स्वामी प्रसाद मौर्य पर सपा और कांग्रेस आमने-सामने! क्या बढ़ेंगी दूरियां?

स्वामी प्रसाद मौर्य पर सपा और कांग्रेस आमने-सामने! क्या बढ़ेंगी दूरियां?

UP Politics

​उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी 2027 विधानसभा चुनावों से पहले सियासी पारा अपने चरम पर पहुंच गया है। बसपा और सपा के पूर्व दिग्गज नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के भीतर दरारें साफ नजर आने लगी हैं। जहां एक तरफ सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मौर्य को गठबंधन में शामिल करने से साफ इनकार कर दिया है, वहीं कांग्रेस उनके प्रति अपना रुख बेहद नरम और सहयोगी बनाए हुए है।

बंद कमरे की मुलाकात

​दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई ‘इंडिया’ गठबंधन की महारैली में स्वामी प्रसाद मौर्य अपने समर्थकों के साथ शामिल हुए थे। रैली के तुरंत बाद यूपी कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और स्वामी प्रसाद मौर्य के बीच हुई मुलाकात ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी। यह मुलाकात इसलिए भी बेहद संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि इसके ठीक तीन दिन पहले अखिलेश यादव ने सार्वजनिक तौर पर मौर्य को गठबंधन से बाहर रखने की बात कही थी, जिसके जवाब में मौर्य ने भी सपा प्रमुख पर तीखा हमला बोला था।

​क्या दोस्तों से मिलना छोड़ दूं? 

​स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ मुलाकात पर उठ रहे सवालों का बेबाक जवाब देते हुए यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि राजनीति से अलग व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के भी अपने मायने होते हैं। क्या मैं अपने दोस्तों से मिलना बंद कर दूं? क्या मैं अपनी सामाजिक जिंदगी छोड़ दूं? अखिलेश यादव या अन्य नेता किससे मिलते हैं, यह उनका अधिकार है। ठीक उसी तरह यह मेरा भी अधिकार है कि मैं किससे मिलूं और किससे नहीं। 

​गठबंधन का फैसला लखनऊ नहीं दिल्ली करेगा

​दूसरी ओर, सपा और कांग्रेस के बीच बनते-बिगड़ते समीकरणों पर यूपी कांग्रेस अध्यक्ष आराधना मिश्रा ‘मोना’ ने केंद्रीय नेतृत्व का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ‘इंडिया’ गठबंधन किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, इसका गठन दिल्ली में शीर्ष नेताओं द्वारा हुआ था। गठबंधन में किसे शामिल करना है और किसे नहीं, इसका अंतिम निर्णय राज्यों के स्थानीय नेता नहीं बल्कि केंद्रीय नेतृत्व करेगा।

गठबंधन के अंदर नया घमासान

​ओबीसी समाज के बड़े चेहरे माने जाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर अखिलेश यादव का कड़ा रुख और कांग्रेस नेताओं की उनसे बढ़ती नजदीकियां यह इशारा करती हैं कि उत्तर प्रदेश विपक्षी गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। अब देखना यह होगा कि केंद्रीय नेतृत्व के इस रुख के बाद अखिलेश यादव अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाते हैं।