US Midterm Election Impact: अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को फायदा मिलेगा या बढ़ सकती हैं मुश्किलें?

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बीच आए इन नतीजों से अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन बदल गया है। अब संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी होगी जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बने रहेंगे। इस चुनावी नतीजे का असर सिर्फ अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के लिए भी इसके कई मायने हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार शुल्क, रूस से तेल खरीद, एच-1बी वीजा, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंधों और भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम को लेकर ट्रंप के बयानों के कारण तनाव देखने को मिला है।

ऐसे में सवाल है कि क्या कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में कुछ राहत मिलेगी? क्या भारतीय सामान पर अमेरिकी शुल्क घट सकते हैं? क्या भारतीय आईटी पेशेवरों को एच-1बी वीजा के मामले में राहत मिल सकती है? और क्या रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ेगा?

हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट ने अपने एक्सप्लेनर में विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक बताया है कि डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को बातचीत के लिए कुछ अतिरिक्त मौके मिल सकते हैं लेकिन इससे ट्रंप प्रशासन की नीतियां तुरंत बदल जाएंगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि व्यापार शुल्क और वीजा से जुड़े कई अहम फैसलों में राष्ट्रपति के पास अब भी व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं। आपको बता दें कि नई अमेरिकी कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज संभालेगी।

भारत के लिए क्यों अहम हैं अमेरिकी मध्यावधि चुनाव?

अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। भारतीय आईटी सेवाओं के लिए भी अमेरिकी बाजार बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और रक्षा तकनीक के मामले में दोनों देशों की साझेदारी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने का असर भारत के व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, आव्रजन और रक्षा सहयोग पर पड़ सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों में इस साल कई मुद्दों पर खींचतान रही है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय प्रोडक्ट्स पर टैरिफ लगाए। व्यापार समझौते पर बातचीत अटकी रही। अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बनाया। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने में मध्यस्थता की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ अमेरिका के बढ़ते संपर्क और एच-1बी वीजा से जुड़ी नई फीस ने भी भारत की चिंताएं बढ़ाई हैं। भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को मजबूत बनाए रखे लेकिन रूस जैसे देशों के साथ अपने स्वतंत्र विदेश नीति संबंधों को भी प्रभावित न होने दे।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर क्या पड़ेगा असर?

भारत के लिए सबसे तात्कालिक चिंता व्यापार शुल्क और लंबित व्यापार समझौता है। दोनों देशों ने फरवरी 2026 में एक व्यापार समझौते की रूपरेखा का ऐलान किया था। इसके तहत भारतीय प्रोडक्ट्स पर अमेरिकी शुल्क 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किए जाने की बात थी। इसके बदले भारत को अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कुछ खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने थे। लेकिन इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने स्थिति बदल दी। 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने व्यापक शुल्क लगाने के लिए जिस आपातकालीन शक्तियों से जुड़े कानून का इस्तेमाल किया था वह उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं देता।

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 फीसदी शुल्क की दर वास्तव में लागू ही नहीं हो पाई। इसके बाद अस्थायी रूप से 10 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाया गया और 24 जुलाई से ज्यादातर भारतीय उत्पादों पर सेक्शन 301 के तहत 10 फीसदी शुल्क लागू हुआ। इस बीच भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 29 अक्टूबर को कहा था कि अंतरिम समझौता अंतिम चरण में है और इससे भारतीय किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा होगी। हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है। भारत में किसान संगठनों को आशंका है कि समझौते के जरिए आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों के लिए भारतीय बाजार का रास्ता खुल सकता है।

क्या डेमोक्रेट्स भारत के लिए कम शुल्क की राह खोलेंगे?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत आने से भारत को तत्काल व्यापारिक राहत मिलने की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी भी पूरी तरह मुक्त व्यापार की समर्थक नहीं है। इसलिए उनकी जीत को भारतीय उत्पादों पर शुल्क घटने का संकेत नहीं माना जा सकता। हालांकि डेमोक्रेट्स भारत को चीन के मुकाबले एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानते हैं। ऐसे में वे मौजूदा व्यापार समझौते की कुछ शर्तों में बदलाव की मांग कर सकते हैं। डेमोक्रेटिक बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा अमेरिकी शुल्क के असर पर सुनवाई करा सकती है। खास तौर पर यह जांचने की कोशिश हो सकती है कि आयात पर लगाए गए शुल्क से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए वस्तुएं कितनी महंगी हुई हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस में ऐसा कोई कानून पारित होने की संभावना कम है जिससे भारत पर लगने वाले शुल्क में बड़ा बदलाव हो। इसलिए भारत के लिए व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखना जरूरी होगा। डेमोक्रेट्स की जीत से बातचीत का माहौल बदल सकता है, लेकिन समझौते की शर्तें अपने आप नहीं बदलेंगी।

रूस से तेल खरीदने पर भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी?

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक और बड़ा मुद्दा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर करीब आठ महीने से दबाव बना हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास पैदा हुई बाधाओं ने भी तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.8 फीसदी बढ़कर 104.42 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। बाजार की नजर इस बात पर थी कि ईरान को लेकर अमेरिकी प्रशासन अगला कदम क्या उठाता है। ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा था कि अमेरिका की ईरान पर तत्काल हमला करने की कोई योजना नहीं है। वहीं एक ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि दोनों पक्ष किसी समझौते से अभी काफी दूर हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव क्यों अहम है?

भारत के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना भी लगातार अमेरिकी दबाव का विषय रहा है। 18 सितंबर को हस्ताक्षरित एक अमेरिकी कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसदी तक शुल्क लगाने का प्रावधान है। हालांकि ट्रंप ने 16 अक्टूबर को इन शुल्कों से छूट दे दी थी। इस छूट की कोई तय समाप्ति तारीख नहीं है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति इसे वापस ले सकते हैं। फरवरी में जारी अमेरिकी आदेश के तहत वाणिज्य विभाग को यह निगरानी करने का निर्देश दिया गया है कि भारत दोबारा रूस से तेल खरीदना शुरू करता है या नहीं। डेमोक्रेट्स के सत्ता में आने से रूस के प्रति अमेरिकी नीति में नरमी आने की संभावना नहीं दिखती। मार्च में जब अमेरिकी वित्त विभाग ने होर्मुज क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने के दौरान भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए अस्थायी छूट दी थी, तब कांग्रेस के डेमोक्रेटिक सदस्यों ने इसका विरोध किया था। इसलिए भारत के लिए स्थिति आसान होने के बजाय कुछ मामलों में चुनौतीपूर्ण भी हो सकती है।

एच-1बी वीजा पर भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलेगी राहत?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का एक बड़ा असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले युवाओं पर पड़ सकता है। भारतीय नागरिक एच-1बी वीजा पाने वालों में सबसे बड़ा समूह हैं। इसलिए इस वीजा से जुड़े अमेरिकी नियमों में बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों पर सबसे ज्यादा पड़ सकता है। सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए एच-1बी आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का एलान किया था। इससे भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों की चिंता बढ़ी। हालांकि इस फीस की वसूली को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों ने 24 जुलाई 2026 से इस फीस की वसूली पर रोक लगा रखी है। 18 सितंबर को जारी एक राष्ट्रपति आदेश के जरिए इस व्यवस्था को 21 सितंबर 2027 तक बढ़ाया गया था। मैसाचुसेट्स की एक अदालत में 20 राज्यों की ओर से दायर मामले में न्यायाधीश ने कहा कि यह फीस असल में एक तरह का कर है जिसे लगाने का अधिकार सिर्फ अमेरिकी कांग्रेस के पास है।

क्या डेमोक्रेट्स एच-1बी फीस खत्म कर सकते हैं?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से एच-1बी नीति की जांच-पड़ताल बढ़ सकती है। वे इस बात पर सवाल उठा सकते हैं कि नई फीस का अमेरिकी कंपनियों और विदेशी पेशेवरों पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन इससे यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि एच-1बी वीजा की फीस तुरंत खत्म हो जाएगी या वीजा नियमों में बड़ी राहत मिल जाएगी। नई कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज शुरू करेगी। ट्रंप के पास राष्ट्रपति के रूप में वीटो का अधिकार बना रहेगा। अगर कांग्रेस ऐसा कोई विधेयक पारित करती है जो इस फीस को सीमित करता है या इसे कानून के रूप में बदलने की कोशिश करता है तो ट्रंप उसे वीटो कर सकते हैं।

भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बीच भारतीय शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। चुनाव परिणाम आने से पहले भारतीय बाजार मजबूत स्थिति में थे। मंगलवार तक चार कारोबारी सत्रों में निफ्टी 50 और सेंसेक्स करीब 5 फीसदी चढ़कर दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे। इसके पीछे कंपनियों के बेहतर नतीजे, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और विदेशी निवेशकों की ओर से खरीदारी में शुरुआती सुधार जैसे कारण थे। मंगलवार को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 6837 करोड़ रुपये यानी 721.66 मिलियन डॉलर की शुद्ध खरीदारी की। लेकिन बुधवार को तस्वीर कुछ बदली। निफ्टी 23946.35 के उच्च स्तर तक पहुंचा, जबकि सेंसेक्स ने 77396.04 का स्तर छुआ। हालांकि बाद में बाजार की बढ़त कम हो गई। इस दौरान आईटी शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। आईटी कंपनियों के शेयरों में 2.2 फीसदी की गिरावट आई। बाजार विशेषज्ञों ने इसकी वजह अमेरिकी आव्रजन नीति और आउटसोर्सिंग से जुड़ी अनिश्चितताओं को बताया। अमेरिकी बाजार में सेवाओं की मांग कमजोर रहने की आशंका भी आईटी शेयरों पर दबाव का एक कारण रही।

क्या मध्यावधि चुनाव के बाद भारतीय बाजार में तेजी आती है?

इतिहास के कुछ आंकड़े भारतीय शेयर बाजार के लिए उम्मीद की वजह हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक 1982 के बाद से अमेरिका के 11 मध्यावधि चुनावों में से छह मौकों पर उसके बाद के महीनों में भारतीय शेयर सूचकांकों ने औसतन 12 फीसदी की बढ़त दर्ज की। हालांकि इसे इस बार भी बाजार में तेजी की गारंटी नहीं माना जा सकता। कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख, कंपनियों के नतीजे और अमेरिका की आर्थिक नीतियां बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ब्रोकरेज के आकलन में निफ्टी के लिए 23200 का स्तर एक महत्वपूर्ण सपोर्ट माना गया है।

रक्षा सहयोग, क्वाड और चीन के मोर्चे पर क्या बदलेगा?

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग को दोनों देशों की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता रहा है। दोनों देश रक्षा अभ्यास, सैन्य तकनीक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने जैसे मुद्दों पर साथ काम करते रहे हैं। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा में बड़े बदलाव की संभावना कम है। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी और बजट संबंधी फैसले कुछ रक्षा परियोजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं।

इसके लिए भारत-अमेरिका क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी यानी आईसीईटी ढांचे के तहत सहयोग को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा क्वाड के तहत महत्वपूर्ण खनिजों और समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली इंटरनेट केबल जैसी परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने के अवसर भी हैं। डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी अमेरिकी विदेश नीति में कुछ मामलों में संतुलनकारी भूमिका निभा सकती है। इससे भारत को रक्षा, व्यापार और कूटनीति से जुड़े अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं।

भारत के लिए डेमोक्रेट्स की जीत के क्या मायने हैं?

ऐसे में देखें तो अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजे भारत के लिए न तो पूरी तरह राहत की खबर हैं और न ही किसी बड़े संकट का संकेत। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी बढ़ेगी। व्यापार के मोर्चे पर भारत को तत्काल शुल्क में कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। एच-1बी वीजा के मामले में भी डेमोक्रेट्स की जीत से तुरंत राहत मिलने की संभावना नहीं है। रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव जारी रह सकता है और इस मुद्दे पर कांग्रेस में बहस तेज हो सकती है। भारत की चुनौती अब यह होगी कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ अपने संबंधों को संभालते हुए अमेरिकी कांग्रेस के साथ भी संवाद मजबूत करे। आखिरकार, भारत की समस्या अमेरिका के साथ साझेदारी नहीं बल्कि ट्रंप प्रशासन के कुछ खास नीतिगत फैसले रहे हैं।

‘शायद मेरे स्पेस लेजर काम नहीं आए…’, अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत पर मस्क का तंज

US Midterm Election Results 2026: अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेट पर कब्जा जमाने और रिपब्लिकन पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बीच दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क का पहला रिएक्शन आया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर मस्क ने चुनावी नतीजों पर अपने मजाकिया और व्यंग्यात्मक अंदाज में तंज कसा।

मस्क ने पोस्ट करते हुए लिखा, ‘Guess my election-interfering space lasers didn’t work this time’ हिन्दी में इसका मतलब ये है कि- ‘शायद चुनाव में धांधली करने वाले मेरे स्पेस लेजर इस बार काम नहीं आए’।

मस्क का यह तंज उन वामपंथी ट्रोल्स और सोशल मीडिया कॉन्सपिरेसी थ्योरी पर कड़ा प्रहार है, जिनमें दावा किया जाता रहा है कि मस्क अपनी सैटेलाइट कंपनी ‘स्टारलिंक’ या स्पेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने और रिपब्लिकन को जिताने के लिए करते हैं।

रिपब्लिकन को सबसे बड़े फंड देने वालों में से एक थे मस्क

यह पोस्ट इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि 2026 के इन मिडटर्म चुनावों में एलन मस्क डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के सबसे बड़े समर्थक और डोनर के रूप में सामने आए थे। मस्क ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों को जिताने के लिए करीब 500 मिलियन डॉलर यानी करीब 4,100 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि राजनीतिक फंड्स दी थी।

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मतदान के ठीक एक दिन पहले मस्क ने X पर ‘Vote Red Today!’ लिखकर अमेरिकियों से रिपब्लिकन पार्टी को वोट देने की अपील भी की थी।

2025 में डोनाल्ड ट्रंप की राष्ट्रपति पद पर वापसी के बाद एलन मस्क ‘डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी’ (DOGE) के प्रमुख रहे और ट्रंप के सबसे करीबी सलाहकार बने।

इसके बावजूद, सीनेट में डेमोक्रेट्स की जीत और रिपब्लिकन के घटते जनाधार ने मस्क और ट्रंप कैंपेन को भारी आर्थिक व राजनीतिक झटका दिया है।

चुनावों का मौजूदा रुख और पावर शिफ्ट

2026 के मिडटर्म चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए बहुत बड़ा गतिरोध बन गए हैं। डेमोक्रेट्स ने टेक्सास और कैरोलिना जैसे रिपब्लिकन गढ़ों को भेदते हुए बहुमत हासिल कर लिया है। सीनेट हाथ से जाने के बाद ट्रंप ने संसद के हर कानून पर ‘वीटो’ का इस्तेमाल करने और वाशिंगटन में डेमोक्रेट्स के बिल रोकने का ऐलान किया है।

सीनेट गंवाते ही बौखलाए ट्रंप! लाल टोपी पोस्ट कर दी ‘VETO’ की धमकी, बोले- ‘मैं मैदान में होता तो मिलती लैंडस्लाइड जीत!’

US Midterm Election Results 2026: अमेरिका में हुए 2026 के मिडटर्म चुनावों के नतीजों ने अमेरिकी राजनीति में भूचाल ला दिया है। विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने रिपब्लिकन के मजबूत गढ़ों को ध्वस्त करते हुए सीनेट पर अपना कब्जा जमा लिया है। इस बड़े चुनावी झटके के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का तीखा रिएक्शन सामने आया है।

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक लाल रंग की बेसबॉल कैप की तस्वीर शेयर की है, जिस पर लिखा है- ‘VETO’। इसके जरिए उन्होंने साफ संदेश दिया है कि संसद में बहुमत हासिल करने के बावजूद वे डेमोक्रेट्स के हर बिल को अपनी राष्ट्रपति शक्तियों से ब्लॉक करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

‘अगर मैं चुनाव मैदान में होता तो लैंडस्लाइड जीत होती’: ट्रंप

रिपब्लिकन पार्टी को मिले झटके पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने दावा किया कि अगर उनका नाम बैलट पेपर पर होता तो पार्टी ऐतिहासिक जीत दर्ज करती। ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए 80 वर्षीय राष्ट्रपति ट्रंप ने लिखा, ‘मेरा नाम बैलट पर नहीं था, और अगर मैं होता, तो हमें बंपर जीत हासिल होती! इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद।’

दिलचस्प बात यह है कि द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने नतीजों को स्वीकार करने और डेमोक्रेट्स के साथ काम करने की बात कही थी। लेकिन उस बयान के महज कुछ ही मिनटों बाद उन्होंने ‘VETO’ लिखी टोपी की फोटो पोस्ट कर अपने तेवर कड़े कर लिए।

‘मिस्टर वीटो’ बनने को तैयार ट्रंप?

मतदान समाप्त होने से ठीक पहले CBS न्यूज को दिए एक विशेष इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि उनके पास राष्ट्रपति की सबसे बड़ी ताकत यानी ‘वीटो पावर’ मौजूद है।

ट्रंप ने कहा कि अगर डेमोक्रेट्स संसद के किसी भी सदन में बहुमत लाते हैं, तो वे उनके बिलों को खारिज करने के लिए अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल करेंगे। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अगर उन्हें ‘मिस्टर वीटो’ भी कहा जाए, तो उन्हें इससे कोई गुरेज नहीं होगा।

अमेरिकी मिडटर्म में डेमोक्रेट्स का बड़ा उलटफेर! डॉलर-ट्रेजरी यील्ड धड़ाम, जानें भारतीय बाजार पर इसका क्या होगा असर?

CBS के सूत्रों के अनुसार, संसद गंवाने के बाद भी ट्रंप के पास ट्रेड, बॉर्डर सिक्योरिटी, विदेशी नीति और नेशनल सिक्योरिटी जैसे मुख्य मुद्दों पर मनमुताबिक फैसले लेने का पूरा अधिकार रहेगा।

डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन के गढ़ों में लगाई सेंध

2026 मिडटर्म चुनावों के नतीजों ने वाशिंगटन का पावर बैलेंस बदल दिया है:

कहां-कहां पलटी बाजी: डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन के पारंपरिक मजबूत गढ़ों- टेक्सास, साउथ कैरोलिना और नॉर्थ कैरोलिना में जीत दर्ज करते हुए सीटें छीन लीं। इसके अलावा जॉर्जिया और न्यू हैम्पशायर में अपनी सीटें बचाने में भी कामयाबी हासिल की।

ट्रंप प्रशासन की बढ़ेगी मुश्किल: सीनेट पर कब्जा और प्रतिनिधि सभा में मजबूत स्थिति के बाद अब डेमोक्रेट्स ट्रंप प्रशासन के खिलाफ जांच शुरू कर सकते हैं और उनके विधायी एजेंडे को रोक सकते हैं।

चुनावों में रिपब्लिकन की हार के 3 बड़े कारण

  1. फ्यूल और महंगाई: अमेरिकी जनता में जीवन-यापन की बढ़ती लागत और महंगाई को लेकर भारी नाराजगी।
  2. ईरान युद्ध का असर: ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियानों और तनाव के कारण पेट्रोल-डीजल की रिकॉर्ड ऊंची कीमतें।
  3. ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीतियां: राष्ट्रपति की व्यापार और टैरिफ नीतियों से आम मतदाताओं और बिजनेस सेक्टर में असंतोष।

US Midterm Election: अमेरिका में ट्रंप को तगड़ा झटका, संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स ने बनाई बढ़त; जानें क्या बोले राष्ट्रपति?

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donald trump

US Midterm Election Results : अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों के शुरुआती रुझानों ने मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। संसद के दोनों सदनों—हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट—में डेमोक्रेटिक पार्टी मजबूत स्थिति में नजर आ रही है और बहुमत के करीब पहुंच गई है। ALSO READ: क्‍या है mid-term election, अमेरिका में क्‍या होगा डोनाल्‍ड ट्रंप सरकार का, मनमानी पर लगेगी लगाम?

 

अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के लिए हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों के साथ ही कुछ राज्यों में गवर्नर समेत अहम पदों के लिए मतगणना जारी है। अब तक प्राप्त रुझानों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका लगा है। दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स आगे नजर आ रहे हैं। हाउस ऑफ डेमोक्रेट्स को अब तक 103 सीटों पर बढ़त, रिपब्लिकन पार्टी 61 सीटों पर आगे हैं। सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के पास फिलहाल 46 और रिपब्लिकन पार्टी के पास 36 सीटें हो गई। डेमोक्रेटिक पार्टी बहुमत से सिर्फ 5 सीटें दूर है। 

 

मिडटर्म इलेक्शन रिजस्ट पर क्या बोले ट्रंप?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिडटर्म चुनाव के नतीजों के बीच अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट साझा कर दावा किया कि अगर वह भी चुनाव में उम्मीदवार होते तो उनकी पार्टी को बड़ी जीत मिलती। उन्होंने कहा- मैं चुनाव में उम्मीदवार नहीं था। अगर मैं उम्मीदवार होता तो हम बहुत बड़े अंतर से जीतते।

जॉन ओसॉफ का ट्रंप पर निशाना

अमेरिका में सीनेट चुनाव में दोबारा जीत हासिल करने के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता जॉन ओसॉफ ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी जनता ने बड़े अंतर से जीत दिलाकर ट्रंप के नेतृत्व की नाकामी, भ्रष्टाचार और गलत कामों को खारिज कर दिया है। ALSO READ: क्या ईरान पर होने वाला है परमाणु हमला? नेतन्याहू के दबाव में ट्रंप प्रशासन ले सकता है बड़ा फैसला

 

क्या है भारतवंशियों का हाल?

डेमोक्रेटिक पार्टी की पिया डांडिया फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल जिले से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी गईं। डेमोक्रेटिक पार्टी के सुहास सुब्रमण्यम ने वर्जीनिया के 10वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से दोबारा चुनाव जीतकर अपनी सीट बरकरार रखी। रिपब्लिकन पार्टी के नेता विवेक रामास्वामी ओहायो के गवर्नर चुनाव में पीछे चल रहे हैं।

 

US Midterm Results Live: कौन हैं 39 साल के जॉन ओसॉफ जिनकी बड़ी जीत के चर्चे! ट्रंप के खिलाफ ऐसा चल रहा डेमोक्रेट्स का प्रदर्शन

US Midterm Election Results 2026 Live: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव 2026 के शुरुआती नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने रिपब्लिकन पार्टी को कड़ी चुनौती दी है। जॉर्जिया से डेमोक्रेट सीनेटर जॉन ओसॉफ ने अपनी सीट पर जीत हासिल कर ली है। नॉर्थ कैरोलिना में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रॉय कूपर ने सीनेट की सीट जीतकर पार्टी को पहली बड़ी सफलता दिलाई है। शुरुआती नतीजों में वर्जीनिया से सीनेटर मार्क वॉर्नर भी अपनी सीट बचाने में सफल रहे हैं।

इन नतीजों के बीच 39 साल के जॉन ओसॉफ की जीत खास चर्चा में है। अमेरिकी राजनीति में तेजी से उभरे ओसॉफ को अब पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जोड़कर देखा जा रहा है। ओसॉफ की जीत से जॉर्जिया में डेमोक्रेट्स को मजबूती मिली है और पार्टी को सीनेट में बहुमत हासिल करने की उम्मीद भी बढ़ी है।

हालांकि, अभी यह साफ नहीं हुआ है कि चुनाव के बाद अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर किस पार्टी का नियंत्रण होगा। डेमोक्रेट्स की कोशिश है कि वे रिपब्लिकन पार्टी से दोनों सदनों का नियंत्रण वापस हासिल करें। इन चुनावों को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए भी एक अहम राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है।

कौन हैं 39 साल के जॉन ओसॉफ, जिनकी जीत की हो रही चर्चा?

जॉन ओसॉफ अमेरिकी राजनीति में तेजी से अपनी पहचान बनाने वाले डेमोक्रेट नेता हैं। 39 साल की उम्र में जॉर्जिया से सीनेट चुनाव जीतकर उन्होंने एक बार फिर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की है। अमेरिकी मीडिया नेटवर्क्स ने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी माइक कॉलिन्स के खिलाफ उनकी जीत का अनुमान जताया है। इसके साथ ही ओसॉफ जॉर्जिया से सीनेटर के रूप में एक और कार्यकाल के लिए चुने गए हैं। ओसॉफ की राजनीतिक यात्रा काफी दिलचस्प रही है। एक दशक से भी कम समय में वह लंदन की एक खोजी टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनी में काम करने से लेकर अमेरिकी राजनीति के चर्चित चेहरों में शामिल हो गए। अब उन्हें भविष्य में राष्ट्रपति पद के संभावित दावेदार के रूप में भी देखा जाने लगा है।

अमेरिकी राजनीति में किसी नेता की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जाता है कि उसकी तुलना बड़े नेताओं से होने लगे। ओसॉफ के मामले में उनकी तुलना बराक ओबामा से की जा रही है। वहीं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी उनके लिए अपमानजनक उपनाम का इस्तेमाल किया है। इन सबके बीच जॉर्जिया में उनकी जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

नॉर्थ कैरोलिना में रॉय कूपर की जीत, डेमोक्रेट्स को पहली बड़ी सफलता

डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए नॉर्थ कैरोलिना से भी अच्छी खबर आई है। यहां रॉय कूपर ने सीनेट चुनाव जीत लिया है। इस जीत को मौजूदा चुनाव में सीनेट की पहली ऐसी सीट के तौर पर देखा जा रहा है जो रिपब्लिकन पार्टी से डेमोक्रेट्स के खाते में गई है। डेमोक्रेट्स के लिए यह जीत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी को सीनेट में बहुमत हासिल करने के लिए रिपब्लिकन पार्टी से चार सीटों का शुद्ध फायदा चाहिए। ऐसे में नॉर्थ कैरोलिना की जीत पार्टी की रणनीति को मजबूती देती है।वहीं, जॉर्जिया में जॉन ओसॉफ और वर्जीनिया में मार्क वॉर्नर की जीत से डेमोक्रेट्स ने अपनी मौजूदा सीटों को बचाने में भी सफलता हासिल की है।

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में क्या दांव पर है?

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होते हैं। 2026 के चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर मतदान हो रहा है। इसके अलावा 36 राज्यों में गवर्नर के चुनाव भी हो रहे हैं। इन चुनावों का नतीजा तय करेगा कि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण बना रहेगा या डेमोक्रेट्स वापसी करने में सफल होंगे। फिलहाल सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 और डेमोक्रेट्स के पास 47 सीटें हैं। सीनेट में बहुमत हासिल करने के लिए डेमोक्रेट्स को चार सीटों का शुद्ध फायदा चाहिए। वहीं 435 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करने के लिए पार्टी को तीन सीटों का शुद्ध फायदा करना होगा। इसका मतलब है कि दोनों सदनों में सत्ता का समीकरण कुछ सीटों के अंतर से बदल सकता है। अगर डेमोक्रेट्स दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लेते हैं, तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।

ट्रंप के खिलाफ डेमोक्रेट्स का प्रदर्शन कैसा चल रहा है?

मिडटर्म चुनाव को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर जनता की राय के तौर पर देखा जा रहा है। चुनाव में महंगाई, रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतें, इमिग्रेशन यानी आव्रजन नीति और ईरान के साथ जारी संघर्ष जैसे मुद्दे अहम रहे हैं। डेमोक्रेट्स को उम्मीद है कि बढ़ती महंगाई और कॉस्ट ऑफ लीविंग से परेशान मतदाता उनके पक्ष में मतदान करेंगे। पार्टी का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन ने कीमतों में बढ़ोतरी रोकने के अपने वादे को पूरा नहीं किया है। डेमोक्रेट्स यह मुद्दा भी उठा रहे हैं कि प्रशासन का ध्यान देश की राजधानी में परियोजनाओं पर अधिक है, जबकि आम अमेरिकी नागरिक बढ़ती लागत से परेशान हैं।

रिपब्लिकन पार्टी ने उन राज्यों और चुनावी क्षेत्रों में करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं, जहां 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को अच्छी बढ़त मिली थी। पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव प्रचार में किए गए बड़े निवेश से वह संसद में अपना बहुमत बचा सकेगी। हालांकि रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा में नियंत्रण गंवाने का खतरा दिखाई दे रहा है। सीनेट में भी उसे कई करीबी मुकाबलों में अपनी सीटें बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

महंगाई, स्वास्थ्य खर्च और नौकरियों का मुद्दा हावी

चुनाव में आर्थिक स्थिति मतदाताओं के लिए सबसे अहम मुद्दों में शामिल रही। किराना सामान, फ्यूल और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों ने लोगों की चिंता बढ़ाई है। इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों के नुकसान का मुद्दा भी चुनावी बहस में शामिल रहा। ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि महंगाई पर नियंत्रण पाया जा चुका है, लेकिन डेमोक्रेट्स का कहना है कि आम लोगों को रोजमर्रा के खर्च में राहत नहीं मिली है। इमिग्रेशन नीति भी रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बनती दिख रही है। चुनावी सर्वे में ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीतियों का विरोध करने वाले मतदाताओं की संख्या समर्थन करने वालों से अधिक बताई गई है। ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी को उन इलाकों में समर्थन कम होने की चिंता है, जहां प्रवासी आबादी अधिक है। लैटिन अमेरिकी मूल के मतदाता भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में इस समुदाय के कई मतदाताओं ने ट्रंप का समर्थन किया था। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मिडटर्म चुनाव में उनका रुख किस पार्टी की ओर रहता है।

सर्वे में बदलाव चाहने वाले मतदाताओं की संख्या ज्यादा

अक्टूबर में हुए AP-NORC सर्वे के मुताबिक, अमेरिका के करीब आधे मतदाता चाहते हैं कि देश चलाने के तरीके में बड़े बदलाव किए जाएं। वहीं लगभग 10 में से तीन मतदाताओं ने व्यवस्था में पूरी तरह और व्यापक बदलाव की इच्छा जताई। सर्वे में सिर्फ 10 में से करीब दो मतदाताओं ने कहा कि वे छोटे बदलाव चाहते हैं या मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं चाहते। बदलाव की मांग डेमोक्रेट्स और निर्दलीय मतदाताओं में अधिक देखने को मिली। हालांकि रिपब्लिकन मतदाताओं के बीच भी असंतोष सामने आया। सर्वे के मुताबिक 45 फीसदी रिपब्लिकन मतदाता व्यवस्था में बड़े बदलाव चाहते थे जबकि 13 फीसदी ने पूरी व्यवस्था में व्यापक बदलाव की इच्छा जताई। मतदान को लेकर भी मतदाताओं में दिलचस्पी दिखाई दी। सर्वे में करीब दो-तिहाई पंजीकृत मतदाताओं ने कहा कि मिडटर्म चुनाव में वोट डालना उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। वहीं, लगभग 10 में से दो मतदाताओं ने इसे बहुत महत्वपूर्ण बताया।

सीनेट की इन सीटों पर सबकी नजर

अमेरिकी सीनेट में बहुमत का फैसला कुछ करीबी मुकाबलों से हो सकता है। इसलिए दोनों पार्टियों की नजर कई अहम राज्यों पर है। इनमें टेक्सास, जॉर्जिया, नॉर्थ कैरोलिना, मेन, मिशिगन, आयोवा, ओहायो, अलास्का और कंसास शामिल हैं। डेमोक्रेट्स उन राज्यों में भी जीत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां आमतौर पर रिपब्लिकन पार्टी मजबूत रही है। वहीं रिपब्लिकन पार्टी ऐसी सीटों को बचाने में जुटी है, जहां उसके उम्मीदवारों को कड़ी चुनौती मिल रही है। आयोवा में डेमोक्रेट्स को मौका दिखाई दे रहा है क्योंकि वहां रिपब्लिकन पार्टी के मौजूदा सीनेटरों ने दोबारा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। टेक्सास, कंसास, मिशिगन और मेन के मुकाबले भी सीनेट में बहुमत के लिहाज से अहम माने जा रहे हैं।

ट्रंप के लिए क्यों अहम हैं ये चुनाव?

मिडटर्म चुनाव में अगर डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो ट्रंप प्रशासन के सामने कई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। विपक्षी पार्टी को प्रशासन की नीतियों की जांच करने, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाने और राष्ट्रपति के विधायी एजेंडे के कुछ हिस्सों को रोकने की अधिक ताकत मिल जाएगी। इसके उलट अगर रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में अपना नियंत्रण बनाए रखती है, तो ट्रंप को अपनी प्राथमिकताओं को लागू करने में आसानी होगी। ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली संसद कोई कानून पारित करती है, तो वह उस पर वीटो कर सकते हैं। इसलिए इन चुनावों का असर केवल संसद की सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाकी दो वर्षों की राजनीतिक दिशा भी इससे प्रभावित हो सकती है।

भारत में कब से आने लगे अमेरिकी चुनाव के नतीजे?

अमेरिका में अलग-अलग टाइम जोन होने की वजह से मतदान और मतगणना का समय भी राज्यों के हिसाब से अलग है। भारतीय समय के मुताबिक शुरुआती नतीजे 4 नवंबर की सुबह करीब 4:30 बजे से आने शुरू होने की उम्मीद थी। अमेरिका के पूर्वी समय के अनुसार मंगलवार, 3 नवंबर को शाम 6 बजे इंडियाना और केंटकी के कुछ हिस्सों में मतदान केंद्र बंद होने के बाद शुरुआती नतीजे आने शुरू हुए। इसके बाद अलग-अलग राज्यों में मतदान खत्म होने के साथ नतीजे सामने आते रहेंगे। हालांकि करीबी मुकाबलों में अंतिम नतीजे आने में कई घंटे या कई दिन भी लग सकते हैं। खासकर जहां जीत का अंतर कम हो या डाक मतपत्रों की गिनती बाकी हो, वहां किसी उम्मीदवार की जीत की आधिकारिक घोषणा में समय लग सकता है।

हाउस और सीनेट के नतीजों के लिए करना पड़ सकता है इंतजार

प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर चुनाव होने के कारण अलग-अलग राज्यों से नतीजे सामने आएंगे। मतदान खत्म होने के बाद मंगलवार रात से मतगणना शुरू हुई और बुधवार तक जारी रहने की संभावना है। सीनेट की 35 सीटों पर भी अलग-अलग राज्यों में मतगणना के बाद नतीजे आएंगे। कुछ मुकाबलों में शुरुआती घंटों में तस्वीर साफ हो सकती है, लेकिन करीबी मुकाबलों में सभी मतपत्रों की गिनती पूरी होने तक इंतजार करना पड़ सकता है। 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनाव हुए हैं। इन राज्यों में भी मतदान केंद्र बंद होने के बाद मतगणना शुरू हुई। हालांकि डाक मतपत्रों और स्थानीय मतगणना प्रक्रियाओं के कारण कुछ राज्यों में अंतिम नतीजे आने में देरी हो सकती है। फिलहाल शुरुआती रुझानों और घोषित जीतों में डेमोक्रेट्स को कुछ अहम सफलताएं मिली हैं। जॉन ओसॉफ और मार्क वॉर्नर ने अपनी सीटें बचाई हैं, जबकि रॉय कूपर ने नॉर्थ कैरोलिना में रिपब्लिकन पार्टी से एक सीट छीन ली है। लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में बहुमत का अंतिम फैसला बाकी सीटों के नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट होगा।

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