
इंदौर। 22 अगस्त 2026 को इंदौर के 'अभिनव कला समाज' में जनवादी लेखक संघ के 150वें मासिक रचना पाठ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं पर केंद्रित था, जिसमें ललित निबंध, यात्रा वृत्तांत और व्यंग्य विधा की रचनाएँ प्रस्तुत की गईं।
रचना पाठ का विवरण
ललित निबंध (संध्या गंगराड़े): संध्या गंगराड़े ने अपने ललित निबंध 'तबे एकला चालो रे' का पाठ किया। यह निबंध कबीर, मीरा, ग़ालिब और रवींद्रनाथ टैगोर जैसी महान विभूतियों के माध्यम से भीड़ से अलग हटकर अपनी राह बनाने वाले व्यक्तित्वों की बात करता है। निबंध में यह विचार व्यक्त किया गया कि अपनी अलग राह बनाने वाले ही समाज को कुछ नया दे सकते हैं, जबकि भीड़ तो भेड़चाल में बदलकर मंदिर-मस्जिद के विवादों में उलझी रहती है। इसी अकेलेपन के संघर्ष को दर्शाने के लिए कबीर के “जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ”, मीरा के “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई”, ग़ालिब के “रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई ना हो” और टैगोर के “जोदी तोर डाक शुने केउ ना आशे तोबे एकला चालो रे” का उल्लेख किया गया।
यात्रा वृत्तांत (विभा दुबे): विभा दुबे ने अपने यात्रा वृत्तांत 'मेरी अमेरिका यात्रा' का वाचन किया। उन्होंने बताया कि यह यात्रा दो दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी—पहला, अपने देश से दूर बसे परिजनों (बेटी और भाई) से मिलना और दूसरा, वहाँ की संस्कृति को समझना। इसमें न्यूज़र्सी, न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया और नियाग्रा फॉल्स की यात्रा का वर्णन था, जिसके अंतर्गत अमेरिका के वातावरण, वनस्पति, स्थानीय संस्कृति और मकानों की बनावट का सुंदर ज़िक्र किया गया।
व्यंग्य पाठ (सुरेश उपाध्याय): अंत में सुरेश उपाध्याय ने अपने तीन व्यंग्यों—'फाइल है फाइल का क्या', 'बैसाखी नंदन के बल्ले-बल्ले' और 'चोर-चोर का शोर' का पाठ किया। ये तीनों व्यंग्य वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों पर चुटकी लेते हुए गहराई से सोचने पर विवश करते हैं।
रचनाओं पर समीक्षा एवं चर्चा
रचना पाठ के उपरांत उपस्थित साहित्यकारों ने पढ़े गए आलेखों पर बेबाक और ईमानदार चर्चा की:
प्रदीप कांत: उन्होंने कहा कि ललित निबंध अपनी अलग राह बनाने वालों से शुरू होकर भीड़ की उस भेड़चाल तक जाता है, जो कभी भी सांप्रदायिकता का रूप ले सकती है। वहीं, यात्रा वृत्तांत को अपने वास्तविक स्वरूप में लिखा जाना अभी बाकी है।
प्रदीप मिश्र: उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों में रचनात्मकता साझा की जाती है, इसलिए उन पर ईमानदारी से चर्चा ज़रूरी है। उन्होंने निबंध में अकेलेपन के संघर्ष की सराहना करते हुए लालित्य की थोड़ी कमी को रेखांकित किया। यात्रा वृत्तांत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि बतकही के साथ-साथ इसमें शब्दचित्र बनने चाहिए थे, जिनकी अभी कमी दिखी। साथ ही उन्होंने सुरेश उपाध्याय के व्यंग्यों की पैनी धार की सराहना की।
अन्य वक्ता (देवेंद्र रिणवा, शिरीन भावसार, विश्वनाथ कदम, विभा दुबे और संध्या गंगराड़े): देवेंद्र रिणवा, शिरीन भावसार और विश्वनाथ कदम ने व्यंग्य तथा ललित निबंध की सराहना की, परंतु यह भी माना कि यात्रा वृत्तांत का अपने पूर्ण स्वरूप में आना अभी शेष है। विभा दुबे और संध्या गंगराड़े ने व्यंग्यों के छोटे आकार के बावजूद उनके भीतर छिपी बड़ी सामाजिक मार को रेखांकित किया।
मंच संचालन एवं आभार
कार्यक्रम का सफल संचालन सचिव, जनवादी लेखक संघ प्रदीप कांत ने किया तथा अंत में आभार प्रदर्शन देवेंद्र रिणवा द्वारा किया गया।


