Stock To Buy: एक्सिस ने इन 7 लार्ज-कैप शेयरों पर दी खरीद की सलाह, मिल सकता है 44% का रिटर्न

Stock To Buy: भारतीय शेयर बाजार ने अभी एक रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन ऐसा रिकॉर्ड नहीं जिसकी निवेशकों को उम्मीद थी। दलाल स्ट्रीट में लगातार आठ हफ़्तों से गिरावट देखी गई है, जो 2020 के कोविड-19 क्रैश और 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान देखी गई गिरावट से भी ज़्यादा है। बाजार की इस बढ़ी गिरावट में एक्सिस सिक्योरिटीज ने 7 लार्ज-कैप स्टॉक्स चुने हैं जिनमें भारी गिरावट के बाद भी मजबूत वैल्यू है। एक्सिस

बजाज फाइनेंस (Bajaj Finance)

एक्सिस ने 1,305 रुपये का प्राइस टारगेट तय किया है, जो मौजूदा लेवल से 36% ज़्यादा है। यह कंपनी कंज्यूमर फाइनेंस के लिए भारत की सबसे बड़ी NBFCs में से एक है। इसके पास टू-व्हीलर, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, हाउसिंग और छोटे व्यवसायों के लिए लोन जैसे कई तरह के प्रोडक्ट्स का पोर्टफोलियो है।

भारती एयरटेल (Bharti Airtel)

2,530 रुपये के प्राइस टारगेट के साथ, ब्रोकरेज ने मौजूदा लेवल से 44% बढ़ने की संभावना जताई है। यह एक भारतीय मल्टीनेशनल टेलीकम्युनिकेशन कंपनी है जो दक्षिण एशिया, अफ्रीका और चैनल आइलैंड्स के 18 देशों में काम करती है। यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम ऑपरेटर है, जिसकी घरेलू बाज़ार में मज़बूत मौजूदगी है और इसके पास डिजिटल सेवाओं का एक व्यापक पोर्टफोलियो है, जिसमें फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क, मोबाइल और डेस्कटॉप टेलीफोनी और अन्य डिजिटल समाधान शामिल हैं।

ICICI बैंक (ICICI Bank )

1,800 रुपये के टारगेट प्राइस के साथ, ब्रोकरेज ने मौजूदा लेवल से 36% बढ़ने की संभावना जताई है। इस लेंडर को मजबूत लायबिलिटी फ्रैंचाइज़ और अच्छे रिटेल-कॉर्पोरेट मिक्स का सहारा मिला हुआ है। बैंक की सब्सिडियरी कंपनियाँ, जैसे ICICI वेंचर फंड्स, ICICI प्रू AMC, ICICI सिक्योरिटीज, ICICI प्रूडेंशियल और ICICI लोम्बार्ड, अपने-अपने क्षेत्रों की प्रमुख कंपनियों में शामिल हैं।

एटरनल (Eternal)

एक्सिस बैंक ने 390 रुपये के टारगेट प्राइस के साथ खरीदारी की राय दी है। ब्रोकरेज ने मौजूदा लेवल से इसमें 22% बढ़ने की संभावना जताई है। कंपनी का बिजनेस मॉडल ‘एसेट-लाइट’ है, जो डिमांड और सप्लाई को एक साथ लाने पर आधारित है। साथ ही, यह कुशल लास्ट-माइल लॉजिस्टिक्स को सक्षम बनाता है, मज़बूत नेटवर्क प्रभाव पैदा करता है और यूज़र एंगेजमेंट को बढ़ाता है। इसमें चार मुख्य बिज़नेस शामिल हैं। ज़ोमैटो (Zomato), ब्लिंकिट (Blinkit), डिस्ट्रिक्ट (District) और हाइपरप्योर (Hyperpure)।

वरुण बेवरेजेज़ (Varun Beverages)

एक्सिस बैंक ने ₹530 के टारगेट प्राइस के साथ इस स्टॉक में खरीदारी की राय दी है। ब्रोकरेज का अनुमान है कि पिछली क्लोजिंग के मुकाबले इसमें 23% की बढ़त हो सकती है। VBL ग्लोबल बेवरेज इंडस्ट्री में एक अहम कंपनी है और दुनिया भर में (US के बाहर) पेप्सिको (PepsiCo) की दूसरी सबसे बड़ी फ्रैंचाइज़ी है। इसके पास फ्रैंचाइज़ी अधिकारों के तहत 10 देशों में और डिस्ट्रीब्यूशन अधिकारों के तहत 4 और देशों में कामकाज करने की सुविधा है।

कोटक महिंद्रा बैंक (Kotak Mahindra Bank)

₹500 के टारगेट प्राइस के साथ, एक्सिस (Axis) का अनुमान है कि मौजूदा स्तरों से इसमें 20% की बढ़त हो सकती है। यह भारत के प्रमुख डाइवर्सिफाइड फाइनेंशियल सर्विस ग्रुप्स में से एक है, जो अलग-अलग कस्टमर सेगमेंट और इलाकों में कई तरह की सर्विस देता है। यह रिटेल कस्टमर्स (सैलरी पाने वाले और खुद का काम करने वाले दोनों), छोटे बिज़नेस, NRI, संस्थानों और सरकारी संस्थाओं को सर्विस देता है। इसकी सर्विस में सुविधा, इनोवेशन और डिजिटल-फर्स्ट ऑफरिंग पर खास ध्यान दिया जाता है।

नेस्ले इंडिया (Nestle India)

ब्रोकरेज ने इसका टारगेट प्राइस ₹1,765 तय किया है, जो मौजूदा स्तरों से 35% ज़्यादा है। नेस्ले इंडिया कई तरह के फूड और बेवरेज प्रोडक्ट्स बनाती और बेचती है, जिनमें दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स, कॉफी, चाय, नूडल्स, चॉकलेट, कन्फेक्शनरी और बच्चों के लिए न्यूट्रिशन प्रोडक्ट्स शामिल हैं। भारत में इसके कुछ पॉपुलर ब्रांड्स में मैगी (Maggi), नेस्कैफे (Nescafé), किटकैट (KitKat), मिल्कीबार (MilkyBar) और नेस्ले एवरीडे (Nestle Everyday) शामिल हैं।

 

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Nestle Controversies: कभी बेबी फूड, कभी किटकैट, कभी मैगी…नेस्ले के लिए नया नहीं है विवादों में घिरना, लंबा है इतिहास

एफएमसीजी कंपनी नेस्ले (Nestle) एक बार फिर विवादों में है। ताजा मामला इसकी भारतीय यूनिट नेस्ले इंडिया से जुड़ा है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पाया है कि शिशु पोषण (Infant Nutrition) के 3 उत्पादों में खाद्य सुरक्षा मानकों का कथित रूप से पालन नहीं किया गया। इसे लेकर FSSAI ने नेस्ले इंडिया लिमिटेड के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की है। हालांकि कंपनी का कहना है कि वह लागू नियमों का पूरी तरह पालन कर रही है। FSSAI का कहना है कि उसने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध NAN एक्सेला प्रो स्टेज 1, लैक्टोजेन प्रो 1 और एक फॉलो-अप फॉर्मूला की जांच शुरू की है।

नियामक ने NAN एक्सेला प्रो स्टेज-1 में ‘5HMOs’ और ‘व्हे प्रोटीन’ से जुड़े दावों पर आपत्ति जताई है। वहीं, लैक्टोजेन प्रो 1 में ‘व्हे प्रोटीन’ को आसानी से पचने वाला बताने के दावे पर सवाल उठाया है। इसके अलावा नेस्ले इंडिया के एक फॉलो-अप फॉर्मूला का सैंपल लैब टेस्ट में बायोटिन की मात्रा के मामले में स्टैंडर्ड्स के मुताबिक नहीं पाया गया। नेस्ले इंडिया के ये तीनों प्रोडक्ट प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं। इसलिए FSSAI ने कंपनी के खिलाफ 3 अलग-अलग मामले दर्ज किए हैं। हालांकि नेस्ले इंडिया का कहना कि उसके बच्चों के पोषण वाले प्रोडक्ट सभी लागू नियमों का पूरी तरह से पालन करते हैं।

नेस्ले और विवादों का नाता नया नहीं है। कंपनी भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी पहले भी कई बार विवादों के साए में रह चुकी है। कभी गलत मार्केटिंग प्रैक्टिसेज, कभी प्रोडक्ट की प्राइस फिक्सिंग तो कभी अनहेल्दी प्रोडक्ट्स को लेकर कंपनी आलोचनाएं झेल चुकी है। आइए डालते हैं एक नजर नेस्ले से जुड़े प्रमुख विवादों पर…

बेबी फॉर्मूला मार्केटिंग विवाद

साल 1977 में अमेरिका में नेस्ले को जबरदस्त बॉयकॉट झेलना पड़ा था। वजह थी नेस्ले के ब्रेस्ट मिल्क सब्सटिट्यूट की एग्रेसिव मार्केटिंग। यह मार्केटिंग कुछ इस तरह की गई कि कंपनी पर मांओं को स्तनपान कराने से हतोत्साहित करने और अपने बेबी फॉर्मूले को मां के दूध से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक यानि हेल्दी बताने का आरोप लग गया। कैंपेनिंग में इस तरह का संकेत दिया गया कि इस फॉर्मूले का इस्तेमाल हेल्थ प्रोफेशनल्स करते हैं। नेस्ले ने मैटरनिटी यूनिट्स में अपने फॉर्मूले के फ्री सैंपल बांटना शुरू किया और सेल्सपर्सन को नर्स के जैसे तैयार करके पेश करने लगी।

हालांकि नेस्ले का बेबी फॉर्मूला, मां के दूध से ज्यादा पौष्टिक है, इस बात का कोई सबूत नहीं था। लेकिन विवाद तो खड़ा हो गया था और 1977 में अमेरिका में नेस्ले का बहिष्कार शुरू हो गया। फिर यह धीरे-धीरे यूरोप में भी फैल गया। बहिष्कार आधिकारिक तौर पर 1984 में बंद हुआ, वह भी तब जब नेस्ले, WHO द्वारा समर्थित इंटरनेशनल मार्केटिंग कोड का पालन करने पर राजी हुई। लेकिन 1989 में बॉयकॉट फिर शुरू हो गया। इसके बाद नेस्ले पर 1990 के दशक में भी पाकिस्तान जैसे विकासशील देशों में इसी तरह की मार्केटिंग प्रैक्टिसेज अपनाने के आरोप लगते रहे।

KitKat: चॉकलेट या वेफर

बात 1998 की है। नेस्ले इंडिया अपनी किटकैट को भारत में वेफर की कैटेगरी में रखना चाहती थी और इसी के हिसाब से 10 प्रतिशत सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी भरना चाहती थी। लेकिन टैक्स अथॉरिटीज को यह मंजूर न था। उनका मानना था कि किटकैट एक चॉकलेट है और इसलिए इस पर 20 प्रतिशत ड्यूटी लगनी चाहिए। उनका यह भी कहना था कि नेस्ले इंडिया, किटकैट का विज्ञापन तो चॉकलेट के तौर पर कर रही है, लेकिन ड्यूटी वेफर वाली भरना चाहती है। लेकिन नेस्ले भी कहां कम थी। उसने सफाई दी कि वह किटकैट को चॉकलेट बताकर नहीं बेचती, लोग इसे वेफर और चॉकलेट का कॉम्बिनेशन समझकर खरीदते हैं।

टैक्स अथॉरिटी का कहना था कि किटकैट में 68-70 प्रतिशत चॉकलेट मिल्क है, इसलिए इसे चॉकलेट माना जाना चाहिए। उस वक्त सेंट्रल एक्साइज डिपार्टमेंट ने नेस्ले इंडिया पर 24 करोड़ रुपये की ड्यूटी लगाई थी। इसमें किटकैट के कथित मिसक्लासिफिकेशन के लिए 100 प्रतिशत अनिवार्य जुर्माना शामिल था। नेस्ले इंडिया को सेंट्रल एक्साइज एक्ट के सेक्शन 11 AB के प्रावधानों के मुताबिक ब्याज भरने का भी निर्देश दिया गया था।

मामला बढ़ते-बढ़ते ‘कस्टम्स, एक्साइज एंड गोल्ड ट्राइब्यूनल, मुंबई’ में पहुंचा- ‘नेस्ले इंडिया वर्सेज कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज (एड्ज्यूडिकेशन), मुंबई’। ट्राइब्यूनल को तय करना था कि किटकैट में वेफर पर चॉकलेट की कोटिंग है या चॉकलेट के अंदर वेफर। फैसला नेस्ले के पक्ष में आया, किटकैट को वेफर माना गया और इसे 10 प्रतिशत सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी की कैटेगरी में ही रखा गया।

चॉकलेट प्राइस फिक्सिंग

कनाडा में प्रतिस्पर्धा ब्यूरो ने चॉकलेट की प्राइसिंग के मामले की जांच के लिए 2007 में नेस्ले कनाडा के ऑफिसेज में छापा मारा था। हर्शी कनाडा और मार्स कनाडा के ऑफिस में भी छापे मारे गए थे। आरोप था कि कीमतों को बढ़ाने के लिए नेस्ले के अधिकारियों ने कनाडा में अपने कॉम्पिटीटर्स के साथ मिलीभगत की। कॉम्पिटीटर्स के अधिकारियों ने रेस्टोरेंट, कॉफी की दुकानों और सम्मेलनों में मुलाकात की। यह आरोप भी था कि नेस्ले कनाडा के तत्कालीन सीईओ रॉबर्ट लियोनिडास ने एक बार एक कॉम्पिटीटर को अपनी कंपनी की प्राइसिंग की जानकारी वाला एक लिफाफा दिया था।

2007 में छापेमारी के सार्वजनिक होने के बाद नेस्ले और अन्य कंपनियों के खिलाफ प्राइसिंग के लिए क्लास एक्शन मुकदमे दायर किए गए। नेस्ले ने किसी भी तरह की जिम्मेदारी माने बिना, 90 लाख डॉलर का समझौता किया। इसके बाद भी संयुक्त राज्य अमेरिका में बड़े पैमाने पर क्लास एक्शन मुकदमे चले।

मिल्क प्रोडक्ट विवाद

सितंबर 2008 के आखिर में, हांगकांग सरकार को चीन में बने नेस्ले के दूध के एक प्रोडक्ट में मेलामाइन मिला। किडनी खराब होने से 6 बच्चों की मौत हो गई और 860 अन्य बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। हालांकि नेस्ले ने कहा कि उसके सभी प्रोडक्ट सुरक्षित हैं और उन्हें मेलामाइन-मिलावटी दूध से नहीं बनाया गया है। अक्टूबर 2008 में ताइवान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने घोषणा की कि चीन में नेस्ले द्वारा बनाए गए 6 तरह के मिल्क पाउडर में मेलामाइन की थोड़ी मात्रा पाई गई है, और उन्हें बाजार से हटा दिया गया।

जब मैगी पर हुआ बड़ा बवाल, हो गई थी बैन

सितंबर 2026 में सामने आया नया वाकया FSSAI और नेस्ले इंडिया के बीच दूसरा बड़ा रेगुलेटरी विवाद है। इससे पहले 2015 में भारत में नेस्ले की मैगी को लेकर एक बड़ा बवाल हुआ था। लेड की ज्यादा मात्रा और लेबलिंग से जुड़ी चिंताओं के कारण नेस्ले इंडिया अपने इंस्टेंट नूडल्स लिए घिरी थी। मई 2015 में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश के फूड सेफ्टी रेगुलेटर्स ने रिपोर्ट दी कि मैगी नूडल्स में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG) का लेवल बहुत ही हाई है। साथ ही लेड का स्तर, जितनी मात्रा की इजाजत है उससे 17 गुना ज्यादा है। बस फिर क्या था। मैगी के सेहत के लिए हानिकारक होने, खासकर बच्चों की सेहत के लिए हानिकारक होने को लेकर वाद-विवाद होने लगे। देश में और विदेश में कई जांच हुईं। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि भारत सरकार ने जून 2015 में मैगी नूडल्स को पूरे देश में बैन कर दिया।

हालांकि नेस्ले हमेशा से यही कहती आई है कि उसके नूडल प्रोडक्ट सुरक्षित हैं। भारत में जब बैन लगा तो मैगी को लगभग 320 करोड़ रुपये का स्टॉक रिकॉल करना पड़ा यानि कि बाजार से वापस मंगाना पड़ा। इतना ही नहीं ऐसी भी खबर आई कि उसने एक सीमेंट फैक्ट्री को स्टॉक जलाने के लिए 20 करोड़ रुपये दिए। मैगी में MSG और लेड, उचित मात्रा से अधिक होने के चलते भारत के कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने नेस्ले इंडिया पर 640 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था।

अगस्त 2015 में यूएस हेल्थ रेगुलेटर एफडीए ने टेस्ट किए, जिनमें सामने आया कि मैगी में लेड की मात्रा खतरनाक स्तर पर नहीं है। 13 अगस्त 2015 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने देश में मैगी पर लगे बैन को हटा दिया। कोर्ट का कहना था कि बैन लगाते हुए प्रॉपर प्रोसिजर फॉलो नहीं किया गया। इसके अलावा कोर्ट ने भारत में हुए टेस्ट के नतीजों पर भी सवाल खड़े किए, जिसकी वजह थी कि टेस्ट नेशनल एक्रेडिएशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज की अधिकृत लैब्स में नहीं हुए थे। नवंबर 2015 में मैगी की भारतीय बाजारों में फिर वापसी हो गई।

2021 में जब फूड प्रॉडक्ट्स और ड्रिंक्स अनहेल्दी होने पर घिरी

जून 2021 में नेस्ले के फूड प्रोडक्ट्स पर एक बड़ा खुलासा हुआ। कंपनी के एक इंटर्नल डॉक्युमेंट में माना गया कि उसके 60 प्रतिशत से ज्यादा फूड प्रोडक्ट और ड्रिंक्स अनहेल्दी हैं। कंपनी ने यह भी माना है कि इसके कुछ फूड प्रोडक्ट कभी भी हेल्दी नहीं होंगे, फिर चाहे वह कितना भी सुधार क्यों न कर ले। यह बात सामने आते ही नेस्ले की फिर से आलोचना होने लगी। एक प्रेजेंटेशन में कहा गया था कि ऑस्ट्रेलिया के हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम के तहत कंपनी के 37 प्रतिशत प्रोडक्ट्स को ही 3.5 स्टार या इससे ज्यादा की रेटिंग मिली। 3.5 स्टार की रेटिंग ‘रिकग्नाइज्ड डेफिनेशन ऑफ हेल्थ’ मानी जाती है। सामने आया था कि नेस्ले के 60 प्रतिशत फूड प्रोडक्ट इस मानक पर खरे नहीं उतरे।

भगवान जगन्नाथ की तस्वीर वाली पैकेजिंग पर विवाद

जनवरी 2022 में नेस्ले इंडिया को सोशल मीडिया पर ग्राहकों की पुरजोर नाराजगी का सामना करना पड़ा था। कारण था किटकैट के रैपर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की तस्वीरें। यह नया स्टॉक आते ही विवादों में घिर गया। कंपनी पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा। नेस्ले इंडिया की सफाई थी कि उसके इस कदम का उद्देश्य केवल भारत के खूबसूरत और दर्शनीय स्थलों को उकेरना था। किटकैट के डिब्बे पर पट्टचित्र के जरिए ओडिशा की संस्कृति को उकेरा गया था।

लेकिन तगड़ी आलोचना को देखते हुए कंपनी ने अपने कदम पर खेद जताया। कहा कि उसने साल 2021 में ही विवादास्पद पैकेजिंग वाली किटकैट के डिब्बों को बाजार से वापस ले लिया था। बाकी बचा हुआ माल भी जल्द ही बाजार से गायब हो गया। इससे पहले अप्रैल 2021 में नेस्ले इंडिया ने किटकैट चॉकलेट के पैकेट पर मणिपुर के कीबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान को मेघालय में दिखाए जाने के लिए माफी मांगी थी। राज्य सरकार के अधिकारियों की आपत्ति के बाद कंपनी ने यह कदम उठाया था।

बेबी फूड में चीनी

अप्रैल 2024 में स्विस NGO ‘पब्लिक आई’ और ‘इंटरनेशनल बेबी फूड एक्शन नेटवर्क’ (IBFAN) की एक जांच से पता चला कि कम और मध्यम आय वाले देशों में बेचे जाने वाले नेस्ले के लोकप्रिय बेबी सीरियल प्रोडक्ट्स और फॉर्मूलाज में यूरोप और अन्य विकसित देशों में बेचे जाने वाले उत्पादों की तुलना में काफी ज्यादा मात्रा में एडेड शुगर है। एक रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में जांचे गए सभी सेरेलक बेबी सीरियल प्रोडक्ट्स में एडेड शुगर थी और मात्रा औसतन प्रति सर्विंग लगभग 3 ग्राम थी। वहीं नेस्ले के यूरोपीय बाजार में बिना चीनी वाले शिशु पोषण उत्पाद उपलब्ध थे। विकासशील देशों में नेस्ले के सबसे ज्यादा बिकने वाले बेबी-फूड ब्रांड्स में काफी ज्यादा मात्रा में एडेड शुगर पाई गई, जबकि स्विट्जरलैंड में इसके प्रोडक्ट शुगर-फ्री थे।

Dividend Stocks: 5 लाख खुदरा निवेशकों को स्पेशल डिविडेंड देने की तैयारी, ऐलान पर बढ़ी इस FMCG स्टॉक की चमक

Dividend Stocks: दिग्गज एफएमसीजी कंपनी नेस्ले इंडिया के बोर्ड की अगले महीने 3 जुलाई को बैठक होने वाली है, जिसमें स्पेशल डिविडेंड के प्रस्ताव पर विचार होगा। इसके अलावा डिविडेंड का प्रस्ताव भी है। इससे कंपनी के 4 लाख से अधिक खुदरा निवेशकों के चेहरे खिल उठे और शेयर भी चमक गए। हालांकि शेयरों की तेजी का कुछ निवेशकों ने फायदा उठाया तो भाव नरम पड़े लेकिन अब भी यह ग्रीन जोन में है। फिलहाल बीएसई पर यह 0.37% की बढ़त के साथ ₹1420.60 (Nestle India Share Price) पर है। इंट्रा-डे में यह 1.02% उछलकर ₹1,429.85 तक पहुंच गया था।

Nestle India की क्या है योजना?

नेस्ले ने 19 जून को एक्सचेंज फाइलिंग में जानकारी दी कि 3 जुलाई को बोर्ड की बैठक होनी है जिसमें 2026 के स्पेशल डिविडेंड के प्रस्ताव पर चर्चा होगी। इसके लिए रिकॉर्ड डेट वही है, जो वित्त वर्ष 2026 के फाइनल डिविडेंड के लिए फिक्स की गई है। कंपनी हर शेयर पर ₹5 का फाइनल डिविडेंड बांट रही है, जिसकी रिकॉर्ड डेट 10 जुलाई फिक्स की गई है। इसका पेमेंट 30 जुलाई 2026 को या इसके बाद किया जाएगा। एक्सचेंज फाइलिंग में कंपनी ने यह भी जानकारी दी कि इस वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही अप्रैल-जून 2027 के कारोबारी नतीजे को लेकर बोर्ड की बैठक 22 जुलाई को होगी।

नेस्ले इंडिया में किसकी कितनी हिस्सेदारी?

बीएसई पर मौजूद मार्च 2026 तिमाही के शेयरहोल्डिंग पैटर्न के हिसाब से कंपनी में 62.76% हिस्सेदारी प्रमोटर्स की है तो पब्लिक शेयरहोल्डिंग 37.24% है। पब्लिक शेयरहोल्डर्स में 4.24% होल्डिंग 51 म्यूचुअल फंड्स की है लेकिन इनमें से किसी की भी होल्डिंग 1% या इससे अधिक नहीं है। एलआईसी के पास इसके 11.84 करोड़ से अधिक शेयर हैं जोकि कंपनी की 6.14% होल्डिंग के बराबर है। देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी एलआईसी को मिलाकर 30 इंश्योरेंस कंपनियों की नेस्ले इंडिया में 7.37% होल्डिंग है तो विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 9.74% है। ₹2 लाख तक के निवेश वाले निवेशकों यानी रिटेल शेयरहोल्डर्स की बात करें तो 4,68,638 निवेशकों के पास कंपनी के 15,64,58,392 शेयर हैं जोकि कंपनी की 8.11% होल्डिंग के बराबर है। एचएनआई की होल्डिंग 3.96% है।

एक साल में कैसी रही शेयरों की चाल?

नेस्ले इंडिया के शेयर पिछले साल 14 अगस्त, 2025 को बीएसई पर ₹1085.00 के भाव पर थे जोकि इसके लिए एक साल का रिकॉर्ड निचला स्तर है। इस निचले स्तर से 9 महीने में यह 38.12% उछलकर पिछले महीने 11 मई, 2026 को ₹1498.60 पर पहुंच गया जोकि इसके शेयरों के लिए एक साल का रिकॉर्ड हाई लेवल है।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।