जेवर में जलभराव पर सियासत तेज, विधायक धीरेन्द्र सिंह बोले- जिन्हें विकास नहीं दिखता, उन्हें सिर्फ गड्ढे नजर आते हैं

जेवर में जलभराव पर सियासत तेज, विधायक धीरेन्द्र सिंह बोले- जिन्हें विकास नहीं दिखता, उन्हें सिर्फ गड्ढे नजर आते हैं

jawer airport

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निकट पार्किंग स्थल पर बारिश के बाद हुए जलभराव को लेकर जेवर विधायक धीरेन्द्र सिंह ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि जिन्हें जेवर का अभूतपूर्व विकास नहीं दिखाई देता, उन्हें केवल गड्ढे और जलभराव नजर आ रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने अधिकारियों को जल निकासी व्यवस्था की समीक्षा कर कमियों को दूर करने और स्थायी समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने इसे प्रदेश में हो रहे विकास से जनता का ध्यान भटकाने की राजनीति बताया।

 

धीरेन्द्र सिंह ने कहा कि बारिश के बाद विपक्ष को यहां गड्ढे और जलभराव दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इसी धरती पर खड़ा अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, विश्वस्तरीय सड़कें, औद्योगिक निवेश और हजारों युवाओं के लिए पैदा हो रहे रोजगार के अवसर नजर नहीं आ रहे। विधायक ने कहा कि एक समय जेवर क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से दूर था, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आज यह उत्तर प्रदेश के बदलते औद्योगिक और आर्थिक स्वरूप का प्रमुख केंद्र बन चुका है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने जेवर को देश-दुनिया के मानचित्र पर नई पहचान दी है।

 

उन्होंने कहा कि जिन लोगों के शासनकाल में एयरपोर्ट वर्षों तक चर्चा और कागजों तक सीमित रहा, आज वे इसके आसपास बारिश के पानी को लेकर राजनीति कर रहे हैं। उन्हें जेवर में हुआ विकास और उत्तर प्रदेश की बदलती तस्वीर स्वीकार नहीं हो रही है।

 

विपक्ष तस्वीरों में गड्ढे खोजता रहे, हम जेवर में विकास की नई इबारत लिखते रहेंगे

 

धीरेन्द्र सिंह ने स्पष्ट किया कि जलभराव या किसी तकनीकी कमी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। संबंधित अधिकारियों से जल निकासी व्यवस्था की समीक्षा कर आवश्यक सुधार करने को कहा गया है। उन्होंने कहा, विपक्ष तस्वीरों में गड्ढे खोजता रहे, हम जेवर में विकास की नई इबारत लिखते रहेंगे। कमी जहां होगी, उसे ठीक कराया जाएगा, लेकिन कुछ समय के जलभराव को जेवर और उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक विकास पर पर्दा डालने का माध्यम नहीं बनने दिया जाएगा।

Cow Urine: अब दूध के साथ गोमूत्र से भी बंपर कमाई करेंगे किसान! यूपी के इन जिलों में ₹10 प्रति लीटर खरीद शुरू

Cow Urine Pilot Project: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले गो-संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में एक नई पहल शुरू की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के तहत बुलंदशहर में गोमूत्र की खरीद का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसके तहत किसानों और पशुपालकों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है। योगी सरकार ने बुलंदशहर में किसानों से गाय का मूत्र इकट्ठा करने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। उम्मीद है कि इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी। साथ ही महिलाओं को कमाई का एक अतिरिक्त जरिया मिलेगा। साथ ही उन गायों की देखभाल में मदद मिलेगी जो अब दूध नहीं देतीं।

इकट्ठा किए गए गाय के मूत्र का इस्तेमाल खेती-बाड़ी के कामों में कच्चे माल के तौर पर किए जाने की उम्मीद है। ऐसी आशा है कि यह केमिकल वाले उत्पादों की जगह ले सकता है। अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो एक औपचारिक नीति बनाई जाएगी। अधिकारियों ने बताया कि चुनाव से पहले इस प्रोजेक्ट को पूरे राज्य में लागू किया जाएगा।

क्या है मकसद?

इस पहल का उद्देश्य गोमूत्र से कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार करना, पशुपालकों की अतिरिक्त आमदनी बढ़ाना, महिलाओं को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराना और प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देना है। पायलट प्रोजेक्ट सफल रहने पर इसे प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी लागू करने की तैयारी है।

बुलंदशहर के 15 गांवों में शुरू हुआ मॉडल

यह पहल बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसेना गांव में डॉ. प्रवीण के नेतृत्व में एक किसान उत्पादक संगठन (FPO) के माध्यम से शुरू की गई है। फिलहाल आसपास के 15 गांवों को इस परियोजना से जोड़ा गया है। इन गांवों में गोमूत्र जमा करने के लिए स्थानीय कलेक्शन सेंटर बनाए गए हैं। इन केंद्रों के जरिए वर्तमान में करीब 500 लीटर गोमूत्र प्रतिदिन एकत्र किया जा रहा है। भविष्य में गोमूत्र की खरीद कीमत को बढ़ाकर 20 रुपये प्रति लीटर करने की भी योजना बताई गई है।

पशुपालकों को नहीं जाना पड़ेगा दूर

गोमूत्र संग्रह के लिए गांवों में 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इससे पशुपालकों को गोमूत्र बेचने के लिए दूर स्थित किसी केंद्र तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती। गांव में ही कलेक्शन और खरीद की व्यवस्था होने से इस योजना में अधिक से अधिक पशुपालकों को जोड़ने में मदद मिल रही है। खासकर ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

महिलाओं को हर लीटर पर 2 रुपये कमीशन

इस मॉडल की एक खास बात महिलाओं की आर्थिक भागीदारी है। गांवों में गोमूत्र संग्रह में मदद करने वाली महिलाओं को हर लीटर पर 2 रुपये कमीशन दिया जा रहा है। इससे महिलाओं के लिए गांव में रहते हुए अतिरिक्त आमदनी का एक नया जरिया तैयार हुआ है। इस पहल से करीब 300 महिलाओं को शुरुआत में जोड़ा गया है। उन्हें इस मॉडल में शेयरधारक भी बनाया गया है।

यानी महिलाएं सिर्फ गोमूत्र संग्रह करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें पूरे आर्थिक मॉडल से सीधे जोड़ा गया है। डॉ. प्रवीण ने न्यूज एजेंसी यूएनआई को बताया कि इस पहल का उद्देश्य केवल गोमूत्र की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। बल्कि इसे महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जोड़ना है।

गोमूत्र से बनाए जाएंगे खेती में काम आने वाले उत्पाद

संग्रह किए गए गोमूत्र का इस्तेमाल कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार करने में किया जा रहा है। इसके लिए गोमूत्र में विभिन्न जड़ी-बूटियों को मिलाकर कृषि में इस्तेमाल होने वाले मिश्रण और उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों को स्थानीय समितियों और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किसानों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। इस मॉडल का उद्देश्य खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ रासायनिक उत्पादों के विकल्प के रूप में गोमूत्र आधारित प्राकृतिक उत्पादों को बढ़ावा देना भी है।

दूध के साथ गोमूत्र से भी आमदनी

ग्रामीण इलाकों में पशुपालन से होने वाली आमदनी मुख्य रूप से दूध और डेयरी उत्पादों पर निर्भर रहती है। इस पहल के जरिए पशुपालकों की आय में गोमूत्र को भी एक अतिरिक्त आर्थिक संसाधन के रूप में जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यानी पशुपालक परिवारों के लिए एक ही पशु से दूध के अलावा गोमूत्र के जरिए भी अतिरिक्त आय का रास्ता बनाया जा रहा है। विशेष रूप से पशुपालन से जुड़े परिवारों की महिलाओं के लिए यह पहल घर और गांव के आसपास रहते हुए अतिरिक्त कमाई का जरिया बन सकती है।

सहकारी समितियों के जरिए बाजार तक पहुंचेंगे उत्पाद

गोमूत्र से तैयार कृषि उत्पादों को केवल किसानों तक पहुंचाने पर ही जोर नहीं है, बल्कि इनके लिए स्थानीय बाजार तंत्र भी विकसित किया जा रहा है। तैयार उत्पादों को सहकारी समितियों और स्थानीय समितियों के जरिए किसानों और बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। इससे गांव में संग्रह से लेकर उत्पाद तैयार करने और फिर उसकी बिक्री तक एक स्थानीय आर्थिक चक्र विकसित करने की कोशिश है।

गो-संरक्षण, रोजगार और प्राकृतिक खेती को जोड़ने की कोशिश

गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, बुलंदशहर में शुरू किया गया मॉडल गो-संरक्षण, ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तीकरण और प्राकृतिक/जैविक खेती को एक साथ जोड़ने वाली पहल के तौर पर देखा जा रहा है। इस मॉडल में गांवों से गोमूत्र इकट्ठा किया जाता है। फिर महिलाएं कलेक्शन प्रक्रिया से आमदनी हासिल करती हैं।

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इसके बाद गोमूत्र से कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार कर उन्हें सहकारी समितियों और स्थानीय समितियों के माध्यम से बाजार तक पहुंचाया जाता है। फिलहाल, यह योजना पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर बुलंदशहर में चलाई जा रही है। इसके अनुभव और परिणामों के आधार पर इसे उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी विस्तार देने की तैयारी है।

VB-G RAM G के तहत रोजगार में 50 फीसदी गिरावट, जानिए क्या है इसकी वजह

ग्रामीण इलाकों में रोजगार की नई गारंटी स्कीम ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ (VB-G RAM-G) के तहत रोजगार में गिरावट आई है। केंद्र सरकार ने 1 जुलाई, 2026 से मनरेगा की जगह वीबी-जी-राम-जी स्कीम लागू की है। इस स्कीम के फंडिंग सिस्टम में भी बदलाव किया गया है।

इन वजहों से घटा स्कीम में रोजगार

VB-G RAM-G में रोजगार घटने की कई वजहें हैं। मानसून के सीजन में इस स्कीम के तहत होने वाले काम रुक जाते हैं। मनरेगा की जगह नई योजना लागू करने के दौरान कुछ दिक्कतें आई होंगी। इसके अलावा बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से मजदूरों के पलायन की रफ्तार सुस्त हुई है। केंद्र सरकार के दो सूत्रों ने यह जानकारी दी।

नई स्कीम में फंडिंग का तरीका बदला

राज्य सरकार के एक सूत्र ने कहा कि राज्यों की खराब वित्तीय हालत भी इस स्कीम में रोजगार में कमी की वजह हो सकती है। नई स्कीम में फंडिंग का तरीका बदला है। ज्यादातर राज्यों को इस स्कीम पर आने वाले खर्च का 40 फीसदी बोझ उठाना पड़ता है। बाकी 60 फीसदी बोझ केंद्र सरकार उठाती है।

ज्यादातर राज्यों की वित्तीय स्थिति खराब

एक राज्य सरकार के प्रतिनिधि ने मनीकंट्रोल को बताया कि ज्यादातर राज्यों की वित्तीय स्थिति खराब है। कई राज्यों ने ऐसे कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिन पर काफी ज्यादा पैसे खर्च होते हैं। इस वजह से उनके पास VB-G RAM-G पर खर्च करने के लिए ज्यादा पैसे नहीं बचते हैं। आरबीआई की रिपोर्ट बताती है कि राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है।

VB-G RAM-G में 125 दिन रोजगार की गारंटी

RBI की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों का कंसॉलिडेटेड फिस्कल डेफिसिट बढ़कर FY25 में जीडीपी का 3.3 फीसदी हो गया। 2021-22 से 2023-24 के बीच यह जीडीपी के 3 फीसदी से कम था। VB-G RAM-G में रोजगार की गारंटी वाले दिन की संख्या बढ़ाकर 125 दिन कर दी दी गई है। मनरेगा में यह 100 दिन थी।

बुआई और कटाई के पीक सीजन में काम रुक जाता है

गारंटी वाले रोजगार के दिन की संख्या बढ़ाने से भी राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ बढ़ा है। इस स्कीम में बुआई और कटाई के पीक सीजन में कुल 60 दिन तक काम रुक जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कृषि कार्य के लिए मजदूरों की कमी नहीं हो।

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जुलाई 2025 के मुकाबले रोजगार में 50 फीसदी कमी

केंद्र सरकार के VB-G RAM-G डैशबोर्ड (10 अगस्त को अपडेटेड) के मुताबिक, जुलाई 2026 में पर्सन-डेज गारंटीड की संख्या जुलाई 2025 में मनरेगा के मुकाबले 50 फीसदी से ज्यादा कम रही। केंद्र सरकार के एक सीनियर अफसर ने बताया कि पर्सन-डेज की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव है।

Gold Silver Price: 10 हफ्ते के हाई पर सोना, 1 हफ्ते में 11% चढ़ी चांदी, जानिए इस तेजी के पीछे क्या है वजह

Gold – Silver Price: सोने और चांदी की कीमतों में हालिया तेजी जारी है। सोना 10 हफ्ते के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है जबकि चांदी में पिछले हफ्ते 11% से ज़्यादा की बढ़त हुई है। इस हफ्ते स्पॉट गोल्ड की कीमत लगभग USD 4,435 प्रति औंस तक पहुंच गई, जो जून के मध्य के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। खबर लिखे जाने के समय USD 4,375 के आसपास थी।

Comex सिल्वर में इस हफ्ते 11% से ज्याजा की तेजी आई। स्पॉट सिल्वर की कीमत लगभग USD 64 प्रति औंस हो गई। भारत में, सोना 10 ग्राम के लिए लगभग 1,55,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास ट्रेड कर रहा था, जबकि MCX सिल्वर में हफ्ते भर में लगभग 6.58% की बढ़त हुई और यह प्रति किलोग्राम लगभग 2,31,804 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास ट्रेड कर रहा था।

सोने-चांदी की कीमतों के पीछे तेजी के एक नहीं बल्कि कई वजह है। इनमें से US में कमजोर रोजगार डेटा, फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की कम होती उम्मीदें, सेंट्रल बैंक द्वारा लगातार सोने की खरीद, ETF में फिर से निवेश आना और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता – इन सभी ने मिलकर कीमती धातुओं की मांग को मजबूत किया है।

US में कमजोर जॉब्स डेटा से कम हुई ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें

हालिया तेजी की एक मुख्य वजह US जॉब मार्केट से आई। US ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स ने 7 अगस्त, 2026 को रिपोर्ट दी कि जुलाई में नॉन-फ़ार्म पेरोल में 23,000 की गिरावट आई, जबकि बाजार को लगभग 80,000 नई नौकरियों की उम्मीद थी। जून के आंकड़ों को भी नीचे की ओर संशोधित किया गया, जबकि मई और जून के संयुक्त संशोधनों से पहले के अनुमानों में लगभग 103,000 नौकरियों की कमी आई।

इस रिपोर्ट के आने के बाद, स्पॉट गोल्ड 2.67% बढ़कर USD 4,352.60 हो गया, जबकि चांदी 4.20% बढ़कर USD 63.97 हो गई, क्योंकि ट्रेडर्स ने सितंबर में फ़ेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें कम कर दीं।

बाजार अब सितंबर में 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना लगभग 44% मान रहा है, जबकि एक हफ्ते पहले यह संभावना 67% थी। सोने पर कोई ब्याज या डिविडेंड नहीं मिलता है, इसलिए ब्याज दरें कम रहने की उम्मीद से इस मेटल को रखने की ‘अपॉर्चुनिटी कॉस्ट’ कम हो सकती है और इसकी मांग को बढ़ावा मिल सकता है।

फेडरल रिजर्व के ब्याज दर पर फैसले पर नजर

फेडरल ओपन मार्केट कमेटी ने 29 जुलाई को अपनी बेंचमार्क ब्याज दर को 3.50% से 3.75% के दायरे में बनाए रखने के लिए 9-3 से वोट किया। हालांकि फेडरल रिजर्व ने पॉलिसी में किसी बड़े बदलाव का साफ संकेत नहीं दिया है, लेकिन कमजोर रोजगार डेटा और दरों को स्थिर रखने के फैसले ने निकट भविष्य में ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदों को कम कर दिया है।

कीमती धातुओं के लिए अगला बड़ा ट्रिगर इस सप्ताह के आखिर में आने वाला अमेरिकी महंगाई का डेटा है। कमजोर पेरोल रिपोर्ट से सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाने के लिए फेडरल रिजर्व पर दबाव कम हो सकता है, हालांकि उम्मीद से ज्यादा महंगाई दर बढ़ने की उम्मीदों को फिर से जगा सकती है और सोने-चांदी पर दबाव डाल सकती है।

सेंट्रल बैंक की रिकॉर्ड खरीदारी से सोने को मिला सहारा

कीमतों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के अलावा, सेंट्रल बैंक की मजबूत मांग ने सोने को एक मजबूत आधार दिया है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की ‘गोल्ड डिमांड ट्रेंड्स Q2 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही के दौरान सेंट्रल बैंकों की शुद्ध सोने की खरीदारी 289 टन ​​तक पहुंच गई। यह Q1 2026 के स्तर से पांच गुना अधिक और रिकॉर्ड पर दूसरी तिमाही का सबसे अधिक आंकड़ा था।

सेंट्रल बैंक की खरीदारी एक साल पहले की इसी अवधि की तुलना में 62% अधिक थी। पोलैंड के नेशनल बैंक ने Q2 के दौरान 51 टन सोना जोड़ा, जिससे उसका भंडार 632 टन हो गया, जबकि पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने 33 टन सोना जोड़ा, जो Q4 2023 के बाद से उसकी सबसे बड़ी तिमाही खरीदारी थी।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के नवीनतम सर्वेक्षण में भी सेंट्रल बैंक की मांग जारी रहने की मजबूत उम्मीदें दिखाई दीं। लगभग 89% उत्तरदाताओं को उम्मीद थी कि अगले वर्ष वैश्विक स्वर्ण भंडार में वृद्धि होगी, जबकि रिकॉर्ड 45% लोगों को उम्मीद थी कि वे अपने स्वयं के स्वर्ण भंडार में वृद्धि करेंगे।

ETF में फिर से निवेश बढ़ा

सोने को ETF की खरीदारी से भी सहारा मिला है। 20 जुलाई के बाद से एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) में कुल बुलियन होल्डिंग में 24 टन की वृद्धि हुई है, जो अप्रैल की शुरुआत के बाद से निवेश के प्रवाह की सबसे तेज गति है।

ETF की मांग में यह वापसी ऐसे समय में हुई है जब सेंट्रल बैंक की खरीदारी अधिक बनी हुई है, जिससे इस पीली धातु के लिए निवेश की मांग का एक और स्रोत मिल रहा है। संस्थागत खरीदारी और ETF में फिर से निवेश बढ़ने से कीमतों को सहारा मिला है, भले ही ऊंची कीमतों के कारण गहनों की मांग पर दबाव बना हुआ है।

ब्रोकरेज हाउस क्या दे रहे अनुमान

जेपी मॉर्गन को उम्मीद है कि सोने की कीमतें $6,000 प्रति औंस तक पहुंच सकती है। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि इस साल के आखिर तक कीमते $5,400 के स्तर पर पहुंच सकती है। वहीं मेटल फोकस का अनुमान है कि कीमतें $6,000 प्रति औंस तक पहुंच सकती है। वहीं डॉयचे बैंक, एचएसबीसी और ING जैसे कई बैंक इस कैलेंडर साल की चौथी तिमाही तक सोने की कीमत $4,600 से $4,900 के बीच रहने का अनुमान लगा रहे है।

 

MCX पर सोना ₹1.53 लाख के पार, चांदी ₹2.36 के नीचे फिसली, जानें किस कारण बढ़ी मांग

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हाईटेक चीन में ‘मान्यताओं’ से तय होते करोड़ों के प्रोजेक्ट:सरकारी से लेकर सैन्य अफसर तक परंपराओं में उलझे; सैकड़ों, हाईवे-पुल प्रभावित

चीन की युआनयांग में नए औद्योगिक पार्क और उससे जुड़ने वाले फोर-लेन हाईवे की योजना मंजूर हो चुकी थी। इंजीनियर नक्शे व बजट को अंतिम रूप दे चुके थे, पर शिलान्यास से पहले ताओवादी फेंग शुई मास्टर ने दावा किया कि प्रस्तावित मार्ग की उत्तर-पूर्व दिशा ली वेई की जन्मतिथि के अनुसार अशुभ है और इससे करिअर प्रभावित हो सकता है। इसके बाद वेई ने हाईवे का रूट बदलवा दिया। इसके लिए अतिरिक्त जमीन लेनी पड़ी। प्रोजेक्ट 14 महीने लेट हुआ और 21 करोड़ रुपए लागत बढ़ गई। इसी तरह जियांग्शी प्रांत में पुल का निर्माण 20% हो चुका था। इसी दौरान अधिकारी झेंग गुआंगझोउ ने फेंग शुई सलाहकार से परामर्श लिया। सलाहकार ने दावा किया कि पुल का पिलर क्षेत्र की कथित ‘ड्रैगन वेंस’ (प्राकृतिक ऊर्जा) को काट रहा है, जिससे झेंग को जेल हो सकती है। उन्होंने निर्माण रुकवा दिया और पिलर 50 मीटर आगे बढ़वा दिया। पहले से बने पिलर भी तोड़ने पड़े। प्रोजेक्ट दो साल तक अटका रहा और 29 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। चीन में फेंग शुई और कई मान्यताएं सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई प्रशासनिक फैसलों और ​प्रोजेक्ट को भी प्रभावित कर रही है। दिलचस्प यह है कि इन मान्यताओं का खुलकर विरोध करने वाली ‘कम्युनिस्ट पार्टी’ के अफसर और मेयर ही इनके घोर समर्थक बने हुए हैं। ​वॉल स्ट्रीट की रिपोर्ट के अनुसार इन मान्यताओं के कारण बीते एक दशक में सैकड़ों हाईवे, पुल व औद्योगिक पार्क प्रभावित हुए। नक्शे बदलने व तोड़-फोड़ से प्रोजेक्ट्स 3 से 4 साल लेट हुए। एक ही मामले में 23 में से 16 बड़े प्रोजेक्ट बीच में ही रद्द या ठप कर दिए गए। सेना को ऑडिट कराना पड़ा – चीन की सबसे संवेदनशील रॉकेट फोर्स और रक्षा तंत्र में हुई बड़ी कार्रवाई के पीछे भ्रष्टाचार के अलावा इन पारंपरिक मान्यताओं को भी बड़ी वजह बताया गया। जांच में पता चला कि कुछ वरिष्ठ अधिकारी आधुनिक सैन्य जरूरतों के बजाय ताओवादी भविष्यवाणियों (ताओ धर्म की विद्या के आधार पर अनुमान) प्राचीन ग्रंथों और गणनाओं के आधार पर फैसले ले रहे थे। इनके चलते कई रक्षा प्रोजेक्ट्स व रणनीतिक ढांचों की मंजूरी में महीनों की देरी हुई। हालात इतने गंभीर हो गए कि 2023-24 में चीन को रक्षा बजट और प्रमुख प्रोजेक्ट्स का ऑडिट कराना पड़ा। ‘अशुभ दिशा’ मानकर निवेश कम, जीडीपी औसतन 2.3% कम बोस्टन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 2000 से 2018 के बीच 300 चीनी मेयरों की जन्मतिथियों व उनकी कथित ‘अशुभ’ दिशाओं की स्टडी की। ताकि पता चल सके कि वे जन्मतिथि व मान्यताओं के आधार पर किस तरह फैसले लेते हैं। नतीजे चौंकाने वाले थे। जिन क्षेत्रों को मेयर अशुभ दिशा में मानते थे, वहां कम निवेश करते थे। इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा और उन जिलों की जीडीपी औसतन 2.3% कम रही। रोजगार व निजी निवेश भी घटे। इससे चीन को हर साल कुल जीडीपी का 0.1% का घाटा हुआ। दस साल में यह नुकसान 15 लाख करोड़ रु. रहा।

लोकतंत्र की पहली पाठशाला: छात्रसंघ चुनावों की वापसी क्यों जरूरी? जानें युवाओं की बड़ी जिम्मेदारी

Madhya Pradesh Student Union Elections 2026

“विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ नहीं गढ़ते, वे राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं।”

 

करीब नौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद मध्य प्रदेश के महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों की आहट फिर सुनाई दे रही है। कैंपस एक बार फिर जीवंत हैं- गलियारों में चुनावी नारों की गूंज है, कक्षाओं में प्रत्याशी विद्यार्थियों से संवाद कर रहे हैं, छात्र अपने भविष्य के प्रतिनिधियों पर चर्चा कर रहे हैं और पूरे परिसर का वातावरण लोकतांत्रिक ऊर्जा से भर उठा है। यह दृश्य केवल चुनावी गतिविधियों का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति की वापसी का प्रतीक है जिसकी शुरुआत शिक्षण संस्थानों से होती है।

 

मेरे लिए यह दृश्य केवल वर्तमान का अनुभव नहीं, बल्कि स्मृतियों का भी हिस्सा है। छात्र जीवन के वे दिन अनायास ही सामने आ खड़े होते हैं, जब मैं स्वयं छात्र राजनीति में सक्रिय था। वर्ष 2000 से लेकर 2017 तक छात्र राजनीति से जुड़ने एवं मार्गदर्शन करने का एक लंबा अवसर मुझे मिला। विद्यार्थियों की समस्याओं को समझना, नेतृत्व करना, संगठन बनाना, संवाद स्थापित करना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनना मेरे सार्वजनिक जीवन की ऐसी पाठशाला रही जिसने मेरे व्यक्तित्व और सोच दोनों को परिपक्व बनाया। आज यह गहराई से महसूस होता है कि छात्रसंघ चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नेतृत्व, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक संस्कारों का पहला विद्यालय हैं।

 

लोकतंत्र संसद या विधानसभा की सीढ़ियों से शुरू नहीं होता; उसकी पहली सांस विद्यालयों और महाविद्यालयों के परिसरों में चलती है। यहीं युवा मतदान का महत्व समझते हैं, भिन्न विचारों का सम्मान करना सीखते हैं, असहमति के साथ भी संवाद करने की कला विकसित करते हैं और यह अनुभव करते हैं कि नेतृत्व अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। इसी कारण छात्र राजनीति को 'लोकतंत्र की पहली पाठशाला' कहा जाता है।

 

वर्ष 2017 के बाद मध्य प्रदेश के अधिकांश महाविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। इस दौरान एक पूरी पीढ़ी कॉलेजों में आई, पढ़ाई पूरी की और आगे बढ़ गई, लेकिन उन्हें लोकतंत्र का प्रत्यक्ष अभ्यास करने का अवसर नहीं मिला। आज जो विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्ययनरत हैं, उनके लिए यह पहला अवसर होगा जब वे अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। यह केवल मतपत्र पर मुहर लगाने या बटन दबाने का अवसर नहीं, बल्कि एक सजग लोकतांत्रिक नागरिक बनने की दिशा में पहला कदम है।

 

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या रोजगार हासिल करना नहीं होता। इसका वास्तविक लक्ष्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो समाज के प्रति संवेदनशील हों, विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हों और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाने का साहस रखते हों। छात्रसंघ चुनाव इन मूल्यों को व्यावहारिक रूप से सीखने का अवसर देते हैं। यहाँ विद्यार्थी समझते हैं कि लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और सम्मानजनक असहमति की संस्कृति का नाम है।

 

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से ही की। संसद, विधानसभाओं और सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अनेक व्यक्तित्व कभी कॉलेज परिसरों में छात्र प्रतिनिधि रहे। मध्य प्रदेश भी इससे अलग नहीं है। यहाँ के छात्रसंघों ने ऐसे अनेक नेता दिए जिन्होंने आगे चलकर राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसलिए छात्रसंघ चुनावों को केवल एक वार्षिक औपचारिकता मानना उनके ऐतिहासिक महत्व को कम करके आंकना होगा।

 

समय के साथ छात्र राजनीति का स्वरूप भी बदला है। मेरे छात्र जीवन में चुनाव प्रचार पोस्टर, पर्चियों, दीवार लेखन और नुक्कड़ सभाओं तक सीमित रहता था। आज डिजिटल युग में व्हाट्सएप ग्रुप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया मंच चुनावी अभियान के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। यह परिवर्तन समय की मांग भी है और एक नया अवसर भी। इससे संवाद का दायरा व्यापक हुआ है और विद्यार्थी अपने विचार अधिक प्रभावी ढंग से रख पा रहे हैं। हालाँकि, इसके साथ ही यह जिम्मेदारी भी बढ़ी है कि डिजिटल मंच स्वस्थ बहस का माध्यम बनें- दुष्प्रचार, ट्रोलिंग और व्यक्तिगत कटाक्ष का नहीं।

 

आज की राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अनेक बार रचनात्मक विमर्श की जगह शोर और तथ्यों की जगह भावनात्मक ध्रुवीकरण हावी हो जाता है। यदि यही प्रवृत्ति छात्र राजनीति में भी प्रवेश कर गई, तो लोकतंत्र की पहली पाठशाला अपना मूल उद्देश्य खो देगी। इसलिए यह आवश्यक है कि चुनाव व्यक्तियों की लोकप्रियता से अधिक मुद्दों की गंभीरता पर आधारित हों। महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक पुस्तकालय, शोध सुविधाएं, छात्रावास, खेल, महिला सुरक्षा, दिव्यांग-अनुकूल परिसर, डिजिटल संसाधन, स्टार्टअप और कौशल विकास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि केवल अच्छे भाषण से अधिक महत्वपूर्ण एक अच्छी और व्यावहारिक कार्ययोजना होती है।

 

यह भी उतना ही आवश्यक है कि छात्र राजनीति अपनी मूल आत्मा को सुरक्षित रखे। राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रेरणा लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हो सकती है, लेकिन छात्रसंघों की प्राथमिकता सदैव 'छात्रहित' ही रहनी चाहिए। यदि चुनाव धनबल, बाहुबल, जातीय ध्रुवीकरण या व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का माध्यम बनेंगे, तो उनका शैक्षणिक और लोकतांत्रिक उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन, राज्य सरकार, छात्र संगठनों और स्वयं विद्यार्थियों की यह साझा जिम्मेदारी है कि चुनाव मर्यादित, शांतिपूर्ण और विचार-केंद्रित हों।

 

छात्रसंघ के निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए भी यह अवसर केवल विजय प्राप्त करने का नहीं, बल्कि विद्यार्थियों का विश्वास अर्जित करने का है। उनका प्रमुख दायित्व प्रशासन और विद्यार्थियों के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करना, समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक पहल करना और परिसर में सकारात्मक शैक्षणिक वातावरण बनाए रखना है। नेतृत्व का वास्तविक अर्थ लोकप्रियता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और सेवा भाव है। यदि यह भावना छात्र जीवन में ही विकसित हो जाए, तो वही युवा भविष्य में समाज और राष्ट्र को बेहतर नेतृत्व प्रदान करेंगे।

 

मध्य प्रदेश में प्रस्तावित छात्रसंघ चुनाव इसलिए केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि वे लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना का सुनहरा अवसर हैं। नौ वर्षों के बाद लौटती यह चुनावी हलचल केवल पोस्टरों, नारों और मतदान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; यह विचारों के पुनर्जागरण, संवाद की पुनर्स्थापना और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी का उत्सव बननी चाहिए।

 

आज आवश्यकता इस बात की है कि विद्यार्थी चुनाव को अधिकार नहीं बल्कि दायित्व के रूप में देखें, उम्मीदवार पद को नहीं बल्कि सेवा को अपना संकल्प समझें, और विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव को महज औपचारिकता न मानकर लोकतांत्रिक संस्कृति के उत्सव के रूप में संचालित करे। यदि ऐसा हुआ, तो यह केवल छात्रसंघ चुनावों की वापसी नहीं होगी, बल्कि लोकतंत्र की उस आत्मा का पुनर्जन्म होगा जो शिक्षा संस्थानों से होकर पूरे समाज तक प्रवाहित होती है। इतिहास गवाह है- जब विश्वविद्यालयों में विचार जागते हैं, तब केवल परिसर ही नहीं जागते; समाज जागता है, राजनीति परिपक्व होती है और राष्ट्र का भविष्य एक नई व सही दिशा प्राप्त करता है।

VIDEO: ‘शुद्ध पेट्रोल तुम्हारे बाप के यहां से आएगा….’; एथेनॉल विवाद पर BJP सांसद जनार्दन मिश्रा का विवादित बयान

Ethanol-Petrol Controversy: देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को लेकर जारी विवाद के बीच मध्य प्रदेश के रीवा से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद जनार्दन मिश्रा ने रविवार (9 अगस्त) को इस पॉलिसी के बचाव में विरोधियों पर निशाना साधते हुए एक विवादित टिप्पणी की। रीवा से भोपाल और कोलकाता के लिए ‘नई उड़ान’ सेवाओं के उद्घाटन के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते मिश्रा ने कहा कि भारत में केवल 20 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन होता है। जबकि 80 प्रतिशत तेल विदेश से आयात करना पड़ता है। इस दौरान एथेनॉल-ब्लेंडिंग नीति का बचाव करते हुए बीजेपी सांसद ने विवादित बयान देते हुए कहा कि शुद्ध पेट्रोल तुम्हारे बाप के यहां से आएगा जब देश में शुद्ध पेट्रोल है ही नहीं…।

वैश्विक परिस्थितियों का हवाला देते हुए बीजेपी सांसद मिश्रा ने कहा कि तेल आपूर्ति के लिए जहाजों को 18,000 किलोमीटर के करीब अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। उन्होंने कहा, “ऐसी परिस्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की बात करते हैं तो कुछ लोग विरोध में आंदोलन करने लगते हैं।” उन्होंने आक्रामक अंदाज में बघेली भाषा में कहा, “आंदोलन हो रहा है एथेनॉल नहीं चलेगा, शुद्ध पेट्रोल चलेगा। शुद्ध पेट्रोल तुम्हारे बाप के घर से आएगा? शुद्ध पेट्रोल है ही नहीं देश में तो कहां से आएगा?”

एथेनॉल से चलने वाले वाहनों का समर्थन किया

मिश्रा ने कहा कि भारत में वाहन एथेनॉल-ब्लेंडिंग ईंधन से चल सकते हैं। लेकिन कुछ लोग एथेनॉल के इस्तेमाल का विरोध करते हुए इसे पेट्रोल में नहीं मिलाने की बात कह रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, “एथेनॉल नहीं बनेगा तो पेट्रोल कहां से आएगा, डीजल कहां से आएगा?” पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि ब्राजील में तो गाडियां 100 प्रतिशत एथेनॉल से चल रहीं। लेकिन इसके बावजूद वहां वाहनों में ऐसी कोई समस्या नहीं है। मिश्रा पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने के सरकार के लक्ष्य का बचाव कर रहे थे।

उन्होंने जनता को याद दिलाया कि ब्राजील दुनिया में सबसे ज्यादा एथेनॉल का उत्पादन करता है। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि वहां 100 फीसदी एथेनॉल से गाड़ियां चल रही हैं। अक्सर अपनी विवादित टिप्पणियों के लिए सुर्खियों में रहने वाले मिश्रा ने कहा कि भारत में भी विशेषज्ञों की राय है कि एथेनॉल से गाड़ियों के इंजन को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। लेकिन इसके बावजूद बेवजह विरोध किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि आज दुनिया में सबसे कम महंगाई और सबसे अधिक रोजगार कहीं है तो वह भारत में है।

एथेनॉल पर बहस तेज

मिश्रा की ये बातें केंद्र के इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर चल रही बहस के बीच आई हैं। इस बहस में मुख्य रूप से गाड़ियों की कम्पैटिबिलिटी, फ्यूल एफिशिएंसी और ग्राहकों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं। सरकार E20 पेट्रोल को बढ़ावा दे रही है। इसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल होता है। यह कदम कच्चे तेल के आयात को कम करने और देश में बने वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की कोशिशों का हिस्सा है।

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केंद्र का कहना है कि E20 की टेस्टिंग और फील्ड अनुभव से इंजन में असामान्य टूट-फूट, जंग लगने या गाड़ी की उम्र कम होने का कोई सबूत नहीं मिला है। मिश्रा ने बायोगैस और CNG जैसे वैकल्पिक ईंधन के लिए सरकार की व्यापक कोशिशों का भी समर्थन किया। साथ ही हवाई कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए उठाए गए कदमों पर भी जोर दिया। फिलहाल, उनका वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। विपक्षी पार्टियां भगवा पार्टी पर हमलावर हैं।

बिहार की सीमा के पास नेपाल के गंडकी में लीगल हुआ गांजा, जानें क्या हैं नियम

नेपाल के गंडकी प्रांत ने देश में पहली बार भांग की नियंत्रित खेती और मेडिकल इस्तेमाल को कानूनी मंजूरी दी है। इस फैसले के तहत लाइसेंस वाली कंपनियां और स्थानीय किसान सरकार की कड़ी निगरानी में भांग की खेती कर सकेंगे। इसके लिए एक तय नियम और व्यवस्था बनाई गई है। भांग का पौधा इस इलाके के पहाड़ी क्षेत्रों में पहले से ही प्राकृतिक रूप से उगता है।

नए कानून के तहत भांग से दवाइयां, जरूरी तेल और औद्योगिक काम में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल तैयार किया जा सकेगा। हालांकि, इसके लिए फसल में टेट्राहाइड्रोकैनाबिनोल यानी टीएचसी की मात्रा 0.3 प्रतिशत की अंतरराष्ट्रीय तय सीमा के भीतर होनी जरूरी है। वहीं, निजी इस्तेमाल के लिए भांग उगाना और बिना अनुमति के घर पर इसकी खेती करना अभी भी गैरकानूनी रहेगा। नियमों का पालन नहीं करने वाली भांग की फसल को नष्ट करना जरूरी होगा। इस कानून के जरिए गंडकी प्रांत ने भांग की खेती को एक नियंत्रित और कानूनी ढांचे के तहत लाने की पहल की है।

भांग की खेती को लेकर पुराना कानून बना चुनौती

नेपाल में कई दशकों तक भांग पर पूरी तरह रोक लगी रही। 1970 के दशक के आखिर में अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद देश में भांग की खेती और कारोबार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इससे नेपाल का मशहूर भांग पर्यटन भी लगभग खत्म हो गया। अब गंडकी प्रांत के नीति बनाने वाले लोग नियंत्रित तरीके से भांग की खेती को आर्थिक विकास का एक जरिया मान रहे हैं। उनका मानना है कि कम उपयोग वाली या बंजर जमीन पर भांग की व्यावसायिक खेती शुरू की जा सकती है। इससे गांवों में रोजगार के नए मौके पैदा होंगे, युवाओं को स्थानीय स्तर पर काम मिल सकेगा और उन्हें दूसरे शहरों या देशों में जाने से रोकने में मदद मिल सकती है।

प्रांत की योजना भांग से जुड़े मेडिकल और औद्योगिक बाजारों के लिए उत्पाद तैयार करने की है। इन बाजारों में भांग से बने उत्पादों की मांग ज्यादा होने की उम्मीद है। हालांकि, इस फैसले के सामने एक बड़ी कानूनी चुनौती भी है। गंडकी का प्रांतीय कानून लाइसेंस लेकर भांग की व्यावसायिक खेती की अनुमति देता है, जबकि नेपाल का राष्ट्रीय नशीले पदार्थों से जुड़ा कानून भांग रखने और उसके कारोबार को अपराध मानता है। ऐसे में प्रांतीय कानून और राष्ट्रीय कानून के बीच तालमेल बनाना जरूरी होगा। यही तय करेगा कि गंडकी की भांग नीति लंबे समय तक किस तरह लागू हो पाएगी और इसके लिए कानूनी व्यवस्था कितनी मजबूत बनती है।

खेती करने वालों के लिए सख्त नियम

गंडकी प्रांत के नए कानून में भांग की खेती को लेकर कई सख्त नियम बनाए गए हैं। इनका मकसद भांग के गलत इस्तेमाल को रोकना और खेती से मिलने वाली फसल की गुणवत्ता पर नजर रखना है।

  • खेती की न्यूनतम सीमा: भांग की खेती का लाइसेंस केवल रजिस्टर्ड कंपनियों या कम से कम दो रोपनी जमीन पर खेती करने वाले किसानों को दिया जाएगा।
  • खरीद का समझौता जरूरी: लाइसेंस की अंतिम मंजूरी से पहले आवेदकों को किसी रजिस्टर्ड दवा कंपनी या औद्योगिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी के साथ आधिकारिक सप्लाई समझौता जमा करना होगा। यानी किसान या कंपनी को पहले से यह बताना होगा कि तैयार फसल किसे बेची जाएगी।
  • तय इलाकों में ही खेती: भांग की व्यावसायिक खेती हर जगह नहीं की जा सकेगी। इसके लिए कुछ खास इलाकों को चुना जाएगा। इन जगहों का चयन मिट्टी की उपयुक्तता, सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी में आसानी जैसे आधारों पर किया जाएगा।

बिहार के साथ सीमा पार असर

गंडकी की इस नई नीति का असर सीमा से जुड़े इलाकों में भी देखने को मिल सकता है। गंडकी की दक्षिणी सीमा भारत के बिहार राज्य से जुड़ी है। यह सीमा बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में वाल्मीकिनगर बॉर्डर के पास है। बिहार में शराब पर पूरी तरह रोक है। इसी वजह से सीमा पर सुरक्षा एजेंसियां गैरकानूनी सामान की आवाजाही पर कड़ी नजर रखती हैं।

हालांकि, गंडकी का नया कानून मुख्य रूप से दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और औद्योगिक हेम्प की नियंत्रित खेती के लिए बनाया गया है। इसके बावजूद, खुली सीमा को देखते हुए दोनों देशों की सुरक्षा और कानून लागू करने वाली एजेंसियां निगरानी बढ़ा सकती हैं। खास तौर पर यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि कानूनी तरीके से तैयार की जाने वाली भांग या उससे जुड़े उत्पादों की सप्लाई किसी तरह गैरकानूनी बाजार तक न पहुंचे। इससे सीमा पार तस्करी और गैरकानूनी कारोबार को रोकने में मदद मिल सकती है।

कश्मीरी पंडितों को फिर आतंकी धमकी! LeT से जुड़े टेरर ग्रुप ने जारी की हिट लिस्ट, घाटी के बाहर भी हमले की चेतावनी

लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक आतंकी संगठन ने कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारियों को धमकी दी है। सीएनएन-न्यूज18 के मनोज गुप्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, संगठन ने एक नया धमकी भरा नोट जारी किया है, जिसमें कुछ कर्मचारियों की निजी जानकारी साझा की गई है। साथ ही, कश्मीर घाटी और जम्मू में उन्हें निशाना बनाकर हमले करने की चेतावनी दी गई है। यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल यानी यूएलसी को भारतीय खुफिया एजेंसियां लश्कर-ए-तैयबा का एक छद्म संगठन मानती हैं। यूएलसी ने कश्मीरी पंडित अधिकारियों की एक कथित ‘हिट लिस्ट’ जारी की है। इसमें छह सरकारी कर्मचारियों के नाम और फोन नंबर शामिल हैं।

यह धमकी खास तौर पर उन कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को दी गई है, जो सरकारी रोजगार योजनाओं के तहत काम कर रहे हैं। संगठन ने यह भी धमकी दी है कि अगर आतंकियों और उनके समर्थकों की संपत्तियों को जब्त या कुर्क किया गया, तो सुरक्षा बलों और प्रशासन के खिलाफ कड़ी जवाबी कार्रवाई की जाएगी।

‘हिट लिस्ट’ में कश्मीरी पंडित कर्मचारी

धमकी भरे नोट में दावा किया गया है कि संगठन सरकारी विभागों पर नजर रख रहा है। इनमें खास तौर पर राजस्व विभाग शामिल है, जहां सरकारी पैकेज के तहत कई कश्मीरी पंडित कर्मचारी तैनात हैं। नोट में छह कश्मीरी पंडित सरकारी कर्मचारियों के नाम और फोन नंबर भी दिए गए हैं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इस तरह निजी जानकारी सार्वजनिक करने का मकसद कर्मचारियों में डर पैदा करना और उन्हें संभावित टारगेट के रूप में पहचानना हो सकता है। हालांकि, सीएनएन-न्यूज18 ने सुरक्षा कारणों से धमकी में शामिल कर्मचारियों के नाम और उनके संपर्क नंबर सार्वजनिक नहीं किए हैं।

घाटी से जम्मू जाने पर भी हमले की धमकी

संगठन ने कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को चेतावनी दी है कि अगर वे कश्मीर घाटी से जम्मू चले भी जाते हैं, तो वे पूरी तरह सुरक्षित नहीं होंगे। धमकी में कहा गया है कि उन्हें कश्मीर के बाहर भी निशाना बनाया जा सकता है। संगठन ने प्रवासी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के लिए दी जा रही प्रशासनिक सुविधाओं का भी विरोध किया है। इनमें घर से काम करने और दूर रहकर काम करने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। संगठन ने ऐसी सुविधाएं जारी रखने पर भी धमकी दी है।

एलजी, डीजीपी और केंद्र को खुली चेतावनी

धमकी भरे नोट में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल (एलजी), पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और दिल्ली में मौजूद अधिकारियों को भी चेतावनी दी गई है। संगठन ने दावा किया है कि भविष्य में होने वाले हमलों के दौरान वह लोगों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं करेगा। नोट के एक अन्य हिस्से में स्थानीय पुलिस को लेकर भी धमकी दी गई है। इसमें दावा किया गया है कि 90 प्रतिशत से ज्यादा स्थानीय पुलिसकर्मी स्थानीय इलाकों में ही रहते और आते-जाते हैं। संगठन ने इसी आधार पर पुलिसकर्मियों पर कहीं भी और कभी भी हमले का खतरा बताया है।

लश्कर ‘शैडो फ्रंट’ के जरिए करता है काम: खुफिया सूत्र

भारत के वरिष्ठ खुफिया सूत्रों ने सीएनएन-न्यूज18 को बताया कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन कई बार अलग-अलग नामों से बने ‘शैडो फ्रंट’ के जरिए काम करते हैं। इनमें द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ), यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (यूएलसी) और पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट (पीएएफएफ) जैसे नाम शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक, इन संगठनों का इस्तेमाल खास तौर पर आम लोगों और धार्मिक समुदायों के खिलाफ होने वाले हमलों की जिम्मेदारी लेने के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य इन हमलों को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के बजाय किसी स्थानीय और धर्मनिरपेक्ष प्रतिरोध के रूप में पेश करना हो सकता है। खुफिया सूत्रों का कहना है कि ऐसे प्रॉक्सी संगठनों के जरिए आतंकी संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली जांच और आतंकवाद के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों से बचने की कोशिश भी करते हैं। इनमें फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की निगरानी और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध शामिल हैं।

कर्मचारियों का डेटा जारी करना सोची-समझी साजिश

खुफिया जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत भर्ती किए गए कर्मचारियों के नाम, फोन नंबर और उनकी तैनाती की जगहों की जानकारी सार्वजनिक करना एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि इस जानकारी का इस्तेमाल इन कर्मचारियों को डराने या उन्हें निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। सुरक्षा एजेंसियों ने यह भी पाया है कि ‘हाइब्रिड आतंकियों’ द्वारा की जाने वाली लक्षित हत्याओं में छोटे और आसानी से छिपाए जा सकने वाले हथियारों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इनमें पिस्तौल और रिवॉल्वर जैसे हथियार शामिल हैं। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, हाइब्रिड आतंकी ऐसे लोग होते हैं जो सामान्य नागरिकों की तरह अपनी नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी जीते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। ऐसे लोगों का इस्तेमाल खास लोगों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ाई गई

सरकारी कर्मचारियों को मिल रही धमकियों और आतंकवादियों की मदद करने वालों की संपत्ति जब्त किए जाने के बाद सामने आई धमकियों को देखते हुए सुरक्षा बलों ने प्रवासी कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ा दी है। उनके रहने की जगहों के आसपास निगरानी भी बढ़ा दी गई है। सुरक्षा एजेंसियां कर्मचारियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए सुरक्षित रास्ते तय कर रही हैं। इसके साथ ही, कर्मचारियों की निजी जानकारी ऑनलाइन साझा करने वाले आतंकी गुटों के खिलाफ खुफिया जानकारी के आधार पर अभियान भी तेज किए गए हैं। इन अभियानों का मकसद ऐसे आतंकी नेटवर्क और उनके मददगारों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करना है।

‘Fine Shyt’ रिलीज होते ही विवादों में Guru Randhawa! ऑफिस में महिलाओं के डांस पर क्यों उठे सवाल?

पंजाबी सिंगर गुरु रंधावा एक बार फिर अपने नए म्यूजिक वीडियो को लेकर चर्चा में हैं। उनका नया गाना ‘Fine Shyt’ रिलीज होने के कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गया है। जहां कुछ यूजर्स ने गाने के म्यूजिक और कोरियोग्राफी को लेकर नाराजगी जताई, वहीं कई लोगों ने वीडियो के कॉन्सेप्ट पर सवाल उठाए हैं। खासतौर पर कॉरपोरेट ऑफिस में महिला कर्मचारियों के तौर पर दिखाए गए कलाकारों को गुरु रंधावा के किरदार के आसपास डांस करते हुए दिखाने को लेकर आपत्ति जताई जा रही है।

कॉरपोरेट ऑफिस में दिखाया गया है पूरा सेटअप

‘Fine Shyt’ का म्यूजिक वीडियो एक कॉरपोरेट ऑफिस के माहौल में फिल्माया गया है। वीडियो में Guru Randhawa एक सीनियर प्रोफेशनल के किरदार में नजर आते हैं। वहीं, कई महिला कलाकार ऑफिस कर्मचारियों के रूप में दिखाई देती हैं, जो उनके किरदार के आसपास डांस और परफॉर्म करती नजर आती हैं।

वीडियो के इसी सेटअप ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी। आलोचना करने वाले यूजर्स का कहना है कि गाने में डांस और ग्लैमर दिखाना अलग बात है, लेकिन कामकाजी महिलाओं को उनके वर्कप्लेस के संदर्भ में इस तरह पेश करना एक अलग संदेश देता है।

वीडियो में Disclaimer भी, लेकिन विवाद नहीं थमा

वीडियो की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर दिया गया है। इसमें बताया गया है कि वीडियो में दिखाई देने वाले सभी लोग 18 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और वीडियो में दिखाए गए घटनाक्रम काल्पनिक हैं। इसके अलावा दर्शकों को मजाकिया अंदाज में चेतावनी दी गई है कि वे वीडियो में दिखाए गए डांस मूव्स को अपने ऑफिस में दोहराने की कोशिश न करें। ऐसा करने पर HR की कार्रवाई या बैन का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इस डिस्क्लेमर के बावजूद सोशल मीडिया पर वीडियो के कॉन्सेप्ट को लेकर सवाल उठते रहे।

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Instagram पर वायरल हुई आलोचना

Instagram यूजर @sohasyap ने वीडियो का एक हिस्सा शेयर करते हुए इसकी आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्हें वीडियो में महिलाओं के डांस या उनके कॉस्ट्यूम से परेशानी नहीं है, बल्कि आपत्ति इस बात पर है कि उन्हें कामकाजी महिलाओं के रूप में एक पुरुष के आसपास डांस करते हुए क्यों दिखाया गया।

पोस्ट में यह सवाल भी उठाया गया कि इस तरह का कॉन्सेप्ट ऑफिस सेटिंग में रखने की जरूरत क्या थी। यूजर के मुताबिक, इसी तरह की एनर्जी और डांस को किसी अलग, एस्थेटिक सेट पर भी फिल्माया जा सकता था।

लड़कियों को नहीं, कॉन्सेप्ट को जिम्मेदार ठहराएं

वीडियो का बचाव करने वाले लोगों की प्रतिक्रियाओं के बाद Instagram यूजर ने अपनी बात विस्तार से स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना वीडियो में काम कर रही महिला कलाकारों के खिलाफ नहीं है।

उनका कहना था कि ये महिलाएं अपने काम के लिए वीडियो का हिस्सा बनी हैं और इसलिए निशाना कलाकारों को नहीं, बल्कि वीडियो के कॉन्सेप्ट और उसे बनाने वाली टीम को बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि गुरु रंधावा एक बड़े कलाकार हैं और उनके म्यूजिक वीडियो बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचते हैं। ऐसे में वीडियो में दिखाई जाने वाली चीजें किसी न किसी तरह दर्शकों पर प्रभाव डाल सकती हैं।

विदेशी कलाकारों पर सवाल क्यों नहीं?’

अपनी सफाई में Instagram यूजर ने उन लोगों को भी जवाब दिया जिन्होंने इसे संकीर्ण सोच का मामला बताया था। उन्होंने कहा कि उनका सवाल ग्लोबल या विदेशी कलाकारों द्वारा किए जाने वाले ऐसे कंटेंट से अलग नहीं है।

उनका तर्क था कि अगर किसी वीडियो में महिलाओं को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह चर्चा का विषय बन सकता है तो कलाकार चाहे कोई भी हो, उस पर सवाल उठाना गलत नहीं है।

सोशल मीडिया पर गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी भी निशाने पर

‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया पर सिर्फ वीडियो की थीम ही चर्चा में नहीं रही। कई यूजर्स ने गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी को लेकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। एक यूजर ने गाने को सीधे तौर पर ‘Noise Pollution’ बताया। वहीं एक अन्य यूजर ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि आलोचना के बावजूद यह गाना सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर सकता है और जल्द ही इस पर बड़ी संख्या में डांस रील्स देखने को मिल सकती हैं। एक अन्य कमेंट में गाने को लेकर व्यंग्य किया गया, जबकि एक हिंदी कमेंट में यूजर ने गाना सुनने के बाद अपनी नाराजगी बेहद मजाकिया अंदाज में जाहिर की।

‘गुरु रंधावा इस्तीफा दोकमेंट ने खींचा ध्यान

बहस के बीच एक यूजर ने ‘गुरु रंधावा इस्तीफा दो’ लिखकर कमेंट किया। यह टिप्पणी हालिया छात्र प्रदर्शनों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जोड़कर की गई थी।

यानी एक म्यूजिक वीडियो पर शुरू हुई बहस में सोशल मीडिया यूजर्स ने राजनीतिक तंज का एंगल भी जोड़ दिया।

डांस स्टाइल को लेकर भी यूजर्स ने साधा निशाना

कुछ लोगों ने वीडियो की कोरियोग्राफी पर भी सवाल उठाए। एक यूजर ने तंज करते हुए कहा कि गुरु रंधावा के लिए डांस का मतलब शायद सिर्फ एक खास तरह के बोल्ड या अजीब स्टेप्स रह गया है।

वहीं एक अन्य यूजर ने वीडियो की ऑफिस सेटिंग को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उसके मुताबिक, वर्कप्लेस को इस तरह के चित्रण से जोड़ना उचित नहीं है और वीडियो बनाने वालों ने आलोचना की असली वजह को समझने के बजाय सिर्फ उम्र और किरदार से जुड़े सवालों पर ध्यान दिया।

कामकाजी महिलाओं की ऐसी तस्वीर क्यों?’

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने इस विवाद को महिलाओं के रोजगार और समाज में उनकी स्थिति से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।

उसका कहना था कि महिलाओं को आज भी घर से बाहर निकलकर निजी कंपनियों में काम करने को लेकर कई तरह की सामाजिक पाबंदियों और सवालों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में लोकप्रिय म्यूजिक वीडियो में ऑफिस जाने वाली महिलाओं को इस तरह दिखाना उन धारणाओं को और मजबूत कर सकता है जिनसे कामकाजी महिलाएं पहले से जूझ रही हैं।

विवाद के बीच असली सवाल कॉन्सेप्ट पर

‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया की बहस ने गाने से ज्यादा उसके विजुअल प्रेजेंटेशन को चर्चा में ला दिया है। जहां कुछ यूजर्स इसे महज मनोरंजन और म्यूजिक वीडियो का हिस्सा मान रहे हैं, वहीं आलोचकों का कहना है कि बड़े कलाकारों के कंटेंट का व्यापक प्रभाव होता है।

फिलहाल, गुरु रंधावा के ‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी है। किसी को गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी पसंद नहीं आई, तो किसी ने ऑफिस सेटिंग में महिलाओं की प्रस्तुति को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं कुछ यूजर्स इसे सिर्फ एक काल्पनिक म्यूजिक वीडियो मानते हुए आलोचना को जरूरत से ज्यादा बता रहे हैं।

14 महीने तक किसी को नहीं हुआ शक, दो कंपनियों में चुपचाप करता रहा नौकरी; लेकिन मर्जर ने ऐसा फंसाया कि अब समझ नहीं आ रहा क्या करे!