US Midterm Results Live: कौन हैं 39 साल के जॉन ओसॉफ जिनकी बड़ी जीत के चर्चे! ट्रंप के खिलाफ ऐसा चल रहा डेमोक्रेट्स का प्रदर्शन

US Midterm Election Results 2026 Live: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव 2026 के शुरुआती नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने रिपब्लिकन पार्टी को कड़ी चुनौती दी है। जॉर्जिया से डेमोक्रेट सीनेटर जॉन ओसॉफ ने अपनी सीट पर जीत हासिल कर ली है। नॉर्थ कैरोलिना में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रॉय कूपर ने सीनेट की सीट जीतकर पार्टी को पहली बड़ी सफलता दिलाई है। शुरुआती नतीजों में वर्जीनिया से सीनेटर मार्क वॉर्नर भी अपनी सीट बचाने में सफल रहे हैं।

इन नतीजों के बीच 39 साल के जॉन ओसॉफ की जीत खास चर्चा में है। अमेरिकी राजनीति में तेजी से उभरे ओसॉफ को अब पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जोड़कर देखा जा रहा है। ओसॉफ की जीत से जॉर्जिया में डेमोक्रेट्स को मजबूती मिली है और पार्टी को सीनेट में बहुमत हासिल करने की उम्मीद भी बढ़ी है।

हालांकि, अभी यह साफ नहीं हुआ है कि चुनाव के बाद अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर किस पार्टी का नियंत्रण होगा। डेमोक्रेट्स की कोशिश है कि वे रिपब्लिकन पार्टी से दोनों सदनों का नियंत्रण वापस हासिल करें। इन चुनावों को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए भी एक अहम राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है।

कौन हैं 39 साल के जॉन ओसॉफ, जिनकी जीत की हो रही चर्चा?

जॉन ओसॉफ अमेरिकी राजनीति में तेजी से अपनी पहचान बनाने वाले डेमोक्रेट नेता हैं। 39 साल की उम्र में जॉर्जिया से सीनेट चुनाव जीतकर उन्होंने एक बार फिर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की है। अमेरिकी मीडिया नेटवर्क्स ने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी माइक कॉलिन्स के खिलाफ उनकी जीत का अनुमान जताया है। इसके साथ ही ओसॉफ जॉर्जिया से सीनेटर के रूप में एक और कार्यकाल के लिए चुने गए हैं। ओसॉफ की राजनीतिक यात्रा काफी दिलचस्प रही है। एक दशक से भी कम समय में वह लंदन की एक खोजी टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनी में काम करने से लेकर अमेरिकी राजनीति के चर्चित चेहरों में शामिल हो गए। अब उन्हें भविष्य में राष्ट्रपति पद के संभावित दावेदार के रूप में भी देखा जाने लगा है।

अमेरिकी राजनीति में किसी नेता की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जाता है कि उसकी तुलना बड़े नेताओं से होने लगे। ओसॉफ के मामले में उनकी तुलना बराक ओबामा से की जा रही है। वहीं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी उनके लिए अपमानजनक उपनाम का इस्तेमाल किया है। इन सबके बीच जॉर्जिया में उनकी जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

नॉर्थ कैरोलिना में रॉय कूपर की जीत, डेमोक्रेट्स को पहली बड़ी सफलता

डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए नॉर्थ कैरोलिना से भी अच्छी खबर आई है। यहां रॉय कूपर ने सीनेट चुनाव जीत लिया है। इस जीत को मौजूदा चुनाव में सीनेट की पहली ऐसी सीट के तौर पर देखा जा रहा है जो रिपब्लिकन पार्टी से डेमोक्रेट्स के खाते में गई है। डेमोक्रेट्स के लिए यह जीत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी को सीनेट में बहुमत हासिल करने के लिए रिपब्लिकन पार्टी से चार सीटों का शुद्ध फायदा चाहिए। ऐसे में नॉर्थ कैरोलिना की जीत पार्टी की रणनीति को मजबूती देती है।वहीं, जॉर्जिया में जॉन ओसॉफ और वर्जीनिया में मार्क वॉर्नर की जीत से डेमोक्रेट्स ने अपनी मौजूदा सीटों को बचाने में भी सफलता हासिल की है।

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में क्या दांव पर है?

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होते हैं। 2026 के चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर मतदान हो रहा है। इसके अलावा 36 राज्यों में गवर्नर के चुनाव भी हो रहे हैं। इन चुनावों का नतीजा तय करेगा कि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण बना रहेगा या डेमोक्रेट्स वापसी करने में सफल होंगे। फिलहाल सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 और डेमोक्रेट्स के पास 47 सीटें हैं। सीनेट में बहुमत हासिल करने के लिए डेमोक्रेट्स को चार सीटों का शुद्ध फायदा चाहिए। वहीं 435 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करने के लिए पार्टी को तीन सीटों का शुद्ध फायदा करना होगा। इसका मतलब है कि दोनों सदनों में सत्ता का समीकरण कुछ सीटों के अंतर से बदल सकता है। अगर डेमोक्रेट्स दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लेते हैं, तो राष्ट्रपति ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।

ट्रंप के खिलाफ डेमोक्रेट्स का प्रदर्शन कैसा चल रहा है?

मिडटर्म चुनाव को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर जनता की राय के तौर पर देखा जा रहा है। चुनाव में महंगाई, रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतें, इमिग्रेशन यानी आव्रजन नीति और ईरान के साथ जारी संघर्ष जैसे मुद्दे अहम रहे हैं। डेमोक्रेट्स को उम्मीद है कि बढ़ती महंगाई और कॉस्ट ऑफ लीविंग से परेशान मतदाता उनके पक्ष में मतदान करेंगे। पार्टी का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन ने कीमतों में बढ़ोतरी रोकने के अपने वादे को पूरा नहीं किया है। डेमोक्रेट्स यह मुद्दा भी उठा रहे हैं कि प्रशासन का ध्यान देश की राजधानी में परियोजनाओं पर अधिक है, जबकि आम अमेरिकी नागरिक बढ़ती लागत से परेशान हैं।

रिपब्लिकन पार्टी ने उन राज्यों और चुनावी क्षेत्रों में करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं, जहां 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को अच्छी बढ़त मिली थी। पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव प्रचार में किए गए बड़े निवेश से वह संसद में अपना बहुमत बचा सकेगी। हालांकि रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा में नियंत्रण गंवाने का खतरा दिखाई दे रहा है। सीनेट में भी उसे कई करीबी मुकाबलों में अपनी सीटें बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

महंगाई, स्वास्थ्य खर्च और नौकरियों का मुद्दा हावी

चुनाव में आर्थिक स्थिति मतदाताओं के लिए सबसे अहम मुद्दों में शामिल रही। किराना सामान, फ्यूल और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों ने लोगों की चिंता बढ़ाई है। इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों के नुकसान का मुद्दा भी चुनावी बहस में शामिल रहा। ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि महंगाई पर नियंत्रण पाया जा चुका है, लेकिन डेमोक्रेट्स का कहना है कि आम लोगों को रोजमर्रा के खर्च में राहत नहीं मिली है। इमिग्रेशन नीति भी रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बनती दिख रही है। चुनावी सर्वे में ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीतियों का विरोध करने वाले मतदाताओं की संख्या समर्थन करने वालों से अधिक बताई गई है। ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी को उन इलाकों में समर्थन कम होने की चिंता है, जहां प्रवासी आबादी अधिक है। लैटिन अमेरिकी मूल के मतदाता भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में इस समुदाय के कई मतदाताओं ने ट्रंप का समर्थन किया था। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मिडटर्म चुनाव में उनका रुख किस पार्टी की ओर रहता है।

सर्वे में बदलाव चाहने वाले मतदाताओं की संख्या ज्यादा

अक्टूबर में हुए AP-NORC सर्वे के मुताबिक, अमेरिका के करीब आधे मतदाता चाहते हैं कि देश चलाने के तरीके में बड़े बदलाव किए जाएं। वहीं लगभग 10 में से तीन मतदाताओं ने व्यवस्था में पूरी तरह और व्यापक बदलाव की इच्छा जताई। सर्वे में सिर्फ 10 में से करीब दो मतदाताओं ने कहा कि वे छोटे बदलाव चाहते हैं या मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं चाहते। बदलाव की मांग डेमोक्रेट्स और निर्दलीय मतदाताओं में अधिक देखने को मिली। हालांकि रिपब्लिकन मतदाताओं के बीच भी असंतोष सामने आया। सर्वे के मुताबिक 45 फीसदी रिपब्लिकन मतदाता व्यवस्था में बड़े बदलाव चाहते थे जबकि 13 फीसदी ने पूरी व्यवस्था में व्यापक बदलाव की इच्छा जताई। मतदान को लेकर भी मतदाताओं में दिलचस्पी दिखाई दी। सर्वे में करीब दो-तिहाई पंजीकृत मतदाताओं ने कहा कि मिडटर्म चुनाव में वोट डालना उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। वहीं, लगभग 10 में से दो मतदाताओं ने इसे बहुत महत्वपूर्ण बताया।

सीनेट की इन सीटों पर सबकी नजर

अमेरिकी सीनेट में बहुमत का फैसला कुछ करीबी मुकाबलों से हो सकता है। इसलिए दोनों पार्टियों की नजर कई अहम राज्यों पर है। इनमें टेक्सास, जॉर्जिया, नॉर्थ कैरोलिना, मेन, मिशिगन, आयोवा, ओहायो, अलास्का और कंसास शामिल हैं। डेमोक्रेट्स उन राज्यों में भी जीत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जहां आमतौर पर रिपब्लिकन पार्टी मजबूत रही है। वहीं रिपब्लिकन पार्टी ऐसी सीटों को बचाने में जुटी है, जहां उसके उम्मीदवारों को कड़ी चुनौती मिल रही है। आयोवा में डेमोक्रेट्स को मौका दिखाई दे रहा है क्योंकि वहां रिपब्लिकन पार्टी के मौजूदा सीनेटरों ने दोबारा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। टेक्सास, कंसास, मिशिगन और मेन के मुकाबले भी सीनेट में बहुमत के लिहाज से अहम माने जा रहे हैं।

ट्रंप के लिए क्यों अहम हैं ये चुनाव?

मिडटर्म चुनाव में अगर डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो ट्रंप प्रशासन के सामने कई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। विपक्षी पार्टी को प्रशासन की नीतियों की जांच करने, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाने और राष्ट्रपति के विधायी एजेंडे के कुछ हिस्सों को रोकने की अधिक ताकत मिल जाएगी। इसके उलट अगर रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में अपना नियंत्रण बनाए रखती है, तो ट्रंप को अपनी प्राथमिकताओं को लागू करने में आसानी होगी। ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली संसद कोई कानून पारित करती है, तो वह उस पर वीटो कर सकते हैं। इसलिए इन चुनावों का असर केवल संसद की सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाकी दो वर्षों की राजनीतिक दिशा भी इससे प्रभावित हो सकती है।

भारत में कब से आने लगे अमेरिकी चुनाव के नतीजे?

अमेरिका में अलग-अलग टाइम जोन होने की वजह से मतदान और मतगणना का समय भी राज्यों के हिसाब से अलग है। भारतीय समय के मुताबिक शुरुआती नतीजे 4 नवंबर की सुबह करीब 4:30 बजे से आने शुरू होने की उम्मीद थी। अमेरिका के पूर्वी समय के अनुसार मंगलवार, 3 नवंबर को शाम 6 बजे इंडियाना और केंटकी के कुछ हिस्सों में मतदान केंद्र बंद होने के बाद शुरुआती नतीजे आने शुरू हुए। इसके बाद अलग-अलग राज्यों में मतदान खत्म होने के साथ नतीजे सामने आते रहेंगे। हालांकि करीबी मुकाबलों में अंतिम नतीजे आने में कई घंटे या कई दिन भी लग सकते हैं। खासकर जहां जीत का अंतर कम हो या डाक मतपत्रों की गिनती बाकी हो, वहां किसी उम्मीदवार की जीत की आधिकारिक घोषणा में समय लग सकता है।

हाउस और सीनेट के नतीजों के लिए करना पड़ सकता है इंतजार

प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर चुनाव होने के कारण अलग-अलग राज्यों से नतीजे सामने आएंगे। मतदान खत्म होने के बाद मंगलवार रात से मतगणना शुरू हुई और बुधवार तक जारी रहने की संभावना है। सीनेट की 35 सीटों पर भी अलग-अलग राज्यों में मतगणना के बाद नतीजे आएंगे। कुछ मुकाबलों में शुरुआती घंटों में तस्वीर साफ हो सकती है, लेकिन करीबी मुकाबलों में सभी मतपत्रों की गिनती पूरी होने तक इंतजार करना पड़ सकता है। 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी चुनाव हुए हैं। इन राज्यों में भी मतदान केंद्र बंद होने के बाद मतगणना शुरू हुई। हालांकि डाक मतपत्रों और स्थानीय मतगणना प्रक्रियाओं के कारण कुछ राज्यों में अंतिम नतीजे आने में देरी हो सकती है। फिलहाल शुरुआती रुझानों और घोषित जीतों में डेमोक्रेट्स को कुछ अहम सफलताएं मिली हैं। जॉन ओसॉफ और मार्क वॉर्नर ने अपनी सीटें बचाई हैं, जबकि रॉय कूपर ने नॉर्थ कैरोलिना में रिपब्लिकन पार्टी से एक सीट छीन ली है। लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में बहुमत का अंतिम फैसला बाकी सीटों के नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट होगा।

ये भी पढ़ें- राजस्थान के श्रीगंगानगर में ट्रेन उड़ाने की साजिश नाकाम! पाकिस्तान सीमा के पास रेलवे ट्रैक पर धमाके से हड़कंप, कई ट्रेनें रद्द; ATS ने शुरू की जांच