अमेरिका अब रूस से डीजल खरीदेगा:ट्रम्प बोले- इस डील से दुनिया में तेल की कीमतें घटेंगी; सितंबर में रूस पर बैन का कानून बनाया

अमेरिका ने रूस से डीजल खरीदने के लिए समझौता किया है। ट्रम्प ने शुक्रवार को इसकी जानकारी देते हुए सोशल मीडिया पर कहा, होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिकी नियंत्रण और रूस से डीजल की सप्लाई बढ़ने से अमेरिका समेत दुनिया भर में डीजल की कीमतें तेजी से घटेंगी। उनके मुताबिक, समझौते के तहत रूस तुरंत 3 लाख टन से ज्यादा डीजल भेजेगा। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन डीजल भेजा जाएगा। खास बात यह है कि सितंबर में ही ट्रम्प ने रूस पर प्रतिबंधों वाले कानून पर साइन किया था। इसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर ट्रम्प 100% तक टैरिफ लगा सकते हैं। इसमें भारत और चीन जैसे देश शामिल है। ट्रम्प ने रूस पर प्रतिबंधों को अगले साल तक रोका ट्रम्प ने पुतिन के साथ फोन पर बातचीत के बाद वैश्विक बाजार में रूसी डीजल की बिक्री और आयात पर लगे प्रतिबंधों को 7 अप्रैल 2027 तक अस्थायी रूप से हटा दिया है। यह डील रूस पर अमेरिकी दबाव की नीति में बड़ा बदलाव है। रूस पर यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका कई साल से प्रतिबंध लगाता रहा है। उन्होंने कहा कि कम कीमतें, खासकर अमेरिकी किसानों, पशुपालकों और ट्रक चालकों के लिए, उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं। ट्रम्प ने शुक्रवार को व्हाइट हाउस से चुनावी रैली के लिए रवाना होते समय भी समझौते पर खुशी जताई। जेलेंस्की बोले- डील से रूस को युद्ध लंबा खींचने में मदद मिलेगी यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इस समझौते को कमजोर फैसला बताया। जेलेंस्की ने कहा कि रूस इस समझौते का बदले और आतंक और धोखा ही फैलाएगा। यह डील युद्ध को लंबा खींचने में रूस की मदद करेगा। जेलेंस्की ने कहा कि यह रूस के हित में है। इससे वह ज्यादा लोगों को मार सकेगा और दुनिया को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा। एक्सपर्ट- डील से कीमतों पर फर्क कम पड़ेगा ईरान युद्ध के कारण दुनियाभर में तेल की कीमतें बढ़ी हैं। हालांकि, शुक्रवार को ट्रम्प के ऐलान के बाद डीजल की कीमतों में गिरावट आई। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के ऊर्जा विशेषज्ञ क्लेटन सीगल ने कहा कि इस समझौते से कीमतों पर ज्यादा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। उन्होंने कहा कि इससे रूस और पुतिन को बड़ा फायदा होगा। वहीं, एनर्जी पॉलिसी रिसर्च फाउंडेशन के माइकल लिंच ने इस समझौते की तुलना डूबते जहाज से की। उन्होंने कहा कि अमेरिका रूस से डीजल खरीदेगा, तो रूस के मौजूदा ग्राहकों को इसकी कमी होगी। उन्हें दूसरे देशों से डीजल खरीदना पड़ेगा। ऐसे में कीमतें लगभग मौजूदा स्तर पर ही बनी रह सकती हैं। ईरान जंग खत्म कराने में रूस की मदद का ट्रम्प ने स्वागत किया रूसी राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन के मुताबिक, ट्रम्प ईरान जंग का समाधान निकालने की कोशिशों में रूस की भूमिका का स्वागत करते हैं। ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के साथ जंग खत्म होते ही तेल की कीमतें तेजी से गिरेंगी। उन्होंने शुक्रवार को न्यूयॉर्क के सिरैक्यूज में एक चुनावी रैली के दौरान यह बात कही। ट्रम्प ने दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट से आज युद्ध शुरू होने से पहले के मुकाबले ज्यादा तेल गुजर रहा है। उन्होंने तेल रिफाइनरियों और खुदरा विक्रेताओं से पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत कम करने को कहा। ट्रम्प ने एक बार फिर दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण है। अमेरिका का ईरान पर फिर बमबारी का प्लान तैयार अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने ईरान पर लगातार तीन दिन तक बड़े पैमाने पर बमबारी करने की योजना बनाई है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, इसके लिए अक्टूबर के आखिर तक पश्चिम एशिया में 20 हजार से ज्यादा नौसैनिक और मरीन सैनिक तैनात किए जाएंगे। साथ ही सैकड़ों लड़ाकू विमान और 3 विमानवाहक पोत भी भेजे जाएंगे। हालांकि, ट्रम्प अभी ईरान पर दोबारा हमला करने के लिए तैयार नहीं हैं। पिछले कुछ महीनों में वे ईरान और हूती विद्रोहियों पर बड़े हमले करने के 5 प्रस्ताव ठुकरा चुके हैं। नई योजना के तहत ईरान के मिसाइल और ड्रोन ठिकानों, बिजली बनाने वाले संयंत्रों और सैन्य मुख्यालयों पर हमले किए जाएंगे। ट्रम्प ने साफ किया है कि नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले हमला नहीं किया जाएगा। ——————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट पर प्रतिबंध लगाए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। पूरी खबर पढ़ें…

जंतर-मंतर पर ही क्यों होता है प्रदर्शन? कब और कैसे मिलती है प्रोटेस्ट की मंजूरी? नियमों के साथ जानिए कल का लेटेस्ट अपडेट

Delhi Jantar Mantar Protest Rules Explained: कल 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन होने वाला है। इस प्रदर्शन का ऐलान ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और देश के तमाम छात्र संगठनों ने किया है। यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आयोजित किया जा रहा है। इससे पहले दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर को ही इस प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। पुलिस ने अनुमति न देने के पीछे आवेदन देने में हुई देरी और पुराने प्रदर्शनों के दौरान नियमों के उल्लंघन की वजह बताई है।

अनुमति खारिज होने के बावजूद राजधानी में समर्थकों की भारी भीड़ जुटने की आशंका है। इसे देखते हुए प्रशासन ने पूरी दिल्ली में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। ऐसे में आइए आसान भाषा में समझते हैं कि जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने के क्या नियम हैं और पुलिस का इस पर क्या कहना है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की शुरुआत कैसे हुई?

1980 के दशक के उत्तरार्ध से पहले दिल्ली में इंडिया गेट के पास बॉट क्लब किसी भी प्रदर्शन का मुख्य ठिकाना हुआ करता था। उस समय किसानों के एक विशाल आंदोलन के कारण बॉट क्लब के आसपास का पूरा इलाका ठप हो गया था। इसके बाद सरकार को प्रदर्शन का स्थान बदलना पड़ा। साल 1993 में जंतर-मंतर को प्रदर्शनों के लिए नए स्थान के रूप में चुना गया। तब से लोग अपनी मांगें उठाने और सरकार से सवाल पूछने के लिए यहां जुटते आए हैं।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के क्या नियम हैं?

दिल्ली पुलिस के नए दिशानिर्देशों के अनुसार, प्रदर्शन की इजाजत के लिए कम से कम 10 दिन पहले डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP, नई दिल्ली जिला) को आवेदन देना होता है। जंतर-मंतर पर एक समय में अधिकतम 1,000 लोग ही प्रदर्शन में शामिल हो सकते हैं।

साथ ही आयोजकों को भीड़ प्रबंधन, सार्वजनिक सुरक्षा और शांति बनाए रखने की शर्तों का पालन करना अनिवार्य है। सेंट्रल विस्टा, इंडिया गेट और इसके आसपास के लॉन पूरी तरह प्रतिबंधित क्षेत्र हैं। यहां प्रदर्शन की अनुमति नहीं है।

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अगर 1,000 से ज्यादा लोग हों, तो कहां होगा प्रदर्शन?

अगर प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों की संख्या 1,000 से अधिक और 50,000 तक है, तो इसके लिए रामलीला मैदान तय किया गया है। भीड़ अगर 50,000 से भी अधिक होती है, तो प्रदर्शन केवल बुराड़ी के मैदान में ही आयोजित किया जा सकता है।

दिल्ली पुलिस ने अनुमति क्यों नहीं दी?

नई दिल्ली रेंज की जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस नूपुर प्रसाद ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थिति साफ की। उन्होंने बताया कि CJP ने प्रदर्शन के लिए 7 अक्टूबर को आवेदन किया था, जो कार्यक्रम से सिर्फ 3 दिन पहले मिला। नियमों के अनुसार आवेदन कम से कम 10 दिन पहले मिलना चाहिए था। इसके अलावा, संगठन द्वारा पिछले प्रदर्शनों में नियमों का उल्लंघन भी किया गया था। इसी कारण सुरक्षा और समय सीमा के नियमों के तहत इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई।

क्या है आज की स्थिति? ट्रेन और मेट्रो को लेकर ये आदेश जारी

10 अक्टूबर, शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन और सुरक्षा स्थिति को देखते हुए राजधानी में कड़े प्रशासनिक आदेश लागू किए गए हैं। रेलवे बोर्ड के आदेशानुसार, शनिवार सुबह 4 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली कई प्रमुख मेल, एक्सप्रेस व लोकल ट्रेनों को उनके शुरुआती स्टेशनों से ही रद्द कर दिया गया है।

दिल्ली पुलिस के निर्देश पर DMRC ने 9 अक्टूबर रात 9 बजे से राजीव चौक, कश्मीरी गेट, नई दिल्ली और केंद्रीय सचिवालय सहित करीब 57 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश व निकास गेट बंद रखने और ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी घटाने का फैसला किया है।

आदेश और अंतरात्मा के बीच खड़ी वर्दी !

सुधार किसी एक प्रदर्शन की जीत-हार से नहीं निकलेगा। बल प्रयोग की हर घटना की वीडियो, समय और आदेश-श्रृंखला सार्वजनिक होनी चाहिए। निषेधाज्ञा लिखित हो और बाद में आनुपातिकता की स्वतंत्र जाँच हो। चिह्नित स्थलों पर पूर्व सूचना और यातायात व्यवस्था को अनुमति के पूर्ण निषेध से अलग रखा जाए। प्रदर्शनकारियों के लिए भी सीमा साफ है।

लोकतंत्र केवल मतपेटी में बंद मतों का नाम नहीं है। वह उस सांस का भी नाम है, जिसमें नागरिक अपनी नाराजगी शांतिपूर्वक सड़क पर रख सके। भारत के संविधान ने यह सांस अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) में दी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बिना हथियार के शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार और सीमा भी उसी अनुच्छेद में है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) संप्रभुता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देते हैं। यहीं से पुलिस का कठिन कर्तव्य शुरू होता है। उसे न विरोध को कुचलना है, न अव्यवस्था को खुली छूट देनी है।

यह द्वंद्व किसी एक आंदोलन की संपत्ति नहीं है। परीक्षा-पत्र लीक से निकले युवा मार्च हों, किसान कानूनों के खिलाफ घेराव हो, नागरिकता कानून पर धरना हो, या चुनावी सूची और निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर उठे सवाल हों। हर बार सवाल एक ही लौटता है। राज्य विरोध को सुविधा दे रहा है, या केवल उसे नियंत्रित करने के नाम पर संकुचित कर रहा है। अक्टूबर 2026 का दिल्ली दृश्य इसी प्रश्न की ताजा तस्वीर है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर विपक्षी गठबंधन के सांसद जंतर-मंतर की ओर बढ़े, तो लुटियंस दिल्ली बैरिकेड, आरएएफ और केंद्रीय बलों की छावनी बन गई। बसें रोक दी गईं, रास्ते सील कर दिए गए। उसी बीच, पेपर लीक मुद्दे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन की औपचारिक सूचना संसद मार्ग थाने में दी। पिछली बार के धरने से सबक लेते हुए इस बार दिल्ली पुलिस ने अनुमति नामंजूर कर दी।

तर्क यह था कि निर्धारित स्थल पर भी बैठक या धरने के लिए आवेदन कम से कम दस दिन पहले देना होता है, और भीड़ के आकार के अनुसार स्थल जंतर-मंतर, रामलीला मैदान या बुराड़ी तय होते हैं। आयोजकों का जवाब सीधा था। जंतर-मंतर ऐतिहासिक और चिह्नित विरोध-स्थल है। पुलिस का काम सुरक्षा, व्यवस्था और यातायात है, अनुमति देकर नागरिक के अधिकार का फैसला करना नहीं।

कानून इस बहस में खाली नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की वे धाराएँ, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 से 132 थीं, कार्यपालक मजिस्ट्रेट या थाना प्रभारी को गैरकानूनी जमाव को तितर-बितर करने का आदेश देती हैं। बल तभी है जब आदेश न माना जाए, और तब भी जितना कम बल और जितनी कम क्षति हो, उतना ही। धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लगाई जा सकती है, पर सर्वोच्च न्यायालय अनुराधा भसीन मामले में कह चुका है कि ऐसा आदेश वास्तविक आपात पर टिका हो, तथ्यों को दर्ज करे और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरे।

हिम्मत लाल शाह (1973) में सार्वजनिक सड़कों पर बैठकों का पूर्ण निषेध नकारा गया। रामलीला मैदान (2012) में प्रक्रियात्मक सुरक्षा को औपचारिकता नहीं माना गया। अमित साहनी, यानी शाहीन बाग (2020), में शांतिपूर्ण विरोध को माना गया, पर सार्वजनिक मार्ग के अनिश्चितकालीन कब्जे को नहीं। मार्च 2025 में न्यायालय ने कहा कि पुलिस अनुच्छेद 12 के अर्थ में राज्य का अंग है, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा उसका संवैधानिक दायित्व है। जुलाई 2026 में, नीट व अन्य पेपर लीक पर ‘चलो संसद’ मार्च के बाद, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने मौखिक रूप से रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण विरोध गारंटीकृत है और केवल आंदोलन होने से लाठीचार्ज जायज नहीं हो जाता।

जुलाई का वह मार्च याद दिलाने लायक है, क्योंकि वहाँ बल की सीमा ही विवाद बनी। पुलिस का पक्ष था कि मार्च मना था, भीड़ ने बैरिकेड तोड़े और पथराव किया, बल अंतिम उपाय था और इस प्रदर्शन में सौ से अधिक सुरक्षाकर्मी घायल हुए। प्रदर्शनकारियों, अस्पताल रिकॉर्ड और बाद की रिपोर्टों ने लाठी, आँसू गैस और पेलेट गन के इस्तेमाल की बात कही। न्यायालय ने नाबालिगों की रिहाई के आदेश दिए और स्वतंत्र जाँच का पैनल बनाया। वहीं दिल्ली पुलिस ने अपने आचरण को कानूनी और पेशेवर बताया। दोनों बयान अब भी अधूरे हैं। यही अधूरापन हर बड़े प्रदर्शन के बाद दोहराया जाता है।

इसी ढाँचे में वर्दी की नैतिक स्थिति समझी जा सकती है। धरने प्रदर्शन का सामना कर रहा पुलिस का सिपाही अक्सर उसी वर्ग से आता है जिससे प्रदर्शनकारी। वह परीक्षा की अनियमितता, बेरोजगारी, फसल के दाम या मतदाता सूची के संदेह को व्यक्तिगत रूप से समझ सकता है। पर उसके साथ ही वह वर्दी में वह राजनीतिक कार्यपालिका के आदेश का सेवक है। संविधान की सातवीं अनुसूची में पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं। दिल्ली में यह नियंत्रण केन्द्र के गृह मंत्रालय से जुड़ा है। स्थानांतरण, पदोन्नति और विभागीय जाँच उसी सत्ता के हाथ में हैं, जिसकी नीतियों के खिलाफ भीड़ खड़ी होती है।

परिणाम यह होता है कि ‘न्यूनतम बल’ का सिद्धांत असल में मौके पर ‘आदेश का पालन’ में सिकुड़ जाता है। यह भी सच है कि जब भीड़ पथराव करती है, वाहन क्षतिग्रस्त करती है या सुरक्षाकर्मियों पर हमला होता है, तब संयम बरतने वाले अधिकारी को बाद में ढिलाई का आरोप झेलना पड़ता है। पुलिस न पूरी तरह दमन का औजार है, न भीड़ का स्वयंसेवक। वह बीच की संस्था है। उसकी निष्पक्षता तभी बचती है जब राजनीतिक आका ऐसा कोई आदेश दें, पर कानून सीमा बाँधे।

इसलिए सुधार किसी एक प्रदर्शन की जीत-हार से नहीं निकलेगा। बल प्रयोग की हर घटना की वीडियो, समय और आदेश-श्रृंखला सार्वजनिक होनी चाहिए। निषेधाज्ञा लिखित हो और बाद में आनुपातिकता की स्वतंत्र जाँच हो। चिह्नित स्थलों पर पूर्व सूचना और यातायात व्यवस्था को अनुमति के पूर्ण निषेध से अलग रखा जाए। प्रदर्शनकारियों के लिए भी सीमा साफ है। बिना हथियार, बिना मार्ग के अनंत कब्जे, और बिना हिंसा के। लोकतंत्र में पुलिस संविधान का अभिकर्ता है। जब वह राजनीतिक इच्छा और नागरिक के नैतिक दावे के बीच कानून को चुनती है, तभी विरोध सड़क की गरमी बना रहता है, राजधानी का घेरा नहीं।

अयोध्या आकर भी अखिलेश यादव का ‘राम लला’ से परहेज! क्या कहते हैं रामनगरी के प्रबुद्धजन

अयोध्या आकर भी अखिलेश यादव का 'राम लला' से परहेज! क्या कहते हैं रामनगरी के प्रबुद्धजन

Akhilesh Yadav ayodhya visit

Akhilesh Yadav Ayodhya Visit: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव गुरुवार को अयोध्या के कृष्णापुर खानपुर (रसूलाबाद) गांव पहुंचे। मौका था सपा सरकार में मंत्री रहे तेज नारायण पांडेय उर्फ ‘पवन पांडेय’ के आवास पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ का। इस अवसर पर उन्होंने मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चेतावनी भी दे डाली। 

 

​अखिलेश ने व्यास पीठ का पूजन किया, कथा व्यास डॉ. राघवाचार्य जी महाराज से आशीर्वाद लिया और संतों द्वारा भेंट की गई गदा स्वीकार की। हालांकि, राम नगरी की पावन धरती पर कदम रखने के बावजूद राम जन्मभूमि मंदिर न जाने और राम लला के दर्शन न करने को लेकर अयोध्या के प्रबुद्ध वर्ग और संतों में गहरी नाराजगी है।

अखिलेश की सीएम योगी को चुनौती

​2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए इस दौरे के गहरे राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद, पूर्व विधायक इंद्र प्रताप तिवारी ‘खब्बू’ समेत कई दिग्गज स्थानीय नेता मौजूद रहे। अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि विकास और एयरपोर्ट के नाम पर गरीबों व व्यापारियों को उजाड़ा गया है। उन्होंने वादा किया कि सपा सरकार बनने पर किसानों को सर्किल रेट का 6 गुना मुआवजा और 300 यूनिट मुफ्त बिजली दी जाएगी।

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सपा प्रमुख ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधा ललकारते हुए कहा कि वे स्वयं अयोध्या से चुनाव लड़कर दिखाएं। उन्होंने दावा किया कि भाजपा को अयोध्या से लड़ने के लिए कोई नया प्रत्याशी तक नहीं मिल रहा है। राम मंदिर में चढ़ावे और चंदे की चोरी के हालिया विवाद को लेकर भी उन्होंने सरकार को घेरा।

​मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पलटवार

​दूसरी ओर, सीएम योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि सपा प्रमुख को अयोध्या की चिंता करने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि सपा शासन के दौरान ही रामभक्तों पर गोलियां चलाई गई थीं और थानों-जेलों में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के आयोजनों पर रोक लगाई गई थी।

​राम सबके हैं, दूरी क्यों?

​अयोध्या आकर भी राम लला के दर्शन न करने पर स्थानीय नागरिकों, बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ​इक़बाल अंसारी (पूर्व पक्षकार, बाबरी मस्जिद) ने कहा कि अयोध्या धर्म की नगरी है और यहां से लोगों का अटूट विश्वास जुड़ा है। अखिलेश यादव को राम लला का दर्शन-पूजन जरूर करना चाहिए था, जिससे उन्हें ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ मिलता।

 

​प्रो. आशुतोष सिंह ने कहा कि जब अखिलेश जी ने ही राम मंदिर में चंदा चोरी का प्रकरण उठाया था, तो उन्हें मंदिर आकर देखना चाहिए था कि व्यवस्थाएं कैसी चल रही हैं। डॉ. वंदना जायसवाल ने कहा कि भगवान राम किसी एक व्यक्ति या दल के नहीं हैं, राम तो सबके हैं। अयोध्या आने पर उन्हें मंदिर जरूर जाना चाहिए था। डॉ. अविनाश तिवारी ने कहा कि राम मंदिर किसी सरकार का नहीं है। जनता का मान रखने के लिए उन्हें राम लला से दूरी नहीं बनानी चाहिए थी।

 

​डॉ. मनीष सिंह ने कहा कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उन्हें जनता की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए था और मंदिर जाकर व्यवस्थाओं का जायजा लेना चाहिए था। ​डॉ. आशीष प्रताप सिंह (अध्यक्ष, शिक्षक संघ) ने कहा कि राम मंदिर कोई राजनीतिक स्थान नहीं है। राम लला के दर्शन करने से उन्हें लाभ ही होता, यह बेहद दुखद है।

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डॉ. रमेश प्रताप सिंह ने कहा कि एक यदुवंशी होने के नाते उन्हें राम मंदिर जाना ही चाहिए था। दर्शन न करने से ऐसा प्रतीत होता है कि चंदा चोरी का मुद्दा उन्होंने सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए उठाया था। ​डॉ. समरेन्द्र बहादुर सिंह का कहना है कि सपा की छवि राम मंदिर आंदोलन में खलनायक जैसी रही है। निर्माण के बाद आए बदलावों को देखने के बजाय उन्होंने केवल कमियां ढूंढने और इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया। डॉ. कुमुद रंजन ने कहा कि अयोध्या जैसी पवित्र भूमि पर आकर भगवान राम के द्वार न जाना अनुचित है। इस राजनीतिक रवैये का असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ सकता है।

Shivraj Singh Chouhan के घर फिर गूंजी किलकारी, पोती इला के बाद पोते अहान के दादा बने केंद्रीय कृषि मंत्री

केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दूसरी बार दादा बन गए हैं। उनके छोटे बेटे कुणाल सिंह चौहान और बहू रिद्धि के घर एक बेटा हुआ है। नए जन्मे बच्चे का नाम अहान रखा गया है।

शिवराज सिंह चौहान ने सोशल मीडिया पर यह खुशखबरी शेयर की और परिवार में नए सदस्य के आने पर अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि अहान के आने से उनके घर में बहुत खुशी आई है और नए जन्मे बच्चे को भगवान का अनमोल आशीर्वाद बताया।

अहान के आने से चौहान परिवार में नई खुशी आई

शिवराज सिंह चौहान ने अपनी पोस्ट में कहा कि वह और उनकी पत्नी साधना एक बार फिर दादा-दादी बनने की खुशी में बहुत खुश हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे के आने से परिवार का घर खुशियों और प्यार से भर गया है। उन्होंने संदीप जैन और स्वाति जैन को नाना-नानी बनने पर बधाई दी। अहान कुणाल और रिद्धि का बेटा है, जबकि शिवराज सिंह चौहान के बड़े बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान और उनकी पत्नी अमानत अब बच्चे के चाचा और चाची हैं। नवजात शिशु शिवराज सिंह चौहान की पोती इला का चचेरा भाई भी है।

शिवराज सिंह चौहान ने जनवरी में पोती इला का स्वागत किया

शिवराज सिंह चौहान इस साल की शुरुआत में पहली बार दादा बने थे, जब कार्तिकेय और अमानत ने 21 जनवरी, 2026 को अपनी बेटी इला का स्वागत किया था। बच्ची का जन्म दिल्ली के AIIMS में हुआ था, और चौहान ने उस समय सोशल मीडिया पर उसके आने की घोषणा की थी। उन्होंने इला को परिवार की प्यारी ‘लक्ष्मी’ बताया और कार्तिकेय के पिता और अमानत के मां बनने का जश्न मनाया।

अहान के जन्म के साथ, इला को अब एक छोटा कजिन मिल गया है, जबकि शिवराज और साधना चौहान 2026 में दूसरी बार दादा-दादी बन गए हैं। अहान के आने से चौहान परिवार में नए जश्न का माहौल बन गया है, रिश्तेदार कुणाल और रिद्धि को उनके बेटे के जन्म पर शुभकामनाएं दे रहे हैं।

मैं गलत कामों को बंद करने की ठान कर बैठा हूं, बंद कर के रहूंगा: मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि उनकी सरकार ने मोबाइल संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से जनता का लाखों करोड़ रुपया गलत हाथों में जाने से बचाया है और बहुतों की मुफ्त की कमाई बंद की है और ऐसे ही लोग आज उनका विरोध कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि उन्होंने गलत कामों को बंद करने की ठान रखी हैं और ऐसा करके रहेंगे चाहे उनका विरोध करने वाले कितना ही शोर क्यों न करें। श्री मोदी यहां यशोभूमि में भारत मोबाइल कांग्रेस 2026 का औपचारिक उद्घाटन कर रहे थे। उनका यह बयान ऐसे वातावरण में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जबकि विपक्ष राज्यों की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के चुनाव आयोग के कार्यक्रम को लेकर मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए जगह जगह- धरने प्रदर्शन कर रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा आज सरकार की सैकड़ों सर्विसेज मोबाइल फोन पर हैं। सरकारी मदद अब सीधे बेनिफिशरीज़ के खाते में जाती है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से करीब 50 लाख करोड़ रुपए सीधे लाभार्थियों के मोबाइल में भेजे गए और उनके बैंक अकाउंट में पहुंचे। और इससे करीब 5 लाख करोड़ रुपए, ये आंकड़ा छोटा नहीं है, 5 लाख करोड़ रुपए गलत हाथों में जाने से बचे हैं।

श्री मोदी ने कहा अब मुझे बताइए, जिनकी ये मुफ्त की कमाई बंद हो गई है, वो क्या, मोदी को प्यार करेंगे क्या? मैंने सही किया कि नहीं किया? करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? ये सारे गलत कामों को बंद करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? वो कितने ही चिल्लाते रहें, चीखते रहें, मैं इसको ठान के बैठा हूं, करके रहूंगा। श्री मोदी ने कहा कि टेलीकॉम के क्षेत्र में भारत में पिछले 10-12 साल में जो क्रांति आई है उसका नागरिक को सीधा-सीधा फायदा हुआ है।

उन्होंने देश विदेश से आयी दूरसंचार जगत की हस्तियों को संबोधित करते हुए कहा आप जानते हैं कि भारत, भाषा और भूगोल, हर प्रकार से डायवर्स देश है, विविधताओं से भरा हुआ देश है। इसके कारण लोगों के जीवन में अनेक असुविधाएं भी आती हैं। मोबाइल कनेक्टिविटी ने इस डायवर्सिटी (विविधता) को भी सुविधा से जोड़ा है। पहले ज्यादातर बैंक शहरों में ही होते थे, अस्पताल शहरों में होते थे, सरकारी दफ्तर ब्लॉक या जिला स्तर पर रहते थे। यानि कुछ भी काम करना हो, सरकारी सेवा लेनी हो, तो लोगों का पैसा और समय दोनों खर्च होता था। 

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डिजिटल गवर्नेंस ने इन परिस्थितियों को बदला है। उन्होंने कहा पुरानी व्यवस्था होती, तो सरकार का 5 लाख करोड़ रुपए लीकेज में चला जाता और ऐसे लोगों की जेब भर देता, मोदी ने इसको रोका है। और अब वही पैसा सही लाभार्थी को मिल रहा है और बचा हुआ पैसा सही काम के लिए उपयोग आ रहा है।

श्री मोदी ने कहा पीएम किसान सम्मान निधि के तहत हम 4 लाख करोड़ रुपए से अधिक किसानों के बैंक अकाउंट में जमा कर चुके हैं। किसान को मोबाइल फोन पर ही पैसा जमा होने का मैसेज मिल जाता है। ये पैसा उन करोड़ों छोटे किसानों तक पहुंचा है, जिन तक कभी सरकारी स्कीम्स का लाभ पहुंच ही नहीं पाता था। प्रधानमंत्री ने कहा कि दूरसंचार की चर्चा में अक्सर नेटवर्क और स्पैक्ट्रम पर बहस , मोबाइल टावर, नेटवर्क की पहुंच और गति की बातें होती हैं। लेकिन भारत के लोगों के लिए टेलीकॉम के मायने और भी रहे हैं। बीते 10-12 वर्षों में मोबाइल फोन आधुनिक संचार के माध्यम के साथ-साथ गुड-गवर्नेंस (सुशासन) का भी अहम औजार बनकर सामने आया है। और यह हमारे डिजिटल इंडिया विजन के केंद्र में रहा है।

श्री मोदी ने कहा आज हम सुनते हैं कि भारत में डेटा सस्ता है, मोबाइल फोन सस्ते हैं, मोबाइल फोन यूजर बेस इतना एक्सपैंड हो गया है, ये अपनी जगह सब सच है, लेकिन ये हुआ कैसे? और ये सब किया क्यों गया? ये जब हम समझेंगे, तो सभी को भारत का फोकस, भारत का ध्यान एकदम स्पष्ट होगा। उन्होंने कहा कि एक दशक पहले तक भारत में डिजिटल डिवाइड बहुत बड़ी चुनौती थी। आधुनिक टेक्नोलॉजी बड़े लोगों का अधिकार बनती जा रही थी। यानि जिसके पास साधन है, वही आधुनिक टेक्नोलॉजी का लाभ ले सकता था।

प्रधानमंत्री ने कहा डिजिटल इंडिया अभियान से हमने इस स्थिति को बदलने की ठानी और इसके केंद्र में मोबाइल फोन को लेकर के आए। यह टेक्नोलॉजी के लोकतांत्रीकरण का बहुत बड़ा प्रयास था। उन्होंने कहा कि इसके लिए दूरसंचार क्षेत्र में हर जरूरी सुधार किए गए, अवसंरचना का विस्तार किया गया। हमने इस बात पर ध्यान दिया किया कि मोबाइल फोन और अन्य टेलीकॉम हार्डवेयर भारत में ही बने।

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नाना पाटेकर ने निधन से ठीक पहले रात 2:30 बजे दोस्त को क्या मैसेज किया था? कुछ घंटों बाद हमेशा के लिए हो गए खामोश

Nana Patekar Death News Updates: हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर ने फिल्म जगत को गहरे सदमे में डाल दिया है। जिंदगी भर अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले नाना पाटेकर ने निधन से कुछ घंटे पहले ही अपने एक करीबी दोस्त को मैसेज भेजकर बताया था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार (8 अक्टूबर) तड़के करीब 2:30 बजे नाना पाटेकर ने अपने दोस्त को मैसेज किया कि वह असहज महसूस कर रहे हैं। उनकी तबीयत ठीक नहीं है। देर रात होने के कारण दोस्त उस मैसेज को समय पर देख नहीं सके।

करीब 4 बजे जब दोस्त उनके घर पहुंचे, तो नाना पाटेकर की हालत बेहद गंभीर थी। वह पसीने से तर थे। उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। इसके बाद उन्हें बचाने की कोशिशें शुरू हुईं। एंबुलेंस और मेडिकल टीम मौके पर पहुंची और उन्हें सीपीआर दिया गया। अस्पताल ले जाते समय भी उन्हें सीपीआर दिया जाता रहा। लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। अस्पताल के मुताबिक, नाना पाटेकर को तड़के अस्पताल लाया गया और करीब 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। डॉक्टरों ने मौत की वजह कार्डियक अरेस्ट बताई है।

सिनेमा जगत में शोक की लहर

नाना पाटेकर के बेटे मल्हार ने भी उनके निधन की पुष्टि की। पाटेकर के बेटे मल्हार ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा, “हां, यह जानकारी सही है। मैं अभी पुणे में हूं और गोवा पहुंच रहा हूं। मैं जल्द ही इस बारे में विस्तार से जानकारी दूंगा।” उन्होंने बताया कि उनके पिता का अंतिम संस्कार पुणे में किया जाएगा। उनके निधन की खबर सामने आते ही सिनेमा जगत, राजनीति और उनके लाखों प्रशंसकों के बीच शोक की लहर दौड़ गई।

नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि अभिनय की अपनी अलग पहचान रखने वाले कलाकार थे। ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘नटसम्राट’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग किरदारों को यादगार बना दिया। करीब पांच दशक लंबे करियर में उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार से लेकर पद्मश्री तक कई सम्मान हासिल किए। फिल्मों से दूर भी उन्होंने जरूरतमंदों और सूखाग्रस्त किसानों की मदद के लिए काम किया।

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लेकिन अब उनके जाने के बाद सबसे ज्यादा भावुक कर देने वाली बात यही है कि जिस अभिनेता ने पर्दे पर अनगिनत किरदारों में जान फूंकी, उसने जिंदगी के आखिरी घंटों में सिर्फ एक संदेश के जरिए अपनी तबीयत खराब होने की खबर दी… और कुछ ही घंटे बाद उनकी आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री आशीष शेलार ने घोषणा की है कि पाटेकर का अंतिम संस्कार आज राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

Nana Patekar Death: जब बॉलीवुड छोड़ नाना पाटेकर पहुंच गए थे कारगिल बॉर्डर, 60 दिन सेना के साथ रहे; 76 से 56 किलो हो गया था वजन

Nana Patekar Death: नाना पाटेकर को आपने पर्दे पर पुलिस अफसर, गैंगस्टर, सैनिक और आम आदमी जैसे तमाम किरदारों में देखा होगा। लेकिन उनकी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय भी है जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान नाना पाटेकर करीब 60 दिनों तक भारतीय सेना के जवानों के साथ रहे थे। नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कारगिल युद्ध के दौरान वह सेना के साथ जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से इजाजत मांगी।

शुरुआत में उन्हें बताया गया कि एक आम नागरिक को इस तरह सेना में शामिल नहीं किया जा सकता। लेकिन नाना ने बताया कि उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग की है। वह राष्ट्रीय स्तर पर राइफल शूटिंग में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

फिर सेना के साथ जाने की मिली इजाजत

नाना पाटेकर के मुताबिक, जॉर्ज फर्नांडिस से बातचीत के बाद उन्हें सेना के साथ जाने की अनुमति मिल गई। वह करीब 60 दिन तक सेना के जवानों के साथ रहे और द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला और सोपोर जैसे इलाकों में गए। उन्होंने यह भी बताया कि वह एक Quick Reaction Team (QRT) का हिस्सा बने थे। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने वहां वास्तव में क्या काम किया, तो नाना ने ऑपरेशनल जानकारी बताने से इनकार कर दिया।

76 किलो से 56 किलो रह गया था वजन

कारगिल में बिताए उन करीब दो महीनों का असर नाना के शरीर पर भी पड़ा। उन्होंने बताया था कि जब वह वहां गए थे, तब उनका वजन करीब 76 किलो था। लेकिन लौटने तक यह घटकर 56 किलो रह गया था। यानी करीब 20 किलो वजन कम हो गया था। नाना के लिए यह सिर्फ रोमांच या प्रचार का हिस्सा नहीं था। उन्होंने कहा था कि उन्हें खुशी थी कि वह देश के लिए कुछ छोटा-सा योगदान कर सके।

फिल्मों में सैनिक का किरदार निभाने से पहले असल ट्रेनिंग

नाना पाटेकर की सेना से यह दिलचस्प जुड़ाव फिल्म ‘प्रहार’ से भी रहा। फिल्म के लिए उन्होंने करीब तीन साल की सैन्य ट्रेनिंग ली थी। उन्हें मानद तौर पर कैप्टन की रैंक भी दी गई थी। यही वजह है कि पर्दे पर सैनिक या पुलिस अधिकारी के किरदार निभाते समय उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी में एक अलग वास्तविकता दिखाई देती थी।

गरीबी में पोस्टर और सड़क की लाइनें भी पेंट कीं

नाना पाटेकर की जिंदगी का एक और पहलू बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। फिल्मों में आने से पहले वह फिल्मों के पोस्टर और सड़क की जेब्रा क्रॉसिंग तक पेंट करने का काम कर चुके थे। एक दौर में वह रोजाना करीब 35 रुपये कमाते थे। उसी में गुजारा करते थे। यही संघर्ष आगे चलकर उनके अभिनय में भी दिखाई दिया। उनकी फिल्मों के किरदारों में आम आदमी का गुस्सा, दर्द और संघर्ष बेहद स्वाभाविक नजर आया।

किसानों के लिए भी उठाया बड़ा कदम

नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ अभिनेता के तौर पर नहीं रही। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘NAAM Foundation’ की शुरुआत की। इसका फोकस महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित गांवों और संकट से जूझ रहे किसानों की मदद करना है। संस्था पानी, गांवों के विकास और किसानों की आजीविका से जुड़े काम करती है। पर्दे पर जिस अभिनेता ने सैनिकों और आम आदमी के किरदारों में जान फूंकी, असल जिंदगी में भी उनकी कहानी संघर्ष, सेना और किसानों से जुड़ी रही।

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‘जनसेवा से राष्ट्रसेवा’ तक PM मोदी के 25 साल, वाराणसी से वडनगर सेवा यात्रा का भव्य समापन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनसेवा और समर्पण के 25 साल पूरे होने के मौके पर ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत निकाली गई ‘वाराणसी से वडनगर सेवा यात्रा’ का बुधवार को वडनगर में समापन हुआ। इस अवसर पर वडनगर में गौरवपूर्ण समापन समारोह आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी मौजूद रहे। इस दौरान अलग-अलग राज्यों से पहुंचे बाइकर्स और सेवा यात्रियों का स्वागत किया गया और उन्हें सम्मानित भी किया गया।

सीएम ने क्या कहा

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने ‘वाराणसी से वडनगर सेवा यात्रा’ के समापन अवसर पर कहा कि, “7 अक्टूबर, 2001 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर सेवा दायित्व संभाला था। आज प्रधानमंत्री ने लगातार 25 वर्षों तक जनसेवा और सुशासन का दायित्व निभाकर देश में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले जननायक बनने का गौरव हासिल किया है। ” सीएम ने आगे कहा, “प्रधानमंत्री ने सत्ता को पद के बजाय सेवा का माध्यम माना और गरीबों, मध्यम वर्ग, किसानों, महिलाओं और युवाओं के विकास पर जोर दिया।”

भारत की ताकत दुनिया के सामने मजबूत

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने आगे कहा कि, “गुजरात में वाइब्रेंट गुजरात समिट, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, बुलेट ट्रेन, GIFT City और सेमीकंडक्टर हब जैसे बड़े प्रोजेक्ट मोदी के विकास के विजन को दिखाते हैं। पीएम मोदी के नागरिक-केंद्रित शासन के चलते देश में करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं और भारत दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है।” उन्होंने कहा कि, “कोरोना के दौरान वैक्सीन की मदद, ग्रीन एनर्जी के लक्ष्यों, अनुच्छेद 370 हटाने, आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीति और अंतरिक्ष व रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे कदमों से भारत की ताकत दुनिया के सामने मजबूत हुई है। पटेल ने प्रधानमंत्री को जनसेवा के 25 साल पूरे होने पर बधाई दी और कहा कि विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को पूरा करने में गुजरात की युवा शक्ति अहम भूमिका निभाएगी।”

देश की सेवा में एक भी दिन नहीं किया आराम

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 7 अक्टूबर को ऐतिहासिक दिन बताते हुए कहा कि इसी दिन 2001 में नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी जनसेवा की शुरुआत की थी। उन्होंने कहा कि, “पीएम मोदी ने पिछले 25 वर्षों में बिना एक भी दिन आराम किए देश के विकास और गरीबों के कल्याण के लिए काम किया।” चौहान ने कोरोना संकट और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के दौरान प्रधानमंत्री के नेतृत्व की भी सराहना की।” उन्होंने कहा कि, “नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेजी से दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है और विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वाराणसी से वडनगर तक बाइक रैली के जरिए पहुंचे युवाओं की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि देश के युवाओं में देशभक्ति और राष्ट्रसेवा की भावना होनी चाहिए और उन्हें विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए।”

मद् भगवद् गीता के श्लोकों का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व की सराहना करते हुए कहा कि गीता में बताए गए ‘सात्विक कर्ता’ के सभी गुण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में दिखाई देते हैं। वे राग-द्वेष और अहंकार से परे रहकर धैर्य के प्रतीक बन गए हैं।

पश्चिम बंगाल के सीएम ने क्या कहा

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने वडनगर पहुंचने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्मभूमि को नमन करते हुए कहा कि, इस धरती ने देश को एक दूरदर्शी नेता दिया है। उन्होंने कहा कि, प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ‘राष्ट्र प्रथम’ और गरीब कल्याण को ध्यान में रखते हुए देश में विकास और सुशासन को बढ़ावा मिला। अधिकारी के मुताबिक, किसान कल्याण, ग्रामीण विकास, सड़क और रेलवे के विस्तार, पीएम आवास योजना, पीएम किसान सम्मान निधि और उड़ान योजना जैसी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंच रहा है।

उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए देशभर के लोग एकजुट होकर आगे बढ़ रहे हैं। अधिकारी ने वाराणसी से वडनगर तक निकाली गई सेवा यात्रा को देश की एकता, सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करने वाला प्रयास बताया।

सेवा यात्रा के समापन कार्यक्रम में गुजरात बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और निकोल विधायक जगदीश विश्वकर्मा ने देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे बाइकर्स और युवाओं का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि, “7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी और अब उनकी जनसेवा के 25 साल पूरे हो गए हैं। इस यात्रा के दौरान युवाओं को सरकार की अलग-अलग योजनाओं के लाभार्थियों से सीधे बातचीत करने का मौका मिला।” विश्वकर्मा ने कहा कि, “मोदी का 25 साल का सार्वजनिक जीवन ‘जनसेवा और राष्ट्रसेवा’ के प्रति समर्पण का उदाहरण है। उनके नेतृत्व में देश के विकास, सुशासन और आर्थिक मजबूती के लिए कई महत्वपूर्ण काम हुए हैं, जिससे भारत की वैश्विक पहचान भी मजबूत हुई है।

पीएम मोदी के 25 साल के जनसेवा का सफर

‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 साल के जनसेवा के सफर को लोगों तक पहुंचाने के लिए वाराणसी से वडनगर तक सेवा यात्रा निकाली गई। इस यात्रा में 500 बाइकर्स और कई युवा शामिल हुए, जिन्होंने 10 राज्यों के गांवों और शहरों में पहुंचकर सफाई अभियान, पौधारोपण, नशामुक्ति और लोगों से संवाद जैसे सामाजिक काम किए। अभियान से बड़ी संख्या में लोग जुड़े और पीएम नरेंद्र मोदी ने भी ऑनलाइन युवाओं का उत्साह बढ़ाया। यात्रा के दौरान वडनगर के शर्मिष्ठा तालाब का जल काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचाया गया, जबकि वाराणसी से लाए गए पवित्र जल से वडनगर के हाटकेश्वर महादेव मंदिर में अभिषेक किया गया। इस पहल के जरिए वाराणसी और वडनगर के बीच आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी दर्शाया गया।

कौन-कौन था मौजूद

सेवा यात्रा के समापन समारोह में राज्य सरकार के मंत्री सर्व ऋषिकेशभाई पटेल, कौशिकभाई वेकरिया, प्रवीणभाई माली, कमलेशभाई पटेल, गुजरात प्रदेश प्रभारी तरुण चुग, सांसद सर्व हरिभाई पटेल, मयंक नायक, राजेंद्रभाई शुक्ल, मध्य प्रदेश के सांसद वी.डी. शर्मा, मेहसाणा जिला पंचायत अध्यक्ष नितिनभाई पटेल, विधायक सर्व किरीटभाई पटेल, मुकेशभाई पटेल, सरदारभाई चौधरी, सुखाजी ठाकोर, राजेश चावड़ा, पूर्व उप मुख्यमंत्री नितिनभाई पटेल, मेहसाणा दूध सागर डेयरी के चेयरमैन अशोकभाई चौधरी, मेहसाणा डिस्ट्रिक्ट बैंक के चेयरमैन विनोदभाई पटेल, वडनगर नगर पालिका अध्यक्ष, सेवा संकल्प अभियान गुजरात प्रदेश प्रभारी और पूर्व मंत्री ब्रिजेश मेरजा, भाजपा प्रदेश महामंत्री प्रशांतभाई कोराट, उपाध्यक्ष नटुजी ठाकोर, अग्रणी भरतभाई पंड्या, सीताबेन पटेल, गिरीशभाई राजगोर, मेहसाणा जिला प्रभारी भरतभाई डांगर सहित बाइकर्स, प्रबुद्ध नागरिक और बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

Video: होम गार्ड भर्ती में साड़ी पहन नंगे पैर दौड़ने वाली कविता की कहानी! पति नहीं रहे तो बच्चों, ससुराल का बोझ उठाने का ये जज्बा इमोशनल कर देगा

रामगढ़ की सुबह इन दिनों सिर्फ सूरज की पहली किरणों से नहीं, बल्कि उन महिलाओं के हौसले से भी रोशन होती है, जो अपने सपनों के लिए मैदान में पसीना बहा रही हैं। इन्हीं में 32 वर्षीय कविता कुमारी की कहानी सबसे अलग नजर आती है। दुलमी प्रखंड के सोसो गांव की रहने वाली कविता विधवा हैं और दो बच्चों की मां भी। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपने लिए एक ऐसा लक्ष्य चुना है, जो उनकी जिंदगी बदल सकता है। हर सुबह घर के जरूरी काम निपटाने के बाद कविता करीब 8 किलोमीटर दूर रामगढ़ के सिदो-कान्हू मैदान पहुंचती हैं। उनके पास महंगे रनिंग शूज, ट्रैकसूट या स्पोर्ट्स टी-शर्ट नहीं हैं।

ऐसे में साड़ी ही उनका अभ्यास का पहनावा बन गई है। तेज धूप, लंबा रास्ता और सीमित साधन भी उनके कदम नहीं रोक पाए। कविता की कोशिश सिर्फ नौकरी पाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने बच्चों के लिए बेहतर और सुरक्षित भविष्य तैयार करना चाहती हैं।

पहले देखने पहुंचीं, फिर खुद दौड़ने लगीं

कविता शुरुआत में मैदान पर दूसरे अभ्यर्थियों को ट्रेनिंग करते हुए देखने पहुंची थीं। धीरे-धीरे उन्होंने खुद भी दौड़ लगाने का फैसला किया। शुरुआत में 1.6 किलोमीटर की दूरी पूरी करने में उन्हें करीब 8 मिनट लगते थे। अब वह यही दूरी लगभग 7 मिनट में पूरी कर लेती हैं।

भर्ती परीक्षा के दौरान साड़ी पहनकर दौड़ते हुए उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। खास बात यह है कि कविता को काफी समय तक पता ही नहीं था कि उनका वीडियो इंटरनेट पर चर्चा में आ चुका है।

दो बच्चों की मां, परिवार की जिम्मेदारी भी कंधों पर

कविता के पति का निधन हो चुका है और वह अपने दो बच्चों के साथ बुजुर्ग ससुरालवालों की जिम्मेदारी भी संभालती हैं। आर्थिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने तैयारी का रास्ता नहीं छोड़ा। वह बताती हैं कि उनका मकसद सिर्फ नौकरी हासिल करना नहीं है। वह होमगार्ड बनकर अपने बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को सुरक्षित करना चाहती हैं।

मैदान पर सिर्फ कविता नहीं, सैकड़ों संघर्ष की कहानियां

सिदो-कान्हू मैदान में हर सुबह का नजारा किसी कहानी से कम नहीं। ट्रैकसूट पहने युवतियों के साथ कई महिलाएं साड़ी और चप्पलों में दौड़ती दिखाई देती हैं। इनमें कई ऐसी हैं, जो घर का काम, बच्चों की देखभाल या खेतों का काम निपटाकर सीधे मैदान पहुंचती हैं।

बूढ़ा-खुखरा गांव की 30 वर्षीय सुनीता कुमारी भी साड़ी में दौड़ती हैं। उनका कहना है कि गरीब किसान परिवार से होने के कारण परिवार ट्रैकसूट और जूते नहीं खरीद सका, लेकिन इससे उनका हौसला कम नहीं हुआ।

किसी के लिए नौकरी, तो किसी के लिए बच्चों का भविष्य

गोला की मोनिका कुमारी ने 1.6 किलोमीटर की दौड़ करीब 6 मिनट 4 सेकंड में पूरी की। वहीं कई अन्य महिला अभ्यर्थियों के लिए यह भर्ती सिर्फ रोजगार का मौका नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने की उम्मीद है। फिटनेस कोच सिकंदर पांडेय और एक मार्शल आर्ट्स प्रशिक्षक अभ्यर्थियों को मुफ्त प्रशिक्षण दे रहे हैं। 2 अक्टूबर को आयोजित एक बड़ी दौड़ में करीब 2,500 अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया।

284 पदों ने जगाई नई उम्मीद

रामगढ़ में 284 होमगार्ड पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया 24 अक्टूबर से 5 नवंबर तक प्रस्तावित है। इसमें 50 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए और अतिरिक्त 5 प्रतिशत सीटें विधवा व तलाकशुदा महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। भर्ती में 1.6 किलोमीटर की दौड़ के अलावा लंबाई, सीना और अन्य शारीरिक परीक्षण होंगे। प्रशासन ने पारदर्शी तरीके से योग्यता और फिटनेस के आधार पर चयन की तैयारी की है।

Video: ‘हिंदी सीखो वरना नौकरी छोड़ दो’… Zomato सुपरवाइजर का वीडियो वायरल, अब मांगी माफी