US Midterm Election Impact: अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को फायदा मिलेगा या बढ़ सकती हैं मुश्किलें?

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बीच आए इन नतीजों से अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन बदल गया है। अब संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी होगी जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बने रहेंगे। इस चुनावी नतीजे का असर सिर्फ अमेरिका की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के लिए भी इसके कई मायने हैं। पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार शुल्क, रूस से तेल खरीद, एच-1बी वीजा, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंधों और भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम को लेकर ट्रंप के बयानों के कारण तनाव देखने को मिला है।

ऐसे में सवाल है कि क्या कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत को ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में कुछ राहत मिलेगी? क्या भारतीय सामान पर अमेरिकी शुल्क घट सकते हैं? क्या भारतीय आईटी पेशेवरों को एच-1बी वीजा के मामले में राहत मिल सकती है? और क्या रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव बढ़ेगा?

हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट ने अपने एक्सप्लेनर में विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक बताया है कि डेमोक्रेट्स की जीत से भारत को बातचीत के लिए कुछ अतिरिक्त मौके मिल सकते हैं लेकिन इससे ट्रंप प्रशासन की नीतियां तुरंत बदल जाएंगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि व्यापार शुल्क और वीजा से जुड़े कई अहम फैसलों में राष्ट्रपति के पास अब भी व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं। आपको बता दें कि नई अमेरिकी कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज संभालेगी।

भारत के लिए क्यों अहम हैं अमेरिकी मध्यावधि चुनाव?

अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। भारतीय आईटी सेवाओं के लिए भी अमेरिकी बाजार बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अलावा चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और रक्षा तकनीक के मामले में दोनों देशों की साझेदारी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने का असर भारत के व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, आव्रजन और रक्षा सहयोग पर पड़ सकता है। भारत-अमेरिका संबंधों में इस साल कई मुद्दों पर खींचतान रही है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय प्रोडक्ट्स पर टैरिफ लगाए। व्यापार समझौते पर बातचीत अटकी रही। अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बनाया। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने में मध्यस्थता की थी। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ अमेरिका के बढ़ते संपर्क और एच-1बी वीजा से जुड़ी नई फीस ने भी भारत की चिंताएं बढ़ाई हैं। भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को मजबूत बनाए रखे लेकिन रूस जैसे देशों के साथ अपने स्वतंत्र विदेश नीति संबंधों को भी प्रभावित न होने दे।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर क्या पड़ेगा असर?

भारत के लिए सबसे तात्कालिक चिंता व्यापार शुल्क और लंबित व्यापार समझौता है। दोनों देशों ने फरवरी 2026 में एक व्यापार समझौते की रूपरेखा का ऐलान किया था। इसके तहत भारतीय प्रोडक्ट्स पर अमेरिकी शुल्क 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी किए जाने की बात थी। इसके बदले भारत को अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कुछ खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने थे। लेकिन इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने स्थिति बदल दी। 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि ट्रंप ने व्यापक शुल्क लगाने के लिए जिस आपातकालीन शक्तियों से जुड़े कानून का इस्तेमाल किया था वह उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं देता।

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 फीसदी शुल्क की दर वास्तव में लागू ही नहीं हो पाई। इसके बाद अस्थायी रूप से 10 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाया गया और 24 जुलाई से ज्यादातर भारतीय उत्पादों पर सेक्शन 301 के तहत 10 फीसदी शुल्क लागू हुआ। इस बीच भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 29 अक्टूबर को कहा था कि अंतरिम समझौता अंतिम चरण में है और इससे भारतीय किसानों के हितों की पूरी सुरक्षा होगी। हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है। भारत में किसान संगठनों को आशंका है कि समझौते के जरिए आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी जीएम फसलों के लिए भारतीय बाजार का रास्ता खुल सकता है।

क्या डेमोक्रेट्स भारत के लिए कम शुल्क की राह खोलेंगे?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत आने से भारत को तत्काल व्यापारिक राहत मिलने की संभावना कम है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी भी पूरी तरह मुक्त व्यापार की समर्थक नहीं है। इसलिए उनकी जीत को भारतीय उत्पादों पर शुल्क घटने का संकेत नहीं माना जा सकता। हालांकि डेमोक्रेट्स भारत को चीन के मुकाबले एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानते हैं। ऐसे में वे मौजूदा व्यापार समझौते की कुछ शर्तों में बदलाव की मांग कर सकते हैं। डेमोक्रेटिक बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा अमेरिकी शुल्क के असर पर सुनवाई करा सकती है। खास तौर पर यह जांचने की कोशिश हो सकती है कि आयात पर लगाए गए शुल्क से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए वस्तुएं कितनी महंगी हुई हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस में ऐसा कोई कानून पारित होने की संभावना कम है जिससे भारत पर लगने वाले शुल्क में बड़ा बदलाव हो। इसलिए भारत के लिए व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखना जरूरी होगा। डेमोक्रेट्स की जीत से बातचीत का माहौल बदल सकता है, लेकिन समझौते की शर्तें अपने आप नहीं बदलेंगी।

रूस से तेल खरीदने पर भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी?

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक और बड़ा मुद्दा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान के साथ युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर करीब आठ महीने से दबाव बना हुआ है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास पैदा हुई बाधाओं ने भी तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.8 फीसदी बढ़कर 104.42 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। बाजार की नजर इस बात पर थी कि ईरान को लेकर अमेरिकी प्रशासन अगला कदम क्या उठाता है। ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा था कि अमेरिका की ईरान पर तत्काल हमला करने की कोई योजना नहीं है। वहीं एक ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि दोनों पक्ष किसी समझौते से अभी काफी दूर हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव क्यों अहम है?

भारत के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना भी लगातार अमेरिकी दबाव का विषय रहा है। 18 सितंबर को हस्ताक्षरित एक अमेरिकी कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100 फीसदी तक शुल्क लगाने का प्रावधान है। हालांकि ट्रंप ने 16 अक्टूबर को इन शुल्कों से छूट दे दी थी। इस छूट की कोई तय समाप्ति तारीख नहीं है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति इसे वापस ले सकते हैं। फरवरी में जारी अमेरिकी आदेश के तहत वाणिज्य विभाग को यह निगरानी करने का निर्देश दिया गया है कि भारत दोबारा रूस से तेल खरीदना शुरू करता है या नहीं। डेमोक्रेट्स के सत्ता में आने से रूस के प्रति अमेरिकी नीति में नरमी आने की संभावना नहीं दिखती। मार्च में जब अमेरिकी वित्त विभाग ने होर्मुज क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने के दौरान भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए अस्थायी छूट दी थी, तब कांग्रेस के डेमोक्रेटिक सदस्यों ने इसका विरोध किया था। इसलिए भारत के लिए स्थिति आसान होने के बजाय कुछ मामलों में चुनौतीपूर्ण भी हो सकती है।

एच-1बी वीजा पर भारतीय आईटी पेशेवरों को मिलेगी राहत?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव का एक बड़ा असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले युवाओं पर पड़ सकता है। भारतीय नागरिक एच-1बी वीजा पाने वालों में सबसे बड़ा समूह हैं। इसलिए इस वीजा से जुड़े अमेरिकी नियमों में बदलाव का असर भारतीय पेशेवरों पर सबसे ज्यादा पड़ सकता है। सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए एच-1बी आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का एलान किया था। इससे भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम करने के इच्छुक भारतीय पेशेवरों की चिंता बढ़ी। हालांकि इस फीस की वसूली को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अदालतों ने 24 जुलाई 2026 से इस फीस की वसूली पर रोक लगा रखी है। 18 सितंबर को जारी एक राष्ट्रपति आदेश के जरिए इस व्यवस्था को 21 सितंबर 2027 तक बढ़ाया गया था। मैसाचुसेट्स की एक अदालत में 20 राज्यों की ओर से दायर मामले में न्यायाधीश ने कहा कि यह फीस असल में एक तरह का कर है जिसे लगाने का अधिकार सिर्फ अमेरिकी कांग्रेस के पास है।

क्या डेमोक्रेट्स एच-1बी फीस खत्म कर सकते हैं?

कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से एच-1बी नीति की जांच-पड़ताल बढ़ सकती है। वे इस बात पर सवाल उठा सकते हैं कि नई फीस का अमेरिकी कंपनियों और विदेशी पेशेवरों पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन इससे यह उम्मीद करना सही नहीं होगा कि एच-1बी वीजा की फीस तुरंत खत्म हो जाएगी या वीजा नियमों में बड़ी राहत मिल जाएगी। नई कांग्रेस जनवरी 2027 में कामकाज शुरू करेगी। ट्रंप के पास राष्ट्रपति के रूप में वीटो का अधिकार बना रहेगा। अगर कांग्रेस ऐसा कोई विधेयक पारित करती है जो इस फीस को सीमित करता है या इसे कानून के रूप में बदलने की कोशिश करता है तो ट्रंप उसे वीटो कर सकते हैं।

भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बीच भारतीय शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। चुनाव परिणाम आने से पहले भारतीय बाजार मजबूत स्थिति में थे। मंगलवार तक चार कारोबारी सत्रों में निफ्टी 50 और सेंसेक्स करीब 5 फीसदी चढ़कर दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे। इसके पीछे कंपनियों के बेहतर नतीजे, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और विदेशी निवेशकों की ओर से खरीदारी में शुरुआती सुधार जैसे कारण थे। मंगलवार को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 6837 करोड़ रुपये यानी 721.66 मिलियन डॉलर की शुद्ध खरीदारी की। लेकिन बुधवार को तस्वीर कुछ बदली। निफ्टी 23946.35 के उच्च स्तर तक पहुंचा, जबकि सेंसेक्स ने 77396.04 का स्तर छुआ। हालांकि बाद में बाजार की बढ़त कम हो गई। इस दौरान आईटी शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। आईटी कंपनियों के शेयरों में 2.2 फीसदी की गिरावट आई। बाजार विशेषज्ञों ने इसकी वजह अमेरिकी आव्रजन नीति और आउटसोर्सिंग से जुड़ी अनिश्चितताओं को बताया। अमेरिकी बाजार में सेवाओं की मांग कमजोर रहने की आशंका भी आईटी शेयरों पर दबाव का एक कारण रही।

क्या मध्यावधि चुनाव के बाद भारतीय बाजार में तेजी आती है?

इतिहास के कुछ आंकड़े भारतीय शेयर बाजार के लिए उम्मीद की वजह हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक 1982 के बाद से अमेरिका के 11 मध्यावधि चुनावों में से छह मौकों पर उसके बाद के महीनों में भारतीय शेयर सूचकांकों ने औसतन 12 फीसदी की बढ़त दर्ज की। हालांकि इसे इस बार भी बाजार में तेजी की गारंटी नहीं माना जा सकता। कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेशकों का रुख, कंपनियों के नतीजे और अमेरिका की आर्थिक नीतियां बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ब्रोकरेज के आकलन में निफ्टी के लिए 23200 का स्तर एक महत्वपूर्ण सपोर्ट माना गया है।

रक्षा सहयोग, क्वाड और चीन के मोर्चे पर क्या बदलेगा?

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग को दोनों देशों की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता रहा है। दोनों देश रक्षा अभ्यास, सैन्य तकनीक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने जैसे मुद्दों पर साथ काम करते रहे हैं। इसलिए अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के बहुमत से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों की दिशा में बड़े बदलाव की संभावना कम है। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी और बजट संबंधी फैसले कुछ रक्षा परियोजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं।

इसके लिए भारत-अमेरिका क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी यानी आईसीईटी ढांचे के तहत सहयोग को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा क्वाड के तहत महत्वपूर्ण खनिजों और समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली इंटरनेट केबल जैसी परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने के अवसर भी हैं। डेमोक्रेट्स की मजबूत मौजूदगी अमेरिकी विदेश नीति में कुछ मामलों में संतुलनकारी भूमिका निभा सकती है। इससे भारत को रक्षा, व्यापार और कूटनीति से जुड़े अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं।

भारत के लिए डेमोक्रेट्स की जीत के क्या मायने हैं?

ऐसे में देखें तो अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजे भारत के लिए न तो पूरी तरह राहत की खबर हैं और न ही किसी बड़े संकट का संकेत। इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर अमेरिकी कांग्रेस की निगरानी बढ़ेगी। व्यापार के मोर्चे पर भारत को तत्काल शुल्क में कमी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। एच-1बी वीजा के मामले में भी डेमोक्रेट्स की जीत से तुरंत राहत मिलने की संभावना नहीं है। रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव जारी रह सकता है और इस मुद्दे पर कांग्रेस में बहस तेज हो सकती है। भारत की चुनौती अब यह होगी कि वह ट्रंप प्रशासन के साथ अपने संबंधों को संभालते हुए अमेरिकी कांग्रेस के साथ भी संवाद मजबूत करे। आखिरकार, भारत की समस्या अमेरिका के साथ साझेदारी नहीं बल्कि ट्रंप प्रशासन के कुछ खास नीतिगत फैसले रहे हैं।

AI-Proof प्रोफेशन्स की पहचान करेगा वाणिज्य मंत्रालय, पीयूष गोयल ने जो कहा उसके मायने समझिए

AI-proof professions: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच भारत सरकार भविष्य के रोजगार और कौशल की जरूरतों को ध्यान में रखकर नई रणनीति तैयार करने की दिशा में अहम काम कर रही है। मोदी सरकार ऐसे प्रोफेशन्स की पहचान कर रही है जिन पर AI का कम असर पड़ेगा। इसमें उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया जा रहा है, जहां टेक्नोलॉजी इंसानों की जगह लिए बिना उनकी कार्यक्षमता बढ़ा सकती है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि उन्होंने अपने मंत्रालय से ऐसे पेशों और क्षेत्रों की पहचान करने को कहा है, जो AI के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद मानव श्रम, रचनात्मकता और पारंपरिक कौशल के कारण प्रासंगिक बने रह सकते हैं।

मंत्री ने बताया कि भारत की विशाल आबादी और रोजगार की जरूरतों को देखते हुए इस पहल का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों पर ध्यान देना है, जहां तकनीक इंसानों को पूरी तरह विस्थापित करने के बजाय उनकी उत्पादकता बढ़ाने में मदद करे। जर्मनी में भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी शोधकर्ताओं और छात्रों को संबोधित करते हुए गोयल ने कहा कि भारत को उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जहां उसकी मानव कौशल उसे वैश्विक स्तर पर अलग पहचान दिला सकते हैं। उन्होंने हस्तशिल्प, हथकरघा, पाक-कला और पर्यटन जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत इन क्षेत्रों में दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है।

AI से नौकरियों पर असर के बीच सरकार की तैयारी

AI के विस्तार से दुनिया भर में रोजगार के स्वरूप में बदलाव की आशंका जताई जा रही है। कई कामों में स्वचालन बढ़ रहा है। वहीं नए तकनीकी कौशल और रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे बड़ी श्रमशक्ति वाले देश के लिए यह समझना महत्वपूर्ण हो गया है कि किन क्षेत्रों में मानव भागीदारी लंबे समय तक अहम बनी रह सकती है। पीयूष गोयल ने कहा कि उन्होंने अपने मंत्रालय से ‘AI-प्रूफ प्रोफेशन’ यानी ऐसे पेशों की पहचान करने को कहा है, जो AI के कारण पूरी तरह अप्रासंगिक होने की आशंका से अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकते हैं।

न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक उन्होंने कहा, “आखिरकार, हमें एक राष्ट्र के रूप में करोड़ों लोगों के भविष्य की योजना बनानी है। ऐसे कौन-से क्षेत्र हैं, जहां AI अधिकतम कार्यक्षमता बढ़ा सकता है। लेकिन जरूरी नहीं कि वह मानव कार्यबल की जगह ले।” मंत्री के इस बयान का व्यापक अर्थ यह है कि भारत को भविष्य की रोजगार नीति बनाते समय केवल नई टेक्नोलॉजी को अपनाने पर ही नहीं, बल्कि मानव कौशल की रक्षा और विकास पर भी ध्यान देना होगा।

हस्तशिल्प और हथकरघा में भारत देख रहा वैश्विक नेतृत्व की संभावना

गोयल ने भारत की पारंपरिक कला और कौशल को भविष्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान देने की बात कही। उनके मुताबिक, हस्तशिल्प और हथकरघा जैसे क्षेत्रों में भारतीय कारीगरों का अनुभव, सांस्कृतिक विरासत और रचनात्मकता देश की विशेष ताकत हैं। उन्होंने कहा कि भारत के पारंपरिक कौशल को AI पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।

भारत में हस्तशिल्प और हथकरघा केवल सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा नहीं हैं। बल्कि अनेक कारीगरों, बुनकरों और छोटे उद्यमियों की आजीविका से भी जुड़े हैं। इन क्षेत्रों में डिजाइन, बुनाई, कढ़ाई, लकड़ी का काम, मिट्टी की कला और अन्य पारंपरिक तकनीकों का विशेष महत्व है।

AI का इस्तेमाल इन उद्योगों में डिजाइन तैयार करने, बाजार के रुझानों को समझने, उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री और ग्राहकों तक पहुंच बढ़ाने में किया जा सकता है। वहीं, उत्पादों के निर्माण में मानवीय कौशल, स्थानीय पहचान और विशिष्ट कलात्मकता की भूमिका बनी रह सकती है।

कला और पर्यटन में भी भारत के लिए बड़े अवसर

वाणिज्य मंत्री ने कला और पर्यटन को भी ऐसे क्षेत्रों में शामिल किया, जहां भारत अपनी विशेष क्षमताओं के आधार पर वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ सकता है। भारत की क्षेत्रीय खाद्य परंपराएं, स्थानीय व्यंजन, सांस्कृतिक विविधता, ऐतिहासिक स्थल और पारंपरिक आतिथ्य पर्यटन उद्योग को विशिष्ट पहचान देते हैं। इन क्षेत्रों में मानवीय संपर्क, स्थानीय अनुभव और सांस्कृतिक समझ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

AI पर्यटन स्थलों के प्रचार, यात्रा की योजना बनाने, ग्राहकों की पसंद समझने और सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है। लेकिन स्थानीय संस्कृति का अनुभव और पारंपरिक भोजन की खासियत जैसे पहलुओं में मानवीय भागीदारी अब भी महत्वपूर्ण रह सकती है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन पारंपरिक क्षेत्रों को आधुनिक तकनीक से जोड़े, ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें और स्थानीय उद्यमियों को बड़े बाजारों तक पहुंच मिल सके।

140 करोड़ लोगों के बेहतर भविष्य पर जोर

गोयल ने कहा कि भारत के पास ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां देश की विशिष्ट ताकतों को विकसित करके लोगों के जीवन स्तर में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे क्षेत्रों पर एक साथ ध्यान देगी, जिनमें भारत की विशेष क्षमताएं हैं, जो देश की लगभग 1.4 अरब आबादी के बेहतर भविष्य में योगदान दे सकते हैं। इस दृष्टिकोण में रोजगार सृजन, कौशल विकास, छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन और तकनीकी बदलावों के अनुरूप आर्थिक अवसर तैयार करना शामिल है। भारत की बड़ी युवा आबादी को देखते हुए यह भी जरूरी होगा कि शिक्षा और ट्रेनिंग व्यवस्था को उद्योगों की बदलती मांग के साथ जोड़ा जाए।

AI से मुकाबले में सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर करेंगे काम

जब गोयल से पूछा गया कि इन क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए क्या विशेष प्रोत्साहन दिए जाएंगे? इस पर उन्होंने कहा कि इसके लिए भारत सरकार, निजी क्षेत्र और अन्य पक्षों की भागीदारी से अलग-अलग पहल की जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रयास केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं होगा। कुछ पहल प्राइवेट सेक्टर के नेतृत्व में होंगी। वहीं, कुछ सरकार की ओर से संचालित की जाएंगी। जबकि अन्य अवसरों और लोगों की भागीदारी के आधार पर आगे बढ़ेंगी।

उनके मुताबिक AI के दौर में रोजगार से जुड़ी चुनौतियों का समाधान केवल एक नीति या एक योजना से नहीं निकलेगा। इसके लिए उद्योगों, शिक्षण संस्थानों, स्कील ट्रेनिंग सेंटर और सरकार के बीच समन्वय की जरूरत होगी। यदि ऐसे प्रयास प्रभावी ढंग से लागू होते हैं, तो पारंपरिक उद्योगों में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाते हुए रोजगार के मौजूदा अवसरों को मजबूत करने और नए काम पैदा करने की संभावनाएं बन सकती हैं।

विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों को वापस लाने की पहल

गोयल ने जर्मनी में मौजूद भारतीय शोधकर्ताओं, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को भारत लौटकर देश के विकास में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत पर भी बात की। उन्होंने बताया कि उन्होंने वहां भारतीय शोधकर्ताओं और छात्रों से पूछा है कि भारत में काम करने पर विचार करने के लिए उन्हें किस प्रकार की सहायता और सुविधाओं की आवश्यकता होगी।

मंत्री ने कहा कि उन्होंने प्रतिभाशाली युवा शोधकर्ताओं, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से यह बताने को कहा है कि सरकार किस तरह उन्हें भारत में काम करने और देश की सेवा करने के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध करा सकती है। विदेशों में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों का अनुभव, तकनीकी ज्ञान और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों से जुड़ाव भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

प्रतिभा की वापसी के लिए बेहतर रिसर्च इकोसिस्टम जरूरी

गोयल ने कहा कि प्रतिभाशाली पेशेवरों को भारत वापस लाने का मामला केवल सैलरी या आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है। इसके लिए ऐसा माहौल तैयार करना जरूरी है, जहां शोधकर्ताओं को अच्छी सुविधाएं, संस्थागत सहयोग और इनोवेशन के पर्याप्त अवसर मिल सकें। उन्होंने कहा कि उन्हें यह समझ में आया है कि मामला केवल पैसे का नहीं, बल्कि सक्षम वातावरण और सहयोगी इकोसिस्टम का भी है।

गोयल ने कहा कि वह इस मुद्दे पर सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों, एकेडमिक वर्ल्ड, प्रमुख शोध संस्थानों तथा उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से चर्चा करेंगे। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि शोधकर्ताओं और उद्योगों के बीच साझेदारी को किस प्रकार मजबूत किया जा सकता है। भारत में शोध के अवसर बढ़ने से न केवल विदेशों में मौजूद प्रतिभाओं को वापस लाने में मदद मिल सकती है। बल्कि देश में पढ़ रहे छात्रों के लिए भी हाईटेक रिसर्च और इनोवेशन के नए रास्ते खुल सकते हैं।

‘जर्मनी में भारतीय स्टूडेंट भारत की विकास यात्रा से जुड़ने को उत्सुक’

गोयल ने जर्मनी में पढ़ रहे भारतीय स्टूडेंट्स का उल्लेख करते हुए कहा कि उनमें से कई भारत लौटकर देश की आर्थिक प्रगति में योगदान देने को लेकर उत्साहित दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय स्टूडेंट्स का एक बड़ा समुदाय अपने अनुभव और एजुकेशन को भारत वापस लाने के लिए उत्सुक है। उनके मुताबिक, अब कुछ छात्र केवल जर्मनी में नौकरी पाने के बजाय भारत लौटकर देश की विकास यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं। आंकड़ों के अनुसार, जर्मनी में भारतीय मूल के लगभग 3.3 लाख लोग रहते हैं। इसके अलावा वहां भारतीय स्टूडेंट की संख्या करीब 60,000 से 70,000 बताई जाती है।

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