कविता- तू ना हो तो…

कवयित्री: पूर्वा मेहता

 

Poem kavita tum na ho to

शीर्षक: तू ना हो तो…

तू ना हो तो यह दिन थम सा जाता है,

बिना तेरे हमसे रहा नहीं जाता है…

 

तू ना हो तो एक कमी सी है,

दुनिया जैसे बिल्कुल थमी सी है…

 

तू ना हो तो बाकी सब भी है,

मगर उनका होना, न होना सा है…

 

तू ना हो तो सब अधूरा सा लगता है,

तेरे होने से पूरा सा लगता है।

 

तू ना हो तो मेरी मुस्कान खो जाती है,

रातें तो जागती हैं और सुबह सो जाती है…

 

तू ना हो तो बातें किससे करूँ,

तेरे बिना खामोशी भी सताती है…

 

तू ना हो तो सुबह अधूरी सी लगती है,

तेरे न होने से शाम खाली सी लगती है…

 

तू ना हो तो ज़िंदगी चल तो जाती है,

पर तेरे बिना जीने का एहसास खो जाता है…

 

तू ना हो तो हर धुन फीकी सी है,

तेरे बिना हर गीत अधूरा सा है…

 

(समाप्त)

 

भारत की शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में 6 बड़ी खामियां, आखिर कब होगा जरूरी सुधार?

indian education system

cjp protest in delhi: हमारे देश में डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए युवाओं को NEET, JEE और UPSC जैसी कठिनतम प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ता है। इसके विपरीत, देश की नीतियां और भविष्य तय करने वाले राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए किसी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता या मानक परीक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। केवल किसी राजनीतिक दल या संगठन से जुड़कर कोई भी व्यक्ति नीति-निर्माता बन सकता है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि जहाँ देश के निर्माण में लगे विशेषज्ञों के लिए योग्यता के कड़े पैमाने हैं, वहीं पूरे तंत्र को चलाने वाले वर्ग के लिए ऐसी कोई जवाबदेही तय नहीं है। एक अंगूठा टेक भी शिक्षा मंत्री बन सकता है।

 

1. वर्तमान शिक्षा प्रणाली की मौलिक कमियाँ

स्मृति-केंद्रित मूल्यांकन: हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था बुद्धिमत्ता की जगह केवल रटने की क्षमता (Memory) की परीक्षा लेती है। यही कारण है कि अकादमिक स्तर पर गोल्ड मेडल पाने वाले विद्यार्थी भी व्यावहारिक जीवन की चुनौतियों के सामने कई बार असहाय सिद्ध होते हैं।

 

प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा का दबाव: पारंपरिक शिक्षा बच्चों में सहयोग के स्थान पर तुलना और प्रतिस्पर्धा की भावना भरती है। “प्रथम आने” की यह अंधी दौड़ अंततः मानसिक तनाव, ईर्ष्या और सामाजिक विसंगतियों को जन्म देती है।

 

जीविका बनाम जीवन का बोध: वर्तमान शिक्षा नीति का पूरा जोर केवल इस बात पर है कि “रोटी कैसे कमाई जाए”। यह विद्यार्थी को आजीविका कमाना तो सिखाती है, लेकिन शांत, संतुलित और आनंदपूर्ण जीवन जीने की कला से दूर रखती है।

 

2. स्कूल बनाम कोचिंग: शिक्षा व्यवस्था का दोहरा रवैया

भारत में शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, ज्ञानवर्धन और प्रतिभा का विकास माना गया था। लेकिन आज की वास्तविक स्थिति यह है कि देश का शिक्षा ढांचा एक ऐसी अंधी दौड़ में बदल चुका है, जहाँ छात्र और अभिभावक दोनों मानसिक, आर्थिक और सामाजिक दबाव तले पिस रहे हैं। 'स्कूल बनाम कोचिंग' की दुविधा और 'आरक्षण-आधारित व्यवस्था' से उपजी हताशा- ये दो ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं, जिन पर व्यापक और बेबाक चर्चा की तत्काल आवश्यकता है।

 

आज के समय में एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि यदि बच्चे को अंततः प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग ही जाना है, तो स्कूल प्रणाली का औचित्य क्या रह जाता है?

 

समय और संसाधन की बर्बादी: एक सामान्य विद्यार्थी सुबह 6 से 8 घंटे स्कूल में बिताता है और उसके तुरंत बाद कोचिंग संस्थानों का रुख करता है। इससे न तो उसे स्व-अध्ययन (Self-study) का समय मिलता है और न ही मानसिक विश्राम का।

 

'डमी स्कूल' कल्चर का पनपना: 11वीं और 12वीं कक्षा में प्रवेश लेते ही छात्र 'डमी स्कूलing' का सहारा लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं। स्कूल केवल नाममात्र के लिए रह जाते हैं और उनकी पूरी पढ़ाई का केंद्र कोचिंग सेंटर बन जाते हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि हमारी मुख्यधारा की स्कूली शिक्षा NEET और JEE जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के मापदंडों को पूरा करने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है।

 

आर्थिक व मानसिक शोषण: अभिभावक स्कूल और कोचिंग दोनों की भारी-भरकम फीस भरते हैं। लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी जब किसी कारणवश बच्चे का चयन नहीं होता, तो परिवार आर्थिक रूप से टूट जाता है और बच्चा भयंकर अवसाद (Depression) या हताशा का शिकार हो जाता है।

 

3. योग्यता, आरक्षण और युवाओं की अनिश्चितता

शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था ने मेधावी और मेहनती युवाओं के सामने एक अनूठा संकट खड़ा कर दिया है।

 

मेहनत और परिणाम का असंतुलन: जो छात्र दिन-रात एक करके अत्यधिक कठिन परिश्रम करते हैं, उन्हें अक्सर प्रक्रिया के अंत में यह पता चलता है कि कट-ऑफ और सीटों के आरक्षण के कारण उनके सारे प्रयास निष्फल हो गए। यह स्थिति किसी भी युवा के मनोबल को तोड़ने के लिए काफी है।

 

भविष्य के प्रति अनिश्चितता: परीक्षा और नौकरी दोनों स्तरों पर व्याप्त यह व्यवस्था उन बच्चों के लिए अत्यधिक कष्टदायी साबित हो रही है, जो केवल अपनी योग्यता के बल पर आगे बढ़ना चाहते हैं। जब पढ़ाई का पैमाना केवल अंक या ज्ञान न रहकर जातिगत या श्रेणीगत श्रेणियां बन जाता है, तो प्रतिभा पलायन (Brain Drain) और निराशा का जन्म होता है।

 

संवाद का अभाव: इस नीतिगत भेद पर कोई भी राजनीतिक दल या नीति-निर्माता खुलकर बात करने को तैयार नहीं है। सवाल यह है कि यह व्यवस्था कितनी और पीढ़ियों तक इसी रूप में चलती रहेगी और कब तक योग्यता को हाशिये पर रखा जाएगा?

 

4. भौतिकवादी दृष्टिकोण और प्रलोभन की संस्कृति

सफलता की संकीर्ण परिभाषा: बचपन से ही बच्चों के मन में यह विचार गहराई से बिठा दिया जाता है कि पद, ऊँची तनख्वाह, गाड़ी और बंगला ही सफलता के एकमात्र पैमाने हैं।

 

नैतिकता पर हावी पद-लोभ: व्यवस्था बच्चों को 'शांत व गुणी इंसान' या 'वैज्ञानिक' बनने के बजाय 'ऊँची कुर्सी' पाने का प्रलोभन देती है। इस दौड़ में सफलता पाने के साधनों की शुद्धता पीछे छूट जाती है और केवल परिणाम को ही महत्व दिया जाता है।

 

संघर्ष का भाव: यह दृष्टिकोण समाज में एक ऐसा माहौल बनाता है जहाँ हर व्यक्ति दूसरे के खिलाफ संघर्षरत दिखाई देता है, जिससे सहज मैत्री-भाव और सामाजिक सद्भाव समाप्त हो जाता है।

 

5. सामाजिक और वैचारिक विभाजन के केंद्र

संस्थागत सांप्रदायिकता: देश में शिक्षा का ढांचा धार्मिक और सांप्रदायिक आधारों पर बंटा हुआ प्रतीत होता है। विभिन्न धार्मिक व निजी शिक्षण संस्थाएं अपने-अपने एजेंडे के अनुसार पाठ्यक्रम संचालित कर रही हैं, जिससे एकीकृत राष्ट्रीय चेतना का निर्माण बाधित होता है।

 

कैंपस में वैचारिक ध्रुवीकरण: उच्च शिक्षण संस्थान अक्सर वैज्ञानिक शोध और मौलिक चिंतन के केंद्र बनने के बजाय राजनीतिक विचारधाराओं (लेफ्ट और राइट विंग) के टकराव के अड्डे बन जाते हैं। छात्र राष्ट्र निर्माण या नवाचार के बजाय आंदोलनों तक सीमित होकर रह जाते हैं।

 

6. प्राथमिकताओं का विपर्यय और भविष्य की चुनौतियाँ

सकारात्मक प्रेरणा का अभाव: हमारी सामाजिक सोच बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार या नेता बनने का दबाव तो देती है, लेकिन उन्हें एक संवेदनशील इंसान, मौलिक साहित्यकार या वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा नहीं देती।

 

वैज्ञानिक सोच बनाम सांस्कृतिक संघर्ष: यदि हम आने वाली पीढ़ियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temperament) का विकास करने में विफल रहे, तो समाज वैचारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संघर्षों में ही उलझा रहेगा।

 

शिक्षा में क्रांति की जरूरत:

आज़ादी के बाद से शिक्षा नीतियों में अनेक बदलाव हुए, लेकिन वे मुख्य रूप से सतही ही रहे। जब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल 'आज्ञाकारी कर्मचारी' बनाने के ढर्रे से बाहर निकलकर संशय, मौलिक सोच, वैज्ञानिक चेतना और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा नहीं देती, तब तक एक सशक्त और विवेकशील समाज का निर्माण संभव नहीं है। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली न तो विद्यार्थी को सर्वांगीण विकास दे पा रही है और न ही उसे निष्पक्ष अवसर की गारंटी दे रही है। यदि हमें देश के युवा धन को अवसाद, पलायन और आंदोलन से बचाना है, तो दो शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव करना होंगे। 

Azad Jayanti 2026: जयंती विशेष: चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की ऐसी घटनाएं, जिन्हें हर युवा को जानना चाहिए

A photo reflecting the great freedom fighter Chandrashekhar Azads love for India, on the occasion of his birth anniversary

Chandra Shekhar Azad Biography: भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में कई नायक हुए, लेकिन पंडित चन्द्रशेखर 'आजाद' का व्यक्तित्व अद्वितीय है। वे केवल एक महान क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि आत्मसम्मान, संगठन कुशलता और अटूट निष्ठा के प्रतीक थे। उनका साहस, अनुशासन और नेतृत्व आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के युवाओं के लिए आजाद का जीवन केवल वीरता की कहानियों तक सीमित नहीं है; यह इस बात का अध्ययन है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में चरित्र का निर्माण कैसे किया जाता है। 

 

चन्द्रशेखर आजाद जयंती 2026 पर जानें उनके जीवन की प्रेरक घटनाएं, साहस, बलिदान, संघर्ष और ऐसे अनसुने तथ्य जो हर युवा को प्रेरित करते हैं।

 

1. 'आजाद' नाम का जन्म: 

1921 के असहयोग आंदोलन के दौरान मात्र 15 वर्ष का एक किशोर पुलिस की गिरफ्त में आया। अदालत में जब अंग्रेज जज ने सवाल पूछे, तो उस बालक के उत्तर ऐतिहासिक थे:

 

नाम: 'आजाद'

पिता का नाम: 'स्वतंत्रता'

पता: 'जेलखाना'

 

जज ने क्रुद्ध होकर 15 कोड़ों की सजा सुनाई। उस समय हर कोड़े की मार पर चमड़ी उधड़ जाती थी, लेकिन वह किशोर हर मार के साथ 'भारत माता की जय' का हुंकार भरता रहा।

 

* यह घटना केवल एक बच्चे के दुस्साहस की नहीं है। यह दर्शाती है कि जब कोई व्यक्ति अपने आत्म-बोध और राष्ट्र-बोध को पहचान लेता है, तो शारीरिक दर्द या भय उसके सामने बौना साबित हो जाता है। युवाओं के लिए सीख यह है कि अपने सिद्धांतों के लिए खड़े होने का साहस उम्र का मोहताज नहीं होता।

 

2. काकोरी कांड और संगठन पुनर्निर्माण

सन् 1925 का काकोरी ट्रेन एक्शन या काकोरी कांड क्रांतिकारी आंदोलन की महत्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद जब राम प्रसाद बिस्मिल्ला, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां और अन्य प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तो ऐसा लगा कि संगठन समाप्त हो जाएगा।

आजाद ने न केवल खुद को गिरफ्तारी से बचाया, बल्कि बिखर चुके आंदोलन को समेटा। उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) को पुनर्गठित कर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे युवाओं को जोड़कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का रूप दिया।

 

* आजाद केवल बंदूक उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे, वे एक बेहतरीन संगठनकर्ता और रणनीतिकार थे। जब सब कुछ बिखर रहा था, तब नेतृत्व संभालना और नए विचार यानी समाजवाद को जोड़कर संगठन को आगे बढ़ाना उनकी बौद्धिक क्षमता और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

 

3. साधु के वेश में ओरछा प्रवास

काकोरी के बाद जब अंग्रेजों की सीआईडी आजाद के पीछे पड़ी थी, तब वे मध्य प्रदेश में ओरछा के जंगलों यानी सातार नदी के किनारे 'हरिशंकर ब्रह्मचारी' के नाम से छिपकर रहे। वहां वे स्थानीय बच्चों को पढ़ाते थे, कुश्ती सिखाते थे और साथ ही अपने साथियों को निशानेबाज़ी का प्रशिक्षण देते थे।

 

* इस दौर से उनके कठोर आत्म-नियंत्रण और परिस्थितियों के अनुकूल खुद को ढालने की क्षमता का पता चलता है। एक क्रांतिकारी का जीवन केवल उत्तेजना का नहीं, बल्कि लंबे धैर्य और अनुशासन का नाम है- यह सबक आज के उस युवा के लिए जरूरी है जो तुरंत परिणाम की अपेक्षा रखता है।

 

4. अलफ्रेड पार्क में अंतिम संघर्ष

प्रयागराज/ इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में जब मुखबिरी के कारण पुलिस ने उन्हें घेर लिया, तब आजाद के पास पिस्टल में केवल कुछ गोलियां बची थीं। उन्होंने अपने साथी सुखदेव राज को सुरक्षित बाहर निकाला और अकेले पूरी पुलिस टुकड़ी का सामना किया। जब अंतिम गोली बची, तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को याद किया- 'दुश्मन की गोली का सामना हम करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।' उन्होंने वह अंतिम गोली स्वयं को मार ली और जीवित रहते कभी अंग्रेजों के हाथ न आने का अपना वादा पूरा किया।

 

* आजाद का अंतिम क्षण किसी पराजय का नहीं, बल्कि अंतिम विजय का प्रतीक था। उन्होंने मृत्यु का वरण अपनी शर्तों पर किया। यह घटना सिखाती है कि व्यक्ति का जीवन कितना लंबा है, यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि वह अपने जीवन के मूल्यों और प्रतिज्ञाओं के प्रति कितना निष्ठावान रहता है।

 

आज के युवाओं के लिए संदेश

चन्द्रशेखर आजाद का जीवन आज के दौर में इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वे किसी बाहरी शक्ति से ज्यादा अपने विचारों और आत्म-सम्मान के प्रति जवाबदेह थे।

 

स्पष्ट उद्देश्य: आजाद के जीवन में कोई भ्रम यानी कंफ्यूजन नहीं था। उनका लक्ष्य भारत की स्वाधीनता था, और उनका हर कदम उसी ओर उठा।

 

नेतृत्व क्षमता: एक सच्चे नेता की तरह उन्होंने खुद को कभी आगे नहीं रखा, बल्कि अपने साथियों- भगत सिंह आदि को वैचारिक रूप से आगे बढ़ने का पूरा अवसर दिया।

 

स्वाभिमान: उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके।

 

चन्द्रशेखर आजाद का इतिहास पढ़ना केवल बीते हुए समय को याद करना नहीं है, बल्कि अपने अंदर उस 'अजेय भावना' को जगाना है जो किसी भी कठिनाई के आगे झुकने से इंकार कर देती है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: लोकमान्य तिलक जयंती 2026: जीवन परिचय, इतिहास, महत्व और अनसुने तथ्य

लोकमान्य तिलक जयंती 2026: जीवन परिचय, इतिहास, महत्व और अनसुने तथ्य

A portrait of Keshav Gangadhar Tilak on the birth anniversary of Lokmanya Tilak, a pioneer of the freedom movement

Lokmanya Tilak Biography: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और जनजागरण की बात होती है, तो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उन्हें आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली राष्ट्रवादियों में गिना जाता है। हर वर्ष 23 जुलाई को लोकमान्य तिलक की जयंती मनाई जाती है। वर्ष 2026 में उनकी 170वीं जयंती मनाई जाएगी।

 

जब भारतीय जनमानस औपनिवेशिक दासता की गहरी नींद में सोया हुआ था, तब एक ऐसी आवाज़ गूंजी जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी- और वह थीं, 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।' यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत के पुनर्जागरण का शंखनाद था। यह दिन केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों, विचारों और राष्ट्र निर्माण में दिए गए योगदान को समझने का भी अवसर है।

 

  • जीवन परिचय: एक शिक्षक से राष्ट्रनायक तक का सफर
  • इतिहास: गरम दल का नेतृत्व और होम रूल आंदोलन
  • सामाजिक एकीकरण का अनूठा प्रयोग
  • आज के संदर्भ में जयंती का महत्व
  • लोकमान्य तिलक से जुड़े अनसुने तथ्य

 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती 2026 पर जानें उनका जीवन परिचय, इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान, महत्व, प्रसिद्ध विचार और अनसुने तथ्य…

 

जीवन परिचय: एक शिक्षक से राष्ट्रनायक तक का सफर

जन्म: 23 जुलाई 1856 रत्नागिरी, महाराष्ट्र

मूल नाम: केशव गंगाधर तिलक  (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

माता-पिता: पार्वतीबाई एवं गंगाधर रामचंद्र तिलक

योग्यता: गणित और संस्कृत के प्रकांड विद्वान, एलएलबी में स्नातक

उपाधि: 'लोकमान्य' जनता द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया नेता।

पेशा: शिक्षक, पत्रकार, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी

निधन: 1 अगस्त 1920, मुंबई

 

तिलक जी का मानना था कि किसी भी देश की स्वतंत्रता की नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था पर टिकी होती है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक वकील के रूप में नहीं, बल्कि एक शिक्षक के रूप में की। उन्होंने युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए पुणे में 'न्यू इंग्लिश स्कूल' और 'डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी/ फर्गुसन कॉलेज' की स्थापना की।

 

इतिहास: गरम दल का नेतृत्व और होम रूल आंदोलन

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती दौर में जब अंग्रेज सरकार के समक्ष केवल प्रार्थना-पत्र देने की नीति अपनाई जा रही थी, तब तिलक जी ने इसका मुखर विरोध किया। लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल यानी त्रिदेव (लाल-बाल-पाल) के साथ मिलकर उन्होंने कांग्रेस में 'राष्ट्रवादी/गरम दल' का गठन किया। उनका मानना था कि आजादी भीख में नहीं, बल्कि संघर्ष से मिलती है।

 

समाचार पत्रों का माध्यम: बाल गंगाधर तिलक ने ऐसे समय में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाना आसान नहीं था। उन्होंने शिक्षा, पत्रकारिता और सामाजिक आंदोलनों को जनजागरण का माध्यम बनाया।

उन्होंने मराठी समाचार पत्र 'केसरी' और 'मराठा' अंग्रेजी समाचार पत्र के माध्यम से अंग्रेजों की जनविरोधी नीतियों को बेनकाब किया। केसरी में लिखे उनके लेख ब्रिटिश सरकार के लिए किसी बम धमाके से कम नहीं होते थे। सन् 1916 में उन्होंने एनी बेसेंट के साथ मिलकर ऑल इंडिया होम रूल लीग यानी स्वशासन की मांग को लेकर देशव्यापी आंदोलन चलाया, जिसने भारत के कोने-कोने में राष्ट्रवाद की ज्वाला जला दी। 

 

सामाजिक एकीकरण का अनूठा प्रयोग

लोकमान्य तिलक एक दूरदर्शी नेता थे। वे जानते थे कि जब तक भारत की विविधता को एक सूत्र में नहीं पिरोया जाएगा, तब तक अंग्रेजों से लड़ना असंभव है। इसके लिए उन्होंने धर्म और संस्कृति को जन-जागरण का माध्यम बनाया, जिसके तहत उन्होंने सन् 1893 में सार्वजनिक गणेशोत्सव प्रारंभ किया, अर्थात् जो पूजा घरों की चारदीवारी तक सीमित थी, उसे उन्होंने एक सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया ताकि लोग जाति-पात से ऊपर उठकर एक जगह एकत्र हों और देश की स्थिति पर चर्चा कर सकें।

उन्होंने 1895 में शिवाजी महोत्‍सव के रूप में छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य को याद दिलाकर भारत के युवाओं में स्वाभिमान और साहस का संचार किया।

 

आज के संदर्भ में जयंती का महत्व

आज 21वीं सदी के आत्मनिर्भर भारत में लोकमान्य तिलक के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनकी जयंती हमें सिखाती है कि स्वावलंबन ही वास्तविक स्वतंत्रता है। तिलक जी ने जो 'स्वदेशी' का पाठ 100 साल पहले पढ़ाया था, वही आज 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' का आधार है। उनकी निर्भीकता और मौलिक सोच तथा अन्याय के सामने न झुकने का उनका जज्बा आज के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाशपुंज है।

 

लोकमान्य तिलक से जुड़े अनसुने तथ्य

 

1. 'लोकमान्य' की उपाधि जनता ने दी

उनके लोकप्रिय नेतृत्व और जनसमर्थन के कारण लोगों ने उन्हें 'लोकमान्य', अर्थात् 'जिसे जनता ने स्वीकार किया हो', की उपाधि दी।

 

2. पत्रकारिता को बनाया आंदोलन का हथियार

उन्होंने अपने समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों का निर्भीक विरोध किया।

 

3. गणेशोत्सव को बनाया सार्वजनिक उत्सव

तिलक ने घरेलू गणेश पूजा को सार्वजनिक आयोजन का रूप देकर लोगों को एकजुट किया और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया।

 

4. कई बार गए जेल

ब्रिटिश सरकार ने उनके राष्ट्रवादी लेखों और भाषणों के कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार किया। उन्हें म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) के मांडले कारागार में भी कैद रखा गया।

 

5. जेल में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक

मांडले जेल में रहते हुए उन्होंने 'गीता रहस्य' नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की, जिसमें उन्होंने कर्मयोग का महत्व बताया।

 

6. स्वदेशी आंदोलन के समर्थक

उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का जोरदार समर्थन किया।

 

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बारिश में कुछ टेस्टी खाने का है मन? ट्राई करें ये 5 मानसून स्पेशल रेसिपीज

The image caption features a message about monsoon special snack recipes, accompanied by a photo of plates arranged with Palak Patta Chaat, Dal Vada, Samosas, and Potato Tacos

Rainy Day Snacks: रिमझिम फुहारें और ठंडी हवाएं… मानसून का मौसम आते ही दिल कुछ गरमा-गरम और चटपटा खाने के लिए मचलने लगता है। इस मौसम में बालकनी में बैठकर बारिश को निहारते हुए अगर हाथ में स्नैक्स की प्लेट हो, तो मजा दोगुना हो जाता है। अगर आप भी इस बार पारंपरिक पकौड़ों से हटकर कुछ नया और बेहद लाजवाब ट्राई करना चाहते हैं, तो यहाँ 5 मानसून स्पेशल स्नैक्स रेसिपीज दी गई हैं:ALSO READ: बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

 

1. चटपटा 'पालक पत्ता चाट' 

बारिश में चाट खाने का अपना ही मजा है। यह स्नैक दिखने में जितना फैंसी है, बनाने में उतना ही आसान।

 

कैसे बनाएं: पालक के बड़े और साफ पत्तों को बेसन, अजवाइन और नमक के गाढ़े घोल में डुबोकर एकदम क्रिस्पी होने तक तल लें। अब इन कुरकुरे पत्तों को एक प्लेट में सजाएं। ऊपर से फेंटा हुआ मीठा दही, हरी चटनी, इमली की खट्टी-मीठी चटनी, चाट मसाला और नायलॉन सेव डालकर तुरंत सर्व करें।

 

2. गरमा-गरम 'दाल वड़ा' 

दक्षिण भारत का यह मशहूर स्नैक मानसून में कमाल का लगता है। यह ऊपर से बेहद कुरकुरा और अंदर से सॉफ्ट होता है।

 

कैसे तैयार करें: चना दाल को 3-4 घंटे भिगोकर बिना पानी के दरदरा पीस लें। अब इसमें बारीक कटा प्याज, हरी मिर्च, ढेर सारा कढ़ी पत्ता, अदरक और हींग मिलाएं। इस मिश्रण की छोटी-छोटी टिक्कियां बनाकर गरम तेल में सुनहरा होने तक डीप फ्राई करें। इसे नारियल की चटनी के साथ परोसें। चाय के साथ गरमा-गरम 'दाल वड़ा' का आनंद लें।

 

3. अचारी पनीर टिक्का समोसा

आलू समोसा तो हमेशा खाते हैं, इस बार बारिश में कुछ रॉयल ट्राई करें। समोसे के अंदर पनीर टिक्का की स्टफिंग हर बाइट में मजा ला देगी।

 

कैसे तैयार करें: पनीर के छोटे टुकड़ों को दही, तंदूरी मसाला, कसूरी मेथी और थोड़े से अचार के मसाले के साथ मैरीनेट करें और तवे पर हल्का सा टॉस कर लें। अब समोसे की पट्टी (शीट्स) में इस अचारी पनीर को भरकर समोसे का आकार दें और फ्राई करें। पुदीने की तीखी चटनी के साथ यह लाजवाब लगता है।

 

4. क्रिस्पी पोटैटो टाकोस

अगर बच्चों और बड़ों दोनों को खुश करना है, तो यह इंडो-मैक्सिकन फ्यूजन स्नैक बेस्ट है।

 

कैसे बनाएं: उबले हुए आलुओं में चाट मसाला, चिली फ्लेक्स, प्याज और हरा धनिया मिलाकर एक स्टफिंग तैयार करें। अब बची हुई रोटियों या मैदा की शीट पर इस स्टफिंग को फैलाएं, ऊपर से ढेर सारा चीज डालें और इसे आधे चांद के आकार में मोड़ लें। तवे पर मक्खन या तेल लगाकर इसे दोनों तरफ से एकदम क्रिस्पी होने तक सेकें।

 

5. मॉनसून स्पेशल 'चीज़ कॉर्न बॉल्स' 

बारिश और भुट्टे का रिश्ता बहुत पुराना है। इस बार भुट्टे को एक चीजी और क्रिस्पी ट्विस्ट दें।

 

कैसे तैयार करें: उबले हुए कॉर्न को थोड़ा दरदरा क्रश कर लें। इसमें उबला आलू, कद्दूकस किया हुआ मोजेरेला चीज, काली मिर्च और नमक मिलाएं। इसके छोटे-छोटे बॉल्स बनाएं, उन्हें कॉर्नफ्लोर के घोल में डुबोएं और फिर ब्रेड क्रम्ब्स में लपेटकर कुरकुरा होने तक तल लें।

 

स्मार्ट कुकिंग टिप: बारिश के मौसम में स्नैक्स को और भी क्रिस्पी बनाने के लिए बेसन या मैदे के घोल में 1 से 2 चम्मच चावल का आटा या गरम तेल जरूर मिलाएं। इससे स्नैक्स लंबे समय तक कुरकुरे रहते हैं।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Monsoon Special Recipes: मानसून की 5 बेहतरीन रेसिपीज, देखते ही मुंह में आ जाएगा पानी

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

The image depicts the problems that occur when blood sugar levels drop

Signs of Low Blood Sugar: शरीर में शुगर यानी ग्लूकोज का स्तर कम होना एक ऐसी स्थिति है जिसे मेडिकल भाषा में हाइपोग्लाइसीमिया (Hypoglycemia) कहा जाता है। हमारे दिमाग और शरीर को ठीक से काम करने के लिए ग्लूकोज की लगातार जरूरत होती है। जब इसका स्तर 70 mg/dL से नीचे चला जाता है, तो शरीर तुरंत खतरे के संकेत भेजने लगता है।

 

आमतौर पर यह समस्या मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों में अधिक देखी जाती है, लेकिन कई बार लंबे समय तक भूखे रहने, अत्यधिक व्यायाम, कुछ दवाओं के सेवन या अन्य स्वास्थ्य कारणों से गैर-डायबिटिक लोगों में भी हो सकती है। शुरुआत में हल्की कमजोरी, पसीना आना या चक्कर जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं, लेकिन यदि समय पर ध्यान न दिया जाए तो यह स्थिति गंभीर भी हो सकती है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि शुगर कम होने पर शरीर में क्या-क्या परेशानियां हो सकती हैं, उनके शुरुआती संकेत क्या हैं और ऐसी स्थिति में तुरंत क्या करना चाहिए।

 

शरीर में शुगर कम होने पर दिखने वाले लक्षणों को हम इस तरह समझ सकते हैं:ALSO READ: Monsoon Health Tips: बारिश के मौसम के लिए जानें खास 7 डाइट प्लान और इम्युनिटी बढ़ाने वाले घरेलू उपाय

 

1. जब शुगर कम होना शुरू होती है, जानें शुरुआती लक्षण

जैसे ही ब्लड शुगर का लेवल गिरता है, शरीर में एड्रेनालाईन (Adrenaline) हार्मोन बढ़ने लगता है, जिससे ये शुरुआती परेशानियां होती हैं:

 

अचानक तेज भूख लगना: शरीर ऊर्जा की कमी को पूरा करने के लिए तुरंत खाने के संकेत देता है।

 

चक्कर आना या कमजोरी: सिर हल्का महसूस होने लगता है और पैर डगमगाने लगते हैं।

 

चिड़चिड़ापन या मूड बदलना: अचानक बिना बात के गुस्सा आना, रोने का मन करना या घबराहट होना।

 

हाथ-पैरों में कंपन या घबराहट: बिना किसी कारण के शरीर में कंपकंपी महसूस होने लगती है।

 

अत्यधिक पसीना आना और ठंड लगना: बिना गर्मी के भी अचानक विशेषकर गर्दन के पीछे ठंडा पसीना आने लगता है।

 

दिल की धड़कन तेज होना: ऐसा महसूस होना कि दिल बहुत तेजी से धड़क रहा है (Palpitations)।

 

2. जब शुगर बहुत ज्यादा गिर जाएल जानें गंभीर लक्षण

यदि शुरुआती लक्षणों पर ध्यान न दिया जाए और दिमाग को पर्याप्त ग्लूकोज न मिले, तो स्थिति गंभीर हो सकती है:

 

आंखों के सामने धुंधलापन आना: साफ दिखाई न देना या एक की जगह दो चीजें दिखना।

 

भ्रम की स्थिति: बात समझने में दिक्कत होना या लड़खड़ाती आवाज में बोलना या सही से बोल न पाना।

 

नींद न खुलना या सुस्ती: बहुत ज्यादा सुस्ती छा जाना और सोने की इच्छा होना।

 

दौरे पड़ना या बेहोशी: यह सबसे खतरनाक स्थिति है, जहां व्यक्ति अचानक अचेत (Unconscious) हो सकता है।ALSO READ: पोहा, समोसा खाकर हो गए हैं बोर तो नाश्ते में खाएं स्प्राउट्स चाट, 5 फायदे: Healthy Breakfast Ideas

 

आपातकालीन स्थिति में क्या करें? 

यदि आपको या आपके आस-पास किसी को शुगर कम होने के लक्षण दिखें, तो तुरंत '15:15 का नियम' अपनाएं:

 

1. तुरंत करें ये उपाय

15 ग्राम तुरंत पचने वाला कार्बोहाइड्रेट लें: जैसे ही लक्षण दिखें, मरीज को 3-4 चम्मच चीनी/ग्लूकोज पाउडर, 1/2 कप फ्रूट जूस, या 4-5 टॉफी चूसने के लिए दें। ध्यान रखें: चॉकलेट या बिस्कुट न दें, क्योंकि इनमें मौजूद फैट शुगर को जल्दी बढ़ने नहीं देता।

 

2. 15 मिनट का इंतजार करें

कुछ भी मीठा खिलाने के बाद मरीज को शांत बैठने दें या आराम करने दें और 15 मिनट तक इंतजार करें ताकि शुगर शरीर में एब्जॉर्ब हो सके।

 

3. ब्लड शुगर दोबारा चेक करें

15 मिनट बाद ग्लूकोमीटर से शुगर लेवल दोबारा मापें। यदि लेवल अभी भी 70 mg/dL से कम है, तो स्टेप 1 को दोबारा दोहराएं।

 

4. नॉर्मल खाना या स्नैक दें

जब शुगर लेवल 70 mg/dL से ऊपर आ जाए, तो मरीज को एक रोटी या बिस्कुट जैसी ठोस चीज खिलाएं ताकि शुगर लेवल दोबारा नीचे न गिरे। यह शुगर लेवल को स्थिर रखने में मदद करेंगा।

 

महत्वपूर्ण चेतावनी: यदि व्यक्ति बेहोश हो गया हो या कुछ भी निगलने की स्थिति में न हो, तो उसके मुंह में जबरदस्ती पानी, जूस या चीनी बिल्कुल न डालें। इससे वह उसकी सांस की नली में फंस सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत मरीज को नजदीकी अस्पताल ले जाएं ताकि उसे ग्लूकोज का इंजेक्शन (IV Fluids) दिया जा सके।

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Monsoon Health Tips: बारिश में फिट कैसे रहें?

क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना

The Odyssey

एक राजा और महानायक होते हुए भी ओडिसस की ज़िंदगी कोई जश्न नहीं है, बल्कि एक लंबा इंतज़ार, एक बेबसी और ज़िंदगी के आख़िर में पसरा हुआ एक अंतहीन सन्नाटा है। यह एक ऐसे दुख की किरच के साथ घर लौटने की कहानी है, जिसके अंत में यही अर्थ मिलता है कि अंततः ज़िंदगी का कोई अर्थ नहीं। फिर वह ज़िंदगी स्वयं महाकवि होमर के ओडिसस की ही क्यों न हो।

इस फ़िल्म को देखते हुए बार-बार मुझे यह अहसास होता रहा कि ज़िंदगी और समंदर एक ही चीज़ हैं। ज़िंदगी बार-बार समंदर की तरह उफनती है, स्थिर होती है और फिर किसी अंतहीन गहराई की तरह पसर जाती है। इस गहराई का दूर-दूर तक कोई अर्थ नहीं, सिवाय इसके कि वह बस हमारी आँखों के सामने कभी बेसाख़्ता, तो कभी बेतरतीब-सी फैली रहती है—अपने अनंत और विराट विस्तार में फैले नीले समंदर की तरह।

न जाने क्यों, मुझे ‘द ओडिसी’ की कहानी में मुख्य किरदार (प्रोटैगोनिस्ट) समंदर लगता है। उसकी आवाज़, उसका मौन, उसकी गहराई, उसकी आत्मीयता और उसका विद्रोह। दूर तक फैले इस बे-शक्ल पानी में कितना कुछ है, जबकि असल में कुछ भी नहीं।

निर्देशक क्रिस्टोफ़र नोलन का ओडिसस भी समंदर की तरह अपनी गहराई, अपने अकेलेपन, अपनी विफलता और अपनी अंतहीन निरर्थकता के बीच अपनी ज़िंदगी के दस साल गुज़ारता है। वह कई बार एक ऐसे योद्धा की तरह नज़र आता है, जो लहरों के ख़िलाफ़ लड़ना चाहता है; तो कई जगह एक उलझा हुआ आदमी दिखाई देता है।
हालाँकि ट्रॉय के युद्ध के बाद इथाका के राजा ओडिसस के पास घर लौटने का एक मक़सद है। उसकी स्मृति में इंतज़ार करती हुई एक औरत है, जो उसकी पत्नी है। उसका एक मृतप्रायः कुत्ता भी इसलिए इंतज़ार कर रहा है कि जब ओडिसस लौटेगा, तभी वह मरेगा। और ऐसा ही होता है। ओडिसस के आते ही कुत्ता मर जाता है।
ओडिसस की वफ़ादार और बेहद ख़ूबसूरत पत्नी पेनेलोप उसका इंतज़ार कर रही है। वह ओडिसस के लिए अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर देने को तैयार है।

मैं हैरान हूँ। इस ख़ूबसूरत औरत को देखते हुए दृश्य नहीं, बल्कि पंक्तियाँ याद आती हैं। एक पंक्ति याद आती है—Waiting is the most intense way of living.

क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म ‘द ओडिसी’ मानो समंदर पर लिखी हुई कोई उदास कविता हो।

यही वजह है कि ‘द ओडिसी’ में मुझे युद्ध के साथ-साथ प्रेम और इंतज़ार भी दो बड़े तत्त्व महसूस होते हैं। हालाँकि ‘द ओडिसी’ में भावनाओं का ट्रीटमेंट कुछ टूटा, खोया और दरका हुआ-सा है। मैं एक बार भी किसी दृश्य या किसी जेस्चर पर सिहर नहीं पाया। किंतु इसकी सिनेमाई भव्यता, ओडिसस की ज़िंदगी की त्रासदी और इस कहानी का दृश्य-विन्यास इसे इतना बड़ा बना देते हैं कि हम अपनी अदृश्य और नाज़ुक भावनाओं को कुछ देर के लिए कुचलकर भूल जाने को तैयार हो जाते हैं।

लुडविग गोरान्सन का संगीत—जिसमें सिंथेसाइज़र के साथ-साथ प्राचीन और पुनर्निर्मित ग्रीक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया गया है, शायद ब्रॉन्ज़ गोंग भी—समंदर की लहरों, गहरे अँधेरों, दृश्यों की विराटता, कहीं-कहीं पसरी हुई ख़ामोशी और समंदर की विशालता के बीच कभी-कभी शोपाँ की याद दिलाता है।

फ़िल्म में परदे पर अतीत और वर्तमान किसी मौसम की तरह आते-जाते रहते हैं। इन दृश्यों के बीच ओडिसस अपने घर लौटने की कहानी कहता हुआ लड़ाई लड़ रहा है। इस संघर्ष में एक बाहर की लड़ाई है और भीतर की एक भावुक लड़ाई भी। ओडिसस राक्षसों से लेकर प्रेतात्माओं तक से लड़ता है। कभी अच्छी आत्माएँ और देवता उसकी मदद करते हैं। वह अपने स्मृतिलोप से भी लड़ता है और अपने अपराधबोध से भी।

घर लौटने के इस संघर्ष में वह अपने सारे योद्धाओं को खो देता है। कभी समंदर, तो कभी राक्षस उसके सारे प्रिय साथियों को निगल जाते हैं और आख़िर में वह अकेला, ख़ाली हाथ घर लौटता है। इसलिए कई जगह ओडिसस की आत्मा मुझे कलिंग के युद्ध में जीतकर भी अपनी आत्मा से हार चुके सम्राट अशोक की आत्मा जैसी लगती है। कलिंग विजय के लिए सम्राट अशोक ने एक ओर भीषण नरसंहार किया और दूसरी ओर, जीत के बाद भी वह अकेले और एक उलझे हुए दार्शनिक की तरह खड़ा नज़र आया—नितांत अकेला और निसंग। हज़ारों लाशों के बीच खड़ा एक सम्राट, जो यह तय नहीं कर पाया कि वह जीता है या हार गया।

दिलचस्प बात यह है कि जिस अनुवादक एमिली विल्सन ने ‘द ओडिसी’ का अँग्रेज़ी में अनुवाद किया है, उसकी पहली पंक्ति ही कहती है—”Tell me, Muse, of the man of many ways.”

‘द ओडिसी’ महाकवि होमर की लिखी तक़रीबन तीन हज़ार वर्ष पुरानी कविता पर आधारित ग्रीक साहित्य का एक मील का पत्थर है। यह भारत के महाकाव्यों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के समकक्ष माना जाने वाला काव्य है, जिसके रचयिता होमर के वजूद को लेकर भी अनेक रहस्य और मत हैं। कुछ उन्हें एक ही व्यक्ति मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि होमर एक नहीं, बल्कि इस नाम के कई व्यक्ति थे।

कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि ‘होमर’ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रीस के चारणों (घूम-घूमकर कविता गाने वाले कवियों) के एक समूह का नाम मात्र था। कई सदियों से चली आ रही इन मौखिक या वाचिक रचनाओं को जब एक साथ संकलित किया गया, तो उसे ‘होमर’ का नाम दे दिया गया। इस रहस्य को होमरिक प्रश्न (The Homeric Question) कहा गया है।

बहरहाल, क्रिस्टोफ़र नोलन ‘ओपनहाइमर’ बनाकर फ़िल्म-निर्माण का वह बेंचमार्क स्थापित कर चुके हैं कि अगले स्तर पर ‘द ओडिसी’ जैसी फ़िल्म लगभग अनिवार्य थी। अब उनके दर्शकों को भी ‘द ओडिसी’ केवल एक दृश्य-अनुभव की तरह नहीं, बल्कि एक महाकाव्य, एक त्रासदी और मनुष्य के अकेलेपन की यात्रा की तरह देखनी चाहिए। शायद तभी वे उस जगह तक पहुँच पाएँगे, जहाँ पहुँचकर नोलन ने इस फ़िल्म की कल्पना की है।

कविता: लाल किला तुझे सलाम

A scene depicting the importance of our national flag, the tricolor, flying at the Red Fort in the country's capital, Delhi

देश की राजधानी दिल्ली में,

यमुना के तट पर

अडिग अविचल चुपचाप

खड़ा है लाल किला। 

 

इस्लामी फ़ारसी तैमूरी

और हिन्दू शैलियों की

मिली जुली वास्तुकला का

बेजोड़ नमूना यह किला

बलुआ लाल पत्थरों की चादर

से खुद को ढांपे

अपने जख्मों को छुपाए 

हंसता हुआ मिलता है

अपने दर्शनार्थियों-सैलानियों से। 

 

अपने निर्माता शहंशाह शाहजहां से

लेकर अंतिम मुगल बादशाह

जर्जर बहादुर शाह जफर तक की

जीवित मृत कहानियों का

प्रत्यक्ष गवाह यह किला

आज भारत की आन है बान है शान है

और अनमोल धरोहर भी है। 

 

आजादी ए जश्न का आधिकारिक 

आंखों देखा हाल सर्व प्रथम

इसी ने सुनाकर

हमें किया था अभिभूत। 

 

इसके गौरव और पतन की कथा

अतीत की गलियों से निकलकर

वर्तमान के चौराहों पर आकर हमें

करने लगती है उद्वेलित। 

 

इसकी लाल आंखों ने

न जाने कितने

शौर्य के सिपाहियों

क्रांति दूतों, बलिदानियों के लहू से

कालिंदी को

लाल होते हुए देखा है। 

 

आजादी के मोल का

स्मरण कराते इस किले पर

फहराता हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

अहर्निश हमें करता रहता है

रोमांचित-उल्लासित। 

लाल किला तुझे सलाम। 

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है…)

 

Essay on Friendship Day: फ्रेंडशिप डे: दोस्ती के अटूट बंधन का खूबसूरत पर्व, पढ़ें हिन्दी में रोचक निबंध

Friendship is a precious relationship in life, picture shows friends celebrating Friendship Day

Friendship Day 2026 : मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके जीवन में परिवार के बाद यदि किसी रिश्ते का सबसे अधिक महत्व है, तो वह दोस्ती का रिश्ता है। दोस्ती ऐसा बंधन है जो न तो खून का रिश्ता होता है और न ही किसी स्वार्थ पर आधारित होता है। यह विश्वास, अपनापन, सहयोग और सच्ची भावनाओं से जुड़ा होता है। इसी अनमोल रिश्ते का उत्सव मनाने के लिए हर साल अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है।

 

'जिंदगी में एक सच्चा दोस्त होना, 

लाखों की भीड़ में अकेले न होने का अहसास है।'


प्रस्तावना. फ्रेंडशिप डे या मित्रता दिवस केवल एक तारीख या कैलेंडर का दिन नहीं है, बल्कि यह उन खूबसूरत रिश्तों को मनाने का जरिया है जिन्हें हम खून के रिश्तों से परे, अपनी मर्जी और दिल से चुनते हैं। हर साल अगस्त महीने के पहले रविवार को भारत सहित दुनिया के कई देशों में फ्रेंडशिप डे बड़ी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस बार यह दिवस 02 अगस्त को पड़ रहा है, जब फ्रेंडशिप डे मनाया जाएगा। यह दिन हमें अपने दोस्तों के प्रति प्यार, सम्मान और आभार व्यक्त करने का अवसर देता है।

 

फ्रेंडशिप डे की शुरुआत और इतिहास

फ्रेंडशिप डे/ मित्रता दिवस की शुरुआत सबसे पहले 1930 में हॉलमार्क कार्ड्स के संस्थापक जॉइस हॉल द्वारा की गई थी। शुरुआत में लोग इस दिन अपने दोस्तों को कार्ड भेजा करते थे। बाद में, 1958 में इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे का प्रस्ताव रखा गया।

 

संयुक्त राष्ट्र (UN) ने 30 जुलाई को आधिकारिक तौर पर 'अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस' घोषित किया, लेकिन भारत, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों में अगस्त के पहले रविवार को ही फ्रेंडशिप डे मनाने की परंपरा लोकप्रिय है।

 

फ्रेंडशिप डे कैसे मनाया जाता है?

 

आज के दौर में फ्रेंडशिप डे मनाने के तरीके भले ही बदल गए हों, लेकिन इसके पीछे की भावना आज भी वही है:

 

फ्रेंडशिप बैंड और कार्ड्स: बचपन की यादों में सबसे खास होता है दोस्तों की कलाई पर रंग-बिरंगे 'फ्रेंडशिप बैंड' बांधना। जिसके हाथ में जितने ज्यादा बैंड होते थे, वह उतना ही 'पॉपुलर' माना जाता था!

 

गेट-टुगेदर और पार्टी: इस दिन पुराने दोस्त एक साथ मिलते हैं, पुरानी खट्टी-मीठी यादें ताजा करते हैं और साथ में घूमते-फिरते या खाना खाते हैं।

 

डिजिटल शुभकामनाएं: सोशल मीडिया के इस दौर में लोग स्टेटस, फोटो कोलाज और प्यारे संदेशों/मैसेजेस के जरिए दूर बैठे दोस्तों को भी इस दिन की बधाई देते हैं।

 

फ्रेंडशिप डे के अवसर पर लोग अपने दोस्तों को फ्रेंडशिप बैंड बांधते हैं, शुभकामनाएं देते हैं और उपहार देकर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं। स्कूल, कॉलेज और कार्यालयों में भी इस दिन विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कई लोग अपने पुराने दोस्तों से मिलते हैं, साथ घूमने जाते हैं या सोशल मीडिया के माध्यम से शुभकामनाएं भेजते हैं।

 

जीवन में दोस्ती का असली महत्व

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसमें न कोई छोटा होता है, न बड़ा; न कोई अमीर, न गरीब। यह एक निष्पक्ष और पारदर्शी रिश्ता है।

 

सुख-दुख का साथी: सच्चा दोस्त वही है जो आपकी खुशी में खुलकर हंसे और आपके बुरे वक्त में ढाल बनकर आपके साथ खड़ा रहे।

 

बिना डर के अभिव्यक्ति: माता-पिता या परिजनों से हम कई बातें कहने में झिझकते हैं, लेकिन दोस्त के सामने हम बिना किसी नकाब के पूरी तरह से 'असली हम' हो सकते हैं।

 

मानसिक तनाव से मुक्ति: जब जिंदगी की उलझनें हावी होने लगती हैं, तो दोस्त के साथ बिताए कुछ पल या एक कप चाय पूरी थकान और मानसिक तनाव को मिटा देती है।

 

पौराणिक संदर्भ: सच्ची दोस्ती की मिसालें

भारतीय संस्कृति में दोस्ती के कई महान उदाहरण मिलते हैं:

 

* कृष्ण और सुदामा की जोड़ी यह सिखाती है कि सच्ची मित्रता में धन और पद का कोई स्थान नहीं होता।

 

* भगवान राम और सुग्रीव की दोस्ती हमें विपत्ति के समय एक-दूसरे का साथ देने का संदेश देती है।

 

* दुर्योधन के गलत होने के बावजूद, कर्ण ने अपनी मित्रता का धर्म अंत तक निभाया।

 

निष्कर्ष

दोस्ती एक ऐसा पौधा है जिसे विश्वास, सम्मान और प्यार के पानी से सींचना पड़ता है। फ्रेंडशिप डे हमें यह याद दिलाने का एक बहाना है कि भागदौड़ भरी जिंदगी में हम उन लोगों को शुक्रिया कहें जो बिना किसी स्वार्थ के हमारी जिंदगी को खूबसूरत बनाते हैं। इस फ्रेंडशिप डे पर अपने व्यस्त शेड्यूल से थोड़ा समय निकालें, अपने पुराने दोस्तों को फोन करें और उन्हें बताएं कि वे आपके लिए कितने खास हैं!

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

 

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता (फिर इंदौर) हमारा

London Trip

Trip To London: मेरा कथन न तो आत्म मुग्धता है, न अतिशयोक्ति। हर किसी को अपनी माटी, अपना घर, अपने लोग पसंद होते हैं। वह उन सबके साथ सुविधाजनक स्थिति में होता है। फिर भी कोई तो ऐसी बात है कि सैकड़ों साल की गुलामी और लाखों सितम के बाद भी हमारे अभिमान के लिए एक वाक्य ही काफी है कि 'हस्ती मिटती नहीं हमारी'। इसका मतलब यह भी नहीं कि दुनिया में कहीं कुछ हमसे अच्छा नहीं, हमसे बेहतर नहीं। बेहतर तो बहुत है। तकनीक, विज्ञान, शिल्प, शिक्षा, शिष्टाचार, प्राकृतिक संसाधन, व्यवहार वगैरह बहुत कुछ भिन्न और उम्दा बहुत सारी जगह है।

फिर भी हम 140 करोड़ की चिल्लर जैसी आबादी के साथ, मामूली-सी प्राकृतिक और खनिज संपदा (मुगल और अंग्रेज अधिकांश तो लूट ले गए) के साथ, बैसाखी वाली शिक्षा के सहारे, लोकतंत्र के नाम पर लूटमार वाली राजनीतिक व्यवस्था के बीच, जातिवाद, भेदभाव, तुष्टिकरण, भाई-भतीजावाद के नासूर के बावजूद यदि आज दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच पा रहे हैं तो यह है फिनिक्स जैसी जिजीविषा, चट्‌टान जैसी दृढ़ता और पानी जैसी प्रकृति की वजह से, जो किसी भी तरह आगे बढ़ने का रास्ता निकाल लेता है। तो आइए, इस किस्त में कुछ अन्य पहलुओं को टटोलते हैं। ALSO READ: Trip To London : लंदन में न सड़क पर धरने-प्रदर्शन, न चक्का जाम

 

मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि जहां से जो अच्छा मिले, उसे ग्रहण करें। यह भी कि जिसने भी इस ब्रह्मांड की रचना की, उसने किसी एक की झोली में सब कुछ नहीं डाला। कमीबेशी के साथ जीवन दिया है। यदि उत्तर, पश्चिम को ठंडा माहौल, बर्फ से ढंकी वादियां दीं तो पूरब को प्रचुर जल संपदा, विविध भौगोलिक संरचना, नदियां, दुनिया में सर्वाधिक बोलियां, विभिन्न संस्कृतियां, रस्म, त्यौहार, परंपराओं वाली प्रकृति दी। इसलिए किसी को कमतर व किसी को बेहतर हम बताते रहें, लेकिन वे सब अपने आप में भिन्न और कुछ विशेषता लिए हैं। ALSO READ: Trip To London: पाउंड को रुपए में गिनेंगे तो चाय भी नहीं पी सकेंगे

 

ब्रिटेन का प्रमुख शहर व राजधानी लंदन 90 लाख से अधिक आबादी वाला है, लेकिन यहां अंग्रेज केवल 36.8 प्रतिशत हैं। शेष एशियाई, अरब, अफ्रीकन, यहूदी व दुनिया भर के अन्य लोग हैं। लंदन में साढ़े 6 लाख भारतीय, 3 लाख 22 हजार बांग्लादेशी व 2 लाख 90 हजार पाकिस्तानी हैं। आपको किसी भी मॉल, शॉपिंग सेंटर, कार टैक्सी, सिक्यूरिटी सर्विस, एअरपोर्ट ग्राउंड टी, रेस्टारेंट, ग्रासरी स्टोर्स पर मालिक या कर्मचारी के तौर पर भारत, पाक, बांग्लादेश के चेहरे मिल जाएंगे। आप इस चक्कर में न रहें कि कोई भारतीय आपकी ओर देखकर मुस्कराएगा। जबकि, हम इंदौरियों को कोई भटिंडा में भी दिख जाए तो चेहरा खिल उठता है। फिर इंदौर में उससे कभी न मिले हों, बस कहीं देखा भर हो। ALSO READ: London Trip: प्रधानमंत्री से पब्लिक तक मेट्रो, सिटी बस में सफर करते हैं

 

लंदन में यहूदी भी भरपूर नजर आते हैं और मुस्लिमों की तरह अपनी स्पष्ट पहचान के साथ रहते हैं। जैसे मुस्लिम को टोपी-दाढ़ी से परहेज नहीं, वैसे ही ये लांग काला कोट और काली पेंट, सफेद शर्ट पहनते हैं, जिसमें से डोरियां बाहर लटकती रहती हैं। सिर पर हैट भी पहनते हैं। शनिवार को अपने पूजा स्थल सपरिवार जाएंगे। ये आम तौर पर किसी से बात नहीं करते। इनमें भी अधिक बच्चों का चलन है। तीन-चार बच्चे आम बात है। इस शहर में भिखारी, स्ट्रीट डॉग, मच्छर व मक्खियां नहीं हैं। यहां मांगने का तरीका थोड़ा हटकर है। जैसे, कोई फुटपाथ पर कोई स्वांग रचकर लेट-बैठ जाएगा। कोई संगीत पेश करेगा। कोई मेट्रो स्टेशन पर बाकायदा पूरा बैंड सजाकर गाएगा-बजाएगा। आपकी इच्छा हो तो दो नहीं तो निकल लो। ALSO READ: London Trip: सड़कें संकरी, फुटपाथ चौड़े, फिर भी जाम नहीं लगता

 

जब ब्रिटिश हुकूमत के तहत दुनिया के करीब 60-65 देश गुलाम थे, तब कहा जाता था कि विक्टोरिया के राज में कभी सूर्य अस्त नहीं होता। यह दुनिया के करीब 35 प्रतिशत हिस्से पर कब्जे के समय की बात है, लेकिन भौगोलिक कारणों से आज भी ब्रिटन में नाम को ही सूर्यास्त होता है। रात साढ़े नौ बजे तक उजाला रहता है और सुबह 4 बजे फिर से प्रकाश फैल जाता है। यूरोप में भी प्राय: ऐसा होता है।

 

लंदन या ब्रिटेन में टेलिफोन, ऑप्टिकल फाइबर या किसी भी तरह की केबल सड़क के ऊपर नजर नहीं आएगी। सब अंडरग्राउंड। इनके चैंबर पर लिखा भी होगा कि कौन-सी लाइन है। सिवरेज, वाटर सप्लाय, पोस्टल सर्विस, स्ट्राम वाटर लाइन के अलग-अलग चैंबर हैं, जिन पर स्पष्ट अक्षरों में अंकित रहता है। यहां टेलिफोन का उपयोग अभी-भी बहुतायत से होता है- खासकर वरिष्ठ नागरिक इसका उपयोग करते हैं। उनके लिए आपातकालीन सेवा के नंबर याद रखना आसान होता है। यहां सौ-दो सौ साल पुराने भवन मिलना सामान्य बात है। तमाम मकान लाल ईंट व कवेलू के होते हैं और समूचे ब्रिटेन, यूरोप में मकान की छत ढलान वाली होती है, ताकि बर्फ व पानी बहकर नीचे गिर जाए। 

 

इनमें टैरेस या गच्ची नहीं होती, जहां खड़े होकर पतंग उड़ाई जा सके। न छत पर पानी की टंकी या अवैध पेंट हाउस होता है। वास्तु शिल्प बेजोड़ होता है। 400 से एक हजार साल पुराने विशालकाय भवन हैं, जो पत्थरों के बने हैं। ये प्रमुखत: चर्च हैं। स्कॉटलैंड का चर्च 900 साल पुराना और लंदन का सैंट पॉल कैथेड्रल 400 साल पुराना है। जबकि वेस्टमिंस्टर चर्च 1066 से अभी तक कायम है। इसमें ब्रिटिश राजाओं के राज्याभिषेक होते रहे हैं तथा शादियां भी होती हैं। यहां राजा, रानियों, आइजैक न्यूटन व स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिकों, कवियों को दफनाया गया है।

 

यहां आपको दो सौ, तीन सौ साल पुराने रेस्टारेंट भी मिल जाएंगे, जिनके संचालक तो काफी बदल गए, लेकिन रंगत वही बनी रही। ये रेस्टारेंट किसी प्रतीक से पहचाने जाते हैं। जैसे पैवैलियन, फोर सिस्टर्स, हेलमेट। तब इनसे रास्ता बताना आसान होता था। यहां की प्रसिद्ध नदी टेम्स का पानी साल भर मटमैला होता है, जबकि यूरोप में आम तौर पर नदियां साफ पानी वाली होती हैं। टेम्स की तलहटी मिट्‌टी वाली है, जो उसे साफ नहीं रहने देती।

 

यहां लंदन से अन्यत्र जाने वाली ट्रेन भी मेट्रो या वंदे भारत जैसी होती हैं, जिनमें हवाई जहाज जैसी सुविधाएं होती हैं। इनमें बैठने के लिए सीट होती हैं और भारत की तरह कुछ बोगियां और आरक्षित बोगी में भी कुछ सीट बिना आरक्षण के होती हैं। उन पर लिखा रहेगा- अवेलेबल। पूरे रास्ते उद्घोषणा होती रहती है। बस, मेट्रो, ट्रेन में दिव्यांग, बुजुर्ग के लिए सीट अलग होती हैं। उन पर आप बैठ सकते हैं, लेकिन किसी के आने पर उठना होता है।

 

बातें तो काफी हैं, लेकिन हर एक का उल्लेख जरूरी नहीं। मैंने अभी तक ब्रिटेन, यूरोप के सात देश, मॉरीशस, दुबई, थाईलैंड की यात्रा की है। अपने इस भ्रमण के मद्देनजर एक ही बात कह सकता हूं- सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा और हिंदोस्ता में सबसे अच्छा इंदौर हमारा। दुनिया घूमें, लेकिन इंदौर जैसा खान-पान, आत्मीयता, शांति-सद्भाव, उल्लास, उत्सवप्रियता, सुरक्षित वातावरण, दिलदार लोग, आसपड़ोस, पता पूछने पर गली या मकान तक छोड़ने आने का उत्साह जैसे अनेक कारण हैं, जिनकी वजह से इंदौर लाजवाब है। (समाप्त)