सिर्फ एक अंडा! वैज्ञानिकों ने बताया दिमाग तेज करने का ‘सीक्रेट फॉर्मूला’

Eggs lowers Alzheimers risk

Eggs lowers Alzheimers risk: आज के दौर में खराब लाइफस्टाइल और खानपान के कारण भूलने की बीमारी यानी 'अल्ज़ाइमर' (Alzheimers) और डिमेंशिया का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया भर के डॉक्टर और वैज्ञानिक इसे 'भविष्य की बड़ी स्वास्थ्य चुनौती' मान रहे हैं। लेकिन हाल ही में हुए वैज्ञानिक शोधों में एक बेहद चौंकाने वाला और राहत देने वाला सच सामने आया है। दिमागी कमजोरी के हजारों मरीजों का इलाज कर चुके मशहूर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. डेल ब्रेडिसन के अनुसार, हमारे किचन में मौजूद एक बेहद साधारण-सी चीज 'अंडा' अल्जाइमर से बचाने और दिमाग को बूस्ट करने में सबसे बड़ा मददगार साबित हो सकता है।

हफ्ते में सिर्फ 1 अंडा खाइए

प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल 'द जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन' में हाल ही में  प्रकाशित एक शोध के अनुसार, जो लोग हफ्ते में एक या उससे अधिक अंडे का सेवन करते हैं, उनमें अंडा न खाने वालों (या महीने में एक बार खाने वालों) की तुलना में अल्जाइमर रोग होने का खतरा 47 प्रतिशत तक कम पाया गया। यही नहीं, नियमित अंडा खाने वाले लोगों ने प्लानिंग, फोकस (एकाग्रता) और सही समय पर सही निर्णय लेने (Decision-making) से जुड़े दिमागी टेस्ट में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया।

आखिर अंडे में ऐसा क्या है?

अल्जाइमर और दिमागी कमजोरी से जूझ रहे मरीजों के मस्तिष्क में आमतौर पर दो जरूरी पोषक तत्वों की भारी कमी देखी जाती है—पहला 'कोलीन' (Choline) और दूसरा ओमेगा-3 फैट का एक प्रकार 'डीएचए' (DHA)। अंडा दुनिया के उन गिने-चुने सुपरफूड्स में से है जिसमें ये दोनों तत्व एक साथ भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।

 

'कोलीन' का पावरहाउस : अल्जाइमर के खतरे को कम करने में अकेले 'कोलीन' की 39% भूमिका होती है। पुरुषों को रोजाना 550 मिलीग्राम और महिलाओं को 425 मिलीग्राम कोलीन की जरूरत होती है। महज एक उबले अंडे से शरीर को लगभग 150 मिलीग्राम कोलीन मिल जाता है। यह दिमाग की कोशिकाओं (Brain Cells) की बाहरी परत को मजबूत करता है और याददाश्त को बढ़ाने वाले न्यूरोट्रांसमीटर का निर्माण करता है।

 

एंटीऑक्सीडेंट्स की ढाल : अंडे में ल्यूटिन (Lutein) जैसे एंटीऑक्सीडेंट और ओमेगा-3 फैटी एसिड होते हैं, जो दिमाग की कोशिकाओं को डैमेज होने और सूजन (Inflammation) से बचाते हैं।

'मेटाबॉलिक सिंड्रोम' से भी बचाता है अंडा

डॉ. डेल ब्रेडिसन का कहना है कि अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन, शारीरिक निष्क्रियता और तनाव के कारण होने वाला 'मेटाबॉलिक सिंड्रोम' ही आगे चलकर अल्जाइमर का कारण बनता है। बुजुर्गों के लिए अंडा एक बेहतरीन डाइट है क्योंकि यह पोषक तत्वों से भरपूर है, पचाने में आसान है और शरीर में ब्लड शुगर के लेवल को अचानक बढ़ने नहीं देता। हेल्थ एक्सपर्ट्स दिमाग में कोलीन की मात्रा बढ़ाने के लिए अंडों के साथ सब्जियों और पनीर को मिलाकर खाने की सलाह देते हैं।

Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

 

रानी अहिल्याबाई का जन्म कब और कहां हुआा था?

Maharani Ahilyabai Holkar

राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के चौंडी (Chaundi) गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम मानकोजी शिंदे (राव) था, जो अपने गांव के पाटिल (मुखिया) थे। अहिल्याबाई का विवाह मालवा साम्राज्य के सूबेदार मल्हारराव होल्कर के पुत्र खांडेराव होल्कर से हुआ था, जिसके बाद वे इंदौर (मालवा) की महारानी बनीं।

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वर्ष 1733 में अहिल्याबाई का विवाह खंडेराव से हो गया। उस वक्त अहिल्याबाई की उम्र सिर्फ 8 वर्ष थी। खंडेराव अहिल्याबाई से 2 साल बड़े थे। शादी के बाद अहिल्याबाई महेश्वर आ गई। सन 1745 में उन्हें बेटा हुआ मालेराव होलकर और 1748 में उन्हें बेटी हुई मुक्ताबाई। सन 1754 में अहिल्याबाई के जीवन में अंधेरा छा गया। एक युद्ध के दौरान पति खंडेराव वीरगति को प्राप्त हो गए। इसके बाद उन्हें राजपाट संभालना पड़ा। अहिल्याबाई महान शिव भक्त थीं। उनके जीवन से जुड़े कई रोचक किस्से हैं। 

लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का संपूर्ण इतिहास

 

महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासनकाल में भारत के विभिन्न हिस्सों में मंदिरों का निर्माण और पुनर्निर्माण कराया। इनमें प्रमुख है काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी, विश्वनाथ मंदिर, गया, ओंकारेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश, सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक, खजराना गणेश मंदिर, इंदौर। इसके अतिरिक्त, उन्होंने हरिद्वार, केदारनाथ, बद्रीनाथ, ऋषिकेश, प्रयाग, द्वारका, रामेश्वरम, सोमनाथ, नासिक, उज्जैन, पंढरपुर, परली वैजनाथ, कुरुक्षेत्र, पशुपतिनाथ (नेपाल), श्रीशैलम, उडुपी, गोकर्ण और काठमांडू जैसे स्थानों पर भी मंदिरों और धार्मिक संरचनाओं का निर्माण या पुनर्निर्माण कराया। 

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महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने न केवल मंदिरों का निर्माण कराया, बल्कि तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए धर्मशालाएं, घाट, कुएं और अन्य संरचनाएं भी बनवाईं। उनके द्वारा निर्मित प्रमुख संरचनाओं में शामिल हैं। दशाश्वमेध घाट, वाराणसी: यह घाट उन्होंने बनवाया, जो आज गंगा आरती के लिए प्रसिद्ध है। मणिकर्णिका घाट, वाराणसी: यह घाट भी उन्होंने पुनर्निर्मित कराया, जो अंतिम संस्कार के लिए प्रमुख स्थल है। उन्होंने विभिन्न तीर्थस्थलों पर धर्मशालाएं बनवाईं, ताकि यात्रियों को ठहरने की सुविधा मिल सके।

नौतपा की ‘आग’ उगलती गर्मी से कैसे बचें? ये 5 सावधानियां और 10 गोल्डन रूल्स बदल देंगे आपका समर गेम!

Golden rules of Nautapa, photo showing ways to avoid scorching heat, heat wave and strong sunlight

Summer Safety Tips: हर साल जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में एंट्री मारते हैं, तो शुरू होता है साल का सबसे गर्म हफ्ता- 'नौतपा'। इन 9 दिनों में सूरज आसमान से आग उगलने लगता है। तीखी धूप और थपेड़े मारती लू इंसान को घर के अंदर हो या बाहर, दोनों जगह बेचैन कर देती है।ALSO READ: Nautapa health tips: नौतपा और स्वास्थ्य: बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सावधानियां

 

इस प्रचंड गर्मी में जरा सी लापरवाही आपको अस्पताल पहुंचा सकती है। इसलिए, खुद को कूल और हाइड्रेटेड रखने के लिए आपको कुछ बेहद जरूरी सावधानियां बरतनी होंगी।

 

नौतपा की 5 अचूक सावधानियां, जो आपको रखनी हैं याद:

अगर नौतपा के दौरान घर से बाहर निकलना बेहद जरूरी है, तो इन 5 बातों का कड़ाई से पालन करें:

 

1. कवर-अप गेम ऑन रखें: कभी भी खुले शरीर धूप में न जाएं। बाहर निकलने से पहले सिर और कान को कॉटन के कपड़े से ढंकें और आंखों पर अच्छी क्वालिटी का सनग्लास (धूप का चश्मा) जरूर लगाएं।

 

2. जेब में रखें 'कवच': दादी-नानी का यह नुस्खा आज भी सुपरहिट है। रोजाना खाने में प्याज का इस्तेमाल करें और घर से बाहर निकलते समय अपनी जेब में एक छोटासा कच्चा प्याज जरूर रखें, यह लू से बचाता है।

 

3. लिक्विड डाइट को बनाएं दोस्त: इन दिनों सादे पानी के अलावा अपनी डाइट में नारियल पानी, गन्ने का रस, फलों का जूस, जलजीरा, लस्सी, आम पना, दही और जीरा छाछ को भरपूर जगह दें।

 

4. पानी से नो कॉम्प्रोमाइज: प्यास न भी लगे, तो भी हर थोड़ी देर में पानी पीते रहें। शरीर से पसीना बहने पर तापमान को बैलेंस करने के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

 

5. फैब्रिक का रखें ख्याल: सिंथेटिक कपड़ों को बाय-बाय कहें। इन 9 दिनों में सिर्फ ढीले, हल्के और मुलायम सूती (कॉटन) कपड़े ही पहनें ताकि पसीना आसानी से सूख सके और स्किन खुलकर सांस ले सके।ALSO READ: Nautapa and health: नौतपा में ऐसे रखें सेहत का ध्यान, जानें 10 सावधानियां

 

नौतपा के गोल्डन टिप्स, जानें 10 सबसे काम की बातें

1. क्या है नौतपा?

जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में गोचर करता है, तो शुरुआती 9 दिनों को नौतपा कहा जाता है। यह पूरे साल का सबसे गर्म समय माना जाता है।

 

2. खाली पेट बाहर जाना मना है:

नौतपा के दौरान सूरज की किरणें सीधे पृथ्वी पर आती हैं। सुबह कितना भी जल्दी हो, बिना कुछ खाए-पिए घर से कदम बाहर न निकालें।

 

3. ग्लूकोज से मिलेगी इंस्टेंट एनर्जी:

पसीने के रास्ते शरीर के जरूरी मिनरल्स बाहर निकल जाते हैं। इसलिए समय-समय पर ग्लूकोज या ओआरएस (ORS) का घोल पीते रहें और अपनी एनर्जी को फालतू कामों में वेस्ट न करें।

 

4. अच्छे मानसून का संकेत:

सनातन मान्यताओं के अनुसार, नौतपा के ये 9 दिन जितनी शिद्दत से तपेंगे, आने वाले मानसून में उतनी ही झमाझम और अच्छी बारिश होने की संभावना बढ़ती है।

 

5. इमरजेंसी में घरेलू उपाय या डॉक्टर:

अगर चक्कर आना, उल्टी या तेज सिरदर्द जैसे लू के लक्षण दिखें, तो तुरंत घरेलू उपाय (जैसे आम पना) अपनाएं या बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करें।

 

6. एसी (AC) से निकलते ही सावधानी:

अगर आप ऑफिस या घर में लगातार एसी में बैठते हैं, तो एसी से निकलते ही तुरंत कड़कड़ाती धूप में न जाएं। शरीर के तापमान को धीरे-धीरे नॉर्मल होने दें।

 

7. मेहंदी का नेचुरल कूलिंग इफेक्ट:

जिन लोगों को गर्मी ज्यादा सताती है या तलवों में जलन होती है, वे अपने हाथ-पैर और सिर में प्राकृतिक मेहंदी जरूर लगाएं। यह शरीर की गर्मी को खींचकर आपको अंदर से तरोताजा रखती है।

 

8. पसीने को सोखना है जरूरी:

सूती कपड़े पहनने से शरीर का तापमान मेंटेन रहता है और घमौरियों या स्किन एलर्जी का खतरा नहीं रहता।

 

9. लाइट और इजी मील:

दोपहर और रात के खाने में ऐसा भोजन लें जो जल्दी पच जाए- जैसे खिचड़ी, दलिया, लौकी-तोरई की सब्जी। लिक्विड चीजों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

 

10. ऑयली फूड से तौबा:

इन नौ दिनों में समोसे, कचोरी और हैवी मसालेदार भोजन से बिल्कुल दूर रहें। भारी खाना इस मौसम में आपके डाइजेशन सिस्टम यानी पाचन क्रिया को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।

 

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यह सुझाव देश के हित में है

Photo of Prime Minister Narendra Modis foreign trip, Georgia Meloni with Modi in the image

शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश के सम्मान की बात आती है तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए। 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच दिवसीय विदेश यात्रा पर भारत के अंदर राजनीतिक व गैर राजनीतिक मोर्चे पर हो रही टिप्पणियों के संदर्भ में उनका यह मंतव्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से आरंभ कर स्वीडन, नीदरलैंड, ज्नॉर्वे और इटली की द्विपक्षीय यात्रा की तथा नार्वे की राजधानी ओस्लो में स्कैंडिनेवियाई भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुए। 

 

प्रधानमंत्री के समक्ष अपने राष्ट्रीय हित को साधने का उद्देश्य था और इन यात्राओं पर विशेषज्ञों का मत यही है कि उसमें उन्हें अधिकतम सफलता मिली। किंतु राजनीतिक और गैर राजनीतिक एक्टिविज्म और सोशल मीडिया पर उनके विदेश में रहते हुए ही हमले शुरू हो गए। सारे हमलों‌ व‌ आलोचनाओं के हल्ला बोल में ऐसा एक तथ्य नहीं आया जिसमें बताया गया हो कि अमुक बिंदु पर प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्रीय हित के अनुकूल काम नहीं किया।

 

जाहिर है कि विरोध केवल राजनीतिक मतभेदों और असहमतियों के इर्द-गिर्द था। यह चिंताजनक है क्योंकि भारत की भौगोलिक सीमाओं के अंदर की राजनीतिक असहमतियां और मतभेद सीमाओं से बाहर चला जाए तो राष्ट्रीय हित प्रभावित होता है। इसका अर्थ है कि हम देश हित को प्राथमिकता देने की जगह अपने राजनीतिक, व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता दे रहे हैं या फिर हमारा वैचारिक दुराग्रह हावी है।

 

ऐसा नहीं है कि पवार की मोदी से पूरी तरह सहमति है। महाराष्ट्र में आज शरद पवार की राकांपा शक्तिहीन है तो इसी कारण क्योंकि स्वर्गीय अजीत पवार ने विद्रोह कर भाजपा से हाथ मिला लिया। बावजूद हमारी पारंपरिक राजनीति, जिसका प्रतिनिधित्व करने वाले गिने-चुने नेता रह गए हैं, में यही व्यवहार लंबे समय तक रहा है। देश में हमारी असहमति होती है, आरोप – प्रत्यारोप करते हैं लेकिन जब विदेशों की, अंतरराष्ट्रीय मंच की बात आती है तो देश साथ खड़ा होता है। 

 

अंतरराष्ट्रीय मंच पर या विदेश में प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहां केवल राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। पत्रकारिता में भी अनेक बार प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के विदेश में दिए बयानों से असहमति होती थी लेकिन वरिष्ठ लोग बताते थे कि विदेश नीति पर हमारी आलोचना का स्वर ऐसा नहीं हो सकता। अपवाद हर समय रहे हैं पर पर वह कभी मुख्य धारा नहीं बना। 

 

इसलिए ज्यादातर विदेशी यात्राओं या विदेशी मेहमानों के भारत आगमन पर हुए समझौते आदि पर राजनीतिक दलों व मीडिया की ध्वनि एक समान होती थी। जैसे-जैसे राजनीतिक मतभेद बढ़े, भारत और वैश्विक स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं, निहित स्वार्थी संगठनों, समूहों के बीच संपर्क संबंध बढ़ा इस स्वाभाविक व्यवहार में अंतर आता गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता शीर्ष पर आने के बाद यह अतिवाद तक चला गया है। इसी का प्रकटीकरण इस समय दिखा है। 

 

एक भारतवासी के नाते इस समय हमारा उद्देश्य क्या होना चाहिए? पश्चिम एशिया संकट यानी ईरान अमेरिका इजरायल टकराव और तनाव ने ईंधन आपूर्ति में उथल-पुथल पैदा कर दिया है। हार्मूज जलडमरूमध्य की खतरनाक नाकेबंदी से निपटना विश्व के लिए मुश्किल हो रहा है।

इसमें पेट्रोल डीजल आदि के लिए आयात पर निर्भर भारत या अन्य देशों के लिए दूरगामी दृष्टि से आपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था करना, देशों के संबंधों में हो रहे बदलावों के साथ सामंजस्य स्थापित करना या अस्थिरता के काल में उसका आधार बनाते रहना तथा भविष्य में बनने वाले अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की दृष्टि से ऐसी स्थिति में होना ताकि देश के रूप में हम कहीं अलग-थलग न पड़ें। 

 

मोटा-मोटी प्रधानमंत्री की यात्रा में यही लक्ष्य समाहित होंगे। इन सबमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। आप चाहे भाजपा के सरकार के विरोधी हों या समर्थक दृष्टि एक ही होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान उन देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत, संयुक्त घोषणाओं तथा संपन्न समझौतों में क्या-क्या हुआ? जब आप गहराई से उन सबको देखेंगे तो आपका विचार अपने आप बदल जाएगा। दुर्भाग्य से हम उन पर सरसरी दृष्टि भी डालना नहीं चाहते। 

 

किसी पत्रकार ने नॉर्वे में दोनों प्रधानमंत्रियों के स्वागत वक्तव्य में निर्धारित प्रोटोकॉल के विपरीत जबरन कैमरे घूमाकर भारत के प्रधानमंत्री से मानवाधिकार एवं प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न पूछे और वह हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। नॉर्वे के साथ हमारे समझौते, हमारे यहां पेंशन फंड से 28 अरब डॉलर के निवेश की योजना, ब्लू इकोनामी साझेदारी, हरित साझेदारी आदि पर हमने चर्चा नहीं की।

यही नहीं नॉर्दिक भारत शिखर सम्मेलन में औपचारिक रूप से ट्रस्टेड ग्रीन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप यानी विश्वसनीय हरित तकनीक एवं अन्वेषण रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिलना और कातिक परिषद में भी पर्यवेक्षक की हैसियत हासिल करना इनके लिए हास्य पर चला गया। 

 

इसी तरह इटली की यात्रा में प्रधानमंत्री ने पार्ले कंपनी के सामान्य मेलोडी ट्रॉफी वहां की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी को भेंट करते हुए एक रोचक वीडियो पोस्ट किया। इटली के साथ हमारी ठोस विशेष रणनीतिक साझेदारी कायम हुई, भारत और इटली में निर्माण करो तथा विश्व को आपूर्ति करो का ढांचा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के स्थान की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, अनेक मुद्दों पर हमारे साथ सहमति बनी जिनमें आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष भी है। 

 

इस यात्रा में स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया और काम करने वाली पत्रकार और कार्टून छापने वाले अखबार के देश नार्वे ने भी। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य और कृषि संगठन ने प्रधानमंत्री को विशेष रूप से सम्मानित किया। इन सब पर चर्चा की जगह हमारे यहां टौफी वीडियो को लेकर ऐसी टिप्पणियां की जा रही है जिनमें कई को देखने सुनने या पढ़ने में शर्म आए। भारत जैसे देश में विमर्श का यह स्तर किसी को भी अंदर से परेशान कर देगा।

 

क्या हम ऐसा करते समय विचार भी नहीं करते कि एक देश के रूप में विदेश में हमारी कैसी छवि बनेगी? यहीं पर शरद पवार का यह कथन प्रासंगिक हो जाता है कि जब भी राष्ट्रीय हित के लिए सामूहिक रूप से काम करने का मौका मिले तो सभी को एक साझा उद्देश्य के साथ जुड़ना चाहिए और देश की प्रतिष्ठा मजबूत करने में मदद करनी चाहिए। कोई भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री देश के बाहर होते हैं तो अपने दृष्टिकोण से वह देश के भविष्य और सम्मान को ही केंद्र में रखते हैं। कई बार इनमें गलतियां भी हुई है। 

 

आज के दौर के अनुसार उनकी आलोचना भी अस्वाभाविक नहीं है किंतु आलोचना तथ्यों के आधार पर होगी। अखिर जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी ट्रॉफी भेंट करने से हमारी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा? इटली प्राचीन सभ्यता संस्कृति वाला यूरोप का महत्वपूर्ण और मजबूत देश है।

वर्तमान तनावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में दो प्रधानमंत्रियों के बीच इस तरह के सहज संबंध, मुस्कान और ठहाके कूटनीति की दुनिया में बहुत बड़ी उपलब्धि है। एक बार दो नेताओं के बीच सहज सामान्य संवाद निर्मित हो गए तो जटिल से जटिल मुद्दों पर भी सहमति बनती है तथा रास्ता निकल जाता है। दूसरे, इससे हमारे देश के एक सामान्य ब्रांड का भी जबरदस्त विपणन हुआ। इस विषय पर स्थापित अंतरराष्ट्रीय मीडिया की टिप्पणियां देखेंगे तो सकारात्मक भाव पैदा होगा। 

 

कूटनीति में एक सामान्य वस्तु का उपयोग कर माहौल बदल देना, दुनिया को संदेश देना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परस्पर व्यवहार का रास्ता दिखा देना सामान्य बात नहीं है। अभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा हुआ और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी बातचीत के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए।

इसके बाद रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की चीन यात्रा हुई। दोनों नेताओं के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए। पुतिन और शी जिनपिंग के बीच सामान्य संबंध हैं। बावजूद उनके व्यवहार में सहज मुस्कान नहीं दिखेगा। 

 

तनावपूर्ण और अनिश्चितताओं की दुनिया में दो महत्वपूर्ण देश के नेताओं के बीच सरल सहज मुस्कान और संबंध कूटनीति के लिए नया मानक है। कायदे से देश में इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। भारत ने अपने लक्ष्य के अनुरूप यात्रा से सारी उपलब्धियां हासिल की जिसकी ओर तत्काल दृष्टि थी।

दूसरे देश भी अपने हित के अनुसार काम कर रहे थे और उन्हें भी प्राप्त हुआ। पर मूल बात यह है कि हम एक राष्ट्र के रुप में कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता अब ज्यादा उपलब्ध नहीं है कि सामने आकर रास्ता दिखाएं। ज्यादातर जा चुके हैं। हमें ही अपने हर व्यवहार पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर स्वयं को बदलना होगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

Nautapa and Health: नौतपा और स्वास्थ्य: डॉक्टर की सलाह कब है जरूरी?

The picture shows a scene informing a patient about seeking medical advice during Nautapa

heatstroke symptoms and treatment: नौतपा की भीषण गर्मी में शरीर एक सीमा तक ही तापमान को नियंत्रित कर पाता है। कई बार हम सामान्य थकान या सिरदर्द समझकर उन संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो वास्तव में मेडिकल इमरजेंसी हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में घरेलू नुस्खों के बजाय तुरंत डॉक्टर की सलाह लेना जीवन रक्षक साबित हो सकता है।ALSO READ: नौतपा की 'आग' उगलती गर्मी से कैसे बचें? ये 5 सावधानियां और 10 गोल्डन रूल्स बदल देंगे आपका समर गेम!

 

यहां वे मुख्य लक्षण और स्थितियां दी गई हैं जब आपको बिना देरी किए डॉक्टर के पास जाना चाहिए:

 

1. हीट स्ट्रोक (Heat Stroke) के गंभीर संकेत

यह सबसे खतरनाक स्थिति है। यदि किसी व्यक्ति में ये लक्षण दिखें, तो तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं:

 

तेज बुखार: शरीर का तापमान 103°F (39.4°C) या उससे अधिक हो जाना।

 

पसीना बंद होना: त्वचा का गर्म और लाल होना, लेकिन पसीना बिल्कुल न आना (यह संकेत है कि शरीर की कूलिंग प्रणाली फेल हो गई है)।

 

भ्रम या बेहोशी: व्यक्ति का लड़खड़ाना, भ्रमित होना (Confusion), चिड़चिड़ापन या बेहोश हो जाना।

 

तेज धड़कन: दिल की धड़कन का असामान्य रूप से तेज और भारी महसूस होना।

 

2. गंभीर डिहाइड्रेशन (Dehydration)

यदि पानी पीने के बाद भी स्थिति न सुधरे और निम्नलिखित लक्षण बने रहें:

 

पेशाब की कमी: 6-8 घंटे से अधिक समय तक पेशाब न आना या पेशाब का रंग बहुत गहरा पीला होना।

 

मुंह और आंखों का सूखना: होंठों का फटना और विशेषकर बच्चों में रोते समय आंखों से आंसू न निकलना।

 

अत्यधिक सुस्ती: बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होना कि उठना भी मुश्किल लगे।ALSO READ: Nautapa health tips: नौतपा और स्वास्थ्य: बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सावधानियां

 

3. लगातार उल्टियां और दस्त

गर्मी में 'फूड पॉइजनिंग' या लू के कारण बार-बार उल्टियां हो सकती हैं। यदि व्यक्ति कुछ भी खा-पी नहीं पा रहा है और बार-बार उल्टी हो रही है, तो शरीर में नमक और पानी का संतुलन बिगड़ सकता है। इसके लिए अस्पताल में IV Fluids (ड्रिप) की आवश्यकता हो सकती है।

 

4. मांसपेशियों में ऐंठन (Heat Cramps)

यदि हाथ-पैर या पेट की मांसपेशियों में तेज दर्द और ऐंठन हो रही हो जो आराम करने और तरल पदार्थ लेने के 1 घंटे बाद भी ठीक न हो, तो यह गंभीर इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन का संकेत है।

 

5. पुराना रोग होने पर

यदि आपको या परिवार में किसी को निम्नलिखित बीमारियां हैं, तो नौतपा में थोड़ी भी अस्वस्थता होने पर डॉक्टर से पूछें:

 

हृदय रोग (Heart Disease): गर्मी दिल पर अधिक दबाव डालती है।

 

किडनी की समस्या: डिहाइड्रेशन किडनी के लिए घातक हो सकता है।

 

मधुमेह (Diabetes): शुगर के मरीजों को डिहाइड्रेशन का खतरा अधिक होता है।

 

डॉक्टर के पास जाने से पहले क्या करें? (First Aid)

जब तक आप डॉक्टर तक पहुंचते हैं या मदद आती है, तब तक ये कदम उठाएं:

 

मरीज को तुरंत ठंडी या छायादार जगह पर ले जाएं।

 

उनके शरीर पर ठंडे पानी की पट्टियां रखें या स्प्रे करें।

 

पंखे या कूलर की हवा सीधे उन पर डालें।

 

यदि वे सचेत हैं, तो उन्हें धीरे-धीरे पानी या ओआरएस (ORS) पिलाएं। ध्यान रहें कि बेहोश व्यक्ति के मुंह में कुछ न डालें।

 

सावधानी: नौतपा में अपनी मर्जी से कोई भी 'एंटीबायोटिक' या भारी दवा न लें, क्योंकि गर्मी में कुछ दवाएं डिहाइड्रेशन को और बढ़ा सकती हैं। हमेशा डॉक्टर के परामर्श का पालन करें।

 

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लोकतंत्री कॉकरोच

cockroach janta party

व्यंग्य आलेख: भारतीय लोकतंत्र सचमुच एक विराट रसोईघर है, जहां समस्याएं पकती कम हैं और उनके रूपक अधिक तले जाते हैं। यहां बेरोजगारी वर्षों तक सरकारी फाइलों में धूल खाती रहती है, प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं की जवानी चबा जाती हैं, नियुक्तियां अदालतों और विभागों के बीच पिंगपोंग खेलती रहती हैं, लेकिन जैसे ही किसी प्रभावशाली व्यक्ति के कथित बयान में बेरोजगारों की तुलना कॉकरोच से कर दी जाती है, पूरा देश अचानक जाग उठता है।

बाद में उस बयान पर स्पष्टीकरण भी आया कि टिप्पणी बेरोजगारों पर नहीं, फर्जी डिग्री धारियों पर की गई थी। परंतु हमारे समय का सबसे बड़ा सत्य यही है कि इस देश में स्पष्टीकरण उतनी तेजी से नहीं फैलते जितनी तेजी से अपमान फैलता है। शब्द एक बार जनता की नसों में उतर जाएं तो फिर तथ्य पीछे छूट जाते हैं और व्यंग्य आगे निकल जाता है।

 

तीन दिन के भीतर 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से एक फेसबुक पेज बन गया और देखते ही देखते उस पर बारह मिलियन लाइक आ गए। यह संख्या केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता नहीं थी; यह उन लाखों युवाओं की सामूहिक खुन्नस थी जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं, अस्थायी नौकरियों और स्थगित परिणामों के बीच अपने भविष्य की हड्डियां चबाते आ रहे हैं। 

 

मुझे इस विषय पर लिखने के लिए इतने फोन आए कि लगा मानो देश में बेरोजगारी से अधिक रोजगार इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने में पैदा हो गया हो। कुछ लोग अत्यंत उत्साहित थे। एक कॉकरोच क्षमा करिए एक बेरोजगार ने फोन करके कहा, 'भाईसाहब, इस पार्टी पर जरूर लिखिए। पहली बार लगा कि युवाओं ने अपने अपमान को भी आंदोलन बना दिया।' दूसरी ओर कुछ सज्जन अत्यंत क्रोधित थे। उन्होंने लगभग आदेशात्मक स्वर में कहा, 'आप इसका पर्दाफाश कीजिए। यह देशविरोधी मानसिकता है। कॉकरोच भी कोई नाम हुआ?' मुझे लगा मानो वे नाम से अधिक इस बात से आहत थे कि व्यंग्य ने व्यवस्था की बनावटी गंभीरता पर सीधे चप्पल मार दी है।

 

घर पहुंचा तो श्रीमती जी ने समाचार पढ़ते ही सबसे पहले अपना पल्लू समेटा और बोलीं, 'हे भगवान! कोई दूसरा नाम नहीं मिला इन्हें? मुझे तो कॉकरोच का नाम सुनकर ही डर लगता है।' मैंने कहा, 'डरिए मत, ये वही कॉकरोच हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं की अंधेरी रसोई में वर्षों से जीवित हैं।'

वे बोलीं, 'तुम मज़ाक मत करो। ये प्राणी बड़े खतरनाक होते हैं, जहां थोड़ी सी गंदगी दिखी नहीं कि पूरी टोली लेकर पहुंच जाते हैं।' मैं कुछ क्षण चुप रहा, फिर मुझे लगा कि शायद यही इस समय का सबसे बड़ा राजनीतिक विश्लेषण है। व्यवस्था की गंदगी जहां बढ़ती है, वहां असंतोष के कॉकरोच स्वतः पैदा हो जाते हैं।

 

दरअसल 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम अपने भीतर इतना तीखा व्यंग्य समेटे हुए है कि उसने बेरोजगारी की पूरी त्रासदी को एक प्रतीक में बदल दिया। पार्टी का चुनाव चिन्ह बताया गया 'जूते से बचकर भागता हुआ कॉकरोच।' मुझे यह प्रतीक भारतीय बेरोजगार की जीवटता का राष्ट्रीय चिह्न लगा।

वह हर परीक्षा, हर पेपर लीक, हर रद्द भर्ती, हर आश्वासन और हर भाषण के बाद भी जीवित रहता है। उसकी उम्र निकल जाती है, लेकिन विज्ञापन नहीं निकलते। वह कोचिंग संस्थानों, लाइब्रेरियों, किराए के कमरों और साइबर कैफों में ऐसे बचा रहता है जैसे परमाणु युद्ध के बाद भी कॉकरोच बच जाने की वैज्ञानिक भविष्यवाणी सच हो गई हो।

 

पार्टी के एक स्वयंभू संस्थापक अध्यक्ष का वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह कह रहा था, 'हम कॉकरोच हैं, क्योंकि हमें हर जगह देखकर लोग घृणा तो करते हैं, पर हटाते नहीं।' यह सुनकर मुझे लगा कि देश का युवा अब क्रांति नहीं कर रहा, वह अपनी पीड़ा का स्टैंडअप कॉमेडी संस्करण तैयार कर रहा है। वह रोते-रोते इतना थक चुका है कि अब अपनी ही दुर्दशा पर हँसने लगा है।

शायद यही कारण है कि इस पार्टी का घोषणापत्र भी अत्यंत व्यावहारिक बताया गया। उसमें वादा किया गया कि हर बेरोजगार को प्रतिदिन कम से कम पाँच नए आवेदन भरने का अवसर दिया जाएगा, ताकि उसे यह अनुभूति बनी रहे कि राष्ट्र उसके भविष्य के प्रति गंभीर है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया को सात वर्ष से पहले पूरा न किया जाए, क्योंकि इतनी जल्दी नौकरी मिलने से भारतीय युवाओं का धैर्य और आध्यात्मिक विकास बाधित हो सकता है।

 

हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां अवसरों से अधिक प्रेरणादायक भाषण उपलब्ध हैं। एक टीवी बहस में एक विशेषज्ञ कह रहे थे, आज के युवाओं में धैर्य की कमी है। उसी समय स्क्रीन के नीचे पट्टी चल रही थी 'भर्ती परीक्षा परिणाम पांचवीं बार स्थगित।'

मैंने सोचा, यदि धैर्य को ओलंपिक खेलों में शामिल कर लिया जाए तो भारतीय बेरोजगार स्वर्ण पदक लेकर लौटेंगे। वे वर्षों तक फॉर्म भर सकते हैं, फीस जमा कर सकते हैं, परीक्षा रद्द होने पर पुनः आवेदन कर सकते हैं और फिर भी उनसे कहा जाता है 'सकारात्मक सोचो।'

 

सबसे मनोरंजक दृश्य तब दिखाई देता है जब कोई सफल व्यक्ति मंच पर खड़े होकर कहता है 'मेहनत करो, सफलता अवश्य मिलेगी।' यह वही वाक्य है जो प्रायः वह व्यक्ति बोलता है जिसकी सफलता में मेहनत के साथ-साथ संपर्क, संसाधन, समय और सौभाग्य भी बराबर साझेदार रहे होते हैं। पर इस देश में असफलता हमेशा व्यक्ति की मानी जाती है और सफलता हमेशा व्यवस्था की उपलब्धि घोषित कर दी जाती है। बेरोजगार युवक यदि प्रश्न पूछे तो उसे अधीर कहा जाता है, और यदि चुप रहे तो उसे डेटा में बदल दिया जाता है।

 

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प पक्ष वह स्पष्टीकरण था जिसमें कहा गया कि टिप्पणी बेरोजगारों पर नहीं, फर्जी डिग्री धारियों पर की गई थी। मुझे यह सुनकर बड़ा संतोष हुआ। आखिर देश में कुछ तो लोग हैं जिन्हें कॉकरोच मानने योग्य समझा गया। लेकिन समस्या यह है कि इस देश में असली और फर्जी के बीच की रेखा इतनी धुँधली हो चुकी है कि कभी-कभी डिग्री असली होती है और व्यवस्था फर्जी निकल आती है।

 

दरअसल 'कॉकरोच जनता पार्टी' कोई राजनीतिक दल नहीं है। यह इस समय के घायल युवा मन का व्यंग्यात्मक घोषणापत्र है। यह उन लाखों डिग्रियों की सामूहिक हंसी है जो अलमारियों में रखी-रखी पीली पड़ रही हैं। यह उस पीढ़ी का आत्मव्यंग्य है जिसे धीरे-धीरे यह समझा दिया गया है कि उसकी प्रतिभा से अधिक मूल्यवान उसका डेटा है, उसकी योग्यता से अधिक उपयोगी उसकी चुप्पी है। यही कारण है कि आज बेरोजगारी केवल आर्थिक संकट नहीं रह गई है; यह सम्मान के क्षरण का संकट भी बन चुकी है।

 

और शायद इस पूरे प्रसंग का सबसे तीखा व्यंग्य यही है कि देश का युवा अब व्यवस्था से नौकरी नहीं मांगता। वह केवल इतना चाहता है कि उसे कीट-पतंगों की श्रेणी में रखने से पहले कम-से-कम उसकी मार्कशीट एक बार देख ली जाए।

 

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Veer Savarkar : स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बारे में 10 खास बातें

Portrait of Indian revolutionary Vinayak Damodar Savarkar

Veer Savarkar Biography: 28 मई का दिन वीर सावरकर के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य उनके साहस, क्रांतिकारी योगदान और विचारधारा को याद करना है। स्वतंत्रता आंदोलन में उनका ऐतिहासिक योगदान माना गया है। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक सशक्त क्रांतिकारी नेटवर्क तैयार किया था। अभिनव भारत संगठन के मद्देनजर उन्होंने युवाओं को संगठित करके ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय किया था।

 

वीर सावरकर के बारे में 10 खास बातें:

 

1. पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था

उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ था।

 

2. 'वीर' की उपाधि उनके साहस के कारण मिली

ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका के कारण लोग उन्हें 'वीर सावरकर' कहने लगे।

 

3. अभिनव भारत संगठन की स्थापना की

उन्होंने युवाओं को संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने के लिए 'अभिनव भारत' नामक क्रांतिकारी संगठन बनाया था।

 

4. लंदन में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियां चलाईं

वे कानून की पढ़ाई के लिए London गए, जहां उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए कई क्रांतिकारियों को प्रेरित किया।

 

5. 1857 के विद्रोह को 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' कहा

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 (The Indian War of Independence 1857) ने 1857 की क्रांति को नई दृष्टि से प्रस्तुत किया।

 

6. काला पानी की सजा मिली

ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा देकर सेल्युलर जेल (Cellular Jail) भेज दिया था।

 

7. जेल में भी लेखन जारी रखा

उन्होंने जेल की दीवारों पर कविताएं और विचार लिखे, जिन्हें बाद में याद करके बाहर लाया गया।

 

8. हिंदुत्व विचारधारा के प्रमुख प्रवर्तक थे

उनकी पुस्तक हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (Hindutva: Who Is a Hindu?) भारतीय राजनीति और समाज पर लंबे समय तक प्रभाव डालती रही।

 

9. सामाजिक सुधारों का समर्थन किया

वे जाति भेद और अस्पृश्यता के विरोधी थे तथा समाज में समानता के पक्षधर थे।

 

10. 1966 में निधन हुआ

26 फरवरी 1966 को मुंबई में उनका निधन हुआ। आज भी वे भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और प्रभावशाली व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Savarkar Jayanti 2026: वीर सावरकर जयंती: काला पानी की यातनाएं झेलने वाले वीर क्रांतिकारी की गाथा

 

Savarkar Jayanti 2026: वीर सावरकर जयंती: काला पानी की यातनाएं झेलने वाले वीर क्रांतिकारी की गाथा

The painting depicts the arrest and sentencing of Veer Savarkar and his patriotism and spirit of independence

Veer Savarkar Biography: वीर सावरकर जयंती हर वर्ष 28 मई को मनाई जाती है। वीर सावरकर केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक भी थे। उन्होंने छुआछूत और जातिगत भेदभाव का विरोध किया। वे समाज में समानता और एकता के पक्षधर थे। उन्होंने कई पुस्तकें और कविताएं लिखीं। उनके लेखन में राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।

 

वीर सावरकर जीवन परिचय

वीर सावरकर भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, लेखक और समाज सुधारक थे। उनका पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। वे अपने साहस, राष्ट्रवाद और क्रांतिकारी विचारों के लिए प्रसिद्ध हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

 

जन्म, प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर और माता का नाम राधाबाई था। बचपन से ही उनमें देशभक्ति और नेतृत्व की भावना थी। उन्होंने पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। बाद में वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां उन्होंने भारतीय छात्रों को संगठित किया और आजादी के आंदोलन को नई दिशा दी।

 

'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' 

सावरकर ने भारत की आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विदेशी शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया और युवाओं में राष्ट्रभक्ति की भावना जगाई। उनकी प्रसिद्ध तथा एक महान ऐतिहासिक पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' (The Indian War of Independence) यह पहली बार 1909 में नीदरलैंड में प्रकाशित हुई थी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था, क्योंकि इस पुस्तक में 1857 के विद्रोह को केवल 'सिपाही विद्रोह' के बजाय भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रस्तुत किया था। 

 

गिरफ्तारी और सजा

अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर आजीवन कारावास की सजा दी। उन्हें सेल्युलर जेल भेजा गया, जिसे काला पानी कहा जाता था। वहां उन्होंने कई वर्षों तक कठिन यातनाएं झेलीं। वीर सावरकर ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने 'अभिनव भारत” नामक संगठन की स्थापना की। वीर सावरकर सामाजिक सुधारों के भी समर्थक थे और उन्होंने छुआछूत तथा जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। 

 

वीर सावरकर जयंती पर संदेश

 

'देशभक्ति ही सच्चा धर्म है।'

'स्वतंत्रता कभी मांगी नहीं जाती, उसे हासिल किया जाता है।'

'वीर सावरकर का जीवन साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है।'

 

निधन

वीर सावरकर का निधन 26 फरवरी 1966 को मुंबई में हुआ। वे स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, लेखक, समाज सुधारक और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक के रूप में जाने जाते हैं। वीर सावरकर का जीवन आज भी हमें साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देता है। 

 

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Famous works of Nehru: जवाहरलाल नेहरू के 5 ऐसे बड़े कार्य जो नहीं कर सकता था कोई दूसरा पीएम

Portrait of Indias first Prime Minister Pandit Jawaharlal Nehru with children

Pandit Nehru Achievements: पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। उन्होंने एक ऐसे समय में देश की कमान संभाली थी जब भारत सदियों की गुलामी, विभाजन की त्रासदी, भयंकर गरीबी और सांप्रदायिक दंगों से जूझ रहा था। उस दौर में देश को बिखरने से बचाना और एक आधुनिक राष्ट्र की नींव रखना बेहद चुनौतीपूर्ण था। इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नेहरू के कई फैसले और कार्य ऐसे थे जिन्हें उनके कद, दूरदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय छवि के बिना कोई दूसरा प्रधानमंत्री शायद ही अमली जामा पहना पाता। 

 

1. विविध रियासतों का सफल विलय और 'लोकतांत्रिक' भारत का निर्माण

2. 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' (NAM) की शुरुआत

3. आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे 'आधुनिक भारत के मंदिरों' की स्थापना

4. 'इसरो' (ISRO) और परमाणु कार्यक्रम (DRDO/BARC) की शुरुआत

5. 'हिंदू कोड बिल' के जरिए महिलाओं को कानूनी अधिकार दिलाना

 

उनके 5 ऐसे ही बड़े कार्य निम्नलिखित हैं:

 

1. विविध रियासतों का सफल विलय और 'लोकतांत्रिक' भारत का निर्माण

विभाजन के समय भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती 500 से अधिक स्वायत्त रियासतों (Princely States) को एक सूत्र में बांधना था। हालांकि जमीनी स्तर पर रियासतों के एकीकरण का श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, लेकिन इसके पीछे नेहरू की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष सोच की बड़ी भूमिका थी।

 

एकता और लोकतंत्र का समन्वय: कई नव-स्वतंत्र देशों में राजशाही खत्म होने के बाद सैन्य शासन या तानाशाही आ गई। लेकिन नेहरू ने सुनिश्चित किया कि सभी रियासतें न केवल भारत का हिस्सा बनें, बल्कि वहां के नागरिकों को भी समान लोकतांत्रिक अधिकार मिलें। उन्होंने भारत को एक 'हिंदू पाकिस्तान' बनने से रोका और बहुसंस्कृतिवाद को बढ़ावा दिया।

 

2. 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' (NAM) की शुरुआत

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया दो महाशक्तियों- अमेरिका (पूंजीवादी ब्लॉक) और सोवियत संघ (साम्यवादी ब्लॉक) के बीच 'शीत युद्ध' (Cold War) में बंट चुकी थी। उस समय नए आजाद हुए देशों पर किसी एक पाले में जाने का भारी दबाव था।

 

स्वतंत्र विदेश नीति: नेहरू ने किसी भी महाशक्ति का पिछलग्गू बनने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने मिस्र के नासिर और युगोस्लाविया के टीटो के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement – NAM) की नींव रखी।

 

ग्लोबल लीडरशिप: इसके जरिए उन्होंने भारत को वैश्विक मंच पर एक नैतिक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया। इस नीति के कारण भारत को अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से मदद मिली, जो उस समय किसी अन्य नेता के अंतरराष्ट्रीय रसूख के बिना असंभव था।

 

3. आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे 'आधुनिक भारत के मंदिरों' की स्थापना

नेहरू का मानना था कि जब तक भारत वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक उसकी आजादी अधूरी है। उन्होंने भारी उद्योगों, बांधों और शैक्षणिक संस्थानों को 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था।

 

संस्थानों की दूरदर्शी नींव: नेहरू ने देश में IITs (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान), IIMs (भारतीय प्रबंधन संस्थान), AIIMS, और IISER जैसे शीर्ष संस्थानों की स्थापना की।

 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper): उन्होंने देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा और अनुसंधान में लगाया। आज भारत जो दुनिया का आईटी हब बना है और वैश्विक स्तर पर हमारे डॉक्टर्स-इंजीनियर्स का जो डंका बजता है, उसकी बुनियाद नेहरू ने ही रखी थी।

 

4. 'इसरो' (ISRO) और परमाणु कार्यक्रम (DRDO/BARC) की शुरुआत

आज भारत अंतरिक्ष और परमाणु तकनीक के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शुमार है, लेकिन इसकी शुरुआत तब हुई थी जब भारत के पास बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं।

 

अंतरिक्ष और परमाणु विजन: नेहरू ने महान वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के साथ मिलकर परमाणु ऊर्जा आयोग (जो बाद में BARC बना) और विक्रम साराभाई के साथ मिलकर INCOSPAR (जो बाद में ISRO बना) की स्थापना की।

 

असंभव को संभव बनाना: उस दौर में जब देश में भुखमरी की स्थिति थी, तब अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रम पर पैसा खर्च करने के फैसले की भारी आलोचना हो सकती थी। लेकिन नेहरू के अडिग विश्वास के कारण ये संस्थान राजनीति से दूर रहकर देश को आत्मनिर्भर बनाने में सफल रहे।

 

5. 'हिंदू कोड बिल' के जरिए महिलाओं को कानूनी अधिकार दिलाना

आजादी के समय भारतीय समाज अत्यधिक रूढ़िवादी था और महिलाओं के पास पैतृक संपत्ति, तलाक या गोद लेने जैसे बुनियादी कानूनी अधिकार नहीं थे। नेहरू भारत को सामाजिक रूप से भी आधुनिक बनाना चाहते थे।

 

भारी विरोध के बावजूद सुधार: नेहरू ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के साथ मिलकर 'हिंदू कोड बिल' (Hindu Code Bill) को संसद में पेश किया। इस बिल का खुद कांग्रेस के अंदर के वरिष्ठ नेताओं और सनातन रूढ़िवादी संगठनों ने उग्र विरोध किया था।

 

महिला सशक्तिकरण की नींव: नेहरू ने अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी और इस बिल को अलग-अलग हिस्सों में (हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम आदि) पारित कराया। इसके जरिए हिंदू महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, एक विवाह का नियम और तलाक का अधिकार मिला। उस दौर में ऐसा क्रांतिकारी सामाजिक सुधार करना किसी भी अन्य प्रधानमंत्री के बस की बात नहीं थी।

 

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10 things about Nautapa: नौतपा से जुड़ी 10 खास बातें

Picture giving information about the days of Nautapa

Summer Health Care: गर्मियों का सबसे तपता दौर यानी नौतपा भारतीय मौसम और लोकमान्यताओं में बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इन नौ दिनों में सूर्य की तपिश अपने चरम पर होती है, जिससे धरती खूब गर्म होती है और आगे चलकर मानसून मजबूत बनता है। ग्रामीण जीवन, खेती-किसानी और मौसम विज्ञान- तीनों में नौतपा का विशेष महत्व बताया गया है।ALSO READ: नौतपा की 'आग' उगलती गर्मी से कैसे बचें? ये 5 सावधानियां और 10 गोल्डन रूल्स बदल देंगे आपका समर गेम!

आइए जानते हैं नौतपा से जुड़ी 10 खास बातें, जो इसे सामान्य गर्मी से अलग बनाती हैं।

 

1. सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते ही नौतपा की शुरुआत मानी जाती है।

 

2. नौतपा के शुरुआती नौ दिन साल के सबसे गर्म दिनों में गिने जाते हैं।

 

3. इस दौरान सूरज की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं, जिससे गर्मी अधिक बढ़ जाती है।

 

4. खाली पेट धूप में निकलना नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए कुछ खाकर ही बाहर जाएं।

 

5. शरीर में ऊर्जा बनाए रखने के लिए समय-समय पर ग्लूकोज या इलेक्ट्रोलाइट्स लेते रहें।

 

6. मान्यता है कि नौतपा अच्छी तरह तपे तो मानसून में अच्छी बारिश होती है।

 

7. लू लगने के लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें या घरेलू उपाय अपनाएं।

 

8. एसी से सीधे तेज धूप में निकलने से बचें, इससे शरीर पर अचानक असर पड़ सकता है।

 

9. इन दिनों पेय पदार्थों और पानी की मात्रा सामान्य दिनों से ज्यादा रखें।

 

10. जिन लोगों को गर्मी अधिक परेशान करती है, वे हाथ-पैरों और सिर पर मेहंदी लगाकर शरीर को ठंडक दे सकते हैं।

 

नौतपा की तेज गर्मी में थोड़ी सी सावधानी आपको लू, डिहाइड्रेशन और थकावट जैसी समस्याओं से बचा सकती है। सही खानपान, पर्याप्त पानी और धूप से बचाव के उपाय अपनाकर आप इस मौसम में आसानी से सेहत संबंधी परेशानियों से बच सकते हैं।

 

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