हिमाचल से हो गई ठंड की एंट्री, धौलाधार और मनाली की चोटियों पर सीजन की पहली बर्फबारी, IMD ने मौसम को लेकर दिया ये अलर्ट

शिमला (Shimla): हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में विंटर सीजन ने तय समय से पहले दस्तक दे दी है। बुधवार को वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के एक्टिव होने से धौलाधार रेंज, मनाली और लाहौल-स्पीति की ऊंची चोटियों पर सीजन की पहली बर्फबारी हुई है। इसका सीधा असर टूरिज्म और लोकल इकोनॉमी पर दिखने लगा है।

मौसम विभाग के मुताबिक, चंबा के सच पास में 1 फीट तक बर्फ गिरी है। सुराल में 3 इंच बर्फ रिकॉर्ड की गई है। बर्फबारी के बाद लाहौल पुलिस ने एहतियातन 3 बड़े हाईवे – रोहतांग से सरचू, दारचा से शिंकू ला और ग्राम्फू से बटल को बंद कर दिया है।

100 गाड़ियां फंसी, पुलिस ने किया रेस्क्यू

भारी बर्फबारी के कारण गोंदला के पास करीब 100 पर्यटक वाहन फंस गए थे, जिन्हें पुलिस ने देर रात रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर निकाला। लाहौल-स्पीति पुलिस ने पर्यटकों के लिए एडवाइजरी जारी की है कि बिना मौसम की जानकारी के हाई-एल्टीट्यूड एरिया में न जाएं।

धर्मशाला में बुधवार को न्यूनतम तापमान 6 डिग्री सेल्सियस तक लुढ़क गया। बर्फबारी के बाद धौलाधार का नजारा साफ हुआ तो बड़ी संख्या में लोग इसे देखने बाहर निकले। मनाली में भी ऊपरी इलाकों में बर्फ और निचले इलाकों में बारिश से ठंड बढ़ गई है।

टूरिज्म कारोबार को बूस्टर डोज की उम्मीद

हिमाचल होटल एसोसिएशन के मुताबिक, अक्टूबर में हुई इस पहली बर्फबारी से विंटर टूरिज्म को बड़ा फायदा होगा। पिछले साल अक्टूबर अंत तक बर्फ नहीं गिरी थी, जिससे बुकिंग 30% कम रही थी। इस बार अर्ली स्नोफॉल से दिवाली और क्रिसमस सीजन की एडवांस बुकिंग 20-25% बढ़ने की उम्मीद है।

IMD का लेटेस्ट अपडेट

मौसम विभाग (IMD) ने कहा है कि शुक्रवार तक राज्य के कई हिस्सों में हल्की बारिश का दौर जारी रहेगा। शनिवार से पूरे प्रदेश में मौसम साफ हो जाएगा और तापमान में और गिरावट आएगी। किसानों के लिए ये बर्फबारी सेब और गेहूं की फसल के लिए फायदेमंद मानी जा रही है।

कल का मौसम: इन 20 राज्यों में बदलेगा मौसम, बारिश के साथ 60 kmph की रफ्तार से चलेंगी तेज हवाएं

Weather Tomorrow: अगर आप अगले कुछ दिनों में मौसम में बदलाव का इंतजार कर रहे हैं, तो देश के कई राज्यों में बारिश दस्तक दे सकती है। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, 16 से 19 अक्टूबर के बीच कई इलाकों में बारिश, गरज-चमक और तेज हवाएं चलने की संभावना है। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भारी बारिश हो सकती है। वहीं, मध्य, पूर्वी, उत्तर और पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में भी बारिश देखने को मिल सकती है।

दिल्ली-NCR में कल कैसा रहेगा मौसम?

दिल्ली-NCR में आने वाले दिनों में हल्की बारिश होने का अनुमान है। इससे मौसम में बदलाव देखने को मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश में कल कैसा रहेगा मौसम?

उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों में 16 अक्टूबर को बारिश हो सकती है। मौसम विभाग के अनुसार, राज्य के कुछ इलाकों में सप्ताह के बाकी दिनों में भी बारिश का सिलसिला जारी रहने की संभावना है।

उत्तराखंड में कल कैसा रहेगा मौसम?

उत्तराखंड में 16 से 18 अक्टूबर के बीच बारिश होने के आसार हैं। कुछ जगहों पर गरज-चमक के साथ बिजली गिर सकती है। इस दौरान तेज हवाएं चलने की भी संभावना है।

जम्मू-कश्मीर में कल कैसा रहेगा मौसम?

जम्मू-कश्मीर के साथ लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद में भी मौसम बदल सकता है। इन इलाकों में कई जगहों पर बारिश होने का अनुमान है। यानी आने वाले दिनों में यहां के लोगों को बारिश का सामना करना पड़ सकता है।

हिमाचल प्रदेश में कल कैसा रहेगा मौसम?

हिमाचल प्रदेश में 16 अक्टूबर को कई जगहों पर बारिश होने की संभावना है। इस दौरान कुछ इलाकों में गरज-चमक के साथ बिजली भी गिर सकती है। मौसम विभाग के अनुसार, 17 अक्टूबर को भी कुछ जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश का एक और दौर देखने को मिल सकता है।

राजस्थान में कल कैसा रहेगा मौसम?

राजस्थान के पूर्वी हिस्सों में 16 अक्टूबर को कुछ जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। इस दौरान 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने का अनुमान है। हवा के झोंकों की रफ्तार 50 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है।

मध्य प्रदेश में कल कैसा रहेगा मौसम?

मध्य प्रदेश में भी मौसम बदलने के आसार हैं। पश्चिमी मध्य प्रदेश में 16 अक्टूबर को बारिश हो सकती है। वहीं, पूर्वी मध्य प्रदेश में 16 से 18 अक्टूबर के बीच बारिश होने का अनुमान है।

छत्तीसगढ़ में कल कैसा रहेगा मौसम?

छत्तीसगढ़ में 16 से 18 अक्टूबर के बीच कुछ जगहों पर बारिश हो सकती है। मौसम विभाग के मुताबिक, इस दौरान राज्य के अलग-अलग इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है।

महाराष्ट्र में कल कैसा रहेगा मौसम?

महाराष्ट्र के कई इलाकों में अगले कुछ दिनों तक मौसम बदल सकता है। विदर्भ में 17 और 18 अक्टूबर को कुछ जगहों पर बारिश होने की संभावना है। वहीं, मुंबई और ठाणे में 17 और 18 अक्टूबर को हल्की से मध्यम बारिश या गरज के साथ बौछारें पड़ सकती हैं।

रत्नागिरी में 16 अक्टूबर को गर्मी का असर देखने को मिल सकता है। कुछ इलाकों में लू जैसी स्थिति भी बन सकती है। हालांकि, दोपहर या शाम के समय गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बारिश होने के आसार हैं। 17 अक्टूबर को भी बारिश हो सकती है। वहीं, 18 अक्टूबर को कुछ जगहों पर बिजली गिरने और 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभावना है।

सिंधुदुर्ग में 16 अक्टूबर को गर्मी और उमस परेशान कर सकती है। दोपहर या शाम के समय हल्की बारिश या गरज के साथ बौछारें पड़ सकती हैं। 17 और 18 अक्टूबर को कुछ जगहों पर गरज-चमक, बिजली गिरने और 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने का अनुमान है।

ओडिशा में कल कैसा रहेगा मौसम?

ओडिशा में 16 से 18 अक्टूबर के बीच कुछ जगहों पर बारिश हो सकती है। इस दौरान राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है।

पश्चिम बंगाल में कल कैसा रहेगा मौसम?

पश्चिम बंगाल के गंगा के मैदानी इलाकों में 16 से 18 अक्टूबर के बीच बारिश हो सकती है। वहीं, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल में भी इसी अवधि के दौरान बारिश होने का अनुमान है।

सिक्किम में कल कैसा रहेगा मौसम?

सिक्किम में 16 से 18 अक्टूबर के बीच बारिश होने की संभावना है। ऐसे में राज्य के कुछ हिस्सों में मौसम बदल सकता है।

बिहार में कल कैसा रहेगा मौसम?

बिहार में 16 से 18 अक्टूबर के बीच कुछ जगहों पर बारिश हो सकती है। मौसम विभाग के अनुसार, इस दौरान राज्य के अलग-अलग इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश होने के आसार हैं।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कल कैसा रहेगा मौसम?

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में शुरुआत में कई जगहों पर बारिश होने की संभावना है। इसके बाद 16 से 18 अक्टूबर के बीच कुछ इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है।

कल पूर्वोत्तर भारत का मौसम

16 से 18 अक्टूबर के बीच असम में कहीं-कहीं बारिश होने की संभावना है। इसी दौरान मेघालय में भी कुछ जगहों पर बारिश हो सकती है।

अरुणाचल प्रदेश में 16 से 17 अक्टूबर के बीच बारिश होने के आसार हैं।

16 अक्टूबर को नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में कहीं-कहीं बारिश हो सकती है। पूरे हफ्ते पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में बारिश का दौर जारी रहने की उम्मीद है।

केरल में कल कैसा रहेगा मौसम?

केरल में अगले कुछ दिनों तक बारिश का दौर तेज हो सकता है। मौसम विभाग के अनुसार, 16 से 18 अक्टूबर के बीच केरल और माहे में कई जगहों पर बारिश होने की संभावना है। कुछ इलाकों में भारी बारिश भी हो सकती है।

16 अक्टूबर को गरज-चमक, बिजली गिरने और तेज हवाएं चलने की चेतावनी दी गई है। शुक्रवार को उत्तरी केरल में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इस दौरान कई इलाकों में तेज बारिश होने के आसार हैं।

केरल में दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व, दोनों मानसून के दौरान बारिश होती है। हालांकि, राज्य की सालाना बारिश में उत्तर-पूर्व मानसून का योगदान अपेक्षाकृत कम रहता है। उत्तर-पूर्व मानसून आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर तक सक्रिय रहता है। तमिलनाडु और दक्षिण भारत के आसपास के इलाकों के लिए यह मानसून काफी अहम है।

तमिलनाडु में कल कैसा रहेगा मौसम?

तमिलनाडु के साथ पुडुचेरी और कराईकल में भी 16 से 18 अक्टूबर के बीच बारिश हो सकती है। मौसम विभाग ने 16 अक्टूबर को गरज-चमक और बिजली गिरने की आशंका जताई है। वहीं, 16 से 18 अक्टूबर के दौरान कुछ जगहों पर भारी बारिश होने का अनुमान है।

कर्नाटक में अगले कुछ दिनों तक बारिश और तेज हवाओं का असर देखने को मिल सकता है। मौसम विभाग के अनुसार, दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में 16 से 18 अक्टूबर के बीच कई जगहों पर बारिश होने की संभावना है। वहीं, तटीय और उत्तरी आंतरिक कर्नाटक में 16 अक्टूबर को कुछ इलाकों में बारिश हो सकती है। इसके बाद 17 और 18 अक्टूबर को कई जगहों पर बारिश का दौर तेज होने का अनुमान है।

उत्तरी आंतरिक कर्नाटक में 16 से 18 अक्टूबर के दौरान कुछ जगहों पर भारी बारिश हो सकती है। वहीं, तटीय कर्नाटक में 17 और 18 अक्टूबर को भारी बारिश की आशंका है। राज्य के कुछ हिस्सों में गरज-चमक, बिजली गिरने और तेज हवाएं चलने की भी संभावना है।

दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में 16 से 18 अक्टूबर के बीच हवा की रफ्तार 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे तक रह सकती है। कुछ जगहों पर हवा के तेज झोंके 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकते हैं।

आंध्र प्रदेश में कल कैसा रहेगा मौसम?

तटीय आंध्र प्रदेश और यानम में 16 अक्टूबर को कुछ जगहों पर बारिश होने की संभावना है। इस दौरान तेज सतही हवाएं भी चल सकती हैं। मौसम विभाग के मुताबिक, 16 और 17 अक्टूबर को कुछ इलाकों में भारी बारिश होने का अनुमान है।

कल तेलंगाना का मौसम

16 से 18 अक्टूबर के बीच तेलंगाना में कहीं-कहीं बारिश होने की संभावना है। इस दौरान 30-40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं, जिनकी गति 50 किमी प्रति घंटे तक भी पहुंच सकती है।

कल रायलसीमा का मौसम

16 अक्टूबर को रायलसीमा में कुछ जगहों पर भारी बारिश हो सकती है।

अगले कुछ दिनों के लिए IMD का ताजा पूर्वानुमान

IMD के पूर्वानुमान के अनुसार, 16 से 19 अक्टूबर के बीच देश के कई हिस्सों में बारिश का दौर जारी रह सकता है। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में कहीं-कहीं भारी बारिश हो सकती है, जबकि मध्य, पूर्वी, उत्तरी और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भी बारिश होने की संभावना है।

यह भी पढ़ें: UP Weather Update: यूपी में मौसम का डबल अटैक! 19 जिलों में ओलावृष्टि का खतरा, 60 KM की रफ्तार से चलेंगी हवाएं; किसानों को IMD का अलर्ट

रेवंत ने कृषि के लिए 20 दिनों तक बिना रुकावट बिजली आपूर्ति के दिये निर्देश

तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने कम बारिश के मद्देनजर खड़ी फसलों को बचाने के लिए अगले 20 दिनों तक कृषि क्षेत्र को चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।

इसके साथ ही श्री रेड्डी ने इस मामले में लापरवाही बरतने पर ऊर्जा विभाग के विशेष मुख्य सचिव और टीजी-जेनको के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) सहित वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित करने की चेतावनी भी दी है।

उन्होंने बुधवार रात यहां कम बारिश, अल नीनो के प्रभाव तथा बिजली और पेयजल आपूर्ति की स्थिति की समीक्षा के लिए आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में बार-बार बिजली कटौती को लेकर कड़ी नाराजगी जतायी। उन्होंने अधिकारियों से सवाल किया कि बार-बार निर्देश दिये जाने के बावजूद स्थिति में सुधार क्यों नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि बिजली की कमी के कारण किसानों की फसलों को नुकसान नहीं होना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को कृषि क्षेत्र में बिजली की अधिक मांग वाले क्षेत्रों की पहचान करने और फसल कटाई पूरी होने तक पर्याप्त बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

मुख्यमंत्री ने सवाल किया कि बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बिजली उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया गया। उन्होंने पूछा कि नैनी और महानदी से कोयले की आपूर्ति की व्यवस्था होने के बावजूद यादाद्रि बिजली संयंत्र अपनी स्थापित क्षमता के अनुसार पूरा उत्पादन क्यों नहीं कर रहा है।

Also Read : कर्नाटक में एसआईआर के खिलाफ अभियान तेज करेगा इंडिया गठबंधन

उन्होंने कहा, “मैं जनता के प्रति जवाबदेह हूं। खड़ी फसलों को बचाने के लिए बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के बार-बार निर्देश देने के बावजूद स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।” उन्होंने कहा, ” मैं ऐसे किसी भी कदम को बर्दाश्त नहीं करूंगा, जिससे जनता को परेशानी हो। लापरवाही बरतने वाले किसी भी व्यक्ति को नहीं बख्शूंगा।”

मुख्यमंत्री ने अल नीनो के संभावित प्रभाव को कोविड-19 महामारी के समान एक आपदा बताते हुए कहा कि यदि विभागों ने समय रहते बचाव के उपाय नहीं किए, तो मौजूदा परिस्थितियां बड़े संकट का रूप ले सकती हैं। उन्होंने सभी विभागों को जून तक के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार करने, अल नीनो के संभावित प्रभावों का आकलन करने और सामान्य बारिश बहाल होने तक जनता की परेशानियां कम करने के लिए आपसी समन्वय से काम करने का निर्देश दिये।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को राज्यभर में पेयजल की कमी को रोकने के लिए पहले से व्यवस्था करने और पशुओं के लिए पर्याप्त चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया। उन्होंने ग्रेटर हैदराबाद क्षेत्र में निर्माण कार्यों और अन्य उपयुक्त जरूरतों के लिए मलजल शोधन संयंत्रों से शोधित पानी का इस्तेमाल करने को कहा। उन्होंने बताया कि स्थिति से निपटने की तैयारियों के तहत प्रत्येक मंडल में समूह-एक और समूह-दो के अधिकारियों की नियुक्ति की जायेगी। ये अधिकारी बारिश की कमी, बिजली और पेयजल आपूर्ति, फसलों की स्थिति तथा चारे की उपलब्धता पर नजर रखेंगे। उन्होंने कहा कि जमीनी स्थिति की नियमित रिपोर्ट मुख्य सचिव को सौंपी जायेगी।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को दशहरा और दिवाली के बीच ग्राम सभाएं आयोजित करने तथा सांस्कृतिक दलों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाने का भी निर्देश दिया। इन अभियानों के जरिए अल नीनो के संभावित प्रभावों की जानकारी देने के साथ-साथ पानी और बिजली की बचत को बढ़ावा दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि सामान्य बारिश बहाल होने तक सभी विभाग सतर्क रहें और लोगों की परेशानियां कम से कम रखने के लिए पहले से ही आवश्यक कदम उठायें।

Pic Credit : UNI

शिवराज धरने पर बैठ गए!

Shivraj Singh Chauhan

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपनी पार्टी की राज्य सरकार से ठन गई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ उनका विवाद अब खुल कर सामने आ गया है। दोनों एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। यह मामला बहुत दिन से चल रहा था लेकिन पिछले दिनों जब नए संगठन महामंत्री चंद्रशेखर भोपाल गए और पार्टी नेताओं के साथ बैठक की तब मामला मीडिया में आ गया। वहां शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कलेक्टर फोन नहीं उठाते हैं। इस पर चंद्रशेखर ने दोनों समझाया और सारी गुटबाजी तीन महीने में खत्म करने को कहा।

लेकिन उसके बाद मामला और तेज हो गया। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने चुनाव जिताने वाली ‘लाड़ली बहना’ योजना पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने कहा कि इस योजना पर बहुत खर्च हो रहा है और राज्य की वित्तीय हालत बिगड़ रही है। ध्यान रहे शिवराज सिंह चौहान ने इस योजना की शुरुआत की थी। इसके बाद एक दिन मामला और आगे बढ़ा, जब शिवराज सिंह चौहान अपने चुनाव क्षेत्र के बुधनी गांव में एक दर्जन आदिवासी परिवारों का घर तोड़े जाने के खिलाफ धरने पर बैठ गए। वन विभाग इन लोगों का घर तोड़ रहा है, जिसे शिवराज सिंह चौहान ने ‘जुल्म की पराकाष्ठा’ कहा है। यह पार्टी के भीतर सिर्फ अनुशासन की कमी दिखाने का मामला नहीं है। यह सत्ता का संघर्ष है। शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते उनको भी उमा भारती और दूसरे नेताओं का ऐसा विरोध झेलना पड़ा था। दिल्ली में मदनलाल खुराना सीएम पद से हटाए जाने से इतने आहत थे कि एक बार वे भी अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे।

CJP फंडिंग पर मैरी मिलबेन और अभिजीत दिपके आमने-सामने:मिलबेन बोलीं- फेल हुए तो अमेरिकी डोनर्स छोड़ देंगे, बेहतर है पीएम के साथ बैठो, भारत को आगे बढ़ाओ

अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके के बीच तीखी बहस हुई। दोनों ने भारत में प्रदर्शन कर रहे संगठन की विदेशी फंडिंग को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साधा। यह विवाद नई दिल्ली में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच हुआ। मिलबेन ने X पर दावा किया कि CJP को अमेरिका में रहने वाले डोनर्स से फंडिंग मिल रही है। उन्होंने भारत के युवाओं से इस संगठन की “विघटनकारी सोच” के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अपील की थी। मिलबेन पर पलटवार करते हुए दीपके ने पूछा कि पीएम मोदी अपने ही देशवासियों को बदनाम करने के लिए अमेरिकियों का समर्थन क्यों ले रहे हैं। नई दिल्ली में प्रदर्शन के बीच विवाद विपक्षी दल और CJP नई दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं। वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इन दलों का आरोप है कि मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) में अनियमितताएं हुई हैं। इसी बीच मिलबेन और दिपके के बीच विदेशी फंडिंग को लेकर बयानबाजी शुरू हुई। दिपके ने मिलबेन को जवाब देते हुए कहा, “विदेशी नागरिकों को भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का अधिकार किसने दिया? हम अपने मुद्दों से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। हमें अपने देश के मामलों में बाहरी लोगों के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।” मैरी का जवाब- पीएम के साथ बैठो और भारत को आगे बढ़ाने में मदद करो अमेरिकी सिंगर मैरी मिलबेन ने अभिजीत दीपके के आरोप के जवाब में एक पोस्ट की है। मैरी मिलबेन ने पोस्ट में लिखा… “ओह डियर अभिजीत दिपके, सच सभी को आजाद करता है। आपको भी। और यह सच है: जब आप कामयाब नहीं होंगे, तो ये अमेरिकी डोनर्स आपको ऐसे छोड़ देंगे, जैसे कोई गर्म केक छोड़ देता है। और तुम सफल नहीं होगे, क्योंकि गैर-कानूनी काम कभी नहीं जीतते। इसके बजाय, अपनी अमेरिकी शिक्षा और टैलेंट का इस्तेमाल अच्छे कामों के लिए करो। पीएम के साथ बैठो और भारत को आगे बढ़ाने के लिए एक सकारात्मक आवाज़ बनो। सही काम करने की तुम्हारी हिम्मत का सच तुम्हारे अगले कदमों में दिखेगा।” प्रधानमंत्री मोदी जून 2023 में अपने अमेरिकी यात्रा के दौरान सिंगर मैरी मिलबेन से मिले थे। 4 मौकों पर मिलबेन ने मोदी को सपोर्ट किया 1. किसान आंदोलन पर: मिलबेन ने फरवरी 2021 में किसान आंदोलन के दौरान मोदी सरकार के कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए कहा था कि उन्हें किसानों की जिंदगी बेहतर बनाने के मोदी के विजन पर भरोसा है। 2. मणिपुर हिंसा पर: अगस्त 2023 में मणिपुर हिंसा के मुद्दे पर भी उन्होंने मोदी का समर्थन किया था। उन्होंने उस समय कहा था कि भारत को अपने नेता पर भरोसा है और मोदी मणिपुर के लोगों की आजादी के लिए लड़ेंगे। 3. BBC की गुजरात दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री पर: मिलबेन ने BBC की डॉक्यूमेंट्री ‘India: The Modi Question’ की आलोचना करते हुए मोदी सरकार का समर्थन किया था। 2023 में आई इस डॉक्यूमेंट्री में 2002 के गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। 4. CAA कानून पर: मार्च 2024 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने पर भी मिलबेन ने मोदी सरकार के फैसले की तारीफ की थी। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भारतीय मतदाताओं से मोदी को वोट देने की अपील भी की थी। भारत में भी CJP फंडिंग पर उठे थे सवाल बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दीपके की अमेरिका में पढ़ाई के खर्च पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि क्या इसके पीछे अमेरिकी कारोबारी जॉर्ज सोरोस से जुड़ा कोई फाउंडेशन था। वहीं, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी विपक्ष और CJP पर विदेशी मदद से देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिश का आरोप लगाया था। इसके अलावा, अगस्त 2026 में RTI कार्यकर्ता अमित तिवारी ने दीपके की पढ़ाई के खर्च और CJP के कानूनी सहायता फंड की जांच की मांग की थी। दीपके ने कहा था- CJP का खर्च दोस्त मिलकर उठाते हैं कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके विदेशी फंडिंग के आरोपों को खारिज कर चुके हैं। CJP के आंदोलनों के खर्च पर दीपके ने कहा था कि वह और उनके दोस्त मिलकर पैसा जुटाते हैं। उनके मुताबिक, संगठन को किसी बाहरी डोनर या बड़े उद्योगपति से आर्थिक मदद नहीं मिली है। आगे उन्होंने क्राउडफंडिंग से पैसा जुटाने की योजना भी बताई थी। विदेशी फंडिंग के आरोपों पर दीपके ने गृह मंत्री अमित शाह से भी सवाल किया था। उनका कहना था कि अगर आंदोलन में विदेशी पैसा आया है, तो इसकी जांच और रोकथाम की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है।

CJP फंडिंग पर मैरी मिलबेन और अभिजीत दिपके आमने-सामने:मिलबेन बोलीं- फेल हुए तो अमेरिकी डोनर्स छोड़ देंगे, बेहतर है पीएम के साथ बैठो, भारत को आगे बढ़ाओ

अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके के बीच तीखी बहस हुई। दोनों ने भारत में प्रदर्शन कर रहे संगठन की विदेशी फंडिंग को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साधा। यह विवाद नई दिल्ली में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच हुआ। मिलबेन ने X पर दावा किया कि CJP को अमेरिका में रहने वाले डोनर्स से फंडिंग मिल रही है। उन्होंने भारत के युवाओं से इस संगठन की “विघटनकारी सोच” के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अपील की थी। मिलबेन पर पलटवार करते हुए दीपके ने पूछा कि पीएम मोदी अपने ही देशवासियों को बदनाम करने के लिए अमेरिकियों का समर्थन क्यों ले रहे हैं। नई दिल्ली में प्रदर्शन के बीच विवाद विपक्षी दल और CJP नई दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं। वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इन दलों का आरोप है कि मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) में अनियमितताएं हुई हैं। इसी बीच मिलबेन और दिपके के बीच विदेशी फंडिंग को लेकर बयानबाजी शुरू हुई। दिपके ने मिलबेन को जवाब देते हुए कहा, “विदेशी नागरिकों को भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का अधिकार किसने दिया? हम अपने मुद्दों से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं। हमें अपने देश के मामलों में बाहरी लोगों के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।” मैरी का जवाब- पीएम के साथ बैठो और भारत को आगे बढ़ाने में मदद करो अमेरिकी सिंगर मैरी मिलबेन ने अभिजीत दीपके के आरोप के जवाब में एक पोस्ट की है। मैरी मिलबेन ने पोस्ट में लिखा… “ओह डियर अभिजीत दिपके, सच सभी को आजाद करता है। आपको भी। और यह सच है: जब आप कामयाब नहीं होंगे, तो ये अमेरिकी डोनर्स आपको ऐसे छोड़ देंगे, जैसे कोई गर्म केक छोड़ देता है। और तुम सफल नहीं होगे, क्योंकि गैर-कानूनी काम कभी नहीं जीतते। इसके बजाय, अपनी अमेरिकी शिक्षा और टैलेंट का इस्तेमाल अच्छे कामों के लिए करो। पीएम के साथ बैठो और भारत को आगे बढ़ाने के लिए एक सकारात्मक आवाज़ बनो। सही काम करने की तुम्हारी हिम्मत का सच तुम्हारे अगले कदमों में दिखेगा।” प्रधानमंत्री मोदी जून 2023 में अपने अमेरिकी यात्रा के दौरान सिंगर मैरी मिलबेन से मिले थे। 4 मौकों पर मिलबेन ने मोदी को सपोर्ट किया 1. किसान आंदोलन पर: मिलबेन ने फरवरी 2021 में किसान आंदोलन के दौरान मोदी सरकार के कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए कहा था कि उन्हें किसानों की जिंदगी बेहतर बनाने के मोदी के विजन पर भरोसा है। 2. मणिपुर हिंसा पर: अगस्त 2023 में मणिपुर हिंसा के मुद्दे पर भी उन्होंने मोदी का समर्थन किया था। उन्होंने उस समय कहा था कि भारत को अपने नेता पर भरोसा है और मोदी मणिपुर के लोगों की आजादी के लिए लड़ेंगे। 3. BBC की गुजरात दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री पर: मिलबेन ने BBC की डॉक्यूमेंट्री ‘India: The Modi Question’ की आलोचना करते हुए मोदी सरकार का समर्थन किया था। 2023 में आई इस डॉक्यूमेंट्री में 2002 के गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। 4. CAA कानून पर: मार्च 2024 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने पर भी मिलबेन ने मोदी सरकार के फैसले की तारीफ की थी। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भारतीय मतदाताओं से मोदी को वोट देने की अपील भी की थी। भारत में भी CJP फंडिंग पर उठे थे सवाल बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दीपके की अमेरिका में पढ़ाई के खर्च पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि क्या इसके पीछे अमेरिकी कारोबारी जॉर्ज सोरोस से जुड़ा कोई फाउंडेशन था। वहीं, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी विपक्ष और CJP पर विदेशी मदद से देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिश का आरोप लगाया था। इसके अलावा, अगस्त 2026 में RTI कार्यकर्ता अमित तिवारी ने दीपके की पढ़ाई के खर्च और CJP के कानूनी सहायता फंड की जांच की मांग की थी। दीपके ने कहा था- CJP का खर्च दोस्त मिलकर उठाते हैं कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके विदेशी फंडिंग के आरोपों को खारिज कर चुके हैं। CJP के आंदोलनों के खर्च पर दीपके ने कहा था कि वह और उनके दोस्त मिलकर पैसा जुटाते हैं। उनके मुताबिक, संगठन को किसी बाहरी डोनर या बड़े उद्योगपति से आर्थिक मदद नहीं मिली है। आगे उन्होंने क्राउडफंडिंग से पैसा जुटाने की योजना भी बताई थी। विदेशी फंडिंग के आरोपों पर दीपके ने गृह मंत्री अमित शाह से भी सवाल किया था। उनका कहना था कि अगर आंदोलन में विदेशी पैसा आया है, तो इसकी जांच और रोकथाम की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है।

विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने थामा कांग्रेस का दामन

उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बुधवार विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।

प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह और चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत की मौजूदगी में चकराता, सहसपुर, विकास नगर से कई लोगों ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने वालों में पूर्व प्रत्याशी विधानसभा चकराता दर्शन लाल डोभाल, सेवानिवृत्त आईजी पुलिस अनन्तराम चौहान, कैप्टन ताजवर सिंह नेगी, कैप्टन नारायण सिंह रावत, कैप्टन गंगा सिंह, कैप्टन हीरा बल्लभ पांडे, कैप्टन सोबन सिंह, जितेंद्र सिंह, शशांक भट्ट आदि प्रमुख हैं।

श्री गोदियाल ने इस अवसर पर कहा कि आज देश एवं प्रदेश की जनता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जनविरोधी नीतियों, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार तथा बिगड़ती कानून व्यवस्था से त्रस्त है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में भाजपा सरकार के शासनकाल में बेरोजगार नौजवान रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराधों से प्रदेश की मातृशक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रही है तथा किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी सरकार की नीतियों से परेशान हैं।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा सरकार की कथनी और करनी में भारी अन्तर है। प्रदेश की जनता ने जिस विश्वास और उम्मीद के साथ भाजपा को सत्ता सौंपी थी, सरकार उन अपेक्षाओं पर खरी उतरने में पूरी तरह विफल रही है। विकास के नाम पर केवल घोषणाएं की जा रही हैं, जबकि प्रदेश में बेरोजगारी, पलायन, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जनता भाजपा सरकार के कुशासन से मुक्ति चाहती है। प्रदेश में विकास कार्य ठप पड़े हैं तथा सरकार जनसमस्याओं के समाधान के बजाय प्रचार-प्रसार और राजनीतिक बयानबाजी में व्यस्त है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार की नाकामियों से जनता में भारी आक्रोश है और आने वाले विधानसभा चुनावों में प्रदेश की जनता भाजपा को सत्ता से बेदखल कर कांग्रेस की सरकार बनाने का मन बना चुकी है।

Also Read : जेएनयू में एबीवीपी का प्रदर्शन

चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष सिंह ने कहा कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी देशभर में लोकतंत्र, संविधान और आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए निरन्तर संघर्ष कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की विचारधारा और जनहित के मुद्दों के प्रति लोगों का विश्वास लगातार मजबूत हो रहा है। इसी का परिणाम है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता कांग्रेस की नीतियों से प्रभावित होकर पार्टी में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी में शामिल होने वाले सभी नेताओं को संगठन में पूरा सम्मान दिया जाएगा तथा उनके राजनीतिक एवं सामाजिक अनुभवों का लाभ पार्टी संगठन को मजबूत बनाने में लिया जाएगा।

प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डॉ. हरक सिंह रावत ने कहा कि राज्य की भाजपा सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। प्रदेश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा पलायन जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर सरकार के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता अब भाजपा के खोखले वादों और झूठी घोषणाओं से ऊब चुकी है तथा कांग्रेस की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है। उन्होंने कहा कि आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी पूरी एकजुटता एवं मजबूती के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस परिवार में नए नेताओं के शामिल होने से पार्टी का जनाधार और अधिक मजबूत होगा तथा भाजपा सरकार के विरुद्ध चल रहे जनसंघर्ष को नई गति मिलेगी।

इस अवसर पर विधायक लखपत सिंह बुटोला, प्रदेश उपाध्यक्ष लालचन्द शर्मा, अभिषेक सिंह, राजेन्द शाह, नवीन जोशी, विनोद चौहान, प्रदेश प्रवक्ता डॉ. प्रतिमा सिंह, अमेन्द्र बिष्ट, अखिलेश उनियाल, प्रशांत खंडूरी, नरेशानन्द नौटियाल आदि पार्टी नेता उपस्थित रहे।

Pic Credit : UNI

PM Kisan 24th Installment: क्या सरकार दिवाली से पहले किसानों के खाते में भेजेगी 2000 रुपये? जानिए 24वीं किस्त का अपडेट

PM Kisan 24th Installment: देश के कप्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-Kisan) योजना की 24वीं किस्त का इंतजार कर रहे हैं। इस योजना की 23वीं किस्त 20 जून को जारी की गई थी। पीएम किसान योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को हर साल 6,000 रुपये मिलते हैं। यह रकम 2,000 रुपये की तीन किस्तों में सीधे बैंक खाते में भेजी जाती है। आमतौर पर हर चार महीने में एक किस्त जारी होती है।

पीएम किसान की 24वीं किस्त कब आएगी?

पीएम किसान योजना की 24वीं किस्त इसी महीने यानी अक्टूबर में आने की ज्यादा संभावना है। कृषि विभाग के उप-कृषि निदेशक नीलेश चौरसिया ने भी पिछले दिनों संकेत दिया था कि अगली किस्त अक्टूबर में आ सकती है। 8 नवंबर को दिवाली है। ऐसे में उम्मीद है कि सरकार उससे पहले ही 24वीं किस्त जारी करके किसानों को दिवाली का तोहफा दे सकती है।

हालांकि, अभी सरकार की ओर से किसी पक्की तारीख का ऐलान नहीं हुआ। ऐसे में किसानों को सोशल मीडिया पर चल रहे दावों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, इस तरह के दावों में फर्जीवाड़ा हो सकता है।

पीएम किसान योजना में हर साल मिलते हैं 6,000 रुपये

पीएम किसान योजना के तहत पात्र किसानों को सालाना 6,000 रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है। यह पैसा 2,000 रुपये की तीन किस्तों में मिलता है। रकम सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में भेजी जाती है।

किसान योजना की वेबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन और पेमेंट स्टेटस भी चेक कर सकते हैं। इससे पता चल सकता है कि किस्त खाते में क्यों नहीं आई या भुगतान में कोई दिक्कत तो नहीं है।

पीएम किसान का पेमेंट स्टेटस कैसे चेक करें?

किसान घर बैठे ऑनलाइन अपनी किस्त का स्टेटस चेक कर सकते हैं। इसके लिए ये स्टेप्स अपनाएं।

  • सबसे पहले https://pmkisan.gov.in/ पर जाएं।
  • वेबसाइट पर Know Your Status विकल्प पर क्लिक करें।
  • अपना पीएम किसान रजिस्ट्रेशन नंबर दर्ज करें।
  • स्क्रीन पर दिख रहा कैप्चा कोड भरें।
  • Get OTP पर क्लिक करें और ओटीपी के जरिए वेरिफिकेशन पूरा करें।

इसके बाद स्क्रीन पर रजिस्ट्रेशन और भुगतान से जुड़ी जानकारी दिख जाएगी।

किन वजहों से अटक सकती है किस्त?

अगर आपने पीएम किसान योजना की पात्रता से जुड़ी शर्तें नहीं पूरी की है, तो आपकी 24वीं किस्त अटक सकती है। सबसे पहले पेमेंट स्टेटस चेक करें। इसके बाद देखें कि आपकी तरफ से कोई जरूरी प्रक्रिया अधूरी तो नहीं है। किसानों को खास तौर पर इन बातों की जांच करनी चाहिए:

  • रजिस्ट्रेशन में दर्ज जानकारी सही है या नहीं।
  • ई-केवाईसी पूरी हुई है या नहीं।
  • जमीन के रिकॉर्ड का सत्यापन हुआ है या नहीं।
  • आधार कार्ड बैंक खाते से लिंक है या नहीं।

अगर इनमें से कोई प्रक्रिया अधूरी है, तो उसे संबंधित आधिकारिक माध्यम से पूरा कराएं। साथ ही, 24वीं किस्त से जुड़ी नई जानकारी के लिए पीएम किसान की वेबसाइट चेक करते रहें।

हॉलीवुड सिंगर बोलीं- CJP को अमेरिका से फंडिंग मिल रही:भारत में अशांति फैलाने की कोशिश कर रहे; मोदी समर्थकों से एकजुट होने की अपील

हॉलीवुड सिंगर मैरी मिलबेन ने कॉकरोच जनता पार्टी पर अमेरिका से फंडिंग मिलने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि PM नरेंद्र मोदी के विरोधी अमेरिकी डोनर्स अभिजीत दीपके को पैसा भेज रहे हैं। उनके मुताबिक इस पैसे का इस्तेमाल भारत में अशांति फैलाने और सरकार के काम में रुकावट डालने के लिए किया जा रहा है। मिलबेन ने X पर पोस्ट कर भारत के युवाओं से आवाज उठाने की अपील की। उन्होंने लिखा, ‘यह चुप रहने का समय नहीं है।’ मिलबेन बोलीं- PM मोदी बाहरी ताकतों के आगे नहीं झुकेंगे मिलबेन ने दावा किया कि फंडिंग करने वाले कुछ अमेरिकी दुनियाभर के दक्षिणपंथी नेताओं को निशाना बनाने का एक तय तरीका अपनाते हैं। उन्होंने आरोप लगाया, ‘ऐसे लोग किसी देश में अमेरिका से पढ़े व्यक्ति को ढूंढते हैं, उसे कट्टर बनाते हैं, वापस उसके देश भेजते हैं और अराजकता व तबाही फैलाने के लिए फंड करते हैं।’ मिलबेन ने प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक सफर का बचाव करते हुए कहा कि वह 25 साल से सरकार में रहकर लोगों की सेवा कर रहे हैं और 12 साल से प्रधानमंत्री हैं। वह अमेरिका से आने वाली ऐसी ताकतों के आगे नहीं झुकेंगे। 4 मौकों पर मिलबेन ने मोदी को सपोर्ट किया 1. किसान आंदोलन पर: मिलबेन ने फरवरी 2021 में किसान आंदोलन के दौरान मोदी सरकार के कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए कहा था कि उन्हें किसानों की जिंदगी बेहतर बनाने के मोदी के विजन पर भरोसा है। 2. मणिपुर हिंसा पर: अगस्त 2023 में मणिपुर हिंसा के मुद्दे पर भी उन्होंने मोदी का समर्थन किया था। उन्होंने उस समय कहा था कि भारत को अपने नेता पर भरोसा है और मोदी मणिपुर के लोगों की आजादी के लिए लड़ेंगे। 3. BBC की गुजरात दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री पर: मिलबेन ने BBC की डॉक्यूमेंट्री ‘India: The Modi Question’ की आलोचना करते हुए मोदी सरकार का समर्थन किया था। 2023 में आई इस डॉक्यूमेंट्री में 2002 के गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। 4. CAA कानून पर: मार्च 2024 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू होने पर भी मिलबेन ने मोदी सरकार के फैसले की तारीफ की थी। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भारतीय मतदाताओं से मोदी को वोट देने की अपील भी की थी। भारत में भी CJP फंडिंग पर उठे थे सवाल दीपके ने कहा था- CJP का खर्च दोस्त मिलकर उठाते हैं कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके विदेशी फंडिंग के आरोपों को खारिज कर चुके हैं। CJP के आंदोलनों के खर्च पर दीपके ने कहा था कि वह और उनके दोस्त मिलकर पैसा जुटाते हैं। उनके मुताबिक, संगठन को किसी बाहरी डोनर या बड़े उद्योगपति से आर्थिक मदद नहीं मिली है। आगे उन्होंने क्राउडफंडिंग से पैसा जुटाने की योजना भी बताई थी। विदेशी फंडिंग के आरोपों पर दीपके ने गृह मंत्री अमित शाह से भी सवाल किया था। उनका कहना था कि अगर आंदोलन में विदेशी पैसा आया है, तो इसकी जांच और रोकथाम की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है। 10 अक्टूबर को हुए दिल्ली प्रदर्शन पर हार्वर्ड के दो बयान दिल्ली में 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्रों के दो समूहों ने अलग-अलग बयान जारी किए। पहले समूह ने पुलिस पर प्रदर्शनकारियों के साथ बर्बरता, गैरकानूनी हिरासत और संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया। 12 अक्टूबर को जारी इस बयान पर 100 पूर्व छात्रों ने हस्ताक्षर किए थे। वहीं, बुधवार को जारी दूसरे बयान पर 44 लोगों के हस्ताक्षर हैं। खुद को ‘हार्वर्ड कम्युनिटी’ बताने वाले इस समूह ने भारत की संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ कथित अभियान पर चिंता जताई। इसमें चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय और संसद के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाने की कोशिशों का जिक्र किया गया। ———————— यह खबर भी पढ़ें… दिल्ली में प्रदर्शन पर वर्ल्ड मीडिया: अल-जजीरा ने लिखा- सरकार के लिए सबसे गंभीर चुनौती, NYT बोला- विरोध को दबाना मुश्किल भारत में SIR को लेकर विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

इंतजार की नसीहत, पर कीमत किसे चुकानी?

मजूदूर, नौजवान, वोट अधिकार के लिए लडता व्यक्ति तीनों नागरिक हैं। तीनों व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं। मगर व्यवस्था के पास समय ही समय है। वह विचार करती रह सकती है, फाइल चला सकती है, समिति बना सकती है, जांच बैठा सकती है। तब तक नागरिक के हाथ से अवसर निकल चुका होता है। एक तरफ प्रक्रिया पर अधिकार रखने वाली सत्ता है। दूसरी तरफ इंतजार की कीमत चुकाता नागरिक।… सड़क सत्ता को सुनने के लिए मजबूर कर सकती है। मगर सुनना, मानना और लागू करना तीन अलग-अलग बातें हैं।

जिस मजदूर की मजदूरी रोक दी गई है, उसे मस्टर रोल चाहिए। जिस नौजवान की परीक्षा रद्द हो गई है, उसे न्याय चाहिए, वह भी इससे पहले कि उसकी जिंदगी का एक और साल बर्बाद हो जाए। जिस मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है, उसे मतदान से पहले अपना नाम वापस चाहिए। जाहिर है 2014, 2019 और 2024 चुनाव हो जाने के बाद मिला आश्वासन फिर उसके किस काम का?

तीनों नागरिक हैं। तीनों व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं। मगर व्यवस्था के पास समय ही समय है। वह विचार करती रह सकती है, फाइल चला सकती है, समिति बना सकती है, जांच बैठा सकती है। तब तक नागरिक के हाथ से अवसर निकल चुका होता है। एक तरफ प्रक्रिया पर अधिकार रखने वाली सत्ता है। दूसरी तरफ इंतजार की कीमत चुकाता नागरिक।

नागरिक का समय घंटों में खर्च होता है। पढ़ाई के घंटे, कमाई के घंटे, परिवार की जिम्मेदारियों के घंटे। जबकि संस्थाओं का समय वर्षों में चलता है। उनके बजट सालाना हैं, नियुक्तियां वर्षों की हैं और जवाबदेही की कोई निश्चित घड़ी नहीं है। समय की यह असमानता ही सत्ता का ऐसा अवरोध है जिसे खड़ा करने के लिए पुलिस को बैरिकेड लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

सत्ता और नागरिक के बीच शिकायत की राजनीति का यह सबसे पुराना सच है। दिल्ली के जंतर मंतर पर 10 अक्टूबर की लामबंदी ने इसी सच को फिर सामने ला दिया है। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रही है। इससे पहले इसी संगठन के आंदोलन के बाद एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। सरकार से समझौता भी हुआ था। मगर उस समझौते की शर्तें कितनी पूरी हुईं, यह सवाल अभी समाप्त नहीं हुआ है।

अब सवाल है कि इस नए आंदोलन की सफलता किससे मापी जाएगी? जंतर मंतर पर कितनी भीड़ जुटी, कितने नारे लगे, किसने इस्तीफा दिया? या इससे कि भीड़ के घर लौट जाने के बाद नागरिकों को वास्तव में क्या अधिकार मिले और उनके इस्तेमाल की क्या गारंटी बनी?

यहीं लोकतंत्र की एक पुरानी पहेली सामने आती है।

फ्रांसीसी विचारक एलेक्सिस द तोकविल ने अपने जीवन के अंतिम सक्रिय वर्षों में फ्रांसीसी क्रांति के इसी विरोधाभास को समझने की कोशिश की थी। जिस क्रांति ने पुरानी राजसत्ता को ध्वस्त करने का संकल्प लिया, उसने उसी सत्ता की प्रशासनिक मशीनरी को क्यों बचाए रखा? कई मामलों में तो उसे और मजबूत क्यों बनाया?

राजा चला गया। मगर राजा के प्रशासन की आदतें नहीं गईं। नए शासकों को नागरिकों पर शासन करने की बनी-बनाई मशीन मिली। वह सुविधाजनक थी। इसलिए उन्होंने उसे बनाए रखा। शासन बदलते हैं, मगर शासन करने का ढंग आसानी से नहीं बदलता। सरकारें मौसम की तरह आती-जाती हैं। प्रशासन जलवायु की तरह बना रहता है।

लोग उस सत्ता के खिलाफ उठ खड़े होते हैं जिसका चेहरा उन्हें दिखाई देता है। मगर जिस व्यवस्था का चेहरा नहीं होता, वह अक्सर आंदोलन के बाद भी बची रहती है। सड़क पर आंदोलन किसी व्यक्ति के खिलाफ खड़ा होता है। मंत्री, मुख्य न्यायाधीश, चुनाव आयुक्त या प्रधानमंत्री। मगर संस्था अपनी प्रक्रियाओं के सहारे चलती है। प्रक्रिया का कोई चेहरा नहीं होता जिससे इस्तीफा मांगा जा सके।

एक इस्तीफा कुछ सप्ताह या महीनों में हासिल हो सकता है। लेकिन उस अधिकारी के जाने के बाद उसका उत्तराधिकारी भी उसी तरह काम करेगा या नहीं, यह तय करने वाली चीजें दूसरी हैं। सरकारी अनुबंध, रिकॉर्ड, रजिस्टर, अभिरक्षा के दस्तावेज, अपील की व्यवस्था और जवाबदेही के नियम।

इन्हें बदलने में साल लग सकते हैं। और इस काम को आगे बढ़ाने वाले लोग अक्सर वे होते हैं जिनका नाम कभी अखबारों की सुर्खियों में नहीं आता। तोकविल को लोकतंत्र में एक और खतरा दिखाई देता था। बराबरी का अधिकार पा चुके नागरिक अपने निजी जीवन में इतने व्यस्त हो सकते हैं कि सार्वजनिक मामलों की जिम्मेदारी धीरे-धीरे एक विशाल, सुविधाजनक और अभिभावक जैसी सत्ता को सौंप दें। वह सत्ता नागरिकों को सार्वजनिक जीवन की परेशानियों से मुक्त करने का दावा करती है। बदले में नागरिकों को उसके फैसलों पर निर्भर रहना पड़ता है। तोकविल के लिए लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान में नहीं थी। वह नागरिकों की आदतों में थी। खासकर मिलकर संगठन बनाने, हिसाब रखने, सार्वजनिक मामलों में भाग लेने और एक-दूसरे से जवाब मांगने की आदत में।

आज की युवा पीढ़ी रातोंरात लाखों लोगों को एक मंच पर जुटा सकती है। उसने लोकतंत्र का आधा सबक सीख लिया है। बाकी आधा सबक कहीं अधिक कठिन है। वह है आंदोलन के बाद भी संगठित रहना। सरकार के वादों का हिसाब रखना। कानून के मसौदे पढ़ना। संस्थाओं को जवाब देने के लिए बाध्य करना। और ऐसा तंत्र बनाना जिसमें नागरिक को अपने अधिकार के लिए हर बार सड़क पर उतरना न पड़े।

क्या यह संभव है?

भारत के अपने इतिहास में इसके दो उदाहरण हैं। दोनों आंदोलनों ने लंबा संघर्ष किया। दोनों ने सरकारों को अपनी मांग सुनने के लिए मजबूर किया। मगर दोनों के परिणाम एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रहे। पहला उदाहरण राजस्थान का है।

राजस्थान के गांवों में मजदूरों को संदेह था कि उनके नाम पर सरकारी धन निकाला जा रहा है, जबकि उन्हें पूरी मजदूरी नहीं मिल रही। उन्हें जानना था कि सरकारी रिकॉर्ड में किसके नाम कितनी मजदूरी दर्ज है, किस काम पर कितना खर्च हुआ और पैसा किसे मिला। मजदूर किसान शक्ति संगठन, यानी एमकेएसएस, ने मस्टर रोल, बिल और भुगतान के वाउचर सार्वजनिक करने की मांग उठाई।

फिर जनसुनवाई का तरीका अपनाया गया। सरकारी कागजों में दर्ज हिसाब गांववालों के सामने पढ़ा जाता। लोग बताते कि वास्तव में किसने काम किया था, कितना काम हुआ था और किसे मजदूरी मिली थी। एक तरफ सरकारी रिकॉर्ड था। दूसरी तरफ गांववालों का अपना अनुभव।

कागज पहली बार प्रशासन की शक्ति के बजाय नागरिक के हाथ में सबूत बनने लगा। यही उस आंदोलन की असली उपलब्धि थी। मजदूर केवल मजदूरी नहीं मांग रहा था। वह सरकार के अपने रिकॉर्ड के आधार पर सरकार को गलत साबित करने का अधिकार मांग रहा था।

अप्रैल 1995 में राजस्थान के मुख्यमंत्री ने स्थानीय विकास कार्यों के रिकॉर्ड तक पहुंच देने की घोषणा की। मगर घोषणा और अधिकार में फर्क था। एक साल बाद मजदूर किसान शक्ति संगठन ने सरकार पर वादा तोड़ने का आरोप लगाते हुए ब्यावर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। धरना लगभग चालीस दिन चला।

मई में आंदोलन जयपुर पहुंचा तो सरकार ने एक समिति बना दी। दो महीने में निर्णय का आश्वासन भी दिया। समिति बन गई। मांग स्वीकार कर ली गई। मगर अधिकार फिर भी सुनिश्चित नहीं हुआ।

सरकारी समिति आखिर क्या है? इंतजार कराने का एक ऐसा कमरा जिसके दरवाजे पर पीतल की नामपट्टी लगी होती है। राजस्थान का आंदोलन इस कमरे में बंद होकर समाप्त हो सकता था। मगर ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि आंदोलन ने सड़क से आगे जाने का रास्ता खोज लिया था।

ब्यावर के धरने से सूचना के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान का विस्तार हुआ। स्थानीय मजदूरों की लड़ाई कानून बनाने की राष्ट्रीय लड़ाई से जुड़ गई। 1996 के अंत तक इस अभियान और न्यायमूर्ति पी. बी. सावंत की अध्यक्षता वाली भारतीय प्रेस परिषद ने सूचना के अधिकार का एक आदर्श विधेयक तैयार कर लिया था।

दिसंबर 2002 में संसद ने सूचना की स्वतंत्रता का कानून पारित किया। मगर उसे लागू ही नहीं किया गया। फिर जुलाई 2004 में राष्ट्रीय अभियान ने नवगठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सामने अपनी सिफारिशें रखीं। लंबी बहस चली। इस पर विवाद हुआ कि नागरिक वास्तव में कौन से दस्तावेज मांग सकेंगे, अधिकारी किस आधार पर जानकारी रोक सकेंगे और सूचना न देने पर क्या कार्रवाई होगी।

आखिर 15 जून 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। ध्यान देने की बात है कि ब्यावर के मूल आंदोलनकारियों को इस पूरे समय सड़क पर बैठे रहने की जरूरत नहीं पड़ी। उनकी मांग अब एक ऐसी प्रक्रिया में बदल चुकी थी जिसे देश का कोई भी नागरिक इस्तेमाल कर सकता था।

कानून ने सूचना मांगने, इनकार के खिलाफ अपील करने और दोषी सूचना अधिकारियों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था दी। केंद्रीय सूचना आयोग के अनुसार अपील में सूचना देने से इनकार का औचित्य साबित करने की जिम्मेदारी अधिकारी की होती है और आयोग के निर्णय बाध्यकारी होते हैं। यानी नागरिक को ऐसा अधिकार मिला जिसे इस्तेमाल करने के लिए हर बार भीड़ जुटाने की जरूरत नहीं थी।

किसी आंदोलन की स्थायी सफलता इसी क्षण शुरू होती है। जब उसकी मांग एक ऐसी व्यवस्था बन जाए जिसका लाभ वे लोग भी उठा सकें जिन्होंने आंदोलन में कभी हिस्सा नहीं लिया। मगर यह सफलता भी पूरी नहीं थी।

सूचना का अधिकार कानून के बीस वर्ष पूरे होने के समय जारी 2024-25 की रिपोर्ट में बताया गया कि देशभर के सूचना आयोगों में लगभग 4.3 लाख अपीलें और शिकायतें लंबित थीं। केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त का पद खाली था और केवल दो आयुक्त काम कर रहे थे।

अधिकार बीस वर्ष तक बचा रहा। मगर समय पर न्याय मिलने की गारंटी आज भी सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित नहीं हो सकी। यानी कानून बन जाने के बाद भी लड़ाई समाप्त नहीं होती। अब दूसरा उदाहरण देखिए।

मणिपुर की इरोम शर्मिला ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम, यानी अफस्पा, के खिलाफ वर्ष 2000 में अनशन शुरू किया। उनका अनशन अगस्त 2016 तक चला। लगभग सोलह वर्ष। उनका आंदोलन अकेला नहीं था। मणिपुर में 2004 के विरोध प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार ने न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में समिति बनाई। समिति ने 2005 में अफस्पा को समाप्त करने की सिफारिश की। उसका सुझाव था कि कुछ आवश्यक प्रावधान गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम में शामिल किए जा सकते हैं।

समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। 2008 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने दर्ज किया कि सरकार ने उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई नहीं की थी। 2013 में पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि सेना इस कानून में किसी भी संशोधन का बहुत कड़ा विरोध कर रही थी। इस कारण सरकार के लिए आगे बढ़ना कठिन था।

एक विश्लेषक के अनुसार समिति की रिपोर्ट आने के बाद पूर्वोत्तर में आंदोलन की तीव्रता भी कम हुई। जब इरोम शर्मिला ने अपना अनशन समाप्त किया, तब भी उनकी मूल मांग पूरी नहीं हुई थी।

यह राजस्थान के सूचना अधिकार आंदोलन जैसी परिस्थितियों वाला संघर्ष नहीं था। यहां सवाल राज्य की सुरक्षा शक्तियों का था। उस संस्था का था जिसके अधिकार स्वयं विवाद का विषय थे और जो उन्हें छोड़ना नहीं चाहती थी। आंदोलन सरकार को सुनने के लिए मजबूर कर सकता था। समिति बनवा सकता था। अपने पक्ष में सरकारी सिफारिश भी हासिल कर सकता था।

मगर कानून नहीं बदलवा सका। यानी लगातार संघर्ष अपने आप सफलता की गारंटी नहीं है। आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक व्यवस्था में रास्ता भी होना चाहिए। जहां निर्णायक संस्थाएं परिवर्तन रोकने पर अड़ी हों, वहां केवल नैतिक शक्ति और जनसमर्थन पर्याप्त नहीं होते।

राजस्थान में मजदूरों ने सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंच हासिल की। मणिपुर में सोलह वर्ष का अनशन भी कानून को नहीं बदल सका। दोनों अनुभव लोकतंत्र की एक कठिन सच्चाई बताते हैं।

सड़क सत्ता को सुनने के लिए मजबूर कर सकती है। मगर सुनना, मानना और लागू करना तीन अलग-अलग बातें हैं।

अब फिर जंतर मंतर पर लौटिए। कॉकरोच जनता पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांग रही है। मगर पिछले चार वर्षों में भारत के तीन पड़ोसी देशों में सड़कों ने इससे कहीं अधिक हासिल किया है। एक देश में राष्ट्रपति को भागना पड़ा। दूसरे में प्रधानमंत्री की सत्ता समाप्त हुई। तीसरे में सरकार एक दिन के भीतर गिर गई।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल। तीनों देशों में जनता ने सत्ता के शिखर को हिला दिया।

मगर असली सवाल वही है। जिस दिन शासक चला जाता है, उस दिन आंदोलन को वास्तव में क्या हासिल होता है? क्या शासन बदलता है? क्या शासन करने का तरीका बदलता है? क्या प्रशासन बदलता है? क्या नागरिक के अधिकार बदलते हैं? या केवल सत्ता की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बदल जाता है?

राजस्थान और मणिपुर के अनुभवों के बाद दक्षिण एशिया के इन तीन आंदोलनों को समझना इसलिए जरूरी है।क्योंकि सत्ता गिरा देना और सत्ता को जवाबदेह बना देना एक ही बात नहीं है। (जारी)