गरीबी चुराने कोई नहीं आता!

Sarvodaya Philosophy: सर्वोदय दर्शन को समग्रता से समझने एवं सहजता से समझाने वाले तथा स्वाधीनता आंदोलन के सैनिक दादा धर्माधिकारी अपने संस्मरणों को सहजता से अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं कि एक बार आदिवासियों के एक गांव में जाने का मौका हुआ। उनके पास कोई जगह नही थी। मकान में एक ही कमरा था। उसमें खिड़की नहीं थी। वहीं रोटी बनती थी। सारे मकान में धुआं था। कुछ मुर्गियां थी, बच्चे भी इधर- उधर खेलते थे। उन्होंने सोचा कि मुझे वहां सुलाना ठीक नहीं होगा।

बगल में एक झोपड़ी थी, वहां मेरी खाट बिछा दी। 'हमने पूछा यह जगह आपके पास कहां से आई?' वह हमारा अपमान या मज़ाक नहीं करना चाहता था, पर उसने वस्तुस्थिति बतलाई कि 'हम इसमें सूअर रखते हैं। हमारे पास और कोई जगह नहीं थी। हमने इसे आज साफ कर लिया।' मैंने कहा- 'खैर साफ कर लिया तो अच्छा ही किया।' थोड़ी देर में हमें लगा कि यह व्यक्ति यहां सूअर रखता था। रात को कोई घुस आए तो क्या होगा? हमने पूछा- 'इसमें किवाड़ नहीं है?' बोला- 'इसमें किवाड़ों की जरूरत नहीं है।' 'क्यों? आसपास कोई चोर नहीं है?'

 

'चोर तो बहुत हैं।' 'तो फिर तुम्हारे घर में किवाड़ क्यों नहीं?' बोला हम ऐसे भाग्यवान कहां कि हमारे घर में चोर आए?'

अब यह बिल्कुल अनपढ़ मनुष्य कह रहा है। वह कह रहा है कि हमारा ऐसा भाग्य नहीं है। क्यों? भाग्य किसलिए चाहिए? तो कहता है- 'हमारे पास एक ही चीज हैं ग़रीबी और उसे चुराने वाला कोई नहीं।' मैंने कहा- 'तब तो आपको पुलिस और फौज की जरूरत नहीं होती।'

 

'वह जवाब देता है कि पुलिस और फौज की हमें क्या ज़रूरत पड़ती होगी?'

'पुलिस वाला कभी नहीं आता तुम्हारे यहां?' कहता है 'आता है।' 'कब आता है?'

'आपकी घड़ी गुम हो जाए, तो खोजने के लिए हमारे मकानों में आता है।' 

'पुलिस और फौज किसलिए हैं?'

'बोला आपकी अमीरी को बचाने के लिए है और हमारी गरीबी को बचाने के लिए। वह दोनों की हिफाज़त करतीं हैं।'

 

आदिवासी मनुष्य की अपनी मौलिक दार्शनिक समझ होती है जिसे वे लोग ही समझ पाते हैं जो प्राकृतिक मानस के होते हैं, सदा जीवन्त और भय मुक्त। अपने मन और शरीर की ताकत से जीवन की हर चुनौती को हल करने की सहजता से ओतप्रोत। इसी तरह आदिवासी अंचलों में जो बसाहट होती है वह भी इसी दृष्टि का विस्तार करती हैं। आदिवासी अंचलों में घरों की बनावट और बसाहट की अपनी मौलिक लोकदृष्टि होती हैं।

आदिवासी अंचलों में मनुष्य केवल मनुष्य या परिवार या समाज के साथ ही नहीं रहता समूची प्रकृति की अंतहीन जीवन श्रृंखला के साथ सहजता से सहजीवन करता है। पर्वतीय इलाकों में हो या घने जंगल में आदिवासी अंचलों की जीवन शैली में समूचे जीवन या प्राकृतिक श्रृंखला का समावेश होता है। एक बात मैंने आदिवासी अंचलों में चार पांच दशकों के अपने लोक सम्पर्क और सहजीवन से समझी है कि प्रकृति और सहजीवन की सहज समझ आज के कालखंड में आदिवासी अंचलों के लोक जीवन में मौजूद होकर आज भी बनी हुई है।

 

एक बार मैंने अलिराजपुर के अंदरूनी हिस्से के सधन जंगलों में देखा कि अधिकांश घर मिट्टी और लकड़ी के सुन्दर, सुरुचिपूर्णऔर आकर्षक संरचना के साथ मौजूद हैं। निरक्षर लोगों ने  बिना कागज़ पर कोई प्रारूप या रेखाकंन बनाए और बिना बड़े भौतिक संसाधनों को इस्तेमाल किए ही अपनी लोक परम्परागत नजर और सहज समझ के समन्वय से स्थानीय संसाधनों से बनाए हैं, जिसमें हर किसी के लिए अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से घर को साझा इस्तेमाल करने का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है।

जब मैंने एक आदिवासी बुजुर्ग से उनकी बसाहट को लेकर यह जिज्ञासा प्रगट की कि आपके घरों में दरवाजे क्यों नहीं है? तो उन्होंने मुझे अपनी लोकदृष्टि से विनम्रतापूर्वक समझाते हुए कहा कि वकील साहब यह घर केवल हमारे परिवार के सदस्यों के लिए ही हम नहीं बनाते। हमारे साथ हमारी बकरी, मुर्गी और गाय-बैल भी हमारे जीवन एवं परिवार के सदस्य हैं। उन्हें जब हमारे घर में आवश्यकतानुसार अंदर बाहर आना जाना हो तो दरवाजा उनके स्वतंत्र अवागमन में बाधा खड़ी कर सकता है। हम उनकी जरूरत और सुविधा की दृष्टि से दरवाजा नहीं रखते हैं। ऐसी उदात्त लोकदृष्टि खुद ही आदिवासी समाज प्राकृतिक जीवन की निरन्तरता को अपने जीवन में आत्मसात कर, सब पर पूरा-पूरा विश्वास रखते हुए घर के सदस्य की तरह सहजता से करता है। तो मन खिल उठता है। खिला हुआ मन आदिवासी लोक जीवन की अनूठी धरोहर है जो सारी दुनिया के वनप्रान्तरों में रची-बसी आदिवासी लोक परम्परा का सार या निचोड़ हैं।

 

अभी भी सदूर आदिवासी अंचलों में पीने का पानी घर के बाहर एक छोटे मिट्टी और लकड़ी से बने एक मचान में मिट्टी के मटके को चारों और से मिट्टी से ही ढंककर उसमें पीने का पानी सबके लिए रखने की लोक परम्परा कहीं कहीं देखने को मिलती हैं। इसी तरह अनाज को भी घर के बाहर बांस एवं गोबर मिट्टी से निर्मित बड़ी बड़ी कोठियों में रखने की लोक परम्परा आज भी आदिवासी अंचलों में देखने को मिलती हैं। सब पर भरोसा और आत्मविश्वास, आदिवासी लोक परम्परा का मूल है। आज भी अधिकांश आदिवासी अंचलों में स्वावलंबन और सहजीवन की अनोखी जुगलबंदी की मजबूती से खड़ी होकर मौजूद दिखाई देती हैं।

 

आधुनिक जीवन शैली के आदी होते जा रहे विकसित शहरी सभ्यता के लोग, आदिवासी अंचलों की जीवन शैली के प्राकृतिक रूप स्वरूप और दर्शन को आत्मसात करने का आत्मविश्वास और उदात्त मानवीय मूल्यों को समझने के बजाय जाने अंजाने अपने आप ही प्रकृति से दूर जाते जा रहे हैं। इससे ऐसा आभास होता है कि विकसित मानव सभ्यता की दिशा सरलता से जटिलता की दिशा में निरंतर बढ़ती ही जा रही है। जिसे आज की विकास यात्रा में हम शहरी या विकसित बसाहट में सब कुछ यंत्राधारित करने की अंधी दौड़ में निरंतर ले जाने में प्राणप्रण से जुट गए हैं, उससे हम सब की प्राकृतिक सोच समझ और जीवन का आनंद हमारे पास से निरन्तर दूर जाने की दिशा में बढ़ता जा रहा है।

भौतिक समृद्धि और प्राकृतिक सम्पदा के सह सम्बन्ध को भूलकर आगे बढ़ने की दौड़ में हम सब हांफ रहे हैं। इसी से कभी कभी ऐसा लगता है कि हम विकसित सभ्यता के आदी मनुष्य अपने प्राकृतिक जीवन  क्रम को खुद होकर लुप्त करने में लगे हुए हैं।

नई स्टडी: एंथोसायनिन से घट सकता है हृदय रोग और डायबिटीज का खतरा, जानिए कैसे

Health American blueberries

नई दिल्ली, भारत| 07 अगस्त 2026: 'द अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन' में प्रकाशित एक नए अध्ययन और मेटा-एनालिसिस के अनुसार, लाल, नीले और बैंगनी रंग के खाद्य पदार्थों में पाए जाने वाले प्राकृतिक बायोएक्टिव तत्व 'एंथोसायनिन' का अधिक सेवन स्वस्थ व्यक्तियों में हृदय और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकता है।

 

एंथोसायनिन पौधों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ऐसे यौगिक हैं, जो कई फलों और सब्जियों को लाल, बैंगनी और नीला रंग प्रदान करते हैं। बेरीज़ (Berries) को इसका सबसे समृद्ध स्रोत माना जाता है। विशेष रूप से अमेरिका में उगाई जाने वाली ब्लूबेरी एंथोसायनिन का बेहतरीन स्रोत है, जो हृदय स्वास्थ्य को मजबूत करने में सहायक होती है।

 

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

शोधकर्ताओं ने 27 वैज्ञानिक प्रकाशनों से जुड़े 18 प्रोस्पेक्टिव कोहोर्ट अध्ययनों (Prospective Cohort Studies) और स्वस्थ लोगों पर किए गए 65 क्लिनिकल ट्रायल्स का व्यापक विश्लेषण किया। अध्ययन के अनुसार, नियमित रूप से पर्याप्त मात्रा में एंथोसायनिन का सेवन करने वाले लोगों में यह परिणाम देखे गए:-

 

  • हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम: 26% तक कम
  • हार्ट अटैक (हृदयघात) का खतरा: 18% तक कम
  • टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम: 11% तक कम
  • हृदय संबंधी कारणों से मृत्यु का खतरा: 9% तक कम
  • हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) का जोखिम: 8% तक कम

 

क्लिनिकल ट्रायल्स में यह भी पाया गया कि प्रतिदिन 50 मिलीग्राम या उससे अधिक एंथोसायनिन का सेवन करने से रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) की कार्यक्षमता और इंसुलिन स्तर में सुधार होता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि एंथोसायनिन युक्त खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करके यह मात्रा आसानी से प्राप्त की जा सकती है।

 

भारत के लिए इस अध्ययन का महत्व

भारत में हृदय संबंधी बीमारियों, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसे जीवनशैली से जुड़े रोगों के लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए इस अध्ययन के निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण हैं।

 

दैनिक आहार में प्राकृतिक रूप से लाल, नीले और बैंगनी रंग के फलों व सब्जियों को शामिल करने से भोजन की गुणवत्ता में सुधार होता है। अमेरिकी ब्लूबेरी का सेवन ताज़ा, फ्रोजन या सूखे (ड्राई) रूप में किया जा सकता है। इसे दही, ओट्स, स्मूदी, नाश्ते के व्यंजनों, सलाद, डेजर्ट और भारतीय व्यंजनों में आसानी से शामिल किया जा सकता है।

 

विशेषज्ञों की राय

“यह शोध हमारे रोजमर्रा के आहार में विविधता लाने और प्राकृतिक रूप से रंगीन खाद्य पदार्थों को शामिल करने के महत्व को रेखांकित करता है। अमेरिका में उगाई जाने वाली ब्लूबेरी एंथोसायनिन का बेहतरीन स्रोत है, जिसे भारतीय खानपान का हिस्सा बनाना बेहद आसान है।”

— राज कपूर, भारत प्रतिनिधि, यूएस हाईबश ब्लूबेरी काउंसिल (USHBC)

 

“अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि खानपान में किए गए छोटे और व्यावहारिक बदलाव लंबे समय में हृदय रोगों, उच्च रक्तचाप और टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को कम करने में बड़ा योगदान दे सकते हैं।”

— प्रोफेसर एडीन कैसिडी, मुख्य शोधकर्ता

 

संतुलित जीवनशैली ही कुंजी है

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि कोई भी एक खाद्य पदार्थ अकेले किसी बीमारी को पूरी तरह रोक या ठीक नहीं कर सकता। इसके बजाय, संतुलित आहार के रूप में एंथोसायनिन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और डॉक्टरी सलाह मिलकर ही बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित कर सकते हैं।

मानसून में बालों का झड़ना और चेहरे की चिपचिपाहट होगी गायब, बस डेली रूटीन में शामिल करें ये 5 लाइफस्टाइल टिप्स

image shows a girl getting drenched in the rain, and the caption reads:

Health Tips: देशभर में 6 अगस्त को झमाझम बारिश के साथ मौसम का मिजाज बदल चुका है। लेकिन इस सुहावने मौसम के साथ उमस, स्किन इंफेक्शन, हेयर फॉल और प्लेटलेट्स गिरने का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। यदि आप इन समस्याओं से बचना चाहते हैं तो अपनाएं ये 5 आसान और असरदार टिप्स।

 

  • बारिश के मौसम में नमी की वजह से स्किन और बालों का नेचुरल ऑयल बैलेंस बिगड़ जाता है।
  • इम्यून सिस्टम मजबूत रखने के लिए रोजाना डाइट में एंटी-ऑक्सीडेंट्स और ताजे फलों को शामिल करें।
  • डेंगू और मानसून इंफेक्शन से बचने के लिए शरीर को ढंककर रखें और बासी खाने से परहेज करें।

1. मानसून का बदलता ट्रेंड और सेहत की चुनौतियां:

  • 6 अगस्त को आईएमडी (IMD) ने देश के कई राज्यों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। बारिश गर्मी से राहत जरूर दिलाती है, लेकिन इसके साथ ही हवा में नमी (Humidity) का स्तर 90% तक पहुंच जाता है।
  • इस मौसम में फंगल इंफेक्शन, चेहरे पर मुंहासे (Acne), तेजी से बाल झड़ना और डेंगू जैसे मच्छरों के काटने का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। अगर आप इस मौसम में अपने डेली केयर रूटीन पर ध्यान नहीं देंगे, तो इंफेक्शन आपको आसानी से अपना शिकार बना सकता है।

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2. मानसून में स्किन और सेहत को फिट रखने के 5 आसान टिप्स:

सेलिसिलिक एसिड बेस्ड फेसवॉश का इस्तेमाल करें: हफ्ते में 3 से 4 बार यह वॉश चेहरे के एक्स्ट्रा ऑयल (Sebum) को हटाता है और पसीने से होने वाले मुंहासों को रोकता है।

एंटी-फंगल पाउडर का इस्तेमाल: बारिश में भीगे कपड़ों या जूतों की वजह से फंगल इंफेक्शन का खतरा रहता है। नहाने के बाद टॉवल से शरीर पूरी तरह सुखाकर पाउडर लगाएं।

हल्का और गर्म खाना खाएं: बारिश के दिनों में पाचन क्रिया धीमी हो जाती है। स्ट्रीट फूड और बासी खाने से बचें; सूप, हर्बल टी और घर का ताजा खाना ही लें।

बालों को गीला न छोड़ें: बारिश के पानी में एसिडिक तत्व होते हैं। अगर बाल भीग जाएं तो तुरंत माइल्ड शैम्पू से धोकर ड्राई कर लें।

हाइड्रेशन का रखें ध्यान: ठंडक महसूस होने पर भी दिन में कम से कम 2.5 से 3 लीटर पानी जरूर पीएं ताकि बॉडी डिटॉक्स होती रहे।

एक्सपर्ट की राय:-

“मानसून के दिनों में हवा में नमी की वजह से बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपते हैं। अपने स्कैल्प को सूखा रखना, गीले कपड़े न पहनना और प्लेटलेट्स का ध्यान रखने के लिए विटामिन-C रिच डाइट लेना इस मौसम में सबसे जरूरी है।”- डॉक्टर राजेंद्र बिस्वारी (स्किन केयर विशेषज्ञ)

 

3. मानसून में भूलकर भी न करें ये 4 गलतियां:

गीले बाल बांधना: गीले बालों को बांधने से स्कैल्प में फंगस और डैंड्रफ की समस्या दोगुनी तेजी से फैलती है।

भारी मॉइस्चराइजर लगाना: मानसून में जेल-बेस्ड (Gel-based) या ऑयल-फ्री मॉइस्चराइजर का ही इस्तेमाल करें; हैवी क्रीम्स पोर्स को ब्लॉक कर देती हैं।

ठहरा हुआ पानी नजरअंदाज करना: घर के आसपास 24 घंटे से ज्यादा पानी जमा न होने दें, यह डेंगू के मच्छरों का मुख्य ब्रीडिंग ग्राउंड बनता है।

सनस्क्रीन स्किप करना: बादलों के पीछे भी यूवी (UV) किरणें मौजूद रहती हैं, इसलिए बिना सनस्क्रीन लगाए बाहर न निकलें।

 

बारिश का मौसम का आनंद लेने के साथ-साथ अपनी सेहत और स्किन की सही देखभाल करना बेहद आसान है। बस अपने डेली रूटीन में ये छोटे-छोटे बदलाव करें और इस मानसून को पूरी तरह सुरक्षित और झंझट-फ्री बनाएं!क्या आपने इस मानसून में अपना नया स्किनकेयर या फिटनेस रूटीन शुरू किया है? हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं!

सावधान! थाली में रखा पनीर असली है या वेजिटेबल ऑयल से बना नकली? 2 मिनट के इस टेस्ट से जानें सच्चाई

Paneer, a bottle of iodine, and a glass bowl in the picture.

क्या आप भी खा रहे हैं 'एनालॉग पनीर'? सेहत के लिए खतरनाक मिलावटी पनीर को घर पर ऐसे पहचानें। अगर आप भी बाजार से लाकर बड़े चाव से पनीर खा रहे हैं, तो रुकिए! हाल ही में खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई में वनस्पति तेल और स्टार्च से बना नकली यानी 'एनालॉग पनीर' भारी मात्रा में पकड़ा गया है।

 

  • बाजार में दूध की जगह पाम ऑयल और स्टार्च से तैयार एनालॉग पनीर धड़ल्ले से बिक रहा है।
  • आयोडीन टेस्ट, गर्म पानी और मसलकर देखने से असली और नकली पनीर का फर्क तुरंत पता चल जाता है।
  • मिलावटी पनीर खाने से डाइजेशन खराब होने के साथ कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ सकता है।

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क्यों ट्रेंड में है 'एनालॉग पनीर' और क्या है यह?

गुजरात और देश के कई राज्यों में Food & Drug Control Administration (FDCA) ने नकली मिल्क प्रोडक्ट्स और एनालॉग पनीर पर कड़े कदम उठाए हैं। दरअसल, असली पनीर शुद्ध दूध से बनता है, जबकि 'एनालॉग पनीर' बनाने के लिए दूध का फैट निकालकर उसमें सस्ता पाम ऑयल, स्टार्च, डिटर्जेंट या यूरिया मिलाया जाता है। यह दिखने में बिल्कुल असली पनीर जैसा लगता है, लेकिन सेहत के लिए बेहद हानिकारक है।

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असली vs नकली पनीर: घर पर पहचान करने के 5 आसान टिप्स

अगर आपको शक है कि आपका लाया हुआ पनीर नकली है, तो इन 5 आसान घरेलू तरीकों से तुरंत टेस्ट करें:

1. आयोडीन ड्रॉप टेस्ट (Iodine Test): पनीर के टुकड़े को पानी में उबालें और ठंडा होने पर उस पर 2-3 बूंदें आयोडीन सॉल्यूशन की डालें। अगर पनीर का रंग नीला (Blue) हो जाए, तो समझ जाएं कि इसमें स्टार्च या मैदा मिलाया गया है।

 

2. हाथ से मसलकर देखें: असली पनीर को हाथ से मसलने पर वह टूटकर बिखर जाएगा लेकिन ज्यादा रबड़ी जैसा नहीं चिपकेगा। नकली पनीर में रबड़ जैसी इलास्टिसिटी होती है और वह हाथ में चिपकता है।

 

3. उबालकर देखें (Boiling Test): पनीर के छोटे टुकड़े को पानी में उबालें। अगर पानी झागदार हो जाए या पनीर गलकर फैल जाए, तो इसमें डिटर्जेंट या केमिकल की मिलावट हो सकती है।

 

4. अरहर दाल टेस्ट: पनीर को पानी में उबालकर उसमें थोड़ा सा अरहर दाल पाउडर डालें। 10 मिनट बाद अगर रंग हल्का लाल या गुलाबी होने लगे, तो इसमें यूरिया या डिटर्जेंट हो सकता है।

 

5. गंध और स्वाद (Smell & Taste): असली पनीर में दूध की सौंधी महक होती है, जबकि एनालॉग पनीर में कोई महक नहीं होती या फिर कच्चा तेल/केमिकल की गंध आती है।

 

एक्सपर्ट की राय:

“एनालॉग या मिलावटी पनीर में ट्रांस-फैट्स और सिंथेटिक केमिकल्स होते हैं। इसके लगातार सेवन से पेट में इन्फेक्शन, एसिडिटी, लिवर पर असर और बैड कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ सकता है। हमेशा सर्टिफाइड डेयरी या विश्वसनीय ब्रांड्स से ही डेयरी प्रोडक्ट्स खरीदें।”- डॉ. अनामिका शर्मा (सीनियर न्यूट्रिशनिस्ट)

 

पनीर खरीदते समय ये 3 गलतियां भूलकर भी न करें

  • बहुत सस्ता पनीर खरीदना: अगर बाजार भाव से आधा रेट पर खुला पनीर मिल रहा है, तो 90% आशंका है कि वह एनालॉग पनीर ही है।
  • सख्त और चमकीले पनीर के चक्कर में पड़ना: बहुत ज्यादा सफेद और रबड़ जैसा खींचने वाला पनीर स्वाद में भले ठीक लगे, लेकिन वह सेहत बिगाड़ सकता है।
  • बिना पैकेजिंग/FSSAI मार्क का पनीर लेना: बिना एफएसएसएआई (FSSAI) रजिस्ट्रेशन वाली दुकानों से खुला पनीर खरीदने से बचें।

 

सेहतमंद रहने के लिए स्वाद के साथ-साथ शुद्धता का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है। अगली बार जब भी आप बाजार से पनीर लाएं, तो ऊपर बताए गए आयोडीन या बॉइलिंग टेस्ट से उसकी गुणवत्ता जरूर जांचें। क्या आपके शहर में भी मिलावटी या नकली पनीर बिकने की शिकायतें आई हैं? हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं और इस जानकारी को अपने परिजनों के साथ शेयर करें!

कांवड़ यात्रा : ‘बोल बम’ का सनातन संदेश

-हरिशंकर मिश्र

Kanwar Yatra social harmony: किसी भी समाज में प्रेम, सहयोग और समरसता का वातावरण तब स्वतः निर्मित होता है, जब व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग कर भक्ति का पथ अपनाता है। कांवड़ यात्रा इसी सत्य का सजीव प्रतीक है। मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली सांस्कृतिक चेतना की यह एक विराट यात्रा है जिसमें जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति और सामाजिक भेदभाव गौण हो जाते हैं। कांवड़ यात्रा हमारे लिए यह बड़ी सीख भी है कि सामाजिक समरसता किसी उपदेश से नहीं, बल्कि साझा आस्था, सहभागिता और परस्पर सम्मान से विकसित होती है और इसे वर्तमान में प्रत्यक्ष रूप में देखा भी जा सकता है जबकि एक साथ हजारों लोग कंधे पर गंगाजल लिए शिवालयों की ओर बढ़ रहे हैं।

 

विविधताओं के बीच एकात्मता का यह दृश्य इस सावन में जीवंत हो उठा है। प्रेम, सेवा, सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता पर टिकी हुई यह श्रद्धा यात्रा वह आध्यात्मिक शक्ति है जो लोगों को समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से जोड़ती है। इस सामूहिक अनुशासन के पीछे एक साक्षा पहचान है-भोला। यानि वह संज्ञा जो मनुष्य को शिव से एकाकार करती है।

 

‘भोला’ कोई साधारण संबोधन नहीं है। यह बराबरी का संवाद है। कांवड़ उठाते ही श्रद्धालु का नाम, उसका कुल, उसकी आर्थिक हैसियत गौण हो जाती है। सड़क किनारे सेवा शिविर में एक करोड़पति व्यापारी का बेटा और एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा एक ही पंगत में बैठकर बराबरी से भोजन करते हैं। यह सिर्फ भूख मिटाना भर नहीं हैं। यह सदियों पुरानी सामाजिक दूरियों को पाटने का एक मौन प्रयास है और आस्था की स्वाभाविक शक्ति से यह भाव जन्म लेता है।

 

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस सामाजिक आयाम को गहराई से समझा है और यही कारण है कि कांवड़ यात्रा को व्यवस्थागत समर्थन लगातार दिया जा रहा है। योगी सरकार की दृष्टि में यह यात्रा ऐसा सामाजिक अवसर है जहां समाज अपने भीतर की खाइयों को स्वयं पाटने का काम करता है। सड़कों की मरम्मत, सुरक्षा व्यवस्था, चिकित्सा शिविर, पेयजल और विश्राम स्थलों की व्यवस्था, यह सब एक तरह से सामाजिक समरसता के ढांचे को मजबूती देने का प्रयास है।

 

इस समरसता का एक और भावनात्मक पक्ष हिंदू-मुस्लिम सहभागिता के रूप में दिखाई देता है। बरेली, मेरठ, मुजफ्फरनगर और दिल्ली के कई कस्बों में कांवड़ बनाने का काम पीढ़ियों से मुस्लिम कारीगरों के हाथों में रहा है। बांस को मोड़ना, रंगीन कागज और कपड़े से सजावट करना, घंटियां टांकना, यह हुनर उन परिवारों की जीविका का हिस्सा है, जो साल भर सावन का इंतजार करते हैं। उम्मीद के इस भाव के साथ कि सावन आए और उनकी कारीगरी किसी शिवभक्त के कंधे की शोभा बने। यह भारतीय समाज की उस गहरी बुनावट का प्रमाण है, जहां श्रद्धा और आजीविका एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

Kanwar Yatra UP 2026

यात्रा के दौरान सामाजिक समरसता के अन्य बिंदु भी देखने को मिलते हैं। कई कस्बों में मुस्लिम परिवार अपने घरों के बाहर कांवड़ियों के लिए पानी और शरबत की व्यवस्था करते हैं। कुछ जगहों पर मस्जिद परिसर में थके यात्रियों को विश्राम की अनुमति दी जाती है। यात्रा के दौरान उभरने वाली यह सहजता दिखाती है कि आस्था और मानवता, राजनीतिक विमर्श से कहीं गहरे स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। फिर भी कुछ लोग प्रश्न उठाते हैं कि क्या यह समरसता समाज में स्थायी छाप भी छोड़ जाती है? इसका उत्तर है कि मानव मन स्मृतियों से बनता है और हम अपनी यात्रा के अनुभव कभी नहीं भूलते। यात्रा के अनुभव समाज की सामूहिक चेतना में धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं। सामाजिक बदलाव ऐसे ही संचित अनुभवों से आता है, थोड़ा धीमे-धीमे, लेकिन निश्चित रूप से।

 

आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो भी कांवड़ यात्रा हमें समरसता से ओतप्रोत करती है। शिव स्वयं समरसता के प्रतीक हैं। वह श्मशान में विराजते हैं और कैलाश पर भी, वह भस्म रमाते हैं और चंद्रमा भी धारण करते हैं, उनके गले में सर्प है और जटाओं से गंगा प्रवाहित होती है। शिव को विरोधाभासों का देवता कहा जाता है। वह कल्याण भी करते हैं और विध्वंस भी। कांवड़िया जब अपने कलश में गंगाजल भरता है, तब उसे अहसास होता है कि उसके भीतर की सारी भिन्नताएं उस जल में समाहित हो रही हैं। इसके बाद उसके शरीर के साथ ही उसकी आत्मा भी यात्रा करती है। वह आत्मा जो किसी जाति, किसी वर्ग, किसी संप्रदाय को नहीं जानती।

 

इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा, आर्थिक अवसर, न्यायसंगत नीतियां और निरंतर सामाजिक संवाद, यह सब मिलकर परिवर्तन लाते हैं, लेकिन कांवड़ यात्रा जैसे आयोजन वह भूमि तैयार करते हैं, जिस पर बड़े सामाजिक परिवर्तन के बीज बोए जा सकते हैं। योगी सरकार में इस यात्रा के लिए जो प्रतिबद्धता दिखाई देती है, उसके मूल में यही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके लिए सारी व्यवस्थाएं पूरी कर एक तरह से गहरा सामाजिक निवेश करते हैं, जो भविष्य की पीढ़ी के लिए आधार के रूप में कार्य करेगा। 

 

वस्तुतः समरसता एक ऐसा अनुभव है, जिसे जीना पड़ता है, बांटना पड़ता है, कंधे पर उठाना पड़ता है। यह यात्रा हर वर्ष याद दिलाती है कि विभाजन की रेखाएं मनुष्य की बनाई हुई हैं, जबकि साझी श्रद्धा, साझी प्यास, साझी थकान और साझा विश्राम, यह सब हमारी सामाजिक एकता के प्रमाण हैं। ‘बोल बम’ की गूंज केवल शिव का आह्वान नहीं, बल्कि उस समाज का आह्वान भी है जो अपने भीतर एकत्व, समरसता और आत्मबोध की चाह रखता है।

 

यह उद्घोष हमें स्मरण कराता है कि शिव अंतर्मन में विद्यमान उस चेतना के प्रतीक हैं जो भेदभाव से ऊपर उठकर समता, करुणा और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करती है। अहंकार, स्वार्थ और विकारों का परित्याग करने को प्रेरित करती है। जब मन निर्मल हो, व्यवहार करुणामय हो और जीवन लोककल्याण के संकल्प से जुड़ जाए, तभी शिव की उपासना पूर्ण होती है। यही ‘बोल बम’ का सनातन संदेश है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं) 

 

भारत की विभिन्नताओं में समाहित है अटूट अभिन्नता!

unity in diversity

Indian culture: भारत विविधताओं का लोकसागर है। भारतीय लोक समाज, सागर जैसी विशालता के साथ ही साथ लोकजीवन में समायी अंतहीन विविधताओं का जीता-जागता संग्रहालय हैं। हमारा देश भारत, लोकजीवन की अंतहीन विविधताओं का गहरा जमावड़ा है। यहां खानपान, सोच विचार,रहन सहन, वेशभूषा, भाषा बोली -लिपियों, चिन्तन परम्परा से लेकर स्थापत्य, विचारधारा,दर्शन, धर्म संस्कृति और समाज में अनेक मत मतान्तरों, लड़ाई-झगड़ों सहित विविध साकार निराकार विचारों का अंतहीन सिलसिला सनातन समय से है। आधुनिक काल में कई एकांगी समूह, संगठन और विचारधाराएं भारत की विविधताओं से अपने अन्तर्मन में विचलित होकर भारत की विविधताओं को बिखराव की संज्ञा देती हुए दिखाई देती हैं। भारत की वैचारिक विविधताओं को भी इस विविधता विरोधी एकांगी विचार प्रक्रिया पर भी कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि सारी विविधताएं एक तरह से विचारों का विस्तार ही तो है! विविधताओं से असहमति भी विविधता मय जीवन का एक वैचारिक आयाम ही समझा जाना चाहिए। ALSO READ: आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया!

 

एक विचार यह भी उभारने की पहल हो रही है कि विविधताओं से एकता कमजोर होती है। सब कुछ एक जैसा होना चाहिए। भाषा भूषा, खान पान,सोच विचार, दर्शन धर्म, बोल चाल, हाव भाव सब कुछ एक जैसा होना चाहिए। यदि इस भारत देश और दुनिया में सब कुछ एक जैसा हो जाय तो अंतहीन नए विविधतापूर्ण सोच-विचार और सृजनात्मक गतिविधियों को तो एक तरह से यांत्रिक एकरस जड़ता में ढलना ही होगा। जीवन कभी भी एक रस नहीं हो सकता, साथ ही एक मार्गी और एकांगी भी नहीं हो सकता है। जीवन की चेतना, सहज विस्तार और प्राकृतिक समृद्धि का पर्याय है उसकी अंतहीन विविधता। विविधता पूर्ण जीवन की चेतना से ही लोक जीवन और जगत हर क्षण नवीनता और विविधता से भरपूर बना रहता है। यही प्राकृतिक जीवन का आनंद हैं। ALSO READ: राजनीति और धर्म का मूल जीवन का अध्यात्म हैं!

 

प्रकृति में कुछ भी एक जैसा नहीं है।साथ ही कुछ भी प्रवाहहीन या गतिहीन भी नहीं है, सबकुछ एक दूसरे से भिन्न भी है फिर भी सब कुछ अभिन्न भी हैं। विभिन्नता बाह्य स्वरूप है, अभिन्नता आत्म स्वरूप है, साथ ही साथ निरंतर गतिशील भी। एक ही पेड़ की दो पत्तियां एक जैसी नहीं होती एक जैसे दो जीव नहीं होते। जीव भिन्न है जीवन अभिन्न हैं। विविध विचारों विषयों और विधाओं से ही मानवीय सभ्यता का विस्तार होकर वैचारिक समृद्धि और समझ का दायरा निरन्तर प्रवाहित होता है। यदि सारी दुनिया एक तरह के या एक जैसे यांत्रिक सांचे में ढली होती तो दुनिया नीरस और उदासी भरी एकरसता का यंत्रवत विस्तार मात्र ही बनी रहती। आज समूची दुनिया में जो विभिन्नता का अनन्त विस्तार है इसी से समूची दुनिया एक तरह से विविध रूप स्वरूप के अनन्त महासागर जैसी दिखाई देती हैं। ALSO READ: सृष्टि का आनंद बनाम आनंद की सृष्टि!

 

हमारी इस धरती पर जो भूमि या भूभाग हैं उसकी विविधताओं का कोई अंत नही है। कहीं विशाल पर्वत श्रृंखला है तो कहीं विशाल वीराने या सन्नाटे समेटे जन एवं वनस्पति रहित रेतीले रेगिस्तान, तो कहीं धनधोर वन प्रान्तर का विशाल साम्राज्य। इसके अलावा हमारी धरती में महासागरों के रूप में जो विशाल जलराशि का विस्तार है, उसमें जिस जीव और वनस्पति जगत का अंतहीन विस्तार है वह या उसकी विविधता हमारी कल्पना से परे है। महासागर की जलराशि में मौजूद जीवन के विस्तार को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारी धरती में हूबहू एक जैसा दूसरा कोई जीव या वनस्पति मौजूद ही नहीं है।

 

सब कुछ अपने आप में अनोखा और अंतहीन जीवन श्रृंखला का साकार स्वरूप जैसा ही है। यानी धरती पर जीवन का स्पष्ट संकेत या संदेश विविधतापूर्ण जीवन चिंतन और मनन के लिए है। तभी तो समूचा जगत और जीवन अंतहीन विविधताओं के जीते-जागते संग्रहालय जैसा लगता है जिसे कोई भी जीव अपने जीवन काल में समग्र रूप से देख,समझ और अनुभव भी नहीं कर पाता है। भारत में मौजूद विविधताओं के अंतहीन विस्तार की समूची कल्पना भी मनुष्य के मन में  अपने समूचे जीवन काल में नहीं आ पाती है। हमारी धरती और मनुष्य के मन में विविधताओं का कोई ओर-छोर नहीं है कोई थाह ही नहीं है। हमारी गणना समाप्त हो सकती है पर धरती के जल,थल और जीवन में मौजूद विविधताओं का अंत और अस्तित्व समाप्त नहीं हो सकता है।

 

हमारी इस धरती पर वनस्पति जगत की उत्पत्ति अपने आप प्राकृतिक रूप से एक निश्चित समय चक्र में अपने आप होती रहती है। इस तरह अपने आप अंकुरित होने वाली वनस्पति में अंतहीन विविधताओं के दर्शन होते हैं। पर मनुष्य द्वारा तयशुदा फ़सल चक्र में जो बीज बोया जाता है वहीं फ़सल के रूप में अंकुरित हो अनाज के रूप में हमें मिलता है। मनुष्य के द्वारा फसल या अनाज के रूप में बोया गया बीज तो उस रूप में उगता ही है पर उसके साथ साथ असंख्य वनस्पतियों की अन्य प्रजातियां भी प्राकृतिक रूप से अंकुरित हो कर कई तरह की वनस्पतियों को जन्म देती है।

 

हम अपनी उपयोगिता या लाभ हानि के लिए एकांगी स्वरूप का मनचाहा बीज बोते हैं। पर प्रकृति जीवन के हर आयाम में ऐसी-ऐसी विविधताओं को निरंतर अभिव्यक्त करती है जिसका कोई अंत ही हमें हमारे जीवन काल में कभी भी दिखाई ही नहीं पड़ता। विविधता में अंतर्निहित अभिन्नता के मूल को समझने पर हम दोनों ही स्थितियों को भले ही भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से देखें पर फिर भी दोनों ही भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी आपस में अभिन्न स्वरूप में ही बनी रहती है।

 

दादाजी की याद में पोती की पाती, पढ़कर आंखें भी नम होगी, उर्जा भी मिलेगी

Abhay Chhajlani

  • श्रद्धा बच्छावत

दिन बदल जाते हैं— मौसम बदल जाते हैं और साल बदल जाते हैं। लेकिन कुछ स्‍मृतियां, कुछ सीख और कुछ रिश्‍तों के अर्थ और उनकी अहमियत कभी नहीं बदलती। ऐसे रिश्‍ते जो अपनी अगली पीढ़ी को तब भी सींचते रहते हैं, जब वे दुनिया में सशरीर नहीं होते हैं। तब भी अपनी उर्जा और अपना आशीर्वाद अपने बच्‍चों पर बनाए रखते हैं जब वे चले जाते हैं।

सुखद बात यह है कि उनकी पीढ़ी भी अपने उन पुरखों को कभी भुलाती नहीं, उन्‍हें शिद्दत से याद करती है, उनके प्रति अपना स्‍नेह लुटाती हैं और उन्‍हें समय-समय पर अपने लिए किसी रूहानी नैमत के तौर पर याद करती रहती है। ऐसा ही एक रिश्‍ता है दादा और पोती के बीच।

आज 4 अगस्‍त को नईदुनिया के शिखर पुरुष अभय छजलानी का जन्‍मदिवस है। इस मौके पर उनकी पौत्री श्रद्धा ने कुछ इसी स्‍नेह और अपनेपन से याद किया है। उन्‍होंने अपने दादा अभय जी की स्‍मृति में एक सुंदर कविता लिखी है। इस मौके पर पढ़िए ये कविता।

(श्रद्धा बच्छावत की कविता) 

कुछ लोग केवल जीवन जीते हैं
कुछ जीवन का अर्थ सिखा जाते हैं
कुछ नाम समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं
और कुछ पीढ़ियों की पहचान बन जाते हैं

आप उन्हीं में से एक थे, दादाजी
 
शब्द आपके हथियार नहीं
आपका चरित्र थे
स्याही से केवल समाचार नहीं लिखे
विश्वास की कहानी लिखी थी आपने
 
एक अख़बार का संपादन किया
पर सच तो यह है कि
पत्रकारिता की एक पूरी पीढ़ी गढ़ दी
आपका कार्यालय केवल दफ़्तर नहीं था
वह पत्रकारिता की पाठशाला था
 
पद से नहीं
अपने व्यवहार से बड़े बने
हर व्यक्ति को एक-सा सम्मान दिया
चाहे वह किसी भी पहचान का हो
यही आपका सबसे बड़ा परिचय था
 
आपकी वाणी में ऐसा ओज था
कि लोग सुनते भी थे और सीखते भी
आपके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था
कि मिलने वाला हर व्यक्ति
अपने साथ कुछ अच्छा लेकर लौटता था
 
आज लोग हमारे परिवार का नाम लेते हैं
तो उसमें आपकी कमाई हुई प्रतिष्ठा की गूँज सुनाई देती है
यह विरासत धन से नहीं
सादगी और सद्भाव से बनी है
 
समय आपको हमसे दूर ले गया
पर आपके विचार आज भी
हमारे निर्णयों में जीवित हैं
आपकी सीख हमारी राह है
आपका आशीर्वाद हमारी शक्ति
 
कुछ दीपक बुझकर भी
अपनी रोशनी छोड़ जाते हैं
 
आप भी वैसे ही एक दीप थे, दादाजी—
जो आज भी हमारे जीवन को
प्रकाशित कर रहे हैं

क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस? जानिए इतिहास और इसका महत्व

Why is World Tribal Day celebrated

World Indigenous Day 2026 : जल, जंगल और जमीन के सच्चे संरक्षक और प्रकृति के सबसे करीबी आदिवासी समाज की संस्कृति, उनके अधिकारों और योगदान को सम्मानित करने के लिए हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस (World Indigenous Day) मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में इसे मनाने की घोषणा की थी। साल 1982 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की आदिवासी आबादी पर कार्य समूह की पहली बैठक हुई थी, जिसकी याद में यह दिन तय किया गया।

 

इस दिवस को मनाने का उद्देश्य और महत्व

इस दिवस को मनाने का उद्देश्य आदिवासी लोगों के मानवाधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन की रक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना और आदिवासी समाजों की अनूठी भाषा, परंपराओं और कला को बचाए रखना है। यह दिन न केवल उनकी समृद्ध परंपराओं को याद करने का अवसर है। 

 

यह दिवस समाज की मुख्यधारा से दूर रह रहे इन समुदायों की चुनौतियों पर विचार करने का भी एक माध्यम है। आदिवासी समाज दुनिया की कुल आबादी का एक छोटा हिस्सा होने के बावजूद जैव विविधता (Biodiversity) को बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।

 

विश्व आदिवासी दिवस का इतिहास

आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनकी समस्याओं की ओर दुनिया का ध्यान खींचने की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के मंच से हुई। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार आयोग ने 'आदिवासी आबादी पर कार्य समूह' (Working Group on Indigenous Populations) की पहली बैठक आयोजित की।

 

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में इसे मनाने की घोषणा की थी। संयुक्त राष्ट्र ने 'इंडिजिनस पीपुल्स के अधिकारों पर घोषणा पत्र' (UNDRIP) अपनाया, जो उनके आत्मनिर्णय, भूमि और सांस्कृतिक अधिकारों का आधार बना। 1857 की क्रांति से ठीक एक साल पहले बिहार और झारखंड के 'दामिन-इ-कोह' क्षेत्र में संथाल आदिवासियों ने ब्रिटिश हुकूमत और महाजनों के अत्याचारों के खिलाफ बिगुल फूंका था।

 

संथाल परगना के महान क्रांतिकारी तिलका मांझी (जबा पहाड़िया) को देश के पहले आदिवासी स्वाधीनता सेनानियों में गिना जाता है। विश्व आदिवासी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि जब तक हम अपने मूल संरक्षकों के अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा नहीं करेंगे, तब तक प्रकृति का संतुलन बनाए रखना असंभव है।

अभय छजलानी, पत्रकारिता के तपस्वी साधक

Abhay Chhajlani

Abhay Chhajlani Naidunia : इंदौर आज समूचे भारत में पत्रकारिता की नर्सरी माना जाता है। महनीय सम्पादकीय परम्परा की नींव माने जाने वाले शहर इंदौर की इमारत की बुलंदी को खड़ा करने में जिन साधकों के श्रम दर्ज हैं, ऐसे योद्धाओं में एक नाम अभय छजलानी भी है।

 

मां अहिल्या की नगरी इंदौर में छजलानी परिवार में 4 अगस्त 1934 को जन्म लेने वाले अभय जी ने हिन्दी पत्रकारिता की नर्सरी माने जाने वाले अखबार 'नईदुनिया' को वटवृक्ष बनाने में अहम भूमिका निभाई। आपने वर्ष 1955 में पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया। 1963 में कार्यकारी संपादक का कार्यभार संभाला। बाद में, लंबे अरसे तक आप 'नईदुनिया' के प्रधान संपादक भी रहे।

वर्ष 1965 में पत्रकारिता के विश्व प्रमुख संस्थान थॉम्सन फाउंडेशन, कार्डिफ (यूके) से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र से इस प्रशिक्षण के लिए चुने जाने वाले आप पहले पत्रकार थे। परिवार में पत्नी पुष्पा छजलानी, पुत्र विनय छजलानी और पुत्रियां शीला और आभा हैं।

 

हिन्दी पत्रकारिता के कर्मठ सूत्रधार, जिनके नेतृत्व ने भारतीय पत्रकारिता जगत् को कई मूर्धन्य संपादक सौंपे, जिनमें राजेन्द्र माथुर जी, राहुल बारपुते जी, प्रभाष जोशी जी, शरद जोशी जी आदि हैं। हिन्दी पत्रकारिता की कोंपलो को आपने बहुत करीने से सहेजकर पल्लवित होने में मदद की है। अभय जी नईदुनिया के संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के अलावा कई महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व भी निभा रहे थे। 

 

वे भारतीय भाषाई समाचार पत्रों के शीर्ष संगठन इलना के 3 बार अध्यक्ष रह चुके हैं। वे 1988, 1989 और 1994 में संगठन के अध्यक्ष रहे। वे इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी (आईएनएस) के 2000 में उपाध्यक्ष और 2002 में अध्यक्ष रहे। 2004 में भारतीय प्रेस परिषद् के लिए मनोनीत किए गए, जिसका कार्यकाल 3 वर्ष रहा।

उन्हें 1986 का पहला श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। 1995 में मप्र क्रीड़ा परिषद् के अध्यक्ष बने। ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग एंड फ्रेटरनिटी द्वारा वर्ष 1984 का गणेश शंकर विद्यार्थी सद्भावना अवॉर्ड वर्ष 1986 में राजीव गांधी ने प्रदान किया। 

 

पत्रकारिता में विशेष योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1997 में जायन्ट्स इंटरनेशनल पुरस्कार तथा इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी पुरस्कार मिला था। पत्रकारिता में अतुलनीय अवदान के लिए भारत सरकार ने उन्‍हें वर्ष 2009 में पद्मश्री प्रदान किया था।

छजलानी जी को इंदौर में इंडोर स्टेडियम अभय प्रशाल स्थापित करने के लिए भोपाल के माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान ने सम्मानित किया था। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय योगदान के लिए ऑल इंडिया एचीवर्स कॉन्फ्रेंस ने दिल्ली में 1998 में राष्ट्रीय गौरव पुरस्कार प्रदान किया। साथ ही, इसी वर्ष लाल बाग ट्रस्ट इंदौर का अध्यक्ष बनाया गया।

 

अभय जी का हिन्दी भाषा के प्रति गहरा प्रेम और लगाव भी रहा, यहां तक कि अपने अखबार में वर्तनी दोष भी न जाएं इस बात की चिंता अभय जी अधिक करते थे। कुछ एक बार तो अख़बार में एक शब्द की गलती हेडिंग में गलत छप जाने के कारण उन्होंने अख़बार में इंक से सुधार करवाएं और प्लेट्स भी बदलवा कर नई छपाई करवाई। ऐसे हिन्दी आग्रही का सम्पूर्ण जीवन हिन्दी भाषा की सेवा में रत रहा।

 

‘मातृभाषा उन्नयन संस्थान’ द्वारा वर्ष 2020 में आपको ‘हिन्दी गौरव अलंकरण’ से विभूषित किया गया। संस्थान ने पहला हिन्दी गौरव अलंकरण समारोह इंदौर में आयोजित कर अभय जी को अलंकृत किया था। आप मध्य प्रदेश टेबल टेनिस संगठन के अध्यक्ष रह चुके हैं। इसके अलावा अभय जी ने शहर के कई खास मुद्दों को भी उठाया। छजलानी जी की खेल गतिविधियों में खास रुचि के चलते ही नईदुनिया प्रकाशन ने हिन्‍दी की पहली खेल पत्रिका ‘खेल हलचल’ का प्रकाशन भी आरंभ किया था।

 

सामाजिक सरोकारों की बात करें तो अभय जी नर्मदा को इंदौर लाने की मुहिम के अगुआ थे। इंदौर के पेयजल संकट को दूर करने के लिए नर्मदा का पानी लाने के आंदोलन में उन्होंने पुरजोर तरीके से कार्य किया। इंदौर में अभय प्रशाल जैसा भव्य इनडोर स्टेडियम बनवाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

 

इसके अतिरिक्त सामाजिक और राजनीतिक दखलंदाजी भी बेजोड़ रही। एक समय मंत्रिमंडलों का खाका नईदुनिया तय करता था, और अभय जी कई बार निर्णायक भी होते थे। यहां तक कि वे अख़बार की हर विधा, हर क्षेत्र में दक्ष थे। अख़बार की डिजाइनिंग, रिपोर्टिंग, संपादन, मार्केटिंग या कोई भी पद हो, हर पद पर उन्होंने काम किया।

 

उन्होंने सोवियत संघ, जर्मनी, फ़्रांस, जॉर्डन, यूगोस्लाविया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, इंडोनेशिया, तुर्की, स्पेन, चीन आदि कई देशों की यात्रा कर उस अनुभवों को अपनी कार्यशैली में शामिल किया।

 

अभय जी ने 'विकास की व्यथा-कथा-कारवां भाग -1', 'छटपटाता शहर -भाग -2', 'शहर अकेला इस भीड़ में -कारवां -3', 'पीड़ा -ज्यों की त्यो -भाग -कारवां -4', 'अपना इंदौर -चार भागों में', 'मंथन', 'चिंतन', 'धड़कन', 'देखा सुना' किताबों को लिखा एवं आपके संपादन में 'सन्दर्भ-2003', 'सृष्टि का स्वर लता', 'भोपाल आज और कल', 'जब गांधी आए' एवं 'अमर सेनानी' पुस्तक प्रकाशित हुई। इनमें 'अपना इंदौर' बड़ी चर्चित और महनीय पुस्तक रही, जिसमें इंदौर का समग्र इतिहास समाया है।

 

अभय जी को अब्बू जी नाम राहुल बारपुते जी ने ही दिया था, प्यार से उनके बेहद खास लोग अब्बू जी कहते थे। अब्बू जी न केवल इंदौर के लिए बल्कि प्रदेश और देश के लिए कृत संकल्पित व्यक्तित्व रहे। दृष्टि संपन्नता में उनका कोई सानी नहीं था। हिन्दी भाषा की सतत् सेवा का ध्येय और साधारण से साधारण व्यक्ति के लिए भी सहज भाव से आदर सहित मिलने वाले चंद लोगों में अभय जी भी शामिल रहे।

 

एक बार मातृभाषा उन्नयन संस्थान के सम्मान के लिए आग्रह हेतु उनसे जब मैं मिलने गया तो उन्होंने इतना आदर दिया, संस्थान की गतिविधियों के बारे में जानकारी ली और यह तनिक भी महसूस नहीं होने दिया कि उनकी और मेरी उम्र में लगभग आधी शताब्दी का अंतर है। विनीत भाव से सम्मान ग्रहण करने का आग्रह स्वीकार किया। यही सहजता अभिभूत करती रही।

 

ऐसा भी नहीं रहा कि अभय जी का कभी विवादों से सामना न हुआ हो, लता अलंकरण हो अथवा अन्य मसले, इनके बावजूद भी अभय जी एक महानायक जैसे, हमेशा की तरह सूट-बूट पहने उजले ही नजर आए। एक उम्र गुजार कर नईदुनिया को अपने पसीने से सींचने के कारण ही अभय जी ने इंदौर की वैश्विक पहचान में नईदुनिया को दर्ज करवाया।

 

अपने छोटों से भी असीम नेह रखने वाले अभय जी ने 23 मार्च 2023 को इंदौर में आखिरी सांस ली। उनका अंतिम संस्कार इंदौर के रीजनल पार्क मुक्तिधाम पर किया गया। उनके साथ न केवल नईदुनिया युग ठहर गया बल्कि हिन्दी पत्रकारिता ने एक योद्धा को खो दिया।

जीवन के अंतिम दौर में बीमारी के कारण उनकी स्मृतियां धुंधली जरूर हो रही थीं किंतु चेतना और जिजीविषा वैसी ही बनी रही। लोगों से मिलने की चेष्टा हो अथवा शहर हितार्थ कार्य करने की प्रणाली, साहित्य में रुचि हो अथवा लेखनी को सतत् भाव से बहने देने का कार्य, अभय जी हमेशा से जीवंत व्यक्तित्व के रूप में नजर आए। निश्चित रूप से अभय जी पत्रकारिता का चलता-फिरता विश्वविद्यालय या यूं कहें कि पत्रकारिता के तपस्वी साधक रहे।

आस्था और अनुशासन का अद्भुत संगम है कांवड़ यात्रा

-डॉ. रंगनाथ त्रिपाठी

सावन के इस महीने में उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में कांवड़ियों के झुंड कंधों पर गंगाजल लिए शिवत्व को आत्मसात करते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं तो यह सनातन परंपरा की उस अनंत धारा का साक्षात प्रकटीकरण है जो प्राचीन काल से भारतीय चेतना में प्रवाहित होती रही है। यह महीना शिव-आराधना का सबसे पवित्र काल है। यही वह समय है जब पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र-मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने कंठ में धारण किया था और सृष्टि को विनाश से बचाया था।

 

कांवड़िए गंगाजल लेकर शिवलिंग पर अभिषेक करते हैं तो यह उस देवता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है, जिसने संसार के कल्याण के लिए विष पिया। यह त्याग और भक्ति के शाश्वत सिद्धांत की जीवंत अभिव्यक्ति है। आस्था के इसी धरातल पर, यदि हम इस यात्रा को सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप में देखें, तो ऐसी संरचना उभरती है जिसमें मनुष्य की सामूहिक चेतना, अनुशासन और सामाजिक सहयोग की गहरी परतें हैं। यही गहराई उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पूर्ण समर्पण से इन तपस्वियों के प्रति सेवा भाव के लिए प्रेरित करती है।

 

इस यात्रा का मूल तत्व आस्था और अनुशासन है। आस्था मनुष्य की सहनशक्ति बढ़ा देती है। सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा, वह भी भीषण गर्मी और मानसून की अनिश्चितता के बीच, किसी सामान्य शारीरिक क्षमता का काम नहीं। श्रद्धा के आवेग में शरीर धीरे-धीरे थकान की सीमाओं को पार करता जाता है। शिव भक्त को अपने शरीर की सीमाओं का नए सिरे से साक्षात्कार होता है। यह अनुभव दीर्घकालिक और सामूहिक है। यहां प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहभागिता केंद्र में होती है। शरीर की यह परीक्षा व्यक्ति को यह सिखाती है कि सीमाएं जितनी भौतिक होती हैं, उतनी ही मानसिक भी, और अक्सर मन शरीर से पहले हार मान लेता है।

इसी बिंदु से मानसिक अनुशासन का प्रश्न जुड़ता है। लंबी पदयात्रा में कांवड़ियों को एक निश्चित संयम और मर्यादा का पालन भी करना पड़ता है। समय पर विश्राम, भोजन में सादगी, और सबसे महत्वपूर्ण, कांवड़ को भूमि पर न रखने जैसे नियमों का निर्वहन। यह अनुशासन स्वेच्छा से स्वीकार किया गया प्रतिबंध है। जब कोई व्यक्ति किसी बड़े लक्ष्य के लिए स्वयं को संयमित करता है, तो उसमें आत्म-नियंत्रण की क्षमता विकसित होती है। अनेक कांवड़िए इस अनुभव को केवल धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि आत्म-परिष्करण की एक प्रक्रिया के रूप में वर्णित करते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो कांवड़ को भूमि पर न रखने का नियम भी गहरा प्रतीकात्मक अर्थ रखता है। यह जल साक्षात गंगा का, स्वयं शिव की जटाओं से प्रवाहित पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय परंपरा में तप, व्रत और संयम को सदा मोक्ष के मार्ग के रूप में देखा गया है, और कांवड़ यात्रा इसी तपस्या-परंपरा का समकालीन रूप है।

 

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो कांवड़ यात्रा ऐसी सामूहिकता है जो सामाजिक ढांचों, जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति की सीमाओं को अस्थायी रूप से धुंधला कर देती है। सड़क पर चलते समय एक मजदूर और एक व्यापारी, दोनों समान रूप से थकान और कष्ट साझा करते हैं। यह साझा अनुभव एक अस्थायी किंतु सशक्त बंधन उत्पन्न करता है। मनुष्य के सामाजिक स्वभाव में यह प्रवृत्ति गहराई से अंतर्निहित है कि साझा कष्ट और साझा उद्देश्य समुदाय को अधिक दृढ़ता से बांधते हैं। साझा सुख में यह दृढ़ता नहीं होती।

 

इसी सामूहिकता में सेवा शिविरों की व्यवस्था भी है। मार्ग में स्थान-स्थान पर स्थापित सेवा शिविर, जहां स्थानीय निवासी, सामाजिक संगठन और स्वयंसेवक निःशुल्क भोजन, विश्राम और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराते हैं, पूरी यात्रा का सामाजिक आधार बनाते हैं। यह स्वतःस्फूर्त सामुदायिक सहयोग का उदाहरण है। हजारों परिवार और संस्थाएं बिना किसी प्रत्यक्ष लाभ की अपेक्षा के इस व्यवस्था में योगदान देती हैं। आज के दौर में जहां आधुनिक शहरी जीवन व्यक्तिवाद और पारस्परिक अलगाव की ओर बढ़ रहा है, कांवड़ यात्रा वर्ष में एक बार ही सही, पारस्परिक निर्भरता और सामुदायिक दायित्व की भावना को पुनर्जीवित करती है।

 

राज्य की भूमिका पर विचार किए बिना यह विषय पूरा नहीं होगा। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने बीते वर्षों में इस यात्रा को व्यवस्थित, सुरक्षित और गरिमामय बनाने की दिशा में जो प्रयास किए हैं, वे एक स्पष्ट सांस्कृतिक दृष्टि का प्रतिबिंब हैं। मार्ग प्रकाश व्यवस्था, चिकित्सा शिविर, ड्रोन निगरानी, स्वच्छता अभियान, पुष्प वर्षा और यातायात प्रबंधन जैसे कदम यह दर्शाते हैं कि योगी सरकार श्रद्धालुओं को भीड़ के रूप में नहीं, सम्मानित आस्था-यात्रियों के रूप में देखती है।

 

योगी आदित्यनाथ स्वयं धर्माचार्य हैं और उनके नेतृत्व में यह प्रयास सांस्कृतिक पुनर्जागरण या 'सनातन गौरव की पुनर्स्थापना' के रूप में देखा जाता है। एक ऐसी दृष्टि जिसके अंतर्गत काशी विश्वनाथ धाम का भव्य पुनर्निर्माण, अयोध्या में राम मंदिर के आसपास के अवसंरचनात्मक कायाकल्प, और कुंभ जैसे आयोजनों की भव्यता को भी रखा जा सकता है। कांवड़ यात्रा मार्ग की हर सड़क, हर लाइट, हर सेवा शिविर, आस्था और शासन के बीच सम्मानजनक संबंध का प्रतीक है। स्वाभाविक है कि किसी भी बड़े सार्वजनिक विषय पर भिन्न मत भी होते हैं, और कुछ टिप्पणीकार इस विषय पर अलग दृष्टिकोण भी रखते हैं परंतु व्यापक जनसमर्थन और श्रद्धालुओं की निरंतर बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि योगी सरकार उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप है।

 

कांवड़ यात्रा को सिर्फ आस्था या अनुशासन के ही रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह यात्रा वास्तव में इन दोनों तत्वों के संगम पर खड़ी है जहां आध्यात्मिक विश्वास शारीरिक कष्ट को अर्थ प्रदान करता है, और शारीरिक कष्ट उस विश्वास को अधिक सघन, अधिक प्रत्यक्ष और अधिक अनुभवजन्य बना देता है। आस्था के बिना यह यात्रा केवल एक कठिन शारीरिक परीक्षा रह जाती और अनुशासन के बिना यह केवल भावुक उन्माद बनकर रह जाती। किंतु, जब लाखों भक्त शिव के प्रति अपने प्रेम में एक साथ चलते हैं, कष्ट सहते हैं और फिर भी मुस्कुराते हुए 'बोल बम' का उद्घोष करते हैं, तब यह केवल सामाजिक व्यवहार नहीं रह जाता, यह सनातन धर्म की अजेय जीवंतता का प्रमाण बन जाता है।

 

जब राज्य स्वयं आगे बढ़कर इस आस्था को गरिमा, सुरक्षा और सम्मान देता है, तो यह सभ्यता की उस स्मृति के प्रति राजकीय कृतज्ञता है जिसने हमें सनातन पहचान दी है। इन दोनों के संतुलन में ही इस परंपरा की वास्तविक शक्ति निहित है। एक ऐसी शक्ति जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ती है, समुदाय को एक-दूसरे से जोड़ती है, और राष्ट्र को उसकी आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ती है। (लेखक श्री गोरक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर में वेद विभागाध्यक्ष हैं)