MP में 25 सितंबर से शुरू होगी मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा, CM मोहन यादव 351 बसों को दिखाएंगे हरी झंडी

MP में 25 सितंबर से शुरू होगी मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा, CM मोहन यादव 351 बसों को दिखाएंगे हरी झंडी

मध्यप्रदेश के नागरिकों को सुलभ, सुरक्षित, आधुनिक  एवं पर्यावरण अनुकूल सार्वजनिक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा प्रदेश सरकार बड़ा कदम उठाने जा रही है। परिवहन विभाग की महत्वाकांक्षी ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ का 25 सितंबर 2026 को शुभारंभ होगा। भोपाल के दशहरा मैदान में आयोजित राज्यस्तरीय कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शुरुआती चरण में 351 बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। प्रदेश सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के विभिन्न शहरों के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करना, दैनिक यात्रियों को राहत पहुंचाना और पर्यावरण-अनुकूल सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना है। मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा अंतर्गत प्रदेश में लगभग 1500 बसें चलना शुरू हो जाएंगी। 

 

दो श्रेणियों में शुरू होंगी बस सेवाएं

 

कार्यक्रम के दौरान 351 बसों को एक साथ हरी झंडी दिखाकर रवाना किया जाएगा। इसे दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है। इसमें 120 इंटरसिटी बसें हैं। ये बसें दो या दो से अधिक शहरों के बीच आवागमन को सुगम और तीव्र बनाएंगी। 231 इंट्रासिटी बसें शहरों के भीतर नागरिकों को सुरक्षित, सुलभ और सस्ती यात्रा सुविधा प्रदान करेंगी।

 

7 शहरों की 351 बसों को दिखाई जाएगी हरी झंडी

 

मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा अंतर्गत प्रथम चरण में प्रदेश के 7 प्रमुख शहरों  की बसों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया जाएगा। इसमें इदौर, भोपाल, जबलपुर, रीवा, देवास, कटनी और भिंड शामिल है। इंदौर में 145 बस, जिसमें 50 इंटरसिटी, 95 इंट्रासिटी,  भोपाल के लिए 106 बसें, जिसमें  23 इंटरसिटी, 83 इंट्रासिटी, जबलपुर के लिए 67 बसें, जिसमें  14 इंटरसिटी, 53 इंट्रासिटी। रीवा की 18 इंटरसिटी बस, देवास की 10 इंटरसिटी बस, कटनी की 3 और भिंड की  2 इंटरसिटी बस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया जाएगा।

 

लगभग 15,000 सार्वजनिक बसें की जाएंगी संचालित

 

मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के अंतर्गत वर्ष 2031 तक 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों को बस सेवा से जोड़कर ग्रामीण कनेक्टिविटी को नई मजबूती दी जाएगी। प्रदेशभर में लगभग 15,000 से अधिक आधुनिक सार्वजनिक बसें संचालित की जाएंगी। इससे प्रतिदिन 30 लाख से ज्यादा यात्रियों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा प्रदान होगी। साथ ही 180 से अधिक आधुनिक बस स्टैंड्स, टर्मिनल्स और डिपो का कायाकल्प किया जाएगा। 

 

इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर विशेष जोर 

 

प्रदेश सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के उद्देश्य से स्वच्छ ईंधन और इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर विशेष जोर दिया जाएगा। 

 

 

इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) के माध्यम से की जाएगी निगरानी

 

मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के अंतर्गत संचालित बसों की निगरानी इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) के माध्यम से की जाएगी। इसके लिए मध्यप्रदेश यात्री परिवहन एण्ड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MPYPIL) एवं उसकी 7 सहायक कंपनियों में अत्याधुनिक कमांड-कंट्रोल सेंटर स्थापित किए गए हैं। इन सेंटरों के माध्यम से बसों के संचालन, लोकेशन, समयबद्धता एवं अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों की रियल टाइम निगरानी सुनिश्चित की जाएगी। इसके साथ ही सार्वजनिक बसों में महिला और बाल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इससे यात्री परिवहन व्यवस्था अधिक सुरक्षित, सुगम, पारदर्शी और प्रभावी बनाने में भी मदद मिलेगी। सभी बसों को 07 सीसीटीवी कैमरों, पैनिक बटन और रियल-टाइम व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग (VLTD) सिस्टम से लैस किया जा रहा है। इसके अलावा, पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम (PIS), ड्राइवरों की तकनीकी ट्रेनिंग और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र के जरिए सुरक्षित एवं समयबद्ध यात्रा सुनिश्चित की जाएगी। 

 

पीपीपी मॉडल के जरिए निजी ऑपरेटरों की सशक्त भागीदारी

जन-निजी भागीदारी (PPP) को गति देने के लिए पारदर्शी अनुबंध प्रणाली और प्रोत्साहन योजनाएं लागू की जाएगी। इस मॉडल से निजी बस ऑपरेटरों को राजस्व रिसाव रोकने, नॉन-फेयर रेवेन्यू (जैसे विज्ञापन व कार्गो सेवाएं) बढ़ाने और आधुनिक डिपो व टर्मिनलों के उपयोग की सुविधाएं मिलेंगी साथ ही प्रशासन का पूर्ण सहयोग भी मिलेगा। 

 

परिवहन क्षेत्र में रोजगार और निवेश को मिलेगा बढ़ावा

 

प्रदेश में सुगम यात्री परिवहन सेवा शुरू होने से परिवहन क्षेत्र में रोजगार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा। यात्री परिवहन के विस्तार से प्रदेश में बस संचालन, वाहन निर्माण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी सेवाओं और अन्य संबद्ध क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएं बढ़ेंगी। इससे परिवहन क्षेत्र से जुड़े उद्योगों को प्रोत्साहन मिलने के साथ युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

Nestle Controversies: कभी बेबी फूड, कभी किटकैट, कभी मैगी…नेस्ले के लिए नया नहीं है विवादों में घिरना, लंबा है इतिहास

एफएमसीजी कंपनी नेस्ले (Nestle) एक बार फिर विवादों में है। ताजा मामला इसकी भारतीय यूनिट नेस्ले इंडिया से जुड़ा है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पाया है कि शिशु पोषण (Infant Nutrition) के 3 उत्पादों में खाद्य सुरक्षा मानकों का कथित रूप से पालन नहीं किया गया। इसे लेकर FSSAI ने नेस्ले इंडिया लिमिटेड के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की है। हालांकि कंपनी का कहना है कि वह लागू नियमों का पूरी तरह पालन कर रही है। FSSAI का कहना है कि उसने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध NAN एक्सेला प्रो स्टेज 1, लैक्टोजेन प्रो 1 और एक फॉलो-अप फॉर्मूला की जांच शुरू की है।

नियामक ने NAN एक्सेला प्रो स्टेज-1 में ‘5HMOs’ और ‘व्हे प्रोटीन’ से जुड़े दावों पर आपत्ति जताई है। वहीं, लैक्टोजेन प्रो 1 में ‘व्हे प्रोटीन’ को आसानी से पचने वाला बताने के दावे पर सवाल उठाया है। इसके अलावा नेस्ले इंडिया के एक फॉलो-अप फॉर्मूला का सैंपल लैब टेस्ट में बायोटिन की मात्रा के मामले में स्टैंडर्ड्स के मुताबिक नहीं पाया गया। नेस्ले इंडिया के ये तीनों प्रोडक्ट प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं। इसलिए FSSAI ने कंपनी के खिलाफ 3 अलग-अलग मामले दर्ज किए हैं। हालांकि नेस्ले इंडिया का कहना कि उसके बच्चों के पोषण वाले प्रोडक्ट सभी लागू नियमों का पूरी तरह से पालन करते हैं।

नेस्ले और विवादों का नाता नया नहीं है। कंपनी भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी पहले भी कई बार विवादों के साए में रह चुकी है। कभी गलत मार्केटिंग प्रैक्टिसेज, कभी प्रोडक्ट की प्राइस फिक्सिंग तो कभी अनहेल्दी प्रोडक्ट्स को लेकर कंपनी आलोचनाएं झेल चुकी है। आइए डालते हैं एक नजर नेस्ले से जुड़े प्रमुख विवादों पर…

बेबी फॉर्मूला मार्केटिंग विवाद

साल 1977 में अमेरिका में नेस्ले को जबरदस्त बॉयकॉट झेलना पड़ा था। वजह थी नेस्ले के ब्रेस्ट मिल्क सब्सटिट्यूट की एग्रेसिव मार्केटिंग। यह मार्केटिंग कुछ इस तरह की गई कि कंपनी पर मांओं को स्तनपान कराने से हतोत्साहित करने और अपने बेबी फॉर्मूले को मां के दूध से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक यानि हेल्दी बताने का आरोप लग गया। कैंपेनिंग में इस तरह का संकेत दिया गया कि इस फॉर्मूले का इस्तेमाल हेल्थ प्रोफेशनल्स करते हैं। नेस्ले ने मैटरनिटी यूनिट्स में अपने फॉर्मूले के फ्री सैंपल बांटना शुरू किया और सेल्सपर्सन को नर्स के जैसे तैयार करके पेश करने लगी।

हालांकि नेस्ले का बेबी फॉर्मूला, मां के दूध से ज्यादा पौष्टिक है, इस बात का कोई सबूत नहीं था। लेकिन विवाद तो खड़ा हो गया था और 1977 में अमेरिका में नेस्ले का बहिष्कार शुरू हो गया। फिर यह धीरे-धीरे यूरोप में भी फैल गया। बहिष्कार आधिकारिक तौर पर 1984 में बंद हुआ, वह भी तब जब नेस्ले, WHO द्वारा समर्थित इंटरनेशनल मार्केटिंग कोड का पालन करने पर राजी हुई। लेकिन 1989 में बॉयकॉट फिर शुरू हो गया। इसके बाद नेस्ले पर 1990 के दशक में भी पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों में इसी तरह की मार्केटिंग प्रैक्टिसेज अपनाने के आरोप लगते रहे।

KitKat: चॉकलेट या वेफर

बात 1998 की है। नेस्ले इंडिया अपनी किटकैट को भारत में वेफर की कैटेगरी में रखना चाहती थी और इसी के हिसाब से 10 प्रतिशत सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी भरना चाहती थी। लेकिन टैक्स अथॉरिटीज को यह मंजूर न था। उनका मानना था कि किटकैट एक चॉकलेट है और इसलिए इस पर 20 प्रतिशत ड्यूटी लगनी चाहिए। उनका यह भी कहना था कि नेस्ले इंडिया, किटकैट का विज्ञापन तो चॉकलेट के तौर पर कर रही है, लेकिन ड्यूटी वेफर वाली भरना चाहती है। लेकिन नेस्ले भी कहां कम थी। उसने सफाई दी कि वह किटकैट को चॉकलेट बताकर नहीं बेचती, लोग इसे वेफर और चॉकलेट का कॉम्बिनेशन समझकर खरीदते हैं।

टैक्स अथॉरिटी का कहना था कि किटकैट में 68-70 प्रतिशत चॉकलेट मिल्क है, इसलिए इसे चॉकलेट माना जाना चाहिए। उस वक्त सेंट्रल एक्साइज डिपार्टमेंट ने नेस्ले इंडिया पर 24 करोड़ रुपये की ड्यूटी लगाई थी। इसमें किटकैट के कथित मिसक्लासिफिकेशन के लिए 100 प्रतिशत अनिवार्य जुर्माना शामिल था। नेस्ले इंडिया को सेंट्रल एक्साइज एक्ट के सेक्शन 11 AB के प्रावधानों के मुताबिक ब्याज भरने का भी निर्देश दिया गया था।

मामला बढ़ते-बढ़ते ‘कस्टम्स, एक्साइज एंड गोल्ड ट्राइब्यूनल, मुंबई’ में पहुंचा- ‘नेस्ले इंडिया वर्सेज कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज (एड्ज्यूडिकेशन), मुंबई’। ट्राइब्यूनल को तय करना था कि किटकैट में वेफर पर चॉकलेट की कोटिंग है या चॉकलेट के अंदर वेफर। फैसला नेस्ले के पक्ष में आया, किटकैट को वेफर माना गया और इसे 10 प्रतिशत सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी की कैटेगरी में ही रखा गया।

चॉकलेट प्राइस फिक्सिंग

कनाडा में प्रतिस्पर्धा ब्यूरो ने चॉकलेट की प्राइसिंग के मामले की जांच के लिए 2007 में नेस्ले कनाडा के ऑफिसेज में छापा मारा था। हर्शी कनाडा और मार्स कनाडा के ऑफिस में भी छापे मारे गए थे। आरोप था कि कीमतों को बढ़ाने के लिए नेस्ले के अधिकारियों ने कनाडा में अपने कॉम्पिटीटर्स के साथ मिलीभगत की। कॉम्पिटीटर्स के अधिकारियों ने रेस्टोरेंट, कॉफी की दुकानों और सम्मेलनों में मुलाकात की। यह आरोप भी था कि नेस्ले कनाडा के तत्कालीन सीईओ रॉबर्ट लियोनिडास ने एक बार एक कॉम्पिटीटर को अपनी कंपनी की प्राइसिंग की जानकारी वाला एक लिफाफा दिया था।

2007 में छापेमारी के सार्वजनिक होने के बाद नेस्ले और अन्य कंपनियों के खिलाफ प्राइसिंग के लिए क्लास एक्शन मुकदमे दायर किए गए। नेस्ले ने किसी भी तरह की जिम्मेदारी माने बिना, 90 लाख डॉलर का समझौता किया। इसके बाद भी संयुक्त राज्य अमेरिका में बड़े पैमाने पर क्लास एक्शन मुकदमे चले।

मिल्क प्रोडक्ट विवाद

सितंबर 2008 के आखिर में, हांगकांग सरकार को चीन में बने नेस्ले के दूध के एक प्रोडक्ट में मेलामाइन मिला। किडनी खराब होने से 6 बच्चों की मौत हो गई और 860 अन्य बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। हालांकि नेस्ले ने कहा कि उसके सभी प्रोडक्ट सुरक्षित हैं और उन्हें मेलामाइन-मिलावटी दूध से नहीं बनाया गया है। अक्टूबर 2008 में ताइवान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने घोषणा की कि चीन में नेस्ले द्वारा बनाए गए 6 तरह के मिल्क पाउडर में मेलामाइन की थोड़ी मात्रा पाई गई है, और उन्हें बाजार से हटा दिया गया।

जब मैगी पर हुआ बड़ा बवाल, हो गई थी बैन

सितंबर 2026 में सामने आया नया वाकया FSSAI और नेस्ले इंडिया के बीच दूसरा बड़ा रेगुलेटरी विवाद है। इससे पहले 2015 में भारत में नेस्ले की मैगी को लेकर एक बड़ा बवाल हुआ था। लेड की ज्यादा मात्रा और लेबलिंग से जुड़ी चिंताओं के कारण नेस्ले इंडिया अपने इंस्टेंट नूडल्स लिए घिरी थी। मई 2015 में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश के फूड सेफ्टी रेगुलेटर्स ने रिपोर्ट दी कि मैगी नूडल्स में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG) का लेवल बहुत ही हाई है। साथ ही लेड का स्तर, जितनी मात्रा की इजाजत है उससे 17 गुना ज्यादा है। बस फिर क्या था। मैगी के सेहत के लिए हानिकारक होने, खासकर बच्चों की सेहत के लिए हानिकारक होने को लेकर वाद-विवाद होने लगे। देश में और विदेश में कई जांच हुईं। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि भारत सरकार ने जून 2015 में मैगी नूडल्स को पूरे देश में बैन कर दिया।

हालांकि नेस्ले हमेशा से यही कहती आई है कि उसके नूडल प्रोडक्ट सुरक्षित हैं। भारत में जब बैन लगा तो मैगी को लगभग 320 करोड़ रुपये का स्टॉक रिकॉल करना पड़ा यानि कि बाजार से वापस मंगाना पड़ा। इतना ही नहीं ऐसी भी खबर आई कि उसने एक सीमेंट फैक्ट्री को स्टॉक जलाने के लिए 20 करोड़ रुपये दिए। मैगी में MSG और लेड, उचित मात्रा से अधिक होने के चलते भारत के कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने नेस्ले इंडिया पर 640 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था।

अगस्त 2015 में यूएस हेल्थ रेगुलेटर एफडीए ने टेस्ट किए, जिनमें सामने आया कि मैगी में लेड की मात्रा खतरनाक स्तर पर नहीं है। 13 अगस्त 2015 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने देश में मैगी पर लगे बैन को हटा दिया। कोर्ट का कहना था कि बैन लगाते हुए प्रॉपर प्रोसिजर फॉलो नहीं किया गया। इसके अलावा कोर्ट ने भारत में हुए टेस्ट के नतीजों पर भी सवाल खड़े किए, जिसकी वजह थी कि टेस्ट नेशनल एक्रेडिएशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज की अधिकृत लैब्स में नहीं हुए थे। नवंबर 2015 में मैगी की भारतीय बाजारों में फिर वापसी हो गई।

2021 में जब फूड प्रॉडक्ट्स और ड्रिंक्स अनहेल्दी होने पर घिरी

जून 2021 में नेस्ले के फूड प्रोडक्ट्स पर एक बड़ा खुलासा हुआ। कंपनी के एक इंटर्नल डॉक्युमेंट में माना गया कि उसके 60 प्रतिशत से ज्यादा फूड प्रोडक्ट और ड्रिंक्स अनहेल्दी हैं। कंपनी ने यह भी माना है कि इसके कुछ फूड प्रोडक्ट कभी भी हेल्दी नहीं होंगे, फिर चाहे वह कितना भी सुधार क्यों न कर ले। यह बात सामने आते ही नेस्ले की फिर से आलोचना होने लगी। एक प्रेजेंटेशन में कहा गया था कि ऑस्ट्रेलिया के हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम के तहत कंपनी के 37 प्रतिशत प्रोडक्ट्स को ही 3.5 स्टार या इससे ज्यादा की रेटिंग मिली। 3.5 स्टार की रेटिंग ‘रिकग्नाइज्ड डेफिनेशन ऑफ हेल्थ’ मानी जाती है। सामने आया था कि नेस्ले के 60 प्रतिशत फूड प्रोडक्ट इस मानक पर खरे नहीं उतरे।

भगवान जगन्नाथ की तस्वीर वाली पैकेजिंग पर विवाद

जनवरी 2022 में नेस्ले इंडिया को सोशल मीडिया पर ग्राहकों की पुरजोर नाराजगी का सामना करना पड़ा था। कारण था किटकैट के रैपर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की तस्वीरें। यह नया स्टॉक आते ही विवादों में घिर गया। कंपनी पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा। नेस्ले इंडिया की सफाई थी कि उसके इस कदम का उद्देश्य केवल भारत के खूबसूरत और दर्शनीय स्थलों को उकेरना था। किटकैट के डिब्बे पर पट्टचित्र के जरिए ओडिशा की संस्कृति को उकेरा गया था।

लेकिन तगड़ी आलोचना को देखते हुए कंपनी ने अपने कदम पर खेद जताया। कहा कि उसने साल 2021 में ही विवादास्पद पैकेजिंग वाली किटकैट के डिब्बों को बाजार से वापस ले लिया था। बाकी बचा हुआ माल भी जल्द ही बाजार से गायब हो गया। इससे पहले अप्रैल 2021 में नेस्ले इंडिया ने किटकैट चॉकलेट के पैकेट पर मणिपुर के कीबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान को मेघालय में दिखाए जाने के लिए माफी मांगी थी। राज्य सरकार के अधिकारियों की आपत्ति के बाद कंपनी ने यह कदम उठाया था।

बेबी फूड में चीनी

अप्रैल 2024 में स्विस NGO ‘पब्लिक आई’ और ‘इंटरनेशनल बेबी फूड एक्शन नेटवर्क’ (IBFAN) की एक जांच से पता चला कि कम और मध्यम आय वाले देशों में बेचे जाने वाले नेस्ले के लोकप्रिय बेबी सीरियल प्रोडक्ट्स और फॉर्मूलाज में यूरोप और अन्य विकसित देशों में बेचे जाने वाले उत्पादों की तुलना में काफी ज्यादा मात्रा में एडेड शुगर है। एक रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में जांचे गए सभी सेरेलक बेबी सीरियल प्रोडक्ट्स में एडेड शुगर थी और मात्रा औसतन प्रति सर्विंग लगभग 3 ग्राम थी। वहीं नेस्ले के यूरोपीय बाजार में बिना चीनी वाले शिशु पोषण उत्पाद उपलब्ध थे। विकासशील देशों में नेस्ले के सबसे ज्यादा बिकने वाले बेबी-फूड ब्रांड्स में काफी ज्यादा मात्रा में एडेड शुगर पाई गई, जबकि स्विट्जरलैंड में इसके प्रोडक्ट शुगर-फ्री थे।

भारत में AI की बीन, गधे भी संपेरे!

गुरुवार को मैंने भाजपा के सोशल मीडिया अकाउंटों के प्रोपेगेंडा का लबोलुआब जाना। भाजपा की प्रदेश इकाइयों के एक वीडियो में लाठियों से कांग्रेस की धुनाई है। दूसरे विज्ञापन में योद्धा हाथ में तलवार लिए हुए बेहद हिंसक अंदाज में चीखते हुए हमले के लिए तैयार हैं। कहीं बंदूकें हैं, कहीं ‘दिमागी नक्सलियों’ पर हमले का आह्वान। मतलब क्रूर फिल्मों, वेब सीरीज और हिंसक दृश्यों जैसी दृश्य-भाषा से राजनीतिक वीडियो, क्लिप और प्रचार सामग्री। जाहिर है, जनरेटिव AI ने ऐसी तस्वीर, आवाज और वीडियो बनाना इतना आसान किया है तो नतीजतन ऐसी सामग्री और सोशल मीडिया नैरेटिव। पहले जिस काम के लिए डिजाइनर, एडिटर और तकनीकी कौशल चाहिए था, उसके बजाय अब मात्र एक अच्छे प्रॉम्प्ट से यह गंदगी संभव है। असली वीडियो और AI से बने वीडियो का फर्क भी लगातार कठिन है।

सो लब्बोलुआब यह कि भारतीय राजनीति के लिए AI प्रचार का धांसू नया औजार है। वह वास्तविकता जैसी दिखने वाली कृत्रिम वास्तविकता बनाने की बीन भी है।

तभी इस सत्य को नोट करें कि अमेरिका और चीन भले AI को अधिकाधिक बुद्धिमान बनाने में दिल-दिमाग खपाए हुए हैं, वहीं भारत उसका यूजर बाजार है। और बाजार में इसकी उपयोगिता अलग ही लेवल की है। अर्थात AI से भारत पहले से मौजूद झूठ, मूर्खता और अज्ञान को अधिक उत्पादक बनाने का सुपर उपयोक्ता हो गया है। कहने को सरकारी आंकड़े भारत को AI कौशल और अपनाने में अग्रणी देश बताते हैं। भारतीय कंपनियां कई व्यावसायिक क्षेत्रों में AI लागू करने में गंभीर हैं। मगर भीड़ और बहुसंख्यक आबादी में वह जो पैदा कर रही है, वह दिमागी बर्बादी है, मानसिक पतन है और विश्वगुरुता के ढोल में पोल है।

इसलिए क्योंकि AI में भारत की दशा वही है जो दिल्ली में आयोजित वैश्विक शिखर सम्मेलन में जाहिर हुई थी। इसमें प्रधानमंत्री मोदी थे, दुनिया के दिग्गज थे। अरबों-खरबों डॉलर के इन्वेस्टमेंट कमिटमेंट्स की घोषणाएं हुईं। लोगों ने मान लिया कि भारत AI महाशक्ति हो गया! बावजूद सत्य क्या था? भारत के महंगे निजी विश्वविद्यालय ने चीन में बना Unitree Go2 रोबोटिक डॉग रखा। उसका नाम “Orion” रखा। विश्वविद्यालय की प्रतिनिधि ने कैमरे पर उसे अपने Centre of Excellence में विकसित बताया। कुछ ही मिनटों में कुत्ते की जन्मकुंडली निकल आई थी—मेड इन चाइना! मामला केवल एक विश्वविद्यालय और एक रोबोट कुत्ते का नहीं है। असली सवाल है—हम AI बना कितना रहे हैं? जवाब है, हम बना नहीं रहे हैं, हम अपनी बुद्धि, दिमाग, सत्य, ज्ञान, खोज को ही झूठ में खलास कर दे रहे हैं।

फरीदाबाद के पास नया शहर बसाने की तैयारी में HSVP, 10 लाख लोगों के रहने का तैयार हो रहा मास्टर प्लान

हरियाणा सरकार ने ‘नमो सिटी’ को विकसित करने का काम शुरू कर दिया है। यह एक ‘ग्रीनफील्ड’ शहर होगा, जिसे कुंडली-मानेसर-पलवल (KMP) एक्सप्रेसवे और जल्द बनने वाले दिल्ली-कटरा एक्सप्रेसवे के आस-पास बसाने की योजना है। हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) ने लगभग 9000 एकड़ की इस परियोजना के लिए झज्जर, सोनीपत और रोहतक जिलों के गांवों की पहचान की है। प्राधिकरण ने वहां के किसानों से कहा है कि वे 31 अक्टूबर तक ‘ई-भूमि’ पोर्टल पर अपनी सहमति दें।

नमो सिटी क्या है?

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सबसे पहले इस साल जून के आखिर में नमो सिटी का विचार पेश किया था। तब वे दिल्ली के व्यापार प्रतिनिधियों से मिले थे और राजधानी के भीड़-भाड़ वाले बाजारों से थोक व्यापारियों को बाहर लाने के लिए 5,000 एकड़ की कमर्शियल टाउनशिप का प्रस्ताव रखा था।

सैनी का था ये प्रस्ताव

प्रस्ताव में एक ऐसा शहर जिसमें चौड़ी सड़कें, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, सिंगल-विंडो और समय-सीमा के भीतर मंजूरी की व्यवस्था हो। निवेश व रोजगार से जुड़े प्रोत्साहन भी मिलें। हरियाणा सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी की जानकारी के मुताबिक नमो सिटी का कॉन्सेप्ट KMP बेल्ट के लिए पहले से मौजूद बड़े विचार का ही एक हिस्सा है।

साल 2018 में हरियाणा कैबिनेट ने ‘पंचग्राम विकास विधेयक’ को मंजूरी दी थी। इसमें 50,000 हेक्टेयर में पांच नए शहर बसाने की योजना थी, जो आठ जिलों – सोनीपत, रोहतक, झज्जर, गुरुग्राम, रेवाड़ी, मेवात (नूंह), फरीदाबाद और पलवल – में एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित होंगे।

इसके अलावा नेशनल कैपिटल रीजन प्लानिंग बोर्ड (NCRPB) ने 16 जून को ‘नमो भारत रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम’ (RRTS) कॉरिडोर के किनारे आत्मनिर्भर और पर्यावरण के अनुकूल शहरी केंद्र के तौर पर ‘नमो सिटी’ बसाने पर चर्चा की थी। यह उसी ब्रांडिंग से जुड़ा, लेकिन एक अलग हिस्सा है।

असल में नमो सिटी ब्रांडिंग का विचार भी उसी बैठक के एक फैसले से आया है। उस बैठक में बोर्ड ने नमो भारत (RRTS) कॉरिडोर के मौजूदा और आने वाले चुनिंदा स्टेशनों पर चार ‘सेमी-ग्रीनफील्ड’ शहरों को ‘मिक्स्ड-यूज’ और ‘ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट’ (यातायात-केंद्रित विकास) के तौर पर विकसित करने का प्रस्ताव दिया था। इनका नाम ‘नमो सिटी’ रखा जाएगा और इन्हें नेशनल कैपिटल रीजन में शामिल राज्यों के बीच एक कॉम्पिटिटिव प्रोसेस के जरिए चुना जाएगा।

इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए बोर्ड ने ₹5,000 करोड़ के परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव को मंज़ूरी दी। इसमें ग्रांट, लोन और गारंटी सपोर्ट का मिला-जुला रूप शामिल है, जिसमें ₹1,000 करोड़ की ग्रांट भी है। NCRPB की फंडिंग का मकसद इन नोड्स पर विकास को तेजी देना है।

अधिकारी ने बताया कि हरियाणा का KMP-लिंक्ड नमो सिटी दो चीजों से प्रेरित है

जून में व्यापारियों को दूसरी जगह बसाने की घोषणा और एक्सप्रेसवे के किनारे सुनियोजित सैटेलाइट शहर बनाने का पुराना सपना। HSVP के जमीन अधिग्रहण के विज्ञापन (जो 1 सितंबर को छपा था) में नमो सिटी को 64,000 एकड़ के बड़े प्रोजेक्ट के हिस्से के तौर पर 9,000 एकड़ में बनाने की बात कही गई थी। इस बड़े प्रोजेक्ट में सोनीपत, रोहतक और झज्जर जैसे कई कस्बों में आम रिहायशी-कमर्शियल-संस्थागत विस्तार और ट्रांसपोर्ट नगर योजनाएं भी शामिल हैं। ये वही तीन जिले हैं, जिन्हें नमो सिटी के लिए चुना गया है।

HSVP ने नमो सिटी के लिए खास तौर पर 10 रेवेन्यू गांवों की पहचान की है

रोहतक में हसनगढ़ (1,320 एकड़), झज्जर में निलोठी, खेड़ी जसौर, जसौर खेड़ी और लोहारहेड़ी ( 1,731, 2,269, 1,315 और 1,117 एकड़) और सोनीपत में पाई, बरौना, खुरमापुर, रोहना और किढोली ( 1,040, 174, 440, 516 और 30 एकड़)। इन सबको मिलाकर कुल जमीन लगभग 10,000 एकड़ होती है।

इन गांवों के किसानों से कहा गया है कि वे 31 अक्टूबर तक e-Bhoomi पोर्टल पर अपनी सहमति दर्ज करें। इसके बाद HSVP का कहना है कि वह पॉलिसी के मुताबिक जमीन खरीदने और विकास का काम शुरू करेगा।

YouTube पर मशहूर होने की धुन में 9 साल के बच्चे ने उड़ाए 1.25 करोड़ रुपये, बेटे की इस हरकत से पिता की जा सकती है नौकरी

हाल के समय में सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है और आज बहुत से लोग सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने के लिए बहुत उत्साहित रहते हैं। हालांकि इस कोशिश में लोग अक्सर किसी भी हद तक चले जाते हैं। ऐसी ही एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है, जो आपको चौंका देगी। ज्यादा व्यूज पाने की चाहत में नौ साल के एक लड़के ने चुपके से अपने पिता के ऑफिस का क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किया और पूरे 1.13 करोड़ खर्च कर दिए। लड़के की लापरवाही के कारण अब उसके पिता की नौकरी खतरे में पड़ गई है।

यह पूरी कहानी नौ साल के एक लड़के और उसके पिता डेव के बारे में है। माइक नाम का यह लड़का “माइटी माइक प्लेज” (Mighty Mike Plays) नाम का एक YouTube चैनल चलाता है, जिस पर वह Minecraft और Roblox जैसे गेम्स के गेमप्ले वीडियो और रोबोटिक्स से जुड़ा कंटेंट अपलोड करता है। किसी भी युवा क्रिएटर की तरह माइक भी इस बात से परेशान था कि उसके वीडियो पर ज़्यादा व्यूज नहीं आ रहे थे। उसकी निराशा को दूर करने के लिए उसके पिता डेव ने उसे YouTube Ads के बारे में बताया। तभी उनके पिता ने उन्हें सिखाया कि सिर्फ $20 (लगभग ₹1,600–₹1,700) में एक छोटा सा ऐड कैंपेन कैसे शुरू किया जाए। उन्होंने उन्हें बजट बनाना ऑडियंस चुनना और विज्ञापन लॉन्च करना सिखाया।

माइक ने शॉर्टकट अपनाया

माइक को अपने पिता की सीख तो याद थी, लेकिन उसने बजट की बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उसका मानना ​​था कि वह जितना ज्यादा पैसा खर्च करेगा, वीडियो को उतने ही ज्यादा व्यूज मिलेंगे। उसके पिता के ऑफिस का क्रेडिट कार्ड पहले से ही Google अकाउंट में सेव था। अगले लगभग तीन हफ्तों तक माइक अकेले ही ऐड टूल्स का इस्तेमाल करता रहा और एक के बाद एक ज्यादा महंगे एडवरटाइजिंग कैंपेन चलाता रहा।

गूगल ने बिना किसी रुकावट के हर कैंपेन के लिए उसके पिता के ऑफिस क्रेडिट कार्ड से पेमेंट काटना शुरू कर दिया। हालांकि जब तीन महीने बाद कुल बिल सामने आया तो वह पूरी तरह हैरान रह गया। बिल कोई छोटी-मोटी रकम नहीं थी। कुल मिलाकर यह $118,000 की भारी-भरकम रकम थी—जो लगभग ₹1.13 करोड़ के बराबर है।

कंपनी की मीटिंग में सच सामने आया

जब डेव को ऑफिस के कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाया गया तो उसे पूरी स्थिति के बारे में पता चला। वहां कंपनी मैनेजर के साथ HR और फाइनेंस टीमें भी मौजूद थीं। उन्होंने उसके सामने तीन हफ्ते के एडवरटाइजिंग कैंपेन का पूरा खर्च रखा और उससे सफाई मांगी। अब डेव सोच रहा है कि क्या उसकी नौकरी बचेगी या उसे अपनी जेब से पूरी रकम चुकानी पड़ेगी।

मजेदार बात यह है कि डेव के बेटे माइक ने जो तरीका अपनाया वह सच में काम कर गया। इतना बड़ा खर्च करने के बाद माइक के वीडियो को 2,00,000 से ज्यादा बार देखा गया। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने बताया कि उन्हें YouTube पर गेमिंग के लंबे-लंबे विज्ञापन दिख रहे थे। जब उसके पिता ने इस बारे में उससे पूछा तो बेटे ने बड़े मासूमियत से जवाब दिया, “अब तो मेरी खैर नहीं।”

इस चौंकाने वाली घटना के बाद माइक के परिवार ने चैनल को बंद करने या कुछ समय के लिए सस्पेंड करने का फैसला किया है। साथ ही कड़े कदम भी उठाए जा रहे हैं—जैसे कि पैरेंटल कंट्रोल लागू करना, खर्च की सीमा तय करना और सेव की गई पेमेंट डिटेल्स को हटाना। गौरतलब है कि माइक के पिता ने खुद अपने बेटे के चैनल पर एक वीडियो पोस्ट करके ये बातें बताईं। इस घटना से हड़कंप मच गया है और फिलहाल हर तरफ इसी की चर्चा हो रही है।

एनसीपीसीआर के सामने मेटा इंडिया प्रमुख पेश

नई दिल्ली। सोशल मीडिया मंचों पर बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री यानी सीएसईएएम वाले कथित विज्ञापनों की जांच के सिलसिले में मेटा इंडिया के शीर्ष अधिकारी बुधवार को एक सप्ताह में दूसरी बार राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के सामने पेश हुए। इनमें मेटा इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास भी शामिल थे।   आयोग से बाहर निकलने के बाद श्रीनिवास ने बैठक के बारे में मीडिया के बार-बार पूछे गए सवालों का जवाब नहीं दिया।

सूत्रों के अनुसार श्रीनिवास और उनकी टीम ने आयोग के सामने इस मामले में वही रुख दोहराया, जो कंपनी ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सामने रखा था। एनसीपीसीआर ने नौ सितंबर को मेटा इंडिया के प्रबंध निदेशक और प्रमुख को सोशल मीडिया मंच पर सीएसईएएम से जुड़े कथित विज्ञापनों की जांच के सिलसिले में तलब किया था। आयोग ने ‘बीबीसी आई’ की एक रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेकर मेटा से स्पष्टीकरण मांगा था। आयोग ने जुलाई में कंपनी को पहला नोटिस भेजा था और बाद में मामले की औपचारिक जांच शुरू की।

एनसीपीसीआर ने एक अलग मामले में बेंगलुरु में कंपनी द्वारा संचालित एक पालना-घर में बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनी कैपजेमिनी के एक वरिष्ठ अधिकारी को भी तलब किया।

इस बीच फेसबुक और इंस्टाग्राम की मालिक कंपनी मेटा बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों की रिपोर्ट सीधे इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी आई4सी द्वारा संचालित साइबर अपराध पोर्टल पर करने के लिए सहमत हुई है।  सरकार ऑनलाइन बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और अन्य हानिकारक सामग्री को लेकर सोशल मीडिया मंचों से अधिक सुरक्षा उपाय और जवाबदेही की मांग कर रही है।

मेटा के प्रवक्ता ने कहा है कि कंपनी के लिए उसके मंचों पर बच्चों की सुरक्षा प्राथमिकता है और वह सरकार के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि ऐसे अपराध करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाए।कंपनी के अनुसार बच्चों को होने वाले नुकसान से निपटने के प्रयास मजबूत करने के लिए मेटा अब बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों की रिपोर्ट सीधे आई4सी द्वारा संचालित साइबर अपराध पोर्टल पर करेगा।

अमेरिका में मुख्यालय वाली मेटा ऐसी व्यवस्था बनाने का वादा करने वाली पहली बड़ी प्रौद्योगिकी मध्यस्थ कंपनी है, जिसके तहत बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों की जानकारी सीधे भारतीय कानून प्रवर्तन व्यवस्था को दी जाएगी। अब तक मेटा ऐसे मामलों की रिपोर्ट अमेरिका स्थित ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन’ यानी एनसीएमईसी को करती रही है। नई व्यवस्था के बाद भारतीय एजेंसियों तक ऐसी सूचनाएं सीधे पहुंचाने का रास्ता बनेगा।

हिंदी दिवस 2026: हिंदी नहीं रही अब पहले जैसी, फिर भी दुनिया में बढ़ता जा रहा इसका दबदबा

हिंदी दिवस 2026: हिंदी नहीं रही अब पहले जैसी, फिर भी दुनिया में बढ़ता जा रहा इसका दबदबा

Hindi Diwas 2026

Hindi Diwas 2026

14 सितंबर 2026 को हिन्दी दिवस मनाया जाएगा। वर्तमान में भले ही हिंदी के हाल अच्‍छे नहीं है। बोलचाल की भाषा में हिन्दी में ऊर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी के शब्दों की अधिकता होने लगी है। हिंदी के अखबार और किताबों में भी अब वैसी हिंदी नहीं रही जैसी होना चाहिए थी। इसमें अंग्रेजी के शब्दों की भरमार हो चली है। हिंदी के अंग्रेजी और ऊर्दू होते जाने के दौर में भी हिंदी का बाजार पहले की अपेक्षा बढ़ने लगा है। कुछ लोगों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में लोग हिंदी बोलना छोड़ देंगे। हकीकत इसके बिल्कुल उलट है- आज वैश्विक और डिजिटल स्तर पर हिंदी का विस्तार तेजी से हो रहा है। 

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हिंदी के अस्तित्व और विस्तार के 4 बड़े प्रमाण

डिजिटल और इंटरनेट क्रांति:

  1. आज इंटरनेट, सोशल मीडिया और ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी कंटेंट की मांग में अभूतपूर्व उछाल आया है।
  2. एआई (AI) और सर्च इंजन में हिंदी भाषा की उपस्थिति मजबूत हुई है; विश्व हिंदी दिवस 2026 की थीम भी “पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक” इसी बदलाव को दर्शाती है।

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ग्लोबल रीच और यूजर बेस:

दुनिया भर में हिंदी 60 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में शामिल है।

विश्व की कई वैश्विक टेक कंपनियां (Google, Meta, Microsoft) हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के यूजर्स को ध्यान में रखकर अपने उत्पाद और सेवाएं तैयार कर रही हैं।

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भाषा का बदलता रूप ('हिंग्लिश' बनाम 'अस्तित्व'):

लोगों को लगता है कि “हिंदी नहीं रही अब हिंदी”, क्योंकि बोलचाल में अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण (हिंग्लिश) बढ़ा है।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार, शब्दों का आदान-प्रदान किसी भाषा के खत्म होने का नहीं, बल्कि उसके जीवंत और अनुकूलनीय (adaptive) होने का संकेत है।

 

आर्थिक और व्यावसायिक महत्व:

विज्ञापन, बॉलीवुड/सिनेमा, डिजिटल मीडिया और ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए हिंदी और भारतीय भाषाएं सबसे बड़ा बाजार बन चुकी हैं। हालांकि इन माध्यमों में हिंदी के बीच अंग्रेजी का ज्यादा उपयोग किया जाता है जिसके चलते हिंदी को संघर्ष करना पड़ रहा है।

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चुनौतियां और जिम्मेदारियां

हालांकि हिंदी खत्म नहीं हो रही है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां जरूर हैं:

रोजगार और उच्च शिक्षा: तकनीकी शिक्षा, मेडिकल और उच्च न्यायपालिका में अभी भी अंग्रेजी का दबदबा है, जिसे बदलने की दिशा में प्रयास (जैसे एनईपी 2020) जारी हैं।

शुद्धता का क्षरण: अति-आधुनिकता के चक्कर में अपनी लिपि (देवनागरी) और मूल शब्दावली की उपेक्षा न हो, इसके लिए नई पीढ़ी को साहित्य और सही लेखन से जोड़ना जरूरी है।

 

Croma सेल में iPhone 17 Pro Max पर बंपर छूट, जानिए कीमत और ऑफर्स की पूरी डिटेल

Croma ने भारत में अपने स्टोर्स पर चल रहे नए ऑफर्स के तहत iPhone 17 Pro Max की कीमत में बड़ी कटौती की है। इस छूट के साथ 256GB मॉडल की प्रभावी कीमत 74,990 रुपये और 512GB मॉडल की प्रभावी कीमत 94,990 रुपये हो गई है। इसमें योग्य एक्सचेंज ऑफर और दूसरे फायदे शामिल हैं।

बता दें कि यह ऑफर ऐसे समय में आया है जब Croma नए iPhone 18 Pro लाइनअप के लिए प्री-बुकिंग भी शुरू कर रहा है। इससे खरीदारों को लेटेस्ट मॉडल लेने या पिछली जनरेशन के Pro Max को काफी कम प्रभावी कीमत पर खरीदने का विकल्प मिलता है।

iPhone 17 Pro Max की डील के बारे में जानकारी

Croma स्टोर्स पर iPhone 17 Pro Max का 256GB मॉडल 74,990 रुपये की प्रभावी कीमत पर मिल रहा है, जबकि ऑफर के तहत 512GB मॉडल की कीमत 94,990 रुपये है। ये कीमतें फोन की स्टैंडर्ड सेलिंग प्राइस में सीधी कटौती के बजाय, एक्सचेंज बेनिफिट्स और अन्य लागू डिस्काउंट्स को मिलाकर तय की गई हैं।

इसमें सबसे बड़ा हिस्सा Croma की ओर से दिया जाने वाला 12,000 रुपये तक का एक्सचेंज बोनस है। खरीदार अपना पुराना iPhone भी एक्सचेंज कर सकते हैं। Croma iPhone 15 Pro Max के लिए उसके मॉडल और कंडीशन के आधार पर 53,000 रुपये तक दे रहा है।

इसके अलावा, चुनिंदा क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करने पर ग्राहकों को 4,000 रुपये का बैंक कैशबैक भी मिल सकता है। इसका मतलब है कि फाइनल प्रभावी कीमत एक्सचेंज किए जा रहे डिवाइस की वैल्यू और लागू ऑफर्स के लिए ग्राहक की पात्रता पर निर्भर करती है।

iPhone 17 Pro Max पर और भी ऑफर

Croma, iPhone 17 Pro सीरीज के साथ कुछ अतिरिक्त फायदे भी दे रहा है। iPhone 17 Pro Max खरीदने वाले ग्राहक 3,499 रुपये की कीमत वाला Hyphen केस कॉम्बो मुफ्त में पा सकते हैं।

iPhone 17 Pro सीरीज के डिवाइस के साथ AppleCare+ खरीदने पर 10% की सीधी छूट भी मिल रही है। जो ग्राहक छह महीने की ‘नो कॉस्ट EMI’ का विकल्प चुनते हैं, उन्हें शर्तों के अनुसार 4,000 रुपये का अतिरिक्त कैशबैक भी मिल सकता है।

जो खरीदार एक्सचेंज ऑफर का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, उनके लिए Croma.com पर iPhone 17 Pro Max की कीमत 256GB के लिए 1,39,990 रुपये और 512GB के लिए 1,59,990 रुपये है (इसमें 4,000 रुपये का बैंक कैशबैक भी शामिल है)। ये ऑनलाइन कीमतें 15 सितंबर से लागू होंगी।

iPhone 17 Pro Max बनाम iPhone 18 Pro

इस ऑफर का समय बहुत अहम है क्योंकि Croma साथ ही iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max की प्री-बुकिंग शुरू करने की तैयारी भी कर रहा है। नए मॉडल्स की प्री-बुकिंग 12 सितंबर को शाम 5:30 बजे शुरू होगी।

Croma स्टोर्स पर, iPhone 18 Pro मॉडल में से किसी को भी ₹5,000 देकर प्री-बुक किया जा सकता है। Croma.com, Tata Neu और BigBasket के ज़रिए ऑनलाइन प्री-बुकिंग के लिए पूरा पेमेंट करना होगा। Croma नए Pro मॉडल्स पर ₹12,000 तक का एक्सचेंज बोनस भी दे रहा है।

इसलिए, iPhone 17 Pro Max की यह डील उन ग्राहकों के लिए है जिन्हें ज़रूरी नहीं कि सबसे नया मॉडल ही चाहिए; वे Apple के पिछले Pro Max मॉडल को काफ़ी कम प्रभावी कीमत पर लेना पसंद करेंगे।

iPhone 17 Pro Max कहां से खरीदें

iPhone 17 Pro Max के ऑफर देश भर के Croma स्टोर पर उपलब्ध हैं, जबकि ऑनलाइन खरीदने के विकल्प Croma.com और Tata Neu इकोसिस्टम के जरिए उपलब्ध हैं। Croma भारत के 200 से ज्यादा शहरों में 560 से ज्यादा स्टोर चलाता है।

विज्ञापन में बताई गई कीमतें और फायदे पात्रता, उपलब्धता और अलग-अलग ऑफर की शर्तों पर निर्भर करते हैं। पुराने फोन के मॉडल और उसकी स्थिति के आधार पर एक्सचेंज वैल्यू भी अलग-अलग हो सकती है।

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UP Lekhpal Result 2026: 7994 पदों पर भर्ती के लिए लिखित परीक्षा का रिजल्ट जारी, डॉक्युमेंट वेरिफिकेशन पर ये है अपडेट

UP Lekhpal Result 2026: उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) ने यूपी लेखपाल रिजल्ट 2026 जारी कर दिया है। यूपी लेखपाल भर्ती लिखित मुख्य परीक्षा 21 मई, 2026 को हुई थी। इस परीक्षा में शामिल उम्मीदवार अब आधिकारिक वेबसाइट upsssc.gov.in पर अपना रिजल्ट देख सकते हैं। रिजल्ट में उन कैंडिडेट की डिटेल्स हैं, जो अगले चरण में शामिल होने के लिए सफल घोषित किए गए हैं। शॉर्टलिस्ट उम्मीदवार डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन (DV) चरण में शामिल होंगे। यूपीएसएसएससी जल्द ही डीवी का विस्तृत शेड्यूल और निर्देश आधिकारिक पोर्टल पर जारी करेगा।

यूपी लेखपाल भर्ती 2026 विज्ञापन संख्या 02-एग्जाम/2025 के तहत आयोजित की जा रही है। इसके तहत राज्य में कुल 7994 लेखपाल पदों पर नियुक्ति की जाएगी। यूपी लेखपाल भर्ती 2026 लिखित मुख्य परीक्षा में 28,409 कैंडिडेट क्वालिफाई हुए हैं, जो डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के अगले चरण में शामिल होंगे। यूपी लेखपाल रिजल्ट 2026 यूपीएसएसएससी की आधिकारिक वेबसाइट के रिजल्ट सेक्शन में नोटिफिकेशन पीडीएफ के जरिए देखा जा सकता है। शॉर्टलिस्ट किए गए कैंडिडेट्स को भर्ती प्रक्रिया के अगले चरण के लिए रिजल्ट की एक प्रिंटेड कॉपी रखनी होगी।

यूपी लेखपाल रिजल्ट 2026 एक नजर में

इस भर्ती के जरिए राजस्व विभाग/बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, उत्तर प्रदेश में कुल 7,994 पद भरे जाएंगी। नीचे दिए गए टेबल में इस भर्ती से जुड़ी डिटेल्स देखें।

खास जानकारी

एग्जाम यूपी लेखपाल 2026

कन्डक्टिंग बॉडी उत्तर प्रदेश सबऑर्डिनेट सर्विसेज़ सिलेक्शन कमीशन (UPSSSC)

रिजल्ट घोषित

रिजल्ट रिलीज डेट 11 सितंबर, 2026

रिजल्ट मोड ऑनलाइन

कुल क्वालिफाइड कैंडिडेट 28,409

खाली जगहों की संख्या 7994

अगला स्टेज डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन

ऑफिशियल वेबसाइट upsssc.gov.in

यूपीएसएसएससी लेखपाल रिजल्ट 2026 डाउनलोड करने के स्टेप्स

कैंडिडेट अपना यूपी लेखपाल रिजल्ट 2026 चेक करने के लिए नीचे दिए गए स्टेप्स फॉलो कर सकते हैं

  • यूपीएसएसएससी की ऑफिशियल वेबसाइट upsssc.gov.in पर जाएं।
  • होमपेज पर नोटिस बोर्ड सेक्शन पर जाएं
  • एडवर्टाइजमेंट नंबर-02-एग्जाम/2025, लेखपाल मेन एग्जामिनेशन (PET-2025)/01 के तहत एलिजिबिलिटी / डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के लिए क्वालिफाई हुए कैंडिडेट्स के रिजल्ट लिंक पर क्लिक करें।
  • जरूरी डिटेल्स डालें।
  • रिजल्ट देखने के लिए डिटेल्स सबमिट करें।
  • रिजल्ट में अपना क्वालिफाइंग स्टेटस चेक करें।
  • आगे के रेफरेंस के लिए रिजल्ट की एक कॉपी डाउनलोड करके सेव कर लें।

यूपीएसएसएससी लेखपाल रिजल्ट 2026 में दी गई डिटेल्स

यूपीएसएसएससी लेखपाल रिजल्ट 2026 में दी गई ये डिटेल्स चेक कर सकते हैं

  • कैंडिडेट का नाम
  • रोल नंबर
  • रजिस्ट्रेशन नंबर
  • कैटेगरी
  • क्वालिफाइंग स्टेटस
  • मेरिट या शॉर्टलिस्टिंग स्टेटस
  • एलिजिबिलिटी या डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के बारे में डिटेल्स
  • अगले स्टेज के लिए जरूरी निर्देश

यूपी लेखपाल रिजल्ट 2026 रिजल्ट के बाद क्या?

यूपी लेखपाल रिजल्ट 2026 में शॉर्टलिस्ट उम्मीदवारों को अब दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाया जाएगा। यूपीएसएसएससी डीवी का विस्तृत शेड्यूल और जरूरी निर्देश अपनी ऑफिशियल वेबसाइट के जरिए देगा।

IAF Agniveervayu 2026: सिटी इंटीमेशन स्लिप से जानें किस शहर में आपको देनी है अग्निवीरवायु भर्ती की परीक्षा? आधिकारिक वेबसाइट से करें चेक

न इंजीनियरिंग की डिग्री, न टेक्निकल बैकग्राउंड, BBA छात्र ने बताया कैसे 2010 में Google में मिली नौकरी

Google में नौकरी का सपना देखने वालों में अक्सर इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस के छात्रों का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन निखिल दुर्गानी की कहानी इस आम धारणा से बिल्कुल अलग है। उन्होंने न तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और न ही कंप्यूटर साइंस की। इसके बावजूद 2010 में BBA के छात्र रहते हुए उन्हें Google में नौकरी मिल गई। करीब 16 साल तक कंपनी में काम करने के बाद 2026 में उन्होंने 35 साल की उम्र में रिटायरमेंट ले लिया।

जब कॉलेज कैंपस में Google को देखकर हैरान रह गए छात्र

निखिल का जन्म और पालन-पोषण भारत में हुआ। पढ़ाई के लिए वह कोलकाता के St. Xavier’s College पहुंचे, जहां उन्होंने BBA में दाखिला लिया। साल 2010 में जब वह ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष में थे, तभी उनके कॉलेज में Google कैंपस प्लेसमेंट के लिए पहुंचा। यह देखकर छात्रों को काफी हैरानी हुई। वजह थी कॉलेज का माहौल। वहां ज्यादातर छात्र कॉमर्स, आर्ट्स और जर्नलिज्म जैसे विषयों से जुड़े थे। ऐसे में एक बड़ी टेक कंपनी का कैंपस में आना कई छात्रों के लिए किसी पहेली से कम नहीं था। निखिल ने बाद में बताया कि छात्रों के मन में सवाल था कि आखिर Google उनके कॉलेज में क्यों आई है, जबकि वहां इंजीनियरिंग के छात्र ही नहीं हैं।

तब पहली बार सामने आया Google AdWords का नाम

कैंपस भर्ती के दौरान निखिल और उनके साथियों को पता चला कि Google में सिर्फ सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के लिए ही नौकरियां नहीं होतीं। कंपनी के विज्ञापन कारोबार में ऐसे लोगों की भी जरूरत थी, जिन्हें बिजनेस और ग्राहकों की समझ हो। यहीं निखिल की मुलाकात Google AdWords से हुई। यही प्लेटफॉर्म आगे चलकर Google के बड़े विज्ञापन कारोबार का अहम हिस्सा बना और 2018 में इसका नाम बदलकर Google Ads कर दिया गया। निखिल के लिए यह एक ऐसा मौका था, जिसने उनके करियर की दिशा ही बदल दी।

BBA के बाद सीधे Google, शुरुआत Account Optimizer के तौर पर

2010 में निखिल उन तीन छात्रों में शामिल थे, जिन्हें St. Xavier’s College से Google ने चुना था। तीनों की पहली पोस्टिंग हैदराबाद में हुई। निखिल ने Account Optimizer के तौर पर काम शुरू किया। उनकी जिम्मेदारी विज्ञापनदाताओं की ऑनलाइन विज्ञापन कैंपेन को बेहतर बनाने और उन्हें अच्छे नतीजे दिलाने की थी। यानी जिस छात्र ने कॉलेज में BBA पढ़ते हुए Google के कैंपस में आने पर हैरानी जताई थी, कुछ ही समय बाद वह खुद Google की टीम का हिस्सा बन चुका था।

प्लान था सिर्फ दो साल नौकरी करने का

Google ज्वाइन करते समय निखिल ने नहीं सोचा था कि उनका सफर इतना लंबा होने वाला है। उनकी योजना थी कि कुछ साल नौकरी करेंगे और फिर मास्टर्स की पढ़ाई के लिए आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन Google में उन्हें लगातार नई भूमिकाएं और नए अवसर मिलते रहे। इसी वजह से उनका सफर एक नौकरी से बढ़कर लंबा करियर बन गया।

एक रोटेशन प्रोग्राम ने खोले करियर के नए दरवाजे

Google में करीब तीन साल काम करने के बाद निखिल को एक रोटेशन प्रोग्राम में शामिल होने का मौका मिला। इस प्रोग्राम के जरिए कर्मचारी कुछ समय के लिए कंपनी की किसी दूसरी टीम या भूमिका में काम कर सकते थे। इससे उन्हें यह समझने का मौका मिलता था कि वे आगे किस क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं। निखिल के लिए यह अनुभव काफी अहम साबित हुआ। उन्होंने कंपनी के भीतर अलग-अलग भूमिकाओं और टीमों को समझा और अपने करियर का दायरा बढ़ाया।

हैदराबाद से अमेरिका तक पहुंचा सफर

Google में करीब साढ़े तीन साल हैदराबाद में काम करने के बाद निखिल को विदेश जाने का अवसर मिला। वह अमेरिका के मिशिगन स्थित Ann Arbor पहुंचे। यह उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। भारत से बाहर काम करने के अनुभव ने उनके सामने आगे बढ़ने की नई संभावनाएं खोलीं।इसी दौरान उन्हें Google Singapore जाने का मौका मिला।

Singapore गए तो वहीं बस गई जिंदगी

निखिल करीब 12 साल से सिंगापुर में रह रहे हैं। शुरुआत में यह उनके करियर का अगला पड़ाव था, लेकिन धीरे-धीरे सिंगापुर उनकी स्थायी जिंदगी का हिस्सा बन गया। यहीं उन्होंने अपने परिवार के साथ जीवन बसाया और Google में अपना करियर भी आगे बढ़ाया। भारत के एक कॉलेज से शुरू हुआ उनका सफर पहले हैदराबाद, फिर अमेरिका और आखिरकार सिंगापुर तक पहुंच गया।

15 साल से ज्यादा Google में बिताए, फिर 35 की उम्र में रिटायरमेंट

2010 में शुरू हुआ Google का सफर 2026 में खत्म हुआ। निखिल ने कंपनी में 15 साल से ज्यादा समय बिताने के बाद 35 साल की उम्र में रिटायरमेंट ले लिया। उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसकी शुरुआत एक ऐसे मौके से हुई थी, जिसकी उन्होंने शायद उम्मीद भी नहीं की थी। BBA के छात्र निखिल ने जब अपने कॉलेज में Google को देखा था, तब उनके मन में सवाल था “Google यहां क्यों आई है?” लेकिन उसी सवाल का जवाब उनके लिए एक नए करियर के रूप में सामने आया।

आज उनकी कहानी यह बताती है कि किसी कंपनी में करियर बनाने के लिए हमेशा वही डिग्री जरूरी नहीं होती, जिसकी हम कल्पना करते हैं। कभी-कभी आपकी पढ़ाई से ज्यादा मायने रखता है कि आपके सामने आया मौका आपकी काबिलियत से कितना मेल खाता है और आप उस मौके को कितनी दूर तक ले जा पाते हैं।

180 बार होटल, 50+ इंश्योरेंस पॉलिसियां और करोड़ों रुपये… पत्नी ने ऐसे पकड़ा पति का अफेयर