Friendship Day 2026: कैसे दोस्तों के दोस्त बन जाते हैं जिंदगी के सबसे पक्के दोस्त?

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Friendship Day 2026 Special: “दोस्ती” एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम खुद चुनते हैं। खून का रिश्ता न होकर भी यह दुनिया के सबसे खूबसूरत और मजबूत रिश्तों में से एक माना जाता है। अगस्त का पहला इतवार यानी फ्रेंडशिप डे, इसी अनमोल बंधन का जश्न मनाने का दिन है। इस बार 2 अगस्त को फ्रेंडशिप डे रहेगा।

 

अक्सर हमारी ज़िंदगी में कुछ लोग ऐसे आते हैं, जिन्हें हम शुरुआत में सिर्फ 'किसी दोस्त का दोस्त' (Mutual Friend) मानकर मिलते हैं। हाय-हेलो से शुरू हुआ यह सफर कब एक अटूट और पक्के रिश्ते में बदल जाता है, इसका अंदाजा भी नहीं होता। इस फ्रेंडशिप डे पर बात करते हैं उसी खास सफर की- कैसे “दोस्तों के दोस्त” बन जाते हैं हमारे “पक्के दोस्त”!

 

म्यूचुअल फ्रेंड से 'बेस्ट फ्रेंड' बनने का सफर

अनजाने में हुई पहली मुलाकात:

किसी पार्टी, कॉलेज कैंटीन या वीकेंड ट्रिप पर जब कोई दोस्त अपने किसी और दोस्त को साथ लाता है, तब पहली बार मुलाकात होती है। शुरुआत में बातचीत थोड़ी औपचारिक (Formal) होती है, लेकिन धीरे-धीरे यही औपचारिकता हंसी-मजाक में बदल जाती है।

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पसंद और सोच का मिलना:

जब दो लोगों की सोच, पसंद, म्यूजिक टेस्ट या चाय का प्रेम एक जैसा निकल आता है, तो 'म्यूचुअल फ्रेंड' वाला टैग हटने में देर नहीं लगती। साझा पसंद ही नए रिश्ते की नींव रखती है।

 

सुख-दुख के साझेदार:

शुरुआत भले ही किसी तीसरे दोस्त के जरिए हुई हो, लेकिन वक्त के साथ जब कोई इंसान आपके बुरे वक्त में बिना मांगे मदद के लिए खड़ा हो जाए या आपकी खुशी में सबसे ज्यादा खुश हो, तो वह 'दोस्त का दोस्त' नहीं, आपका अपना 'पक्का दोस्त' बन जाता है।

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डिजिटल दौर में दोस्ती का नया अंदाज

आज के दौर में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने 'दोस्तों के दोस्तों' को करीब लाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

ग्रुप चैट्स और ऑनलाइन गेमिंग: अक्सर कॉमन फ्रेंड्स के व्हाट्सएप ग्रुप या ऑनलाइन गेमिंग के दौरान बातचीत शुरू होती है।

समान सोच के सर्कल: सोशल मीडिया पर एक ही तरह के मीम्स शेयर करने और कमेंट्स में खिंचाई करने से दूरियां खत्म होती हैं और एक नया फ्रेंडशिप सर्कल तैयार हो जाता है।

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पक्के दोस्त की पहचान क्या है?

बिना फिल्टर की बातचीत: जिनके सामने आपको खुद को बदलने या कुछ छुपाने की जरूरत न पड़े।

हर स्थिति में साथ: जो आपकी सफलता पर ताली बजाए और असफलता में आपका हाथ थामे।

बिना कहे समझ जाना: आपकी खामोशी या चेहरे के भावों से ही मन की बात पढ़ लेना।

 

फ्रेंडशिप डे 2026 पर अपने 'पक्के दोस्तों' को ऐसे कराएं खास महसूस

पुरानी यादें ताजा करें: अपने उस 'दोस्त के दोस्त' को फोन करें और उस पहली मुलाकात को याद करके हंसें।

एक छोटा सा सरप्राइज: उन्हें फ्रेंडशिप बैंड भेजें, कोई प्यारी सी पुरानी फोटो शेयर करें या साथ बैठकर चाय की चुस्की लें।

दिल से कहें शुक्रिया: अपनी ज़िंदगी में उनकी मौजूदगी के लिए उन्हें “थैंक यू” कहना न भूलें।

सच्ची बात: दोस्ती इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप किसी को कितने सालों से जानते हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि कौन आपकी जिंदगी में आया और कभी साथ नहीं छोड़ा।

 

आप सभी को फ्रेंडशिप डे 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं!

गाली पर इतना बवाल क्यों? भाषा बिगड़ रही है, या समाज का असली चेहरा सामने आ रहा है?

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इन दिनों गालियां फिर राष्ट्रीय बहस का विषय हैं। कभी किसी स्टैंड-अप कॉमेडियन के कारण, कभी किसी ओटीटी सीरीज़ के कारण, कभी किसी यूट्यूबर की भाषा को लेकर, तो कभी किसी छात्र आंदोलन में इस्तेमाल हुए जार्गन पर।

ऐसा लगता है मानो देश के सामने सबसे बड़ा संकट बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य या अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि शब्दों का हो। लेकिन असली सवाल यह है—क्या गालियां अचानक पैदा हुई हैं, या पहली बार माइक्रोफोन पर सुनाई देने लगी हैं?

गाली का इतिहास, इंटरनेट से कहीं पुराना है
यदि कोई यह मानता है कि गालियां इंटरनेट, ओटीटी, जेन-जी या सोशल मीडिया की देन हैं, तो उसे एक बार बनारस के अस्सी घाट की शामें, उत्तर भारत के गांवों की चौपालें, पुलिस थानों की भाषा, ट्रक चालकों की बातचीत और शादी-ब्याह में गाए जाने वाले पारंपरिक 'गारी गीत' याद कर लेने चाहिए।

भारतीय लोकसंस्कृति में गालियों का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है, जितना लोकगीतों का। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वे चौपालों, घाटों और आंगनों में गूंजती थीं, आज एल्गोरिदम उन्हें ट्रेंड करा देता है।

काशीनाथ सिंह ने अपने चर्चित उपन्यास 'काशी का अस्सी' में बनारस की उस भाषा को दर्ज किया है, जिसमें गाली हमेशा अपमान नहीं होती। वह आत्मीयता भी है, ठहाका भी, अपनापन भी और सत्ता से बेखौफ होकर बात करने का अंदाज़ भी। बनारस में कई बार गाली रिश्ते की दूरी नहीं, बल्कि निकटता का प्रमाण होती है।

उत्तर भारत के अनेक विवाहों में आज भी 'गारी' एक रस्म है। दूल्हे और उसके परिवार को गाकर सुनाई जाने वाली ये गालियां अपमान के लिए नहीं, बल्कि सदियों पुराने सामाजिक संकोच को तोड़ने, रिश्तों में सहजता लाने और औपचारिकता की दीवार गिराने के लिए होती हैं।

यानी भारतीय समाज ने गाली को केवल आक्रोश की भाषा नहीं बनाया; कई बार उसे हास्य, अपनत्व और लोकसंस्कृति का भी हिस्सा बनाया है।
दिलचस्प यह है कि यही समाज कबीर का भी है—

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥”

यानी हमारी संस्कृति में मधुर वाणी भी है और ठेठ गाली भी। दोनों सदियों से साथ-साथ चली हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गालियां मोहल्ले तक सीमित थीं, अब राष्ट्रीय बहस का विषय हैं।

असली समस्या गाली नहीं, हमारा पाखंड है
हिंदी भाषी समाज शायद दुनिया के सबसे दिलचस्प भाषाई विरोधाभासों में से एक है।
औपचारिक मंच पर हम शालीनता की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं। “आदरणीय”, “माननीय”, “श्रद्धेय” जैसे शब्दों से वाक्य शुरू करते हैं। लेकिन सड़क पर, ट्रैफिक में, क्रिकेट मैच के दौरान, दोस्तों की महफिल में, पुलिस थानों में और कभी-कभी घरों के भीतर भी वही समाज ऐसी भाषा बोलता है, जिसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में संकोच करता है।

यानी हमारी भाषा दो हिस्सों में बंट चुकी है—एक कैमरे के लिए, दूसरी कैमरे के पीछे।
रहीम ने बहुत पहले चेताया था—

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पाताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥”

लेकिन लगता है कि हमने इस दोहे को दीवार पर टांग दिया, व्यवहार में नहीं।
ओटीटी ने भाषा नहीं बिगाड़ी, उसने मेकअप उतार दिया
हर नई वेब सीरीज़ के बाद कहा जाता है कि ओटीटी समाज को बिगाड़ रहा है।
क्या सचमुच?
या उसने सिर्फ वही भाषा रिकॉर्ड कर ली, जिसे समाज वर्षों से ऑफ रिकॉर्ड बोलता आया है?
जिस समाज में पुलिस की डांट अक्सर गाली से शुरू होती हो, जहां चुनावी मंचों से लेकर विधानसभाओं और संसद तक कई बार असंसदीय शब्द रिकॉर्ड से हटाने पड़ते हों, वहां ओटीटी पर नैतिकता का पूरा बोझ डाल देना आसान रास्ता है।
आईना हमेशा दोषी नहीं होता। कई बार चेहरा भी देख लेना चाहिए।

गाली आखिर करती क्या है?

  • गाली केवल अश्लीलता नहीं है।
  • वह गुस्से का शॉर्टकट है।
  • हताशा का विस्फोट है।
  • व्यंग्य का हथियार है।
  • और कई बार प्रतिरोध की भाषा भी।

दार्शनिक लुडविग विट्गेंस्टाइन ने लिखा था— मेरी भाषा की सीमाएँ ही मेरी दुनिया की सीमाएँ हैं।”
यदि समाज की भाषा अधिक आक्रामक हो रही है, तो संभव है कि समाज के भीतर बेचैनी भी उतनी ही बढ़ रही हो।

कई बार बहुत सारे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पारिवारिक दबावों से बोझिल व्यक्ति के लिए अपनी असहायता, गुस्सा और झुंझलाहट निकालने का सबसे आसान माध्यम एक गाली ही बन जाती है। बिना हिंसा किए, अपमान, निरादर, क्षोभ और प्रतिरोध की जितनी तीखी अभिव्यक्ति कुछ हिंदी गालियां कर देती हैं, उतनी कई बार लंबे भाषण भी नहीं कर पाते।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर गाली जायज़ है। लेकिन हर गाली को केवल खराब संस्कार कह देना भी उतना ही अधूरा विश्लेषण है।

गाली और बराबरी का नया विमर्श
एक दिलचस्प बदलाव और आया है। सदियों तक अधिकांश गालियां स्त्रियों के शरीर और रिश्तों के माध्यम से पुरुष का अपमान करती रहीं। यानी भाषा भी पितृसत्ता का औज़ार बनी रही।
लेकिन आज वही गालियां महिलाएं भी बोल रही हैं।

  • क्या यह भाषा का पतन है?
  • या भाषाई बराबरी का दावा?

उत्तर आसान नहीं है।
महादेवी वर्मा ने लिखा था कि श्रृंखलाएँ केवल लोहे की नहीं होतीं, भाषा की भी होती हैं।” (भावार्थ) संभव है कि नई पीढ़ी उन्हीं भाषाई श्रृंखलाओं को तोड़ने की कोशिश कर रही हो। कुछ इसे पतन कहेंगे, कुछ इसे समानता का दावा। दोनों दृष्टियाँ विचारणीय हैं।

लेकिन सावधान…
यह लेख गालियों का समर्थन नहीं है। क्योंकि जिस दिन तर्क की जगह गाली ले लेगी, उस दिन लोकतंत्र कमजोर होगा। असहमति आवश्यक है। अपमान नहीं।
व्यंग्य लोकतंत्र को जीवित रखता है। लेकिन गाली यदि विचार का विकल्प बन जाए, तो वह संवाद नहीं, शोर पैदा करती है। यहीं सबसे बड़ी सावधानी की जरूरत है।
आज की भाषा में मीम हैं, रील हैं, तंज हैं, वायरल वीडियो हैं और गालियां भी। इनसे असहमत होना आपका अधिकार है।
लेकिन इनके अस्तित्व से इनकार करना शायद वास्तविकता से इनकार करना है। आखिरकार, सवाल यह नहीं कि समाज गालियां क्यों दे रहा है।

सवाल यह है कि समाज इतना गुस्से में क्यों है?
क्योंकि शब्द अपने आप पैदा नहीं होते, वे समय की कोख से जन्म लेते हैं। गालियाँ भाषा का सौंदर्य नहीं हैं,

लेकिन वे समाज की मनःस्थिति का एक्स-रे अवश्य हैं।
इसलिए हर गाली की आलोचना कीजिए, लेकिन उसे जन्म देने वाली सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की भी पड़ताल कीजिए। क्योंकि भाषा कभी निर्वात में पैदा नहीं होती।
वह हमेशा समाज का आईना होती है। और आईना, चाहे कितना भी असुविधाजनक क्यों न लगे, झूठ नहीं बोलता।

कागज से नहीं, भ्रांतियों से बचने की आवश्यकता है

National Paper Day

-गगन गुप्ता
National Paper Day: प्रतिवर्ष 1 अगस्त को राष्ट्रीय कागज़ दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल कागज़ उद्योग या व्यापार से जुड़े लोगों का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का है, क्योंकि कागज़ हमारे ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता का आधार है।

 

आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है, तब कागज़ को लेकर अनेक भ्रांतियां भी तेजी से फैल रही हैं। सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि कागज़ का अधिक उपयोग करने से जंगल समाप्त हो रहे हैं, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।

 

भारत में बनने वाले कागज़ का लगभग 75 प्रतिशत पुनर्चक्रित (रद्दी) कागज़, 10 प्रतिशत कृषि अवशेषों (जैसे गन्ने की खोई, गेहूं एवं धान की भूसी) तथा केवल 15 प्रतिशत विशेष रूप से लगाए गए पेड़ों (Plantation Wood) की लकड़ी से तैयार किया जाता है। यह लकड़ी प्राकृतिक या सरकारी वनों से नहीं, बल्कि किसानों द्वारा उगाए गए वृक्षों और सामाजिक वानिकी (Social & Farm Forestry) के माध्यम से प्राप्त होती है। यही कारण है कि कागज़ उद्योग देश में वृक्षारोपण को बढ़ावा देने, किसानों की आय बढ़ाने तथा हरित आवरण के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

दूसरी ओर, सार्वजनिक वनों से काटे जाने वाले अधिकांश पेड़ों का उपयोग इमारती लकड़ी, फर्नीचर और निर्माण कार्यों में होता है। इसलिए यदि पर्यावरण संरक्षण की बात की जाए, तो हमारा ध्यान उन क्षेत्रों पर अधिक होना चाहिए जहां प्राकृतिक वनों पर वास्तविक दबाव पड़ता है।

 

कागज़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह 100 प्रतिशत पुनर्चक्रण योग्य (Recyclable) और जैव-अवक्रमणीय (Biodegradable) है। उपयोग के बाद इसे बार-बार पुनः कागज़ में बदला जा सकता है। यही कारण है कि विकसित देशों में भी कागज़ के पुनर्चक्रण और जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है।

 

शिक्षा, न्याय व्यवस्था, बैंकिंग, चिकित्सा, प्रशासन, शोध, साहित्य, धार्मिक ग्रंथ, संविधान, अभिलेख, मानचित्र और करोड़ों विद्यार्थियों की पढ़ाई इन सभी का आधार आज भी कागज़ है। डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन ज्ञान के स्थायी संरक्षण और विश्वसनीय दस्तावेज़ीकरण में कागज़ की भूमिका आज भी अपरिवर्तनीय है।

 

कागज़ का विवेकपूर्ण उपयोग पर्यावरण के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके पक्ष में है। जितनी अधिक मांग होगी, उतना ही अधिक नियोजित वृक्षारोपण होगा, किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी और हरित क्षेत्र का विस्तार होगा। इसलिए आवश्यकता कागज का बहिष्कार करने की नहीं, बल्कि “कम करें, पुनः उपयोग करें और पुनर्चक्रण करें” की भावना को अपनाने की है।

 

इन्हीं तथ्यों को समाज तक पहुंचाने के उद्देश्य से इंदौर पेपर ट्रेडर्स एसोसिएशन पिछले कई वर्षों से विद्यालयों में जागरूकता सेमिनार, चित्रकला प्रतियोगिताएं, वृक्षारोपण अभियान, सोशल मीडिया के माध्यम से जन-जागरूकता तथा विभिन्न सामाजिक गतिविधियों का आयोजन करता आ रहा है।

 

राष्ट्रीय कागज दिवस पर आइए, हम सभी यह संकल्प लें कि कागज़ का विवेकपूर्ण उपयोग करेंगे, अधिक से अधिक पुनर्चक्रण को अपनाएंगे और वृक्षारोपण को बढ़ावा देंगे। पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक मार्ग कागज़ का बहिष्कार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच, जिम्मेदार उपयोग और अधिक से अधिक हरित आवरण के निर्माण से होकर गुजरता है।

 

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भ्रांतियों के स्थान पर तथ्यों को स्वीकार करें। कागज़ पेड़ों को समाप्त नहीं करता, बल्कि नियोजित वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करता है। जितना अधिक कागज़ पुनर्चक्रित होगा और जितनी अधिक उसकी जिम्मेदारीपूर्ण खपत होगी, उतना ही अधिक वृक्षारोपण, किसानों की आय, हरित आवरण और पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा।

 

आइए, इस राष्ट्रीय कागज़ दिवस पर यह संदेश जन-जन तक पहुंचाएं- “पेड़ काटकर नहीं, पेड़ लगाकर कागज़ बनता है।” “कागज़ का जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग ही हरित, समृद्ध और सतत भविष्य की मजबूत नींव है।”

मुंशी प्रेमचंद जयंती पर जाने जीवन परिचय और 6 अनसुनी बातें

A photograph of Munshi Premchand, the titan of Indian literature

Munshi Premchand Biography: भारतीय साहित्य में जब भी यथार्थवाद, सामाजिक चेतना और आम आदमी के जीवन का जिक्र होता है, तो सबसे पहले मुंशी प्रेमचंद का नाम सामने आता है। हिंदी और उर्दू साहित्य के इस महान लेखक ने अपनी लेखनी से समाज की कुरीतियों, गरीबी, शोषण, जातिगत भेदभाव और ग्रामीण जीवन की सच्चाइयों को बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। यही कारण है कि उन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहा जाता है। हर वर्ष 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद की जयंती मनाई जाती है। 

 

यहां जानें मुंशी प्रेमचंद जयंती 2026 पर हिंदी-उर्दू के महान साहित्यकार का जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान, प्रमुख रचनाएं और उनसे जुड़े रोचक व अनसुने तथ्य।

 

मुंशी प्रेमचंद: संक्षिप्त जीवन परिचय

 

वास्तविक नाम- धनपत राय श्रीवास्तव

जन्म तिथि व स्थान- 31 जुलाई 1880, लमही (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)

उपनाम/लेखन नाम- नवाब राय (उर्दू में), प्रेमचंद (हिंदी में)

माता-पिता- आनंदी देवी और अजायब राय (डाकघर में क्लर्क)

प्रमुख रचनाएं-

उपन्यास: गोदान, गबन, सेवासदन, कर्मभूमि, रंगभूमि

कहानी- ईदगाह, पूस की रात, दो बैलों की कथा, कफन

निधन- 8 अक्टूबर 1936, वाराणसी

 

मुंशी प्रेमचंद के जीवन से जुड़ी अनसुनी बातें

1. असली नाम 'धनपत राय' और पहला छद्म नाम 'नवाब राय'

बचपन में उनके चाचा उन्हें 'नवाब' कहते थे। जब उन्होंने उर्दू में लिखना शुरू किया, तो 'नवाब राय' नाम से ही अपनी रचनाएं प्रकाशित करवाते थे।

 

2. पहली किताब 'सोजे वतन'

1908 में उनका पहला कहानी संग्रह 'सोजे वतन' (देश का दर्द) उर्दू में छपा। इसमें देशभक्ति की भावना इतनी तीव्र थी कि ब्रिटिश सरकार ने इसे राष्ट्रद्रोही मानकर प्रतिबंधित कर दिया और इसकी सभी प्रतियां जला दीं। इसके बाद हमीरपुर के दरोगा ने उन्हें बिना सरकारी इजाजत न लिखने की सख्त चेतावनी दी।

 

3. 'प्रेमचंद' नाम कैसे पड़ा?

अंग्रेजी हुकूमत की बंदिशों से बचने के लिए उनके स्नेही मित्र और 'जमाना' पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम ने उन्हें एक नया नाम सुझाया- 'प्रेमचंद'। इसके बाद उन्होंने इसी नाम से हिंदी में लिखना शुरू किया।

 

4. बाल-विवाह का विरोध और विधवा-विवाह

प्रेमचंद सामाजिक कुरीतियों के सख्त खिलाफ थे। अपनी पहली शादी के असफल होने के बाद, उन्होंने 1906 में समाज के विरोध की परवाह न करते हुए एक बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया। शिवरानी देवी स्वयं एक लेखिका थीं और उन्होंने प्रेमचंद पर 'प्रेमचंद घर में' नाम से प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।

 

5. महात्मा गांधी के आह्वान पर सरकारी नौकरी छोड़ी

प्रेमचंद शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थे। 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो प्रेमचंद ने अपनी स्थिर सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूर्णकालिक लेखन व देश सेवा में जुट गए।

 

6. 'मुंशी' शब्द कैसे जुड़ा?

'मुंशी' उनका नाम नहीं बल्कि एक सम्मानजनक उपाधि थी। जब वे 'हंस' पत्रिका का संपादन कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (K. M. Munshi) के साथ करते थे, तब कवर पेज पर 'मुंशी, प्रेमचंद' छपता था, जिसे बाद में लोगों ने एक साथ 'मुंशी प्रेमचंद' कहना शुरू कर दिया।

 

'साहित्य वही है जो हमारे अंदर सौंदर्य की भावना जगाए, हममें गति, शक्ति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं।' – मुंशी प्रेमचंद

 

मुंशी प्रेमचंद केवल एक लेखक नहीं, बल्कि भारतीय समाज के संवेदनशील इतिहासकार और जनमानस के साहित्यकार थे। उनकी रचनाएं आज भी समाज को सोचने, बदलने और मानवीय मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती हैं। उनकी जयंती हमें यह याद दिलाती है कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रभावशाली शक्ति भी है। उनकी जयंती के अवसर पर देशभर में साहित्यिक गोष्ठियां, संगोष्ठियां, पुस्तक प्रदर्शनियां और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 

उधमसिंह शहीद दिवस पर जानें इस वीर क्रांतिकारी के बारे में 10 अनसुने तथ्य

 Picture of Udham Singh, a true son of Mother India and a brave revolutionary, on his martyrdom day

 

Udham Singh Shaheed Diwas; भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में शहीद ऊधम सिंह का नाम अदम्य साहस, देशभक्ति और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए लगभग 21 वर्षों तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और अंततः ब्रिटिश अधिकारी माइकल ओ'ड्वायर को लंदन में गोली मारकर हजारों निर्दोष भारतीयों की शहादत का प्रतिशोध लिया।

31 जुलाई को मनाया जाने वाला ऊधम सिंह शहीद दिवस हमें उनके अद्वितीय साहस, राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान की याद दिलाता है। इस महान क्रांतिकारी के जीवन से जुड़े 10 ऐसे रोचक और कम चर्चित तथ्य, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

 

आइए जानते हैं उधम सिंह शहीद दिवस पर जानें इस महान क्रांतिकारी के जीवन से जुड़े 10 अनसुने और प्रेरणादायक तथ्य…

 

उधम सिंह के बारे में 10 अनसुने तथ्य

 

1. बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया

ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के सुनाम में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया, जिसके बाद वे अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में पले-बढ़े।

 

2. उनका जन्म नाम कुछ और था

बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका मूल यानी जन्म नाम शेर सिंह था। अनाथालय में दीक्षा के बाद उनका नाम बदलकर ऊधम सिंह रखा गया।

 

3. जलियांवाला बाग हत्याकांड ने बदल दी जिंदगी

13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग नरसंहार ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने वहीं प्रतिज्ञा की कि इस अत्याचार के जिम्मेदार लोगों को दंड दिलाएंगे।

 

4. बदला लेने के लिए 21 वर्षों तक इंतजार किया

ऊधम सिंह ने जल्दबाजी नहीं की। उन्होंने लगभग 21 वर्षों तक सही अवसर का इंतजार किया और फिर 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में माइकल ओ'ड्वायर को गोली मार दी।

 

5. कई देशों की यात्रा की

क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान उन्होंने अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप सहित कई देशों की यात्रा की। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों से संपर्क बनाए।

 

6. कई नामों से पहचाने गए

ब्रिटिश सरकार से बचने के लिए उन्होंने अलग-अलग नामों का उपयोग किया। सबसे प्रसिद्ध नाम 'राम मोहम्मद सिंह आजाद' था, जो भारत की धार्मिक एकता और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है।

 

7. अदालत में भी नहीं झुके

गिरफ्तारी के बाद अदालत में उन्होंने अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं जताया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने अपने देशवासियों के साथ हुए अत्याचार का प्रतिशोध लिया है।

 

8. 31 जुलाई 1940 को दी गई फांसी

ब्रिटेन की पेंटनविले जेल में 31 जुलाई 1940 को उन्हें फांसी दी गई। इसी कारण हर वर्ष 31 जुलाई को उनका शहीद दिवस मनाया जाता है।

 

9. 34 साल बाद भारत लौटा उनका पार्थिव शरीर

वर्ष 1974 में महान क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह के पार्थिव अवशेष उनकी शहादत के 30 साल बाद एयर इंडिया की विशेष उड़ान से भारत लाए गए थे, जहां पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

 

10. आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा हैं

ऊधम सिंह का जीवन हमें अन्याय के खिलाफ साहस, धैर्य, देशभक्ति और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्यायों में हमेशा अमर रहेगा। शहीद दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देना और उनके आदर्शों को अपनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

 

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उजाले उनकी यादों के: डॉ. बशीर बद्र

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लेखक: प्रदीप कांत (वरिष्ठ साहित्यकार)

 

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

 

खुद को ‘दरिया’ कहने वाले इस शायर का नाम है डॉ. बशीर बद्र। उन्होंने यदि इस शेर में खुद को दरिया कहा, तो शायरी में अपना एक अलग मुकाम बनाकर खुद को दरिया साबित भी किया। बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में से हैं, जिन्होंने अपनी एक अलग भाषा और नया मुहावरा गढ़ा। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को पारंपरिक और कठिन शब्दों के चंगुल से निकालकर बेहद सरल और आम-फ़हम (आसानी से समझ आने वाली) भाषा दी। वे किसी बड़ी मजबूरी या मानवीय संवेदना को भी सरलतम शब्दों में बयान कर देते हैं:

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

जी बहुत चाहता है सच बोलें

क्या करें हौसला नहीं होता

 

नज़ाकत और खुद्दारी का अनूठा संगम

एक तरफ बशीर साहब की शायरी में बेहद नज़ाकत है, तो दूसरी तरफ उनकी खुद्दार तबीयत भी साफ़ झलकती है। वे सामने वाले की गलतफ़हमी को जितनी आसानी से समझते हैं, उतनी ही सहजता से अपनी संवेदनशीलता को भी स्पष्ट कर देते हैं:

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला

मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा

 

और जब वे आत्म-सम्मान या खुद्दारी की बात करते हैं, तो इस अंदाज़ में करते हैं कि सामने वाला चाहे कोई भी हो, उनके व्यक्तित्व के आगे बौना नज़र आने लगता है:

कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं

दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आएँगे

 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि वे यहाँ खुद को ओस की 'बूँद' नहीं, बल्कि 'मोती' कहते हैं। ओस की बूँद तो सूरज की पहली किरण के साथ ही नष्ट हो जाती है, जबकि मोती का अस्तित्व लंबा होता है। यहाँ शायर का शब्दों और प्रतीकों के सही इस्तेमाल का हुनर साफ़ दिखाई देता है।

 

त्रासदी और सामाजिक संचेतना

सांप्रदायिकता किसी भी समाज के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप है। कभी-कभी लगता है कि हम कितना भी वैज्ञानिक विकास क्यों न कर लें, सांप्रदायिकता का यह भूत हमारा पीछा नहीं छोड़ता। वर्ष 1987 के मेरठ दंगों में बशीर साहब का घर जला दिया गया—उसी मेरठ में, जो कभी उन पर नाज़ करता था। जब वे इस हादसे के आघात से उबरे, तो उनके क़लम से यह ऐतिहासिक शेर निकला:

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

 

यह शेर सिर्फ दंगों में घर जलने की त्रासदी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है—चाहे वह बुलडोज़र संस्कृति हो, सड़क चौड़ीकरण हो या किसी परियोजना के नाम पर लोगों का विस्थापन।

यहाँ मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर याद आता है:

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा

कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

 

घर जलने के बाद बशीर साहब की कई अनमोल किताबें और बहुत सा लिखा हुआ साहित्य नष्ट हो गया। प्रसिद्ध संगीतकार विशाल भारद्वाज बताते हैं कि बशीर साहब को अपनी 90 प्रतिशत रचनाएँ ज़बानी याद थीं। तब विशाल जी ने एक साल की कड़ी मेहनत के साथ उनकी वे ग़ज़लें पुनः संकलित करवाईं।

 

दरअसल, मसला सिर्फ़ एक मकान के जलने का नहीं होता; उस मकान को किसी ने बड़ी मेहनत, शिद्दत और मोहब्बत से 'घर' बनाया होता है। जब वह जलता है, तो उसे केवल आर्थिक नुकसान कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता। वह क्रूरता और वहशीपन इंसान के दिलो-दिमाग़ पर जो घाव छोड़ता है, उसे केवल वही समझ सकता है जो खुद भुगतभोगी हो या फिर संवेदनशील हो; अन्यथा दूसरों के लिए तो वह सिर्फ़ एक खबर बनकर रह जाती है।

 

नर्म लहज़ा और मारक तंज़

सामान्यतः बशीर साहब का लहज़ा बहुत नर्म है। वे अपने शेरों में कोई चोट भी करते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे रुई के फ़ाहे में लपेटकर एक छोटा-सा पत्थर फेंका गया हो—चोट महसूस भी होती है और शेर सीधे दिल में उतर जाता है। महानगरीय जीवन की औपचारिकता और बनावटी व्यवहार पर उनका यह तंज़ देखिए:

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

 

इसी तरह अपनों की बेरुखी पर वे लिखते हैं:

इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं

उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं

 

पढ़ने और सुनने वालों को यह शेर पढ़कर एक तल्खी (कड़वाहट) महसूस हो सकती है, लेकिन बशीर साहब के अंदाज़ में कोई चीख-पुकार या आक्रामकता नहीं है। बशीर साहब के यहाँ एक तरफ प्रिय को न पा सकने की बेबसी है, तो दूसरी तरफ वे मोहब्बत में भी एहतियात बरतते नज़र आते हैं:

ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने

बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला

मैं यूँ भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ

कोई मासूम क्यूँ मेरे लिए बदनाम हो जाए

 

यहाँ महबूब पर कोई शिकवा या गिला करने के बजाय वे उसे दुनिया की नज़रों से बचाते हुए नज़र आते हैं। वे इतने संवेदनशील शायर हैं कि उन्हें अपनी ही आवाज़ से चोट लग सकती है:

मोहब्बत से इनायत से वफ़ा से चोट लगती है

बिखरे हुए फूल हूँ मुझ को हवा से चोट लगती है

मैं शबनम की ज़बाँ से फूल की आवाज़ सुनता हूँ

अजब एहसास है अपनी सदा से चोट लगती है

तकल्लुफ़, बनावट और अदा से जिसे चोट लग सकती हो, वह इंसान भीतर से कितना पारदर्शी और सादा होगा, यह समझना कठिन नहीं है।

 

आम आदमी के सरोकार

तो क्या डॉ. बशीर बद्र केवल हुस्न, इश्क़ और नज़ाकत के शायर हैं? नहीं। उनके यहाँ जितने ज़ाती (व्यक्तिगत) अनुभव आते हैं, उतनी ही शिद्दत से आम आदमी के सरोकार भी उजागर होते हैं:

दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है

जो भी गुज़रा है उस ने लूटा है

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

 

इन शेरों में समाज के उस अंतिम व्यक्ति की बेबसी नज़र आती है, जिसे मुख्यधारा अक्सर अनदेखा कर देती है। एक आम इंसान कभी नफ़रत नहीं चाहता; नफ़रत तो राजनीतिक व सामाजिक स्वार्थों के लिए फैलाई जाती है। बशीर साहब आम जनमानस की इसी भावना को व्यक्त करते हैं:

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें

आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत

 

सत्ता या व्यवस्था के विरोध में बोलना हमेशा से जोखिम भरा रहा है। इस घुटने टेकती अभिव्यक्ति की कश्मकश को वे सहजता से बयान करते हैं:

मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का

मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है

 

जीवन का सलीका और मर्यादा

बशीर साहब के यहाँ रिश्तों को जीने की एक ख़ास मर्यादा और सलीका है। बड़प्पन के सामने खुद के वजूद को बचाए रखने का हुनर वे बख़ूबी जानते हैं:

ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे

कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना

जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता

 

जहाँ एक तरफ वे ईश्वर के सामने खुद को नतमस्तक मानते हैं, वहीं अन्याय और अधर्म के माहौल में वे यह कहने से भी नहीं झिझकते:

यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें

तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है

 

बशीर साहब ने यह भी गहराई से महसूस किया कि आधुनिक दौर में इंसानियत खोती जा रही है और पदों व ओहदों का महत्त्व बढ़ता जा रहा है:

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे

बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला

 

भाषा और प्रयोगशीलता (हिंदुस्तानी शैली)

बशीर साहब की शायरी का दायरा बहुत व्यापक है। उसमें प्रेम, भ्रम, दोस्ती, दुश्मनी, यादें और पश्चाताप—सब कुछ मौजूद है:

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों

अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना

हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है

 

बशीर साहब का मानना था कि ग़ज़ल ऐसी कही जानी चाहिए जो उर्दू में छपे तो उर्दू की लगे और हिंदी में छपे तो हिंदी पाठक उसे अपनी मान लें। इस लिहाज़ से वे सही मायनों में 'हिंदुस्तानी' ज़बान के शायर हैं। जहाँ उन्होंने ग़ज़ल को उर्दू के कठिन शब्दों से मुक्त किया, वहीं अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों को भी सहजता से अपनाया:

सुनसान रास्तों से सवारी न आएगी

अब धूल से अटी हुई लारी न आएगी

ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है

कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे

 

जीवन का अंतिम सत्य

बशीर साहब एक मुसाफ़िर की तरह अपनी शायरी के सफ़र पर आगे बढ़ते रहे:

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है

आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

 

जब किसी शायर की शोहरत शिखर पर पहुँच जाती है, तो उसके व्यावसायिक इस्तेमाल का ख़तरा भी बढ़ जाता है। बशीर साहब इस बात को समझते थे:

मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए

कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं

 

फिर भी, वे शोहरत के इस चकाचौंध को क्षणभंगुर मानते थे:

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है

जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

 

उन्होंने जीवन और मृत्यु के अंतिम सत्य को बेहद गहराई से समझा था। शायद इसीलिए उन्होंने यह अमर शेर लिखा था:

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

 

और जीवन की थकान को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा:

अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ

मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे

 

(नोट: डॉ. बशीर बद्र जी का 18 मई 2025 को निधन हो गया।)

भले ही बशीर साहब अब शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी शायरी का उजाला और उनकी ग़ज़लें एक मशाल बनकर आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी।

 

 

मध्य प्रदेश में पुनर्जीवित हो रही गुरुकुल की सनातन परंपरा

sandipani vidyalaya MP

Sandipani Schools MP: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार ने 'सांदीपनि विद्यालयों' के जरिए गुरुकुल के संपन्न और सनातन वैभव को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की एक नायाब शुरुआत की है। ​इस वर्ष गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर, जब पूरा देश आदि गुरु महर्षि वेदव्यास के अवदान को याद कर रहा है, तब मध्य प्रदेश से आ रही सांस्कृतिक और शैक्षणिक पुनर्जागरण की बयार पूरे देश को एक नई राह दिखा रही है। इन विद्यालयों में गुरुकुल की समृद्ध परंपराओं के साथ अत्याधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भी शिक्षा दी जा रही है, और ऐसा करने वाला मध्य प्रदेश देश का इकलौता और अग्रणी राज्य बन गया है।

 

​उज्जैन केवल बाबा महाकाल की नगरी ही नहीं है, बल्कि वह द्वापर युग में महर्षि सांदीपनि की ऐतिहासिक तपोभूमि भी रही है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 29 जुलाई को उज्जैन के माधव विज्ञान महाविद्यालय में सांदीपनि अलंकरण समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव थे। इसके अलावा 15 जुलाई से 29 जुलाई तक गुरु शिष्य परंपरा के उत्सव के तौर पर गुरु पूर्णिमा पखवाड़ा मनाया गया। इस दौरान प्रदेश में  “एक गुरु एक वृक्ष” अभियान के तहत 40000 से अधिक पौधों का रोपण भी किया गया।

 

उज्जैन में महर्षि सांदीपनि का पावन आश्रम था, जहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा ने साथ रहकर समतावादी शिक्षा प्राप्त की थी। यहीं पर श्रीकृष्ण और बलराम ने मात्र 64 दिनों में 4 वेद, 6 वेदांग, उपनिषद, राजनीति, युद्धकला, संगीत और जीवन प्रबंधन सहित 64 कलाओं और 14 विद्याओं का गहन अध्ययन किया था।

 

​मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इसी ऐतिहासिक नगरी उज्जैन से आते हैं। यही कारण है कि उज्जैन की इस महान सांदीपनि शिक्षा परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए वे व्यक्तिगत रूप से खासे संजीदा हैं। मुख्यमंत्री इस योजना के क्रियान्वयन, गुणवत्ता और प्रगति की स्वयं कड़े स्तर पर मॉनिटरिंग करते हैं। उनके विजन का ही नतीजा है कि पूर्व की “सीएम राइज़” योजना को भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ देते हुए अब 'सांदीपनि विद्यालय' के रूप में एक नई चेतना प्रदान की गई है।

 

सांदीपनि विद्यालय परंपरा और आधुनिकता का संगम हैं। ​आज का युग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल तकनीक, बिग डेटा और इंटरनेट का है। उंगलियों की एक क्लिक पर दुनिया भर की सूचनाएं उपलब्ध हैं, परंतु सूचना और 'विवेक' में बहुत महीन अंतर होता है। उत्तर इंटरनेट दे सकता है और निबंध एआई लिख सकता है; लेकिन सही-गलत का भेद करने वाला विवेक, मानवीय मूल्य, करुणा और अडिग चरित्र का निर्माण केवल और केवल एक 'सच्चा गुरु' ही कर सकता है।

 

​राज्य में प्रथम चरण में कुल 368 सांदीपनि विद्यालय संचालित हैं। इनमें 274 स्कूल शिक्षा विभाग और 94 जनजातीय कार्य विभाग से जुड़े हैं। दूसरे चरण में 405 और विद्यालय संचालित करने का लक्ष्य तय किया गया है। 

 

​मध्य प्रदेश के सांदीपनि विद्यालय आज की पीढ़ी को राज्य के गौरव से जोड़ रहे हैं। शैक्षिक सत्र 2025- 26 में हाई स्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं में इन विद्यालयों का रिजल्ट तकरीबन 90 फीसदी रहा है। कुल मिलाकर सांदीपनि विद्यालयों के माध्यम से मध्य प्रदेश सरकार 21वीं सदी के भारत के लिए 'मनुष्य निर्माण की एक अनुपम प्रयोगशाला' तैयार कर रही है।

 

​सांदीपनि विद्यालयों का लक्ष्य भव्य कंक्रीट की इमारतें खड़ा करना मात्र नहीं है, बल्कि आधुनिक विद्यालयों में 'गुरुकुल की आत्मा' को डालना है। यहाँ एक तरफ जहाँ आधुनिक विज्ञान प्रयोगशालाएं, रोबोटिक्स और डिजिटल स्मार्ट कक्षाएं बच्चों को 21वीं सदी के लिए तैयार कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पाठ्यक्रम में भारतीय संस्कृति, योग, नैतिक शिक्षा, खेल, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व को अनिवार्य रूप से समाहित किया गया है।

बाघ संरक्षण और पर्यावरण संतुलन

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार ने 'सांदीपनि विद्यालयों' के जरिए गुरुकुल के संपन्न और सनातन वैभव को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की एक नायाब शुरुआत की है। ​इस वर्ष गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर, जब पूरा देश आदि गुरु महर्षि वेदव्यास के अवदान को याद कर रहा है, तब मध्य प्रदेश से आ रही सांस्कृतिक और शैक्षणिक पुनर्जागरण की बयार पूरे देश को एक नई राह दिखा रही है। इन विद्यालयों में गुरुकुल की समृद्ध परंपराओं के साथ अत्याधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भी शिक्षा दी जा रही है, और ऐसा करने वाला मध्य प्रदेश देश का इकलौता और अग्रणी राज्य बन गया है।

 

​उज्जैन केवल बाबा महाकाल की नगरी ही नहीं है, बल्कि वह द्वापर युग में महर्षि सांदीपनि की ऐतिहासिक तपोभूमि भी रही है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर 29 जुलाई को उज्जैन के माधव विज्ञान महाविद्यालय में सांदीपनि अलंकरण समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव थे। इसके अलावा 15 जुलाई से 29 जुलाई तक गुरु शिष्य परंपरा के उत्सव के तौर पर गुरु पूर्णिमा पखवाड़ा मनाया गया। इस दौरान प्रदेश में  “एक गुरु एक वृक्ष” अभियान के तहत 40000 से अधिक पौधों का रोपण भी किया गया।

 

उज्जैन में महर्षि सांदीपनि का पावन आश्रम था, जहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा ने साथ रहकर समतावादी शिक्षा प्राप्त की थी। यहीं पर श्रीकृष्ण और बलराम ने मात्र 64 दिनों में 4 वेद, 6 वेदांग, उपनिषद, राजनीति, युद्धकला, संगीत और जीवन प्रबंधन सहित 64 कलाओं और 14 विद्याओं का गहन अध्ययन किया था।

 

​मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इसी ऐतिहासिक नगरी उज्जैन से आते हैं। यही कारण है कि उज्जैन की इस महान सांदीपनि शिक्षा परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए वे व्यक्तिगत रूप से खासे संजीदा हैं। मुख्यमंत्री इस योजना के क्रियान्वयन, गुणवत्ता और प्रगति की स्वयं कड़े स्तर पर मॉनिटरिंग करते हैं। उनके विजन का ही नतीजा है कि पूर्व की “सीएम राइज़” योजना को भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ देते हुए अब 'सांदीपनि विद्यालय' के रूप में एक नई चेतना प्रदान की गई है।

 

सांदीपनि विद्यालय परंपरा और आधुनिकता का संगम हैं। ​आज का युग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल तकनीक, बिग डेटा और इंटरनेट का है। उंगलियों की एक क्लिक पर दुनिया भर की सूचनाएं उपलब्ध हैं, परंतु सूचना और 'विवेक' में बहुत महीन अंतर होता है। उत्तर इंटरनेट दे सकता है और निबंध एआई लिख सकता है; लेकिन सही-गलत का भेद करने वाला विवेक, मानवीय मूल्य, करुणा और अडिग चरित्र का निर्माण केवल और केवल एक 'सच्चा गुरु' ही कर सकता है।

 

​राज्य में प्रथम चरण में कुल 368 सांदीपनि विद्यालय संचालित हैं। इनमें 274 स्कूल शिक्षा विभाग और 94 जनजातीय कार्य विभाग से जुड़े हैं। दूसरे चरण में 405 और विद्यालय संचालित करने का लक्ष्य तय किया गया है। 

 

​मध्य प्रदेश के सांदीपनि विद्यालय आज की पीढ़ी को राज्य के गौरव से जोड़ रहे हैं। शैक्षिक सत्र 2025- 26 में हाई स्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं में इन विद्यालयों का रिजल्ट तकरीबन 90 फीसदी रहा है। कुल मिलाकर सांदीपनि विद्यालयों के माध्यम से मध्य प्रदेश सरकार 21वीं सदी के भारत के लिए 'मनुष्य निर्माण की एक अनुपम प्रयोगशाला' तैयार कर रही है।

 

​सांदीपनि विद्यालयों का लक्ष्य भव्य कंक्रीट की इमारतें खड़ा करना मात्र नहीं है, बल्कि आधुनिक विद्यालयों में 'गुरुकुल की आत्मा' को डालना है। यहाँ एक तरफ जहाँ आधुनिक विज्ञान प्रयोगशालाएं, रोबोटिक्स और डिजिटल स्मार्ट कक्षाएं बच्चों को 21वीं सदी के लिए तैयार कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पाठ्यक्रम में भारतीय संस्कृति, योग, नैतिक शिक्षा, खेल, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व को अनिवार्य रूप से समाहित किया गया है।

Guru Purnima Essay: हिन्दी निबंध: गुरु पूर्णिमा: गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का महापर्व

A photo of a guru imparting teachings to his disciple on the auspicious occasion of Guru Purnima

Essay on Guru Purnima: प्रस्तावना: भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊंचा माना गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है-ALSO READ: गुरु पूर्णिमा 2026: आधुनिक भारत के 7 महान गुरु, जिनके ज्ञान ने बदल दी लाखों लोगों की जिंदगी

'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुदेवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः'

– अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही महादेव हैं। वे साक्षात् परमब्रह्म के समान हैं। इसलिए भारतीय परंपरा में गुरु का सम्मान सर्वोच्च माना गया है। इसी सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता को व्यक्त करने के लिए प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है।

 

गुरु पूर्णिमा का इतिहास

गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से माना जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया तथा महाभारत और अनेक पुराणों की रचना की। इसलिए उन्हें आदि गुरु कहा जाता है। उनके जन्मदिवस के रूप में गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है, जिसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

यह केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और जीवन के सही मार्गदर्शन से भी जुड़ा हुआ है। इस दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती भी मनाई जाती है। वेदव्यास जी ने चारों वेदों का विभाजन किया, महाभारत की रचना की और अठारह पुराणों का संकलन किया। इसी कारण उन्हें 'आदि गुरु' और 'व्यास ऋषि' के नाम से सम्मानित किया जाता है। इस पर्व को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

 

गुरु केवल विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक ही नहीं होते, बल्कि माता-पिता, आध्यात्मिक गुरु, जीवन में सही दिशा दिखाने वाले मार्गदर्शक और प्रेरणा देने वाले प्रत्येक व्यक्ति गुरु के समान होते हैं। गुरु ही अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। वे हमें केवल पुस्तक का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला, नैतिक मूल्य, अनुशासन और सही निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करते हैं। अहंकार को त्यागकर गुरु के चरणों में श्रद्धा अर्पित करना ही इस पावन पर्व का वास्तविक संदेश है।

 

गुरु पूर्णिमा पर क्या करते हैं: गुरु पूर्णिमा के दिन विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं, उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उन्हें धन्यवाद देते हैं। आश्रमों, विद्यालयों और धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा, सत्संग, भजन-कीर्तन, प्रवचन तथा गुरु वंदना का आयोजन किया जाता है। अनेक लोग अपने गुरु को पुष्प, वस्त्र, पुस्तकें या अन्य उपयोगी उपहार भेंट कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। कई स्थानों पर गुरु के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना अत्यंत शुभ माना जाता है।

 

वर्तमान समय में गुरु का महत्व: वर्तमान समय में जब तकनीक और आधुनिक जीवनशैली तेजी से बदल रही है, तब भी गुरु का महत्व पहले की तरह बना हुआ है। आज इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों से ज्ञान प्राप्त करना आसान हो गया है, लेकिन सही और गलत का अंतर समझाने, व्यक्तित्व का निर्माण करने तथा जीवन में मूल्यों का विकास करने का कार्य केवल एक सच्चा गुरु ही कर सकता है। इसलिए गुरु का स्थान किसी भी पुस्तक, मशीन या तकनीक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

 

गुरु पूर्णिमा का संदेश: गुरु पूर्णिमा हमें यह संदेश देती है कि हमें अपने जीवन में जिन लोगों ने ज्ञान, प्रेरणा और सही दिशा दी है, उनके प्रति सदैव सम्मान और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। गुरु का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सफल और सार्थक बनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

 

उपसंहार: गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का ऐसा महान पर्व है, जो गुरु और शिष्य के पवित्र संबंध को मजबूत बनाता है। यह दिन हमें विनम्रता, ज्ञान, संस्कार और कृतज्ञता का महत्व सिखाता है। यदि हम अपने गुरु के आदर्शों और शिक्षाओं को जीवन में अपनाएं, तो निश्चित रूप से सफलता, सम्मान और आत्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। यही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश और महत्व है। गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि हम अपने जीवन में जिनके भी ऋणी हैं- चाहे वे हमारे शिक्षक हों, माता-पिता हों या मार्गदर्शक, उनके प्रति आभार व्यक्त करें। 

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Happy Guru Purnima Messages: गुरु पूर्णिमा के 10 सबसे खास, भावात्मक और आकर्षक शुभकामना संदेश

Happy Guru Purnima Messages: गुरु पूर्णिमा के 10 सबसे खास, भावात्मक और आकर्षक शुभकामना संदेश

An image featuring 10 heartfelt greeting messages dedicated to the Guru on the occasion of Guru Purnima 2026

Guru Purnima 2026 Wishes: भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का पर्व गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन अवसर माना जाता है। यह दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्होंने वेदों और पुराणों के ज्ञान को संकलित कर मानव समाज को अमूल्य धरोहर प्रदान की। गुरु केवल शिक्षा देने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे जीवन की सही दिशा दिखाने वाले मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और व्यक्तित्व निर्माण के आधार स्तंभ होते हैं।ALSO READ: गुरु पूर्णिमा 2026: आधुनिक भारत के 7 महान गुरु, जिनके ज्ञान ने बदल दी लाखों लोगों की जिंदगी

 

गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु, शिक्षक, माता-पिता, आध्यात्मिक गुरु या जीवन में मार्गदर्शन देने वाले किसी भी व्यक्ति के प्रति सम्मान व्यक्त करना शुभ माना जाता है। एक श्रेष्ठ गुरु का मिलना ईश्वर का सबसे सुंदर उपहार है। आपका मार्गदर्शन मेरे जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा है। आपने केवल किताबों का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि सच्चाई, विनम्रता और मानवता का पाठ भी पढ़ाया। आपके चरणों में मेरा सादर नमन। यह संदेश गुरु पूर्णिमा को खास बना देता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने गुरु, शिक्षकों या मार्गदर्शक को भेजने के लिए यहां 10 बेहद खास, भावात्मक और सम्मानजनक शुभकामना संदेश दिए गए हैं जिन्हें आप WhatsApp, Facebook, Instagram या SMS के माध्यम से साझा कर सकते हैं।

 

यहां पढ़ें संस्कृत श्लोक, भावात्मक तथा पारंपरिक और विचारशील संदेश…

 

1. अज्ञानता के अंधेरे से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले मेरे पूज्य गुरुदेव को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं। आप हैं तो मेरी हर राह आसान है। 

 

2. सिर्फ किताबें पढ़ाना ही शिक्षा नहीं, जीवन जीने की सही कला सिखाना असली ज्ञान है। मुझे एक बेहतर इंसान बनाने के लिए आपका कोटि-कोटि धन्यवाद। शुभ गुरु पूर्णिमा!

 

3. जब भी जीवन के रास्तों पर भटका, आपकी सीख ने ही सही मार्ग दिखाया। मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को गुरु पूर्णिमा की सप्रेम शुभकामनाएं।

 

4. गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुदेवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

– आप ही मेरे मार्गदर्शक हैं और आप ही मेरी प्रेरणा। गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर आपके चरणों में सादर प्रणाम!ALSO READ: गुरु पूर्णिमा पर जरूर जपें ये 5 गुरु मंत्र, जीवन की बाधाएं होंगी दूर और मिलेगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद

 

5. जिसने अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का दीप जलाया, वही सच्चा गुरु है। ऐसे पूजनीय गुरु को गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व की अनंत शुभकामनाएं।

आपका आशीर्वाद सदैव बना रहे।

 

6. अक्षर-अक्षर हमें सिखाते, शब्द-शब्द का अर्थ बताते।

कभी प्यार से तो कभी डांट से, जीवन जीना हमें सिखाते।

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं!

 

7. मिट्टी से तराशकर जिसने मुझे इंसान बनाया,

उस गुरु के चरणों में मेरा शत-शत नमन।

हैप्पी गुरु पूर्णिमा! 

 

8. गुरु का सान्निध्य जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। आपका मार्गदर्शन ही मेरी सफलता की सबसे मजबूत नींव है।

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं!

 

9. सफलता के इस मुकाम पर आज मैं जहां भी हूं, उसमें सबसे बड़ा योगदान आपकी सीख और विश्वास का है। गुरु पूर्णिमा पर आपको मेरा सादर प्रणाम।

 

10. गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की सही दिशा भी दिखाते हैं। आपके आशीर्वाद से हर कठिन राह आसान हो जाती है। आपके चरणों में मेरा सादर प्रणाम। गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं!

 

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