कौन हैं डॉ. अमीश शाह? एरिजोना से US संसद का चुनाव जीतकर भारतीय मूल के डॉक्टर ने रचा इतिहास

कौन हैं डॉ. अमीश शाह? एरिजोना से US संसद का चुनाव जीतकर भारतीय मूल के डॉक्टर ने रचा इतिहास

Dr amish Shah US Election

who is dr amish shah: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (US House of Representatives) के चुनाव में भारतीय मूल के डेमोक्रेटिक नेता और आपातकालीन चिकित्सक (Emergency Physician) डॉ. अमीश शाह ने इतिहास रच दिया है। उन्होंने एरिजोना राज्य के प्रथम कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से शानदार जीत हासिल कर अमेरिकी संसद के निचले सदन में जगह बनाई है। डॉ. अमीश शाह एरिजोना से अमेरिकी कांग्रेस के लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी बन गए हैं। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही वे अमेरिकी संसद में भारतीय-अमेरिकी ‘समस्या निवारण समूह’ (Samosa Caucus) के छठे भारतीय-अमेरिकी सदस्य के रूप में शामिल हो गए हैं।

डॉ. अमीश शाह की ऐतिहासिक उपलब्धि

अमेरिका के एरिजोना राज्य में एक नया राजनीतिक इतिहास लिखा गया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी और प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. अमीश शाह ने एरिजोना की पहले कांग्रेसनल सीट से रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी (पूर्व एनएफएल खिलाड़ी) जे फीली को एक कड़े मुकाबले में हराकर जीत दर्ज की है। शाह को 52.49% वोट मिले, जबकि फेली को 45.45% वोट हासिल हुए। इस जीत से उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के कब्जे वाली सीट पर डेमोक्रेट्स का परचम लहरा दिया है। अपनी जीत के बाद एक्स (ट्विटर) पर आभार व्यक्त करते हुए डॉ. अमीश शाह ने लिखा- एरिजोना, आपका अगला कांग्रेसी बनना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है। ALSO READ: ट्रंप के खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी में बगावत : उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी नाराज, रक्षामंत्री हेगसेथ पर महाभियोग का खतरा

 

कौन हैं डॉ. अमीश शाह?

48 वर्षीय डॉ. अमीश शाह के माता-पिता भारत के गुजरात राज्य से संबंध रखते हैं। उनके माता-पिता 1960 के दशक में भारत से अमेरिका जाकर शिकागो में बस गए थे, जहां अमीश शाह का जन्म और पालन-पोषण हुआ। उनके पिता जैन धर्म को मानते हैं, जबकि मां हिंदू हैं। अमीश ने नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से स्नातक और बर्कले की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से सार्वजनिक स्वास्थ्य में स्नातकोत्तर (MPH) की डिग्री हासिल की। वे पिछले 15 से अधिक वर्षों से एरिजोना के अस्पताल में इमरजेंसी रूम (ER) डॉक्टर के रूप में सेवा दे रहे हैं। ALSO READ: ईरान युद्ध की वजह से हारे मध्यावधि चुनाव? अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का बड़ा कबूलनामा

 

राजनीतिक सफर : उन्होंने वर्ष 2018 में पहली बार राजनीति में प्रवेश किया और एरिजोना हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (राज्य विधानसभा) के लिए चुने गए। उन्होंने लगातार तीन कार्यकाल तक राज्य प्रतिनिधि के रूप में अपनी सेवाएं दीं। डॉ. अमीश शाह की सफलता का सबसे बड़ा कारण उनका जमीनी जनसंपर्क माना जा रहा है। अपने अभियान के दौरान उन्होंने स्वयं 28,000 से अधिक घरों के दरवाजे खटखटाए और मतदाताओं से सीधे संवाद किया।

 

चुनाव के दौरान उनके मुख्य मुद्दे : एक डॉक्टर होने के नाते उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और सस्ती बनाने पर जोर दिया। उन्होंने शिक्षा बजट में वृद्धि और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में ठोस नीतियां बनाने का वादा किया। एरिजोना के सीमावर्ती राज्य होने के कारण उन्होंने संतुलित सीमा सुरक्षा और नागरिकों के मतदान अधिकारों की रक्षा का समर्थन किया।

 

डॉ. शाह की यह जीत अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को दर्शाती है। वे अमेरिकी संसद के निचले सदन में प्रतिनिधि के रूप में शामिल होकर स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और द्विस्तरीय कूटनीति से जुड़े मुद्दों पर अहम भूमिका निभाएंगे।

Pia Dandiya Journey: कभी दिल्ली के स्लम में पढ़ाने वाली पिया डांडिया ने फ्लोरिडा से जीत दर्ज कर रचा इतिहास, रिपब्लिकन गढ़ ध्वस्त करने वाली नेता की कहानी जानिए

Pia Dandiya Journey: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में भारतीय मूल की पिया डांडिया ने फ्लोरिडा से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पारी की शानदार शुरुआत की है। 39 वर्षीय पिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी असकर को हराकर अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जगह बनाई है। उनकी जीत इसलिए भी खास है क्योंकि जिस सीट पर उन्होंने जीत दर्ज की वहां नए परिसीमन के बाद रिपब्लिकन पार्टी को राजनीतिक बढ़त मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी। इसके बावजूद पिया ने इस सीट पर डेमोक्रेटिक पार्टी का परचम लहरा दिया।

पिया डांडिया की कहानी किसी सामान्य चुनावी जीत तक सीमित नहीं है। भारत की राजधानी दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को पढ़ाने से शुरू हुआ उनका सफर अमेरिका के प्रतिष्ठित व्हाइट हाउस फेलोशिप प्रोग्राम, शिक्षा विभाग और दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में शामिल ऐपल तक पहुंचा। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काम किया, स्कूल की प्रिंसिपल बनीं, सरकारी नीतियों को बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा रहीं और फिर राजनीति में कदम रखा।

उनकी जिंदगी का यह सफर अब अमेरिकी कांग्रेस तक पहुंच गया है। पिया की जीत भारतीय-अमेरिकी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं कौन हैं पिया डांडिया, उनका भारत से क्या कनेक्शन है और कैसे उन्होंने फ्लोरिडा में रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जा रही सीट पर जीत हासिल की।

कौन हैं पिया डांडिया, भारत से क्या है कनेक्शन?

पिया डांडिया पहली पीढ़ी की भारतीय-अमेरिकी नागरिक हैं। उनका जन्म और पालन-पोषण अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के पाम बीच काउंटी में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे। भारतीय मूल के परिवार में पली-बढ़ीं पिया ने अपने करियर में शिक्षा, सरकारी नीतियों और तकनीक के क्षेत्र में काम किया है। पिया की पहचान एक शिक्षाविद, नीति विशेषज्ञ और टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम कर चुकी पेशेवर के रूप में रही है। राजनीति में आने से पहले उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उनका मानना रहा है कि अच्छी शिक्षा और रोजगार के अवसरों के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की जिंदगी बदली जा सकती है। उनके इसी विचार ने उन्हें अपने करियर के शुरुआती दौर में दिल्ली की उन झुग्गी-बस्तियों तक पहुंचाया, जहां आर्थिक तंगी के कारण बच्चों के सामने पढ़ाई जारी रखना भी बड़ी चुनौती थी।

दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने से शुरू हुआ सफर

पिया डांडिया के करियर की शुरुआत शिक्षा के क्षेत्र से हुई। हमारे सहयोगी फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने अपने शुरुआती करियर में दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले वंचित समुदायों के बच्चों को पढ़ाया। इस अनुभव ने उन्हें करीब से समझने का मौका दिया कि गरीबी और संसाधनों की कमी किस तरह बच्चों की शिक्षा और भविष्य को प्रभावित करती है। दिल्ली में पढ़ाने के दौरान उन्होंने देखा कि प्रतिभा होने के बावजूद कई बच्चों को बेहतर शैक्षणिक अवसर नहीं मिल पाते। आर्थिक स्थिति, परिवार की परिस्थितियां और शिक्षा के संसाधनों तक सीमित पहुंच उनके आगे बढ़ने में बाधा बनती है।

इस अनुभव ने पिया के करियर और उनकी सोच को प्रभावित किया। वह शिक्षा को सिर्फ स्कूल तक सीमित रखने के बजाय आर्थिक और सामाजिक बदलाव का माध्यम मानने लगीं। इसके बाद वह अमेरिका लौट गईं और वहां मिडिल स्कूल और हाई स्कूल में टीचर के रूप में काम किया। धीरे-धीरे शिक्षा के क्षेत्र में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ स्कूलों के संचालन और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में भी काम किया।

28 साल की उम्र में बनीं हाई स्कूल की प्रिंसिपल

पिया डांडिया के करियर की एक बड़ी उपलब्धि महज 28 साल की उम्र में हाई स्कूल की संस्थापक प्रिंसिपल बनना रही। इतनी कम उम्र में इस जिम्मेदारी तक पहुंचने के कारण वह अमेरिका की सबसे कम उम्र की हाई स्कूल प्रिंसिपलों में शामिल हो गई थीं। उन्होंने जिस स्कूल की स्थापना और नेतृत्व किया, वहां ज्यादातर विद्यार्थी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते थे। उनके चुनावी अभियान की वेबसाइट के मुताबिक, स्कूल के 86 फीसदी विद्यार्थी कम आय वाले परिवारों से संबंधित थे। पिया ने स्कूल में ऐसा शैक्षणिक माहौल तैयार करने पर जोर दिया, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को भी कॉलेज में दाखिला लेने और आगे बढ़ने का अवसर मिल सके।

उनके नेतृत्व में स्कूल से पढ़ाई पूरी करने वाले सभी विद्यार्थियों को कॉलेज में दाखिला मिला। यह उपलब्धि उनके चुनाव प्रचार के दौरान भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर पेश की गई। पिया ने अपनी शैक्षणिक यात्रा के अनुभवों को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं से भी जोड़ा। उनकी चुनावी प्राथमिकताओं में सभी बच्चों के लिए प्री-किंडरगार्टन शिक्षा की सुविधा, सरकारी स्कूलों में निवेश बढ़ाना और युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना शामिल रहा।

‘वाइट हाउस’ में भी किया काम, दोनों पार्टियों की सरकारों के साथ जुड़ा रहा अनुभव

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के बाद पिया डांडिया ने अमेरिकी सरकार की नीति निर्माण प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें प्रतिष्ठित वाइट हाउस फेलो के रूप में चुना गया था। वाइट हाउस फेलोशिप अमेरिका का एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम है, जिसके तहत अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले प्रतिभाशाली पेशेवरों को संघीय सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ काम करने का अवसर मिलता है। पिया ने वाइट हाउस की डोमेस्टिक पॉलिसी काउंसिल और अमेरिकी शिक्षा विभाग में काम किया। खास बात यह रही कि उन्हें डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों पार्टियों के प्रशासन के दौरान काम करने का अनुभव मिला।

इस दौरान उन्होंने शिक्षा और घरेलू नीतियों से जुड़े मुद्दों पर काम किया। स्कूलों की व्यवस्था, बच्चों को बेहतर शैक्षणिक अवसर और परिवारों की आर्थिक स्थिति जैसे विषय उनके काम के केंद्र में रहे। सरकारी व्यवस्था के भीतर काम करने के इस अनुभव ने उन्हें अमेरिकी प्रशासन और नीतियां बनाने की प्रक्रिया को करीब से समझने का अवसर दिया। बाद में राजनीति में उतरने के दौरान भी उन्होंने अपने इस अनुभव को प्रमुखता से सामने रखा।

फिर ऐपल से जुड़ीं, टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी बनाया अनुभव

सरकारी सेवा के बाद पिया ने निजी क्षेत्र का रुख किया और टेक्नोलॉजी कंपनी ऐपल से जुड़ीं। वहां उन्होंने पब्लिक सेक्टर से संबंधित काम किया। उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शिक्षा और सरकारी सेवाओं में तकनीक के इस्तेमाल को बेहतर बनाना था। उन्होंने स्कूलों में आईपैड के जरिए पढ़ाई को आसान बनाने और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े लोगों के लिए तकनीकी समाधान विकसित करने जैसे कामों में योगदान दिया।

फ्लोरिडा में कैसे मिली जीत, रिपब्लिकन उम्मीदवार को दी मात?

पिया डांडिया ने फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से चुनाव लड़ा था। यहां उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी असकर से था। असकर अमेरिकी मरीन कॉर्प्स के पूर्व सैनिक और कारोबारी हैं। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी नीतियों का समर्थन करते हुए चुनाव प्रचार किया था। पिया ने इस मुकाबले में 51.9 फीसदी वोट हासिल किए, जबकि असकर को 48.1 फीसदी वोट मिले। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पिया को 151926 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी असकर को 140933 वोट हासिल हुए। इस जीत के साथ पिया ने फ्लोरिडा के 22वें डिस्ट्रिक्ट को डेमोक्रेटिक पार्टी के खाते में बनाए रखा। उनकी जीत इसलिए भी उल्लेखनीय रही क्योंकि फ्लोरिडा में रिपब्लिकन पार्टी की सरकार ने 2026 के चुनाव से पहले कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट की सीमाओं में बदलाव किया था।

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फ्लोरिडा के गवर्नर रॉन डीसेंटिस के नेतृत्व में हुए नए परिसीमन के बाद इस सीट का राजनीतिक स्वरूप बदल गया था। नए नक्शे में ऐसे इलाके शामिल किए गए, जहां रिपब्लिकन पार्टी को अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी। इस वजह से चुनावी मुकाबले को दक्षिण फ्लोरिडा की सबसे चर्चित और प्रतिस्पर्धी सीटों में गिना जा रहा था। नए परिसीमन के बाद इस सीट पर कोई मौजूदा सांसद उम्मीदवार के रूप में मैदान में नहीं था। पिया ने इस राजनीतिक परिस्थिति का फायदा उठाते हुए चुनाव अभियान चलाया और रिपब्लिकन उम्मीदवार को शिकस्त दी।