Pandit Jawaharlal Nehru: पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में 10 रोचक बातें

Pictured is Indias first Prime Minister, Pandit Jawaharlal Nehru

Jawaharlal Nehru First Prime Minister of India: भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि हर वर्ष 27 मई को मनाई जाती है। उनका निधन 27 मई 1964 को 74 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से हुआ था। नेहरू जी आधुनिक भारत के निर्माण, लोकतंत्र की मजबूती और शिक्षा के विकास में अहम योगदान देने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। वे बच्चों के प्रिय 'चाचा नेहरू' के नाम से भी प्रसिद्ध थे। नेहरू जी का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में हुआ था। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। 

 

आइए जानते हैं पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी 10 बेहद रोचक बातें:

 

1. कश्मीरी पंडित होने के कारण मिला 'नेहरू' उपनाम

जवाहरलाल नेहरू का परिवार मूल रूप से कश्मीरी पंडित था। उनके पूर्वज राज कौल 18वीं शताब्दी की शुरुआत में कश्मीर से दिल्ली आए थे। दिल्ली में उनका घर एक मुगलकालीन नहर के किनारे था, जिसके कारण स्थानीय लोग उन्हें 'नेहरू' (नहर वाले) कहने लगे। आगे चलकर यही उनका स्थायी उपनाम बन गया।

 

2. घर पर ही हुई शुरुआती पढ़ाई

नेहरू जी के पिता मोतीलाल नेहरू एक बेहद अमीर और प्रसिद्ध वकील थे। उन्होंने जवाहरलाल की शुरुआती शिक्षा के लिए घर पर ही देश-विदेश के सबसे बेहतरीन निजी शिक्षक रखे थे। शुरुआती 15 साल की उम्र तक उन्होंने किसी स्कूल का मुंह नहीं देखा था तथा उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई थी। इस उम्र तक उन्होंने किसी स्कूल में दाखिला नहीं लिया था।

 

3. दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों से शिक्षा

घर पर शिक्षा प्राप्त करने के बाद, 15 वर्ष की आयु में सन् 1905 में वे आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। उन्होंने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक हैरो (Harrow School) से स्कूली शिक्षा ली। इसके बाद उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज, कैंब्रिज (Trinity College, Cambridge University) से नेचुरल साइंस में ग्रेजुएशन किया और फिर लंदन के इन्नर टेम्पल से वकालत की पढ़ाई पूरी की।

 

4. सिगार से लेकर कपड़ों तक के अनोखे किस्से

नेहरू जी अपनी रॉयल लाइफस्टाइल के लिए जाने जाते थे। वे 'स्टेट एक्सप्रेस 555'(State Express 555) ब्रांड की सिगार पीते थे। यह सिगार यूनाइटेड किंगडम (लंदन) की एक प्रतिष्ठित और लग्जरी सिगरेट ब्रांड है। एक बार जब नेहरू जी भोपाल गए और उनकी पसंदीदा सिगार खत्म हो गई, तो विशेष रूप से इंदौर से एक विमान के जरिए उनके लिए सिगार मंगवाई गई थी।

 

5. कुल 9 बार गए जेल (3259 दिन)

भारत की आजादी की लड़ाई के दौरान नेहरू जी को कुल 9 बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने अपने जीवन के लगभग 9 साल (3,259 दिन) सलाखों के पीछे बिताए थे। उनकी पहली जेल यात्रा 1921-22 में हुई थी और आखिरी बार वे 1945 में रिहा हुए थे। 

 

6. जेल की बैरक में लिखी कालजयी किताबें

नेहरू जी एक बेहतरीन लेखक भी थे। उन्होंने जेल में मिले खाली समय का सदुपयोग लिखने में किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें जैसे 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' (The Discovery of India, भारत की खोज) और 'ग्लिम्प्सिज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' (Glimpses of World History, विश्व इतिहास की झलकियां) उन्होंने अहमदनगर किले की जेल में रहते हुए बिना किसी संदर्भ किताबों के, केवल अपनी याददाश्त के दम पर लिखी थीं।

 

7. 'चाचा नेहरू' और 'बाल दिवस' का कनेक्शन

नेहरू जी को बच्चों से अगाध प्रेम था और वे बच्चों को देश का भविष्य मानते थे। बच्चे भी उन्हें प्यार से 'चाचा नेहरू' कहते थे। यही कारण है कि उनके जन्मदिन यानी 14 नवंबर को पूरे देश में 'बाल दिवस' (Childrens Day) के रूप में मनाया जाता है।

 

8. कपड़ों का स्टाइल बना ग्लोबल ट्रेंड

नेहरू जी के पहनावे का स्टाइल इतना लोकप्रिय हुआ कि वह पूरी दुनिया में एक फैशन स्टेटमेंट बन गया। उनके द्वारा पहनी जाने वाली बिना कॉलर वाली जैकेट को आज भी 'नेहरू जैकेट' कहा जाता है। प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय मैगजीन 'वोग' (Vogue) ने भी उनके ड्रेसिंग सेंस को सराहा था। बता दें कि ये दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली फैशन और लाइफस्टाइल मासिक पत्रिका है, जो 1892 में अमेरिका में स्थापित तथा इसे 'फैशन की बाइबिल' भी माना जाता है। 

 

9. गुलाब के फूल के पीछे का राज

नेहरू जी हमेशा अपनी शेरवानी की जेब पर एक ताजा लाल गुलाब का फूल लगाते थे। इसके पीछे एक बेहद भावुक कारण था। कहा जाता है कि वे अपनी पत्नी कमला नेहरू की याद में यह गुलाब लगाते थे, जिनका साल 1936 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था।

 

10. 11 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित

वैश्विक शांति के लिए काम करने और गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) की नींव रखने वाले नेहरू जी को 11 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकितकिया गया था, हालांकि उन्हें कभी यह पुरस्कार मिल नहीं सका। 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने और उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक इस पद की जिम्मेदारी संभाली।

 

पंडित जवाहर लाल नेहरू की पुण्यतिथि पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Savarkar Jayanti 2026: वीर सावरकर जयंती: काला पानी की यातनाएं झेलने वाले वीर क्रांतिकारी की गाथा

 

राजकुमार चंदन का उपन्यास- विश्व शांति की अनुगूंज: समुद्र का न्याय

Novel Samudra Ka Nyay

उपन्यास का परिचय

लेखक राजकुमार चंदन का उपन्यास “समुद्र का न्याय” वर्तमान विश्व परिदृश्य के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह लेखक की 32वीं प्रकाशित कृति है। हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच, संस्कृत, मराठी और उर्दू भाषाओं सहित मालवी बोली में प्रकाशित यह अनूठा उपन्यास ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के मानवीय सिद्धांतों पर आधारित है, जो भारतीय चेतना के माध्यम से विश्व शांति की अनुगूँज पैदा करता है।

 

लेखक के बारे में

उपन्यास के लेखक श्री चंदन अंतर्राष्ट्रीय बुनियादी विषयों तथा विश्व शांति के विशिष्ट हस्ताक्षर हैं। इससे पूर्व, विश्व शांति पर रूस-यूक्रेन युद्ध के कथानक पर लिखा उनका उपन्यास “आई एम द टाइम” (I am the Time) वर्ष 2025 में नोबेल पुरस्कार चयन समिति के समक्ष भी सम्मिट (प्रस्तुत) हो चुका है।

 

कथानक और मुख्य रूपक (Plot & Allegory)

इस उपन्यास के कथानक का केंद्र एक विशाल, आधुनिक यात्री जहाज़ (क्रूज) है। लेखक ने इस जहाज़ को पूरी दुनिया के एक रूपक (प्रतीक) के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसमें विभिन्न देशों, संस्कृतियों और विचारधाराओं के हजारों यात्री समुद्री यात्रा कर रहे हैं। इसके माध्यम से लेखक ने वैश्विक जगत का एक बड़ा और वास्तविक चित्रण किया है।

 

कहानी का प्रवाह और मोड़

  • यात्रा के प्रारंभ में सब कुछ ठीक चलता है, लेकिन धीरे-धीरे मनुष्यों की मूल नकारात्मक वृत्तियाँ उभरने लगती हैं।
  • छोटी-बड़ी बातों पर मतभेद के कारण बहस शुरू होती है।
  • यही बहस आगे चलकर विवाद में बदल जाती है।
  • अंततः यह विवाद हिंसा का रूप धारण कर लेता है, जिसके बाद जहाज़ में उपद्रव और अराजकता का तांडव शुरू हो जाता है।
  • वर्तमान विश्व की स्थिति की ही तरह, इस जहाज़ में भी कुछ शांतिवादी यात्री परिस्थितियों को शांत करने का प्रयास करते हैं, किन्तु वे सफल नहीं हो पाते।

 

त्रासदी और मानवीय विडंबना

इस निरंतर उपद्रव और संघर्ष के कारण क्रूज में एक भयंकर विस्फोट हो जाता है। जहाज़ का निचला हिस्सा (हुल) क्रैक होने से उसमें पानी भरने लगता है और वह धीरे-धीरे डूबने की कगार पर पहुँच जाता है। विडंबना यह है कि इस विकट परिस्थिति में भी जहाज़ को बचाने की फिक्र किसी को नहीं होती। बदले की भावना में अंधे होकर यात्री अपने शत्रुओं से आखिरी समय तक लड़ते रहते हैं, और जहाज़… विनाश की ओर बढ़ता जाता है।

 

प्रेम और सौहार्द का संदेश

इसी अशांत यात्रा के बीच भारत के लेखक 'प्रशांत' और ब्रिटेन की पत्रकार युवती 'सारा' के बीच का आत्मीय प्रेम दर्शाया गया है। पूर्व और पश्चिम के इन दोनों मुख्य पात्रों का चरित्र विश्व शांति और सद्भावना के नए द्वार खोलता है।

 

शिल्प और लेखन शैली

लेखक ने कथानक में विश्व शांति का जो रूपक चुना है, वह बेहद अनूठा है। यह उपन्यास रोचक होने के साथ-साथ विस्मयकारी परिदृश्यों से भरा हुआ है। किसी फिल्म की भाँति गतिमान यह उपन्यास मनमोहक समुद्री सैर के साथ-साथ जीवन के गूढ़ रहस्यों से परिचय कराता हुआ आगे बढ़ता है। जहाज़ के यात्रियों की वृत्ति और उनकी मनोदशा को इसमें बेहद प्रभावी रूप से अभिव्यक्त किया गया है। घटनाओं का यह सजीव चित्रण पाठकों को भीतर तक झकझोर देता है।

 

निष्कर्ष

यह उपन्यास भारतीय संस्कृति के उस मूल चिंतन को प्रमुखता से रेखांकित करता है, जो मनुष्य को भीतर से शांत होने के लिए प्रेरित करती है। सम्पूर्ण कृति ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का मूल आधार है। वर्तमान दौर में यह उपन्यास एक अमूल्य धरोहर है। यह संवेदनशील हृदयों में विश्व शांति के स्वरों की एक अद्भुत अनुगूँज पैदा करती है।

पाठकों से अपील: यदि आप भी दुनिया में शांति के पक्षधर हैं, तो “समुद्र का न्याय” उपन्यास अवश्य पढ़ें।

समीक्षक: ओम नवगोत्री (प्रकाशक, साधना कुंज, देवास)

अमेरिका और ईरान युद्ध दोबारा भड़का तो क्या होगा?

अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को लागू हुआ युद्धविराम फिलहाल बना हुआ है, लेकिन शाब्दिक नोक-झोंक और पूर्ववत तनावों के बीच उनकी बातचीत में प्रगति के संकेत भी मिल रहे हैं।

 

अमेरिकी न्यूज़ पोर्टल एक्सिओस (Axios) के अनुसार, सबसे नई प्रगति यह है कि एक 'समझौता ज्ञापन' (मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) दोनों देशों के बीच विवाद के सभी प्रमुख मुद्दों को संबोधित करता है। वह कथित तौर पर सभी तरह की शत्रुता को अस्थायी रूप से रोकने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित है। ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना और अमेरिका द्वारा ज़ब्त ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना भी कथित तौर पर चर्चा का विषय है।

 

अमेरिकी के सूत्रों के अनुसार, आशा है कि ईरान युद्धविराम की अवधि के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों के गुज़रने में मदद करेगा। कोई टोल (शुल्क) नहीं लिया जाएगा। जहाज़ों का यातायात जल्द ही 'युद्ध-पूर्व के स्तर' पर लौट जाएगा। किंतु, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि यह युद्धविराम कितने समय तक चलेगा। अमेरिकी सूत्रों ने 60 दिनों की अवधि की बात कही है। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने सरकारी टेलीविज़न पर '30 से 60 दिनों की अवधि' का ज़िक्र किया।

ईरान बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बिछाई गई बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार है। इसके बदले में, अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी नाकेबंदी हटा सकता है और ईरान को बिना किसी रोक-टोक के तेल निर्यात करने की अनुमति दे सकता है। किंतु, इस बारे में ईरान से आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। वहां की समाचार एजेंसी 'फ़ार्स' ने लिखा कि ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या को युद्ध-पूर्व स्तर पर वापस लाने पर सहमति जताई तो है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि युद्ध से पहले जैसी 'मुक्त आवाजाही' की स्थिति फिर से बहाल हो गई है। इसलिए, ट्रंप के बयान को 'अधूरा' माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि वह वास्तविकता को नहीं दर्शाता।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य

ईरान ने कथित तौर पर वादा किया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा। किंतु, उसके यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को निलंबित करने के संबंध में बातचीत अभी होनी है। अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का भंडार भी चर्चा का विषय है; उसे ईरान से संभवतः हटाया जा सकता है। इसके बदले में, अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने और उस की संपत्तियों को मुक्त करने की बात कही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने 'कुछ प्रगति' की बात करते हुए, बहुत सावधानी भरी आशावादिता का स्वर अपनाया। उन्होंने संकेत दिया कि वे संभवतः कुछ ही दिनों के भीतर कोई सही घोषणा कर पाएंगे।

 

दूसरी ओर, अमेरिका में टेक्सास राज्य के रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ ने X पर लिखाः अगर इसका नतीजा 'एक ऐसा ईरानी शासन देखने में आता है— जिसका नेतृत्व अभी भी वे इस्लामी कट्टरपंथी ही कर रहे हैं जो ''अमेरिका का नाश हो'' के नारे लगाते हैं— और जिसे अब अरबों डॉलर मिलते हैं, जो यूरेनियम को समृद्ध करने और परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है और जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर प्रभावी रूप से नियंत्रण रखता है, तो यह एक विनाशकारी ग़लती होगी।' 

ईरानी राष्ट्रपति को अमेरिका पर विश्वास नहीं

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने यथासंभव कूटनीतिक समाधान के प्रति अपनी तत्परता दिखाई, लेकिन उन्होंने वाशिंगटन के प्रति तेहरान के गहरे अविश्वास पर ज़ोर भी दिया। उन्होने कहा, 'हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अमेरिका के साथ पिछली वार्ताओं के अनुभवों ने हमें अत्यधिक सावधानी बरतने पर मज़बूर कर दिया है।'

 

ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के महीनों बाद भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अभी भी बंद है। 'समझौता ज्ञापन' वाला समाचार आने से दो ही दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना था कि ईरान के साथ बातचीत उम्मीद से कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हो रही है। यदि कोई समझौता हो भी जाता है, तब भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य को निरापद बनाने के अभियान के समय अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की ज़रूरत पड़ेगी।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य लिए एक 'प्लान B' की वकालत

स्वीडन के हेलसिंगबोर्ग नगर में 22 मई को हुई नाटो (NATO) के विदेश मंत्रियों की बैठक में बोलते हुए, मार्को रूबियो ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक 'प्लान B' की वकालत की। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ ऐसे किसी भी समझौते का, जिसमें इस जलडमरूमध्य को — जो वैश्विक तेल और गैस बाज़ार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण जलमार्ग है— फिर से खोलने का प्रावधान हो, हर कोई स्वागत ही करेगा। लेकिन, ईरान यदि इस जलडमरूमध्य को फिर से खोलने से इनकार कर देता है और उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने तथा वहां से गुज़रने के लिए टोल (शुल्क) लगाने पर अड़ा रहता है— तो एक 'प्लान B' की ज़रूरत पड़ेगी।

 

अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने बताया कि फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व वाला एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन, वर्तमान टकराव खत्म होने के बाद के लिए एक संभावित नौसैनिक मिशन की तैयारी कर रहा है। साथ ही उनका कहना था कि 'तब भी हमें एक 'प्लान B' की ज़रूरत है, यदि कोई गोलीबारी शुरू कर दे, तो ऐसी स्थिति में आप जलडमरूमध्य को फिर से कैसे खोलेंगे?' उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह ज़रूरी तौर पर नाटो (NATO) का एक मिशन होना चाहिए या नहीं, 'लेकिन इसमें निश्चित रूप से वे नाटो देश शामिल होंगे जो अपना योगदान देने में सक्षम हैं।'

 

रूबियो ने स्वीडन वाले अपने वक्तव्य में इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिका अपने सहयोगियों की मदद पर निर्भर नहीं है। उनके शब्दों में, 'संयुक्त राज्य अमेरिका यह कर सकता है, लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने इस तरह के काम में संभावित रूप से हिस्सा लेने में दिलचस्पी दिखाई — ऐसी नौबत यदि सचमुच आती है।' उन्होंने किसी खास देश का नाम नहीं लिया।

Nato

होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुलना विवाद का विषय

अमेरिका और ईरान के बीच इस समय रुकी हुई बातचीत में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना उनके बीच विवाद के मुख्य बिंदुओं में से एक है। युद्ध शुरू होने के बाद, ईरान ने धमकियां देकर और तेलवाही टैंकरों तथा मालवाही जहाज़ों पर गोलाबारी करके इस जलडमरूमध्य से होकर जहाज़ों की आवाजाही को काफी हद तक बंद कर दिया है। इसके जवाब में, अमेरिका ने भी अपनी तरफ से ईरानी बंदरगाहों की तरफ जहाजों की आवाजाही रोक रखी है।

 

इस दोहरी नाकेबंदी के अलवा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से हो कर जहाज़ों का आना-जाना तब तक इसलिए भी ख़तरे से खाली नहीं होगा, जब तक ईरान द्वारा जलडमरूमध्य की तलहटी में बिछाई गई विस्फोटक सुरंगों को ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट नहीं कर दिया जाता। अमेरिका के लिए यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा बन गया है। दैनिक 'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना, ईरान द्वारा बिछाई गई समुद्री सुरंगों को हटाने में अभी शायद सक्षम नहीं है— न तो तेज़ी से और न ही अकेले। इस काम में यूरोपीय देशों के सहयोग की भी एक प्रमुख भूमिका हो सकती है।

अनगिनत बारूदी सुरंगें, हटाने में छह महीने लग सकते हैं

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की तलहटी में 'महाम,' 'सदाफ़,' 'MDM,' और 'EM-52' आदि नाम वाली अनगिनत बारूदी सुरंगें फैला रखी हैं। अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को बंद दरवाज़े के पीछे दी गई एक ब्रीफ़िंग में, पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) ने कथित तौर पर कहा कि इन सुरंगों को हटाने के अभियान में छह महीने तक का समय लग सकता है।

 

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पूर्व अधिकारी केविन आयर ने कहा, 'लगभग 518 वर्ग किलोमीटर का इलाका साफ़ करना होगा। यह बहुत बड़ा समुद्री विस्तार है।' इससे पता चलता है कि ऐसा कोई अभियान कितना जटिल और जोखिम भरा होगा। जिन नौसैनिक जहज़ों की सहायता से यह काम करना होगा, उनका अभी तक असली युद्ध की परिस्थितियों में परीक्षण तक नहीं हुआ है। एक अंदरूनी सूत्र ने 'द टेलीग्राफ' को बताया: 'गठबंधन के भीतर क्षमताओं का सबसे बड़ा हिस्सा यूरोपीय देशों के पास है।'

अमेरिका के लिए यूरोपीय समर्थन

अतीत के रूस-अमेरिकी 'शीत युद्ध' वाले समय के बाद के दौर में अमेरिका ने मुख्य रूप से विमान वाहक जहाज़ों, पनडुब्बियों और विध्वंसक जहाज़ों पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने बारूदी सुरंगों का पता लगाने की अपनी विशेष क्षमताओं को बनाए रखा। 'द टेलीग्राफ' के अनुसार, जर्मनी बारूदी सुरंगों का पता लगाने वाले अपने जहाज़ 'फुल्दा' को पहले ही तैनात कर चुका है। बताया जा रहा है कि ब्रिटेन भी स्वचालित बारूदी सुरंग-खोजी जहाज़ और गोताखोर उपलब्ध करा रहा है, जबकि इटली बारूदी सुरंगें हटाने वाले जहाज़ भेज रहा है।

 

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के दो जहाज— यूएस पायोनियर और यूएस चीफ़— पहले ही फ़ारस की खाड़ी की ओर रवाना हो चुके हैं। हालांकि, वहां पहुंचने के बाद उन्हें काफ़ी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। माना जाता है कि बारूदी सुरंगों संबंधी किसी संभावित सफ़ाई अभियान की स्थिति में अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर ही कोई कदम उठाएगा।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी IEA की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ उपयोगी बातचीत की आशा में उस पर नए हमलों को फिलहाल रोक रखा है। यदि फिर से युद्ध भड़का तो कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोटक बढ़ोतरी होनी तय है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वह और अधिक तेल-भंडारों से तेल जारी करने के लिए तैयार है, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को जल्द खोलना भी बेहद ज़रूरी है।

 

ईरान के भौगोलिक नियंत्रण वाले इस 21 किलोमीटर चौड़े जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। IEA ने चेतावनी दी कि यदि हॉर्मुज जलडरूमध्य दोबारा नहीं खुला या ऊर्जा निर्यात के वैकल्पिक रास्ते नहीं बनाए गए, तो दुनिया तेल की आपूर्ति के और भी बड़े संकट में फंस सकती है।

वैश्विक ऊर्जा संकट की सबसे गंभीर चेतावनी

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने वैश्विक ऊर्जा संकट को लेकर अब तक की सबसे गंभीर चेतावनी जारी की है। एजेंसी के प्रमुख फ़ेथ बिरोल ने कहा है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने वाला यातायात ठप होने से दुनिया के बाजारों से प्रतिदिन करीब 1.4 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति कम हो गई है। वैश्विक तेल भंडार तेजी से घट रहे हैं। मार्च में IEA और उसके 32 सदस्य देशों ने रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल बाज़ार में जारी किया था, लेकिन अब ये भंडार भी लगभग ख़त्म होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। फ़ेथ बिरोल ने चेतावनी दी कि हालत यदि सुधरी नहीं, तो जुलाई तक वैश्विक तेल बाज़ार ख़तरे की घंटी वाले ''रेड ज़ोन'' में पहुंच सकता है।

 

''रेड ज़ोन'' का अर्थ ऐसी स्थिति है, जब वैश्विक तेल आपूर्ति मांग के दबाव को संभालने में असमर्थ हो जाए। यानी, तेल भंडार इतने कम हो जाएं कि कोई भी अतिरिक्त बाधा आपूर्ति संकट और कीमतों में तेज़ उछाल पैदा कर दे। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें फिलहाल 104 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं, जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले यह क़रीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी। बिरोल पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि वर्तमान तेल संकट 1973, 1979 और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान आए तेल संकटों से भी ज्यादा गंभीर है। उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजार से प्रतिदिन 1.4 करोड़ बैरल तेल पहले ही ग़ायब हो चुका है।

दोबारा युद्ध भड़का तो क्या होगा?

मई की शुरुआत में कच्चे तेल की क़ीमतें 114 डॉलर तक पहुंची थीं। यदि युद्ध दोबारा भड़का तो क़ीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। IEA के अनुसार, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान 18.27 करोड़ बैरल तेल जारी किया गया था, लेकिन इस बार 40 करोड़ बैरल जारी करने के बावजूद संकट काबू में नहीं आ रहा है। बिरोल ने कहा कि इस भयावः स्थिति का सबसे अधिक असर गरीब देशों पर पड़ेगा, ख़ासकर अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तो खाद्य संकट तक पैदा हो सकता है! कहने की आवश्यकता नहीं कि तब भारत में भी कुहराम मच जायेगा। किंतु, प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक अंध विरोधी तब भी तेल के अकाल के लिए उन्हें ही दोषी ठहराएंगे। 

 

बच्चे की मौत से न टूटे किसी मां-बाप का सपना, यह यूपी सरकार का संकल्प

Infant Mortality Rate UP: इन्फेंट मोर्टलिटी रेट यानी शिशु मृत्यु दर। स्वास्थ्य क्षेत्र का यह शब्द सुनने में भले तकनीकी लगे, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ बेहद भावनात्मक और संवेदनशील है। जन्म लेने वाले प्रति हजार बच्चों में कितने नवजात 28 दिन के भीतर दम तोड़ देते हैं, यही इसका पैमाना है। लेकिन सच यह है कि यह सिर्फ आंकड़ा नहीं होता। यह उन मां-बाप के सपनों की असमय मौत भी होती है, जिन्होंने अपने बच्चे के साथ भविष्य के हजारों सपने देखे होते हैं।

 

यही वजह है कि किसी भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मापने के लिए शिशु मृत्यु दर को सबसे संवेदनशील मानक माना जाता है। चुनौती इसलिए और बड़ी हो जाती है क्योंकि जन्म के पहले साल में मरने वाले बच्चों में करीब 70 प्रतिशत नवजात 28 दिन के भीतर ही दुनिया छोड़ देते हैं। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में यह स्थिति और अधिक गंभीर होती है।

 

मार्च 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने स्वास्थ्य क्षेत्र को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार और तकनीकी हस्तक्षेप के कारण उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

 

इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र और प्रदेश सरकार की साझा प्रतिबद्धता, तकनीकी नवाचार और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के जरिए लगातार प्रयास हो रहे हैं कि शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर तक लाया जा सके। आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है और भविष्य में और बेहतर परिणामों की उम्मीद भी जगाई है।

क्या कहते हैं आंकड़े

भारत अगर विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है तो उसकी पहली शर्त स्वस्थ भारत है। लेकिन जिस देश में हर वर्ष हजारों नवजात जन्म के कुछ दिनों या महीनों के भीतर दम तोड़ देते हों, वहां विकास की गति स्वतः प्रभावित होती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार “सशक्त और समर्थ भारत” की बात करते हैं। यह सपना तभी साकार होगा जब देश के हर नागरिक, विशेषकर माताओं और नवजातों को “गोल्डन टाइम” के भीतर गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल सके।

 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम  के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में भारत ने शिशु मृत्यु दर कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। उत्तर प्रदेश, जो कभी देश में सर्वाधिक शिशु मृत्यु दर वाले राज्यों में गिना जाता था, अब तेजी से सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

 

एक समय प्रदेश में प्रति हजार जीवित जन्म पर 60 से अधिक बच्चों की मौत दर्ज होती थी। अब यह आंकड़ा घटकर लगभग 38 के आसपास पहुंच चुका है। राष्ट्रीय औसत अभी करीब 25 है। इतनी बड़ी आबादी वाले राज्य में कुछ अंकों की गिरावट भी हजारों बच्चों की जिंदगी बचाने के बराबर मानी जाती है। हालांकि चुनौतियां अब भी कम नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, कुपोषण, एनीमिया, समय पर इलाज न मिलना और स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित पहुंच अभी भी बड़ी बाधाएं हैं।

केंद्र और प्रदेश की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से बदली तस्वीर

विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में सुधार के पीछे केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन बड़ी वजह है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, जननी सुरक्षा योजना, आयुष्मान भारत, मिशन इंद्रधनुष और पोषण अभियान जैसी योजनाओं ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को नई दिशा दी है।

 

प्रदेश सरकार ने जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों, न्यूबॉर्न स्टेबलाइजेशन यूनिट और मातृ-शिशु स्वास्थ्य विंग की संख्या बढ़ाई गई। गांव स्तर तक आशा और एएनएम कार्यकर्ताओं के जरिए गर्भवती महिलाओं और नवजातों की निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत किया गया।
 

सबसे महत्वपूर्ण पहल “गोल्डन ऑवर” को लेकर हुई। जन्म के बाद शुरुआती एक घंटे और बीमारी की स्थिति में शुरुआती कुछ घंटों को नवजात के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर ऑक्सीजन, संक्रमण नियंत्रण, टीकाकरण और पोषण उपलब्ध हो जाए तो नवजात मौतों के बड़े हिस्से को रोका जा सकता है।

 

इसी सोच के तहत प्रदेश में 102 और 108 एम्बुलेंस सेवाओं का तेजी से विस्तार किया गया। कई जिलों में माताओं और नवजातों के लिए विशेष रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम विकसित किए गए ताकि गंभीर स्थिति में मरीज को जल्द बड़े अस्पताल तक पहुंचाया जा सके।

तकनीक और डिजिटल हेल्थ बनेगी नई ताकत

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में डिजिटल हेल्थ टेक्नोलॉजी शिशु मृत्यु दर कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। टेलीमेडिसिन, मोबाइल हेल्थ यूनिट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए दूरदराज क्षेत्रों तक विशेषज्ञ सलाह पहुंचाई जा सकती है। यदि हर जिले में अत्याधुनिक मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केंद्र विकसित किए जाएं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को वास्तविक अर्थों में “पहला इलाज केंद्र” बनाया जाए तो शिशु मृत्यु दर में और तेजी से कमी लाई जा सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार इस क्षेत्र में बेहतर करने का लगातार प्रयास कर रही है।

शिशु की मौत सिर्फ आंकड़ा नहीं, बेहद भावनात्मक मामला

दरअसल, शिशु मृत्यु दर केवल स्वास्थ्य का आंकड़ा नहीं है। यह किसी भी समाज की संवेदनशीलता और विकास का आईना भी है। जिस देश के बच्चे सुरक्षित होंगे, वही देश आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत होगा।

 

उत्तर प्रदेश ने पिछले वर्षों में सकारात्मक प्रगति जरूर की है, लेकिन लक्ष्य अभी दूर है। सरकार का प्रयास है कि हर मां और हर नवजात को “गोल्डन टाइम” में सस्ती, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा मिल सके। क्योंकि सरकार की नजर में हर पैदा होने वाला बच्चा देश का भविष्य है और इस भविष्य का असमय अंत नहीं होना चाहिए। प्रदेश सरकार ने जिस प्रतिबद्धता के साथ शिशु मृत्यु दर कम करने की दिशा में अभियान चलाया, उससे स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक सुधार की उम्मीद भी मजबूत हुई है।

 

देश की करीब 140 करोड़ आबादी में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग एक-छठा है। यह देश का सबसे युवा राज्य भी माना जाता है। यहां प्रजनन आयु वर्ग की आबादी अधिक होने के कारण जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। इसलिए प्रदेश के स्वास्थ्य आंकड़ों में मामूली सुधार या गिरावट का असर सीधे राष्ट्रीय औसत पर पड़ता है।

 

ऐसे में शिशु मृत्यु दर को कम करना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए सिर्फ स्वास्थ्य नीति नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक संकल्प बन गया है। एक ऐसा संकल्प, जो स्वस्थ भारत के जरिए “सशक्त और समर्थ भारत” के सपने से सीधे जुड़ता है।

Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

 

Story for Kids: बच्चों के लिए कल्पनाशील कहानी: आइसक्रीम वाला पहाड़ और पिघलती खुशियां

A lovely story for children to enjoy a cool summer afternoon, with an ice cream mountain as the image caption

Mountain with Ice Cream: यहां बच्चों के लिए एक बेहद कल्पनाशील और प्यारी कहानी है, जो गर्मी की दोपहर में उन्हें ठंडी ताजगी का एहसास कराएगी।

 

टिल्लू के गांव 'धूपपुर' में इस बार इतनी गर्मी थी कि सूरज दादा हटने का नाम ही नहीं ले रहे थे। सड़कें तवे जैसी गरम थीं और कूलर भी गर्म हवा फेंक रहे थे। टिल्लू रात को छत पर लेटा तारों को देख रहा था और सोच रहा था- 'काश! कहीं से ढेर सारी बर्फ मिल जाए।'

 

अचानक हुआ चमत्कार

अगली सुबह जब टिल्लू की आंख खुली, तो उसने अपनी खिड़की के बाहर कुछ अजीब देखा। पूरा गांव सफेद चमक रहा था। टिल्लू भागा-भागा बाहर आया और उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।

 

गांव के मैदान में एक विशाल 'आइसक्रीम का पहाड़' खड़ा था! वह पहाड़ तीन परतों वाला था- सबसे नीचे गुलाबी स्ट्रॉबेरी, बीच में सफेद वैनिला और सबसे ऊपर चॉकलेट की चोटी। उस पर चेरी के बड़े-बड़े पत्थर लगे थे और चॉकलेट सिरप की नदियां बह रही थीं।

 

गांव में जश्न

पूरे गांव के बच्चे- चुन्नू, मुन्नी, गोलू और पिंकी- अपनी-अपनी कटोरियां और चम्मच लेकर पहाड़ की ओर भागे। टिल्लू ने चिल्लाकर कहा, 'रुको दोस्तों! यह पहाड़ जादुई है, चलो इसका आनंद लेते हैं!'

 

सबने मिलकर खूब आइसक्रीम खाई। किसी ने चॉकलेट वाली चोटी पर चढ़कर 'स्लाइड' किया, तो किसी ने स्ट्रॉबेरी वाली घाटी में लुका-छिपी खेली। गर्मी का नामो-निशान मिट गया था।

 

पिघलती खुशियां और एक बड़ी मुश्किल

जैसे-जैसे दोपहर हुई, सूरज दादा और तेज चमकने लगे। तभी टिल्लू ने देखा कि पहाड़ के किनारे से चॉकलेट की 'बाढ़' आने लगी है। पहाड़ पिघल रहा था!

 

मुन्नी उदास होकर बोली, 'टिल्लू, अगर यह पिघल गया तो हमारी खुशियां भी पानी बन जाएंगी।'

 

टिल्लू ने हार नहीं मानी। उसने अपनी 'बाल सेना' को इकट्ठा किया और एक प्लान बनाया। उसने कहा, 'इसे पिघलने से तो हम नहीं रोक सकते, लेकिन हम इसे बर्बाद होने से बचा सकते हैं!'

 

टिल्लू का मास्टर प्लान

गांव के हर घर से बड़े-बड़े मटके, बाल्टियां और डिब्बे मंगवाए गए।

 

बच्चों ने मिलकर पिघलती हुई आइसक्रीम को डिब्बों में भरना शुरू किया।

 

जो आइसक्रीम ज्यादा पिघल गई थी, उसे पास के सूखे तालाब की ओर मोड़ दिया गया।

 

देखते ही देखते, पूरा तालाब 'आइसक्रीम शेक' की झील बन गया! टिल्लू ने गांव के उन बुजुर्गों और बीमार लोगों के घर तक आइसक्रीम पहुंचाई जो धूप में बाहर नहीं आ सकते थे।

 

एक मीठी याद

शाम होते-होते पहाड़ छोटा हो गया, लेकिन गांव का हर बच्चा और हर जानवर खुश था। गर्मी अब डरावनी नहीं लग रही थी क्योंकि सबके पास 'आइसक्रीम का स्टॉक' था।

 

सूरज ढलते समय ऐसा लगा जैसे वह भी मुस्कुरा रहा हो। टिल्लू समझ गया कि खुशियां चाहें कितनी भी जल्दी क्यों न पिघल रही हों, अगर उन्हें दूसरों के साथ बांट लिया जाए, तो उनका स्वाद हमेशा के लिए यादगार बन जाता है।

 

इस कहानी से बच्चों को क्या सीख मिलेगी?

शेयरिंग (बांटना): अकेले मजे लेने के बजाय सबके साथ खुशियां बांटना ज्यादा बेहतर होता है।

 

मुसीबत में समझदारी: जब चीजें खराब हो रही हों (पहाड़ पिघल रहा हो), तो रोने के बजाय समाधान ढूंढना चाहिए।

 

एकता: साथ मिलकर काम करने से बड़ी से बड़ी मुश्किल आसान हो जाती है।

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: बाल एकांकी: नालंदा की सुनो कहानी

बढ़ते तापमान की चुनौती और बचाव के मार्ग

Climate change

भारत, वर्तमान में तपती धरती, सुलगते आसमान के चलते भीषण जलवायु संकट के मुहाने पर खड़ा है। सूरज के तीखे तेवर और लू के थपेड़ों ने न केवल जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि मानवों से लेकर बेजुबान पशु-पक्षियों तक के कंठ में शुष्कता भरते हुए, अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

हाल के वर्षों में उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक, पारा लगातार 45 से 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच रहा है। यह बढ़ता तापमान केवल एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा इंसानों को दी जा रही एक गंभीर चेतावनी है। यदि हम वैज्ञानिक आंकड़ों पर गौर करें, तो भारत में गर्मी का यह प्रकोप ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ रहा है, जो हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का रेड अलर्ट है।ALSO READ: गर्मी में यदि लू लग जाए तो करें ये घरेलू उपचार

 

भारत में बढ़ते तापमान के सांख्यिकीय साक्ष्य और कारण

भारत में तापमान वृद्धि की दर चिंताजनक है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत का औसत वार्षिक तापमान 1901 के बाद से लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है।

हालांकि यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन इसके प्रभाव भयावह होकर विनाशकारी बन रहे हैं। पिछले एक दशक में भारत ने अपने इतिहास के सबसे गर्म वर्षों का अनुभव किया है। गर्मी के इस विकराल रूप के पीछे कई वैज्ञानिक और मानवीय कारण उत्तरदायी हैं।

 

भूमंडलीय तापन (ग्लोबल वार्मिंग) और जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का जमाव बढ़ा है। अल-नीनो जैसे समुद्री प्रभाव भारत में मानसून को अनियमित करते हैं और ग्रीष्मकाल की अवधि को लंबा खींच देते हैं। इसके साथ ही, अनियंत्रित शहरीकरण ने कंक्रीट के जंगलों को जन्म दिया है।

शहरों में कंक्रीट और डामर की अधिकता के कारण अर्बन हीट आइलैंड का प्रभाव देखा जा रहा है, जिससे मिट्टी कम पानी सोख रही है। जहां शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। वनों की अंधाधुंध कटाई और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन ने जैसे आग में घी डालने का काम किया है।

 

भीषण गर्मी और लू के बहुआयामी दुष्प्रभाव साफ झलक रहे है। तेज गर्मी का प्रभाव केवल शारीरिक पसीने तक सीमित नहीं है, इसके आर्थिक और पारिस्थितिक परिणाम अत्यंत घातक हैं। स्वास्थ्य के मोर्चे पर, हीट स्ट्रोक (लू), गंभीर डिहाइड्रेशन और शरीर के अंगों की विफलता जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। एक अनुमान के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण भारत की श्रम क्षमता में भारी गिरावट आ रही है, क्योंकि दोपहर के समय बाहरी काम करना असंभव होता जा रहा है। 

 

कृषि क्षेत्र में, अत्यधिक गर्मी गेहूं और अन्य रबी फसलों को पकने से पहले ही सुखा देती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर संकट मंडराने लगा है। इसके अलावा, बेजुबान प्राणियों का संकट और भी अधिक है। सड़कों पर घूमने वाले पशु और आसमान में उड़ने वाले पक्षियों के लिए पानी के प्राकृतिक स्रोत सूख रहे हैं, जिससे जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है। भू-जल स्तर का लगातार नीचे गिरना इस संकट को एक जल-युद्ध की ओर धकेल रहा है।

 

ऐसे में हमें बचाव के पारंपरिक मार्ग मिट्टी और प्रकृति का संरक्षण करने की आवश्यकता है। गर्मी से लड़ने के लिए हमारे पूर्वजों ने जो मार्ग अपनाए थे, वे आज भी सबसे अधिक प्रासंगिक और वैज्ञानिक हैं।

पीने के पानी की कपड़े की छागल और मिट्टी के मटकों का उपयोग इसका बेहतरीन उदाहरण है। फ्रिज के पानी के विपरीत, मटके व छागल का पानी वाष्पीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है, जो शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को बनाए रखता है और गले के संक्रमण से भी बचाता है। 

 

इसी प्रकार, भारतीय संस्कृति में प्याऊ लगाना और जल सेवा को परम धर्म माना गया है। सार्वजनिक स्थानों पर ठंडे जल की व्यवस्था करना न केवल एक सामाजिक उत्तरदायित्व है, बल्कि इस भीषण गर्मी में राहगीरों के लिए जीवनदान से कम नहीं है।

वहीं हमें अपनी छतों और बालकनियों में पक्षियों के लिए मिट्टी के सकोरों में पानी रखने की परंपरा को अधिक से अधिक अपनाना होगा। ग्रामीण भारत में आज भी खस के पर्दों और छप्पर का उपयोग घरों को ठंडा रखने के लिए किया जाता है, जो आधुनिक एयर कंडीशनिंग का एक सस्ता और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है।

 

सामूहिक और प्राचीन प्रयासों के साथ आधुनिक उपाय और खान-पान का अनुशासन भी गर्मी में स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है। आज पंखे, कूलर और एसी हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं, किंतु इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। स्वास्थ्य और ऊर्जा संरक्षण हेतु एसी को 24 से 26 डिग्री पर चलाना और कूलर के साथ वेंटिलेशन का ध्यान रखना जरूरी है, ताकि उमस न बढ़े। 

 

घर के अनावश्यक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बंद रखकर भी हम आंतरिक ऊष्मा कम कर सकते हैं। आधुनिक विज्ञान भी अब पारंपरिक जीवनशैली का समर्थन कर रहा है।

आज के दौर में हाइड्रेशन के लिए केवल सादा पानी पर्याप्त नहीं है। शरीर में लवणों की पूर्ति के लिए नींबू-पानी, ताजी छाछ, बेल का शरबत, नारियल पानी और कच्चे आम का पना जैसे देसी पेय पदार्थों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। खान-पान में तरबूज, खरबूजा, खीरा, संतरा, नारियल पानी और ककड़ी आदि जैसे मौसमी फलों का समावेश अनिवार्य है, जिनमें जल की मात्रा 90% से अधिक होती है। 

 

व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए सूती और हल्के रंगों के ढीले कपड़े पहनना, दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बाहर निकलने से बचना और सिर को ढककर रखना बुनियादी बचाव हैं। आधुनिक तकनीक में कूल रूफ पेंट प्रचलित हो रहे है। वर्टिकल गार्डनिंग जैसे नवाचार भी घरों के भीतर के तापमान को 2-4 डिग्री तक कम करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

 

अंततः, बढ़ता तापमान केवल एक मौसमी समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे विकास के मॉडल पर भी प्रश्नचिह्न है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां ठंडी छांव का अनुभव करें, तो हमें तात्कालिक बचाव के साथ-साथ दीर्घकालिक समाधानों पर काम करना होगा।

वृक्षारोपण को एक उत्सव बनाना होगा और जल संरक्षण को जीवन का हिस्सा। प्रकृति का बढ़ता पारा हमें सचेत कर रहा है कि सतर्कता, संयम और संवेदनशीलता ही इस संकट से सुरक्षा का मूल मंत्र हैं। आइए, हम खुद को सुरक्षित रखें और प्यासे बेजुबानों के लिए पानी की एक बूंद सुनिश्चित कर मानवता का धर्म भी निभाएं।

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है…)ALSO READ: Summer health tips: गर्मी में धूप से बचने के 10 प्रभावी उपाय

आल्हा जयंती कैसे और कब मनाई जाती है?

Picture depicting the tales of bravery of Aalha, the great brave warrior of Bundelkhand, on his birth anniversary

Alha Jayanti celebration: बुंदेलखंड के महान और अदम्य साहसी योद्धा वीर आल्हा की जयंती हर साल 25 मई को मनाई जाती है। आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल (उदयसिंह), महोबा के राजा परमाल (जिन्हें इतिहास में परमर्दी देव चंदेल के नाम से जाना जाता है) के महान सेनापति थे, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए 52 युद्ध लड़े थे और वे किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए।ALSO READ: Navtapa 2026 dates: कब से कब तक रहेगा नौतपा?

 

आइए जानते हैं कि आल्हा जयंती कैसे और क्यों मनाई जाती है:

 

आल्हा जयंती कैसे मनाई जाती है?

आल्हा जयंती मुख्य रूप से बुंदेलखंड क्षेत्र (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से) में बेहद उत्साह और गर्व के साथ मनाई जाती है। इसे मनाने के पारंपरिक तरीके निम्नलिखित हैं:

 

1. 'आल्हा खंड' (आल्हा गायन) का आयोजन

इस दिन बुंदेलखंड के गांवों, चौपालों और शहरों में विशेष रूप से “आल्हा गायन” के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

 

महोबा के राजकवि जगनिक, जिन्हें 'परमाल रासो' के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा रचित 'आल्हा खंड' (वीर रस से भरपूर महाकाव्य) को ढोलक और मंजीरों की थाप पर ऊंचे स्वर में गाया जाता है। बुंदेली भाषा में गाए जाने वाले ये गीत बहुत लोकप्रिय हैं। इसे सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि इसके शब्दों और धुनों में आज भी युवाओं के रोंगटे खड़े कर देने वाला वीर रस होता है।

 

2. मैहर माता मंदिर (सतना, मरणोपरांत मान्यता) में विशेष पूजा

आल्हा को मां शारदा (सरस्वती) का परम भक्त माना जाता है। मान्यता है कि मां शारदा के आशीर्वाद से ही उन्हें अमरत्व का वरदान मिला था। इस दिन मध्य प्रदेश के महोबा और मैहर (शारदा भवानी मंदिर) में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। लोक मान्यता है कि आज भी हर सुबह मंदिर के कपाट खुलने से पहले वीर आल्हा अदृश्य रूप से आकर मां शारदा की सबसे पहली पूजा और श्रृंगार करके जाते हैं।

 

3. शौर्य यात्राएं और प्रतिमा पूजन

बुंदेलखंड के कई शहरों में वीर आल्हा और ऊदल की मूर्तियों पर माल्यार्पण किया जाता है। राजपूत और स्थानीय समाज के लोग इस दिन भव्य शौर्य यात्राएं निकालते हैं और उनके पराक्रम को याद करते हैं।

 

आल्हा जयंती का महत्व

अमरता की लोक मान्यता: ऐसी लोक कथाएं हैं कि आल्हा ने अपने जीवन के अंतिम समय में युद्ध छोड़कर संन्यास ले लिया था और वे आज भी अमर हैं।

 

अंतिम युद्ध: आल्हा-ऊदल ने अपना आखिरी और सबसे प्रसिद्ध युद्ध दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान के साथ लड़ा था, जिसमें उनके भाई ऊदल वीरगति को प्राप्त हुए थे, लेकिन आल्हा ने अद्भुत वीरता दिखाई थी।

 

सांस्कृतिक धरोहर: यह जयंती बुंदेलखंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का माध्यम है। इसके जरिए आने वाली पीढ़ी को देश और माटी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीरों की कहानियों से परिचित कराया जाता है।

 

आल्हा जयंती हर वर्ष उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। यह त्योहार भाईचारे, वीरता और ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक है। यह पर्व प्रसिद्ध लोक नायक आल्हा और ऊदल की वीरता, पराक्रम और युद्ध कौशल को समर्पित है। आल्हा जयंती केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह वीरता, परिवार, और देशभक्ति की भावना को भी जागृत करता है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Nautapa 2026: रोहिणी नक्षत्र में सूर्य गोचर 2026: नौतपा के 9 दिनों में क्या करें और क्या न करें?

 

summer cooling tips: नौतपा में आग उगलेगी धरती, जानें Nautapa में घर पर राहत पाने के 7 घरेलू तरीके

A scene showing home remedies to keep the house cool during Nautapa

stay hydrated in summer: गर्मी और उमस के कारण शरीर में हीट स्ट्रेस (नौतपा) होना आम बात है। नौतपा केवल थकान या पसीना नहीं है, बल्कि यह शरीर के तापमान और हाइड्रेशन बैलेंस को प्रभावित करता है। सही समय पर राहत न मिले तो यह हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकता है। घर पर कुछ सरल घरेलू उपाय अपनाकर आप अपने शरीर को ठंडा और स्वस्थ रख सकते हैं।ALSO READ: Nautapa and health: नौतपा में ऐसे रखें सेहत का ध्यान, जानें 10 सावधानियां

 

यहां नौतपा से राहत पाने के प्रभावी तरीके दिए गए हैं:

 

1. खिड़की और दरवाजों का सही प्रबंधन

दिन में बंद, रात में खुला: सुबह 10 बजे के बाद घर की सभी खिड़कियां और दरवाजे बंद कर दें और भारी पर्दे डाल दें। शाम 7 बजे के बाद, जब बाहर की हवा ठंडी हो जाए, तब खिड़कियां खोलें ताकि Cross-Ventilation (क्रॉस-वेंटिलेशन) से घर की गर्म हवा बाहर निकल सके।

 

सफेद पर्दों का प्रयोग: गहरे रंग के पर्दे गर्मी को सोखते हैं। हल्के रंग या सफेद सूती पर्दों का उपयोग करें, ये सूरज की रोशनी को रिफ्लेक्ट (Reflect) कर देते हैं।

 

2. खस और गीले कपड़ों का देसी नुस्खा

खस के पर्दे: पुराने समय में खिड़कियों पर खस की टट्टियां या चटाइयां लगाई जाती थीं। आप अपनी खिड़की के पर्दों पर पानी का छिड़काव कर सकते हैं। जब बाहर की गर्म हवा गीले कपड़े से छनकर आती है, तो वह कमरे को प्राकृतिक कूलर की तरह ठंडा कर देती है।

 

गीली चादर: रात में सोने से पहले अगर कमरे की खिड़की पर एक गीली चादर टांग दी जाए, तो कमरे का तापमान 2-3 डिग्री तक कम हो सकता है।

 

3. फर्श की कूलिंग (Mopping)

दिन में कम से कम दो-तीन बार फर्श पर पोछा लगाएं। फर्श पर पानी रहने से वाष्पीकरण (Evaporation) होता है, जो कमरे की गर्मी खींच लेता है। पोछे के पानी में थोड़ा नमक या नीम का तेल मिलाने से ताजगी भी बनी रहती है।

 

4. इंडोर प्लांट्स (Indoor Plants)

घर के अंदर ऐसे पौधे लगाएं जो हवा को शुद्ध और ठंडा रखते हैं। एलोवेरा, स्नेक प्लांट, मनी प्लांट और एरेका पाम प्राकृतिक रूप से कमरे की नमी बनाए रखते हैं और ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाते हैं।ALSO READ: Nautapa 2026: रोहिणी नक्षत्र में सूर्य गोचर 2026: नौतपा के 9 दिनों में क्या करें और क्या न करें?

 

5. कूलर के लिए स्मार्ट ट्रिक

अगर आप कूलर का उपयोग कर रहे हैं, तो उसमें बर्फ डालने के बजाय उसकी घास (Honey-comb pads) को अच्छे से साफ रखें। कूलर को खिड़की पर ऐसी जगह लगाएं जहां से उसे ताजी हवा मिले; बंद कमरे में कूलर केवल उमस (Humidity) बढ़ाता है।

 

6. किचन की गर्मी को कंट्रोल करें

नौतपा के दौरान दोपहर में भारी खाना पकाने या लंबे समय तक गैस जलाने से बचें। खाना बनाने के बाद एग्जॉस्ट फैन (Exhaust Fan) जरूर चलाएं ताकि किचन की गर्म हवा पूरे घर में न फैले।

 

7. छत को ठंडा रखें

यदि आप सबसे ऊपर वाली मंजिल (Top Floor) पर रहते हैं, तो शाम के समय छत पर पानी का छिड़काव करें। इससे छत की तपिश कम होगी और रात को कमरा जल्दी ठंडा होगा। सफेद 'चूना' या 'हीट रिफ्लेक्टिव पेंट' भी छत पर लगवाना एक बेहतरीन स्थायी समाधान है।

 

एक मजेदार टिप: 'Ice Fan' हैक

एक बड़े कटोरे में ढेर सारी बर्फ लें और उसे टेबल फैन (Table Fan) के ठीक सामने रख दें। पंखे की हवा जब बर्फ से टकराकर आप तक आएगी, तो आपको बिल्कुल एसी जैसी ठंडक का अहसास होगा।

 

नौतपा के इन 9 दिनों में ये छोटे बदलाव आपको लू और बेचैनी से बचा सकते हैं।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Nautapa health tips: नौतपा और स्वास्थ्य: बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सावधानियां

Nautapa 2026: नौतपा क्या है? जानें इसके कारण और लक्षण

नौतपा के दौरान प्रचंड गर्मी और सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश संबंधी जानकारी देता फोटो

Nautapa causes and symptoms: नौतपा भारतीय ज्योतिष और खगोल विज्ञान की एक ऐसी अवधारणा है, जो गर्मी के भीषणतम दिनों को परिभाषित करती है। जब सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं और तापमान अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाता है, तो उस अवधि को 'नौतपा' कहा जाता है। सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में रहने के शुरुआती 9 दिन जो सबसे अधिक गर्म माने जाते हैं, जिन्हें 'नौतपा' कहा जाता है। इस वर्ष यह 25 मई 2026 से शुरू होकर 2 जून 2026 तक जारी रहेगा।ALSO READ: नौतपा 2026: रोहिणी नक्षत्र कब से शुरू होगा और कितने दिन तक रहेगा? जानिए पूरी जानकारी

 

आइए इसके वैज्ञानिक कारण, ज्योतिषीय आधार और शरीर पर दिखने वाले लक्षणों को विस्तार से समझते हैं। 

 

1. नौतपा क्या है?

2. नौतपा के लक्षण

3. नौतपा के खगोलीय एवं वैज्ञानिक कारण

4. ज्योतिषीय कारण

5. सावधानी की सलाह

 

1. नौतपा क्या है?

नौतपा का शाब्दिक अर्थ है 'नौ दिनों का ताप'। हिंदी कैलेंडर के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तो उस समय के शुरुआती 9 दिनों को 'नौतपा' कहा जाता है। यह आमतौर पर मई के अंत या जून की शुरुआत में आता है। मान्यता है कि यदि इन 9 दिनों में खूब गर्मी पड़े, तो मानसून के दौरान बारिश बहुत अच्छी होती है।

 

2. नौतपा के लक्षण

जब नौतपा शुरू होता है, तो वातावरण में निम्नलिखित बदलाव और लक्षण दिखाई देते हैं:

 

भीषण गर्मी और लू: तापमान अपने सामान्य स्तर से 2 से 5 डिग्री तक ऊपर चला जाता है। गर्म हवाएं (लू) तेज हो जाती हैं।

 

नमी की कमी: हवा में रूखापन बढ़ जाता है, जिससे त्वचा में खिंचाव और होंठ सूखने जैसी समस्याएं होती हैं।

 

जल स्रोतों का सूखना: तालाबों और नदियों का जलस्तर तेजी से गिरता है।

 

अचानक आंधी-तूफान: शाम के समय धूल भरी आंधी या गरज-चमक के साथ हल्की बूंदाबांदी होना भी इसका एक लक्षण है, जो बढ़ती गर्मी के कारण बने कम दबाव के क्षेत्र (Low Pressure Zone) की वजह से होता है।

 

3. नौतपा के कारण

नौतपा के पीछे वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दोनों कारण महत्वपूर्ण हैं:

 

खगोलीय एवं वैज्ञानिक कारण

इस दौरान पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध (Northern Hemisphere) पर सूर्य की किरणें लंबवत (Vertical) पड़ती हैं।

 

सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम महसूस होती है।

 

वायुमंडल में नमी कम हो जाती है और शुष्क हवाएं (लू) चलने लगती हैं, जिससे धरती का तापमान तेजी से बढ़ता है।

 

4. ज्योतिषीय कारण

सूर्य को 'अग्नि' का कारक और चंद्रमा को 'शीतलता' का कारक माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा है, जो शीतलता का प्रतीक है। जब सूर्य (अग्नि तत्व) रोहिणी नक्षत्र में आता है, तो वह चंद्रमा की शीतलता को सोख लेता है। शीतलता के अभाव में पृथ्वी पर ताप अत्यधिक बढ़ जाता है।

 

5. सावधानी की सलाह

नौतपा के दौरान निर्जलीकरण/डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) और हीट स्ट्रोक का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इस दौरान अधिक से अधिक पानी पिएं, सूती कपड़े पहनें और दोपहर के समय बाहर निकलने से बचें।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Nautapa and health: नौतपा में ऐसे रखें सेहत का ध्यान, जानें 10 सावधानियां

Nautapa 2026: 25 मई से नौतपा: भीषण गर्मी के दिन, जानें महत्व, पर्यावरण और सेहत पर प्रभाव

The picture provides information regarding health stability during Nautapa

what is heat exhaustion: नौतपा, जिसे आम बोलचाल में गर्मी या हीट स्ट्रेस कहा जाता है, शरीर का वह स्थिति है जब अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण शरीर अपनी सामान्य कार्यक्षमता खो देता है। यह मुख्यतः हीट एक्सॉस्टेशन (Heat Exhaustion) और हीट स्ट्रोक (Heat Stroke) जैसी स्थितियों की शुरुआत हो सकती है। वर्ष 2026 में नौतपा 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक जारी रहेगा तथा इन 9 दिनों तक भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा।ALSO READ: Nautapa 2026: नौतपा क्या है? जानें इसके कारण और लक्षण

 

नौतपा केवल थकावट या पसीने की समस्या नहीं है; यह शरीर के हाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस पर भी असर डालता है। यदि समय रहते सावधानियां न बरती जाएं, तो यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में बदल सकता है।

 

नौतपा का महत्व: 

आयुर्वेद और लोक मान्यताओं के अनुसार, 'जितना तपेगा नौतपा, उतनी होगी वर्षा'। यानी नौतपा के दौरान जितनी अधिक गर्मी और कम दबाव का क्षेत्र बनेगा, समुद्र से उठने वाली मानसूनी हवाएं उतनी ही तेजी से मैदानी इलाकों की ओर बढ़ेंगी, जिससे भविष्य में अच्छी फसल और वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।

 

नौतपा के प्रभाव और लक्षण (Symptoms)

भीषण गर्मी के कारण प्रकृति और मानव शरीर पर स्पष्ट प्रभाव दिखाई देते हैं:

 

पर्यावरण में लक्षण:

तेज लू (Heat Waves): गर्म और शुष्क हवाओं का चलना।

 

जल स्तर में गिरावट: नदियों, तालाबों और कुओं के जल स्तर का तेजी से नीचे जाना।

 

आंधी-तूफान: अत्यधिक गर्मी के कारण कम दबाव का क्षेत्र (Low Pressure Area) बनता है, जिससे शाम के समय धूल भरी आंधियां चलने लगती हैं।

 

शरीर पर प्रभाव (Health Symptoms):

अत्यधिक तापमान के कारण शरीर में निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे सकते हैं:

 

डिहाइड्रेशन: शरीर में पानी की भारी कमी होना।

 

सनस्ट्रोक (लू लगना): तेज बुखार, सिर चकराना और बेहोशी महसूस होना।

 

त्वचा की समस्याएं: सनबर्न, घमौरियां और अत्यधिक पसीना आना।

 

पाचन तंत्र में गड़बड़ी: भूख कम लगना और जी मिचलाना।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Nautapa and health: नौतपा में ऐसे रखें सेहत का ध्यान, जानें 10 सावधानियां