Suzlon Energy Share: चार दिन में 12% चढ़ा सुजलॉन, अब भी तूफानी तेजी की उम्मीद; मोतीलाल ओसवाल ने ₹65 का टारगेट दिया

Suzlon Energy Share: स्टॉक मार्केट में उतार-चढ़ाव के बीच Suzlon Energy के शेयरों में लगातार चौथे कारोबारी सत्र में तेजी जारी रही। यह बीते चार सत्र में 12% चढ़ चुका है। सुजलॉन बुधवार को 1.52% की बढ़त के साथ 40.80 रुपये पर बंद हुआ।

हालांकि, इसके बावजूद शेयर का प्रदर्शन अब तक कमजोर रहा है। पिछले एक साल में इसमें 25% की गिरावट आई है। वहीं, इस साल अब तक शेयर 22% टूट चुका है। पिछले छह महीने में इसमें 17% और एक महीने में 5% की गिरावट दर्ज की गई है।

सुजलॉन पर ब्रोकरेज की राय

ब्रोकरेज  का सुजलॉन पर रुख काफी बुलिश है। ब्रोकरेज फर्म Motilal Oswal ने अपनी 12 अक्टूबर को जारी रिपोर्ट में सुजलॉन पर ‘Buy’ रेटिंग बरकरार रखी। साथ ही, 65 रुपये का टारगेट प्राइस दिया है। यह मौजूदा स्तर से करीब 60% की तेजी का संकेत देता है।

सुजलॉन फिलहाल अपने 52 हफ्ते के निचले स्तर के करीब है। मोतीलाल ओसवाल ने सुजलॉन के शेयरों में संभावित तेजी की पांच बड़ी वजहें बताई हैं।

1. गिरावट के बाद शेयर का वैल्यूएशन आकर्षक

Suzlon Energy के शेयर में पिछले तीन महीनों में करीब 31% की गिरावट आई है। Motilal Oswal का मानना है कि इतनी गिरावट के बाद शेयर का वैल्यूएशन आकर्षक हो गया है। कंपनी की कमाई को लेकर भी तस्वीर पहले से बेहतर दिख रही है।

2. मजबूत ऑर्डर बुक से मिलेगा सहारा

जून तिमाही के अंत में Suzlon Energy के पास 5.9 GW के ऑर्डर थे। Motilal Oswal के मुताबिक, यह ऑर्डर बुक वित्त वर्ष 2028 की तीसरी तिमाही तक कंपनी की डिलीवरी के अनुमान को पूरा सपोर्ट देती है।

3. देश में बढ़ रही है विंड पावर की क्षमता

भारत में चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में 3 GW विंड पावर क्षमता जोड़ी गई। Motilal Oswal के मुताबिक, पिछले रुझानों को देखें तो दूसरी छमाही में इंस्टॉलेशन पहली छमाही से करीब 1.5 गुना रह सकता है। विंड पावर क्षमता बढ़ने से Suzlon जैसी कंपनियों को नए ऑर्डर मिलने की उम्मीद है।

4. शाम को बिजली की ज्यादा मांग से फायदा

देश में बिजली की मांग बढ़ रही है। खासकर शाम के समय पीक डिमांड ज्यादा रहती है। Motilal Oswal के मुताबिक, इससे विंड-सोलर हाइब्रिड और FDRE प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा मिल सकता है।  इसका फायदा Suzlon को भी मिलने की उम्मीद है।

5. नए कारोबार से बढ़ेगी कमाई की उम्मीद

Motilal Oswal के मुताबिक, Suzlon का DevCo मॉडल तेजी से आगे बढ़ रहा है। वित्त वर्ष की शुरुआत के चार महीनों में इस मॉडल के तहत 600 MW से ज्यादा के ऑर्डर मिले हैं। ये कंपनी के कुल ऑर्डर का करीब 60% हैं। कंपनी विदेशों में भी कारोबार बढ़ाने के मौके तलाश रही है। ब्रोकरेज के मुताबिक, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में अच्छी संभावनाएं हैं।

Suzlon Energy पर एनालिस्टों की क्या राय है?

Suzlon Energy को कवर करने वाले 12 एनालिस्ट में से 10 ने शेयर पर ‘Buy’ रेटिंग दी है। दो एनालिस्ट ने इसे ‘Hold’ रेटिंग दी है। किसी भी एनालिस्ट ने शेयर बेचने की सलाह नहीं दी है। सभी एनालिस्ट के टारगेट प्राइस के औसत के हिसाब से शेयर में मौजूदा स्तर से करीब 67% की तेजी की संभावना है।

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Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Stock Market View: अगले 6 महीने तेजी में मुनाफावसूली की रणनीति करेगी काम, पावर और एक्सपोर्ट सेगमेंट में कमाई के मौके

Stock Market View : 13 अक्टूबर के शानदार सेशन के बाद मार्केट पर आज फिर दबाव देखने को मिल रहा है। निफ्टी 22,700 के लेवल से नीचे आ गया है। बुल्स मोमेंटम बनाए रखने के लिए संघर्ष रहे हैं। सेंसेक्स भी थोड़ा नीचे है और 73,000 के लेवल से नीचे फिसल गया है। निफ्टी बैंक इंडेक्स भी मंदडियों की पकड़ से जूझ रहा है और लगभग 100 अंक नीचे है। बाजार जानकारों का कहना है कि निफ्टी के लिए निचले स्तर पर 22,700 का लेवल बचाए रखना अहम होगा। वहीं, फिर से तेजी पकड़ने के लिए 23,000 के लेवल तक पहुंचना भी जरूरी होगा।

ऐसे माहौल में मार्केट आउटलुक पर चर्चा करते हुए डाइमेंशन्स कॉर्पोरेट फाइनेंस सर्विसेज़ ( Dimensions Corporate Finance Services) के मैनेजिंग डायरेक्टर अजय श्रीवास्तव ने कहा कि रुपए में गिरावट और महंगाई बढ़ने के चलते बाजार पर दबाव देखने को मिल रहा है। बाजार की गिरावट से कोई सरप्राइज नहीं है। अगले 6 महीने तक बाजार में मुनाफावूसली की रणनीति काम करती दिखेगी।

मिडकैप में अच्छी तेजी रही है। प्राइमरी मार्केट पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि IPO का सबसे ज्यादा फायदा एंकर निवेशकों ने उठाया है। IPO से रिटेल निवेशकों को खास फायदा नहीं हुआ है। बाजार की तेजी में मुनाफावसूली की रणनीति रखें। मिडकैप में प्रॉफिट बुकिंग की रणनीति बेहतर काम करेगी।

उन्होंने आगे कहा कि इस समय इंजीनियरिंग में पावर और एक्सपोर्ट सेगमेंट में कमाई के मौके हैं। इन सेगमेंट में क्वालिटी शेयरों पर फोकस करें। नॉन-फेरस मेटल की थीम भी बेहतर है। NBFCs में गोल्ड लोन कंपनियां बेहतर लग रही हैं।

फार्मा शेयरों पर बात करते हुए उन्होंने आगे कहा कि CDMO शेयर लंबी अवधि के नजरिए से अच्छे लग रहे हैं। इनमें एंट्री पर ध्यान दें। इसके अलावा इंडिया का होटल सेक्टर अच्छा कर सकता है। न्यू ऐज शेयर भी लंबी अवधि के लिहाज से अच्छे लग रहे हैं। आईटी शेयरों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि IT काफी ओवरसोल्ड है। इस सेक्टर को रुपए की गिरावट से फायदा होगा। फिर भी IT सेक्टर में अभी दम नहीं नजर आ रहा है। उनका यह भी मानना है कि स्टारलिंक से टेलीकॉम की तस्वीर बदलती नजर आएगी।

 

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LTCG और STT पर FM सीतारमण का बड़ा इशारा! अगर कटौती हुई तो आपको कितना हो सकता है फायदा?

शेयर बाजार के निवेशकों और ट्रेडर्स के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आ सकती है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) को लेकर चर्चा करने और विभिन्न पक्षकारों के सुझाव सुनने की बात कही है। वित्त मंत्री के इस रुख के बाद बाजार के जानकारों और निवेशकों के बीच यह कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों या आगामी बजट में इन दोनों टैक्स दरों में कटौती या कुछ ढील देखने को मिल सकती है।

वर्तमान में कितना है यह टैक्स?

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स(LTCG): 23 जुलाई 2024 के बजट संशोधनों के बाद, भारतीय शेयर बाजार में 1 साल से अधिक समय तक शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फंड रखने पर मिलने वाले लाभ पर 12.5% की दर से LTCG टैक्स लगता है। इसमें सालाना ₹1.25 लाख तक की छूट मिलती है यानी ₹1.25 लाख से ऊपर के प्रॉफिट पर ही 12.5% टैक्स देना होता है।

सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स(STT): STT शेयर बाजार में प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री पर लगने वाला एक प्रत्यक्ष कर है। शेयर डिलीवरी सेगमेंट में खरीद और बिक्री दोनों पर 0.1% एसटीटी लगता है, जबकि फ्यूचर्स में बिक्री पर 0.02% और ऑप्शंस प्रीमियम की बिक्री पर 0.1% लागू है।

वित्त मंत्री ने क्या कहा?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट किया कि भारतीय निवेशक और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) दोनों ही LTCG टैक्स को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर करते रहे हैं।

वित्त मंत्री ने कहा, कई मंत्रियों और हितधारकों ने यह मुद्दा भी उठाया है कि LTCG और STT दोनों टैक्स एक साथ चल रहे हैं, और भारत को इनमें से किसी एक को ही प्रमुखता से लागू करना चाहिए या दोनों में सामंजस्य बिठाना चाहिए। इसलिए इस विषय पर चर्चा होना स्वस्थ परंपरा है और मैं सभी पक्षों की राय ध्यान से सुनूंगी।’

कटौती की संभावना कितनी है?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बजट 2027 की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। चूंकि 2026 में अब तक FIIs की ओर से भारतीय बाजार से 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की रिकॉर्ड बिकवाली देखी गई है, ऐसे में विदेशी और घरेलू निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार LTCG की एग्जेम्पशन लिमिट ₹1.25 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख करना या STT की दरों में आंशिक कटौती पर गंभीरता से विचार कर सकती है।

अगर टैक्स घटता है, तो किसको और कितना फायदा होगा?

अगर सरकार LTCG टैक्स रेट घटाती है या STT का दोहरा बोझ कम करती है, तो इसके ये बड़े फायदे होंगे:

रिटेल निवेशकों की जेब में अधिक मुनाफा: लॉन्ग टर्म टैक्स घटने या छूट की सीमा बढ़ने से आम निवेशक जो लंबे समय के लिए SIP या शेयरों में निवेश करते हैं, उन्हें अपनी कमाई पर कम टैक्स देना होगा।

विदेशी निवेशकों (FPIs) की वापसी: ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा के बीच विदेशी फंड्स भारत में दोबारा भारी निवेश शुरू कर सकते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार को नई मजबूती मिलेगी।

ट्रेडर्स के लिए ट्रांजैक्शन कॉस्ट में कमी: अगर STT में कटौती की जाती है, तो रोजाना ट्रेडिंग करने वाले रिटेल व इंस्टीट्यूशनल ट्रेडर्स की लागत घटेगी और बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी।

दोहरे टैक्स के दबाव से मुक्ति: वर्तमान में निवेशक को शेयर बेचने पर STT भी देना पड़ता है और साल के अंत में मुनाफे पर LTCG भी। यदि दोनों में से किसी एक को तार्किक बनाया जाता है, तो टैक्स सिस्टम अधिक पारदर्शी और आसान होगा।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया

इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका की मध्यस्थता के जरिए सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सामने रखा। हालांकि, सऊदी क्राउन प्रिंस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उन्हें डर है कि इजराइली सेना की भागीदारी से सऊदी अरब में जनता की नाराजगी बढ़ सकती है। लेकिन इजराइल आखिर इस सैन्य अभियान में जुड़ना क्यों चाहता है… दरअसल इसकी मुख्य रूप से 3 वजहें हैं… 1. इजराइल सऊदी के साथ संबंध मजबूत करना चाहता है सऊदी अरब यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान चला रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजराइल को उम्मीद थी कि सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग से दोनों अमेरिकी सहयोगियों के संबंध मजबूत होंगे। इजराइल को यह भी उम्मीद थी कि इससे भविष्य में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध सामान्य करने का समझौता भी हो सकता है। 2. इजराइल ईरान समर्थित हूतियों को कमजोर करना चाहता है ईरान और हूती विद्रोहियों के बीच लंबे समय से संबंध हैं। सऊदी अरब और अमेरिका का आरोप है कि ईरान हूतियों को हथियार, ट्रेनिंग और तकनीकी मदद देता है। इससे हूती ड्रोन और मिसाइलों से हमले करने में सक्षम हुए हैं। इस ही वजह से हूती इजराइल और क्षेत्र के कई देशों के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा बन चुके हैं। हूतियों ने क्षेत्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों को प्रभावित करने वाले हमले किए हैं। उन्होंने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच इजराइल को भी निशाना बनाया है। इसलिए इजराइल इस सैन्य अभियान में शामिल होकर हूतियों को कमजोर करना चाहता है। 3. इजराइल सऊदी के साथ सैन्य तालमेल भी बढ़ा सकता है हूतियों की गतिविधियों से सऊदी अरब को भी खतरा रहा है। सऊदी अरब लंबे समय से अपनी दक्षिणी सीमा के पास हूतियों को सुरक्षा चुनौती मानता है। इजराइल सऊदी की मदद कर क्षेत्र की एक बड़ी अरब शक्ति के साथ सैन्य तालमेल भी बढ़ सकता है। हालांकि, इससे रियाद के सामने राजनीतिक जोखिम भी हैं। सऊदी अरब से जुड़े सैन्य अभियानों में इजराइली सेना की भागीदारी पर देश के अंदर और पूरे अरब जगत में विरोध हो सकता है। यह विरोध खास तौर पर तब बढ़ सकता है, जब फिलिस्तीनी मुद्दा अब भी हल नहीं हुआ है। सऊदी और इजराइल के बीच फिलिस्तीन को लेकर मतभेद सऊदी अरब और इजराइल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। हालांकि दोनों ईरान के खिलाफ एक ही रुख अपनाते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प भी कई बार सऊदी से इजराइल के साथ संबंध बनाने की अपील कर चुके है। इसके लिए अमेरिका ने अब्राहम समझौता भी सामने रखा है। अब्राहम समझौते के तहत इजराइल ने 2020 में कई अरब देशों के साथ संबंध सामान्य किए थे। सऊदी अरब का कहना है कि इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने का फैसला फिलिस्तीनी मुद्दे पर प्रगति से जुड़ा होना चाहिए। इसमें एक फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना भी शामिल है। लेकिन नेतन्याहू फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का विरोध करते रहे हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई ————————- यह खबर भी पढ़ें… सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा: अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर; अब तेल-गैस की कमाई में हिस्सा मांग रहे विद्रोही सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। पूरी खबर पढ़ें…

इंतजार की नसीहत, पर कीमत किसे चुकानी?

मजूदूर, नौजवान, वोट अधिकार के लिए लडता व्यक्ति तीनों नागरिक हैं। तीनों व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं। मगर व्यवस्था के पास समय ही समय है। वह विचार करती रह सकती है, फाइल चला सकती है, समिति बना सकती है, जांच बैठा सकती है। तब तक नागरिक के हाथ से अवसर निकल चुका होता है। एक तरफ प्रक्रिया पर अधिकार रखने वाली सत्ता है। दूसरी तरफ इंतजार की कीमत चुकाता नागरिक।… सड़क सत्ता को सुनने के लिए मजबूर कर सकती है। मगर सुनना, मानना और लागू करना तीन अलग-अलग बातें हैं।

जिस मजदूर की मजदूरी रोक दी गई है, उसे मस्टर रोल चाहिए। जिस नौजवान की परीक्षा रद्द हो गई है, उसे न्याय चाहिए, वह भी इससे पहले कि उसकी जिंदगी का एक और साल बर्बाद हो जाए। जिस मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है, उसे मतदान से पहले अपना नाम वापस चाहिए। जाहिर है 2014, 2019 और 2024 चुनाव हो जाने के बाद मिला आश्वासन फिर उसके किस काम का?

तीनों नागरिक हैं। तीनों व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं। मगर व्यवस्था के पास समय ही समय है। वह विचार करती रह सकती है, फाइल चला सकती है, समिति बना सकती है, जांच बैठा सकती है। तब तक नागरिक के हाथ से अवसर निकल चुका होता है। एक तरफ प्रक्रिया पर अधिकार रखने वाली सत्ता है। दूसरी तरफ इंतजार की कीमत चुकाता नागरिक।

नागरिक का समय घंटों में खर्च होता है। पढ़ाई के घंटे, कमाई के घंटे, परिवार की जिम्मेदारियों के घंटे। जबकि संस्थाओं का समय वर्षों में चलता है। उनके बजट सालाना हैं, नियुक्तियां वर्षों की हैं और जवाबदेही की कोई निश्चित घड़ी नहीं है। समय की यह असमानता ही सत्ता का ऐसा अवरोध है जिसे खड़ा करने के लिए पुलिस को बैरिकेड लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

सत्ता और नागरिक के बीच शिकायत की राजनीति का यह सबसे पुराना सच है। दिल्ली के जंतर मंतर पर 10 अक्टूबर की लामबंदी ने इसी सच को फिर सामने ला दिया है। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रही है। इससे पहले इसी संगठन के आंदोलन के बाद एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। सरकार से समझौता भी हुआ था। मगर उस समझौते की शर्तें कितनी पूरी हुईं, यह सवाल अभी समाप्त नहीं हुआ है।

अब सवाल है कि इस नए आंदोलन की सफलता किससे मापी जाएगी? जंतर मंतर पर कितनी भीड़ जुटी, कितने नारे लगे, किसने इस्तीफा दिया? या इससे कि भीड़ के घर लौट जाने के बाद नागरिकों को वास्तव में क्या अधिकार मिले और उनके इस्तेमाल की क्या गारंटी बनी?

यहीं लोकतंत्र की एक पुरानी पहेली सामने आती है।

फ्रांसीसी विचारक एलेक्सिस द तोकविल ने अपने जीवन के अंतिम सक्रिय वर्षों में फ्रांसीसी क्रांति के इसी विरोधाभास को समझने की कोशिश की थी। जिस क्रांति ने पुरानी राजसत्ता को ध्वस्त करने का संकल्प लिया, उसने उसी सत्ता की प्रशासनिक मशीनरी को क्यों बचाए रखा? कई मामलों में तो उसे और मजबूत क्यों बनाया?

राजा चला गया। मगर राजा के प्रशासन की आदतें नहीं गईं। नए शासकों को नागरिकों पर शासन करने की बनी-बनाई मशीन मिली। वह सुविधाजनक थी। इसलिए उन्होंने उसे बनाए रखा। शासन बदलते हैं, मगर शासन करने का ढंग आसानी से नहीं बदलता। सरकारें मौसम की तरह आती-जाती हैं। प्रशासन जलवायु की तरह बना रहता है।

लोग उस सत्ता के खिलाफ उठ खड़े होते हैं जिसका चेहरा उन्हें दिखाई देता है। मगर जिस व्यवस्था का चेहरा नहीं होता, वह अक्सर आंदोलन के बाद भी बची रहती है। सड़क पर आंदोलन किसी व्यक्ति के खिलाफ खड़ा होता है। मंत्री, मुख्य न्यायाधीश, चुनाव आयुक्त या प्रधानमंत्री। मगर संस्था अपनी प्रक्रियाओं के सहारे चलती है। प्रक्रिया का कोई चेहरा नहीं होता जिससे इस्तीफा मांगा जा सके।

एक इस्तीफा कुछ सप्ताह या महीनों में हासिल हो सकता है। लेकिन उस अधिकारी के जाने के बाद उसका उत्तराधिकारी भी उसी तरह काम करेगा या नहीं, यह तय करने वाली चीजें दूसरी हैं। सरकारी अनुबंध, रिकॉर्ड, रजिस्टर, अभिरक्षा के दस्तावेज, अपील की व्यवस्था और जवाबदेही के नियम।

इन्हें बदलने में साल लग सकते हैं। और इस काम को आगे बढ़ाने वाले लोग अक्सर वे होते हैं जिनका नाम कभी अखबारों की सुर्खियों में नहीं आता। तोकविल को लोकतंत्र में एक और खतरा दिखाई देता था। बराबरी का अधिकार पा चुके नागरिक अपने निजी जीवन में इतने व्यस्त हो सकते हैं कि सार्वजनिक मामलों की जिम्मेदारी धीरे-धीरे एक विशाल, सुविधाजनक और अभिभावक जैसी सत्ता को सौंप दें। वह सत्ता नागरिकों को सार्वजनिक जीवन की परेशानियों से मुक्त करने का दावा करती है। बदले में नागरिकों को उसके फैसलों पर निर्भर रहना पड़ता है। तोकविल के लिए लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान में नहीं थी। वह नागरिकों की आदतों में थी। खासकर मिलकर संगठन बनाने, हिसाब रखने, सार्वजनिक मामलों में भाग लेने और एक-दूसरे से जवाब मांगने की आदत में।

आज की युवा पीढ़ी रातोंरात लाखों लोगों को एक मंच पर जुटा सकती है। उसने लोकतंत्र का आधा सबक सीख लिया है। बाकी आधा सबक कहीं अधिक कठिन है। वह है आंदोलन के बाद भी संगठित रहना। सरकार के वादों का हिसाब रखना। कानून के मसौदे पढ़ना। संस्थाओं को जवाब देने के लिए बाध्य करना। और ऐसा तंत्र बनाना जिसमें नागरिक को अपने अधिकार के लिए हर बार सड़क पर उतरना न पड़े।

क्या यह संभव है?

भारत के अपने इतिहास में इसके दो उदाहरण हैं। दोनों आंदोलनों ने लंबा संघर्ष किया। दोनों ने सरकारों को अपनी मांग सुनने के लिए मजबूर किया। मगर दोनों के परिणाम एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रहे। पहला उदाहरण राजस्थान का है।

राजस्थान के गांवों में मजदूरों को संदेह था कि उनके नाम पर सरकारी धन निकाला जा रहा है, जबकि उन्हें पूरी मजदूरी नहीं मिल रही। उन्हें जानना था कि सरकारी रिकॉर्ड में किसके नाम कितनी मजदूरी दर्ज है, किस काम पर कितना खर्च हुआ और पैसा किसे मिला। मजदूर किसान शक्ति संगठन, यानी एमकेएसएस, ने मस्टर रोल, बिल और भुगतान के वाउचर सार्वजनिक करने की मांग उठाई।

फिर जनसुनवाई का तरीका अपनाया गया। सरकारी कागजों में दर्ज हिसाब गांववालों के सामने पढ़ा जाता। लोग बताते कि वास्तव में किसने काम किया था, कितना काम हुआ था और किसे मजदूरी मिली थी। एक तरफ सरकारी रिकॉर्ड था। दूसरी तरफ गांववालों का अपना अनुभव।

कागज पहली बार प्रशासन की शक्ति के बजाय नागरिक के हाथ में सबूत बनने लगा। यही उस आंदोलन की असली उपलब्धि थी। मजदूर केवल मजदूरी नहीं मांग रहा था। वह सरकार के अपने रिकॉर्ड के आधार पर सरकार को गलत साबित करने का अधिकार मांग रहा था।

अप्रैल 1995 में राजस्थान के मुख्यमंत्री ने स्थानीय विकास कार्यों के रिकॉर्ड तक पहुंच देने की घोषणा की। मगर घोषणा और अधिकार में फर्क था। एक साल बाद मजदूर किसान शक्ति संगठन ने सरकार पर वादा तोड़ने का आरोप लगाते हुए ब्यावर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। धरना लगभग चालीस दिन चला।

मई में आंदोलन जयपुर पहुंचा तो सरकार ने एक समिति बना दी। दो महीने में निर्णय का आश्वासन भी दिया। समिति बन गई। मांग स्वीकार कर ली गई। मगर अधिकार फिर भी सुनिश्चित नहीं हुआ।

सरकारी समिति आखिर क्या है? इंतजार कराने का एक ऐसा कमरा जिसके दरवाजे पर पीतल की नामपट्टी लगी होती है। राजस्थान का आंदोलन इस कमरे में बंद होकर समाप्त हो सकता था। मगर ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि आंदोलन ने सड़क से आगे जाने का रास्ता खोज लिया था।

ब्यावर के धरने से सूचना के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान का विस्तार हुआ। स्थानीय मजदूरों की लड़ाई कानून बनाने की राष्ट्रीय लड़ाई से जुड़ गई। 1996 के अंत तक इस अभियान और न्यायमूर्ति पी. बी. सावंत की अध्यक्षता वाली भारतीय प्रेस परिषद ने सूचना के अधिकार का एक आदर्श विधेयक तैयार कर लिया था।

दिसंबर 2002 में संसद ने सूचना की स्वतंत्रता का कानून पारित किया। मगर उसे लागू ही नहीं किया गया। फिर जुलाई 2004 में राष्ट्रीय अभियान ने नवगठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सामने अपनी सिफारिशें रखीं। लंबी बहस चली। इस पर विवाद हुआ कि नागरिक वास्तव में कौन से दस्तावेज मांग सकेंगे, अधिकारी किस आधार पर जानकारी रोक सकेंगे और सूचना न देने पर क्या कार्रवाई होगी।

आखिर 15 जून 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। ध्यान देने की बात है कि ब्यावर के मूल आंदोलनकारियों को इस पूरे समय सड़क पर बैठे रहने की जरूरत नहीं पड़ी। उनकी मांग अब एक ऐसी प्रक्रिया में बदल चुकी थी जिसे देश का कोई भी नागरिक इस्तेमाल कर सकता था।

कानून ने सूचना मांगने, इनकार के खिलाफ अपील करने और दोषी सूचना अधिकारियों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था दी। केंद्रीय सूचना आयोग के अनुसार अपील में सूचना देने से इनकार का औचित्य साबित करने की जिम्मेदारी अधिकारी की होती है और आयोग के निर्णय बाध्यकारी होते हैं। यानी नागरिक को ऐसा अधिकार मिला जिसे इस्तेमाल करने के लिए हर बार भीड़ जुटाने की जरूरत नहीं थी।

किसी आंदोलन की स्थायी सफलता इसी क्षण शुरू होती है। जब उसकी मांग एक ऐसी व्यवस्था बन जाए जिसका लाभ वे लोग भी उठा सकें जिन्होंने आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया। मगर यह सफलता भी पूरी नहीं थी।

सूचना का अधिकार कानून के बीस वर्ष पूरे होने के समय जारी 2024-25 की रिपोर्ट में बताया गया कि देशभर के सूचना आयोगों में लगभग 4.3 लाख अपीलें और शिकायतें लंबित थीं। केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त का पद खाली था और केवल दो आयुक्त काम कर रहे थे।

अधिकार बीस वर्ष तक बचा रहा। मगर समय पर न्याय मिलने की गारंटी आज भी सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित नहीं हो सकी। यानी कानून बन जाने के बाद भी लड़ाई समाप्त नहीं होती। अब दूसरा उदाहरण देखिए।

मणिपुर की इरोम शर्मिला ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम, यानी अफस्पा, के खिलाफ वर्ष 2000 में अनशन शुरू किया। उनका अनशन अगस्त 2016 तक चला। लगभग सोलह वर्ष। उनका आंदोलन अकेला नहीं था। मणिपुर में 2004 के विरोध प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार ने न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में समिति बनाई। समिति ने 2005 में अफस्पा को समाप्त करने की सिफारिश की। उसका सुझाव था कि कुछ आवश्यक प्रावधान गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम में शामिल किए जा सकते हैं।

समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। 2008 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने दर्ज किया कि सरकार ने उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई नहीं की थी। 2013 में पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि सेना इस कानून में किसी भी संशोधन का बहुत कड़ा विरोध कर रही थी। इस कारण सरकार के लिए आगे बढ़ना कठिन था।

एक विश्लेषक के अनुसार समिति की रिपोर्ट आने के बाद पूर्वोत्तर में आंदोलन की तीव्रता भी कम हुई। जब इरोम शर्मिला ने अपना अनशन समाप्त किया, तब भी उनकी मूल मांग पूरी नहीं हुई थी।

यह राजस्थान के सूचना अधिकार आंदोलन जैसी परिस्थितियों वाला संघर्ष नहीं था। यहां सवाल राज्य की सुरक्षा शक्तियों का था। उस संस्था का था जिसके अधिकार स्वयं विवाद का विषय थे और जो उन्हें छोड़ना नहीं चाहती थी। आंदोलन सरकार को सुनने के लिए मजबूर कर सकता था। समिति बनवा सकता था। अपने पक्ष में सरकारी सिफारिश भी हासिल कर सकता था।

मगर कानून नहीं बदलवा सका। यानी लगातार संघर्ष अपने आप सफलता की गारंटी नहीं है। आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक व्यवस्था में रास्ता भी होना चाहिए। जहां निर्णायक संस्थाएं परिवर्तन रोकने पर अड़ी हों, वहां केवल नैतिक शक्ति और जनसमर्थन पर्याप्त नहीं होते।

राजस्थान में मजदूरों ने सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंच हासिल की। मणिपुर में सोलह वर्ष का अनशन भी कानून को नहीं बदल सका। दोनों अनुभव लोकतंत्र की एक कठिन सच्चाई बताते हैं।

सड़क सत्ता को सुनने के लिए मजबूर कर सकती है। मगर सुनना, मानना और लागू करना तीन अलग-अलग बातें हैं।

अब फिर जंतर मंतर पर लौटिए। कॉकरोच जनता पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रही है। मगर पिछले चार वर्षों में भारत के तीन पड़ोसी देशों में सड़कों ने इससे कहीं अधिक हासिल किया है। एक देश में राष्ट्रपति को भागना पड़ा। दूसरे में प्रधानमंत्री की सत्ता समाप्त हुई। तीसरे में सरकार एक दिन के भीतर गिर गई।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल। तीनों देशों में जनता ने सत्ता के शिखर को हिला दिया।

मगर असली सवाल वही है। जिस दिन शासक चला जाता है, उस दिन आंदोलन को वास्तव में क्या हासिल होता है? क्या शासन बदलता है? क्या शासन करने का तरीका बदलता है? क्या प्रशासन बदलता है? क्या नागरिक के अधिकार बदलते हैं? या केवल सत्ता की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बदल जाता है?

राजस्थान और मणिपुर के अनुभवों के बाद दक्षिण एशिया के इन तीन आंदोलनों को समझना इसलिए जरूरी है।क्योंकि सत्ता गिरा देना और सत्ता को जवाबदेह बना देना एक ही बात नहीं है। (जारी)

Stock Market Live Update: GIFT निफ्टी से कमजोर शुरुआत के संकेत, वॉल स्ट्रीट में गिरावट, एशियाई बाजारों में तेजी

Stock Market Live Update: 14 अक्टूबर को GIFT निफ्टी ने सुस्त शुरुआत का संकेत दिया है, जिससे भारतीय शेयर बाजार के गिरावट के साथ खुलने की संभावना है। इस बीच, मंगलवार को एशियाई बाजारों में गिरावट देखी गई, जबकि महंगाई के अहम आंकड़ों से पहले अमेरिकी स्टॉक फ्यूचर्स मिले-जुले रुख के साथ बंद हुए। GIFT निफ्टी 22,765 के स्तर के आसपास कारोबार कर रहा था, जो निफ्टी फ्यूचर्स की पिछली क्लोजिंग से लगभग 85 अंक नीचे है; इससे भारतीय शेयर बाजार के इंडेक्स के लिए नकारात्मक शुरुआत का संकेत मिलता है।

Q2 नतीजों के सीज़न के पहले मुख्य हफ़्ते में कंपनियों की कमाई पर सबकी नज़र है; नतीजे घोषित करने के बाद जिन स्टॉक्स पर फोकस है, उनमें Hero Motors, ICICI Pru, Trans and Rectifiers, Tata Elxsi और अन्य शामिल हैं।

अन्य कंपनियां जो अपने नतीजे घोषित करने वाली हैं, उनमें Bajaj Consumer, BHEL, Tata Tech और Leela Hotels वगैरह शामिल हैं।

Hero Motors Q2 Results: आईपीओ के बाद पहला रिजल्ट, मुनाफा 115% बढ़ा; रेवेन्यू में भी उछाल

Hero Motors Q2 Results: ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली Hero Motors का दूसरी तिमाही में मुनाफा दोगुने से ज्यादा बढ़ गया। कंपनी ने मंगलवार, 13 अक्टूबर को नतीजे जारी किए। यह पिछले महीने लिस्टिंग के बाद कंपनी का पहला रिजल्ट है। जुलाई-सितंबर तिमाही में कंपनी को ₹10.2 करोड़ का नेट प्रॉफिट हुआ। पिछले साल इसी तिमाही में यह ₹4.73 करोड़ था। यानी मुनाफे में करीब 115% की बढ़ोतरी हुई।

कंपनी का रेवेन्यू भी 24.9% बढ़कर ₹319.3 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में यह ₹255.7 करोड़ था। वहीं, EBITDA 92% बढ़कर ₹35.9 करोड़ पहुंच गया। एक साल पहले यह ₹18.7 करोड़ था। EBITDA मार्जिन में भी सुधार हुआ। यह पिछले साल के 7.3% से बढ़कर 11.3% हो गया। यानी कंपनी की कमाई का मार्जिन बेहतर हुआ है।

ब्रिटेन की कंपनी में हिस्सेदारी बढ़ाएगी

Hero Motors अपनी सब्सिडियरी कंपनी Hewland Engineering में हिस्सेदारी बढ़ाने जा रही है। कंपनी इसके मौजूदा शेयरधारकों William Hewland और Siobhan Hewland से 39% अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदेगी। इस सौदे पर करीब 6 लाख पाउंड खर्च होंगे।

इस खरीद के बाद Hewland Engineering में Hero Motors की हिस्सेदारी 51% से बढ़कर 90% हो जाएगी। सौदे के तहत £1 की कीमत वाले 8,039 शेयर खरीदे जाएंगे। कंपनी को उम्मीद है कि यह सौदा करीब छह महीने में पूरा हो जाएगा। इसके लिए किसी सरकारी या नियामकीय मंजूरी की जरूरत नहीं है।

क्या काम करती है Hewland Engineering?

Hewland Engineering ब्रिटेन की कंपनी है। इसकी शुरुआत 29 मई 1957 को हुई थी। यह हाई-परफॉर्मेंस गाड़ियों के ट्रांसमिशन और ड्राइवट्रेन से जुड़े पार्ट्स बनाती है। कंपनी मोटरस्पोर्ट, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और एयरोस्पेस सेक्टर के लिए भी काम करती है। इसके अलावा, यह ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से इंजीनियरिंग समाधान तैयार करती है और रिसर्च पर भी पैसा खर्च करती है।

Hero Motors का कारोबार

Hero Motors ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए पावरट्रेन से जुड़े प्रोडक्ट बनाती है। कंपनी इनकी डिजाइनिंग से लेकर मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई तक का काम करती है। इसका कारोबार भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप और आसियान क्षेत्र में भी फैला है।

कंपनी दोपहिया गाड़ियों, इलेक्ट्रिक साइकिल, ऑफ-रोड गाड़ियों, इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड कारों के लिए प्रोडक्ट बनाती है। भारी गाड़ियों के लिए भी इसके पास सॉल्यूशंस हैं। BMW, Ducati, Enviolo, Formula Motorsport, Hummingbird EV और HWA जैसी कंपनियां इसकी ग्राहक हैं।

Hero Motors का शेयर मंगलवार को NSE पर 0.82% गिरावट के साथ ₹154.44 पर बंद हुआ। हालांकि, स्टॉक अभी भी अपने आईपीओ प्राइस से करीब 56.95% ऊपर है।

Q2 Results: ट्रांसफॉर्मर्स बनाने वाली कंपनी का मुनाफा 135% बढ़ा, रेवेन्यू में 61% का उछाल

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

12 लाख का पैकेज, फिर भी वीकेंड पर चलाते हैं रैपिडो! कमाई जान हो जाएंगे हैरान

Viral Post: अगर आप हर महीने एक लाख से ज्यादा कमाते हो और फिर वीकेंड पर आप अपने एंटरटेरमेंट के लिए रैपिडो चलाए…सुनने में ये आपको थोड़ा अजीब लगेगा पर पुणे से एक ऐसी ही कहानी सामने आई है। पुणे में रहने वाले एक सॉफ्टवेयर डेवलपर ने सोशल मीडिया पर अपने दो रूममेट्स से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा शेयर किया है। उसने बताया कि उसके दोनों रूममेट सालाना 12 लाख रुपये से ज्यादा कमाते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने वीकेंड पर रैपिडो बाइक टैक्सी चलाने का फैसला किया है।

खास बात ये है कि वे ऐसा पैसे कमाने की जरूरत के लिए नहीं, बल्कि अपने खाली समय में कुछ नया करने और शौक के लिए कर रहे हैं। उनके इस फैसले ने सोशल मीडिया पर एक अलग बहस छेड़ दी है।

सोशल मीडिया पर किया पोस्ट

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए सॉफ्टवेयर डेवलपर ने लिखा कि उसके दो रूममेट हैं, जो हर साल 12 लाख रुपये से ज्यादा कमाते हैं। इसके बावजूद, पिछले सप्ताहांत दोनों ने रैपिडो बाइक टैक्सी चलाने के लिए पजिस्ट्रेशन कराया और सिर्फ शौक के लिए कुछ यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया। दोनों के पास स्पोर्ट्स बाइक हैं। इस दौरान एक ने 900 रुपये कमाए, जबकि दूसरे की कमाई 500 रुपये रही। डेवलपर ने मजाकिया अंदाज में कहा कि जब कोई महीने में एक लाख रुपये कमाता हो और फिर भी ऐसा करे, तो समझिए कि लड़के अपने शौक के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

 

900-500 रुपए कमाए

पोस्ट के मुताबिक, दोनों रूममेट के पास स्पोर्ट्स बाइक हैं और रैपिडो चलाकर एक ने 900 रुपये, जबकि दूसरे ने 500 रुपये कमाए। इस घटना से पता चलता है कि कुछ लोग सिर्फ पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि नए अनुभव हासिल करने और मनोरंजन के लिए भी अलग-अलग काम करना पसंद करते हैं। दोनों इंजीनियरों के लिए वीकेंड पर बाइक टैक्सी चलाना भी कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। उनका यह कदम अतिरिक्त कमाई से ज्यादा कुछ नया आजमाने और खाली समय को मजेदार बनाने की कोशिश नजर आता है।

यूजर्स ने किया कमेंट

इस पोस्ट के सामने आने के बाद से ही सोशल मीडिया पर लोगों के बीच इसकी खूब चर्चा हो रही है। पुरुषों की दोस्ती, अचानक बनाए गए प्लान और सिर्फ मजे के लिए कुछ अलग करने के उनके अंदाज ने लोगों का ध्यान खींचा है। यह किस्सा दिखाता है कि कई बार दोस्त मिलकर ऐसे काम भी कर जाते हैं, जिनका मकसद कमाई नहीं, बल्कि साथ में अच्छा समय बिताना और नई चीजों का अनुभव लेना होता है। वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा, “मैंने भी नए लोगों से मिलने और उनसे जान-पहचान बढ़ाने के लिए ऐसा करने के बारे में सोचा था।”

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