
इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में सचमुच ऐसी राय बनी गई है!
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की ताजा भारत यात्रा के सिलसिले में यह उचित सवाल उठा है कि क्या अमेरिका अब भारत के साथ अपने संबंध में कूटनीतिक मर्यादा का पालन करने की जरूरत भी नहीं समझ रहा है। अरबपति अमेरिकी कारोबारी इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर ऐसी ही राय डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में बनी है। इसलिए रुबियो भारतीय कारोबारियों- खासकर रिलायंस ग्रुप के साथ व्यापारिक वार्ता के लिए सीधे मुंबई और जामनगर पहुंच रहे हैं।
इस यात्रा का कार्यक्रम बनने के बाद भारत स्थित अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने “उम्मीद” जताई कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर रुबियो से मिलने जाएंगे। बाद में खबर आई कि जयशंकर सचमुच मुंबई जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम है। यह दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन भारत जैसे ‘रणनीतिक सहयोगियों’ को जूनियर पार्टनर के रूप में देखता है और इस पर नरेंद्र मोदी सरकार को कोई एतराज नहीं है! रुबियो की यात्रा का मकसद अमेरिका में रिलायंस ग्रुप के रिफाइनरी लगाने की योजना को आगे बढ़ाना है। ट्रंप प्रशासन दुनिया भर से पूंजी और उत्पादक विशेषज्ञता को जुटाने के प्रयास में लगा है, ताकि अमेरिका में औद्योगिक ढांचा फिर से खड़ा हो सके।
इस क्रम में भारतीय पूंजीपतियों पर उसकी खास निगाह है, जो सहज ही इस योजना में भागीदार बनने को उतावले दिखे हैं। अंबानी, रुइया, अडानी जैसे भारतीय समूह अमेरिका में बड़े निवेश का इरादा दिखा चुके हैं। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए यह नई चुनौती है, जिसे खुद अभी अपने विकास के लिए बड़े पूंजी निवेश एवं कारोबारी महारत की जरूरत है। हैरतअंगेज है कि पूंजी निवेश की पलट गई इस दिशा पर ना तो भारत में कोई बहस है, और ना ही देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिहाज से इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। जबकि इस दौर में अमेरिका सहित तमाम देश पूंजी प्रवाह को निर्देशित कर रहे हैं। बहरहाल, सबसे दुखद यह संदेश है कि अमेरिका भारत सरकार की संप्रभु प्रतिष्ठा का भी अब ख्याल नहीं रख रहा है।

