
भारत में आरोप लगाने और फिर माफी मांग लेने का चलन पिछले कुछ समय से बहुत बढ़ गया है। पहले भी ऐसा रहा था लेकिन तब अपवाद की तरह था। अरविंद केजरीवाल जब राजनीति में आए तो उन्होंने इसे अपना मुख्य राजनीतिक हथियार बनाया। वे बेधड़क किसी पर भी आरोप लगाते थे। पढ़े लिखे हैं तो उनको कानून का पता है। वे जानते हैं कि किसी पर आरोप लगाएंगे तो एक बार माफी मांगने का मौका मिलता है। लेकिन आरोप लगाने और उसके बाद कानूनी नोटिस मिलने पर माफी मांगने के बीच में इतना समय बीत जाता है कि माफी पर किसी का ध्यान नहीं जाता। आरोप को सभी याद रखते हैं। तभी केजरीवाल ने जितने लोगों पर आरोप लगाए, जितने लोगों को भ्रष्ट ठहराया उनमें से ज्यादातर से माफी मांगी और उन्हीं के साथ अब राजनीति कर रहे हैं।
उनकी देखादेखी बहुत सारे नेता खुल कर आरोप लगाने लगे हैं। उच्च पदों पर बैठे लोगों के साथ बदतमीजी करने लगे हैं। अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं और विवाद बढ़ने पर माफी मांगने लगे हैं। हाल के दिनों खूब आरोप लगे हैं और खूब माफियां मांगी गई हैं। केरल कांग्रेस के सोशल मीडिया हैंडल से चीफ जस्टिस सूर्यकांत के लिए अपमानजनक संबोधन और बातों का प्रयोग हुआ और विवाद बढ़ा तो केरल कांग्रेस ने माफी मांग ली। उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी ने अगड़ा, पिछड़ा औऱ अल्पसंख्यक को लेकर जातिवाद व सांप्रदाकिता पर एक पोस्ट लिख दी और विवाद बढ़ा तो माफी मांग ली। संजदय राउत ने सुप्रीम कोर्ट को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की और विवाद बढ़ा तो माफी मांग ली। निशिकांत दुबे और पूर्व आईएएस सुभाष गर्ग विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया तो महुआ मोइत्रा को भी अपनी एक पोस्ट खेद जताते हुए हटानी पड़ी।

