर्मी के साथ कथित मारपीट का वीडियो सामने आने से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पुलिस अब वीडियो की जांच कर रही है। मामले में पुलिस कार्रवाई कर सकती है। NDTV के मुताबिक, पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है। फिलहाल, दिल्ली पुलिस के आधिकारिक बयान का इंतजार है।

Sambhal Violence: संभल हिंसा मामले में आरोपी को बड़ी राहत! सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत मुल्ला अफरोज की हिरासत रद्द की, UP सरकार पर लगाया ₹10 लाख का जुर्माना

Sambhal Violence Case: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (29 सितंबर) को 2024 की संभल हिंसा मामले के कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत लिए गए हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी खारिज कर दिया, जिसमें हिरासत के आदेश को बरकरार रखा गया था। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के आदेश को अवैध बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी आरोपी के इकबालिया बयान को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत उसे हिरासत में रखने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत को रद्द कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 2024 में संभल में हुई सांप्रदायिक हिंसा में मुल्ला अफरोज की कथित भूमिका को लेकर अक्टूबर 2025 में उसके खिलाफ कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की थी। शीर्ष अदालत ने अवैध हिरासत का आदेश पारित करने के लिए सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

क्या है NSA?

आपको बता दें कि रासुका यानी NSA केंद्र और राज्य सरकारों को व्यक्तियों को हिरासत में लेने का अधिकार देता है, ताकि उन्हें भारत की रक्षा के लिए प्रतिकूल तरीके से कार्य करने से रोका जा सके। हिरासत की अधिकतम अवधि 12 महीने है। हालांकि इसे इससे पहले भी रद्द किया जा सकता है। रासुका के तहत स्थानीय प्रशासन हिरासत का आदेश जारी कर सकता है, जिसे हाई कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाले एक बोर्ड से अनुमोदित कराना होता है। चूंकि यह गिरफ्तारी नहीं बल्कि हिरासत होती है। इसलिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होती।

संभल हिंसा क्या है?

नवंबर 2024 में संभल में तनाव उस समय बढ़ गया था, जब वहां स्थित शाही जामा मस्जिद का अदालत के आदेश पर सर्वे किया जा रहा था। यह सर्वे उन दावों के बाद कराया गया था कि इस स्थान पर पहले हरिहर मंदिर मौजूद था। सर्वेक्षण के दूसरे दौर के दौरान 24 नवंबर को प्रदर्शन कर रहे स्थानीय लोगों की सुरक्षा कर्मियों से झड़प हो गई थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हुए थे।

घटना के करीब 54 दिन बाद अफरोज को गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए एक कथित कबूलनामे के आधार पर हुई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी। हालांकि, 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया। इस आदेश को बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पुलिस हिरासत में कथित कबूलनामे पर उठे सवाल

‘लाइव लॉ’ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत के लिए जरूरी ‘subjective satisfaction’ (व्यक्तिपरक संतुष्टि) केवल ऐसे कथित कबूलनामे के आधार पर कायम नहीं की जा सकती, जो पुलिस हिरासत के दौरान लिया गया हो। 8 सितंबर को सुनवाई के दौरान आदेश सुरक्षित रखते समय भी पीठ ने पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे की प्रासंगिकता और कानूनी महत्व पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने पूछा था कि क्या ऐसा बयान निवारक हिरासत का आदेश जारी करने के लिए आवश्यक ‘subjective satisfaction’ का आधार बन सकता है।

आरोपी ने पुलिस फायरिंग की जांच पर भी उठाए सवाल

शीर्ष अदालत में अफरोज की ओर से दलील दी गई कि हिंसा के दौरान पुलिस ने भी कथित तौर पर गोलीबारी की थी। इस पहलू की निष्पक्ष तरीके से जांच नहीं की गई। उसने इस संबंध में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने की अनुमति मांगी। उसकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि पुलिस हिरासत में दिया गया कथित कबूलनामा कानूनन स्वीकार्य नहीं है। साथ ही कहा गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना अपने आप में कस्टडी का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।