Hanuman Ansh Box Office Collection Day 70: ‘हनुमान अंश’ ने बॉक्स ऑफिस पर मचाया धमाल, 70वें दिन कमाए इतने करोड़ रुपये

Hanuman Ansh Box Office Collection Day 70: विशाल चतुर्वेदी की ‘हनुमान अंश’ ने सिनेमाघरों में अपने 70वें दिन भारत में 65 लाख रुपये की नेट कमाई की। सैकनिल्क (Sacnilk) के अनुसार गुरुवार 15 अक्टूबर को इस फिल्म के हिंदी और तेलुगु वर्जन के कुल 1,672 शो हुए। भारत में इसकी कुल नेट कमाई 338.98 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है, जबकि घरेलू ग्रॉस कलेक्शन 400.03 करोड़ रुपये है।

‘हनुमान अंश’ ने 70वें शो से ₹0.01 करोड़ की नेट कमाई की है। इसके साथ ही, भारत में अब तक का कुल ग्रॉस कलेक्शन ₹400.05 करोड़ और कुल नेट कलेक्शन ₹338.99 करोड़ हो गया है, जबकि भारत का फाइनल कलेक्शन आना अभी बाकी है।

साप्ताहिक प्रदर्शन की बात करें तो पांचवें हफ्ते में फिल्म ने 90.25 करोड़ रुपये की शानदार कमाई की थी। छठे हफ्ते में 80.25 करोड़, सातवें में 44.80 करोड़ और आठवें हफ्ते में 29.20 करोड़ रुपये जुटाए। नौवें हफ्ते का कलेक्शन 10.60 करोड़ रुपये रहा।

क्या है ‘हनुमान अंश’ की कहानी?

विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक ऐसे दुखी बच्चे की कहानी पेश करती है, जो अपनी मां को खोने के बाद उन्हें दोबारा पाने के लिए ईश्वर की तलाश में निकल पड़ता है। उसकी यही खोज धीरे-धीरे उसे दूसरों की मदद करने और जरूरतमंदों की सेवा करने के रास्ते पर ले जाती है।

फिल्म में लक्ष्मण नारायण शर्मा के जीवन को दर्शाया गया है, जिन्हें आगे चलकर नीम करोली बाबा के नाम से पहचान मिली। कहानी उनके बचपन, 13 साल की उम्र में घर छोड़ने और हनुमान जी के प्रति उनकी भक्ति की यात्रा को दिखाती है। फिल्म में शोभिनव सत्य, विहान शेडगे और चंदन आनंद अहम भूमिकाओं में नजर आते हैं।

आंदोलन की जीत के बाद नागरिक हार क्यों जाता है?

उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा? कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

भारत में परीक्षा सुधार का कानून इसी विरोधाभास का एक उदाहरण है। सरकार कानून बनाती है। सजा बढ़ाती है। समयसीमा तय करती है। घोषणा होती है कि अब परीक्षा में धांधली करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। मगर जिस नौजवान की परीक्षा रद्द हुई है, उसके जीवन का एक वर्ष कौन लौटाएगा?

2024 में सार्वजनिक परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बना। यह 21 जून 2024 से लागू हुआ। इसमें दोषियों के लिए तीन से पांच वर्ष तक की कैद का प्रावधान था। मगर मई 2026 में नीट परीक्षा कथित प्रश्नपत्र लीक के बाद रद्द करनी पड़ी। परीक्षा दोबारा आयोजित हुई।

इसके बाद कानून में संशोधन किया गया। 31 जुलाई को मंजूरी मिले संशोधनों में सजा बढ़ाकर पांच से दस वर्ष कर दी गई। जांच पूरी करने के लिए दो महीने की समयसीमा भी तय हुई। मगर पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने एक महत्वपूर्ण कमी बताई। यदि दो महीने में जांच पूरी नहीं होती तो क्या होगा, इसका कानून में कोई अतिरिक्त प्रावधान नहीं है।

यानी समयसीमा है, मगर उसे तोड़ने का परिणाम तय नहीं है।

अब उस छात्र की स्थिति सोचिए जिसकी परीक्षा रद्द हुई। उसका भविष्य अधर में है। वह अगली परीक्षा की तैयारी करे या अदालत के फैसले का इंतजार? उसके परिवार ने कोचिंग पर जो पैसा खर्च किया, उसका क्या होगा? एक वर्ष की पढ़ाई, मेहनत और अवसर का हिसाब कौन देगा?

कानून कहता है कि दोषी को पांच से दस वर्ष की सजा होगी। मगर दोषी कब पकड़ा जाएगा? मुकदमा कब पूरा होगा? और तब तक छात्र को क्या राहत मिलेगी?

इन प्रश्नों का उत्तर सजा बढ़ाने से नहीं मिलता। 28 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि राधाकृष्णन समिति की 46 प्रमुख सिफारिशों में से 35 लागू की जा चुकी हैं। विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जा रही हैं। नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक मामले के लिए एक विशेष अदालत पहले ही निर्धारित हो चुकी थी। मगर 27 जुलाई को उसकी पहली सुनवाई स्थगित करनी पड़ी।

क्यों?

क्योंकि सीबीआई की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। एक तरफ सरकार की घोषणा कि 46 में से 35 सिफारिशें लागू हो चुकी हैं। दूसरी तरफ विशेष अदालत की पहली सुनवाई में ही जांच एजेंसी अनुपस्थित।

यही घोषणा और क्रियान्वयन के बीच का अंतर है।

सरकार कानून बनाकर बता सकती है कि उसने क्या किया। मगर नागरिक जानना चाहता है कि उस कानून से उसके जीवन में क्या बदला। सजा बढ़ाना सरकार का फैसला है। समय पर न्याय दिलाना सरकार की जिम्मेदारी। दोनों को एक समझ लेना ही लोकतांत्रिक जवाबदेही की सबसे बड़ी भूलों में एक है। इस पूरे मामले में समय और सार्वजनिक ध्यान की अपनी राजनीति है।

इस्तीफा एक घटना है। नया कानून एक घटना है। सजा बढ़ाना एक घटना है। ये सब तत्काल दिखाई देते हैं। इनकी तारीख होती है, घोषणा होती है और खबर बनती है।

मगर कानून का लागू होना एक प्रक्रिया है। वह अलग-अलग दफ्तरों, अदालतों, जांच एजेंसियों और अधिकारियों के बीच महीनों तक चलती है।

घटना का श्रेय किसी एक मंत्री या सरकार को मिल सकता है। प्रक्रिया की जिम्मेदारी अनेक अधिकारियों में बंट जाती है। मीडिया के लिए भी घटना आसान है। मंत्री ने इस्तीफा दिया, खबर बन गई। सरकार ने मांग स्वीकार की, खबर बन गई। अदालत ने आदेश दिया, खबर बन गई।

उसके बाद मीडिया दूसरे मुद्दे की ओर बढ़ जाता है। पाठक और दर्शक भी मान लेते हैं कि मामला समाप्त हो गया। जबकि नागरिक के लिए असली काम तब शुरू होता है।

मुआवजे का आदेश हुआ, मगर पैसा कब मिला? मुकदमा दर्ज हुआ, मगर जांच कब पूरी हुई? परीक्षा सुधार की घोषणा हुई, मगर अगली परीक्षा में क्या बदला? मतदाता सूची में सुधार का आश्वासन मिला, मगर मतदान से पहले कितने नाम वापस जुड़े?

इन प्रश्नों पर लगातार निगरानी रखने वाला कौन है? हर नई विफलता को एक नया घोटाला या नया विवाद मान लिया जाता है। उसे पहले किए गए वादे की अधूरी जिम्मेदारी से नहीं जोड़ा जाता। इस तरह सरकार बार-बार जवाब देने का दावा कर सकती है, जबकि उसके पुराने जवाबों का परिणाम सामने नहीं आया होता।

जॉर्ज ऑरवेल ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज’ में राजनीतिक भाषा की इसी प्रवृत्ति की आलोचना की थी। उनके अनुसार राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल अक्सर ऐसी चीजों को ठोस और वास्तविक दिखाने के लिए होता है जिनमें वास्तविकता बहुत कम होती है।

ऑरवेल की यह कसौटी आज भी उपयोगी है।

सरकारी घोषणाएं हमेशा झूठी नहीं होतीं। मंत्री और अधिकारी अपने आश्वासनों के प्रति ईमानदार भी हो सकते हैं। मगर ईमानदार आश्वासन भी तब तक नागरिक के लिए उपयोगी नहीं है जब तक उसे जांचा और लागू न कराया जा सके। सीजेपी की मुआवजे की मांग स्वीकार करते समय संबंधित मंत्री ने परिवारों को लागू नियमों के अंतर्गत अधिकतम संभव सहायता देने का वादा किया था। शब्दों पर गौर कीजिए।

अधिकतम। संभव। लागू नियमों के अंतर्गत।

हर शब्द उचित लग सकता है। मगर इन्हें जोड़ने पर भी यह पता नहीं चलता कि किस परिवार को कितनी रकम मिलेगी, किस तारीख तक मिलेगी और किस अधिकारी की जिम्मेदारी होगी। इसी तरह सरकारी भाषा में कुछ शब्द बार-बार आते हैं। प्रक्रिया शुरू हो गई है। योजना लागू है। मामला विचाराधीन है। सिफारिशें स्वीकार कर ली गई हैं। कार्यान्वयन जारी है।

इनका वास्तविक अर्थ क्या है?

नागरिक किस दफ्तर में जाकर जांच कर सकता है कि काम हुआ या नहीं? किस रजिस्टर में जिम्मेदार अधिकारी का नाम दर्ज है? किस समयसीमा को पार करने पर कार्रवाई होगी?

अदालत बना देना पर्याप्त नहीं है। उसमें न्यायाधीश भी होना चाहिए। सुनवाई होनी चाहिए। फैसला होना चाहिए।

कानून में समयसीमा लिख देना पर्याप्त नहीं है। उसे तोड़ने पर परिणाम भी होना चाहिए।

और अधिकार घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। नागरिक को उसका इस्तेमाल करने का व्यावहारिक रास्ता भी मिलना चाहिए।

इसी बिंदु पर फिर जंतर मंतर और कॉकरोच जनता पार्टी की कहानी सामने आती है।

इस पार्टी की शुरुआत एक मजाक से हुई थी। 15 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी फर्जी डिग्रियों वाले लोगों के संदर्भ में थी।

मगर टिप्पणी ने बेरोजगार युवाओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। अगले दिन पूर्व राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत दीपके ने इसी अपमानजनक शब्द को अपनाकर कॉकरोच जनता पार्टी बना दी।

कुछ ही दिनों में संगठन ने लाखों लोगों के जुड़ने का दावा किया। जिस शब्द से अपमान का बोध हुआ था, वही विरोध की पहचान बन गया। ऑरवेल ने अपने एक अन्य निबंध ‘फनी, बट नॉट वल्गर’ में लिखा था कि हर मजाक एक छोटी क्रांति होता है।

इस अर्थ में कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत दिलचस्प थी। सत्ता और प्रतिष्ठान की भाषा में जो शब्द तिरस्कार का प्रतीक था, युवाओं ने उसी को अपने संगठन का नाम बना लिया।

यह सत्ता के प्रति सम्मान दिखाने की अनिवार्यता को अस्वीकार करने का तरीका था।

ऐसा व्यंग्य लोगों को तेजी से जोड़ सकता है। वह अपमान को सामूहिक प्रतिरोध में बदल सकता है। मगर मजाक और आंदोलन की सीमाएं अलग हैं।

मजाक माचिस की तीली है। वह एक क्षण में अंधेरा दूर कर सकती है। मगर तीली बुझ जाने के बाद रोशनी बनाए रखने के लिए स्थायी व्यवस्था चाहिए।

सीजेपी के सामने भी यही चुनौती है। संगठन ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी बनाई है। अगस्त से उसकी राष्ट्रीय टीम भी काम कर रही है। अभिजीत दीपके राष्ट्रीय संयोजक हैं।अब तक संगठन की कार्यशैली में कुछ महत्वपूर्ण बातें दिखाई देती हैं।

वह सरकार के वादों की निगरानी करता है। समयसीमा तय करता है। जरूरत पड़ने पर फिर आंदोलन की चेतावनी देता है। सर्वोच्च न्यायालय में मामले उठाता है। 12 अगस्त को संगठन की संरचना और आगे की कार्ययोजना पर विचार करने के लिए स्वयंसेवकों की बैठक बुलाई गई थी। मगर दो स्थानों से बैठक हटानी पड़ी। दीपके ने आरोप लगाया कि इसके पीछे सत्तारूढ़ पार्टी का दबाव था।

यह घटनाक्रम बताता है कि सड़क पर भीड़ जुटा लेना और उस भीड़ को स्थायी संगठन में बदलना अलग-अलग काम हैं। किसी आंदोलन के सामने सफलता के बाद कई रास्ते होते हैं।

वह राजनीतिक पार्टी बनकर चुनाव लड़ सकता है, जैसा नेपाल में आंदोलन की ऊर्जा चुनावी राजनीति में पहुंची।

वह सूचना अधिकार आंदोलन की तरह स्थायी नागरिक अभियान बना सकता है। वह अदालतों, जनसुनवाई और सरकारी फैसलों की लगातार निगरानी करने वाला संगठन बन सकता है। या फिर कुछ दिनों की सुर्खियों और भीड़ के बाद समाप्त हो सकता है।

आखिरी रास्ता सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक है।

समय बीतने के साथ आंदोलनकारी अपने जीवन में लौट जाते हैं। छात्र पढ़ाई में लग जाते हैं। मजदूर काम पर लौट जाते हैं। परिवार अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाते हैं।

सरकार वहीं रहती है। दफ्तर वहीं रहते हैं। फाइलें चलती रहती हैं। और आंदोलन का दबाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

सीजेपी ने अब तक दबाव, निगरानी और न्यायालय का रास्ता चुना है। मगर वह अभी ऐसी स्थायी प्रक्रिया नहीं बना सकी है जिसका उपयोग उससे असंबद्ध कोई भी नागरिक अपने अधिकार के लिए कर सके। सूचना अधिकार आंदोलन की सबसे बड़ी सीख यही है।

केवल समर्थक जुटाना पर्याप्त नहीं है। सबूत संभालने होंगे। मांगों को स्पष्ट करना होगा। कानून के प्रस्तावित प्रावधानों की जांच करनी होगी। सरकारी निर्णयों का लगातार पीछा करना होगा।

और एक प्रश्न का उत्तर भी देना होगा। आंदोलन की ओर से फैसला कौन करेगा? 25 जुलाई को सीजेपी का समझौता उसके संस्थापक और दो प्रवक्ताओं ने किया था। संगठन से लाखों लोगों के जुड़ने का दावा था। मगर उन लाखों लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को औपचारिक रूप से नहीं चुना था।

समझौता हुआ और उसी दोपहर आंदोलन समाप्त कर दिया गया। यह अपने आप में कोई आरोप नहीं है। हर आंदोलन में किसी को बातचीत करनी होती है। किसी को सरकार का प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। किसी को समझौते पर सहमति देनी होती है।

मगर प्रश्न यह है कि उसे यह अधिकार किसने दिया और उसकी सीमा क्या है?

अगली बार जब सरकार कोई समझौता पेश करेगी तो संगठन की ओर से कौन निर्णय करेगा? किन मांगों पर समझौता किया जा सकता है? किन मांगों पर नहीं? और यदि आंदोलनकारी अपने प्रतिनिधियों के फैसले से असहमत हों तो क्या व्यवस्था होगी?

सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर होना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का प्रमाण नहीं है।

सड़क पर हजारों लोगों का मौजूद होना भी अपने आप में संगठन के नेतृत्व को हर निर्णय का अधिकार नहीं देता।

किसी भीड़ को राजनीतिक समुदाय बनने के लिए असहमति व्यक्त करने का अधिकार और उसका व्यावहारिक तरीका चाहिए।

यही संगठन और भीड़ का अंतर है। इसका एक दूसरा पहलू भी है। आंदोलन में लंबे समय तक कौन रह सकता है? अखिल भारतीय छात्र संघ की अध्यक्ष नेहा बोरा ने जंतर मंतर पर 23 दिन का अनशन किया।

मगर हर छात्र ऐसा नहीं कर सकता।

किसी को परीक्षा देनी है। किसी को नौकरी तलाशनी है। किसी को परिवार चलाना है। किसी की रोज की कमाई बंद हो जाएगी। किसी के घर में उसकी देखभाल पर निर्भर लोग हैं।

इसलिए आंदोलन में लंबे समय तक उपस्थित रहने की क्षमता भी सबकी बराबर नहीं होती।

जो लगातार धरने पर रह सकते हैं, संगठन के निर्णयों में उनका प्रभाव बढ़ सकता है। मगर जो घर लौटने के लिए मजबूर हैं, उनकी जरूरतें और राय भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

लोकतांत्रिक आंदोलन को यह असमानता समझनी होगी।

आंदोलन की असली परीक्षा उसके समझौते से लाभ पाने वाले नागरिक के जीवन में होती है।

मान लीजिए किसी छात्र की परीक्षा रद्द हुई है। उसे यह जानने से क्या राहत मिलेगी कि प्रश्नपत्र लीक करने वालों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है और पांच वर्ष बाद उन्हें सजा हो सकती है?

उसकी जरूरत तत्काल है। उसे अगली परीक्षा की तारीख चाहिए। दोबारा परीक्षा देने की फीस और खर्च के बारे में स्पष्ट निर्णय चाहिए। विवादित परिणाम के खिलाफ अपील का अधिकार चाहिए। और ऐसा प्रशासनिक तंत्र चाहिए जो उसके आवेदन पर समय रहते फैसला कर सके।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को ये व्यवस्थाएं सार्वजनिक करनी चाहिए।

मंत्रालय को इनके लिए धन उपलब्ध कराना चाहिए।

परीक्षा रद्द होने की पूरी कीमत छात्र और उसके परिवार पर नहीं डाली जा सकती। इसी तरह प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए केवल महंगी तकनीक खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। पहले यह पता चलना चाहिए कि प्रश्नपत्र तक अनधिकृत पहुंच कहां से मिली। निगरानी कहां विफल हुई। किस अधिकारी या ठेकेदार की जिम्मेदारी थी।

प्रश्नपत्रों के हस्तांतरण का रिकॉर्ड होना चाहिए। संवेदनशील सामग्री तक किसकी पहुंच थी, इसका हिसाब होना चाहिए। अनुबंधों में जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। और जांच करने वाली संस्था को संबंधित सबूतों तक पहुंच मिलनी चाहिए।

यह तकनीक से अधिक प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। संसाधन कहां खर्च किए जाएं, किसे अधिकार मिले और गलती होने पर किसे जवाब देना पड़े, यही असली फैसले हैं।

अब मतदाता का उदाहरण लीजिए। जिस नागरिक का नाम मतदाता सूची से कट गया है, उसके लिए समयसीमा मतदान का दिन है। यदि चुनाव हो जाने के बाद उसका नाम वापस जुड़ता है तो वह अधिकार किस काम का?

उसे यह जानने का अधिकार चाहिए कि नाम क्यों काटा गया। किस आधार पर काटा गया। किस अधिकारी ने निर्णय लिया। उसे व्यक्तिगत रूप से सहायता मिलनी चाहिए। आपत्ति दर्ज कराने की सुलभ व्यवस्था होनी चाहिए। और विवादित मामलों के निपटारे के लिए पर्याप्त कर्मचारी होने चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि फैसला मतदान से पहले हो। मौजूदा अपील व्यवस्था को इसी कसौटी पर परखना चाहिए। क्या वह चुनाव से पहले गलती सुधार सकती है?

यदि नहीं, तो किसी अतिरिक्त समीक्षा व्यवस्था के लिए कानूनी अधिकार, पर्याप्त धन और फैसलों को लागू कराने की क्षमता सुनिश्चित करनी होगी। क्योंकि मतदान के बाद मिला अनुकूल फैसला नागरिक को उसका खोया हुआ वोट वापस नहीं दिला सकता।

यहां फिर तोकविल की बात याद आती है। उनके अनुसार स्वतंत्र समाज की रक्षा केवल संविधान के शब्द नहीं करते। नागरिकों की आदतें करती हैं। बैठक का विवरण रखना। सरकारी रिकॉर्ड पढ़ना। फैसलों का हिसाब मांगना। एक ही दफ्तर में दूसरी और तीसरी बार जाना। अपने अधिकार के लिए दूसरों के साथ संगठित रहना।

ये काम आकर्षक नहीं हैं। इनमें आंदोलन की उत्तेजना नहीं है। नारे नहीं हैं। मंच नहीं हैं। तत्काल प्रसिद्धि नहीं है। मगर लोकतंत्र की वास्तविक जवाबदेही इन्हीं कामों से बनती है।

भारत जैसे विशाल युवा आबादी वाले लोकतंत्र में खतरा केवल दमन का नहीं है।

एक दूसरा, कहीं अधिक सूक्ष्म खतरा भी है। युवाओं की आवाज बहुत जोर से सुनी जाए, मगर उनके सवालों का जवाब बहुत धीरे दिया जाए। वे यह मान बैठें कि सरकार ने उनकी बात सुन ली, इसलिए उनकी मांग पूरी हो गई।

जबकि सुन लेना और समाधान करना एक ही बात नहीं है। सड़क पर आंदोलन खतरे की घंटी बजा सकता है। मगर जवाबदेही की स्थायी व्यवस्था सड़क पर लगातार भीड़ जुटाकर नहीं चलाई जा सकती। उसके लिए संस्थाओं के भीतर ऐसे नियम और प्रक्रियाएं चाहिए जो बिना आंदोलन के भी काम करें।

राजस्थान की जनसुनवाइयों में मजदूर सरकारी कागज पर दर्ज मजदूरी का हिसाब अपने वास्तविक काम से मिलाते थे। कागज कहता था कि भुगतान हो गया। मजदूर कहता था कि पैसा नहीं मिला।

इस टकराव से एक सिद्धांत निकला था। सरकारी रिकॉर्ड नागरिक की पहुंच में होना चाहिए ताकि वह सरकार के दावे को चुनौती दे सके। आज वही सिद्धांत परीक्षा और मतदाता सूची के मामलों में लागू होना चाहिए।

छात्र परीक्षा का फैसला चुनौती दे सके। उसे कारण बताया जाए। अपील का रास्ता मिले। और फैसला उस समय आए जब उसका भविष्य बचाया जा सकता हो। मतदाता अपना नाम कटने का कारण जान सके। आपत्ति दर्ज करा सके। और चुनाव से पहले गलती सुधरवा सके।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है।

नागरिक को केवल अधिकार दिया गया है या उस अधिकार को समय रहते इस्तेमाल करने की शक्ति भी दी गई है? क्योंकि अधिकार का अर्थ केवल सरकार की स्वीकृति नहीं है। अधिकार का अर्थ है कि नागरिक सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए बाध्य कर सके।

और वह भी तब, जब उस जिम्मेदारी का निर्वाह उसके लिए उपयोगी हो। राजस्थान के मजदूरों ने यही रास्ता खोला था। आज के छात्रों और मतदाताओं के सामने भी मूल प्रश्न वही है। क्या वे सरकारी फैसले का कारण जान सकते हैं? क्या वे उस फैसले को चुनौती दे सकते हैं? क्या वे सरकार को उसकी कानूनी जिम्मेदारी याद दिलाकर समय पर राहत हासिल कर सकते हैं?

यदि इसका उत्तर सुनिश्चित नहीं है तो आंदोलन समाप्त हो जाने से कुछ साबित नहीं होता।

जंतर मंतर खाली हो सकता है। प्रदर्शनकारी घर लौट सकते हैं। सरकार घोषणा कर सकती है कि मांगें मान ली गई हैं।

मगर जिस नागरिक की परीक्षा रद्द हुई, जिसकी मजदूरी रुकी है या जिसका वोट कट गया है, उसके लिए आंदोलन की सफलता का फैसला अभी बाकी है। सड़क खाली हो जाने का अर्थ यह नहीं कि काम पूरा हो गया। (समाप्त)

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यूरोप में युवाओं पर बुजुर्ग भारी पड़ रहे:पेंशन पर सरकारी खजाना खर्च; Gen Z नौकरी-घर और अच्छी शिक्षा मांग रहे

पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Q2 Results: घाटे से ₹19 करोड़ के मुनाफे में लौटी सोलर कंपनी, ऑर्डर बुक ₹12000 करोड़ के पार

Q2 Results: सोलर एनर्जी से जुड़ी कंपनी Sterling and Wilson Renewable Energy (SWREL) के लिए सितंबर तिमाही अच्छी रही। कंपनी घाटे से निकलकर मुनाफे में आ गई। जुलाई-सितंबर तिमाही में कंपनी ने 19.2 करोड़ रुपये का नेट प्रॉफिट कमाया। पिछले साल इसी तिमाही में उसे 473.2 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

हालांकि, कंपनी का रेवेन्यू घट गया। सितंबर तिमाही में यह 12.6% गिरकर 1,527.5 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल इसी दौरान कंपनी का रेवेन्यू 1,748.6 करोड़ रुपये था।

ऑपरेटिंग मुनाफे में सुधार

कंपनी के कारोबार से होने वाली कमाई में सुधार दिखा। सितंबर तिमाही में EBITDA बढ़कर 56 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में यह सिर्फ 4 करोड़ रुपये था। EBITDA मार्जिन भी 0.2% से बढ़कर 3.7% हो गया।

वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में कंपनी ने 70 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। पिछले साल इसी अवधि में उसे 439 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

ऑर्डर बुक 12,480 करोड़ रुपये पहुंची

SWREL के पास फिलहाल 12,480 करोड़ रुपये के ऐसे ऑर्डर हैं, जिन पर काम पूरा होना बाकी है। इससे आने वाले समय में कमाई की उम्मीद का अंदाजा मिलता है।

कंपनी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में उसकी ऑर्डर बुक सालाना आधार पर 34% बढ़ी है।

985 करोड़ रुपये से ज्यादा के नए ऑर्डर

Sterling and Wilson को हाल ही में भारत और विदेशों में 985 करोड़ रुपये से ज्यादा के नए ऑर्डर मिले हैं। इनमें राजस्थान में 534.3 मेगावाट-पीक क्षमता का सोलर प्रोजेक्ट शामिल है।

इसके अलावा, दक्षिण अफ्रीका में बैटरी स्टोरेज के दो प्रोजेक्ट मिले हैं। इनकी कुल क्षमता 616 मेगावाट-घंटे है। कंपनी को मिस्र में वेस्ट मिन्या सोलर पावर प्रोजेक्ट भी मिला है। इसे कंपनी ने Hassan Allam Construction के साथ जॉइंट वेंचर के जरिए हासिल किया है।

शेयर 3% से ज्यादा चढ़ा

गुरुवार को NSE पर Sterling and Wilson का शेयर 3.06% बढ़कर 177 रुपये पर बंद हुआ। पिछले 1 साल में स्टॉक 27.31% गिरा है। कंपनी का मार्केट कैप 4.09 हजार करोड़ रुपये है।

IRFC Q2 Results: सरकारी रेल कंपनी को ₹1958 करोड़ का मुनाफा, अब तक के सबसे बड़े डिविडेंड का ऐलान

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

IIFL Finance Q2 Results: NBFC कंपनी का मुनाफा 103% बढ़ा, फोकस में रहेगा स्टॉक

IIFL Finance Q2 Results: NBFC कंपनी IIFL Finance ने वित्त वर्ष 2027 की सितंबर तिमाही में शानदार नतीजे पेश किए हैं। कंपनी का नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 103.7% बढ़कर 766.4 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी ने 376.3 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था।

कंपनी की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) भी 50.2% बढ़कर 2,161 करोड़ रुपये पहुंच गई। ये वो कमाई है, जो कर्ज पर मिलने वाले ब्याज और उधार पर चुकाए जाने वाले ब्याज के अंतर से होती है। कंपनी का कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) सालाना आधार पर 38% बढ़कर 1.24 लाख करोड़ रुपये हो गया।

गोल्ड लोन कारोबार में 90% की ग्रोथ

IIFL Finance की ग्रोथ में गोल्ड लोन कारोबार की बड़ी भूमिका रही। इस सेगमेंट का AUM सालाना आधार पर 90% बढ़कर 65,729 करोड़ रुपये हो गया। पिछली तिमाही के मुकाबले इसमें 13% की बढ़ोतरी हुई। गोल्ड लोन में ग्रॉस NPA 0.90% रहा।

होम लोन का AUM पिछली तिमाही के मुकाबले 4% बढ़कर 43,070 करोड़ रुपये पहुंच गया। इस सेगमेंट में ग्रॉस NPA घटकर 1.38% रह गया। वहीं, छोटे कारोबारियों को दिए जाने वाले सिक्योर्ड MSME लोन का AUM 11% बढ़कर 11,948 करोड़ रुपये हो गया। कंपनी बिना गारंटी वाले लोन में अपना जोखिम घटा रही है।

बैड लोन की स्थिति में सुधार

सितंबर तिमाही में IIFL Finance का ग्रॉस NPA 1.5% रहा। यह पिछली तिमाही से 0.07 प्रतिशत अंक कम है। हालांकि, नेट NPA 0.05 प्रतिशत अंक बढ़कर 0.9% हो गया। कंपनी का प्रोविजन कवरेज रेशियो 91% रहा। मतलब कंपनी ने खराब कर्ज से होने वाले संभावित नुकसान के लिए पर्याप्त रकम अलग रखी है।

कंपनी की वित्तीय स्थिति भी मजबूत बनी हुई है। इसका कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो 23.5% और लिक्विडिटी 13,805 करोड़ रुपये रही। वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में कंपनी का रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) 20.1% रहा।

AI के इस्तेमाल पर जोर

IIFL Finance लोन की जांच, कलेक्शन और ग्राहकों से बातचीत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल बढ़ा रही है। कंपनी के मुताबिक, प्रॉपर्टी के बदले छोटे और मझोले कारोबारियों को दिए जाने वाले लोन के 85% से ज्यादा आवेदनों के क्रेडिट असेसमेंट में AI का इस्तेमाल हो रहा है।

कंपनी ने गोल्ड लोन ब्रांचों में भी AI बेस्ड फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम लगाया है। यह सिस्टम अब तक सोने के गहनों की 11 लाख से ज्यादा तस्वीरों का एनालिसिस कर चुका है। कंपनी बैंकिंग पार्टनरशिप बढ़ाकर भी अपना कारोबार मजबूत करना चाहती है।

शेयर में हल्की तेजी

IIFL Finance का शेयर 15 अक्टूबर को NSE पर 0.53% बढ़कर 598 रुपये पर बंद हुआ। आगे कंपनी का फोकस सिक्योर्ड लोन बढ़ाने, खराब कर्ज पर नियंत्रण रखने और बैंकों के साथ साझेदारी मजबूत करने पर रहेगा।

कंपनी इक्विटी के जरिए नया फंड जुटाने की योजना पर भी काम कर रही है। इसके लिए जुलाई 2026 में शेयरधारकों से जरूरी मंजूरी मिल चुकी है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Stock Market Outlook: ‘शेयर बाजार में निवेश का सही मौका’, राजेश कोठारी ने कहा- 3 साल में मिल सकता है तगड़ा रिटर्न

Stock Market Outlook: AlfAccurate Advisors के मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश कोठारी का मानना है कि भारतीय शेयर बाजार अगले 3 से 5 साल में अच्छा रिटर्न दे सकता है। इसके पीछे कंपनियों की कमाई में सुधार, अर्थव्यवस्था की मजबूती और शेयरों की वाजिब वैल्यूएशन जैसे कारण हैं।

CNBC-TV18 को दिए इंटरव्यू में कोठारी ने कहा कि अब इक्विटी में निवेश बढ़ाने का समय है। निवेशकों को लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप, तीनों तरह के शेयरों में मौके तलाशने चाहिए। पिछले दो साल में बाजार से खास रिटर्न नहीं मिला है। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों का प्रदर्शन भी कमजोर रहा है।

अर्थव्यवस्था की मजबूती पर भरोसा

कोठारी के मुताबिक, महंगे कच्चे तेल और ऊंची ब्याज दरों की चिंताओं के बावजूद भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत है। नॉन-फूड क्रेडिट ग्रोथ 17-18%, इंडस्ट्रियल क्रेडिट ग्रोथ 20% और पर्सनल लोन में 16% की बढ़ोतरी इसका संकेत है। उनके मुताबिक, इंडस्ट्रियल क्रेडिट ग्रोथ 2011 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंची है।

खपत, सरकार का कैपिटल एक्सपेंडिचर और निर्यात में सुधार भी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं। कंपनियों की कमाई में भी सुधार दिख रहा है। साथ ही, बाजार की वैल्यूएशन अपने 10 साल के औसत P/E रेशियो से नीचे है।

FII की बिकवाली हर कंपनी के लिए खतरे का संकेत नहीं

कोठारी ने कहा कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली को सिर्फ भारत से उनकी नाराजगी के तौर पर नहीं देखना चाहिए। निवेशकों को नेट खरीद-बिक्री के बजाय कुल खरीद और बिक्री पर भी नजर डालनी चाहिए।

उनके मुताबिक, विदेशी निवेशक उन कंपनियों से पैसा निकाल रहे हैं, जो उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाईं। इसलिए बिकवाली का कारण कई बार देश के बजाय किसी खास कंपनी का कमजोर प्रदर्शन होता है।

इन सेक्टरों में दिख रहे हैं मौके

कोठारी को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS), एयरोस्पेस, कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग (CDMO) और ऑटो एंसिलरी कंपनियों में संभावनाएं दिख रही हैं। EMS सेक्टर को सरकार की PLI स्कीम और भारतीय कंपनियों की बढ़ती उत्पादन क्षमता से मदद मिल रही है।

बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज भी उनकी पसंद में शामिल हैं। मजबूत क्रेडिट ग्रोथ, बेहतर एसेट क्वालिटी और नियंत्रित क्रेडिट लागत से इस सेक्टर को फायदा मिल सकता है। उन्हें स्पेशियलिटी केमिकल्स, कंज्यूमर डिस्क्रेशनरी और ट्रैवल, मीडिया व डिजिटल एडवर्टाइजिंग प्लेटफॉर्म कारोबार में भी अवसर दिखते हैं।

हर शेयर में तेजी की उम्मीद न करें

कोठारी ने स्टॉक चुनते समय सावधानी बरतने की सलाह दी। उनके मुताबिक, पिछले पांच साल में कोई भी लार्जकैप कंपनी हर साल 20% की ग्रोथ दर्ज नहीं कर पाई। मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों में भी करीब 8% ही लगातार इतनी ग्रोथ हासिल कर पाईं।

उन्होंने कहा कि कई प्लेटफॉर्म कंपनियां अब कर्ज-मुक्त हो चुकी हैं। इससे कारोबार को लंबे समय तक आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

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