पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

Shraddh Paksha 2026

क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि हम कौन हैं? हमारा नाम, हमारा परिचय और हमारी व्यक्तिगत पहचान निश्चित ही हमारी अपनी है, लेकिन हमारे अस्तित्व की जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं। हमारे भीतर हमारे माता-पिता का अंश है, उनके भीतर हमारे दादा-दादी का, और उनके पीछे अनगिनत पीढ़ियों का वह इतिहास है जिसने हमारे वर्तमान को आकार दिया है। हमारे शरीर में रक्त के साथ उनकी विरासत प्रवाहित होती है, हमारे संस्कारों में उनकी छाप होती है और हमारे जीवन में उनके संघर्षों की अनुगूंज सुनाई देती है।

 

लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य दुनिया को जानने के लिए बेचैन है और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, पर अपनी जड़ों को जानने के लिए उसके पास समय नहीं है। मोबाइल में हजारों तस्वीरें हैं और दुनिया की हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, मगर अपने ही परदादा की तस्वीर कहाँ है, उनका जीवन कैसा था और उन्होंने परिवार के लिए क्या किया, यह बताने वाला कोई नहीं है। हम भविष्य की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि उस अतीत को भूलते जा रहे हैं, जिसकी नींव पर हमारा वर्तमान खड़ा है।

 

यहीं से श्राद्ध पक्ष की सार्थकता आरंभ होती है। यह केवल पंचांग की कुछ तिथियां नहीं हैं; यह हमारी सामूहिक स्मृति को जगाने वाला वह अवसर है, जब वर्तमान कुछ क्षण के लिए अतीत के सामने खड़ा होता है और स्वीकार करता है कि हम अकेले नहीं हैं—हमारे अस्तित्व के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है।

 

‘श्राद्ध’ का वास्तविक अर्थ और पितृऋण

‘श्राद्ध’ शब्द का सीधा संबंध ‘श्रद्धा’ से है। इसलिए श्राद्ध का मूल अर्थ केवल पिंडदान, तर्पण या ब्राह्मण भोजन कराना ही नहीं है। ये भले ही परंपरागत विधियां हैं, लेकिन इनके केंद्र में जो मूल भाव है, वह है—अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मीय स्मरण।

 

भारतीय सनातन परंपरा ने मृत्यु को संबंधों का पूर्ण विराम नहीं माना है। शरीर समाप्त हो जाता है, किंतु स्मृति और संस्कार जीवित रहते हैं। मनुष्य चला जाता है, लेकिन उसके कर्म परिवार की अगली पीढ़ियों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। यही कारण है कि भारतीय जीवन-दर्शन में पितरों के प्रति दायित्व को विशेष स्थान दिया गया है, जिसे ‘पितृऋण’ कहा जाता है।

 

हमारे माता-पिता ने हमें जीवन दिया और हमारे दादा-दादी व पूर्वजों ने परिवार को संभाला। किसी ने अभाव में जीवन जिया, किसी ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया, तो किसी ने परिवार के लिए अपने सुख त्याग दिए और उन संस्कारों की परंपरा को सुरक्षित रखा जो आज हमारे हाथों में है। हम जिस जीवन को अपना कहते हैं, उसकी नींव में उन सबका योगदान है। इसलिए पितृऋण कोई ऐसा ऋण नहीं है जिसे धन देकर चुकाया जा सके। इसे चुकाने का सबसे सुंदर मार्ग है—माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का सम्मान, परिवार में प्रेम, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन और आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ संस्कार देना।

 

तर्पण और परंपराओं के पीछे छिपा भाव

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, अन्नदान और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं। जल, तिल और कुश आदि के माध्यम से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की परंपरा है। आस्था मानती है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों को तृप्ति व शांति प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद परिवार को मिलता है। लेकिन तर्पण को केवल एक बाहरी कर्मकांड मानना, उसके भीतर छिपे गहरे भाव से वंचित रहना है।

 

तर्पण की जलधारा केवल जल नहीं होती; वह स्मृति और कृतज्ञता की धारा होती है। जब कोई व्यक्ति अपने पिता, दादा, परदादा या अन्य पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह अपने अतीत को प्रणाम करता है। वह मानो यह स्वीकार करता है कि उसके वर्तमान में उसका अपना श्रम जितना है, उतना ही योगदान उन लोगों का भी है जो आज उसके साथ नहीं हैं।

 

श्राद्ध परंपरा में कौवे, गाय और कुत्ते को भोजन कराना तथा ब्राह्मण, अतिथि या किसी जरूरतमंद को भोजन कराने का विधान है। इन परंपराओं में जीव-दया, अन्नदान, सेवा और सह-अस्तित्व की भावना दिखाई देती है। पूर्वजों के नाम पर यदि किसी भूखे का पेट भर जाए या किसी जीव को अन्न मिल जाए, तो श्रद्धा का दायरा और विस्तृत हो जाता है।

 

भारतीय धार्मिक साहित्य और महाकाव्यों में पितृकर्म का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। चाहे महाभारत में कर्ण से जुड़ी कथा हो या रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा पिता राजा दशरथ के निमित्त किया गया श्राद्ध—ये प्रसंग भारतीय समाज में पितरों के प्रति दायित्व की गहरी भावना को दर्शाते हैं।

 

इसी श्रृंखला में ‘सर्वपितृ अमावस्या’ भी व्यापक स्मरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो सका, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए यह तिथि बनी है। यह ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों को नमन करने का दिन है।

 

आधुनिक दौर में श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता

आज श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। परिवार छोटे हो रहे हैं और संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं। घरों में भौतिक सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन पीढ़ियों के बीच का संवाद घटता जा रहा है। बच्चे अपने दादा-दादी के जीवन-संघर्षों से परिचित नहीं हैं और अनेक बार उन्हें अपने परदादा का नाम तक मालूम नहीं होता। ऐसे समय में श्राद्ध पक्ष केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पारिवारिक स्मृतियों को बचाने का माध्यम बन सकता है:

  • घर के बुजुर्ग बच्चों को अपने पूर्वजों की कहानियां सुनाएं।
  • परिवार का एक ‘वंश-वृक्ष’ (Family Tree) तैयार किया जाए।
  • पुरानी तस्वीरों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाए।
  • पूर्वजों के संघर्षों, उनके व्यवसाय, सामाजिक योगदान और जीवन-मूल्यों की जानकारी नई पीढ़ी को दी जाए।
  • क्योंकि जिसे अपनी जड़ों का पता नहीं होता, उसकी पहचान की ऊंचाई भी अधूरी रह जाती है।

 

भय नहीं, कृतज्ञता का नाम है श्राद्ध

पितृदोष जैसी धार्मिक मान्यताएं भी श्राद्ध परंपरा से जुड़ी हुई हैं। अनेक श्रद्धालु पितरों की शांति और परिवार के कल्याण की कामना से तर्पण, पाठ और आध्यात्मिक साधनाएं करते हैं। इन आस्थाओं का सम्मान करते हुए यह समझना भी जरूरी है कि श्राद्ध का व्यापक संदेश भय फैलाना नहीं, बल्कि कृतज्ञता, आत्मचिंतन और सदाचार सिखाना है।

 

यदि हम पितरों की शांति की कामना करते हैं, तो केवल कर्मकांड पर्याप्त नहीं हो सकता। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का आदर, परिवार में प्रेम, जरूरतमंदों की सहायता, जीवों के प्रति करुणा और अपने आचरण में सत्य व संयम रखना भी पितृ-सम्मान का ही विस्तार है।

 

  • आखिर पूर्वजों को सबसे बड़ा सम्मान क्या है?
  • क्या केवल एक दिन जल अर्पित कर देना?
  • क्या केवल भोजन करा देना और दान दे देना?
  • या फिर उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखना?

 

उत्तर स्पष्ट है—यदि उन्होंने परिवार को जोड़कर रखा था, तो हम भी परिवार को जोड़ें। यदि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखा था, तो हम भी धैर्य रखें। यदि उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता की थी, तो हम भी सेवा करें। और यदि उन्होंने हमें संस्कार दिए थे, तो हम उन संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं। यहीं पर श्राद्ध कर्मकांड से ऊपर उठकर ‘जीवन का संस्कार’ बन जाता है।

 

स्मृति की अंजलि

श्राद्ध पक्ष मृत्यु का शोक नहीं, बल्कि स्मृति का उत्सव है। यह अतीत में लौटने का हठ नहीं, बल्कि अतीत से शक्ति लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि हम किसी शून्य से पैदा नहीं हुए हैं; हमारे पीछे अनेक पीढ़ियों का श्रम, संघर्ष, त्याग और संस्कार खड़े हैं।

 

इसलिए इस श्राद्ध पक्ष में जब हम पितरों को जल अर्पित करें, तो अपने भीतर भी कृतज्ञता का दीप जलाएं। जब अन्न अर्पित करें, तो सेवा का संकल्प लें। जब पूर्वजों का नाम लें, तो उनके जीवन से कोई एक श्रेष्ठ गुण अपने आचरण में उतारने का प्रयास करें। और जब अपने बच्चों को उनके पूर्वजों की कहानियां सुनाएं, तो उन्हें यह अहसास कराएं कि वे केवल वर्तमान के व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा के उत्तराधिकारी हैं।

 

पूर्वज चले जाते हैं, उनकी स्मृतियां नहीं।

चेहरे मिट जाते हैं, संस्कार नहीं।

पीढ़ियां बदल जाती हैं, विरासत नहीं।

 

इसीलिए श्राद्ध केवल पितरों को स्मरण करने का पर्व नहीं है, बल्कि स्वयं को पहचानने का पर्व है। अंततः पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल जल की एक अंजलि भर नहीं है; सच्ची श्रद्धांजलि है—एक ऐसा जीवन जीना जिसमें हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ संस्कार दिखाई दें, और ऐसा परिवार बनाना जिसे देखकर हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपनी जड़ों पर गर्व कर सके।

 

श्राद्ध की सबसे बड़ी अंजलि जल की नहीं, स्मृति की है। सबसे बड़ा तर्पण कर्मकांड का नहीं, कृतज्ञता का है; और पितरों को सबसे बड़ा सम्मान यह है कि उनके अच्छे संस्कार हमारे जीवन में निरंतर सांस लेते रहें।

हिंदी एवं इतिहास लेखन में उल्लेखनीय योगदान के लिए अमित राव पवार को मिला ‘मातृभाषा मुंशी प्रेमचंद सम्मान’

हिंदी एवं इतिहास लेखन में उल्लेखनीय योगदान के लिए अमित राव पवार को मिला 'मातृभाषा मुंशी प्रेमचंद सम्मान'

Amit Rao Pawar

इंदौर। 14 सितंबर से प्रारंभ हुए हिंदी सप्ताह के अवसर पर इंदौर प्रेस क्लब सभागार में आयोजित साहित्यिक समारोह में देवास के युवा लेखक एवं इतिहासविद अमित राव पवार को हिंदी साहित्य एवं इतिहास लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘मातृभाषा मुंशी प्रेमचंद सम्मान’ से अलंकृत किया गया।

 

18 सितंबर 2026 (शुक्रवार) को आयोजित इस समारोह में ‘शुभ संकल्प समूह, इंदौर’ एवं ‘मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति’ के संयुक्त तत्वावधान में श्री पवार को स्मृति-चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

 

समारोह के दौरान वक्ताओं ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ युवा पीढ़ी को हिंदी साहित्य से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में अमित राव पवार के साहित्यिक व ऐतिहासिक लेखन की सराहना करते हुए उन्हें हिंदी के प्रति समर्पित युवा रचनाकार बताया गया।

 

इस कार्यक्रम के सफल संयोजन में डॉ. सुनीता श्रीवास्तव एवं उपेंद्र श्रीवास्तव का विशेष योगदान रहा। अमित राव पवार को यह सम्मान प्राप्त होने पर साहित्यिक व सामाजिक क्षेत्र के पदाधिकारियों, साहित्यप्रेमियों तथा शुभचिंतकों ने उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

Mokshagundam Visvesvaraya

हर साल 15 सितंबर को भारत में अभियंता दिवस यानी इंजीनियर्स डे मनाया जाता है। यह दिन महान अभियंता, राष्ट्र-निर्माता और भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (सर एम.वी.) की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। उन्होंने अपनी दूरदर्शिता, तकनीकी दक्षता और जल प्रबंधन के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों से आधुनिक भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

सर एम. विश्वेश्वरैया को भारतीय इंजीनियरिंग के महान स्तंभों में गिना जाता है। उन्हें आधुनिक मैसूर के विकास में उनके योगदान के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। उनकी सोच केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे औद्योगिक विकास, शिक्षा, सिंचाई, जल संरक्षण और आर्थिक प्रगति को भी राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे।

 

15 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है अभियंता दिवस?

अभियंता दिवस हर वर्ष 15 सितंबर को सर एम. विश्वेश्वरैया की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन देशभर में इंजीनियरिंग संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं और विभिन्न संगठनों में कार्यक्रम आयोजित कर उनके योगदान को याद किया जाता है।

 

खासकर कर्नाटक में यह दिन विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। उनके जीवन, कार्यों और राष्ट्र निर्माण में योगदान पर चर्चा की जाती है तथा नई पीढ़ी को उनकी उपलब्धियों से प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

 

शुरुआती जीवन और शिक्षा

सर एम. विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को तत्कालीन मैसूर रियासत के मुद्देनहल्ली गांव में हुआ था, जो वर्तमान में कर्नाटक के चिकबल्लापुर जिले में स्थित है। उनका जन्म एक तेलुगु भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

 

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से बी.ए. की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए पुणे के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान में प्रवेश लिया। सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की और जल्द ही अपनी प्रतिभा तथा कार्यकुशलता के कारण अलग पहचान बना ली।

 

इंजीनियरिंग से राष्ट्र सेवा तक का सफर

सर एम.वी. ने अपने करियर की शुरुआत बॉम्बे प्रेसीडेंसी के लोक निर्माण विभाग (PWD) से की। इंजीनियर के रूप में उन्होंने जल संसाधन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम किया।

 

उनकी तकनीकी समझ और समस्या के व्यावहारिक समाधान खोजने की क्षमता ने उन्हें अपने समय के अग्रणी इंजीनियरों में शामिल कर दिया। वर्ष 1912 से 1918 तक उन्होंने मैसूर राज्य के दीवान के रूप में भी सेवाएं दीं।

 

दीवान के रूप में उन्होंने मैसूर के औद्योगिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास को गति देने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल कीं। इसी कारण उन्हें आधुनिक मैसूर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्तित्व माना जाता है।

 

जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण में बड़ा योगदान

सर एम. विश्वेश्वरैया का सबसे महत्वपूर्ण योगदान जल प्रबंधन और सिंचाई व्यवस्था के क्षेत्र में माना जाता है। उस दौर में भारत के कई हिस्से बाढ़, सूखे और सिंचाई की समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्होंने इन समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक और आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया।

 

उन्होंने जल के संरक्षण, बांधों के निर्माण और अतिरिक्त पानी के प्रभावी प्रबंधन से जुड़ी तकनीकों के विकास और उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी तकनीकी दक्षता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश भारत सरकार ने उन्हें अदन (वर्तमान यमन) की जल आपूर्ति और जल निकासी व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए भेजा था।

 

वे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में विकसित हो रही तकनीकों को समझने और उन्हें भारत की परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने में भी रुचि रखते थे। उनकी यह सोच उस समय के लिए बेहद दूरदर्शी मानी जाती थी।

 

विदेश यात्राओं से सीखने का जुनून

सर एम.वी. का मानना था कि किसी भी देश की प्रगति के लिए नई तकनीकों और वैज्ञानिक सोच को अपनाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने विदेशों की तकनीकी प्रगति का अध्ययन किया।

 

उन्होंने जापान, अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका सहित विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कीं और वहां की इंजीनियरिंग तथा औद्योगिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। उनका उद्देश्य केवल जानकारी हासिल करना नहीं था, बल्कि उपयोगी तकनीकों को भारत की जरूरतों के अनुरूप अपनाना था।

 

ब्रिटिश सरकार ने दिया 'सर' का सम्मान

सर एम. विश्वेश्वरैया के असाधारण योगदान को देखते हुए वर्ष 1915 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर' की उपाधि प्रदान की। इसके बाद उनके नाम के साथ 'सर' की उपाधि जुड़ गई। हालांकि उनका वास्तविक सम्मान भारत के विकास और राष्ट्र सेवा में किए गए उनके कार्यों से स्थापित हुआ।

 

भारत रत्न से हुए सम्मानित

स्वतंत्र भारत में भी उनके योगदान को सर्वोच्च सम्मान मिला। वर्ष 1955 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके लंबे सार्वजनिक जीवन, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में योगदान और राष्ट्र निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की पहचान था।

 

100 वर्ष से अधिक का जीवन और अंतिम समय

सर एम. विश्वेश्वरैया ने लंबा और बेहद सक्रिय जीवन जिया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक देश के विकास, तकनीकी शिक्षा और औद्योगिक प्रगति से जुड़े विषयों पर विचार व्यक्त किए।

 

उन्होंने 14 अप्रैल 1962 को बेंगलुरु में अंतिम सांस ली। उनकी स्मृति में उनके पैतृक गांव मुद्देनहल्ली में स्मारक भी बनाया गया है, जहां आज भी लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

 

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं सर एम.वी.

सर एम. विश्वेश्वरैया का जीवन इस बात का उदाहरण है कि तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास के लिए भी किया जा सकता है।

 

उन्होंने जल प्रबंधन से लेकर औद्योगिक विकास तक अनेक क्षेत्रों में दूरदर्शी सोच का परिचय दिया। उनका जीवन अनुशासन, मेहनत, तकनीकी दक्षता और राष्ट्र सेवा के समन्वय की प्रेरक मिसाल है।

 

इसलिए 15 सितंबर का अभियंता दिवस केवल इंजीनियरों के सम्मान का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस महान अभियंता को याद करने का दिन भी है, जिसने अपने ज्ञान और दूरदृष्टि से आधुनिक भारत की विकास यात्रा को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हिंदी दिवस विशेष: जानिए कैसे हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित रह गई?

हिंदी दिवस विशेष: जानिए कैसे हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित रह गई?

hindi-divas-2026

14 सितंबर को हिंदी दिवस का आगमन संपूर्ण हिंदी जगत के लिए उमंग, उत्साह और ऊर्जा से भरा उत्सव होता है। इसका समापन प्रायः 'हिंदी सप्ताह' या 'हिंदी पखवाड़े' के दौरान आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत करने तथा हिंदी सेवियों, प्रेमियों एवं साधकों के श्रेष्ठ कार्यों के सम्मान के साथ एक औपचारिकता (कर्मकांड) के रूप में हो जाता है।

 

हिंदी दिवस पर हम अत्यंत आत्मविश्वास के साथ हिंदी की गरिमा, महिमा और उसके अप्रतिम गौरव का गुणगान तो करते हैं, किंतु वास्तव में हम इसकी वर्तमान दशा को लेकर अपेक्षित रूप से गंभीर नहीं होते। जबकि यह दिन हमारे आत्म-मूल्यांकन और आत्म-विश्लेषण का है कि हमने हिंदी के भविष्य को स्वर्णिम बनाने की दिशा में क्या महती योगदान दिया है।

ALSO READ: हिंदी दिवस 2026: हिंदी नहीं रही अब पहले जैसी, फिर भी दुनिया में बढ़ता जा रहा इसका दबदबा

यह निर्विवाद है कि हिंदी हमारी अस्मिता की पहचान और भारत की आत्मा है। यह हमारी सांस्कृतिक चेतना को सूक्ष्मता से अभिव्यक्त करने वाली अनमोल संपदा है। यह हमारे सार्वभौमिक मूल्यों की संरक्षिका है, जो समग्र राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोती है। हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि एक समृद्ध, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक विरासत की संवाहिका है। यह 'वसुधैव कुटुंबकम' अर्थात् वैश्विक बंधुत्व और एकता की भावना को जाग्रत कर जन-जन में आत्म-सम्मान का भाव भरती है। परस्पर सम्मान, जुड़ाव, विनम्रता, सहिष्णुता, संवेदनशीलता और समरसता हिंदी की अंतर्निहित प्रकृति है। इसी कारण यह जन-जन की अभिलाषा के अनुरूप पूरे राष्ट्र की संपर्क भाषा बनी है।

 

मध्यकाल में हिंदी भक्ति आंदोलन के धार्मिक और सामाजिक सुधारों का माध्यम बनी तथा स्वाधीनता संग्राम के राष्ट्रीय आंदोलनों को प्रेरित करने वाले आदर्शों को इसने सशक्त स्वर दिया। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लंबे संघर्ष के बाद 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में यह प्रावधान किया गया कि 'संघ की आधिकारिक भाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी।' हालांकि, संविधान लागू होने के समय से 15 वर्षों की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति भी दी गई।

 

अनुच्छेद 343 की धारा 3 में यह व्यवस्था थी कि संसद 15 वर्ष की अवधि के पश्चात विधि द्वारा अंग्रेजी के प्रयोग को बढ़ा सकेगी। खेर आयोग और पंत समिति की रिपोर्टों के आधार पर 1963 में राजभाषा अधिनियम बनाकर यह प्रावधान कर दिया गया कि 26 जनवरी 1965 के बाद भी अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। इसमें यह शर्त जोड़ दी गई कि अंग्रेजी तब तक बनी रहेगी जब तक हिंदी को राजभाषा अपनाने वाले सभी राज्यों के विधानमंडल इसे समाप्त करने का संकल्प पारित न कर दें। इस व्यवस्था ने अंग्रेजी के प्रयोग को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया और एक भी राज्य की असहमति पर हिंदी अनिवार्य राजकाज की भाषा बनने से वंचित रह गई।

 

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भाषा के प्रश्न को केवल भावुकता से नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखा। संस्कृत हो या हिंदी, उनका मानना था कि ये भाषाएं भारत को एकता के सूत्र में बांधकर भाषाई विवादों से बचा सकती हैं। 9 भाषाओं के ज्ञाता और 32 उपाधियों के धारक डॉ. आंबेडकर ने अंग्रेजी के बजाय हिंदी में समाचार पत्र निकाले, जिससे वे वंचित समाज की मुखर आवाज बन सके। वे प्रांतीय भाषाओं के विकास के पक्षधर थे, किंतु राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का ही समर्थन करते थे। भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के विरोधी डॉ. आंबेडकर ने 'एक भाषा-एक राज्य' के स्थान पर 'एक राज्य-एक भाषा' की अवधारणा का समर्थन किया था।

 

हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर हिंदी की स्वीकार्यता को रेखांकित किया था:

महात्मा गांधी: “यदि हम भारत को एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा हो सकती है। राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।”

नेताजी सुभाष चंद्र बोस: “प्रांतीय ईर्ष्या-द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता हिंदी प्रचार से मिलेगी, उतनी किसी अन्य साधन से नहीं।”

महर्षि दयानंद सरस्वती: “हिंदी के माध्यम से संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।”

के. एम. मुंशी: “हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है, वह तो पहले से ही है।”

 

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा था—

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

पै निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल॥”

 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इसी मूलमंत्र को स्वीकारते हुए मातृभाषाओं और लोकभाषाओं को प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक विशेष स्थान दिया गया है। हालांकि, मातृभाषा में शिक्षा का क्रियान्वयन पर्याप्त मानवीय और भौतिक संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। हिंदी के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह केवल प्राथमिक शिक्षा तक सीमित न रहकर वैश्विक विश्वविद्यालयों में उच्च स्तरीय शोध और ज्ञान की बुनियाद बने।

 

किसी भाषा का भविष्य केवल शासकीय आदेशों या तंत्र पर निर्भर नहीं होता; वह भाषा-भाषियों के सृजनात्मक समर्पण, अपनत्व और निस्वार्थ संकल्प-शक्ति से जीवंत रहता है। यदि हमारा हिंदी-प्रेम केवल 14 सितंबर के उत्सव तक सीमित है, तो हमें आत्मचिंतन की आवश्यकता है।

 

मनुस्मृति का कथन है- “धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः” (जो धर्म का नाश करता है, उसका नाश हो जाता है और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है)। भाषा के संदर्भ में भी यही सत्य है—जो समाज अपनी भाषा की उपेक्षा करता है, उसकी संस्कृति का क्षरण निश्चित है।

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि “अन्य भारतीय भाषाएं नदियां हैं और हिंदी महानदी।” अतः हिंदी का यह दायित्व है कि वह अन्य भारतीय भाषाओं को सहेली मानकर परस्पर सम्मान, सहयोग और आदान-प्रदान का वातावरण बनाए।

 

आज सूचना प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के डिजिटल युग में हिंदी के समक्ष अनंत संभावनाएं हैं। एक तरफ जहां सूचनाओं का विशाल भंडार है, वहीं फर्जी व गुणवत्ताहीन सामग्री से बचकर प्रामाणिक ज्ञान का चयन करना एक बड़ी चुनौती है। डिजिटल दुनिया में अपनी उपादेयता बनाए रखने के लिए हिंदी में उच्चस्तरीय ज्ञान-कौशल और समृद्ध डिजिटल सामग्री का निर्माण अनिवार्य है।

 

हिंदी के सर्वांगीण विकास के लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर एकीकृत प्रयासों की आवश्यकता है। आधुनिक विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, एआई, अर्थशास्त्र, खगोल, भूगोल और दर्शन जैसे विषयों पर हिंदी में मौलिक व प्रामाणिक ग्रंथों का सृजन युद्ध स्तर पर होना चाहिए।

 

जिस दिन हिंदी रोजगार की कुंजी और अंतरराष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान का प्रवेश द्वार बन जाएगी, उसी दिन 'हिंदी दिवस' का आयोजन सही मायनों में सार्थक होगा।

 

कोटि-कोटि कंठों की भाषा,

जन-गण की मुखरित अभिलाषा।

हिंदी है पहचान हमारी,

हिंदी है हम सबकी परिभाषा॥

 

लेखक: डॉ. अशोक कुमार भार्गव (पूर्व आईएएस)

संपर्क: 9425427525 | ईमेल: dr.ak.bhargava2022@gmail.com

80s retro look trend : 80 के दशक के रेट्रो लुक से स्मृति और नॉस्टेल्जिया तक

80s retro look trend : 80 के दशक के रेट्रो लुक से स्मृति और नॉस्टेल्जिया तक

retro look

यह बात मान लेनी चाहिए कि हम अपने अतीत से कितना स्नेह रखते हैं। हम वहाँ सुखद अनुभूति करते हैं, सुरक्षित महसूस करते हैं। अतीत हमारे वर्तमान की ख़ाली जगहों को भरता है। वह बार-बार याद आता है, बावजूद इसके कि हमें सिखाया गया है कि भविष्य की योजनाएँ बनानी चाहिए और उसी पर फ़ोकस करना चाहिए।

लेकिन अतीत में लौटना, यादों में जीना या नॉस्टेल्जिक होना कई मर्तबा यह भी बताता है कि जिस भविष्य को हम अपने लिए गढ़ रहे हैं, उसमें कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। यदि भविष्य हमें उतना ही आश्वस्त करता, तो शायद हम उसकी तरफ़ लौटते। मगर हम बार-बार पीछे जाते हैं। क्यों?

स्मृति और अतीत मनुष्य के जीवन का केंद्रीय आयाम हैं। नॉस्टेल्जिया महज़ ‘स्मृति-मोह’ नहीं है। यह आत्म-चेतना को टटोलने की एक प्रक्रिया है—समय के दो आयामों के बीच खड़े होकर यह देखने की कि हम कहाँ से कहाँ आ गए!

हम धीरे-धीरे एक सरल और सुंदर समय से निकलकर एक कठिन और भयावह दौर में प्रवेश करते हैं। शायद पीछे लौटना उसी यात्रा को एक बार फिर देखने की कोशिश है।

अतीत और भविष्य में एक बुनियादी फ़र्क़ है। अतीत में हमारे पास दृश्य हैं, आवाजें हैं, गंध हैं, चेहरे हैं। हमारे पास उसके साक्ष्य हैं। हम उसके साक्षी हैं। भविष्य के पास इसके बरअक्स सिर्फ़ अनुमान हैं—योजनाएँ हैं, आशंकाएँ हैं, उम्मीदें हैं। अतीत घट चुका है, भविष्य अभी घटा ही नहीं है। इसलिए अतीत निश्चित है और भविष्य काल्पनिक।

यह भी सच है कि कई लोगों के लिए अतीत एक बोझ रहा होगा। कुछ लोग अपनी स्मृतियों का वज़्न उठाकर भविष्य की ओर बढ़ते हैं। लेकिन यही स्मृतियाँ उन्हें यह समझने की क्षमता भी देती हैं कि आने वाले संकट से कैसे निपटना है। अतीत केवल बोझ नहीं है, वह अनुभव भी है।

हम अपने वर्तमान में अकेले नहीं होते। हम अपने पुरखों के देखे हुए सपनों के भोक्ता भी होते हैं। भविष्य के लिए उन्होंने जो किया, उसका फल हमें मिलता है और उसका भुगतान भी हमें ही करना पड़ता है। हमारे वर्तमान में बहुत सारा अतीत जमा होता है। इसलिए मैं अतीत को जीवन के लिए एक सहूलत मानता हूँ।

हम अतीत और उसकी स्मृतियों की मदद से अपनी दुनिया को टटोलते हैं। हमारा अतीत ही हमें सबसे बेहतर तरीक़े से बताता है कि हम वास्तव में कौन हैं। अगर हम अपनी स्मृतियों में लौटना छोड़ दें तो शायद यह सिर्फ़ अतीत को छोड़ना नहीं होगा, यह अपनी पहचान का एक हिस्सा खो देना होगा।

यह बात उस आदमी से पूछिए जिसने अपनी याददाश्त खो दी है। उसके लिए परिचित दृश्य और आवाज़ें अचानक अजनबी हो जाती हैं। दुनिया वही रहती है, लेकिन उसके भीतर उससे जुड़ने वाला आदमी बदल जाता है।

निर्मल वर्मा ने इसी अर्थ में पूछा था कि एक मनुष्य के भीतर से उसका सारा अतीत और स्मृतियाँ निकाल दी जाएँ तो उसके पास क्या बचेगा, जिसे वह दिखा सके?

स्मृति हमारे जीवन का नैसर्गिक अंग है। हम मनुष्य हैं तो याद करेंगे। लेकिन यहीं भारतीय दर्शन एक विचित्र विरोधाभास खड़ा करता है। हमारे संतों, योगियों और मनीषियों ने कहा कि अपने संचित विचारों और स्मृतियों से मुक्त होना ही मुक्ति है। तो क्या हम अपनी स्मृतियों से मुक्त होना चाहते हैं या अपने उस ‘मैं’ से, जो स्मृतियों से बना है? क्या विचार और जीवन एक ही चीज़ हैं? क्या स्मृति से मुक्ति वास्तव में जीवन से मुक्ति है?

इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं है। क्योंकि यादें जानलेवा भी हैं और पोषक भी। वे हमें वर्तमान के संकट और भविष्य के भय से कुछ देर के लिए बाहर निकालती हैं। वे एक exit gate हैं—जहाँ से हम थोड़ी देर पीछे जा सकते हैं और फिर आगे की ओर देख सकते हैं। शायद इसीलिए हमें पत्रों से प्रेम है। गंध से प्रेम है। पुराने गीतों से प्रेम है। तस्वीरों से प्रेम है। उन फ़िल्मों से प्रेम है जिन्हें हम बार-बार देखते हैं। उन स्वरों और दृश्यों से प्रेम है जो अब हमारे जीवन में नहीं हैं। हमें उन चीज़ों से प्रेम है जो खो चुकी हैं और उन चीजों से भी जो खो रही हैं।

अगर अतीत इतना ही ख़राब होता तो हम बार-बार उसकी तरफ़ लौटते क्यों? क्यों अपनी पुरानी तस्वीरें देखते? क्यों किसी पुराने गीत को सुनते ही किसी बीते हुए समय में पहुँच जाते? क्यों कोई गंध अचानक वर्षों पुराना दृश्य हमारे सामने ला खड़ा करती है? क्योंकि शायद अतीत में हम सिर्फ़ समय को नहीं खोजते। हम अपने उस रूप को खोजते हैं जो अब कहीं नहीं है।

मैंने अब तक कोई कविता ऐसी नहीं लिखी जिसमें भविष्य का ज़िक्र हो। मेरी सारी कविताएँ स्मृतियों से उपजी हैं। कोई समय रहा होगा जिसे मैं याद करता हूँ। उस समय में कोई शख़्स रहा होगा, जिसे मैंने प्रेम किया होगा या जिससे घृणा की होगी। कविता शायद उसी समय में लौटने का एक रास्ता है। यह सिर्फ़ व्यक्तिगत स्मृति नहीं है। इसका एक सामूहिक रूप भी है।

साल 2026 में हम तस्वीरों के जरिए 1980 के दशक में क्यों लौटना चाहते हैं? 80 के दशक की पॉप-संस्कृति—बड़े हेयरस्टाइल, नियॉन-ब्राइट और वार्म कलर्स, एनालॉग टेक्सचर, बेलबॉटम, रंग-बिरंगी बुशर्ट और मोटे फ़्रेम का चश्मा—हमें आज भी क्यों लुभाते हैं? जिस चीज को उसके समय में देखकर हमें थोड़ी शर्म आती थी, आज उसी को हम स्टाइल और सौंदर्य की तरह क्यों वापस ला रहे हैं? और जब हमारे पास भविष्य की अनंत तकनीकी संभावनाएँ हैं, तब हम एआई को रेट्रो ट्रेंड के प्रॉम्प्ट देकर बार-बार 80 के दशक में क्यों भेज रहे हैं? शायद इसलिए कि तकनीक हमें भविष्य दे सकती है, लेकिन स्मृति हमें वह दुनिया देती है जिसमें हम कभी रह चुके हैं।

भविष्य में संभावनाएँ हैं। अतीत में प्रमाण हैं।

शायद इसी वजह से मनुष्य वहाँ होता ही नहीं है, जहाँ वह है। उसका शरीर वर्तमान में होता है, लेकिन उसका मन एक साथ कई समयों में रहता है। वह उस जगह भी रहता है जहाँ कभी रहा था।

दरअस्ल, हम मनुष्य अपने अतीत के निशान हैं—गुज़र चुके जीवन के अवशेष। अतीत हमें वहाँ दुबारा पहुँचने की मोहलत देता है, जहाँ हम कभी जी चुके हैं। वह जगह भले ही लौटकर न मिले, लेकिन उसकी स्मृति मिल जाती है। भविष्य के पास ऐसा कोई आश्वासन नहीं।

भविष्य एक संभावना है। अतीत एक अनुभव।

मनुष्य शायद हमेशा उस चीज़ की तरफ़ अधिक आश्वस्त होकर लौटता है, जिसके बारे में वह कह सकता है—हाँ, मैं वहाँ था। भविष्य के बारे में हम कितना भी सोच लें, उसकी अंतिम निश्चितता शायद सिर्फ़ इतनी है—हम बूढ़े होंगे और एक दिन मर जाएँगे।

हिंदी दिवस 2026: हिंदी नहीं रही अब पहले जैसी, फिर भी दुनिया में बढ़ता जा रहा इसका दबदबा

हिंदी दिवस 2026: हिंदी नहीं रही अब पहले जैसी, फिर भी दुनिया में बढ़ता जा रहा इसका दबदबा

Hindi Diwas 2026

Hindi Diwas 2026

14 सितंबर 2026 को हिन्दी दिवस मनाया जाएगा। वर्तमान में भले ही हिंदी के हाल अच्‍छे नहीं है। बोलचाल की भाषा में हिन्दी में ऊर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी के शब्दों की अधिकता होने लगी है। हिंदी के अखबार और किताबों में भी अब वैसी हिंदी नहीं रही जैसी होना चाहिए थी। इसमें अंग्रेजी के शब्दों की भरमार हो चली है। हिंदी के अंग्रेजी और ऊर्दू होते जाने के दौर में भी हिंदी का बाजार पहले की अपेक्षा बढ़ने लगा है। कुछ लोगों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में लोग हिंदी बोलना छोड़ देंगे। हकीकत इसके बिल्कुल उलट है- आज वैश्विक और डिजिटल स्तर पर हिंदी का विस्तार तेजी से हो रहा है। 

ALSO READ: Hindi diwas 2023 : हिंदी को बढ़ावा देने के लिये हम सब क्या करें?

हिंदी के अस्तित्व और विस्तार के 4 बड़े प्रमाण

डिजिटल और इंटरनेट क्रांति:

  1. आज इंटरनेट, सोशल मीडिया और ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी कंटेंट की मांग में अभूतपूर्व उछाल आया है।
  2. एआई (AI) और सर्च इंजन में हिंदी भाषा की उपस्थिति मजबूत हुई है; विश्व हिंदी दिवस 2026 की थीम भी “पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक” इसी बदलाव को दर्शाती है।

ALSO READ: संस्कृत दिवस: संस्कृतनिष्ठ हिंदी है भारतीयों की संपर्क भाषा, प्रांतवादी सोच से क्या बढ़ेगा अंग्रेजी का वर्चस्व?

ग्लोबल रीच और यूजर बेस:

दुनिया भर में हिंदी 60 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में शामिल है।

विश्व की कई वैश्विक टेक कंपनियां (Google, Meta, Microsoft) हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के यूजर्स को ध्यान में रखकर अपने उत्पाद और सेवाएं तैयार कर रही हैं।

ALSO READ: हिन्दी भाषा के 10 दुश्मन, जानिए कौन…

भाषा का बदलता रूप ('हिंग्लिश' बनाम 'अस्तित्व'):

लोगों को लगता है कि “हिंदी नहीं रही अब हिंदी”, क्योंकि बोलचाल में अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण (हिंग्लिश) बढ़ा है।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार, शब्दों का आदान-प्रदान किसी भाषा के खत्म होने का नहीं, बल्कि उसके जीवंत और अनुकूलनीय (adaptive) होने का संकेत है।

 

आर्थिक और व्यावसायिक महत्व:

विज्ञापन, बॉलीवुड/सिनेमा, डिजिटल मीडिया और ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए हिंदी और भारतीय भाषाएं सबसे बड़ा बाजार बन चुकी हैं। हालांकि इन माध्यमों में हिंदी के बीच अंग्रेजी का ज्यादा उपयोग किया जाता है जिसके चलते हिंदी को संघर्ष करना पड़ रहा है।

ALSO READ: हिन्दी भाषा के 10 दुश्मन, जानिए कौन…

चुनौतियां और जिम्मेदारियां

हालांकि हिंदी खत्म नहीं हो रही है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां जरूर हैं:

रोजगार और उच्च शिक्षा: तकनीकी शिक्षा, मेडिकल और उच्च न्यायपालिका में अभी भी अंग्रेजी का दबदबा है, जिसे बदलने की दिशा में प्रयास (जैसे एनईपी 2020) जारी हैं।

शुद्धता का क्षरण: अति-आधुनिकता के चक्कर में अपनी लिपि (देवनागरी) और मूल शब्दावली की उपेक्षा न हो, इसके लिए नई पीढ़ी को साहित्य और सही लेखन से जोड़ना जरूरी है।

 

सत्य, प्रेम, करुणा से लेकर राम हरि और जयजगत तक विनोबा भावे का सर्वोदय दर्शन!

सत्य, प्रेम, करुणा से लेकर राम हरि और जयजगत तक विनोबा भावे का सर्वोदय दर्शन!

Vinoba Bhave 131st Birth Anniversary

Vinoba Bhave 131st Birth Anniversary: आज ग्यारह सितंबर को संत विनोबा भावे का 131वां जन्मदिवस है। युवा विनोबा भावे के मन में हिमालय में जाने का भाव उठा पर शीघ्र ही विनोबा के कदम हिमालय के बजाय महात्मा गांधी के पास या सानिध्य में जाने की दिशा में चल पड़े और इस तरह विनोबा जी महात्मा गांधी के पास पहुंच गए। गांधी जी ने विनोबा भावे को पहला सत्याग्रही कहा ही नहीं घोषित भी किया। विनोबा ने तीन शब्दों में मनुष्य जीवन सूत्र का सार बताया “सत्य, प्रेम, करुणा।”

 

विनोबा सूत्र में संवाद करते थे। जिसका सुनने समझने वाले अपने अपने तरीके से अर्थ और भाष्य करते थे। पर विनोबा के सूत्र कालजयी एवं स्पष्ट हैं। 1974 में भारत में आपातकाल लगने से पहले ही विनोबा जी मौन ले चुके थे। विनोबा का मौन देश-दुनिया को आत्मचिंतन का स्पष्ट संदेश देता था, आपातकाल में विनोबा से पूछा गया कि क्या संदेश है तो विनोबा ने एक शब्द लिखा अनुशासन पर्व! आपातकाल के सन्नाटे में अनुशासन पर्व की गूंज समूची दुनिया में गूंजती रही। विनोबा के मौन की मुखरता की अभिव्यक्ति शब्दों की ध्वनि से से ज्यादा बोध्यगम्य रही। विनोबा की बौद्धिक क्षमता की सहजता और सरलता का जीवंत शब्द कर्म 'गीताई' के रूप में आज भी लोकसमाज को सत्य प्रेम और विश्वास को आत्मसात करने की असीम ऊर्जा देता है।

 

महाराष्ट्र की बिना पढ़ी-लिखी पर भक्ति ज्ञान और श्रद्धा-विश्वास से ओतप्रोत गुणवान मातृशक्ति को सहज सरल स्वरूप में 'गीताई' मिली। जगत के स्वरूप को जानने की जिज्ञासुओं को 'गीताई' के रूप में साकार रूप में सरल समाधान मिला। 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान नागपुर केन्द्रीय जेल में विनोबा जी ने गीता पर प्रवचन दिए थे, जिसे साने गुरुजी ने लिपिबद्ध किया था जो आज भी देश दुनिया में पढ़ा जाता है।

 

जय जगत की उद्धोषणा का सहज सरल सूत्र देने वाले संत विनोबा अपने विचारों या जीवन दर्शन को सत्य, प्रेम और करुणा के त्रिवेणी संगम के माध्यम से व्यक्त करते रहे। विनायक नरहरि भावे से प्रारंभ हुए विनोबा के हस्ताक्षर 'बाबा' के स्वरूप तक आकर 'राम हरि' में परिवर्तित हो गए। विनोबा जी द्वारा दिया जयजगत शब्द समूचे जगत में व्याप्त हो गया। व्यक्ति नहीं जगत की जय ही जीवन का सार है।

 

संत विनोबा भावे ने अपने जीवन काल में सभी धर्मों के ग्रंथों का अध्ययन मनन और चिन्तन कर हम सब को सभी धर्मों का सार निकाल कर सबके सामने रखा और सभी ने उस सार सहजता और सरलता के साथ स्वीकार किया। विनोबा भावे ने मन और तन के समन्वय के साथ आजीवन लोकसागर से प्रत्यक्ष साक्षात्कार एवं प्रत्यक्ष संवाद करते हुए समूचे देश में पैदल यात्रा करते हुए सतत् संवाद का अद्भुत प्रयोग कर, पैदल लोक यात्री के रूप में बारह साल तक सतत् गतिशील रहकर यात्रा संपन्न की।

 

हर दिन नई जमीन हर समय नया आसमान। भारत भूमि के लोकमानस में दान की गहरी समझ और परम्परा मौजूद है इस सूत्र को सामने रखकर विनोबा जी ने भूदान, ग्राम दान से लेकर जीवन दान के विचार को जमीन पर साकार कर समूची मानव सभ्यता को आजाद भारत में एक दूसरे के साथ मिलकर रहने और मिल-जुलकर ज़ीने का मार्ग अपनी जीवन यात्रा और कृतित्व से समझाया।

 

चंबल घाटी के बागी भाइयों के मन में संत विनोबा भावे ने बागी जीवन को त्याग कर सामान्य मनुष्य की तरह जीवन जीने का भाव जागृत कर बागी भाई सामान्य रूप से जीने की राह के राहगीर बने और सत्य प्रेम करुणा को बचे हुए जीवन का सूत्र बना दिया। विनोबा भावे ने सर्वोदय दर्शन को समग्रता से समझने की राह चुनी। सर्वोदय पात्र की परिकल्पना को साकार स्वरूप प्रदान किया।

 

सबै भूमि गोपाल की सब सम्पत्ति भगवान की के शाश्वत जीवन दर्शन को समग्रता से समझने की दृष्टि विकसित की। जीवन का कार्य सम्पूर्ण हो गया तो बिनोबाजी सहजता से शून्य में विलीन हो गये। अपने जीवन के आखरी पड़ाव में विनोबा जी ने नये प्रयोग किए जैसे शून्य में प्रवेश, क्षेत्र संन्यास। विनोबा ने अपने सभी साथियों एवं लोगों को एक दूसरे से आपस में नाहक मिलने जुलने का सिलसिला अपने निजी एवं सार्वजनिक जीवन में बनाए रखने का रास्ता सुझाया।

 

हम सब एक दूसरे से कोई काम होता है तभी मिलते-जुलते हैं विनोबा जी ने यह सुझाया कि हम नाहक मिलने जुलने की संस्कृति को बढ़ावा देंगे तो हमें स्वतंत्र सहजीवन का आनंद जीवन भर लगातार बिना रुके और विशेष प्रयास के मिलता रहेगा। विनोबा भावे से मिलकर असीम आनन्द और शान्ति की अनुभूति होती थी। विनोबा जी ने देश और दुनिया की भाषाओं को सीखने का सिलसिला आजीवन जारी रखा। अंतिम समय में वे जापानी सीख रहे थे।

 

भारतीय भाषाओं को समझने में लोगों को सहजता और सरलता हो इसलिए विनोबा जी ने सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखने का न केवल सुझाव दिया वरन कई पत्र-पत्रिकाओं को देवनागरी लिपि में प्रकाशित करने की शुरुआत भी की और करवाईं। विनोबा जी का जीवन प्रकृति की प्रतिकृति की तरह ही आरंभ से अंत तक बना रहा। हर दिन प्रवाहमान और सरलता से परिपूर्ण संत विनोबा जी का जन्मदिन पर सादर स्मरण, जयजगत।

रोजाना अपनाएं ये 10 जादुई आदतें, बीमारियों से रहेंगे कोसों दूर और चेहरे पर आएगा गजब का ग्लो

रोजाना अपनाएं ये 10 जादुई आदतें, बीमारियों से रहेंगे कोसों दूर और चेहरे पर आएगा गजब का ग्लो

health tips

भागदौड़ भरी आधुनिक जिंदगी में खुद को सेहतमंद और ऊर्जावान बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। हम अक्सर अपनी व्यस्त दिनचर्या में छोटी-छोटी मगर बेहद महत्वपूर्ण आदतों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे धीरे-धीरे शरीर में थकान, मानसिक तनाव और बीमारियों का खतरा बढ़ने लगता है। 

 

अगर आप भी अपनी लाइफस्टाइल में बड़ा बदलाव लाए बिना, केवल कुछ आसान आदतों को सुधारकर एक खुशहाल और रोगमुक्त जीवन जीना चाहते हैं, तो ये 10 सुनहरे नियम आपकी जिंदगी को पूरी तरह बदल सकते हैं। आइए जानते हैं कि रोजमर्रा के जीवन में कौन-से बदलाव आपको लंबे समय तक फिट रख सकते हैं:

ALSO READ: आसमान से बरसेगा सेहत या संकट? जानिए बारिश का पानी पीने का सच!

1. थाली को बनाएं रंग-बिरंगा (संतुलित और पोषण युक्त आहार)

अपनी दैनिक खुराक में प्र प्रचुर मात्रा में ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, अंकुरित अनाज और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करें। जितना हो सके प्रसंस्कृत (प्रोसेस्ड) भोजन और जंक फूड से दूरी बनाएं, क्योंकि आपकी सेहत का सीधा रास्ता आपकी थाली से होकर गुजरता है।

 

2. 30 मिनट का वर्कआउट रूल (नियमित शारीरिक गतिविधि)

दिनभर में कम से कम आधा घंटा अपने शरीर को सक्रिय रखने के लिए जरूर निकालें। इसके लिए आपको रोज जिम जाने की ही जरूरत नहीं है; आप तेज चाल में टहलना (ब्रिस्क वॉक), एरोबिक्स या कोई पसंदीदा खेल खेलकर भी शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बना सकते हैं।

 

3. 7 से 8 घंटे की गहरी नींद (शरीर का नेचुरल रिपेयर मोड)

जिस तरह मोबाइल को चार्जिंग की जरूरत होती है, उसी तरह हमारे मस्तिष्क और अंगों को री-सेट होने के लिए गुणवत्तापूर्ण नींद की आवश्यकता होती है। रोजाना 7-8 घंटे की निर्बाध नींद लेने से मानसिक थकान दूर होती है और इम्यूनिटी भी बूस्ट होती है।

ALSO READ: आंखों को सेहतमंद बनाए रखने के लिए 5 नुस्खे

4. बॉडी को रखें फुल्ली हाइड्रेटेड (भरपूर पानी का सेवन)

पानी हमारे शरीर के विषाक्त पदार्थों (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालने का सबसे बेहतरीन जरिया है। दिनभर में कम से कम 8 से 10 गिलास पानी पीने से न सिर्फ पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है, बल्कि त्वचा पर प्राकृतिक निखार भी बना रहता है।

 

5. मेंटल वेलनेस पर दें ध्यान (ध्यान और प्राणायाम)

शारीरिक सेहत के साथ-साथ मानसिक शांति भी बेहद जरूरी है। दिन की शुरुआत में केवल 10-15 मिनट का ध्यान (मेडीटेशन) और अनुलोम-विलोम जैसे प्राणायाम करने से तनाव का स्तर तेजी से कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है।

 

6. बुरी लत को कहें बाय-बाय (नशे से पूरी दूरी)

तंबाकू, धूम्रपान और अत्यधिक शराब के सेवन से दूरी बनाए रखें। ये आदतें न केवल आपके फेफड़ों और लिवर को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि असमय बुढ़ापे और कई गंभीर बीमारियों का मुख्य कारण भी बनती हैं।

 

7. फिटनेस में लाएं वेरायटी (वर्कआउट रूटीन बदलें)

एक ही तरह की कसरत से शरीर और मन दोनों ऊब जाते हैं। अपने रूटीन को मजेदार बनाने के लिए इसमें योग, स्विमिंग, साइक्लिंग या डांस को बारी-बारी से शामिल करें। इससे शरीर के सभी हिस्सों का सही व्यायाम होता है।

 

8. पॉजिटिव और हेल्दी सोशल सर्कल (सकारात्मक लोगों का साथ)

आप जिन लोगों के साथ समय बिताते हैं, उनकी ऊर्जा का आपकी मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे दोस्तों और सहकर्मियों के साथ रहें जो आपको फिटनेस के प्रति प्रोत्साहित करें और जिंदगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा दें।

 

9. अपनी सोच को बनाएं सकारात्मक (पॉजिटिव एटीट्यूड)

हर परिस्थिति में सकारात्मक नजरिया बनाए रखना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। आभार व्यक्त करने की आदत डालें (ग्रैटिट्यूड) और नकारात्मक विचारों को खुद पर हावी न होने दें।

 

10. प्रकृति और आयुर्वेद का लें सहारा (नेचुरल हीलिंग)

अपनी दिनचर्या में ग्रीन टी, हर्बल काढ़ा, तुलसी, आंवला और एलोवेरा जैसे प्राकृतिक व आयुर्वेदिक उपायों को शामिल करें। ये घरेलू नुस्खे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को कुदरती रूप से मजबूत बनाते हैं।

डॉ अंजना चक्रपाणि मिश्र की दो नवीन कृतियों ‘मन अनहद नाद’ और ‘अनकहे से संवाद’ का भव्य विमोचन

डॉ अंजना चक्रपाणि मिश्र की दो नवीन कृतियों 'मन अनहद नाद' और 'अनकहे से संवाद' का भव्य विमोचन

Dr. Anjana Chakrapani Mishra

प्रतिष्ठित संस्था वामा साहित्य मंच ('शब्द शक्ति की संवाहक') के तत्वावधान में एक गरिमामयी साहित्यिक समारोह का आयोजन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ० अंजना चक्रपाणि मिश्र की दो नवीन कृतियों— काव्य संग्रह 'मन अनहद नाद' और आलेख संग्रह 'अनकहे से संवाद' का भव्य एवं शुचित विमोचन किया गया।

 

सांस्कृतिक एवं औपचारिक शुभारंभ

मंगलाचरण: कार्यक्रम का शुभारंभ लेखिका की नातिन अलाइना द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना तथा लब्धप्रतिष्ठ गायिका आकांक्षा जाचक शेट्टी द्वारा अपनी मधुर स्वर-लहरी में गाई गई सरस्वती वंदना से हुआ, जिसने संपूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

 

स्वागत वक्तव्य: वामा साहित्य मंच की अध्यक्षा ज्योति जैन ने शब्द-पुष्पों से अतिथियों, साहित्यकारों एवं सुधी पाठकों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि लेखिका तत्सम प्रधान भाषा का सहज प्रयोग करते हुए समाज की विसंगतियों को प्रखरता से उजागर करती हैं। समाज में बिखरे शब्दों को एक माला में पिरोने का यह प्रयास सराहनीय है और दोनों ही पुस्तकें अत्यंत उत्कृष्ट हैं।

 

पारिवारिक अनुभूतियां (पारिवारिक पाती)

कनिष्क मिश्र: उन्होंने कहा कि मां भले ही अत्यंत संस्कृतनिष्ठ शब्दों का चयन करती हैं, किंतु उनका सुनना और समझना अत्यंत सहज एवं सुंदर है; वही उनके मन का वास्तविक अनहद नाद है।

निष्ठा मिश्र: इस दिन को विशेष बताते हुए उन्होंने कहा कि मां की रचनाएं भले ही पठन में गंभीर एवं कठिन लगें, परंतु वे उनके निरंतर प्रयास, जूनून, अनुभव और प्रेरणा का उत्सव हैं। यह उपलब्धि उनकी लेखनी की सुखद शुरुआत मात्र है।

 

लेखिका का वक्तव्य एवं काव्य प्रस्तुति

मंचासीन अतिथियों एवं उपस्थित प्रबुद्धजनों का अभिवादन करते हुए लेखिका डॉ० अंजना चक्रपाणि मिश्र ने कहा:

“मेरी पुस्तकें मेरा दर्पण हैं, जो आपको मुझसे आत्मीय रूप से रूबरू कराएंगी। मैं दूसरों के सुख-दुख को स्वयं में महसूस करके लिखती हूं। मेरे पिता जी आयुर्वेदाचार्य थे और उनकी प्रेरणा व साधारण परिवेश में पली मेरी मां प्रसूति रोग विशेषज्ञ बनीं, जिनसे मुझे सदैव संबल मिला। इस पूरी यात्रा में मेरे पति, पुत्र और पुत्री हमेशा मेरे सहयोगी रहे हैं।”

इसके उपरांत उन्होंने अपने गीत “रजत राग— चंदनियां गुनगुना रही है…” की भावपूर्ण प्रस्तुति देकर संपूर्ण सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया।

 

कृतियों पर सारगर्भित एवं गहन समीक्षा

डॉ० गरिमा संजय दुबे (प्रोफेसर एवं वरिष्ठ साहित्यकार):

लेखन की शैली: पद्य और गद्य— दोनों ही विधाओं पर समान अधिकार के साथ न्याय करना अत्यंत कठिन कार्य है। ये पुस्तकें एक-दूसरे की पूरक और संवादों का जीवंत प्रतिबिंब हैं।

'मन अनहद नाद' (काव्य संग्रह): इसकी कविताएं स्वयं के मन की तलाश करते हुए पाठक को दूसरों के मन की यात्रा कराती हैं। इसमें स्त्रीभाव, राधा-कृष्ण का प्रेम और आध्यात्मिक दर्शन का अद्भुत समावेश है। इसमें रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) जैसे उपेक्षित विषय पर भी संवेदनशीलता से लिखा गया है कि यह थकान का नहीं, बल्कि मुक्ति का समय है।

'अनकहे से संवाद' (आलेख संग्रह): यह लालित्यपूर्ण शैली में लिखे आलेखों का सुंदर संकलन है। इसमें संस्कृत भाषा, लोक परंपरा, बनारस की आध्यात्मिकता और आधुनिकता का सुंदर समन्वय है। 'नीला लिफाफा', कबीर चौरा और मणिकर्णिका घाट पर लिखे गए आलेख अत्यंत प्रभावकारी बन पड़े हैं।

श्रीमती शैलबाला मार्टिन पाठक (पूर्व आईएएस एवं पूर्व सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग – विशिष्ट अतिथि):

उन्होंने लेखिका को प्रेम, वात्सल्य और परंपरा व आधुनिकता का सुंदर संगम बताया। उन्होंने कहा कि लेखिका की कविताएं अंतर्मन की सहज अभिव्यक्ति हैं, जो पाठक को गहराई से सोचने पर मजबूर करती हैं। इसके बाद उन्होंने 'संवेदना' और 'बनारस की गलियां' कविताओं का वाचन भी किया।

आकांक्षा जाचक शेट्टी: उन्होंने लेखिका को विलक्षण प्रतिभा का धनी बताते हुए डॉ० अंजना चक्रपाणि द्वारा रचित 'चेती गीत' की सुमधुर प्रस्तुति दी।

 

मुख्य अतिथि का संबोधन एवं परामर्श

श्री पंकज सुबीर (प्रख्यात साहित्यकार एवं सारथी, शिवना प्रकाशन):

सराहना: उन्होंने दोनों कृतियों की तुलना बेटियों से की और कहा कि गद्य व पद्य का यह संकलन चौंकाता है। 'रजोनिवृत्ति' और 'स्त्री बोलने पर' जैसे अनछुए विषयों पर लिखना एक साहसिक और आवश्यक कदम है। उन्होंने 'ईश्वर जैसा' तथा 'पिता' कविताओं का मंच से वाचन करते हुए कहा कि “स्त्री का लिखना हमारे समय की वास्तविक उपलब्धि है।”

 

सुझाव: उन्होंने भाषा के संदर्भ में कबीर का उदाहरण देते हुए कहा कि “भाषा बहता नीर होनी चाहिए।” आगे के युवा पाठकों से जुड़ने के लिए भाषा को और अधिक सरल बनाया जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने पुस्तक के शीर्षक चयन में सावधानी रखने तथा भावी कविता संग्रहों को अलग-अलग खंडों में विभाजित करने का व्यावहारिक परामर्श दिया।

 

अन्य गणमान्य जनों के उद्गार एवं संचालन

पद्मा राजेंद्र (संस्थापक अध्यक्ष, वामा साहित्य मंच): उन्होंने इस आयोजन को अत्यंत गर्व और प्रसन्नता का क्षण बताया तथा लेखिका को एक संवेदनशील, कोमल हृदया और आत्मीय सखी के रूप में रेखांकित किया।

मंच संचालन: सम्पूर्ण कार्यक्रम का गरिमापूर्ण एवं कुशल संचालन वरिष्ठ कवयित्री प्रीति दुबे द्वारा किया गया।

अतिथि स्वागत व आभार: कार्यक्रम के दौरान चक्रपाणि दत्त मिश्र, राकेश पाठक, कनिष्क मिश्र, अमर कौर चड्ढा, निष्ठा मिश्र एवं इंदू मिश्र का भावभीना स्वागत किया गया। अंत में चक्रपाणि दत्त मिश्र ने उपस्थित सभी साहित्य-अनुरागियों, प्रबुद्धजनों एवं अतिथियों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया।

राष्ट्र निर्माता शिक्षक का सम्मान एक ही दिन क्यों?

राष्ट्र निर्माता शिक्षक का सम्मान एक ही दिन क्यों?

Why honor the nation-building teacher on just one day

शिक्षक दिवस राष्ट्र निर्माता शिक्षकों के नमन का दिन है जो ज्ञान की रोशनी से विद्यार्थियों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। जो अपने विद्यार्थियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए निस्वार्थ भाव से अपना वर्तमान समर्पित कर देते हैं। वे जो वर्तमान पीढ़ी के व्यक्तित्व को परिष्कृत कर राष्ट्र के भविष्य को स्वर्णिम बनाते हैं।

वे शिक्षक जो जीवन संग्राम मैॅ आने वाली चुनौतियों का सामना करने की सामर्थ्य अपने विद्यार्थियों में सृजित करते हैं। इन्हीं शिक्षकों की गरिमा और यश  को गौरान्वित करने का दिवस है शिक्षक दिवस।

शिक्षकों के श्रेष्ठतम कार्यों का मूल्यांकन कर उन्हें सार्वजनिक रूप से  अलंकृत करने का संकल्प दिवस है शिक्षक दिवस। निसंदेह किसी भी राष्ट्र के विकास की नींव राष्ट्र निर्माता शिक्षक ही होते हैं। इसीलिए भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षकों को परमेश्वर से भी पहले सम्मान दिया गया है क्योंकि शिक्षक अपने विद्यार्थियों के हृदय में शुभ संस्कारों के सर्जक के नाते ब्रह्मा हैं। उनके रक्षण वर्धन के नाते विष्णु और अशुभ संस्कारों,  अन्तरविकारों को नष्ट करने के कारण शिव है अर्थात ब्रह्मा विष्णु और महेश के समन्वित स्वरूप का दूसरा नाम ही गुरु है। जिस प्रकार कुम्हार बाहर से घड़े को ठोकता पीटता है तथा भीतर से हाथ का सहारा देकर खोट निकालकर लोकोपयोगी घट का निर्माण करता है। उसी प्रकार आदर्श शिक्षक भीतर से अपनी सहानुभूति का सहारा देता हुआ ऊपर से  आवश्यकतानुसार चोट मारकर गढ गढ कर  अपने शिष्य का शुभ निर्माण करता है।

कबीरदासजी कहते हैं “गुरु कुम्हार सिख कुंभ है, गढि गढ़ि काढै खोट। अंतर हाथ सहारे दै, बाहर- बाहर चोट।” ऐसे सुनिर्मित विद्यार्थी ही राष्ट्र के भावी कर्णधार और होते हैं। यदि शिक्षक अपने छात्रों का निर्माण ठीक से न करें तो उसकी गलती राष्ट्र के भविष्य में झलकती है। महर्षि अरविंद कहते हैं कि अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुरमाली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच सींच कर महाप्राण शक्तियां बनाते हैं। इसलिए विद्यार्थियों को भी यह समझ लेना चाहिए की “यह तन विष की बैलरी गुरु अमरित की खान, सीस दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान।

   
डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन महान दार्शनिक, शिक्षक और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति थे। इन्होंने कबीरदास की भांति शिक्षकों की महिमा को मंडित करने के लिए अपने प्रशंसकों द्वारा उनका जन्मदिवस  सार्वजनिक रूप से मनाने के आग्रह पर अपना जन्मदिवस शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया और 1962 से प्रति वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा। 

       
किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण  विकास में शिक्षकों की भूमिका  अप्रतिम होती है जैसा कि चाणक्य कहते हैं कि ' शिक्षक कभी साधारण नहीं होता प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।' डॉ. राधाकृष्णन का मत है कि शिक्षक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बौद्धिक परंपराएं और तकनीकी कौशल पहुंचाने का केंद्र है। हेनरी ब्रुक्स एडम्स कहते हैं कि 'एक शिक्षक अनंत काल को प्रभावित करता है,वह कभी नहीं बता सकता कि उसका प्रभाव कहां रुकता है।'

डॉ.भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव, अधिकार प्राप्ति और मुक्ति का सबसे शक्तिशाली साधन माना। उनकी दृष्टि में शिक्षक राष्ट्र रूपी रथ का सारथी है नौकरी करने वाला मास्टर नहीं। शिक्षा केवल किताबों से ही नहीं मिलती, वह शिक्षक के आचरण और व्यवहार से भी मिलती है। इसलिए शिक्षक में करुणा, समता और बंधुता का भाव होना चाहिए। वह प्रज्ञावान शीलवान और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाला योग्य शिक्षक होना चाहिए। 

             
जिस धरा पर कबीर ने गुरु की महिमा को गोविंद से  पहले ये कह कर मंडित किया कि 'हरि रूठै गुरु ठौर है, गुरु रूठै नहीं ठौर, उसी धरा पर क्या शिक्षकों की गरिमा का सम्मान सिर्फ एक दिन होना चाहिए? क्या ये संभव नहीं है कि शिक्षक जो न केवल राष्ट्र निर्माता चरित्र निर्माता हैं उसकी महिमा का सम्मान निरंतर करें क्योंकि राष्ट्र का निर्माण सिर्फ एक दिन में नहीं होता है, वरन उसके लिए अनवरत साधना होती है और शिक्षक भी किसी एक दिन में ही अपने विद्यार्थियों को संपूर्ण नहीं बना देते, वरन वे प्रतिदिन इस दिशा में समर्पण भाव से क्रियाशील रहते हैं। अतः ऐसे आदर्श शिक्षक ही वर्ष में सिर्फ एक दिन नहीं वरन प्रतिदिन प्रतिपल प्रतिक्षण  सम्मान के पात्र होते हैं।

 

भारत की सांस्कृतिक चेतना में शिक्षा और समाज का शाश्वत संबंध रहा है। सभ्यता के प्रारंभ से ही वैविध्यपूर्ण भारतीय समाज में वेदों उपनिषदों पुराणों के जीवन दर्शन और धर्म की शिक्षा पर स्पष्ट छाप रही है । नालंदा,तक्षशिला, विक्रमशिला  भारतीय शिक्षा पद्धति के गौरवशाली बौद्धिक स्मारक हैं। गुरु और शिष्य का आदर्शात्मक संबंध अलौकिक था।नगर के कोलाहल से दूर गुरुकुल व्यवस्था में संघर्षों से मुक्त बौद्धिक शक्ति, चरित्र बल और आध्यात्मिक चेतना से संपन्न हो कर सांसारिक जीवन में उनका प्रवेश अर्थ धर्म काम और मोक्ष के पुरुषार्थ की सिद्धि में सहायक होकर पूर्ण मनुष्य का निर्माण करने वाली थी।

किन्तु मध्यकालीन भारतीय समाज में शिक्षा प्रदान करने के प्रमुख माध्यम मकतबा और मदरसे बने रहे जिसके कारण शिक्षा का क्षेत्र बहुत सीमित हो गया। इसके पश्चात आए अंग्रेजों ने  शिक्षा के रहे सहे अस्तित्व को भी विकृत कर दिया। अंग्रेज भारतीयों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा देने के पक्ष में नहीं थे। सन 1835 में मैकाले ने कहा कि हमें एक ऐसा वर्ग पैदा करना चाहिए जो हमारे और करोड़ों लोगों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिये का काम कर सके। ऐसे व्यक्तियों का वर्ग जो रंग और रक्त से भारतीय हो किन्तु  रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हों।  

             
आज़ादी के बाद देश में शिक्षा के बहु आयामी विकास के लिए अनेक स्तरों पर पहल की गई, किंतु मुख्य प्राथमिकता गुणात्मक शिक्षा के स्थान पर परिमाणात्मक विकास पर केंद्रित होने से शिक्षा का चरित्र उपनिवेशवादी  बना रहा।

आधुनिक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की आत्मा और भारतीयता की उद्घोषणा है। यह ऐसी प्रथम शिक्षा नीति है जो भारतीय व्यक्तियों के विचारों के अनुकूल है। हमारे होनहार बच्चों में ज्ञान विज्ञान के मूल स्रोत को जागृत करना इस नीति का मुख्य ध्येय है।यह अंग्रेजों की उस साजिश को भी समाप्त करने का कार्य करती है जिसमें उन्होने भाषा के आधार पर भारतीयों में हीन भावना पैदा करने का प्रयास किया था। यह नागरिक आकांक्षाओं का प्रतिबिंब और भविष्य के भारत की नींव है।

       
शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहने भर से राष्ट्र का निर्माण नहीं होता जब तक कि शिक्षक को अपने दायित्व निर्वहन में पूरी आज़ादी न दी जाए। शिक्षकों के सामाजिक आर्थिक  शैक्षणिक उत्थान के बिना राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। शिक्षक यदि तनाव से मुक्त आनन्द से युक्त और व्यर्थ की गुलामी से मुक्त है , राजनीति के विषैले वातावरण से ग्रस्त नहीं है,प्रशासन के अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त है, विद्यालय में प्रवेश के लिए संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता है, कोचिंग संस्थानों पर प्रतिबंध है, प्रेरणा और प्रोत्साहन का वातावरण है तभी वह शिक्षा को सही अर्थों में घटित कर सकता है। अन्यथा वह अपने शिक्षकीय दायित्व के साथ न्याय नहीं कर सकेगा।यह कटु सत्य है कि शिक्षक यदि भूखा है तो समझिए ज्ञान का सागर भी सूखा है।

           
मेरी दृष्टि में शिक्षकीय दायित्व बहुत पवित्र किन्तु कठिन है। गगन को चूमती हुई अट्टालिकाओं को निर्मित करना सरल है। उफनती नदी के वेग को नियंत्रित कर नहरें निर्मित करना भी  सरल है। चट्टानों के सीने चीर कर सड़कें बनाना भी सरल है, किंतु राष्ट्र के लिए एक आदर्श और उपयोगी पीढ़ी को निर्मित करना बहुत कठिन है।यह कठिन दायित्व हमारे प्रथम गुरु पूज्य माता और पिता के बाद शिक्षक निभा रहे हैं।


हमारे हाथों की उंगलियां एक जैसी नहीं होती। किसी तालाब में कुछ गंदी मछलियाँ हों तो वह पूरा तालाब गंदा नहीं हो जाता। शिक्षकीय समुदाय संख्या की दृष्टि से बहुत विशाल है। हो सकता है कि कुछ शिक्षक अपने निजी स्वार्थ के लिए राजनीति के विषैले माहौल में रहते हों। कुछ शिक्षक निष्ठा से अपने दायित्व का निर्वहन भी नहीं करते। समय पर विद्यालय नहीं आते। कुछ साधारण शिक्षक हैं जो पढ़ाते हैं। कुछ श्रेष्ठ शिक्षक हैं जो व्याख्या करते हैं और कुछ उत्कृष्ट शिक्षक भी हैं जो छात्रों के मन में सीखने की जिज्ञासा पैदा करते हैं ।अतः हम समग्र शिक्षक समुदाय को लांछित नहीं कर सकते। वे शिक्षक जो अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन हैं उनके विरुद्ध कार्रवाई के प्रावधानों से ठीक किया जा सकता है।

सोशल मीडिया, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के चमत्कारी  दौर में भी शिक्षक अनेक चुनौतियों और विषमताओं के बावजूद ज्ञान की रश्मियों से अपने विद्यार्थियों को आलोकित कर रहे हैं ।उनमें जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने का जीवट सृजित कर रहे हैं। उनके चिंतन के क्षितिज का विस्तार कर उनके विचारों के वैभव को निखार रहे हैं। तभी तो यह देश आगे बढ़ रहा है प्रगति कर रहा है। आज हमारे देश में विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर उपलब्धियों के जो नित नए आयाम स्थापित हो रहे हैं  उसकी बुनियाद में कहीं न कहीं हमारे शिक्षकों का समर्पण भी है। तो ऐसी स्थिति में शिक्षकों का सम्मान सिर्फ एक दिन ही क्यों। वर्ष के बाकी 364 दिन क्यों नहीं होना चाहिए।


हमारे देश में ऐसे आदर्श शिक्षकों की कमी नहीं है जिनका जीवन प्रेरणा और प्रोत्साहन का प्रकाश स्तम्भ है। 

एक विद्यालय तीन विद्यार्थी विलंब से पहुंचे, तब तक प्रार्थना समाप्त हो चुकी थी। स्कूल के प्राचार्य ने इन चारों को  स्कूल के मैदान में तीन चक्कर लगाने की सजा दी। तीनों विद्यार्थी प्राचार्य के आदेश के पालन में मैदान के चक्कर लगाना शुरू कर दिए। दो चक्कर लगाने के बाद उन्होंने देखा कि उनके पीछे पीछे प्राचार्य जिनकी उम्र लगभग पचपन वर्ष की रही होगीभी हांफते हुए दौड़ रहे हैं। छात्रों ने रुककर प्राचार्य से पूछा सर आप किस लिए दौड़ रहे हैं? तब प्राचार्य ने जो उत्तर दिया वह उनके आदर्श चरित्र की पराकाष्ठा है।

प्राचार्य ने कहा कि मेरी तमाम कोशिशों के बाद भी यदि मैं छात्रों को अनुशासन और समय की महत्ता नहीं समझा सका तो इसका अर्थ है कि मेरे प्रयासों में ही कहीं त्रुटि है। इसलिए जितनी गलती आपकी है उससे ज्यादा मेरी गलती है। चूंकि मुझे कोई सजा नहीं दे सकता इसलिए मैंने अपनी सजा खुद ही तय कर दी है और जब तक मैं इस स्कूल के विद्यार्थियों को समय का अनुशासन नहीं समझा पाऊंगा तब तक मैं भी उनके साथ मैदान के चक्कर लगाऊंगा। क्या ऐसे आदर्श शिक्षक के सम्मान में हमें श्रद्धावनत नहीं होना चाहिए।