रिपब्लिकन पार्टी की 50 साल में सबसे बड़ी हार:सरकार अपनी थी, चुनाव लड़ने के लिए रिकॉर्ड पैसा, ट्रम्प को रोक नहीं पाए इसलिए हारे

तारीख- 28 अक्टूबर जगह- न्यूयॉर्क रिपब्लिकन पार्टी के करीब 25 चुनावी रणनीतिकार एक वीडियो कॉल पर जुड़े थे। बातचीत की शुरुआत ही साइनाइड (जहर) की गोली से हुई। पार्टी के लिए चुनावी सर्वे करने वाले टोनी फैब्रिजियो ने पूछा, ”आप पहले सफेद गोली (अच्छी खबर) लेना चाहेंगे या काली (बुरी खबर)?” इसके बाद रिपब्लिकन पार्टी के बड़े डेटा सलाहकारों में से एक टिम सेलर ने चुनाव के दो संभावित नतीजे बताए। पहला ये कि पार्टी के प्रचार के लिए जुटाए गए 40 करोड़ डॉलर का फंड सही वोटर्स तक पहुंच रहा है और लोग वोट देने भी आ रहे हैं। दूसरा नतीजा पार्टी की करारी हार को लेकर था। पार्टी की चुनावी कमान संभाल रहे जेम्स ब्लेयर ने हंसते हुए कहा, ”मैंने अपने अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी है। मेरा सुझाव है कि आप सब भी ऐसा ही करें।” उनकी बात सुनकर बाकी लोग हंसने लगे। करीब 30 मिनट तक कॉल पर ऐसे ही निराशा भरे मजाक चलते रहे। इसमें जेल का खाना खाने, राष्ट्रपति से माफी मिलने और देश छोड़कर भागने की बातें भी हुईं। नेतन्याहू का जिक्र करते हुए ब्लेयर ने तंज में कहा, “कम से कम बीबी जीत गए। वह हमारी रक्षा करेंगे।” इस पर फैब्रिजियो ने कहा, ”हां शायद हमें इजराइल में शरण मिल सकती है। डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन की 7 सीटें छीनीं एक साल पहले किसी को अंदाजा नहीं होगा कि रिपब्लिकन पार्टी की इतनी बड़ी हार होगी। पार्टी पास चुनाव लड़ने के लिए रिकॉर्ड पैसा था। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति इलॉन मस्क का साथ था। उन्होंने इस चुनाव में राष्ट्रपति चुनाव से भी ज्यादा पैसा लुटाया। सीनेट चुनाव में भी रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति मजबूत थी। चुनावी समीकरण ऐसे थे कि डेमोक्रेट्स को उन राज्यों में मुकाबला करना पड़ रहा था, जहां वे दशकों से नहीं जीते थे। हाउस चुनाव में ट्रम्प ने अपना बहुमत बढ़ाने के लिए एक और दांव चला। अमेरिका में आमतौर पर हर 10 साल में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदली जाती हैं। लेकिन ट्रम्प की टीम ने इस परंपरा को तोड़ते हुए बीच दशक में ही सीमाएं बदलने की कोशिश की। मकसद था ऐसे नए चुनावी क्षेत्र बनाना, जहां रिपब्लिकन उम्मीदवारों की जीत आसान हो जाए। इन तमाम कोशिशों के बावजूद रिपब्लिकन पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इसे पिछले 50 साल में पार्टी की सबसे बड़ी चुनावी हार में से एक माना जा रहा है। इसकी तुलना 1974 के चुनाव से की जा रही है। उस समय वाटरगेट कांड के बाद रिपब्लिकन पार्टी ने प्रतिनिधि सभा की 48 और सीनेट की 4 सीटें गंवाई थीं। इस बार रिपब्लिकन पार्टी ने सीनेट की 7 सीटें गंवाई हैं। चुनाव से पहले सीनेट में उसके 53 सदस्य थे, जो घटकर 44 रह गए हैं। (2 सीटों पर गिनती जारी है)। वहीं, हाउस में भी पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ है। शुरुआती नतीजों में वह करीब 25 सीटें गंवाती दिख रही थी। हालांकि, खबर लिखे जाने तक 45 सीटों पर मतगणना जारी थी। ईरान के खिलाफ जंग शुरू कर ट्रम्प ने अपना ही वादा तोड़ा चुनाव के नतीजे आने से पहले ही ट्रम्प सोचने लगे थे कि अगर कुछ फैसले नहीं लिए गए होते तो क्या होता। उनसे बातचीत करने वाले एक व्यक्ति के मुताबिक, ट्रम्प ने पूछा भी था, ”अगर हम ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू ही नहीं करते, तो मिडटर्म चुनाव में क्या होता?” ईरान युद्ध ने लोगों को बहुत नाराज किया क्योंकि ट्रम्प ने राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में वादा किया था कि अमेरिका कोई नया युद्ध शुरू नहीं करेगा। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने खुद नया युद्ध शुरू कर दिया। उन्होंने महंगाई कम करने का वादा किया था। लेकिन पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं और महंगाई भी बढ़ गई। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर ट्रम्प ने कहा, ”यह एक छोटी सी कीमत है, जिसे चुकाया जा सकता है।” ट्रम्प का जंग खत्म करने का अनुमान गलत साबित हुआ ट्रम्प ने जब ईरान के खिलाफ जंग शुरू की तो उन्हें भरोसा था कि यह जल्दी खत्म हो जाएगा और अमेरिका को बड़ी जीत मिलेगी। लेकिन ट्रम्प का अनुमान गलत साबित हुआ। ट्रम्प लगातार दावा कर रहे थे कि अमेरिका ने जीत हासिल की है। लेकिन निजी बैठकों में उनके सलाहकार उन्हें होर्मुज स्ट्रेट बंद होने, पेट्रोल और खाद की कीमतें बढ़ने और अमेरिकी हथियारों के भंडार में तेजी से कमी आने की जानकारी दे रहे थे। युद्ध शुरू होने के करीब दो हफ्ते बाद मार्च में मतदाताओं के बीच सर्वे किया गया। इसमें पता चला कि लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि राष्ट्रपति ने युद्ध शुरू ही क्यों किया। लोगों को लग रहा था कि ट्रम्प ने अपना वादा तोड़ा है और अब इस युद्ध के कारण उनकी रोजमर्रा की जिंदगी महंगी हो रही है। युद्ध का विरोध करने वाले ट्रम्प के कुछ पुराने सहयोगी भी अब खुलकर उनके खिलाफ हो गए थे। इनमें टकर कार्लसन और जॉर्जिया की पूर्व सांसद मार्जोरी टेलर ग्रीन शामिल थीं। सलाहकारों के मुताबिक, ट्रम्प जानते थे कि युद्ध के कारण उनका समर्थन घट रहा है। लेकिन कुछ समय के लिए उन्हें लगा कि अब इस मुसीबत से बाहर निकलने का रास्ता मिल गया है। ट्रम्प अपने शौक में उलझे रहे, जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया ट्रम्प की टीम के कुछ सदस्य इस बात से परेशान थे कि ट्रम्प सीमा सुरक्षा की तुलना में अपने नए बॉलरूम की ज्यादा बात करते थे। उन्हें किराने के सामान की बढ़ती कीमतों से ज्यादा गोल्फ कोर्स की चिंता थी। महंगाई के बजाय वे इमारतों की सजावट पर ध्यान दे रहे थे। मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले अपने आखिरी चुनावी भाषण में भी उन्होंने नेशनल मॉल के रिफ्लेक्टिंग पूल के नवीनीकरण की बात की। मजाक में कहा कि वे इसका नाम अब्राहम लिंकन के बजाय अपने नाम पर रखने के बारे में सोच रहे हैं। यही वह दूरी थी, जिसे लेकर उनकी टीम के लोग चिंतित थे। एक तरफ आम अमेरिकी महंगाई, महंगे पेट्रोल और ईरान युद्ध से परेशान थे, दूसरी तरफ राष्ट्रपति का ध्यान उन मुद्दों पर नहीं दिख रहा था। 28 अक्टूबर की वीडियो कॉल में जिस हार का अंदाजा लगाकर उनकी टीम अंतिम संस्कार और देश छोड़ने के मजाक कर रही थी, एक हफ्ते बाद चुनाव नतीजों ने उस डर को हकीकत में बदल दिया। ————————————-

रिपब्लिकन पार्टी की हार का कारण रहा ईरान युद्ध : जेडी वेंस

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार के लिए ईरान युद्ध को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि यही संघर्ष ‘हमारी हार का कारण’ बना।

इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। श्री वेंस की टिप्पणी ने ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों को उजागर किया है।

श्री वेंस ने प्रशासन की विदेश नीति के राजनीतिक प्रभावों को स्वीकार करते हुए कहा कि ईरान युद्ध ‘हमारी हार का कारण’ बना। उनकी इस टिप्पणी से इस संघर्ष को लेकर रिपब्लिकन खेमे में जारी मतभेद सामने आए हैं।

दूसरी ओर, डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस में बहुमत मिलने के बाद ट्रंप प्रशासन के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। उन्होंने प्रशासन और उसकी नीतियों की जांच कराने का वादा किया है।

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सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता चक शूमर ने कहा कि उनकी पार्टी श्री ट्रंप को ‘विधायी कांटों के जाल में उलझा देगी।’ उनकी इस टिप्पणी से राष्ट्रपति के एजेंडे को कांग्रेस में कड़ी चुनौती मिलने के संकेत मिलते हैं।

ये नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए बड़ा राजनीतिक झटका हैं। उनकी गिरती लोकप्रियता को डेमोक्रेट्स की बढ़त का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। इससे वर्ष 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी की राजनीतिक दिशा को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

सीबीएस न्यूज के अनुसार, ट्रंप अपने सलाहकारों के साथ रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के भविष्य पर भी चर्चा कर रहे हैं। हालांकि, राष्ट्रपति ने बाद में कहा कि वह उन्हें पद से हटाने पर विचार नहीं कर रहे हैं।

इन नतीजों से ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के शेष समय में उनके विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में मुश्किलें आने की आशंका है। डेमोक्रेट्स कांग्रेस में अपने बहुमत का इस्तेमाल प्रशासन की निगरानी बढ़ाने और उसकी नीतिगत प्राथमिकताओं को चुनौती देने के लिए करने की तैयारी कर रहे हैं।

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कौन हैं डॉ. अमीश शाह? एरिजोना से US संसद का चुनाव जीतकर भारतीय मूल के डॉक्टर ने रचा इतिहास

कौन हैं डॉ. अमीश शाह? एरिजोना से US संसद का चुनाव जीतकर भारतीय मूल के डॉक्टर ने रचा इतिहास

Dr amish Shah US Election

who is dr amish shah: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (US House of Representatives) के चुनाव में भारतीय मूल के डेमोक्रेटिक नेता और आपातकालीन चिकित्सक (Emergency Physician) डॉ. अमीश शाह ने इतिहास रच दिया है। उन्होंने एरिजोना राज्य के प्रथम कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से शानदार जीत हासिल कर अमेरिकी संसद के निचले सदन में जगह बनाई है। डॉ. अमीश शाह एरिजोना से अमेरिकी कांग्रेस के लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी बन गए हैं। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही वे अमेरिकी संसद में भारतीय-अमेरिकी ‘समस्या निवारण समूह’ (Samosa Caucus) के छठे भारतीय-अमेरिकी सदस्य के रूप में शामिल हो गए हैं।

डॉ. अमीश शाह की ऐतिहासिक उपलब्धि

अमेरिका के एरिजोना राज्य में एक नया राजनीतिक इतिहास लिखा गया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी और प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. अमीश शाह ने एरिजोना की पहले कांग्रेसनल सीट से रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी (पूर्व एनएफएल खिलाड़ी) जे फीली को एक कड़े मुकाबले में हराकर जीत दर्ज की है। शाह को 52.49% वोट मिले, जबकि फेली को 45.45% वोट हासिल हुए। इस जीत से उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के कब्जे वाली सीट पर डेमोक्रेट्स का परचम लहरा दिया है। अपनी जीत के बाद एक्स (ट्विटर) पर आभार व्यक्त करते हुए डॉ. अमीश शाह ने लिखा- एरिजोना, आपका अगला कांग्रेसी बनना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है। ALSO READ: ट्रंप के खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी में बगावत : उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी नाराज, रक्षामंत्री हेगसेथ पर महाभियोग का खतरा

 

कौन हैं डॉ. अमीश शाह?

48 वर्षीय डॉ. अमीश शाह के माता-पिता भारत के गुजरात राज्य से संबंध रखते हैं। उनके माता-पिता 1960 के दशक में भारत से अमेरिका जाकर शिकागो में बस गए थे, जहां अमीश शाह का जन्म और पालन-पोषण हुआ। उनके पिता जैन धर्म को मानते हैं, जबकि मां हिंदू हैं। अमीश ने नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से स्नातक और बर्कले की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से सार्वजनिक स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर (MPH) की डिग्री हासिल की। वे पिछले 15 से अधिक वर्षों से एरिजोना के अस्पताल में इमरजेंसी रूम (ER) डॉक्टर के रूप में सेवा दे रहे हैं। ALSO READ: ईरान युद्ध की वजह से हारे मध्यावधि चुनाव? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का बड़ा कबूलनामा

 

राजनीतिक सफर : उन्होंने वर्ष 2018 में पहली बार राजनीति में प्रवेश किया और एरिजोना हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (राज्य विधानसभा) के लिए चुने गए। उन्होंने लगातार तीन कार्यकाल तक राज्य प्रतिनिधि के रूप में अपनी सेवाएं दीं। डॉ. अमीश शाह की सफलता का सबसे बड़ा कारण उनका जमीनी जनसंपर्क माना जा रहा है। अपने अभियान के दौरान उन्होंने स्वयं 28,000 से अधिक घरों के दरवाजे खटखटाए और मतदाताओं से सीधे संवाद किया।

 

चुनाव के दौरान उनके मुख्य मुद्दे : एक डॉक्टर होने के नाते उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और सस्ती बनाने पर जोर दिया। उन्होंने शिक्षा बजट में वृद्धि और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में ठोस नीतियां बनाने का वादा किया। एरिजोना के सीमावर्ती राज्य होने के कारण उन्होंने संतुलित सीमा सुरक्षा और नागरिकों के मतदान अधिकारों की रक्षा का समर्थन किया।

 

डॉ. शाह की यह जीत अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को दर्शाती है। वे अमेरिकी संसद के निचले सदन में प्रतिनिधि के रूप में शामिल होकर स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और द्विस्तरीय कूटनीति से जुड़े मुद्दों पर अहम भूमिका निभाएंगे।

भारत के लिए ट्रम्प से ज्यादा खतरनाक है डेमोक्रेट्स!

भारत के लिए ट्रम्प से ज्यादा खतरनाक है डेमोक्रेट्स!

MLC Election Result 2029

                                     

अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रम्प को मिले चुनावी झटकों और डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़ती ताकत के बीच भारत के लिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि वाशिंगटन का रुख उसके प्रति नरम पड़ जाएगा। भारत की नीतियों की आलोचना करने में डेमोक्रेटिक सांसद भी पीछे नहीं रहे है। कश्मीर, धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर पार्टी के कई प्रभावशाली नेता लगातार भारत सरकार पर सवाल उठाते रहे है। ऐसे में अमेरिकी सत्ता के बदलते समीकरणों से भारत के प्रति इस आलोचनात्मक रवैये में बदलाव की उम्मीद करना उचित नहीं होगा।

 

शीतयुद्ध के दौर में भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति, पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रणनीतिक संबंध और भारत के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार मतभेद उभरे। मई 1998 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद तत्कालीन डेमोक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि इन परीक्षणों से दक्षिण एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है।  2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद अमेरिकी कांग्रेस में भारत की नीतियों पर आलोचना  खूब हुई थी और इसमें आगे डेमोक्रेटिक सांसद ही थे।

भारतीय मूल की डेमोक्रेट सांसद प्रमिला जयपाल ने दिसंबर 2019 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रेजोल्यूशन 745 प्रस्तुत किया था। इसमें जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंध समाप्त करने, हिरासत में लिए गए लोगों के मामलों की समीक्षा करने और धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। इस प्रस्ताव का समर्थन बर्नी सैंडर्स और एलिजाबेथ वॉरेन जैसे नेताओं ने भी किया। जानी मानी डेमोकेटिक नेता कमला हैरिस ने कश्मीर के लोगों के नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया था। इस प्रकार कश्मीर अमेरिकी डेमोक्रेटिक राजनीति में भारत से जुड़े प्रमुख मुद्दों में शामिल  रहा है।

 

2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन ने अपने चुनावी कार्यक्रम में सीएए, एनआरसी और जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई थी। एक और चर्चित डेमोक्रेट सांसद इल्हान उमर ने अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की है। वे भारत के प्रति अपने आलोचनात्मक रुख के कारण लगातार चर्चा में रही है। इल्हान उमर कश्मीर, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भारत सरकार की नीतियों पर सवाल उठाती रही है। 2022 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान उन्होंने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का दौरा किया था और वहां मानवाधिकारों तथा कश्मीर की स्थिति पर बयान दिए थे।

भारत ने इस यात्रा पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन बताया था। 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान भी इल्हान उमर ने भारत को लेकर अपनी आलोचना जारी रखी। उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की स्थिति पर चिंता जताई गई थी और धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन से जुड़ी अमेरिकी निगरानी सूची में भारत को शामिल करने की मांग की गई थी।  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की यात्रा और भारत के खिलाफ अमेरिकी संसद में प्रस्ताव पेश करने जैसी घटनाओं के कारण भारत में उन्हें भारत विरोधी दृष्टिकोण रखने वाली सांसद के रूप में देखा जाता है। 

 

एक और डेमोक्रेट सीनेटर टैमी बाल्डविन ने 2023 को सीनेट में रेजोल्यूशन 424 प्रस्तुत किया था। इसमें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कथित उत्पीड़न तथा हिंसा समाप्त करने का आग्रह किया गया था। अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के प्रश्नों पर भारत सरकार की आलोचना करती रही है। यही विरोधाभास बाइडेन प्रशासन के समय भी दिखाई दिया था।  उस समय प्रधानमंत्री मोदी को राजकीय यात्रा का निमंत्रण दिया गया था और रक्षा तथा तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाई मिली, दूसरी ओर अमेरिकी कांग्रेस में भारत की आंतरिक नीतियों पर आलोचनात्मक प्रस्ताव प्रस्तुत होते रहे थे।

 

यहां अमेरिकी विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठते है। पाकिस्तान में सैन्य शासन, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी और अल्पसंख्यकों की स्थिति के बावजूद अमेरिका ने अपने रणनीतिक हितों के लिए लंबे समय तक पाकिस्तान के साथ सहयोग किया है। इसके विपरीत भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिकी सांसदों की मुखरता दिखाई देती है। यह अंतर अमेरिकी विदेश नीति में रणनीतिक हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच मौजूद तनाव को उजागर करता है। 4 नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की सफलता ने अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है। इससे ट्रम्प प्रशासन को कांग्रेस में अधिक राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। डेमोक्रेट सांसद संसदीय समितियों, सुनवाई और प्रस्तावों के माध्यम से प्रशासन की नीतियों पर दबाव बढ़ा सकते है। भारत से जुड़े मुद्दे भी इस राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बन सकते है।

 

अमेरिकी राजनीति में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं, लेकिन भारत को लेकर रिपब्लिकन से कहीं ज्यादा कड़ा व्यवहार डेमोक्रेट्स का रहा है। जाहिर है अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में ट्रम्प के कमजोर पड़ने और  डेमोक्रेट्स के मजबूत होने का फायदा भारत को मिलने वाला है, ऐसा तो नहीं लगता और न ही डेमोक्रेट्स का इतिहास इसकी अनुमति देता है।

Stock Market Rally: भारतीय बाजार फिर हुआ $5 ट्रिलियन का, अब इन 3 बातों पर रहेगी नजर

Stock Market Rally: घरेलू स्टॉक मार्केट में आज लगातार छठे दिन रौनक है। इन छह दिनों की तेजी के साथ भारतीय मार्केट की वैल्यू एक बार फिर $5 ट्रिलियन के पार हो गई। इन छह कारोबारी दिनों में निवेशकों की दौलत में करीब ₹30 लाख करोड़ का इजाफा हुआ है। इस दौरान सेंसेक्स (Sensex) करीब 6400 प्वाइंट्स ऊपर चढ़ गया तो निफ्टी 50 (Nifty 50) 22500 के नीचे आने के बाद तेजी से रिकवर होकर आज 24400 के पार पहुंच गया। निफ्टी के सभी 50 स्टॉक्स इस दौरान मजबूत हुए हैं और निफ्टी 8% से अधिक ऊपर चढ़ा। हालांकि ब्रोडर लेवल पर स्थिति थोड़ी कमजोर रही और मिडकैप इंडेक्स में 5% तो स्मॉलकैप इंडेक्स में 3% की तेजी आई।

इन वजहों से मार्केट में छाई रौनक

28 अक्टूबर के निचले स्तर से छह कारोबारी दिनों में सेंसेक्स और निफ्टी में 8-8% से अधिक की तेजी आई है। इन्हें कई बातों से सपोर्ट मिला है, जैसे कि कंपनियों के धमाकेदार कारोबार नतीजे, अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन में ट्रंप के रिपब्लिकशन पार्टी की शिकस्त और कच्चे तेल का धड़ाम होना।

विदेशी निवेशकों की ताबड़तोड़ खरीदारी ने इस माहौल को और मजबूत किया, जिन्होंने लगातार चार कारोबारी दिनों में ₹20,834.06 करोड़ के शेयरों की नेट खरीदारी की, जिसमें से सबसे अधिक यानी ₹7,284.03 करोड़ के शेयरों की नेट खरीदारी 4 नवंबर को की। विदेशी निवेशकों की खरीदारी को सेबी के प्रस्ताव से सपोर्ट मिला है। न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सेबी ने सरकार से FIIs को एलटीसीजी पर टैक्स से छूट का प्रस्ताव दिया है।

अब आगे क्या?

मार्केट ने $5 ट्रिलियन यानी $5 लाख करोड़ के मार्केट कैप का अहम मनोवैज्ञानिक स्तर छू लिया। अब निवेशकों को आने वाले हफ्तों में कुछ घरेलू और ग्लोबल बातों पर नजर रहेगी-

1. सितंबर तिमाही के नतीजों का दौर अब अपने आखिरी चरण में है। अधिकतर कंपनियों के नतीजे अब तक तो एनालिस्ट्स की उम्मीदों के मुताबिक रहे हैं या उनसे बेहतर रहे हैं।

2. दिसंबर में आने वाली आरबीआई की पॉलिसी पर नजर रहेगा। दिग्गज बैंकर उदय कोटक को उम्मीद है कि इस वित्त वर्ष 2027 के आखिरी तक आरबीआई दरों में 75 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी करेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि दिसंबर में 25 बेसिस पॉइंट्स की और बढ़ोतरी होती है या नहीं।

3. अमेरिका में हो रहे घटनाक्रमों पर भी मार्केट की कड़ी नजर रहेगी, खासतौर से ऐसे समय में, जब डेमोक्रेट्स ने सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, दोनों जगह मिडटर्म चुनावों में शानदार जीत हासिल की है। मार्केट की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या सरकार पर ईरान के साथ कोई समझौता करने का दबाव होगा, और क्या AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से जुड़ा कारोबार और कम होगा।

5 वजह, Nifty लंबे इंतजार बाद 24400 के पार

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

कच्चे तेल की नरमी ने दिया बूस्टर डोज, सरपट भागे JK टायर और इंडिगो के शेयर, पेंट और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को भी लगे पंख

आज गुरुवार, 5 नवंबर को JK टायर, इंडिगो, एशियन पेंट्स और कई तेल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों में तेजी देखने को मिल रही है। इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के कारण एविएशन, टायर और पेंट कंपनियों के शेयरों को फायदा मिला है। ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 9 प्रतिशत गिरकर 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है। बाजार को उम्मीद है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजे अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे तनाव को खत्म करने का रास्ता खोल सकते हैं। इसके चलते क्रूड की कीमत में नरमी आई है।

आज शुरुआती कारोबार में JK टायर 5.6 प्रतिशत बढ़कर 351.5 रुपये पर पहुंच गया, जबकि इंडिगो की पैरेंट कंपनी इंटरग्लोब एविएशन 5.04 प्रतिशत चढ़कर 5,400 रुपये पर जाता दिखा। एशियन पेंट्स 4.44 प्रतिशत बढ़कर 2,525.7 रुपये पर पहुंच गया, वहीं अपोलो टायर्स में 4.37 प्रतिशत की तेजी आई और यह 420 रुपये पर पहुंच गया।

ऑयल मार्केटिंग कंपनियों में भी तेजी

ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों में भी जोरदार खरीदारी देखने को मिली है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) 5.17 प्रतिशत बढ़कर 385.30 रुपये पर, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) 3.63 प्रतिशत बढ़कर 315.75 रुपये पर और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) 3.10 प्रतिशत बढ़कर 146.43 रुपये पर पहुंच गया।

दूसरे बढ़त बनाने वाले शेयरों में CEAT शामिल है जो 3.25 प्रतिशत बढ़कर 3,526 रुपये पर पहुंच गया। कंसाई नेरोलैक पेंट्स 2.84 प्रतिशत बढ़कर 200.86 रुपये पर आ गया और बर्जर पेंट्स 2.75 प्रतिशत की बढ़त के साथ 498.45 रुपये पर पहुंच गया। स्पाइसजेट भी 1.83 प्रतिशत बढ़कर 7.78 रुपये पर आ गया।

अपस्ट्रीम तेल उत्पादक कंपनियों पर दबाव

हालांकि,अपस्ट्रीम तेल उत्पादक कंपनियां दबाव में दिख रही हैं। ऑयल इंडिया 3.07 प्रतिशत गिरकर 443.95 रुपये पर आ गया है। जबकि ONGC 1.60 प्रतिशत फिसलकर 231.24 रुपये पर आ गया है।

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट क्यों?

गुरुवार को ग्लोबल बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार चौथे सेशन में गिरावट देखने को मिली। अमेरिकी मध्यावधि कांग्रेसनल चुनावों में डेमोक्रेट्स की कई अहम जीत के बाद, मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को चुनावों में मिली हार से इस बात की उम्मीद जगी है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल के संघर्ष के और अधिक बढ़ने का खतरा कम हो सकता है।

इस उम्मीद के चलते ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 1.03 प्रतिशत गिरकर 93.65 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) फ्यूचर्स 1.29 प्रतिशत की गिरावट के साथ 86.98 डॉलर पर आ गया। बुधवार को दोनों बेंचमार्क में 8-9 प्रतिशत की भारी गिरावट आई, जिससे ये 31 अगस्त के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए।

इस हफ्ते ब्रेंट में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट आई

इस हफ्ते ब्रेंट में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। अगर यह गिरावट शुक्रवार तक जारी रहती है तो यह अप्रैल 2020 के बाद से तेल की कीमतों में सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट होगी।

एविएशन, टायर और पेंट कंपनियों के शेयरों में तेजी क्यों ?

कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट से उन कंपनियों को फायदा होगा जो पेट्रोलियम से बनने वाले ईंधन और कच्चे माल पर काफी हद तक निर्भर होते हैं। इंडिगो के लिए,एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) एक बड़ा खर्च है। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से कंपनी की ईंधन की लागत कम हो सकती है और एयरलाइन के मुनाफे में सुधार हो सकता है।

JK टायर, अपोलो टायर्स और CEAT जैसी टायर बनाने वाली कंपनियों को सिंथेटिक रबर, कार्बन ब्लैक और पेट्रोलियम से जुड़े दूसरे कच्चे माल की लागत कम होने से फायदा मिल सकता है। एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स और कंसाई नेरोलैक जैसी पेंट बनाने वाली कंपनियों को भी कच्चे माल की लागत में राहत मिल सकती है।

इसी तरह ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को बेहतर मार्केटिंग मार्जिन से फायदा हो सकता है। जबकि कच्चे तेल के सस्ते होने से ONGC और ऑयल इंडिया जैसी तेल उत्पादक कंपनियों की कमाई पर दबाव आ सकता है।

 

 

Currency Check : कच्चे तेल में नरमी से मिला सपोर्ट, रुपया 29 पैसे मजबूत होकर 94.35 रुपए प्रति डॉलर पर खुला

Currency Check : कच्चे तेल में नरमी से मिला सपोर्ट, रुपया 29 पैसे मजबूत होकर 94.35 रुपए प्रति डॉलर पर खुला

Currency Check : 5 नवंबर को लगातार पांचवें दिन भी भारतीय रुपये की बढ़त का सिलसिला जारी है। तेल की कीमतों में गिरावट आई है। इससे रुपए के सपोर्ट मिल रहा है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान युद्ध से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर सकती है। इसके चलते ही तेल की कीमतों में नरमी आई है।

बुधवार के 94.64 रुपए प्रति डॉलर के बंद भाव की तुलना में रुपया आज 29 पैसे की बढ़त के साथ 94.35 रुपए प्रति डॉलर पर खुला। आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ज्यादातर एशियाई मुद्राओं में तेजी देखने को मिली है। फिलीपीन पेसो सबसे ज्यादा मजबूत हुआ है। इसमें 0.36 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है। इसके बाद थाई बाहत का नंबर है जो 0.42 प्रतिशत मजबूत हुआ है। जापानी येन और मलेशियाई रिंगित में 0.29-0.29 प्रतिशत की तेजी आई है, जबकि दक्षिण कोरियाई वॉन और सिंगापुर डॉलर में 0.18 प्रतिशत और 0.08 प्रतिशत की बढ़त देखी गई है।

दूसरी ओर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ताइवान डॉलर में 0.21 प्रतिशत की कमजोरी आई है। जबकि चीनी रेनमिनबी और इंडोनेशियाई रुपिया में 0.07 प्रतिशत और 0.04 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

गुरुवार को डॉलर में थोड़ी गिरावट आई। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स की भारी जीत ने अनिश्चितता के एक बड़े कारण को दूर कर दिया है,जिससे ग्लोबल शेयर बाजार में तेजी आई है। कई बड़ी मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स पिछले सत्र में 0.36% की गिरावट के बाद आज भी 0.06% गिरकर 101.41 पर आ गया है। यूरो 0.12% बढ़कर 1.1241 डॉलर पर पहुंच गया है।

 

 

बाजार की लगाम अब पूरी तरह से तेजड़ियों के हाथ, निफ्टी में जल्द ही 24200–24400 का लेवल मुमकिन

ट्रंप प्रशासन की सख्त कार्रवाई; ईरान की मदद करने वाली 9 भारतीय कंपनियों पर लगाए प्रतिबंध

ट्रंप प्रशासन की सख्त कार्रवाई; ईरान की मदद करने वाली 9 भारतीय कंपनियों पर लगाए प्रतिबंध

US Sanctions on Indian companies

अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी आर्थिक घेराबंदी को और तेज कर दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारत और तुर्की की कई कंपनियों और व्यक्तियों पर नए प्रतिबंध लगा दिए हैं। इन पर आरोप है कि इन्होंने ईरान को अंतरराष्ट्रीय तेल प्रतिबंधों से बचने में मदद की और उसके ‘शैडो फ्लीट’ को सहारा दिया। यह बड़ा कदम ऐसे समय उठाया गया है जब हाल ही में अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स को बड़ी जीत मिली है और चुनावों के दौरान मतदाताओं ने ईरान युद्ध तथा देश में बढ़ती महंगाई को लेकर खुलकर अपनी नाराजगी जताई थी। ALSO READ: ईरान युद्ध की वजह से हारे मध्यावधि चुनाव? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का बड़ा कबूलनामा

 

भारतीय नागरिकों और फर्मों पर शिकंजा

अमेरिकी वित्त विभाग के अनुसार, प्रतिबंधित किए गए लोगों में भारत में रहने वाले सुनील कुमार शर्मा और उनकी पत्नी जसप्रीत प्रीति शाहिद शामिल हैं। इसके अलावा, दो अन्य भारतीय नागरिक भी इस दायरे में आए हैं जो इस दंपति के व्यवसायों को संभालते थे।

 

जांच में सामने आया है कि इन लोगों से जुड़ी नौ अलग-अलग इकाइयों ने समुद्री धोखाधड़ी के एक बड़े जाल के जरिए ईरान के तेल परिवहन में मदद की। इन नेटवर्क्स के जरिए ईरानी पेट्रोलियम ढोने वाले प्रतिबंधित जहाजों को फर्जी झंडे और झूठे प्रमाण-पत्र (फर्जी मैरीटाइम सर्टिफिकेट्स) मुहैया कराए जाते थे, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण नियमों से बच निकल सकें।

 

तुर्की पर भी गाज गिरी

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका ने तुर्की पर भी कड़ा रुख अपनाया है। ट्रेजरी विभाग ने तुर्की की कंपनी ‘फ्यूगो ग्राउंड सर्विसेज इंक’ पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो ईरान के प्रतिबंधित विमानन (Aviation) क्षेत्र को लगातार समर्थन दे रही थी। ALSO READ: क्या लेमडक बने डोनाल्ड ट्रंप? ईरान युद्ध और वैश्विक नीतियों पर पड़ेगा यह बड़ा असर, आ सकता है महाभियोग

 

‘या तो आप हमारे साथ हैं या खिलाफ’

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा, “ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट के तहत आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ। हमें पता है कि आप कहां हैं और जो लोग ईरानी शासन का समर्थन करना जारी रखेंगे, हम उन पर प्रतिबंध लगाएंगे—चाहे वे जमीन, समुद्र या हवा के जरिए ऐसा करें।”

विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यावधि चुनावों में चुनावी झटके के बाद भी ट्रंप प्रशासन ईरान के मामले में पीछे हटने के मूड में नहीं है और तेहरान के खिलाफ अपनी आर्थिक जंग को और अधिक आक्रामक बना रहा है।

5 सेकंड में बरसे ₹6 लाख करोड़, Trump की करारी हार पर Sensex चढ़ा 1621 प्वाइंट्स, 5 वजहों से Nifty 24400 के करीब

Share Market Rally: अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन में विपक्षी पार्टी डेमोक्रेट की धमाकेदार जीत ने मार्केट में ऐसा जोश भरा कि सेंसेक्स 1621 प्वाइंट्स उछल पड़ा तो निफ्टी भी 24400 के करीब पहुंच गया। ब्रोडर लेवल पर भी बहार छा गई और निफ्टी मिडकैप 100 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 1-1% से अधिक की बढ़त है। मार्केट की इस शानदार रौनक में शुरुआती कारोबार में ही बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप ₹6 लाख करोड़ से अधिक बढ़ गया यानी निवेशकों की दौलत में ₹6 लाख करोड़ से अधिक का इजाफा हुआ है। साथ ही मार्केट में डर भी कम हुआ है और इसे मापने वाला इंडिकेटर India VIX फिलहाल 3.73% की गिरावट के साथ 14.62 पर है।

अब घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज की बात करें तो फिलहाल 09:22 AM पर सेंसेक्स (Sensex) 1415.56 प्वाइंट्स यानी 1.83% की बढ़त के साथ 78,716.96 और निफ्टी 50 (Nifty 50) 392.10 प्वाइंट्स यानी 1.64% के उछाल के साथ 24,352.70 पर है। इंट्रा-डे में सेंसेक्स 1621.04 प्वाइंट्स उछलकर 78,922.44 तो निफ्टी भी 431.35 प्वाइंट्स चढ़कर 24,391.95 तक पहुंच गया।

Share Market Rally: ये है वजह

मिडटर्म इलेक्शन में ट्रंप की करारी हार

अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन में ट्रंप के रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार ने अमेरिका से लेकर भारत तक के इक्विटी मार्केट में जोश भर दिया। अमेरिकी मार्केट में एसएंडपी 500 और नास्डाक जैसे अहम इंडेक्सेज डेढ़ फीसदी के आस-पास बंद हुए। एनालिस्ट्स के मुताबिक अमेरिका में डेमोक्रेट की जीत से ट्रंप को ईरान के साथ युद्ध आगे बढ़ाने में दिक्कत हो सकती है।

कच्चे तेल की मई के बाद एक दिन में सबसे तेज फिसलन

ओवरनाइट कच्चे तेल के भाव इतने तेजी से टूटे कि यह न सिर्फ प्रति बैरल $100 के नीचे आ गया बल्कि $95 के भी नीचे आ गया। कच्चे तेल के दोनों ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) और अमेरिकी वैरिएंट वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमतों में ओवरनाइट 8-8% की तेज गिरावट आई। ब्रेंट क्रूड $95 के करीब बंद हुआ तो WTI भी फिसलकर प्रति बैरल $88 के पास बंद हुआ। मई के बाद से इनके भाव में एक दिन में सबसे बड़ी गिरावट रही।

FIIs की खरीदारी

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की खरीदारी से मार्केट को सपोर्ट मिला। विदेशी निवेशकों ने लगातार चार कारोबारी दिनों में ₹20,834.06 करोड़ के शेयरों की नेट खरीदारी की, जिसमें से सबसे अधिक यानी ₹7,284.03 करोड़ के शेयरों की नेट खरीदारी 4 नवंबर को की। इससे मार्केट को सपोर्ट मिला है। विदेशी निवेशकों की खरीदारी को सेबी के प्रस्ताव से सपोर्ट मिला है। न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सेबी ने सरकार से FIIs को एलटीसीजी पर टैक्स से छूट का प्रस्ताव दिया है।

सिर्फ फार्मा सेक्टर लाल

सेक्टरलाइज सिर्फ फार्मा सेक्टर का निफ्टी इंडेक्स लाल है और बाकी सभी अहम सेक्टर्स के निफ्टी इंडेक्स ग्रीन हैं। निफ्टी ऑटो तो 2% से अधिक मजबूत हुआ है तो आईटी, पीएसयू बैंक और प्राइवेट बैंक सेक्टर के निफ्टी इंडेक्स में डेढ़-डेढ़ फीसदी से अधिक की तेजी है। साथ ही मेटल और एफएमसीजी सेक्टर के निफ्टी इंडेक्स में 1-1% की तेजी है। निफ्टी फार्मा में आधे फीसदी से कम की गिरावट है।

यूएस बॉन्ड यील्ड में तेज गिरावट

बुधवार को ट्रेजरी यील्ड में गिरावट आई। अमेरिका में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। बेंचमार्क US 10-ईयर ट्रेजरी यील्ड 2 बेसिस पॉइंट गिरकर 4.86% पर और 2-ईयर बॉन्ड की यील्ड लगभग 2 बेसिस पॉइंट गिरकर 4.56% पर आ गई है।

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Crude Oil Crash: 8% की भारी गिरावट, मई के बाद एक दिन में सबसे बुरा हाल, आखिर क्यों टूटा कच्चा तेल?

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ट्रम्प ने माना- मिडटर्म में हार की वजह ईरान जंग:बोले- मौका मिला तो फिर हमला करूंगा; उनकी पार्टी ने दोनों सदनों में बहुमत गंवाया

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने माना है कि ईरान के साथ जंग के कारण मिडटर्म चुनाव में उनकी रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ। हालांकि, उन्होंने इसका बचाव करते हुए कहा कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए यही एक रास्ता था। CNBC के मुताबिक ट्रम्प ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा, ईरान जंग की वजह से कुछ समय के लिए पेट्रोल की कीमतें बढ़ गई थीं। लेकिन अगर मुझे दोबारा फैसला लेने का मौका मिले, तो मैं फिर यही करूंगा। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स हाउस में कुल 435 सीटें हैं। सभी सीटों पर चुनाव हुए। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने 242 और ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी ने 151 सीटें जीती हैं। 42 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है। डेमोक्रेट्स को जरूरी बहुमत मिल चुका है। सीनेट सीनेट की 100 सीटों में से 35 पर चुनाव हुए हैं। अब तक 33 सीटों के नतीजे सामने आ चुके हैं। इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी ने 20 और रिपब्लिकन पार्टी ने 13 सीटें जीती हैं। बाकी 2 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है। इन नतीजों को मिलाकर डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 54 और रिपब्लिकन पार्टी के पास 44 सीटें हैं। गवर्नर चुनाव कुल 36 सीटों में से 34 राज्यों के नतीजे आ चुके हैं। 22 डेमोक्रेट्स और 12 रिपब्लिकन ने सीटें जीती हैं। 2 राज्यों में वोटों की गिनती जारी है।