US Midterm Election Impact: अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को फायदा मिलेगा या बढ़ सकती हैं मुश्किलें?

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बीच आए इन नतीजों से अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन बदल गया है। अब संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी होगी जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बने रहेंगे। इस चुनावी नतीजे का असर सिर्फ अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के लिए भी इसके कई मायने हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार शुल्क, रूस से तेल खरीद, एच-1बी वीजा, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंधों और भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम को लेकर ट्रंप के बयानों के कारण तनाव देखने को मिला है।

ऐसे में सवाल है कि क्या कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में कुछ राहत मिलेगी? क्या भारतीय सामान पर अमेरिकी शुल्क घट सकते हैं? क्या भारतीय आईटी पेशेवरों को एच-1बी वीजा के मामले में राहत मिल सकती है? और क्या रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ेगा?

हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट ने अपने एक्सप्लेनर में विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक बताया है कि डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को बातचीत के लिए कुछ अतिरिक्त मौके मिल सकते हैं लेकिन इससे ट्रंप प्रशासन की नीतियां तुरंत बदल जाएंगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि व्यापार शुल्क और वीजा से जुड़े कई अहम फैसलों में राष्ट्रपति के पास अब भी व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं। आपको बता दें कि नई अमेरिकी कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज संभालेगी।

भारत के लिए क्यों अहम हैं अमेरिकी मध्यावधि चुनाव?

अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। भारतीय आईटी सेवाओं के लिए भी अमेरिकी बाजार बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और रक्षा तकनीक के मामले में दोनों देशों की साझेदारी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने का असर भारत के व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, आव्रजन और रक्षा सहयोग पर पड़ सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों में इस साल कई मुद्दों पर खींचतान रही है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय प्रोडक्ट्स पर टैरिफ लगाए। व्यापार समझौते पर बातचीत अटकी रही। अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बनाया। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने में मध्यस्थता की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ अमेरिका के बढ़ते संपर्क और एच-1बी वीजा से जुड़ी नई फीस ने भी भारत की चिंताएं बढ़ाई हैं। भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को मजबूत बनाए रखे लेकिन रूस जैसे देशों के साथ अपने स्वतंत्र विदेश नीति संबंधों को भी प्रभावित न होने दे।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर क्या पड़ेगा असर?

भारत के लिए सबसे तात्कालिक चिंता व्यापार शुल्क और लंबित व्यापार समझौता है। दोनों देशों ने फरवरी 2026 में एक व्यापार समझौते की रूपरेखा का ऐलान किया था। इसके तहत भारतीय प्रोडक्ट्स पर अमेरिकी शुल्क 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किए जाने की बात थी। इसके बदले भारत को अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कुछ खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने थे। लेकिन इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने स्थिति बदल दी। 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने व्यापक शुल्क लगाने के लिए जिस आपातकालीन शक्तियों से जुड़े कानून का इस्तेमाल किया था वह उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं देता।

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 फीसदी शुल्क की दर वास्तव में लागू ही नहीं हो पाई। इसके बाद अस्थायी रूप से 10 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाया गया और 24 जुलाई से ज्यादातर भारतीय उत्पादों पर सेक्शन 301 के तहत 10 फीसदी शुल्क लागू हुआ। इस बीच भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 29 अक्टूबर को कहा था कि अंतरिम समझौता अंतिम चरण में है और इससे भारतीय किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा होगी। हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है। भारत में किसान संगठनों को आशंका है कि समझौते के जरिए आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों के लिए भारतीय बाजार का रास्ता खुल सकता है।

क्या डेमोक्रेट्स भारत के लिए कम शुल्क की राह खोलेंगे?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत आने से भारत को तत्काल व्यापारिक राहत मिलने की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी भी पूरी तरह मुक्त व्यापार की समर्थक नहीं है। इसलिए उनकी जीत को भारतीय उत्पादों पर शुल्क घटने का संकेत नहीं माना जा सकता। हालांकि डेमोक्रेट्स भारत को चीन के मुकाबले एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानते हैं। ऐसे में वे मौजूदा व्यापार समझौते की कुछ शर्तों में बदलाव की मांग कर सकते हैं। डेमोक्रेटिक बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा अमेरिकी शुल्क के असर पर सुनवाई करा सकती है। खास तौर पर यह जांचने की कोशिश हो सकती है कि आयात पर लगाए गए शुल्क से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए वस्तुएं कितनी महंगी हुई हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस में ऐसा कोई कानून पारित होने की संभावना कम है जिससे भारत पर लगने वाले शुल्क में बड़ा बदलाव हो। इसलिए भारत के लिए व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखना जरूरी होगा। डेमोक्रेट्स की जीत से बातचीत का माहौल बदल सकता है, लेकिन समझौते की शर्तें अपने आप नहीं बदलेंगी।

रूस से तेल खरीदने पर भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी?

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक और बड़ा मुद्दा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर करीब आठ महीने से दबाव बना हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास पैदा हुई बाधाओं ने भी तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.8 फीसदी बढ़कर 104.42 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। बाजार की नजर इस बात पर थी कि ईरान को लेकर अमेरिकी प्रशासन अगला कदम क्या उठाता है। ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा था कि अमेरिका की ईरान पर तत्काल हमला करने की कोई योजना नहीं है। वहीं एक ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि दोनों पक्ष किसी समझौते से अभी काफी दूर हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव क्यों अहम है?

भारत के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना भी लगातार अमेरिकी दबाव का विषय रहा है। 18 सितंबर को हस्ताक्षरित एक अमेरिकी कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसदी तक शुल्क लगाने का प्रावधान है। हालांकि ट्रंप ने 16 अक्टूबर को इन शुल्कों से छूट दे दी थी। इस छूट की कोई तय समाप्ति तारीख नहीं है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति इसे वापस ले सकते हैं। फरवरी में जारी अमेरिकी आदेश के तहत वाणिज्य विभाग को यह निगरानी करने का निर्देश दिया गया है कि भारत दोबारा रूस से तेल खरीदना शुरू करता है या नहीं। डेमोक्रेट्स के सत्ता में आने से रूस के प्रति अमेरिकी नीति में नरमी आने की संभावना नहीं दिखती। मार्च में जब अमेरिकी वित्त विभाग ने होर्मुज क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने के दौरान भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए अस्थायी छूट दी थी, तब कांग्रेस के डेमोक्रेटिक सदस्यों ने इसका विरोध किया था। इसलिए भारत के लिए स्थिति आसान होने के बजाय कुछ मामलों में चुनौतीपूर्ण भी हो सकती है।

एच-1बी वीजा पर भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलेगी राहत?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का एक बड़ा असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले युवाओं पर पड़ सकता है। भारतीय नागरिक एच-1बी वीजा पाने वालों में सबसे बड़ा समूह हैं। इसलिए इस वीजा से जुड़े अमेरिकी नियमों में बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों पर सबसे ज्यादा पड़ सकता है। सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए एच-1बी आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का एलान किया था। इससे भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों की चिंता बढ़ी। हालांकि इस फीस की वसूली को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों ने 24 जुलाई 2026 से इस फीस की वसूली पर रोक लगा रखी है। 18 सितंबर को जारी एक राष्ट्रपति आदेश के जरिए इस व्यवस्था को 21 सितंबर 2027 तक बढ़ाया गया था। मैसाचुसेट्स की एक अदालत में 20 राज्यों की ओर से दायर मामले में न्यायाधीश ने कहा कि यह फीस असल में एक तरह का कर है जिसे लगाने का अधिकार सिर्फ अमेरिकी कांग्रेस के पास है।

क्या डेमोक्रेट्स एच-1बी फीस खत्म कर सकते हैं?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से एच-1बी नीति की जांच-पड़ताल बढ़ सकती है। वे इस बात पर सवाल उठा सकते हैं कि नई फीस का अमेरिकी कंपनियों और विदेशी पेशेवरों पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन इससे यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि एच-1बी वीजा की फीस तुरंत खत्म हो जाएगी या वीजा नियमों में बड़ी राहत मिल जाएगी। नई कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज शुरू करेगी। ट्रंप के पास राष्ट्रपति के रूप में वीटो का अधिकार बना रहेगा। अगर कांग्रेस ऐसा कोई विधेयक पारित करती है जो इस फीस को सीमित करता है या इसे कानून के रूप में बदलने की कोशिश करता है तो ट्रंप उसे वीटो कर सकते हैं।

भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बीच भारतीय शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। चुनाव परिणाम आने से पहले भारतीय बाजार मजबूत स्थिति में थे। मंगलवार तक चार कारोबारी सत्रों में निफ्टी 50 और सेंसेक्स करीब 5 फीसदी चढ़कर दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे। इसके पीछे कंपनियों के बेहतर नतीजे, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और विदेशी निवेशकों की ओर से खरीदारी में शुरुआती सुधार जैसे कारण थे। मंगलवार को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 6837 करोड़ रुपये यानी 721.66 मिलियन डॉलर की शुद्ध खरीदारी की। लेकिन बुधवार को तस्वीर कुछ बदली। निफ्टी 23946.35 के उच्च स्तर तक पहुंचा, जबकि सेंसेक्स ने 77396.04 का स्तर छुआ। हालांकि बाद में बाजार की बढ़त कम हो गई। इस दौरान आईटी शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। आईटी कंपनियों के शेयरों में 2.2 फीसदी की गिरावट आई। बाजार विशेषज्ञों ने इसकी वजह अमेरिकी आव्रजन नीति और आउटसोर्सिंग से जुड़ी अनिश्चितताओं को बताया। अमेरिकी बाजार में सेवाओं की मांग कमजोर रहने की आशंका भी आईटी शेयरों पर दबाव का एक कारण रही।

क्या मध्यावधि चुनाव के बाद भारतीय बाजार में तेजी आती है?

इतिहास के कुछ आंकड़े भारतीय शेयर बाजार के लिए उम्मीद की वजह हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक 1982 के बाद से अमेरिका के 11 मध्यावधि चुनावों में से छह मौकों पर उसके बाद के महीनों में भारतीय शेयर सूचकांकों ने औसतन 12 फीसदी की बढ़त दर्ज की। हालांकि इसे इस बार भी बाजार में तेजी की गारंटी नहीं माना जा सकता। कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख, कंपनियों के नतीजे और अमेरिका की आर्थिक नीतियां बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ब्रोकरेज के आकलन में निफ्टी के लिए 23200 का स्तर एक महत्वपूर्ण सपोर्ट माना गया है।

रक्षा सहयोग, क्वाड और चीन के मोर्चे पर क्या बदलेगा?

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग को दोनों देशों की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता रहा है। दोनों देश रक्षा अभ्यास, सैन्य तकनीक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने जैसे मुद्दों पर साथ काम करते रहे हैं। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा में बड़े बदलाव की संभावना कम है। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी और बजट संबंधी फैसले कुछ रक्षा परियोजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं।

इसके लिए भारत-अमेरिका क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी यानी आईसीईटी ढांचे के तहत सहयोग को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा क्वाड के तहत महत्वपूर्ण खनिजों और समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली इंटरनेट केबल जैसी परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने के अवसर भी हैं। डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी अमेरिकी विदेश नीति में कुछ मामलों में संतुलनकारी भूमिका निभा सकती है। इससे भारत को रक्षा, व्यापार और कूटनीति से जुड़े अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं।

भारत के लिए डेमोक्रेट्स की जीत के क्या मायने हैं?

ऐसे में देखें तो अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजे भारत के लिए न तो पूरी तरह राहत की खबर हैं और न ही किसी बड़े संकट का संकेत। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी बढ़ेगी। व्यापार के मोर्चे पर भारत को तत्काल शुल्क में कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। एच-1बी वीजा के मामले में भी डेमोक्रेट्स की जीत से तुरंत राहत मिलने की संभावना नहीं है। रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव जारी रह सकता है और इस मुद्दे पर कांग्रेस में बहस तेज हो सकती है। भारत की चुनौती अब यह होगी कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ अपने संबंधों को संभालते हुए अमेरिकी कांग्रेस के साथ भी संवाद मजबूत करे। आखिरकार, भारत की समस्या अमेरिका के साथ साझेदारी नहीं बल्कि ट्रंप प्रशासन के कुछ खास नीतिगत फैसले रहे हैं।

US Stock Futures: ट्रंप की हार से खुश अमेरिकी बाजार? शुरुआती गिरावट के बाद तगड़ा उछाल; GIFT Nifty भी 190 अंक चढ़ा

US Stock Futures: अमेरिकी शेयर बाजार के फ्यूचर्स में बुधवार को जोरदार रिकवरी देखने को मिली। डेमोक्रेट्स की अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में बड़ी जीत के बाद बाजार में शुरुआत में भारी गिरावट आई थी।

हालांकि, बाद में निवेशकों का रुख बदल गया। Nasdaq 100 Futures अपने दिन के निचले स्तर से करीब 950 अंक संभले। Dow और S&P 500 Futures भी गिरावट से निकलकर तेजी में आ गए। GIFT Nifty में भी 190 अंक की बढ़त दर्ज हुई।

इस रिकवरी के पीछे अमेरिकी राजनीति को लेकर अनिश्चितता में कमी और बॉन्ड यील्ड में गिरावट अहम वजह रही। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव के नतीजे स्वीकार करने की बात कही। इससे बाजार को राहत मिली।

Nasdaq Futures में जोरदार रिकवरी

E-mini Nasdaq 100 Futures 28,555 पर कारोबार कर रहे थे। इसमें 250 अंक यानी 0.88% की तेजी आई। इससे पहले ये फ्यूचर्स 2.4% तक गिर गए थे।

E-mini Dow Futures 676 अंक यानी 1.3% बढ़कर 52,571 पर पहुंच गए। वहीं, E-mini S&P 500 Futures 67 अंक यानी 0.89% की बढ़त के साथ 7,664 पर कारोबार कर रहे थे। S&P 500 Futures पहले 1.4% तक गिर गए थे।

अमेरिकी चुनाव के नतीजों से क्यों घबराया बाजार?

डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया। इससे राष्ट्रपति ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। निवेशकों को चिंता थी कि डेमोक्रेट्स के नियंत्रण में टेक कंपनियों पर सख्त नियम लागू हो सकते हैं। खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश करने वाली कंपनियों पर असर पड़ने की आशंका थी।

हालांकि, बाद में निवेशकों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और बॉन्ड यील्ड में गिरावट को ध्यान में रखा। इससे बाजार में रिकवरी आई।

GIFT Nifty 190 अंक उछला

अमेरिकी फ्यूचर्स में रिकवरी के साथ भारतीय बाजारों में भी तेजी जारी रही। GIFT Nifty 23,950 पर पहुंच गया। इसमें 190 अंक यानी 0.8% की बढ़त रही।

बुधवार को Sensex 383 अंक चढ़कर 77,301 पर बंद हुआ। Nifty 150 अंक बढ़कर 23,961 पर पहुंच गया। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी मजबूत खरीदारी देखने को मिली। Nifty Midcap 100 में 1.55% और Nifty Smallcap 100 में 2% की तेजी आई।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।