ग्लो झील ने रचा इतिहास! अरुणाचल प्रदेश को मिली पहली रामसर साइट

अरुणाचल प्रदेश के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है। राज्य के लोहित जिले में ग्लो झील को भारत की 101वीं रामसर साइट का दर्जा मिला है। यह उपलब्धि राज्य के लिए बेहद खास मानी जा रही है और इससे अरुणाचल प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

ग्लो झील (Glow Lake)

1600x900 Wallpapers - Wallpaper Cave

अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित ग्लो झील को रामसर साइट घोषित किया गया है। यह राज्य की पहली वेटलैंड है, जिसे रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। यह उपलब्धि अरुणाचल प्रदेश के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रामसर साइट बनने का मतलब है कि यह झील पर्यावरण और जैव-विविधता के लिहाज से बेहद खास है। अब इस प्राकृतिक धरोहर की सुरक्षा और संरक्षण पर पहले से ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। इससे आने वाले समय में झील को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

 

रामसर साइट (Ramsar Site)

Glow Lake - A Unique Destination With Friendly Atmosphere

रामसर साइट उन वेटलैंड यानी आर्द्रभूमियों को कहा जाता है, जिनका पर्यावरण और बायोडाइवर्सिटी के लिए विशेष महत्व होता है। इन जगहों को इंटरनेशनल लेवल पर संरक्षण के लिए चुना जाता है। ऐसी जगहों पर कई दुर्लभ पौधे, पक्षी और वन्यजीव रहते हैं। साथ ही ये जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। इसलिए इनकी सुरक्षा पूरी दुनिया के लिए जरूरी मानी जाती है।

 

मीठे पानी की झील (Freshwater lake)

Switzerland Desktop Wallpapers - Top Free Switzerland Desktop Backgrounds - WallpaperAccess

ग्लो झील ऊंचाई पर मीठे पानी की झील है। इसमें पहाड़ों से निकलने वाली बारहमासी जलधाराओं का साफ पानी आता है। झील चारों ओर से घने जंगलों और प्राकृतिक हरियाली से घिरी हुई है, जिससे यहां का वातावरण बेहद शांत और सुंदर दिखाई देता है। इस इलाके में 150 से ज्यादा तरह के पेड़ और 49 प्रकार के ऑर्किड पाए जाते हैं। यही वजह है कि इसे पूर्वी हिमालय का एक बायोडाइवर्सिटी हॉटस्पॉट माना जाता है।

 

पर्यावरण के लिए जरूरी (Importance for Environment)

Mountains Canyons Frozen Lakes Bolzano Italy 5K Preview | 10wallpaper.com

ग्लो झील केवल एक खूबसूरत टूरिस्ट डेस्टिनेशन नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी जरुरी है। यह झील पानी को सुरक्षित रखने, आसपास की नदियों में जल प्रवाह बनाए रखने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। इसके अलावा यह कार्बन को संग्रहित करने में भी भूमिका निभाती है, जिससे जलवायु परिवर्तन के इफेक्ट को कम करने में मदद मिलती है। साइंटिस्ट भी इस झील को महत्वपूर्ण मानते हैं।

 

लोगों और टूरिस्म को फायदा (Benefits for Local Communities and Tourism)

रामसर साइट का दर्जा मिलने के बाद इस एरिया में इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे देश-विदेश से ज्यादा टूरिस्ट यहां आ सकते हैं, जिससे यहां के लोगों को रोजगार और आय के नए अवसर मिलेंगे। लोकल आदिवासी समुदाय अपनी संस्कृति और प्राकृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए टूरिस्म से जुड़ सकेंगे। इससे इलाके का डेवेलप भी होगा और लोगों की आजीविका भी बेहतर होगी।

संरक्षण और रिसर्च (Conservation and Research)

रामसर साइट बनने के बाद ग्लो झील के संरक्षण के लिए विशेष प्रबंधन योजनाएं तैयार की जाएंगी। इसके साथ ही इस क्षेत्र को बेहतर कानूनी सुरक्षा और इंटरनेशनल एक्सपर्ट की टेक्निकल सलाह भी मिल सकेगी। भविष्य में यहां साइंटिस्ट रिसर्च, पर्यावरण अध्ययन और बायोडाइवर्सिटी पर निगरानी के लिए फंड मिलने की संभावना भी बढ़ जाएगी।

 

प्राकृतिक धरोहर की रक्षा (Protection of natural heritage)

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू (Pema Khandu) ने ग्लो झील को रामसर साइट का दर्जा मिलने पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि यह राज्य के लिए गर्व की बात है और इससे बायोडाइवर्सिटी कंजर्वेशन को नई मजबूती मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस उपलब्धि से पर्यावरण संरक्षण के साथ ही आने वाली जनरेशन भी राज्य की इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर की रक्षा के लिए प्रेरित होंगी।

योगी सरकार की गो संरक्षण नीति से निकला गो सेवा के साथ रोजगार का नया रास्ता

Yogi Janata darshan

Yogi government cow conservation policy: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गो संरक्षण नीति ने उत्तर प्रदेश में गो सेवा को रोजगार और उद्यमिता के नए मॉडल में बदल दिया है। यह व्यवस्था अब स्वरोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों के कारोबार का मजबूत आधार बन रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से बड़े उद्यमी, इंजीनियर, सामाजिक संस्थाएं व अन्य लोग भी गो संरक्षण के क्षेत्र में उतर कर देसी गायों पर आधारित उत्पादों के जरिए नई आर्थिक संभावनाएं तैयार कर रहे हैं। यही कारण है कि प्रदेश में गो सेवा के साथ रोजगार का नया रास्ता खुला है।

 

प्रदेश में देसी गायों के पंचगव्य, आयुर्वेदिक औषधियों, जैविक उत्पादों और पारंपरिक खाद्य सामग्री की मांग लगातार बढ़ी है। इन उत्पादों का बाजार अब केवल अपने प्रदेश या देश तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, दुबई और यूरोप के कई देशों तक फैल चुका है। गो आधारित उद्योगों के विस्तार से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला है और ग्रामीण क्षेत्रों में आय के नए स्रोत तैयार हुए हैं।

योगी सरकार की नीति से बदली तस्वीर

उत्तर प्रदेश में गो संरक्षण को लेकर सरकार की नीति ने इस क्षेत्र की तस्वीर बदल दी है। गोवंश संरक्षण को जैविक खेती, स्वरोजगार, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण उद्योग और स्वदेशी उत्पादों से जोड़ने का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। देसी नस्ल की गायों पर आधारित मॉडल में दूध, घी, गोमूत्र अर्क, पंचगव्य औषधियां, जैविक खाद, हर्बल उत्पाद और अन्य वैल्यू एडेड वस्तुओं के उत्पादन को बढ़ावा मिला है। इससे गोशालाएं केवल आश्रय स्थल नहीं रहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधि के केंद्र के रूप में भी उभर रही हैं।

 

बदलती उपभोक्ता पसंद और प्राकृतिक उत्पादों की मांग ने भी इस क्षेत्र को नई ताकत दी है। A2 दूध, बिलौना घी और पंचगव्य आधारित उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता ने उद्यमियों को आकर्षित किया है। कई संस्थाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंच बन रही है। इससे उत्तर प्रदेश के गो आधारित उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचने लगे हैं।

सीएम योगी की प्रेरणा से सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने गाजियाबाद में चुना नया रास्ता

करीब डेढ़ दशक तक विदेशी कंपनियों के लिए काम करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर असीम रावत ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से गो संरक्षण के क्षेत्र में कदम रखा। गाजियाबाद स्थित उनकी संस्था ‘हेता ऑर्गेनिक’ आज देसी गायों के संरक्षण के साथ करीब 10 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार कर रही है। यह संस्था केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि वृद्ध गोवंश को भी आश्रय देती है और उनकी नियमित देखभाल करती है।

 

यहां देशी गायों के दूध से 150 से अधिक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनमें A2 बिलौना घी, ब्राह्मी घृत, पंचगव्य घृत, देसी गाय का दूध, कुकीज, लड्डू, शतधौत घृत, हेल्दी मिठाइयां, स्नैक्स, हर्बल चाय, पेय पदार्थ तथा स्किन और हेयर केयर उत्पाद शामिल हैं। असीम रावत का उदाहरण बताता है कि योगी सरकार की प्रेरणा और नीति-समर्थन से गो संरक्षण को आधुनिक प्रबंधन और बाजार के साथ जोड़कर बड़े कारोबार में बदला जा सकता है।

वाराणसी में सुरभि शोध संस्थान बना गो सेवा और आजीविका का केंद्र

वाराणसी स्थित सुरभि शोध संस्थान भी इस दिशा में बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। कारोबारी एवं समाजसेवी सूर्यकांत जालान की गोशालाएं लखनऊ, वाराणसी, मीरजापुर, दिल्ली सहित कई स्थानों पर संचालित हैं। यहां 28,000 से अधिक गोवंश हैं। यहां गोबर और गोमूत्र का उपयोग जैविक खेती और विभिन्न उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।

 

संस्थान ने एक हजार से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया है। यहां काम करने वाले लोग गो आश्रय स्थलों में रहकर गो सेवा के साथ अपनी आजीविका भी चला रहे हैं। यह मॉडल बताता है कि गो संरक्षण को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ बड़े पैमाने पर रोजगार और उत्पादन से भी जोड़ा जा सकता है।

बुलंदशहर के पर्यावरण इंजीनियर ने खड़ा किया सफल मॉडल

बुलंदशहर निवासी पर्यावरण इंजीनियर पराग गौड़ भी गो संरक्षण के क्षेत्र में सफल उद्यमी के रूप में उभरे हैं। लगभग 70 देसी गायों के माध्यम से वे दूध, घी, विशेष प्रकार के च्यवनप्राश समेत अन्य उत्पाद तैयार करते हैं। उनका सालाना कारोबार करीब सवा करोड़ रुपये का है। इस उद्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा हुआ है और गो आधारित उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। यह मॉडल इस बात का उदाहरण है कि गो सेवा, स्वदेशी परंपरा और ग्रामीण उद्यमिता को एक साथ जोड़कर आर्थिक सफलता हासिल की जा सकती है।

योगी सरकार का जोर देसी नस्ल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर

गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि योगी सरकार उन्नत और उच्च उत्पादकता वाली देसी नस्ल की गायों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रोत्साहन दे रही है। उनका कहना है कि गो संरक्षण को आजीविका, जैविक/प्राकृतिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़कर राज्य में नए अवसर पैदा किए जा रहे हैं। इससे गो सेवा के साथ रोजगार और उद्यमिता के नए रास्ते खुल रहे हैं।

वह बाघिन जिसने 3 राज्यों के जंगल पार कर बदल दी भारत के वन्यजीव संरक्षण की कहानी | Tigress Zeenat

भारत में हजारों बाघ हैं, लेकिन कुछ बाघ अपनी अनोखी यात्रा की वजह से इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। Tigress Zeenat ऐसी ही एक बाघिन है।
उसकी कहानी सिर्फ एक जंगल से दूसरे जंगल में जाने की नहीं है। यह कहानी है एक जंगली जानवर की हिम्मत, उसकी आज़ादी की चाह और इंसानों द्वारा प्रकृति को समझने की कोशिश की।
आखिरकार ज़ीनत ने 4 शावकों को जन्म देकर ना केवल बाघों की आबादी बढ़ाई, बल्कि सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व में Genetic Diversity लाकर आने वाली पीढ़ियों को मज़बूत और स्वस्थ बना दिया। 

[Similipal Tiger Reserve, Odisha Wildlife, Black Tiger, Save The Tigers, Tiger Conservation,International Tiger’s Day Wildlife
#thebetterindia #goodnews #positivestories #indianews #thebetterindiahindi #hindi

Follow us for more:

Facebook: https://www.facebook.com/thebetterindia.hindi
Instagram: https://www.instagram.com/thebetterindia.hindi/
Twitter: https://twitter.com/TbiHindi
LinkedIn: https://www.linkedin.com/company/the-better-india-hindi/

Website: https://hindi.thebetterindia.com/

योगी सरकार में जल संरक्षण बना जन आंदोलन, यूपी ने हासिल किया संयुक्त राष्ट्र का छठवां सतत विकास लक्ष्य

Yogi government water conservation: कभी जल संकट और गिरते भूजल स्तर की चुनौती से जूझने वाला उत्तर प्रदेश आज जल संरक्षण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी का व्यापक अभियान बनाया गया। इसी क्रम में यूपी, संयुक्त राष्ट्र के छठवें सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी-6) को हासिल कर चुका है। यूपी में जल दोहन की दर 2017 के 71.26 प्रतिशत से घटकर 70 प्रतिशत हो गई है, जो कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य का मानक है। यह उपलब्धि जल संरक्षण के लिए सम्मलित प्रयासों से मिली है।

 

भूजल गर्भ विभाग निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने बताया कि भूजल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन, आधुनिक तकनीक के सम्मलित प्रयासों ने प्रदेश को जल सरंक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धियां दिलाई हैं। प्रदेश सरकार और विभाग के प्रयासों का सबसे बड़ा परिणाम भूजल पुनर्भरण में वृद्धि के रूप में सामने आया है। वर्ष 2017 में प्रदेश का वार्षिक भूजल रिचार्ज 69.91 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) था, जो वर्ष 2025 तक बढ़कर 73.39 बीसीएम हो गया। वहीं भूजल दोहन की दर 71.26 प्रतिशत से घटकर 70 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिससे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी-6) को प्राप्त करने में उत्तर प्रदेश सफल रहा।

प्रदेश में अतिदोहित विकासखंड़ों की संख्या हुई कम

उन्होंने बताया कि प्रदेश में जल संरक्षण अभियानों का असर अतिदोहित क्षेत्रों में भी दिखाई पड़ा। वर्ष 2017 में प्रदेश में 82 अतिदोहित विकासखंड थे, जिनकी संख्या घटकर 44 रह गई। वहीं सुरक्षित श्रेणी के विकासखंडों की संख्या 540 से बढ़कर 563 हो गई। यह परिवर्तन वैज्ञानिक भूजल प्रबंधन व योजनाबद्ध कार्यों की वजह से संभव हो पाया।

अभियान बना भूजल रिचार्ज की ताकत

'कैच द रेन' अभियान के तहत वर्ष 2021 से 2025 के बीच 3.39 लाख वर्षा जल संचयन एवं जल संरक्षण संरचनाएं बनाई गईं, 1.34 लाख पारंपरिक जल निकायों का पुनर्जीवन किया गया, 14.38 लाख जलग्रहण क्षेत्र विकास कार्य हुए। साथ ही 1.33 लाख भूजल पुनर्भरण एवं पुनः उपयोग से जुड़ी संरचनाएं विकसित की गईं। इन प्रयासों ने वर्षा जल संचयन व भूजल रिचार्ज को नई गति दी।

2 मीटर तक बढ़ा भूजल स्तर

डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अटल भूजल योजना ने भी सकारात्मक बदलाव में अहम भूमिका निभाई। 26 विकासखंडों में ग्राम पंचायत आधारित वाटर सिक्योरिटी प्लान लागू किए गए, जिसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्र अतिदोहित या सेमी-क्रिटिकल श्रेणी से सुरक्षित श्रेणी की ओर बढ़े। एक स्वतंत्र अध्ययन में 550 ग्राम पंचायतों में से 303 पंचायतों में भूजल स्तर में 0.5 से 2 मीटर तक सुधार दर्ज किया गया।

 

रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग से लाभ

योगी सरकार ने रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग को सरकारी एवं अर्धसरकारी भवनों पर भी व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया। प्रदेश में 1,05,593 उपयुक्त भवनों की पहचान की गई, जिनमें से 35,206 भवनों पर वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित की जा चुकी है। भूगर्भ जल विभाग द्वारा 227 भवनों पर प्रणाली स्थापना से प्रतिवर्ष लगभग 4252.80 लाख लीटर संभावित भूजल पुनर्भरण क्षमता भी विकसित की गई है।

करोड़ों लीटर भूजल रिचार्ज क्षमता बढ़ी

योगी सरकार में लगभग सभी विभागों ने जल संरक्षण अभियान को प्राथमिकता में शामिल किया। इसके तहत पिछले कुछ वर्षों में लघु सिंचाई विभाग ने 6,627 चेकडैम का निर्माण किया, जिनकी भंडारण क्षमता 14 हजार करोड़ लीटर व भूजल रिचार्ज क्षमता 10 हजार करोड़ लीटर प्रतिवर्ष है। इसके साथ ही 1,417 तालाबों का जीर्णोद्धार किया, जिसकी भूजल रिचार्ज क्षमता 1,400 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष है। वहीं 6,800 से अधिक भवनों पर रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली स्थापित की।

 

ग्राम्य विकास विभाग ने लगभग 19,974 अमृत सरोवर विकसित किए। कृषि विभाग ने 37,273 खेत तालाबों का निर्माण कराया। इन प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता और कृषि उत्पादकता दोनों में सुधार हुआ। यह सभी प्रयास यूपी में भूजल रिचार्ज और जल संरक्षण के लिए काफी अहम साबित हो रहे हैं।

20 साल से बचा रहे हैं सांपों की जान | Arshad Khan | Snake whisperer | Wildlife rescuer

भारत में 350+ Snake Species पाई जाती हैं, लेकिन डर की वजह से ज़्यादातर सांपों को मार दिया जाता है।

इसी सोच को बदलने का काम पिछले 20 सालों से कर रहे हैं अरशद खान

8वीं क्लास से शुरू हुआ उनका सफर आज उन्हें उत्तराखंड Forest Department के सबसे अनुभवी Snake Rescuers में शामिल करता है। अब तक वे 10,000+ कोबरा, हजारों दूसरे सांपों के साथ 75+ भालू , 30+ तेंदुए और कई अन्य वन्यजीवों का Rescue कर चुके हैं।

यह कहानी सिर्फ एक Snake Rescuer की नहीं, बल्कि इंसानों और Wildlife के बीच भरोसा कायम करने की है।

अगर कभी सांप दिखे, तो उसे मारने नहीं… सही मदद बुलाने की कोशिश कीजिए।

@wild_whisperer

(Arshad Khan, King Cobra Rescue, Snake Rescuer, Forest Officer, Wildlife Rescue, King Cobra, Snake Conservation, Uttarakhand Forest Department, Wildlife Story, Cobra Rescue, Inspiring Story, World Snake Day, Van ke Veer

#thebetterindia #goodnews #positivestories #indianews #thebetterindiahindi #hindi

Follow us for more:

Facebook: https://www.facebook.com/thebetterindia.hindi
Instagram: https://www.instagram.com/thebetterindia.hindi/
Twitter: https://twitter.com/TbiHindi
LinkedIn: https://www.linkedin.com/company/the-better-india-hindi/

Website: https://hindi.thebetterindia.com/

27 गैंडों के शिकार से Zero Poaching तक, एक अफसर ने बदल दी जंगल की तस्वीर | IFS Sandeep Kumar

एक समय था, जब काज़ीरंगा में हर साल गैंडों का शिकार होना आम बात थी।

आज वही काज़ीरंगा दुनिया के सामने इस बात की मिसाल है कि सही नेतृत्व, आधुनिक तकनीक और लोगों की साझेदारी से दशकों पुराना संकट भी खत्म किया जा सकता है।

IFS संदीप कुमार और उनकी टीम ने साबित कर दिया कि जब इरादा मज़बूत हो, तो बदलाव सिर्फ़ संभव नहीं… इतिहास बन जाता है. 🦏

27 गैंडों के शिकार से Zero Poaching तक, एक अफसर ने बदल दी जंगल की तस्वीर | IFS Sandeep Kumar | Kaziranga | Assam

[ Kaziranga National Park, Rhino Conservation, IFS Sandeep Kumar, Wildlife Conservation, Assam Forests, Environmental Action, Civic Responsibility, Grassroots Impact]

#thebetterindia #goodnews #positivestories #indianews #thebetterindiahindi #hindi

Follow us for more:

Facebook: https://www.facebook.com/thebetterindia.hindi
Instagram: https://www.instagram.com/thebetterindia.hindi/
Twitter: https://twitter.com/TbiHindi
LinkedIn: https://www.linkedin.com/company/the-better-india-hindi/

Website: https://hindi.thebetterindia.com/

तूफान में गिरा आंगन का पेड़, 85 साल के बुजुर्ग को बना गया लाखों का मालिक

तेज बारिश और आंधी के बाद पेड़ों का गिरना आमतौर पर नुकसान की खबर लेकर आता है, लेकिन बेंगलुरु के 85 वर्षीय एनजी केसरी की कहानी बिल्कुल अलग है। उनके घर के आंगन में करीब 40 साल से खड़ा एक चंदन का पेड़ तूफान में गिर गया, जो पहली नजर में एक बड़ी क्षति लग रही थी। लेकिन यही पेड़ बाद में उनके लिए किस्मत बदलने वाला साबित हुआ। वर्षों तक प्यार और जिम्मेदारी से इस पेड़ की देखभाल करने वाले केसरी को इसके बदले करीब 28 लाख रुपये मिले।

इतना ही नहीं, पेड़ के संरक्षण और नियमों का पालन करने के लिए उन्हें राज्य स्तर पर सम्मान भी मिला। यह कहानी बताती है कि प्रकृति की देखभाल और धैर्य का फल कई बार बेहद खास तरीके से मिलता है।

अपने आप उगा था चंदन का पौधा, प्यार से बनाया पेड़

करीब चार दशक पहले केसरी के घर के आंगन में चंदन का एक छोटा-सा पौधा अपने आप उग आया था। उन्होंने उसे हटाने के बजाय उसकी देखभाल करने का फैसला किया।

धीरे-धीरे वह छोटा पौधा एक विशाल चंदन के पेड़ में बदल गया। पेड़ की खुशबू आसपास के लोगों का ध्यान खींचने लगी और उसकी कीमत बढ़ने के साथ खतरा भी बढ़ गया।

चोरों से बचाने के लिए लगाया लोहे का सुरक्षा घेरा

चंदन की लकड़ी की कीमत और मांग को देखते हुए पेड़ पर तस्करों और लकड़ी चोरों की नजर पड़ने लगी। केसरी ने पेड़ की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर मजबूत लोहे का घेरा लगवा दिया।

उन्होंने कई वर्षों तक अपनी मेहनत और सतर्कता से इस अनमोल पेड़ को सुरक्षित रखा।

तूफान ने गिराया पेड़, लेकिन केसरी ने नहीं तोड़ा नियम

जून में भारी बारिश और तेज हवाओं के दौरान पास का एक बड़ा पेड़ गिर गया, जिसकी चपेट में आकर चंदन का पेड़ भी जमीन पर आ गया।

इतना कीमती पेड़ मिलने के बाद भी केसरी ने खुद उसे बेचने या काटने की कोशिश नहीं की। उन्होंने तुरंत वन विभाग को इसकी जानकारी दी और सभी कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा किया।

एक टन वजन वाली चंदन की लकड़ी बनी बड़ी कमाई

वन विभाग की जांच के बाद पता चला कि गिरे हुए चंदन के पेड़ का वजन करीब एक टन था। इसके बाद लकड़ी को सरकारी चंदन डिपो, मैसूर भेजा गया। बाद में इसे कर्नाटक सोप्स एंड डिटर्जेंट्स लिमिटेड (KSDL) ने खरीदा, जो चंदन आधारित उत्पादों के लिए जानी जाती है।

इस बिक्री से केसरी को करीब 28 लाख रुपये की राशि मिली।

पैसों के साथ मिला बड़ा सम्मान

केसरी के लिए यह सिर्फ आर्थिक लाभ नहीं था। चंदन के पेड़ को इतने लंबे समय तक सुरक्षित रखने और संरक्षण के प्रति उनकी जिम्मेदारी को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने उन्हें ‘चंदन शिरोमणि’ पुरस्कार से सम्मानित किया।

धैर्य और संरक्षण की मिसाल बनी कहानी

एनजी केसरी की कहानी बताती है कि प्रकृति की देखभाल और धैर्य का फल कभी-कभी अप्रत्याशित रूप से मिलता है। जिस पेड़ के गिरने को शुरुआत में नुकसान माना जा रहा था, वही पेड़ वर्षों की मेहनत के बाद उनके लिए सम्मान और बड़ी उपलब्धि लेकर आया।

13 हजार डॉलर में ‘बॉडी काउंट रीसेट’? वायरल दावे की सच्चाई जानकर रह जाएंगे हैरान