ब्रांडेड डिब्बा, नकली दवा! हर 3 में से 1 भारतीय को मिल रहा है नकली मेडिकल सामान! जानिए किस शहर में है सबसे ज्यादा खतरा

ब्रांडेड डिब्बा, नकली दवा! हर 3 में से 1 भारतीय को मिल रहा है नकली मेडिकल सामान! जानिए किस शहर में है सबसे ज्यादा खतरा

Fake Medicine

Fake Medicines India: जनस्वास्थ्य (Public Health) के मोर्चे पर एक बेहद डरावनी और चिंताजनक सच्चाई सामने आई है। बाजार में मिलने वाली नकली दवाएं और हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स पहली नजर में बिल्कुल असली जैसे दिखते हैं। इनकी पैकेजिंग, ब्रांडिंग और डिजाइन की नकल इतनी सफाई से की जाती है कि आम मरीज या ग्राहक के लिए असली और नकली का फर्क पहचानना लगभग असंभव हो जाता है। खास बात यह है कि दिल्ली क्राइम ब्रांच ने हाल ही में कैंसर की नकली दवाओं के कारोबार का भंडाफोड़ किया है। देश के 17 राज्यों में फैले इस कारोबार के सिलसिले में 17 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है।

एएसपीए-क्रिसिल (ASPA-CRISIL) की हालिया जारी स्टेट ऑफ काउंटरफिटिंग इन इंडिया 2025” रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वे किए गए हर तीन में से लगभग एक उपभोक्ता (33%) ने पिछले 12 महीनों के दौरान किसी न किसी नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट का सामना किया है। यह समस्या कपड़े या इलेक्ट्रॉनिक्स के नकली होने से कहीं ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यहाँ सीधे मरीज की जान दांव पर लगी होती है।

 

Fake Medicine

  •  

स्थानीय मेडिकल स्टोर से लेकर ऑनलाइन ऐप्स तक जाल

अक्सर यह माना जाता है कि नकली सामान केवल अनधिकृत या ऑनलाइन बाजारों में मिलता है, लेकिन यह सर्वे इस भ्रम को तोड़ता है। जिन लोगों का सामना नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स से हुआ:

  • 63% लोगों ने स्थानीय रिटेल मेडिकल स्टोर्स को इसका स्रोत बताया।
  • 60% लोगों को ऑनलाइन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स (दवा डिलीवरी ऐप्स) के जरिए नकली उत्पाद मिले।
  • लगभग एक-तिहाई लोगों को मल्टी-ब्रांड स्टोर्स और सोशल मीडिया विज्ञापनों के जरिए यह सामान बेचा गया।

कीमत का अंतर : नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स असली की तुलना में औसतन 18% सस्ते होते हैं। हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 96% लोग अंजाने में नकली दवाएं खरीदते हैं, असली समस्या यह है कि मरीज के पास दुकान पर खड़े होकर असलियत जांचने का कोई आसान जरिया नहीं है।

पैकेजिंग पर भरोसा ही सबसे कमजोर कड़ी

सर्वे के अनुसार, केवल 52% उपभोक्ता ही दवा या हेल्थकेयर प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसकी असलियत जांचते हैं। हालांकि, 60% लोगों को यह मुगालता रहता है कि वे खुद नकली सामान पहचान सकते हैं।
लोग आमतौर पर इन चीजों को देखकर फैसला लेते हैं:

  1. पैकेजिंग की क्वालिटी (66%)
  2. होलोग्राम (48%)
  3. क्यूआर कोड (40%)

लेकिन आज के आधुनिक जालसाज पैकेजिंग डिजाइन और ब्रांडिंग की हुबहू नकल कर लेते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ डिब्बा देखकर दवा के असली होने का अंदाजा लगाना जानलेवा साबित हो सकता है।

Fake Medicine

2018 से 2025 के बीच दर्ज हुए 521 मामले

एएसपीए (ASPA) के काउंटरफिट न्यूज़ रिपॉजिटरी के अनुसार, वर्ष 2018 से 2025 के बीच हेल्थकेयर क्षेत्र में जालसाजी के 521 आधिकारिक मामले दर्ज किए गए।

  • महामारी में सबसे बड़ा संकट: कोविड-19 (2020-2021) के दौरान नकली पीपीई किट, मास्क, कफ सिरप, जीवनरक्षक दवाओं और यहाँ तक कि नकली वैक्सीन के मामलों में भारी उछाल देखा गया था।

 

Fake Medicine

  •  

नकली दवा का मुद्दा सिर्फ आर्थिक नुकसान का नहीं, बल्कि सीधे जीवन और मृत्यु का है। भले ही उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ रही हो, लेकिन जब तक हर दवा की रीयल-टाइम प्रामाणिकता (Authenticity) जांचने की मजबूत और आसान डिजिटल व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक जनस्वास्थ्य पर यह बड़ा खतरा मंडराता रहेगा।