बुरी तरह हारी ट्रंप की पार्टी

नई दिल्ली। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सारे जतन करने के बावजूद अमेरिका के लोगों ने उनकी रिपब्लिकन पार्टी को बुरी तरह से हरा दिया है। मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट में अपना बहुमत गंवा दिया है। डमोक्रेटिक पार्टी ने दोनों सदनों में अपना नियंत्रण बना लिया है। अब राष्ट्रपति के रूप में बचे हुए दो साल के कार्यकाल में ट्रंप को डेमोक्रेटस के सहारे कामकाज करना होगा।

राष्ट्रपति ट्रंप ने नतीजों की घोषणा शुरू होने के तुरंत बाद हार स्वीकार कर ली थी और कहा था कि वे डेमोक्रेट्स के साथ मिल कर काम करने को तैयार हैं। हालांकि साथ ही यह भी कह दिया कि बैलेट पर उनका नाम या तस्वीर नहीं थी अन्यथा उनकी पार्टी जीत जाती। उनका कहना था कि अगर राष्ट्रपति का चुनाव होता और उनका नाम होता तो जीत मिल जाती।

बहरहाल, ईरान सहित सात देशों में युद्ध का मोर्चा खोल कर ट्रंप ने अपने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन यानी मागा सपोर्ट बेस को नाराज कर दिया था। ऊपर से बढ़ती महंगाई और ट्रंप परिवार पर लगे आरोपों की वजह से भी उनके खिलाफ नाराजगी थी। तभी अमेरिका के मतदाताओं ने ट्रंप की पार्टी को निर्णायक रूप से पराजित किया है।

अमेरिकी कांग्रेस के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्स की कुल 435 सीटों में से गिनती पूरी होने से पहले ही डेमोक्रेटिक पार्टी ने 228 सीटें जीत कर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया। बुधवार की देर शाम तक ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने सिर्फ 139 सीटें जीती थीं। ऐसी ही कांग्रेस के ऊपरी सदन यानी सीनेट की एक सौ सीटों में से 35 पर चुनाव हुए थे, जिनमें से देर शाम तक 33 सीटों के नतीजे सामने आ चुके थे। इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी ने 20 और रिपब्लिकन पार्टी ने 13 सीटें जीती हैं। इस नतीजे के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 54 और रिपब्लिकन पार्टी के पास 44 सीटें हो गईं। पहले ट्रंप की पार्टी के पास 53 सीटें थीं।

अमेरिका के 36 राज्यों में गवर्नर के चुनाव भी हुए थी, जिनमें से देर शाम तक 34 के नतीजे आ गए थे। इनमें से 22 राज्यों में डेमोक्रेट्स जीते हैं और ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को सिर्फ 12 राज्यों में जीत मिली है। इससे दिख रहा है कि ट्रंप की पार्टी के मुकाबले दोगुने राज्यों में उनकी विरोधी पार्टी जीती है। ट्रंप की पार्टी कई ऐसे राज्यों में भी हारी है, जिन्हें रिपब्लिकन पार्टी का पुराना गढ़ माना जाता था। भारतीय मूल के विवेक रामास्वामी भी चुनाव हार गए हैं।

ट्रंप के लिए निजी तौर पर सबसे ज्यादा झटका देने वाला नतीजा मिशिगन से आया, जहां से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अब्दुल अल सैयद ने जीत हासिल की। वे अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं। ट्रंप ने अब्दुल को खुले मंच से ‘जिहादी’ कहा था। 25 अक्टूबर को मिशिगन में एक चुनावी रैली के दौरान ट्रंप ने कहा था, ‘मैं यहां एक जिहादी और मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्य को अमेरिकी सीनेटर बनने से रोकने आया हूं’। ट्रंप ने यहां तक कहा था कि अगर अल सैयद सीनेटर बनते हैं, तो उन्हें संसद में जाने से पहले मेटल डिटेक्टर से गुजरना चाहिए।

Stock Market Today : बाजार पर आज इन खबरों का दिखेगा असर, कोई ट्रेड लेने से पहले इन पर डाल लें एक नजर

Market news : गिफ्ट निफ्टी से मिल रहे संकेतों को देखते हुए लगता है कि 5 नवंबर को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्सों में एक मजबूत शुरुआत देखने को मिल सकती है। शुरुआती कारोबार में गिफ्ट निफ्टी 316 अंक ऊपर चढ़कर 24,315 के आसपास ट्रेड कर रहा था। यहां हम आपके लिए तमाम समाचार प्लेटफॉर्मों पर चल रही आज की ऐसी अहम खबरों की एक सूची जारी कर रहें हैं जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं।

मार्केट ओवरव्यू

4 नवंबर को भारतीय इक्विटी बेंचमार्क ने लगातार पांचवें सत्र में भी अपनी बढ़त बनाए रखी। बाजार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, विदेशी फंडों निवेश और घरेलू कंपनियों के मजबूत नतीजों से सपोर्ट मिला। हालांकि, कमजोर ग्लोबल संकेतों और अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण निवेशक सतर्क रहे। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 383.55 अंक यानी 0.50 प्रतिशत की बढ़त के साथ 77,301.40 पर और निफ्टी 149.75 अंक यानी 0.63 प्रतिशत की बढ़त के साथ 23,960.60 पर बंद हुआ।

बाजार में बुल्स का जोश हाई

बाजार को कच्चे तेल और FIIs का डबल पावर मिल रहा है। गिफ्ट निफ्टी में 350 प्वाइंट से ज्यादा का उछाल है। FIIs की भी दमदार वापसी देखने को मिली है। इनकी तरफ से कैश और वायदा मिलाकर करीब 10 हजार करोड़ रुपये की खरीदारी हुई है। पिछले 7 दिनों में कैश में 25000 करोड़ की नेट खरीदारी देखने को मिली है।

अमेरिकी बाजारों में जोरदार तेजी

अमेरिका के मिड टर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की भारी जीत से अमेरिकी बाजार झूम उठे हैं। डाओ जोंस में 18 महीने की सबसे बड़ी तेजी देखने को मिली है। इसमें 1500 अंकों का जोरदार उछाल आया है। S&P और नैस्डैक भी डेढ़ परसेंट दौड़े हैं। लेकिन डेटा सेंटर से जुड़े शेयरों में भारी बिकवाली आई है। इसके असर से एशिया में कॉस्पी भी 5 परसेंट नीचे दिख रहा है।

ट्रंप के हार के बाद क्रूड में भारी गिरावट

कच्चे तेल में बड़ी गिरावट आई है। यह 9 फीसदी टूटकर 95 डॉलर के नीचे आ गया है। यह 2 महीने के निचले स्तरों पर पहुंच गया है। ट्रंप की हार के बाद ईरान युद्ध खत्म होने की उम्मीद बढ़ने से ये गिरावट बढ़ी है। इधर डॉलर इंडेक्स कमजोर होने से सोने-चांदी में तूफानी तेजी है। सोना 3.5% तो चांदी 5% उछली है।

BSE का मुनाफा 7.5% घटा

दूसरी तिमाही में BSE के नतीजे फीके रहे हैं। तिमाही आधार पर इसका मुनाफा 7.5 फीसदी घटा है। रेवेन्यू में भी 8.5 फीसदी का दबाव दिखा है। लेकिन मार्जिन में 220 bps का सुधार दिखा है।

अपोलो हॉस्पिटल के नतीजे अनुमान से अच्छे

अपोलो हॉस्पिटल्स ने अनुमान से अच्छे नतीजे पेश किए है। इसके मुनाफे 34 परसेंट और रेवेन्यू में 23 परसेंट का उछाल आया है। मार्जिन में भी बढ़त हुई है। अरविंदो फार्मा के रिजल्ट उम्मीद से बेहतर रहे हैं। इसकी प्रॉफिट ग्रोथ 33 परसेंट रही। आय और मार्जिन में भी बढ़ोतरी हुई है।

डाबर के Q2 मुनाफे और रेवेन्यू में 11.7% की बढ़ोतरी

दूसरी तिमाही में डाबर के नतीजे अनुमान के करीब रहे हैं। इसके आय और मुनाफे में 11.7% का उछाल आया है। हालांकि मार्जिन उम्मीद से थोड़ा कम रही है। इसमें 60 bps का दबाव दिखा है। वहीं, वॉल्यूम ग्रोथ 5.5 फीसदी रही है। कंपनी के भारतीय FMCG कारोबार में 10.7% की ग्रोथ रही है।

तीन गुना हुआ नायिका का मुनाफा, लेंसकार्ट के प्रॉफिट और मार्जिन में उछाल

दूसरी तिमाही में नायिका का मुनाफा तीन गुना हो गया है। रेवेन्यू में भी 28% की बढ़त दिखी है। मार्जिन में भी उछाल दिखा है। दूसरी ओर लेंसकार्ट का प्रॉफिट डबल हो गया है। एबिटा में 50% का उछाल आया है। मार्जिन में भी बढ़त दिखी है।

भारती, टाइटन, M&M और ONGC के नतीजे आज

आज निफ्टी की चार कंपनियों भारती एयरटेल, टाइटन, M&M और ONGC के Q2 नतीजे आएंगे। टाइटन का मुनाफा 30% बढ़ सकता है। मार्जिन में भी सुधार संभव है। वहीं ब्रिटानिया, भारत फोर्ज और ग्लेनमार्क समेत वायदा की 13 कंपनियां भी अपने रिजल्ट पेश करेंगी।

एशियाई मुद्राओं में बढ़त

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ज्यादातर एशियाई मुद्राओं में तेजी देखने को मिल रही है। फिलीपीन पेसो सबसे ज्यादा मजबूत हुआ है,जिसमें 0.36 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। इसके बाद थाई बाहत का नंबर है जो 0.42 प्रतिशत मजबूत हुआ है। जापानी येन और मलेशियाई रिंगित में 0.29-0.29 प्रतिशत की तेजी आई है, जबकि दक्षिण कोरियाई वॉन और सिंगापुर डॉलर में क्रमशः 0.18 प्रतिशत और 0.08 प्रतिशत की बढ़त दिख रही है।

दूसरी ओर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ताइवान डॉलर में 0.21 प्रतिशत की कमजोरी आई है। जबकि चीनी रेनमिनबी और इंडोनेशियाई रुपिया में क्रमशः 0.07 प्रतिशत और 0.04 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

विदेशी निवेशकों का रुख

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने लगातार चौथे सत्र में भी अपनी खरीदारी जारी रखी और 4 नवंबर को 7,284 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। इसके विपरीत,घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने लगातार चौथे सत्र में भी बिकवाली जारी रखी और 3,712 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।

US बॉन्ड यील्ड

बुधवार को ट्रेजरी यील्ड में गिरावट आई। अमेरिका में डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। बेंचमार्क US 10-ईयर ट्रेजरी यील्ड 2 बेसिस पॉइंट गिरकर 4.86% पर और 2-ईयर बॉन्ड की यील्ड लगभग 2 बेसिस पॉइंट गिरकर 4.56% पर आ गई है।

डॉलर इंडेक्स

गुरुवार को डॉलर में थोड़ी गिरावट आई है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स की भारी जीत ने अनिश्चितता के एक बड़े कारण को दूर कर दिया है। इससे ग्लोबल इक्विटीज में तेजी आई है। फिलहाल डॉलर इंडेक्स 101.37 पर ट्रेड कर रहा है।

 

 

Market Outlook : बाजार में दिखी जोरदार तेजी, जानिए 5 नवंबर को कैसी रह सकती है सेंसेक्स-निफ्टी का चाल

ट्रम्प ने मिडटर्म चुनाव में हार से पल्ला झाड़ा:पहले खुद को चेहरा बता रहे थे, चुनाव प्रचार में 47 बार अपने नाम पर वोट मांगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार से पल्ला झाड़ लिया है। चुनाव प्रचार के दौरान वे बार-बार खुद को चुनाव का चेहरा बता रहे थे और वोटर्स से उन्हें उम्मीदवार मानकर वोट देने की अपील कर रहे थे। उन्होंने 47 बार खुद के नाम पर लोगों से वोट देने के लिए कहा। लेकिन नतीजे आने के बाद ट्रम्प ने कहा कि वे खुद चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे, इसलिए रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक बड़ी संख्या में वोट डालने नहीं पहुंचे। इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट, दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है। यह ट्रम्प के लिए बड़ा झटका है। अब डेमोक्रेट्स के पास उनके कार्यकाल के बचे हुए दो साल में उनके फैसलों और योजनाओं को रोकने की ताकत होगी। ट्रम्प बोले- मैं बैलेट पर नहीं था, इसलिए हार हुई चुनाव नतीजे आने के बाद ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, “मैं चुनाव में उम्मीदवार नहीं था। इसी वजह से हम ज्यादा लोगों को वोट डालने के लिए नहीं ला सके।” ट्रम्प का यह बयान उनके चुनाव प्रचार से बिल्कुल उलट है। उस दौरान वे खुद को चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा बता रहे थे। उन्होंने उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी मुद्दों, रणनीति और प्रचार के संदेश तक में दखल दिया था। उन्होंने बार-बार वोटर्स से कहा था कि वे उनके कामकाज को ध्यान में रखकर वोट दें। यानी जीत की उम्मीद थी तो ट्रम्प खुद चुनाव का चेहरा थे, लेकिन हार मिली तो उन्होंने खुद को चुनाव से अलग बता दिया। महंगाई और ईरान युद्ध से नाराज थे वोटर्स रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे महंगाई और ईरान युद्ध को बड़ी वजह माना जा रहा है। ट्रम्प ने सत्ता में आने से पहले महंगाई कम करने और अमेरिका को नए युद्धों से दूर रखने का वादा किया था। लेकिन उनके कार्यकाल में ईरान के साथ युद्ध शुरू हो गया। इससे तेल की कीमतें बढ़ीं और अमेरिका में पेट्रोल महंगा हो गया। कई वोटर्स को लगा कि ट्रम्प ने उनसे किए वादे पूरे नहीं किए। वे महंगाई से राहत और सुरक्षित सीमा चाहते थे, लेकिन उन्हें महंगी चीजों और नई जंग का सामना करना पड़ा। दूसरे देशों से आने वाले सामान पर ट्रम्प के लगाए टैक्स ने भी लोगों की जेब पर बोझ बढ़ाया। प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से भी लोग नाराज थे। सरकार ने ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार किया जो कई सालों से अमेरिका में रह रहे थे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ईरान जंग को चुनाव में हार की वजह बताया। ट्रम्प के पसंदीदा उम्मीदवार भी चुनाव हार गए ट्रम्प ने अपनी पसंद के नेताओं को रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनवाने में भी पूरी ताकत लगाई थी। लेकिन उनके पसंदीदा उम्मीदवार भी चुनाव नहीं जीत पाए। टेक्सास में केन पैक्सटन और साउथ कैरोलाइना में डार्लिन ग्राहम को ट्रम्प ने खुद समर्थन दिया था। इसके बावजूद दोनों हार गए। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि दूसरे उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए बेहतर थे। ट्रम्प ने अपनी पार्टी को ज्यादा सीटें दिलाने के लिए कई राज्यों में चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं भी बदलवाने की कोशिश की थी। लेकिन उनका यह दांव उलटा पड़ गया। डेमोक्रेट्स ने उन इलाकों में भी अच्छा प्रदर्शन किया, जहां रिपब्लिकन पार्टी मजबूत मानी जाती है। फ्लोरिडा में कैथी कैस्टर अपनी सीट बचाने में कामयाब रहीं। उनके चुनाव क्षेत्र में 2024 के मुकाबले डेमोक्रेट्स को करीब 16 प्रतिशत अंक ज्यादा वोट मिले। डेमोक्रेट्स के पास अब ट्रम्प के फैसले रोकने की ताकत दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रम्प के लिए अपने एजेंडे को लागू करना आसान नहीं होगा। डेमोक्रेट्स उनके प्रस्तावों को रोक सकते हैं और सरकार के फैसलों पर सवाल उठा सकते हैं। राष्ट्रपति के तौर पर ट्रम्प के पास अभी दो साल का समय है, लेकिन अब उन्हें संसद में विपक्ष का सामना करना पड़ेगा। ट्रम्प ने कहा है कि वे डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस के साथ मिलकर काम करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे अगले दो साल सिर्फ हर प्रस्ताव पर वीटो लगाते हुए नहीं बिताना चाहते। हालांकि, इससे पहले वे कह चुके थे कि डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने पर वे ‘मिस्टर वीटो’ बन जाएंगे। ट्रम्प के समर्थक बोले- उनकी राजनीति अभी खत्म नहीं हुई ट्रम्प के समर्थकों का कहना है कि चुनावी हार को उनकी राजनीति का अंत नहीं मानना चाहिए। क्लब फॉर ग्रोथ के अध्यक्ष डेविड मैकिंटोश ने कहा कि ट्रम्प के विरोधी पहले भी कई बार उनके राजनीतिक अंत की बात कह चुके हैं, लेकिन हर बार गलत साबित हुए। अमेरिका के इतिहास में भी कई बार सत्ताधारी पार्टी को मिडटर्म चुनाव में बड़ी हार का सामना करना पड़ा, लेकिन बाद में उसने वापसी की। 1974 में वॉटरगेट कांड के बाद रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ था, लेकिन छह साल बाद रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति बन गए। इसी तरह 1994 में बिल क्लिंटन और 2010 में बराक ओबामा की पार्टी को मिडटर्म चुनाव में हार मिली थी, लेकिन दोनों नेता दो साल बाद राष्ट्रपति चुनाव जीत गए थे। डेमोक्रेट्स के सामने भी जीत को बनाए रखने की चुनौती डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बाद अब उसके भीतर भी इस बात पर बहस होगी कि इस सफलता की असली वजह क्या रही। पार्टी को ट्रम्प के विरोध का फायदा मिला।
लेकिन कुछ नेताओं का मानना है कि वामपंथी विचारों वाले वोटर्स के समर्थन ने जीत दिलाई, जबकि दूसरे नेताओं के मुताबिक, रिपब्लिकन पार्टी से नाराज वोटर्स का साथ मिलना ज्यादा अहम रहा। पूर्व डेमोक्रेटिक नेता रहम इमैनुएल ने कहा कि अब पार्टी को तय करना होगा कि वह इस जीत को सिर्फ चुनावी सफलता मानती है या इसे अमेरिकी राजनीति में बड़े बदलाव का मौका बनाती है। उनके मुताबिक, 2027 में पार्टी जो फैसले लेगी, उनसे तय होगा कि यह जीत कितनी दूर तक असर डालेगी। ———————-

ट्रम्प ने मिडटर्म चुनाव में हार से पल्ला झाड़ा:पहले खुद को चेहरा बता रहे थे, चुनाव प्रचार में 47 बार अपने नाम पर वोट मांगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार से पल्ला झाड़ लिया है। चुनाव प्रचार के दौरान वे बार-बार खुद को चुनाव का चेहरा बता रहे थे और वोटर्स से उन्हें उम्मीदवार मानकर वोट देने की अपील कर रहे थे। उन्होंने 47 बार खुद के नाम पर लोगों से वोट देने के लिए कहा। लेकिन नतीजे आने के बाद ट्रम्प ने कहा कि वे खुद चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे, इसलिए रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक बड़ी संख्या में वोट डालने नहीं पहुंचे। इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट, दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है। यह ट्रम्प के लिए बड़ा झटका है। अब डेमोक्रेट्स के पास उनके कार्यकाल के बचे हुए दो साल में उनके फैसलों और योजनाओं को रोकने की ताकत होगी। ट्रम्प बोले- मैं बैलेट पर नहीं था, इसलिए हार हुई चुनाव नतीजे आने के बाद ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा, “मैं चुनाव में उम्मीदवार नहीं था। इसी वजह से हम ज्यादा लोगों को वोट डालने के लिए नहीं ला सके।” ट्रम्प का यह बयान उनके चुनाव प्रचार से बिल्कुल उलट है। उस दौरान वे खुद को चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा बता रहे थे। उन्होंने उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी मुद्दों, रणनीति और प्रचार के संदेश तक में दखल दिया था। उन्होंने बार-बार वोटर्स से कहा था कि वे उनके कामकाज को ध्यान में रखकर वोट दें। यानी जीत की उम्मीद थी तो ट्रम्प खुद चुनाव का चेहरा थे, लेकिन हार मिली तो उन्होंने खुद को चुनाव से अलग बता दिया। महंगाई और ईरान युद्ध से नाराज थे वोटर्स रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे महंगाई और ईरान युद्ध को बड़ी वजह माना जा रहा है। ट्रम्प ने सत्ता में आने से पहले महंगाई कम करने और अमेरिका को नए युद्धों से दूर रखने का वादा किया था। लेकिन उनके कार्यकाल में ईरान के साथ युद्ध शुरू हो गया। इससे तेल की कीमतें बढ़ीं और अमेरिका में पेट्रोल महंगा हो गया। कई वोटर्स को लगा कि ट्रम्प ने उनसे किए वादे पूरे नहीं किए। वे महंगाई से राहत और सुरक्षित सीमा चाहते थे, लेकिन उन्हें महंगी चीजों और नई जंग का सामना करना पड़ा। दूसरे देशों से आने वाले सामान पर ट्रम्प के लगाए टैक्स ने भी लोगों की जेब पर बोझ बढ़ाया। प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से भी लोग नाराज थे। सरकार ने ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार किया जो कई सालों से अमेरिका में रह रहे थे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ईरान जंग को चुनाव में हार की वजह बताया। ट्रम्प के पसंदीदा उम्मीदवार भी चुनाव हार गए ट्रम्प ने अपनी पसंद के नेताओं को रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनवाने में भी पूरी ताकत लगाई थी। लेकिन उनके पसंदीदा उम्मीदवार भी चुनाव नहीं जीत पाए। टेक्सास में केन पैक्सटन और साउथ कैरोलाइना में डार्लिन ग्राहम को ट्रम्प ने खुद समर्थन दिया था। इसके बावजूद दोनों हार गए। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि दूसरे उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए बेहतर थे। ट्रम्प ने अपनी पार्टी को ज्यादा सीटें दिलाने के लिए कई राज्यों में चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं भी बदलवाने की कोशिश की थी। लेकिन उनका यह दांव उलटा पड़ गया। डेमोक्रेट्स ने उन इलाकों में भी अच्छा प्रदर्शन किया, जहां रिपब्लिकन पार्टी मजबूत मानी जाती है। फ्लोरिडा में कैथी कैस्टर अपनी सीट बचाने में कामयाब रहीं। उनके चुनाव क्षेत्र में 2024 के मुकाबले डेमोक्रेट्स को करीब 16 प्रतिशत अंक ज्यादा वोट मिले। डेमोक्रेट्स के पास अब ट्रम्प के फैसले रोकने की ताकत दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रम्प के लिए अपने एजेंडे को लागू करना आसान नहीं होगा। डेमोक्रेट्स उनके प्रस्तावों को रोक सकते हैं और सरकार के फैसलों पर सवाल उठा सकते हैं। राष्ट्रपति के तौर पर ट्रम्प के पास अभी दो साल का समय है, लेकिन अब उन्हें संसद में विपक्ष का सामना करना पड़ेगा। ट्रम्प ने कहा है कि वे डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस के साथ मिलकर काम करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे अगले दो साल सिर्फ हर प्रस्ताव पर वीटो लगाते हुए नहीं बिताना चाहते। हालांकि, इससे पहले वे कह चुके थे कि डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने पर वे ‘मिस्टर वीटो’ बन जाएंगे। ट्रम्प के समर्थक बोले- उनकी राजनीति अभी खत्म नहीं हुई ट्रम्प के समर्थकों का कहना है कि चुनावी हार को उनकी राजनीति का अंत नहीं मानना चाहिए। क्लब फॉर ग्रोथ के अध्यक्ष डेविड मैकिंटोश ने कहा कि ट्रम्प के विरोधी पहले भी कई बार उनके राजनीतिक अंत की बात कह चुके हैं, लेकिन हर बार गलत साबित हुए। अमेरिका के इतिहास में भी कई बार सत्ताधारी पार्टी को मिडटर्म चुनाव में बड़ी हार का सामना करना पड़ा, लेकिन बाद में उसने वापसी की। 1974 में वॉटरगेट कांड के बाद रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ था, लेकिन छह साल बाद रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति बन गए। इसी तरह 1994 में बिल क्लिंटन और 2010 में बराक ओबामा की पार्टी को मिडटर्म चुनाव में हार मिली थी, लेकिन दोनों नेता दो साल बाद राष्ट्रपति चुनाव जीत गए थे। डेमोक्रेट्स के सामने भी जीत को बनाए रखने की चुनौती डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बाद अब उसके भीतर भी इस बात पर बहस होगी कि इस सफलता की असली वजह क्या रही। पार्टी को ट्रम्प के विरोध का फायदा मिला।
लेकिन कुछ नेताओं का मानना है कि वामपंथी विचारों वाले वोटर्स के समर्थन ने जीत दिलाई, जबकि दूसरे नेताओं के मुताबिक, रिपब्लिकन पार्टी से नाराज वोटर्स का साथ मिलना ज्यादा अहम रहा। पूर्व डेमोक्रेटिक नेता रहम इमैनुएल ने कहा कि अब पार्टी को तय करना होगा कि वह इस जीत को सिर्फ चुनावी सफलता मानती है या इसे अमेरिकी राजनीति में बड़े बदलाव का मौका बनाती है। उनके मुताबिक, 2027 में पार्टी जो फैसले लेगी, उनसे तय होगा कि यह जीत कितनी दूर तक असर डालेगी। ———————-

US Stock Market Rally: ट्रंप की करारी हार के बाद अमेरिकी शेयर बाजार में तूफानी तेजी, डाउ जोन्स 1200 अंक से ज्यादा उछला

US Stock Market Rally: अमेरिकी शेयर बाजार में बुधवार को जोरदार तेजी देखने को मिली। मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की बड़ी जीत और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नतीजे स्वीकार करने से बाजार को राहत मिली। चुनाव से जुड़ी अनिश्चितता खत्म होने के बाद निवेशकों ने जमकर खरीदारी की।

डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में बहुमत हासिल किया। टेक्सास समेत कई अहम गवर्नर चुनावों में भी पार्टी को जीत मिली। अब डेमोक्रेट्स ट्रंप सरकार की नीतियों पर लगाम लगा सकेंगे।

ट्रंप ने कारोबार को बढ़ावा देने के लिए टैक्स में कटौती की है। वहीं, उनके टैरिफ और ईरान के साथ युद्ध से महंगाई बढ़ी है। बाजार को उम्मीद है कि संसद में डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी से नीतियों को लेकर संतुलन बनेगा।

डाउ जोन्स 1,000 अंक से ज्यादा चढ़ा

बुधवार को शुरुआती कारोबार में ही डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 1,200 अंक से ज्यादा उछल गया। S&P 500 में 1.73% की बढ़त दर्ज की गई। वहीं, नैस्डैक कंपोजिट भी 2.16% चढ़ा। ट्रंप की हार के बाद गूगल, एपल, एमेजॉन और माइक्रोसॉफ्ट के शेयरों में करीब 8% तक तेजी देखने को मिली।

ट्रंप ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि वह चुनाव के नतीजे स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल से भी कहा कि वह और रिपब्लिकन पार्टी डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम करेंगे।

Freedom Capital Markets के चीफ मार्केट स्ट्रैटेजिस्ट जे वुड्स के मुताबिक, बाजार में तेजी की एक वजह चुनाव नतीजों पर राष्ट्रपति का शुरुआती रुख भी रहा। उन्होंने कहा कि आगे भी अनिश्चितता बनी रहेगी, लेकिन सरकार में राजनीतिक गतिरोध की स्थिति बाजार के लिए अच्छी साबित हो सकती है।

AI और डेटा सेंटर कंपनियों पर दबाव

चुनाव से पहले निवेशकों को चिंता थी कि डेमोक्रेट्स की बड़ी जीत से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर से जुड़ी कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। आशंका थी कि देशभर में नए डेटा सेंटर बनाने पर सख्त नियम लागू हो सकते हैं।

टेक्सास में डेमोक्रेट्स की गिना हिनोजोसा की जीत ने इस चिंता को और बढ़ा दिया। उन्होंने राज्य में डेटा सेंटर निर्माण पर तत्काल रोक लगाने का वादा किया है। टेक्सास डेटा सेंटर उद्योग का एक बड़ा केंद्र है।

इस बीच CoreWeave के शेयरों में गिरावट आई। टेक्सास में मुख्यालय रखने वाली एलॉन मस्क की SpaceX के शेयर भी नीचे रहे। Nvidia का स्टॉक भी लाल निशान में था।

राजनीतिक गतिरोध बाजार के लिए अच्छा?

इतिहास बताता है कि जब अमेरिकी सरकार में दोनों पार्टियों के बीच सत्ता का संतुलन रहता है, तब शेयर बाजार का प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। ऐसी स्थिति में बड़े नीतिगत बदलाव और नए नियम लागू करना मुश्किल होता है।

Morgan Stanley Investment Management के एंड्रयू स्लिमन ने CNBC से कहा कि बाजार राजनीतिक गतिरोध को पसंद करता है। उसे किसी एक पार्टी के पास बहुत ज्यादा ताकत होना पसंद नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर चुनाव नतीजों से मध्य पूर्व के संघर्ष को खत्म करने की कोशिश तेज होती है, तो तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है। इससे फेडरल रिजर्व और महंगाई पर दबाव कम होगा।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

US Midterm Election Impact: अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को फायदा मिलेगा या बढ़ सकती हैं मुश्किलें?

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बीच आए इन नतीजों से अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन बदल गया है। अब संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी होगी जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बने रहेंगे। इस चुनावी नतीजे का असर सिर्फ अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के लिए भी इसके कई मायने हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार शुल्क, रूस से तेल खरीद, एच-1बी वीजा, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंधों और भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम को लेकर ट्रंप के बयानों के कारण तनाव देखने को मिला है।

ऐसे में सवाल है कि क्या कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में कुछ राहत मिलेगी? क्या भारतीय सामान पर अमेरिकी शुल्क घट सकते हैं? क्या भारतीय आईटी पेशेवरों को एच-1बी वीजा के मामले में राहत मिल सकती है? और क्या रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ेगा?

हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट ने अपने एक्सप्लेनर में विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक बताया है कि डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को बातचीत के लिए कुछ अतिरिक्त मौके मिल सकते हैं लेकिन इससे ट्रंप प्रशासन की नीतियां तुरंत बदल जाएंगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि व्यापार शुल्क और वीजा से जुड़े कई अहम फैसलों में राष्ट्रपति के पास अब भी व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं। आपको बता दें कि नई अमेरिकी कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज संभालेगी।

भारत के लिए क्यों अहम हैं अमेरिकी मध्यावधि चुनाव?

अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। भारतीय आईटी सेवाओं के लिए भी अमेरिकी बाजार बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और रक्षा तकनीक के मामले में दोनों देशों की साझेदारी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने का असर भारत के व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, आव्रजन और रक्षा सहयोग पर पड़ सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों में इस साल कई मुद्दों पर खींचतान रही है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय प्रोडक्ट्स पर टैरिफ लगाए। व्यापार समझौते पर बातचीत अटकी रही। अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बनाया। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने में मध्यस्थता की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ अमेरिका के बढ़ते संपर्क और एच-1बी वीजा से जुड़ी नई फीस ने भी भारत की चिंताएं बढ़ाई हैं। भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को मजबूत बनाए रखे लेकिन रूस जैसे देशों के साथ अपने स्वतंत्र विदेश नीति संबंधों को भी प्रभावित न होने दे।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर क्या पड़ेगा असर?

भारत के लिए सबसे तात्कालिक चिंता व्यापार शुल्क और लंबित व्यापार समझौता है। दोनों देशों ने फरवरी 2026 में एक व्यापार समझौते की रूपरेखा का ऐलान किया था। इसके तहत भारतीय प्रोडक्ट्स पर अमेरिकी शुल्क 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किए जाने की बात थी। इसके बदले भारत को अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कुछ खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने थे। लेकिन इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने स्थिति बदल दी। 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने व्यापक शुल्क लगाने के लिए जिस आपातकालीन शक्तियों से जुड़े कानून का इस्तेमाल किया था वह उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं देता।

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 फीसदी शुल्क की दर वास्तव में लागू ही नहीं हो पाई। इसके बाद अस्थायी रूप से 10 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाया गया और 24 जुलाई से ज्यादातर भारतीय उत्पादों पर सेक्शन 301 के तहत 10 फीसदी शुल्क लागू हुआ। इस बीच भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 29 अक्टूबर को कहा था कि अंतरिम समझौता अंतिम चरण में है और इससे भारतीय किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा होगी। हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है। भारत में किसान संगठनों को आशंका है कि समझौते के जरिए आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों के लिए भारतीय बाजार का रास्ता खुल सकता है।

क्या डेमोक्रेट्स भारत के लिए कम शुल्क की राह खोलेंगे?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत आने से भारत को तत्काल व्यापारिक राहत मिलने की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी भी पूरी तरह मुक्त व्यापार की समर्थक नहीं है। इसलिए उनकी जीत को भारतीय उत्पादों पर शुल्क घटने का संकेत नहीं माना जा सकता। हालांकि डेमोक्रेट्स भारत को चीन के मुकाबले एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानते हैं। ऐसे में वे मौजूदा व्यापार समझौते की कुछ शर्तों में बदलाव की मांग कर सकते हैं। डेमोक्रेटिक बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा अमेरिकी शुल्क के असर पर सुनवाई करा सकती है। खास तौर पर यह जांचने की कोशिश हो सकती है कि आयात पर लगाए गए शुल्क से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए वस्तुएं कितनी महंगी हुई हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस में ऐसा कोई कानून पारित होने की संभावना कम है जिससे भारत पर लगने वाले शुल्क में बड़ा बदलाव हो। इसलिए भारत के लिए व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखना जरूरी होगा। डेमोक्रेट्स की जीत से बातचीत का माहौल बदल सकता है, लेकिन समझौते की शर्तें अपने आप नहीं बदलेंगी।

रूस से तेल खरीदने पर भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी?

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक और बड़ा मुद्दा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर करीब आठ महीने से दबाव बना हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास पैदा हुई बाधाओं ने भी तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.8 फीसदी बढ़कर 104.42 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। बाजार की नजर इस बात पर थी कि ईरान को लेकर अमेरिकी प्रशासन अगला कदम क्या उठाता है। ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा था कि अमेरिका की ईरान पर तत्काल हमला करने की कोई योजना नहीं है। वहीं एक ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि दोनों पक्ष किसी समझौते से अभी काफी दूर हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव क्यों अहम है?

भारत के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना भी लगातार अमेरिकी दबाव का विषय रहा है। 18 सितंबर को हस्ताक्षरित एक अमेरिकी कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसदी तक शुल्क लगाने का प्रावधान है। हालांकि ट्रंप ने 16 अक्टूबर को इन शुल्कों से छूट दे दी थी। इस छूट की कोई तय समाप्ति तारीख नहीं है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति इसे वापस ले सकते हैं। फरवरी में जारी अमेरिकी आदेश के तहत वाणिज्य विभाग को यह निगरानी करने का निर्देश दिया गया है कि भारत दोबारा रूस से तेल खरीदना शुरू करता है या नहीं। डेमोक्रेट्स के सत्ता में आने से रूस के प्रति अमेरिकी नीति में नरमी आने की संभावना नहीं दिखती। मार्च में जब अमेरिकी वित्त विभाग ने होर्मुज क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने के दौरान भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए अस्थायी छूट दी थी, तब कांग्रेस के डेमोक्रेटिक सदस्यों ने इसका विरोध किया था। इसलिए भारत के लिए स्थिति आसान होने के बजाय कुछ मामलों में चुनौतीपूर्ण भी हो सकती है।

एच-1बी वीजा पर भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलेगी राहत?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का एक बड़ा असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले युवाओं पर पड़ सकता है। भारतीय नागरिक एच-1बी वीजा पाने वालों में सबसे बड़ा समूह हैं। इसलिए इस वीजा से जुड़े अमेरिकी नियमों में बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों पर सबसे ज्यादा पड़ सकता है। सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए एच-1बी आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का एलान किया था। इससे भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों की चिंता बढ़ी। हालांकि इस फीस की वसूली को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों ने 24 जुलाई 2026 से इस फीस की वसूली पर रोक लगा रखी है। 18 सितंबर को जारी एक राष्ट्रपति आदेश के जरिए इस व्यवस्था को 21 सितंबर 2027 तक बढ़ाया गया था। मैसाचुसेट्स की एक अदालत में 20 राज्यों की ओर से दायर मामले में न्यायाधीश ने कहा कि यह फीस असल में एक तरह का कर है जिसे लगाने का अधिकार सिर्फ अमेरिकी कांग्रेस के पास है।

क्या डेमोक्रेट्स एच-1बी फीस खत्म कर सकते हैं?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से एच-1बी नीति की जांच-पड़ताल बढ़ सकती है। वे इस बात पर सवाल उठा सकते हैं कि नई फीस का अमेरिकी कंपनियों और विदेशी पेशेवरों पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन इससे यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि एच-1बी वीजा की फीस तुरंत खत्म हो जाएगी या वीजा नियमों में बड़ी राहत मिल जाएगी। नई कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज शुरू करेगी। ट्रंप के पास राष्ट्रपति के रूप में वीटो का अधिकार बना रहेगा। अगर कांग्रेस ऐसा कोई विधेयक पारित करती है जो इस फीस को सीमित करता है या इसे कानून के रूप में बदलने की कोशिश करता है तो ट्रंप उसे वीटो कर सकते हैं।

भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बीच भारतीय शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। चुनाव परिणाम आने से पहले भारतीय बाजार मजबूत स्थिति में थे। मंगलवार तक चार कारोबारी सत्रों में निफ्टी 50 और सेंसेक्स करीब 5 फीसदी चढ़कर दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे। इसके पीछे कंपनियों के बेहतर नतीजे, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और विदेशी निवेशकों की ओर से खरीदारी में शुरुआती सुधार जैसे कारण थे। मंगलवार को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 6837 करोड़ रुपये यानी 721.66 मिलियन डॉलर की शुद्ध खरीदारी की। लेकिन बुधवार को तस्वीर कुछ बदली। निफ्टी 23946.35 के उच्च स्तर तक पहुंचा, जबकि सेंसेक्स ने 77396.04 का स्तर छुआ। हालांकि बाद में बाजार की बढ़त कम हो गई। इस दौरान आईटी शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। आईटी कंपनियों के शेयरों में 2.2 फीसदी की गिरावट आई। बाजार विशेषज्ञों ने इसकी वजह अमेरिकी आव्रजन नीति और आउटसोर्सिंग से जुड़ी अनिश्चितताओं को बताया। अमेरिकी बाजार में सेवाओं की मांग कमजोर रहने की आशंका भी आईटी शेयरों पर दबाव का एक कारण रही।

क्या मध्यावधि चुनाव के बाद भारतीय बाजार में तेजी आती है?

इतिहास के कुछ आंकड़े भारतीय शेयर बाजार के लिए उम्मीद की वजह हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक 1982 के बाद से अमेरिका के 11 मध्यावधि चुनावों में से छह मौकों पर उसके बाद के महीनों में भारतीय शेयर सूचकांकों ने औसतन 12 फीसदी की बढ़त दर्ज की। हालांकि इसे इस बार भी बाजार में तेजी की गारंटी नहीं माना जा सकता। कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख, कंपनियों के नतीजे और अमेरिका की आर्थिक नीतियां बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ब्रोकरेज के आकलन में निफ्टी के लिए 23200 का स्तर एक महत्वपूर्ण सपोर्ट माना गया है।

रक्षा सहयोग, क्वाड और चीन के मोर्चे पर क्या बदलेगा?

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग को दोनों देशों की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता रहा है। दोनों देश रक्षा अभ्यास, सैन्य तकनीक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने जैसे मुद्दों पर साथ काम करते रहे हैं। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा में बड़े बदलाव की संभावना कम है। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी और बजट संबंधी फैसले कुछ रक्षा परियोजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं।

इसके लिए भारत-अमेरिका क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी यानी आईसीईटी ढांचे के तहत सहयोग को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा क्वाड के तहत महत्वपूर्ण खनिजों और समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली इंटरनेट केबल जैसी परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने के अवसर भी हैं। डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी अमेरिकी विदेश नीति में कुछ मामलों में संतुलनकारी भूमिका निभा सकती है। इससे भारत को रक्षा, व्यापार और कूटनीति से जुड़े अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं।

भारत के लिए डेमोक्रेट्स की जीत के क्या मायने हैं?

ऐसे में देखें तो अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजे भारत के लिए न तो पूरी तरह राहत की खबर हैं और न ही किसी बड़े संकट का संकेत। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी बढ़ेगी। व्यापार के मोर्चे पर भारत को तत्काल शुल्क में कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। एच-1बी वीजा के मामले में भी डेमोक्रेट्स की जीत से तुरंत राहत मिलने की संभावना नहीं है। रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव जारी रह सकता है और इस मुद्दे पर कांग्रेस में बहस तेज हो सकती है। भारत की चुनौती अब यह होगी कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ अपने संबंधों को संभालते हुए अमेरिकी कांग्रेस के साथ भी संवाद मजबूत करे। आखिरकार, भारत की समस्या अमेरिका के साथ साझेदारी नहीं बल्कि ट्रंप प्रशासन के कुछ खास नीतिगत फैसले रहे हैं।

Gold Silver prices Today: दिल्ली में आज सोने-चांदी को लगे पंख, चांदी ₹9000 चढ़ी, सोना ₹4800 उछला

दिल्ली सर्राफा बाजार में आज यानी 4 नवंबर को सोने और चांदी को पंख लग गए। सोना 4,800 रुपये चढ़कर 1,46,600 रुपये पर पहुंच गया। चांदी में तो 9000 रुपये की तेजी आई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी में तेजी का असर इनकी घरेलू कीमतों पर पड़ा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी में जोरदार तेजी आई।

चांदी की कीमतें 1.93 लाख पर पहुंचीं

दिल्ली में चांदी 9,000 रुपये चढ़कर 1.93 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई। एक्सपर्ट्स का कहना है कि बुधवार को घरेलू बाजार में सोने और चांदी में आई तेजी में मजबूत त्योहारी मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमती धातुओं में तेजी का हाथ रहा। लंबे समय बाद सोने और चांदी में एक दिन में ऐसी तेजी दिखी है।

बुलियन मार्केट में सेटीमेंट मजबूत

ब्रिकवर्क रेटिंग्स के हेड ऑफ रिसर्च राजीव शरण ने कहा कि सोना अक्तूबर के अपने हाई लेवल से करीब 8 फीसदी टूट गया था। आज की तेजी से सेंटीमेंट को मजबूती मिली है। पिछले साल के धनतेरस से इस साल धनतेरस पर गोल्ड के रिटर्न को देखा जाए तो यह सिर्फ 5-7 फीसदी रहा है। लेकिन, 2024 के धनतेरस से 2025 के बीच सोने का रिटर्न करीब 65 फीसदी था।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी 4.5 फीसदी उछली

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने में जोरदार तेजी दिखी। स्पॉट गोल्ड 3 फीसदी यानी 113.72 डॉलर चढ़कर 4,043 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। सिल्वर स्पॉट भी 4.5 फीसदी के उछाल के साथ 52 डॉलर प्रति औंस पर चल रहा था। गोल्ड ने कई सत्रों के बाद 4,000 डॉलर का लेवल पार किया है, जबकि चांदी ने 50 डॉलर का लेवल पार किया है।

बुलियन को डॉलर में कमजोरी से मिला सपोर्ट

सोने की कीमतों पर अमेरिकी में मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत का भी असर पड़ा। चुनावी नतीजों से डॉलर में कमजोरी आई। इससे सोने और चांदी की कीमतों को सपोर्ट मिला। मिरै एसेट शेयरखान के एनालिस्ट प्रवीण सिंह ने कहा कि अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बहुमत में आ जाने से डेटा सेंटर्स में निवेश पर असर पड़ेगा।

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क्रूड ऑयल की कीमतों में बड़ी गिरावट 

क्रूड ऑयल की कीमतों में 4 नवंबर को बड़ी गिरावट आई। ब्रेंट क्रूड गिरकर 100 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। पिछले हफ्ते यह 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। डब्ल्यूटीआई क्रूड भी गिरकर 93 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। दोनों में 3 फीसदी से ज्यादा गिरावट आई। इसका पॉजिटिव असर सोने की कीमतों पर पड़ा। क्रूड में नरमी से इनफ्लेशन पर दबाव घटेगा। इससे दिसंबर में फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने की संभावना में कमी आ सकती है। यह सोने के लिए अच्छी खबर होगी।

क्या लेमडक बने डोनाल्ड ट्रंप? ईरान युद्ध और वैश्विक नीतियों पर पड़ेगा यह बड़ा असर, आ सकता है महाभियोग

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US Midterm Elections 2026 Results

US Midterm Elections 2026 Results: अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के परिणामों ने वॉशिंगटन की सत्ता का गणित पूरी तरह बदल दिया है। संसद के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत घटने और डेमोक्रेटिक पार्टी के मजबूत प्रदर्शन ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इन चुनावों में अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटें, उच्च सदन सीनेट की 35 सीटें, गवर्नर के 36 पद और स्थानीय निकायों के कई पद शामिल थे।

 

दरअसल, ट्रंप को बड़ा झटका देते हुए देश के मतदाताओं ने बहुचर्चित मध्यावधि चुनावों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को संसद के उच्च सदन सीनेट का नियंत्रण सौंप दिया और डेमोक्रेट ने कई अहम राज्यों में गवर्नर पदों पर भी जीत दर्ज की। इन नतीजों का असर न केवल अमेरिका, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल सकता है। रिपब्लिकन पार्टी को अपने मजबूत गढ़ माने जाने वाले टेक्सास, जॉर्जिया और आयोवा जैसे राज्यों में करारी हार का सामना करना पड़ा, जहां उसने डेमोक्रेटिक पार्टी के हाथों गवर्नर के पद गंवा दिए। हालांकि अंतिम परिणाम शेष हैं, लेकिन यह भी तय है कि ट्रंप ने दोनों ही सदनों में बहुमत खो दिया है। ALSO READ: ट्रंप की हार से भारत और भारतीयों को क्या-क्या होगा फायदा?

इसके अलावा टेक्सास, मेन, साउथ कैरोलिना, नॉर्थ कैरोलिना, कंसास और आयोवा में सीनेट की सीट पर भी पार्टी को झटका लगा। माना जा रहा है कि महंगा ईंधन, घरेलू महंगाई का असर रिपब्लिकन पार्टी को ले डूबा। ईरान युद्ध को लेकर भी अमेरिकी ट्रंप के साथ नहीं आए। इतना ही नहीं ट्रंप की हार से ग्लोबल मार्केट में स्थिरता की उम्मीदें बढ़ गई हैं। 

क्या ट्रंप ‘लेमडक’ (Lame Duck) राष्ट्रपति बन गए हैं?

हालांकि अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के तहत दो बार राष्ट्रपति रह चुके ट्रंप 2028 का अगला राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते। कार्यकाल का अंतिम दौर होने के कारण उनका राजनीतिक प्रभाव स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाता है। कांग्रेस (संसद) पर अपनी पार्टी का पूर्ण नियंत्रण खोने के बाद अब ट्रंप अपनी इच्छानुसार कानून या बजट पारित नहीं करा पाएंगे। जब कोई राष्ट्रपति न तो अगला चुनाव लड़ सकता है और न ही संसद के जरिए मनचाही नीतियां पास करा सकता है, तो उसे राजनीतिक भाषा में ‘लेमडक’ कहा जाता है। ALSO READ: US Midterm Election: अमेरिका में ट्रंप को तगड़ा झटका, संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स भारी; जानें क्या बोले राष्ट्रपति?

ट्रंप की नीतियों पर क्या असर होगा?

डेमोक्रेटिक-नियंत्रित निचले सदन (House of Representatives) के चलते ट्रंप प्रशासन की टैक्स, आव्रजन (Immigration) और घरेलू आर्थिक नीतियों से जुड़े नए विधेयकों का पास होना बेहद कठिन हो जाएगा। बजट आवंटन को लेकर व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव बढ़ सकता है, जिससे कई बार सरकारी कामकाज बंद होने की नौबत आ सकती है। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप को अपनी प्राथमिकताओं को लागू करने के लिए कार्यकारी आदेशों और बजटीय वीटो पॉवर पर निर्भर रहना पड़ेगा।

क्या थम जाएगा ईरान युद्ध?

अमेरिकी संविधान के अनुसार सैन्य अभियानों के लिए फंड जारी करने का अधिकार संसद के पास है। डेमोक्रेट्स ईरान के खिलाफ किसी भी लंबे सैन्य अभियान या युद्ध के लिए फंड रोकने या सीमित करने के लिए विधायी दबाव बना सकते हैं। संसद की रक्षा और विदेश नीति समितियों द्वारा ट्रंप प्रशासन के फैसलों की कड़ी निगरानी और सुनवाई की जाएगी, जिससे आक्रामक सैन्य कदम उठाना ट्रंप के लिए कठिन होगा। ऐसी उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि ट्रंप और नेतन्याहू की हार के बाद ईरान युद्ध थम सकता है। इससे दुनिया में होने वाली आर्थिक उथल-पुथल भी रुक सकती है। 

वैश्विक नीतियों पर हार का क्या असर पड़ेगा?

अंतरराष्ट्रीय व्यापार (जैसे भारत, चीन या यूरोपीय संघ) पर एकतरफा कड़े टैरिफ लगाने के फैसलों को अमेरिकी संसद से कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों और जलवायु समझौतों पर अमेरिका के एकतरफा फैसलों पर संसद की ओर से संतुलन कायम करने का प्रयास होगा। घरेलू स्तर पर विधायी अड़चनों के कारण ट्रंप अपने कार्यकाल के बाकी समय में विदेश मामलों और कूटनीतिक वार्ताओं पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

क्या ट्रंप के खिलाफ आ सकता है महाभियोग?

यदि प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स के पास बहुमत है, तो वे राष्ट्रपति पर संवैधानिक उल्लंघनों का आरोप लगाकर साधारण बहुमत से महाभियोग (Impeachment) का प्रस्ताव पास कर सकते हैं। महाभियोग पास होना एक बात है, लेकिन राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई (67 वोट) बहुमत की आवश्यकता होती है, जो कि डेमोक्रेट के पास नहीं है। सीनेट में दो-तिहाई वोट जुटाना बेहद मुश्किल होने के कारण ट्रंप को पद से हटाना कठिन होगा, भले ही महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो जाए। हालांकि ट्रंप के खिलाफ पिछले कार्यकाल में भी महाभियोग प्रस्ताव आ चुका है।

राजनीति में मेरे कदम रखने का मकसद छात्र कल्याण भी है: सी जोसेफ विजय

विद्यार्थियों से भ्रष्टाचार और मादक पदार्थों से दूर रहने, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने एवं जीवन में बड़ी ऊंचाइयां हासिल करने का आह्वान करते हुए टीवीके अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने बुधवार को कहा कि राजनीति में उनके आने का एक मकसद छात्र कल्याण भी है।

मुख्यमंत्री ने दसवीं एवं 12 कक्षाओं की बोर्ड परीक्षाओं के ‘टॉपर’ के अभिनंदन के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में विद्यार्थियों को अपनी अलग पहचान बनाने और बाधाओं से न घबराने के लिए प्रोत्साहित किया।

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उन्होंने कहा यदि लोग आपके मार्ग में बाधाएं पैदा करते हैं तो इसका मतलब आपकी सफलता पहले ही पक्की हो चुकी है। उन्होंने शासन के क्षेत्र में आने के अपने सफर पर संक्षेप में बात की। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा मैं आपकी भलाई को ध्यान में रखते हुए ही राजनीति में आया हूं। यह बात आप जानते हैं।

युवा पीढ़ी को बुरी आदतों का दास नहीं बनने की सलाह देते हुए, उन्होंने उनसे स्पष्ट रूप से कहा कि वे ‘‘भ्रष्टाचार और नशीले पदार्थों से दूर रहे।

यह कार्यक्रम टीवीके शैक्षिक पुरस्कारों के पहले चरण का प्रतीक था, जिसमें मुख्यमंत्री ने राज्य के मेधावी विद्यार्थियों को स्वयं प्रमाण-पत्र और आर्थिक प्रोत्साहन राशि वितरित की।

Pic Credit : UNI

US Stock Futures: ट्रंप की हार से खुश अमेरिकी बाजार? शुरुआती गिरावट के बाद तगड़ा उछाल; GIFT Nifty भी 190 अंक चढ़ा

US Stock Futures: अमेरिकी शेयर बाजार के फ्यूचर्स में बुधवार को जोरदार रिकवरी देखने को मिली। डेमोक्रेट्स की अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में बड़ी जीत के बाद बाजार में शुरुआत में भारी गिरावट आई थी।

हालांकि, बाद में निवेशकों का रुख बदल गया। Nasdaq 100 Futures अपने दिन के निचले स्तर से करीब 950 अंक संभले। Dow और S&P 500 Futures भी गिरावट से निकलकर तेजी में आ गए। GIFT Nifty में भी 190 अंक की बढ़त दर्ज हुई।

इस रिकवरी के पीछे अमेरिकी राजनीति को लेकर अनिश्चितता में कमी और बॉन्ड यील्ड में गिरावट अहम वजह रही। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव के नतीजे स्वीकार करने की बात कही। इससे बाजार को राहत मिली।

Nasdaq Futures में जोरदार रिकवरी

E-mini Nasdaq 100 Futures 28,555 पर कारोबार कर रहे थे। इसमें 250 अंक यानी 0.88% की तेजी आई। इससे पहले ये फ्यूचर्स 2.4% तक गिर गए थे।

E-mini Dow Futures 676 अंक यानी 1.3% बढ़कर 52,571 पर पहुंच गए। वहीं, E-mini S&P 500 Futures 67 अंक यानी 0.89% की बढ़त के साथ 7,664 पर कारोबार कर रहे थे। S&P 500 Futures पहले 1.4% तक गिर गए थे।

अमेरिकी चुनाव के नतीजों से क्यों घबराया बाजार?

डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया। इससे राष्ट्रपति ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। निवेशकों को चिंता थी कि डेमोक्रेट्स के नियंत्रण में टेक कंपनियों पर सख्त नियम लागू हो सकते हैं। खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश करने वाली कंपनियों पर असर पड़ने की आशंका थी।

हालांकि, बाद में निवेशकों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और बॉन्ड यील्ड में गिरावट को ध्यान में रखा। इससे बाजार में रिकवरी आई।

GIFT Nifty 190 अंक उछला

अमेरिकी फ्यूचर्स में रिकवरी के साथ भारतीय बाजारों में भी तेजी जारी रही। GIFT Nifty 23,950 पर पहुंच गया। इसमें 190 अंक यानी 0.8% की बढ़त रही।

बुधवार को Sensex 383 अंक चढ़कर 77,301 पर बंद हुआ। Nifty 150 अंक बढ़कर 23,961 पर पहुंच गया। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी मजबूत खरीदारी देखने को मिली। Nifty Midcap 100 में 1.55% और Nifty Smallcap 100 में 2% की तेजी आई।

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