
डिजिटल भुगतान (Digital Payments) को लेकर देश में एक बार फिर बड़ा मोड़ आ गया है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए होने वाले लेनदेन पर शुल्क (MDR) लगाने के प्रस्ताव का केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुरजोर बचाव किया है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि व्यापारियों या नागरिकों को कभी भी ऐसा कोई आधिकारिक आश्वासन नहीं दिया गया था कि यूपीआई पेमेंट हमेशा के लिए पूरी तरह मुफ्त रहेगा। ALSO READ: क्या UGC नियमों को लेकर बैकफुट पर आई सरकार? जानिए सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र ने क्या कहा
सरकार ने कोर्ट में क्या दलीलें दीं?
शीर्ष अदालत में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में केंद्र सरकार ने साफ किया कि एमडीआर (Merchant Discount Rate) का यह नया ढांचा देश के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को मजबूत करने और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। सरकार का मानना है कि यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है।
सरकार की ओर से यह भी साफ कर दिया गया कि पहले दी जाने वाली सब्सिडी कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं थी, बल्कि यह पूरी तरह सरकार के विवेक पर निर्भर थी। साथ ही, इस संशोधित ढांचे को लाने से पहले तमाम हितधारकों के साथ लंबी चर्चा की गई थी।
क्यों गरमाया है मामला?
यह पूरा विवाद वकील अंजन दत्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई एक जनहित याचिका (PIL) के बाद शुरू हुआ। याचिका में यूपीआई पर संशोधित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती देते हुए यह आरोप लगाया गया था कि यह नया प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(जी) (व्यापार और कारोबार की स्वतंत्रता) के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि अदालत इस मामले में आगे क्या रुख अपनाती है, क्योंकि इसका सीधा असर देश के करोड़ों व्यापारियों और डिजिटल लेन-देन करने वाले आम नागरिकों पर पड़ने वाला है।


