भाजपा के वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश माथुर केरल के राज्यपाल नियुक्त

राज्यपालों के फेरबदल के तहत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा के पूर्व सदस्य ओम प्रकाश माथुर को केरल का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। वे राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर की जगह लेंगे।

केरल में नियुक्ति से पहले सिक्किम के राज्यपाल रह चुके श्री माथुर का भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में लंबा करियर रहा है और उन्होंने राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कई अहम पदों पर काम किया है। उनके राजनीतिक अनुभव में कई राज्यों में चुनाव प्रबंधन, राज्यसभा में दो कार्यकाल और पार्टी के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष के तौर पर काम करना शामिल है। दो जनवरी 1952 को राजस्थान के पाली जिले के बेडल गांव में जन्मे माथुर ने राजस्थान विश्वविद्यालय से स्नातक किया।

उन्होंने 1972 में प्रचारक के तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) के साथ अपना सफर शुरू किया और 1979 तक राजस्थान के विभिन्न जिलों में काम किया। 1979 से 1989 तक उन्होंने किसान संघ के ‘संगठन मंत्री’ के तौर पर काम किया।

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उनके आधिकारिक प्रोफाइल में यह भी दर्ज है कि आपातकाल के दौरान उन्हें 11 महीने जेल में रहना पड़ा था। इसके बाद श्री माथुर राजस्थान में भाजपा के संगठनात्मक पदों पर आगे बढ़े और 1989 से 2002 तक महासचिव (संगठन) रहे। उन्होंने अखिल भारतीय सचिव और महासचिव समेत राष्ट्रीय स्तर की कई जिम्मेदारियां संभालीं और 1989 से 2024 तक पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में काम किया। उन्हें 2008 में भाजपा राजस्थान का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया और उसी साल वे राज्यसभा सदस्य के तौर पर संसद पहुंचे। उन्होंने 2008 से 2014 तक अपना पहला कार्यकाल पूरा किया और 2016 से 2022 तक दूसरे कार्यकाल के लिए उच्च सदन में लौटे; इस दौरान वे सदन की समिति के अध्यक्ष भी रहे।

श्री माथुर ने 2015 से 2022 तक भाजपा के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष के तौर पर काम किया। वे 2022 से 2024 तक पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य भी रहे। उनके संगठनात्मक कार्यों में अपने करियर के अलग-अलग समय पर मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भाजपा की गतिविधियों और चुनाव अभियानों की देखरेख करना शामिल था। इन जिम्मेदारियों से उन्हें अलग-अलग राज्यों में पार्टी संगठन और चुनावी प्रबंधन का व्यापक अनुभव मिला। उनकी नियुक्ति से केरल लोक भवन में बदलाव हुआ है, क्योंकि राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया है, जबकि दुष्यंत गौतम सिक्किम के राज्यपाल के तौर पर माथुर की जगह लेंगे।

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5 बकरियों से खड़ा किया ₹18 लाख का स्टार्टअप! बकरी के दूध से साबुन-घी भी बनाते हैं युवा किसान संदीप

Goat Milk Startup: अक्सर लोग पढ़-लिखकर नौकरी करना या अपनी पढ़ाई की स्किल से अपने लिए काम की तलाश करते हैं लेकिन जब जीवन में संकट का दौर आता है तो पढ़ाई लिखाई और स्किल भी धुंधली पड़ जाती हैं लेकिन संकट के बीच से निकलकर लोग अपने लिए नए रास्ता निकालते हैं।

कुछ ऐसी ही कहानी जयपुर के युवा किसान और एंटरप्रेन्योर संदीप मीणा की है जिन्होंने अपने घर के बाड़े से 5 बकरियों से दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स के स्टार्टअप GoatVeda की शुरुआत की और आज इनकी कंपनी का टर्नओवर 18 लाख रुपए है। जयपुर के नजदीक जोबनेर कस्बे के डूंगरीकलां गांव के रहने वाले संदीप कुमार मीणा ने खेती और बकरी पालन के साथ अपने स्टार्टअप की ऐसी जर्नी शुरू की जो अब अन्य युवाओं को प्रेरित कर रही है।

संदीप एक सामान्य परिवार से आते हैं उनके जीवन में सबकुछ ठीक चल रहा होता लेकिन कोरोनाकाल में पिता का निधन और प्राइवेट नौकरी पर गहराए संकट ने संदीप कुमार मीणा के जीवन को अलग दिशा में मोड़ दिया जो आज युवाओं के लिए मिसाल है। संदीप मीणा के पिता राम मीणा पत्थर का काम करते थे और सिलिकोसिस बीमारी से पीड़ित थे। कोरोना काल में 2021 में उनका निधन हो गया।

पिता की असामयिक मृत्यु के बाद घर की जिम्मेदारी संदीप के कंधे पर आ गई। परिवार की आर्थिक स्थिति और प्राइवेट नौकरी को छोड़कर संदीप ने अपनी मां कमला देवी के साथ 2022 में वर्क फ्रॉम होम के साथ अपने स्टार्टअप की शुरुआत की।

संदीप ने 5 बकरियों से शुरू किया था ‘गोटवेदा’ स्टार्टअप

वेटरनरी में दो साल का डिप्लोमा और कुछ महीनों की नौकरी के बाद संदीप कुमार मीणा एक समय एग्रीकल्चर में बीएससी करना चाहते थे। लेकिन 4 साल का लंबा समय और परिवार की स्थिति को देखते हुए उन्होंने अपने घर के बाड़े से ही ‘गोटवेदा’ स्टार्टअप की शुरुआत की, कोरोनाकाल में लगातार दूध की डिमांड को देखते हुए संदीप को इस स्टार्टअप का आइडिया आया। जिसके बाद उन्होंने कुछ समय तक इस स्टार्टअप के वर्क और मार्केट को समझा और फिर बिल्कुल छोटे रूप में शुरुआत की।

आज संदीप के पास जयपुर की रजिस्टर्ड ब्रीड गुर्जर और सिरोही नस्ल की कई बकरियां हैं। बकरी पालन में अक्सर किसान और पशुपालक बकरियों को दो तरीकों से पालते हैं, एक बकरियों को फार्म में बांधकर ब्रीडिंग और मांस के लिए जिसके पालन में खर्च ज्यादा आता है, जबकि ग्रेजिंग में कम खर्च आता है।

संदीप ने ग्रेजिंग के अनुसार बकरियों के पालन की शुरुआत की जिसमें बकरियों के भोजन/चारे के लिए संदीप ने 100 अरडू के पौधे लगाए, जिनकी पत्तियों को बकरियां बड़े चाव से खाती हैं। इससे बकरियों में दूध भी बढ़ता है। इस प्रकार संदीप ने बकरी पालन के साथ पेड़ों से भी अतिरिक्त इनकम बनाना शुरू किया।

संदीप के इस स्टार्टअप का मुख्य आकर्षण यह है कि बकरी का दूध खास तौर पर उन बच्चों के लिए लिया जाता है, जिन्हें गाय, भैंस के दूध से एलर्जी होती है। इसलिए बकरी का दूध पचने में हल्का होता है और यह शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है इसलिए डेंगू जैसी बीमारियों में डॉक्टर भी बकरी का दूध पीने की सलाह देते हैं। इसी के चलते संदीप ने दूध के साथ दूध से ही कई प्रोडक्ट्स बनाए जिनकी अब मार्केट में खूब डिमांड रहती है।

ऑनलाइन मार्केट से ग्राहकों को जोड़ खड़ा किया लाखों का स्टार्टअप

संदीप कुमार मीणा ने अपने स्टार्टअप की शुरुआत भले ही छोटे रूप में की हो लेकिन दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स को मार्केट तक पहुंचाने के लिए संदीप ने अपनी शुरुआत जयपुर में चित्रकूट स्टेडियम के पास लगने वाले ऑर्गेनिक मार्केट में दूध की स्टॉल लगाकर की और यहां संदीप ने 250 रुपए लीटर के हिसाब से अपना दूध बेचा।

ऐसे धीरे-धीरे संदीप को शुरुआती दौर में ग्राहक मिले और उन्हें बाजार का अनुभव मिला। वैसे दूध महंगा होने के चलते शुरुआत में उनके दूध की डिमांड कम रही लेकिन संदीप ने अपने स्टार्टअप पर लगातार फोकस किया और धीरे-धीरे किसानों को अपने साथ जोड़ा और ऑनलाइन मार्केट तक पहुंचे।

आज संदीप एक बकरी से रोजाना करीब एक से डेढ़ लीटर दूध प्राप्त करते हैं तो हर दिन उनके पास लगभग 70 से 80 किलो दूध का उत्पादन होता है। साथ ही संदीप के इस स्टार्टअप से अब कई किसान और जुड़ गए हैं। संदीप अब अपने स्टार्टअप में दूध उत्पादन और प्रोडक्ट्स बनाने के अलावा गांवों में पशुपालन करने वाले किसानों को पशु चिकित्सा सेवाएं और बकरियों-भेड़ों के लिए खरीद/बिक्री, किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और सहायता, ऋण, बीमा और एआई सेवाओं तक गोटवेदा सिर्फ एक ब्रांड नहीं है बल्कि एक सफल स्टार्टअप बन चुका है।

5 बकरियों से खड़ा किया ₹18 लाख का स्टार्टअप!

बकरियों के दूध से संदीप तैयार करते हैं ये खास प्रोडक्ट्स

संदीप अपने प्रोसेसिंग यूनिट में दूध से कई बेहतरीन प्रोडक्ट्स तैयार करते हैं, जिनकी ई-कॉमर्स मार्केट में भारी डिमांड रहती है:

पाउडर: 500 लीटर दूध से बल्क में पाउडर बनवाया जाता है, जिसकी रोजाना 25 से 30 लीटर बिक्री होती है।

साबुन: हर महीने करीब 300 साबुन बनाए जाते हैं, जिसकी कीमत 30 रुपए है।

पनीर: 2 लीटर दूध से 300 ग्राम पनीर तैयार किया जाता है, जिसकी डिलीवरी ऑर्डर्स के हिसाब से की जाती है।

अन्य प्रोडक्ट्स: दूध और घी की भी ग्राहकों के बीच खूब मांग रहती है।

रिपोर्ट: अंकित राजपूत

ट्रंप ने जेलेंस्की पर शांति समझौते के लिए दबाव बढ़ाया

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की पर रूस के साथ समझौता करने के लिए दबाव बढ़ा दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की फिलहाल राष्ट्रपति जेलेंस्की की तुलना में समझौता करने में अधिक रुचि है।

श्री ट्रंप ने पत्रकारों से कहा श्री जेलेंस्की को समझौता करने पर ध्यान देना चाहिए न कि उस बारे में बात करने पर। हमें श्री जेलेंस्की को समझौता करने के लिए तैयार करना होगा। 

इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने दोनों पक्षों की सीधी तुलना करते हुए कहा मुझे लगता है कि वास्तव में पुतिन, जेलेंस्की की तुलना में समझौता करने के लिए अधिक इच्छुक हैं।

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श्री ट्रंप ने रूस से डीज़ल आपूर्ति के संदर्भ में हुए अपने हालिया समझौते का बचाव किया। उन्होंने कुछ रिपब्लिकन नेताओं की आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि रूसी ईंधन के निर्यात पर रोक लगाने से वैश्विक बाजार को नुकसान होगा।

श्री ट्रंप ने कहा यह वास्तव में मेरे लिए कोई समझौता नहीं है बल्कि यह बाकी दुनिया के लिए एक समझौता है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने तर्क दिया कि डीज़ल की आपूर्ति सीमित करने से अंतरराष्ट्रीय ईंधन बाजार पर बहुत असर पड़ेगा और उन्होंने कहा कि वह ऐसे उपायों का समर्थन करते हैं जिनसे अमेरिकी किसानों और पशुपालकों को मदद मिल सके।

राष्ट्रपति ट्रंप की ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब अमेरिका यूक्रेन पर रूस के साथ बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने का दबाव बढ़ा रहा है और साथ ही डीजल समझौते के माध्यम से रूस के साथ ऊर्जा सहयोग भी बढ़ा रहा है।

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IMD Weather Update: 2-3 दिनों में उत्तर-पूर्वी मानसून की दस्तक, IMD ने भारत के इन 6 राज्यों में 5 दिनों तक दिया भारी बारिश का अलर्ट

IMD Weather Update: देश के कई हिस्सों में मौसम एक बार फिर बदलने वाला है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक, आज दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय इलाकों में अगले 2 से 3 दिनों में उत्तर-पूर्वी मानसून की बारिश शुरू हो सकती है। आईएमडी के मुताबिक, उत्तर-पूर्वी मानसून के सक्रिय होने के बाद दक्षिणी प्रायद्वीपीय इलाकों में अगले पांच से छह दिनों तक बारिश का दौर जारी रह सकता है। इस दौरान कई क्षेत्रों में लगातार बारिश होने की संभावना है। आइए जानते हैं आपके शहर को लेकर क्या है आईएमडी का अपडेट

इन राज्यों में होगी तेज बारिश

IMD के मुताबिक, 15 से 18 अक्टूबर के बीच केरल और माहे, तटीय और दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक, तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल के साथ-साथ तटीय आंध्र प्रदेश में कुछ जगहों पर भारी बारिश हो सकती है। वहीं, 17 और 18 अक्टूबर को उत्तर आंतरिक कर्नाटक में और 15 व 16 अक्टूबर को रायलसीमा में भी कुछ स्थानों पर भारी बारिश होने की संभावना जताई गई है। विभाग के अनुसार, इस दौरान दक्षिण भारत के कई इलाकों में बारिश बढ़ सकती है। वहीं, दक्षिण-पश्चिम मानसून अब देश के बचे हुए हिस्सों से भी धीरे-धीरे वापस लौट रहा है।

दिल्ली में कैसा होगा मौसम

देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर में सोमवार की सुबह भारी बारिश हुई है। वहीं बारिश से प्रदुषण और गर्मी से राहत मिली है। वहीं आने वाले दिनों में भी दिल्ली में बारिश के आसार है। दिल्ली-एनसीआर, पंजाब और हरियाणा में 12 से 15 अक्टूबर के बीच तेज हवाओं के साथ बारिश का दौर जारी रहने की संभावना है। इस दौरान हवाओं की रफ्तार 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है, जबकि कुछ जगहों पर झोंके 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक चल सकते हैं।

कैसा होगा यूपी का मौसम

जम्मू-कश्मीर में 13 और 15 अक्टूबर, जबकि हिमाचल प्रदेश में 14 और 15 अक्टूबर को कई इलाकों में बारिश और बर्फबारी का अनुमान है। उत्तर प्रदेश में भी मौसम में बदलाव देखने को मिल रहा है। पश्चिमी यूपी में 11 से 16 अक्टूबर के बीच हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। वहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश में 15 और 16 अक्टूबर को बारिश होने की संभावना जताई गई है।

दो तरह के होते है मानसून

भारत में मानसून मुख्य रूप से दो तरह का होता है, जिनमें दक्षिण-पश्चिम मानसून सबसे अहम माना जाता है। ये आमतौर पर जून से सितंबर के बीच सक्रिय रहता है और केरल के रास्ते देश में प्रवेश करने के बाद धीरे-धीरे अलग-अलग हिस्सों में पहुंचता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून देश के मौसम और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बेहद जरूरी है। इससे गर्मी से राहत मिलने के साथ बारिश होती है, जिसका सीधा फायदा खेती-किसानी को मिलता है। खासकर खरीफ फसलों के लिए यह बारिश बेहद महत्वपूर्ण होती है और इसका असर देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ पर्यावरण पर भी पड़ता है।

जानें क्या है लौटता हुआ मानसून

भारत में मानसून का दूसरा प्रमुख दौर उत्तर-पूर्वी मानसून कहलाता है, जिसे लौटता हुआ मानसून भी कहा जाता है। ये आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच सक्रिय रहता है और इसका असर खासतौर पर दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय इलाकों में देखने को मिलता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की तुलना में इसकी बारिश कम होती है, लेकिन खेती के लिए इसका महत्व काफी ज्यादा है। उत्तर-पूर्वी मानसून से मिलने वाली बारिश दक्षिण भारत के कई हिस्सों में पानी की जरूरत पूरी करती है और रबी फसलों की अच्छी बढ़त में भी मदद करती है।

5 मिनट में 1 एकड़ में छिड़काव, खर्च सिर्फ 100 रुपये! गुजरात के वडोदरा में कृषि ड्रोन ने बदली किसानों की तकदीर

वडोदरा (गुजरात) (ANI)। गुजरात के वडोदरा जिले में किसान अब ड्रोन से फसलों पर खाद का छिड़काव कर रहे हैं। इससे कम समय में खेत का काम पूरा हो जाता है और किसानों की मेहनत भी कम लगती है। सरकार की मदद से किसान कम खर्च में इस सुविधा का फायदा उठा रहे हैं।

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ड्रोन की मदद से कम समय में खेत में छिड़काव किया जा सकता है। इससे किसानों को भारी मशीनें लेकर खेत में घूमना नहीं पड़ता। ड्रोन से नैनो यूरिया और नैनो DAP का छिड़काव भी किया जा रहा है। किसान रस्मिकभाई बिनुभाई पटेल ने बताया कि ड्रोन से एक एकड़ खेत में करीब पांच मिनट में छिड़काव हो जाता है। इससे किसानों का समय बचता है और खर्च भी कम होता है।

वडोदरा जिला पंचायत के कृषि सहायक निदेशक हिरेन पी. थंकी ने बताया कि ड्रोन से छिड़काव करवाने पर किसानों को हर एकड़ के लिए 500 रुपये की मदद मिलती है। किसानों को इसके लिए सिर्फ 100 रुपये प्रति एकड़ खर्च करने होते हैं।

इस सुविधा के मुख्य फायदे हैं:

• कम समय में खेत पर छिड़काव।

• भारी सामान उठाने और ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती।

• सरकारी सब्सिडी से कम खर्च में सेवा।

• नैनो यूरिया और नैनो DAP के छिड़काव में मदद।

सरकार की मदद से लोगों को ड्रोन चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। किसान केवल कुमार चौधरी ने बताया कि उन्हें ट्रेनिंग के साथ ड्रोन भी मिला है। अब वह इससे किसानों के खेतों में नैनो यूरिया और नैनो DAP का छिड़काव करते हैं। ड्रोन ऑपरेटर अचल पटेल कहते है कि इससे कम समय में ज्यादा खेतों में छिड़काव हो जाता है।

गुजरात सरकार खेती के लिए ड्रोन खरीदने वालों को 5 लाख रुपये की मदद दे रही है। इसके लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होती है। इनमें वेलिड ड्रोन पायलट लाइसेंस होना भी जरूरी है।

जिले में 5 से 7 हजार किसानों को फायदा

नितिन वसावा के मुताबिक, वडोदरा जिले में करीब पांच ऑर्गेनाइजेशन ड्रोन से छिड़काव की सर्विस दे रही हैं। लगभग 5,000 से 7,000 किसान अब तक इसका लाभ ले चुके हैं।

ड्रोन से छिड़काव होने से किसानों का काम आसान हो रहा है। इसके साथ ही गांव के युवाओं को ड्रोन चलाने और किसानों की मदद करने का काम भी मिल रहा है।

गन्ने की नई किस्म CoS.23232 की भारी डिमांड, 5 मिनट में खत्म हुआ पूरा स्टॉक; जानें क्यों है खास

लखनऊ : PTI के अनुसार, उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों में इन दिनों गन्ने की नई किस्म CoS.23232 को लेकर जबरदस्त उत्साह है। बुकिंग शुरू होने के महज पांच मिनट के भीतर ही इसका पूरा शुरुआती स्टॉक बुक हो गया, जिससे बड़ी संख्या में किसान बीज हासिल करने से चूक गए। इस नई किस्म को उत्तर प्रदेश की लोकप्रिय गन्ना किस्म Co.0238 के संभावित विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

5 मिनट में 2 लाख Buds खत्म, क्यों मची लूट?

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद (UPCSR) ने 9 अक्टूबर को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर इस नई वैरायटी की ऑनलाइन बुकिंग शुरू की थी। परिषद ने सिर्फ 2 लाख single buds बुकिंग के लिए रखे थे। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अरविंद कुमार के मुताबिक, बुकिंग खुलते ही 5 मिनट के अंदर पूरा स्टॉक बुक हो गया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसानों में इस वैरायटी को लेकर कितनी डिमांड है।

CoS.23232 में ऐसा क्या है खास?

किसानों की इस दीवानगी की 3 बड़ी वजह हैं:

1. 10% ज्यादा पैदावार: फील्ड ट्रायल में इस वैरायटी का औसत उत्पादन 95.56 टन प्रति हेक्टेयर रहा है, जो Co.0238 से 9.44% ज्यादा है। इसका गन्ना लंबा और मोटा है, जिससे प्रति क्विंटल वजन 10% ज्यादा बैठता है।

2. Red Rot से छुटकारा: UP में पिछले कुछ सालों में Co.0238 में रेड रॉट बीमारी लगने से पैदावार आधी हो गई थी। राज्य का चीनी उत्पादन 126 लाख टन से गिरकर 89 लाख टन पर आ गया था। CoS.23232 रेड रॉट रोधी है।

3. जल्दी पकने वाली किस्म: ये अगेती (early-maturing) वैरायटी है। किसान इसे जल्दी काटकर मिल में भेज सकते हैं, जिससे उन्हें पेमेंट भी जल्दी मिलेगा और चीनी मिलों को रिकवरी भी ज्यादा मिलेगी।

10 साल की मेहनत के बाद तैयार हुई वैरायटी

ये कोई रातों-रात तैयार बीज नहीं है। वैज्ञानिकों को इसे बनाने में 10-12 साल लगे हैं। इसे Coimbatore में CoS.8119 (Female) और Co.775 (Male) को क्रॉस करके बनाया गया है। इसके बाद सालों तक इसकी मिठास, पैदावार और बीमारी से लड़ने की क्षमता को परखा गया है। यूपी सरकार ने 29 सितंबर को ही इसे खेती के लिए मंजूर किया था। परिषद अब टिश्यू कल्चर और सिंगल बड तकनीक से इसका बीज तेजी से बढ़ा रहा है। अक्टूबर में होने वाले ‘मिठास मेला 2026’ में किसानों को इसके मिनी किट भी बांटे जाएंगे।

अनगिनत विद्रोह और वो बुनियादी सवाल!

शुरुआत के तीन दिन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं।… वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। इनके साथ जमीनी संघर्षों  को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने हाल में अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- “जून में हुए CJP प्रदर्शनों ने देश में असंख्य छोटे‑बड़े विद्रोहों को जन्म दिया है। (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई ‘वोट चोरी’ अब स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। यह हमारे लोकतंत्र की जड़ पर चोट करती है। सरकार की अपने ‘तोते’ ज्ञानेश को बचाने के लिए प्रदर्शनों को दबाने की कोशिशें उलटी पड़ रही हैं। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ रहा है, जो अब उबाल पर है।”

दरअसल, भूषण ने अंग्रेजी में लिखे इस पोस्ट में ‘million mutinies in the country’ लिखा, जिसका अनुवाद हमने ‘असंख्य छोटे-बड़े विद्रोहों’ के रूप में किया है। यह उपमा संभवतः उन्होंने मशहूर लेखक वी.एस. नॉयपॉल की पुस्तक A Million Mutinies Now से ली है। यह किताब नॉयपॉल की भारत संबंधी त्रि-कथा (Trilogy) की आखिरी रचना है, जो 1990 में प्रकाशित हुई थी।

नॉयपॉल की A Million Mutinies Now का सार है कि भारत की सतह पर दिखने वाली हलचल और उथल-पुथल किसी आने वाले विनाश का संकेत नहीं, बल्कि एक “बौद्धिक और सामाजिक जागरण” का परिणाम है। यह छोटे-छोटे विद्रोहों का ऐसा महा-समुद्र है, जो अंततः भारत को अपनी वास्तविक पहचान और स्वतंत्रता की ओर ले जा रहा है।

नायपॉल ने यह किताब 1980 के दशक में भारत यात्रा पर आने के बाद लिखी थी। यहां घूमते हुए उन्हें अहसास हुआ कि स्वतंत्रता के बाद का भारत अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां समाज के हर हिस्से में छोटे‑छोटे विद्रोह और असंतोष दिखाई देते हैं। लेकिन ये विद्रोह किसी बड़े क्रांतिकारी आंदोलन की तरह नहीं हैं, बल्कि जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़े संघर्ष हैं। नायपॉल ने इसे भारत के बदलते समाज का प्रतीक माना- जहां लोग अब चुप नहीं रहते, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं।

संदर्भ के लिए यह उल्लेख कर लेना उचित होगा कि नॉयपॉल दरअसल संप्रदाय, जाति, क्षेत्र एवं भाषा की पहचान जता रही गतिविधियों से प्रभावित थे, जिन्हें भारतीय नवजागरण के दौर में संकीर्ण एवं भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती समझा जाता था। नेहरूवादी नीतियों एवं भारतीय धर्मनिरपेक्षता के वे कड़े आलोचक थे। उनका मानना था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का उपयोग अक्सर ऐतिहासिक सच्चाइयों और मध्यकालीन (यानी मुस्लिम) आक्रमणों के घावों को छिपाने के राजनीतिक हथकंडे के रूप में किया गया। अपनी इसी सोच के आधार पर नॉयपॉल ने बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए हुए राम जन्मभूमि आंदोलन को भारत में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण के रूप में देखा।

इस रूप में समझा जाएगा कि नरेंद्र मोदी का शासन उस कथित “ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण” का ठोस परिणाम है। यानी आज देश जहां है, वह 1980-90 के दशकों की ‘Million Mutinies’ का परिणाम है। मगर अब बात जिन ‘Million Mutinies’ की हो रही है, वो दरअसल, उन परिणामों से बनी जकड़न से निकलने की जद्दोजहद की मिसाल हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल में इन ‘छोटे-मोटे विद्रोहों’ को साझा मंच प्रदान करने की एक सराहनीय पहल की। सत्याग्रह (http://rahulgandhi।in/satyagraha वेबसाइट की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखाः “देशभर में लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं- और अक्सर अकेले लड़ रहे हैं। Gen Z, छात्र, किसान, आदिवासी, दलित, महिलाएं- हर संघर्ष की अपनी कहानी है। पर जो आवाज़ अकेली उठती है, वो अक्सर दब जाती है। ‘सत्याग्रह’ इन्हीं आवाज़ों को एक नक्शे पर साथ लाने की पहल है। बापू ने यही सिखाया था- सच सबसे बड़ा हथियार है। पर उससे भी बड़ा हथियार है, एकता में सच के साथ खड़े होना। अगर आप भी किसी अन्याय से लड़ रहे हैं- अपनी कहानी भेजिए। दो मिनट लगेंगे। आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा- संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत हो वहां आपके साथ खड़े होकर- नेता विपक्ष के रूप में ये मेरी ज़िम्मेदारी है। अपने सत्याग्रह की कहानी मुझे यहां बताएं।”

इस पहल की शुरुआत के तीन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं। जबकि “वोट चोरी” से संबंधित जिस संघर्ष को प्रशांत भूषण ने “स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा” बताया है, उससे संबंधित सिर्फ 559 (सात अक्टूबर को दिन में एक बजे तक) शिकायतें दर्ज हुईं।

फिर भी यह निर्विवाद है कि वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन में उतरने और उसे मिले भारी समर्थन से जाहिर है कि अभिजात्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में भी “चुनावों को नियंत्रित” कर लिए जाने के आरोप को गंभीरता से लिया गया है। इस कारण मीडिया, सोशल मीडिया, और आम चर्चाओं में यह सवाल सर्वोपरि बना हुआ है।

इनके साथ जमीनी संघर्षों (जिनमें से कई ने राहुल गांधी की वेबसाइट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है) को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है। इनके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सामाजिक अस्थिरता की स्थिति है। आर्थिक दबाव और उस कारण जन्में संघर्षों की कहानी तो लगभग पूरे देश में साकार होती दिखती है। लेकिन उनका कोई सकल एवं राष्ट्र-व्यापी प्रभाव उभरता अभी तक नजर नहीं आया है।

इस सिलसिले में व्लादीमीर इलिच लेनिन का वो कथन अक्सर याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था- There are no people– yet there is a mass of people। इस पूरे कथन का सार था- “जनता बहुत है, असंतोष भी बहुत है, लेकिन नेतृत्व नहीं है। कामगार वर्ग और समाज के अलग‑अलग हिस्सों से हर साल असंतुष्ट लोग सामने आते हैं, जो विरोध करना चाहते हैं और निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष में मदद देने को तैयार हैं। पर समस्या यह है कि उन्हें दिशा देने वाले नेता और संगठनकर्ता नहीं हैं, जो सबकी ताकत को एकजुट करके संगठित और सामंजस्यपूर्ण आंदोलन बना सकें।” (On Organization)

इस कथन का आशय यह भी था कि संगठित करने वाले सक्षम नेतृत्व और रणनीतिकारों के अभाव के कारण क्रांतिकारी आंदोलन की ऊर्जा बिखर जाती है और उसका प्रभाव सीमित हो जाता है। इस बात की पुष्टि वैसे तो आधुनिक इतिहास के हर दौर में हुई है, लेकिन खासकर 21वीं सदी में इसके उदाहरण भरे-पड़े हैं। 2010 का दशक दुनिया भर में विशाल जन आंदोलनों के उभार का रहा। 2011 तो ऐसा वर्ष था, जब अमेरिकी पत्रिका टाइम ने अपनी सालाना रवायत के तहत “The Protester” को Person of the Year घोषित किया। उसका संदर्भ अरब स्प्रिंग (ट्यूनिशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया, बहरीन आदि में जन विद्रोह, अमेरिका में Occupy Wall Street आंदोलन, यूरोप (खास कर ग्रीस और स्पेन) में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शनों, भारत में अन्ना आंदोलन, और मेक्सिको तथा अन्य कई देशों में अलग-अलग मुद्दों पर जन आंदोलनों से बना था।

मशहूर लेखक और पत्रकार विन्सेंट बोविन ने उन आंदोलन का लगभग एक दशक तक अध्ययन करने के बाद “If We Burn: The Mass Protest Decade and the Missing Revolution” नाम की किताब लिखी, जिसका प्रकाशन 2023 में हुआ। उसमें उन्होंने यही समझने की कोशिश की है कि 2010–20 के वैश्विक जन आंदोलन संरचनात्मक बदलाव में क्यों नहीं बदल पाए? उन्होंने लिखा कि ऐसे संघर्षों से अधिक से अधिक संबंधित देश में राजनीतिक शून्यता पैदा होती है, लेकिन यह क्षणिक या अस्थायी घटना बन कर रह जाती है। बेविन्स ने लिखा है:

“जन आंदोलन के दशक में, सड़कों पर (जन आक्रोश के) हुए अचानक विस्फोटों ने कई बार क्रांतिकारी हालात पैदा किए। लेकिन साधारण विरोध प्रदर्शन ऐसे हालात का लाभ उठाने के लिए बहुत कमजोर साबित होते हैं, और इस तरह के विरोध प्रदर्शन इस मोर्चे पर नाकाम रह जाते हैं। अगर आप मानते हैं कि आप एक बेहतर समाज बना सकते हैं… तो आपको खुद उस राजनीतिक खालीपन में प्रवेश करना चाहिए। लेकिन अलग‑अलग कारणों से सड़क पर उतरे बिखरे हुए व्यक्तियों के समूह सीधे सत्ता अपने हाथ में नहीं ले सकते, कम-से-कम पूरे समूह के रूप में तो नहीं ही। अगर कोई व्यक्ति समूह उस राजनीतिक खालीपन में जाकर जनता के नाम पर सत्ता लेता है, तो वह एक प्रकार के अग्रिम दस्ते (vanguard) की भूमिका निभाता है, जो एक विशेष वैचारिक परियोजना से प्रेरित होता है। कुछ आदर्शवादी, सत्ता‑विरोधी विचारधाराओं में मान लिया गया कि उथल-पुथल से ही नया समाज बन जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।”

अर्थ यह कि सिर्फ सड़क पर हुआ विरोध क्रांति को दिशा नहीं दे सकता। सत्ता हाथ में लेने के लिए संगठित नेतृत्व और वैचारिक परियोजना की ज़रूरत होती है। मार्क्सवादी क्रांति के संदर्भ में ऐसी एक चर्चित टिप्पणी लेनिन की भी है। उन्होंने कहा था- “अक्सर कहा जाता है कि श्रमिक वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर आकर्षित होता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि समाजवादी सिद्धांत श्रमिक वर्ग की दुर्दशा के कारणों को अन्य किसी भी अन्य सिद्धांत से अधिक गहराई से और सही ढंग से उजागर करता है। इसी वजह से मजदूर इसे आसानी से अपना लेते हैं- बशर्ते कि यह सिद्धांत खुद ‘स्वतःस्फूर्तता’ के आगे न झुक जाए और उस ‘स्वतःस्फूर्त’ बनी स्थिति को अपने अधीन कर ले। कामगार वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर बढ़ता है; फिर भी, सबसे व्यापक और लगातार नए रूपों में उभरती हुई पूंजीवादी विचारधारा भी स्वाभाविक रूप से कामगार वर्ग पर हावी रहती है।”

फिलहाल, भारत में बात मजदूर तबकों की लड़ाई की नहीं हो रही है। अभी संदर्भ पूंजीवादी ढांचे के तहत मिली सीमित आजादियों और अधिकारों की रक्षा का है। यह गौरतलब है कि इन आजादियों और अधिकारों को अधिक बड़े जन समूहों के साथ साझा करने पर एक दौर में राजी हुए शासक वर्ग इस युग में आकर ऐसी “रियायत” को माकूल और मुनासिब नहीं मान रहे हैं। यह एक वैश्विक परिघटना है। दुनिया भर में आम जन से ऐसी “रियायतों” को छीन लेने की परियोजना इस दौर की हकीकत है। इसके लिए लगभग हर जगह (जहां चुनावी लोकतंत्र है) धुर दक्षिणपंथी ताकतों को शासक समूहों ने अपना औजार बनाया है, जिन्होंने नफरत और विभेद की रणनीति से आम जन को भटकाने की अपनी क्षमता साबित की है।

लाजिम है कि ऐसी कोशिशों के खिलाफ प्रभावित जन समूहों ने प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया है। जिस समय भारत में ‘Million Mutinies’ की बात हो रही है, उसी समय फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि पाकिस्तान में भी हो रहे बड़े जन प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींच रखा है। कहा जा सकता है कि एक बार फिर “The Protester” अग्रिम कतार में आ खड़ा हुआ है। इससे संभव है कि कुछ जगह राजनीतिक शून्य पैदा हो। लेकिन उससे वो पृष्ठभूमि कितनी बदलेगी, जिसकी वजह से आवाम के हासिल अधिकारों पर तलवारें चली हैं और जिनसे आहत होकर लोग प्रतिरोध जताने के लिए प्रेरित हुए हैं?

जैसाकि ऊपर चर्चा हुई, भारत में ‘वोट चोरी’ एक बड़ा मसला है, लेकिन मुद्दे और भी हैं, जैसी झलक राहुल गांधी की पहल ‘सत्याग्रह’ पर देखने को मिली है। बल्कि एक तर्क यह हो सकता है कि उन समस्याओं (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित अन्य मसलों) से परेशान लोग अपनी वोट की ताकत से मौजूदा शासन तंत्र में कोई अस्थिरता पैदा ना करें, इसलिए उनके वोट के प्रभाव को कमजोर करना शासक वर्गों की फिलहाल सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। इसलिए- एक व्यक्ति एक वोट, समान मूल्य- के सिद्धांत को व्यवहार में बचाना इस समय की भले सबसे बड़ी जरूरत हो, लेकिन इस सवाल को सिर्फ इससे ही बांध कर नहीं रखा जा सकता। यह कहना और बार-बार दोहराना जरूरी है कि वोट का अधिकार अपने-आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आम जिंदगी को बेहतर बनाने का एक माध्यम भर है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है।

इस लिहाज से अधिक दूरगामी महत्त्व का प्रश्न यह है कि दशकों तक वोट का अधिकार मिले रहने के बावजूद बहुसंख्यक जनता की जिंदगी में उसका असर सीमित क्यों बना रहा और क्या गारंटी है कि आगे ऐसा नहीं होगा? इस नजरिए से वह बदलाव जरूरी हो जाता है, जैसा 2010-20 के दशक में ना हो पाने का जिक्र और उसके कारणों की पड़ताल विन्सेंट बोविन ने अपनी पुस्तक If We Burn में की है। इसलिए मौजूदा ‘Million Mutinies’ को mass of people के बीच no people की हकीकत से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। बोविन ने दशक भर पुराने आंदोलनों से टिकाऊ बदलाव ना होने के लिए जिस vanguard की कमी को जिम्मेदार माना, आज असल सवाल वही है कि भारत में उस शर्त को पूरा करने बारे में क्या चर्चा हो रही है? इसकी जरूरत पर कितना जोर दिया जा रहा है, और इस विकल्प की तैयारी के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?

सीजेपी के प्रदर्शन पर पुलिस की सख्त कार्रवाई, कई नेता हिरासत में

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे सहित अन्य मांगों में शनिवार को राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर पहुंचने की आशंका को देखते हुए दिल्ली पुलिस तथा अन्य सुरक्षा बलों ने कड़ी कार्रवाई करते हुए राष्ट्रीय स्तर के कई नेताओं माकपा के एमए बेबी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।

जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रमुख नेताओं अभिजीत दीपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका को दिल्ली पहुंचने के बाद इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर हिरासत में लिया गया। दिल्ली पुलिस ने बार्डर सहित कई इलाकों में पहरा सख्त करते हुए कई जगह पर बैरिकेडिंग लगा दी और सुबह से ही यातायात पर कड़ी पाबंदियां लागू कर दी गईं।

वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने और स्थिति पर निगरानी रखने के लिए प्रमुख चौराहों पुलिस बल तैनात किया गया है। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने कनॉट प्लेस, मंडी हाउस, जंतर-मंतर, पटेल चौक और मध्य दिल्ली के अन्य हिस्सों में यातायात जाम और रूट डायवर्जन की चेतावनी देते हुए एडवाइजरी जारी की। पुलिस की सख्ती के बावजूद बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जगह जगह पहुंचे। इनमें मिंटो ब्रिज, दिल्ली रेलवे स्टेशन, प्रभावित चौराहों और मार्गों में अशोक रोड-जंतर-मंतर रोड गोल चक्कर, टॉलस्टॉय मार्ग-जनपथ क्रॉसिंग, जय सिंह रोड-संसद मार्ग क्रॉसिंग, रेल भवन गोल चक्कर, गोल डाकखाना और विंडसर प्लेस शामिल हैं।

पुलिस ने सीजेपी संस्थापक सर्वश्री दीपके, दास और रांका को राष्ट्रीय राजधानी में तब हिरासत में ले लिया जब वे मुंबई से यहां आए हवाई जहाज से उतरने वाले थे। दिल्ली पुलिस ने उनको विमान के भीतर से अपनी हिरासत में ले लिया। इस घटना के बाद पार्टी ने सोशल मीडिया पर बताया कि इन नेताओं के हिरासत में लिए जाने के बाद संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे शनिवार को जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन का नेतृत्व करेंगे।

श्री दीपके ने एक पूर्व रिकार्डेड मैसेज से यह जानकारी देते हुए कहा कि शीर्ष नेतृत्व की हिरासत के बावजूद यह प्रदर्शन जारी रहेगा तथा श्री कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को वापस लेने की मांग पर आंदोलन पूरी दृढ़ता से आगे बढ़ाया जाएगा। इस बीच यह भी जानकारी सामने आई कि श्री दीपके की दादी का निधन हो गया। पार्टी ने एक बयान जारी कर कहा कि नेताओं की इस तरह की गई हिरासत कार्यकर्ताओं के हौसलों को नहीं डिगा सकती और यह लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक निर्णायक संघर्ष है।

बयान में कहा गया जब राज्य सत्ता लोकतांत्रिक असंतोष को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का सहारा लेती है, तो लोकतंत्र को बचाने के लिए जनता को स्वयं कमान संभालनी होगी । इसके अलावा खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के अनुसार, शनिवार सुबह एक संयुक्त अभियान के तहत दिल्ली और गुरुग्राम पुलिस ने गुरुग्राम के एक आवासीय फ्लैट से चर्चित यूट्यूबर ध्रुव राठी को हिरासत में लेकर अज्ञात स्थान पर भेज दिया है। श्री राठी ऐसे वीडियोज के लिए जाने जाते हैं जिनमें केंद्र सरकार की कठोर आलोचना की जाती है।

इस विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए मध्य दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में सुरक्षा बलों और पुलिसकर्मियों को भारी संख्या में तैनात किया गया है। निर्धारित प्रदर्शन स्थल के पास एकत्र हुए प्रदर्शनकारियों को पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर बसों में भरकर अन्य स्थानों पर ले जाया गया। सुरक्षा उपायों के तहत दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के अंतर्गत बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए अब तक हजारों लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। दिल्ली पुलिस ने सीजेपी के इस प्रदर्शन की अनुमति देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि पार्टी द्वारा प्रस्तुत सूचना कोई औपचारिक आवेदन नहीं थी, क्योंकि नियमों के अनुसार जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए कम से कम 10 दिन पहले आवेदन देना अनिवार्य होता है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन को दिल्ली पुलिस के साथ समन्वय स्थापित करने और राजधानी की ओर प्रदर्शनकारियों के आने को रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाने के निर्देश दिए थे। एहतियात के तौर पर अधिकारियों ने दिल्ली के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियां लगाई हैं, बाजारों और मेट्रो स्टेशनों को बंद रखने के आदेश दिए हैं तथा शहर में आने वाली कई ट्रेनों को रद्द कर दिया है। दिल्ली के लोकप्रिय दिल्ली हाट से छात्रों की भीड़ का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा को भी “सरफ़रोशी की तमन्ना” कविता गाते हुए देर दोपहर हिरासत में ले लिया गया।

ममता बनर्जी और उनके सांसदों और समर्थकों का एक समूह प्रतिबंध का उल्लंघन करने के कारण हिरासत में लिए जाने से पहले अपने साउथ एवेन्यू स्थित आवास के बाहर तख्तियां लेकर धरने पर बैठा था। ममता बनर्जी ने एक पुलिस वाहन में ले जाए जाते समय संवाददाताओं से कहा देश में क्या चल रहा है, सबको पता है । दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने शनिवार को विपक्ष पर अपना हमला तेज करते हुए राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल सहित अन्य नेताओं पर देश में तनाव भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि सरकार उनके द्वारा अशांति भड़काने के प्रयासों से सख्ती से निपटेगी।

उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता बार-बार की चुनावी हार के बाद हताश होकर काम कर रहे हैं और चेतावनी दी कि पार्टी तथा उसके समर्थक उनके इन प्रयासों का विरोध करेंगे। उन्होंने कहा भारत सरकार आपके द्वारा तनाव पैदा करने के लिए किए जा रहे प्रयासों से सख्ती से निपटेगी । कांग्रेस ने सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार पर राष्ट्रीय राजधानी को “किले” में तब्दील करने का आरोप लगाया, जिसके तहत पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर लिखा राष्ट्रीय राजधानी को एक किले में बदल दिया गया है, जहाँ हर तरफ सशस्त्र सुरक्षाकर्मी तैनात हैं ।कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार से सवाल करने वालों को हिरासत में लेकर उनकी आवाज दबायी जा रही है और देश को ‘खामोश लोकतंत्र’ में बदला जा रहा है।

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श्री खरगे ने सोशल मीडिया एक्स पर कहा कि युवाओं, छात्रों, वकीलों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, किसान संगठनों के नेताओं, यूट्यूबरों और कंटेंट क्रिएटरों सहित सरकार से सवाल करने वाले सभी लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। उन्होंने कहा “भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की कायरता आज पूरी तरह सामने आ गयी है। हिरासत, गिरफ्तारियां, जेल, लाठियां और पैलेट भी भारत के लोगों को रोक नहीं सकते। स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही युवा देश की नियति तय करने में अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं । कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी एकजुट विपक्ष के साथ मिलकर इस तानाशाही शासन के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ती रहेगी। भारत की आजादी के लिए खून बहाने वाली कांग्रेस लोकतंत्र, संविधान और प्रत्येक भारतीय के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगी। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुये कहा कि जनता की आवाज को ताकत के बल पर दबाने की कोशिश सरकार की बड़ी भूल साबित होगी।

श्री यादव ने ‘एक्स’ पर कहा किसी के रोकने से नहीं रुकेगा, अब दिल्ली में देश जुटेगा । उन्होंने कहा कि देश की युवा ऊर्जा उनके साथ है। भाजपा सरकार अगर यह समझ रही है कि वह ताकत के बल पर जनता को रोक लेगी, तो यह उसकी और भी बड़ी भूल साबित होगी। श्री यादव ने कहा कि ‘जंतर-मंतर’ अब केवल एक जगह का नाम नहीं, बल्कि नई चेतना और जागरण का प्रतीक बन गया है। पुलिस ने सुबह ही जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के शीर्ष नेताओं समेत कई नेताओं को हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए गए नेताओं में माकपा महासचिव एमए बेबी, पूर्व मुख्यमंत्री एवं केरलम विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पिनराई विजयन, केरलम के पूर्व वित्त मंत्री केएन. बालगोपाल, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, मणिकंतन वी. गोविंदान, श्रीमती, वृंदा करात, के के शैलजा और पी राजीव शामिल हैं।

श्रीमती करात ने फेसबुक पेज पर लिखा मोदी और उनकी सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि भारत के लोग उठ खड़े हुए हैं और वे उन्हें रोक नहीं सकते। दिल्ली का दिल उसके सभी लोगों का है। ये दबाने वाले तरीके हमें नहीं रोक पाएंगे! चलो जंतर-मंतर की ओर!”

केरलम भवन से बाहर निकलते ही पुलिस ने वामपंथी नेताओं को जंतर-मंतर की ओर मार्च करने से रोक दिया और उन्हें हिरासत में ले लिया। शुरुआत में पुलिस ने श्री विजयन, श्री ब्रिटास और श्री केएन बालगोपाल को छोड़कर अन्य नेताओं को हिरासत में लिया था लेकिन जब ये तीनों नेता जंतर-मंतर की ओर बढ़ने लगे तो पुलिस के साथ उनकी तीखी बहस हुई और पुलिस ने उन्हें भी हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए जाने के दौरान मीडिया से बात करते हुए श्री विजयन ने इस कार्रवाई को ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया। उन्होंने कहा कि नागरिकों से उनकी सरकार चुनने का अधिकार छीना जा रहा है और 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह काम मुख्य चुनाव आयुक्त ने सरकार के इशारे पर किया है और सरकार अब उन्हें बचाने के लिए गैर-कानूनी तरीके अपना रही है लेकिन यह विरोध आज खत्म नहीं होगा। श्री विजयन ने कहा कि भारत देश कोई पुलिस राज्य नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश है और सत्ताधारी दल के मन में लोकतंत्र के प्रति कोई सम्मान न होने के कारण ऐसी कार्रवाई की जा रही है।

वहीं, सांसद जॉन ब्रिटास ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट क्षेत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान वकीलों के खिलाफ बल प्रयोग किए जाने और उनकी हिरासत की खबरों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। एसोसिएशन ने विशेष रूप से महिला अधिवक्ताओं सहित वरिष्ठ और युवा वकीलों की कथित हिरासत का मुद्दा उठाया है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को दिए गए एक ज्ञापन में एसोसिएशन ने हस्तक्षेप की मांग करते हुए हिरासत में लिए गए वकीलों की सुरक्षा और उनके ठिकाने का पता लगाने का आग्रह किया है। इसके साथ ही, बिना किसी कानूनी आधार के रोके गए वकीलों को तत्काल कानूनी सहायता प्रदान करने, उनकी रिहाई सुनिश्चित करने और पूरी घटना की निष्पक्ष जांच के बाद उचित कानूनी कार्रवाई करने की मांग की गई है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जा रहे आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल समेत पार्टी के कई नेताओं को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया है। हिरासत में लिए गए नेताओं में आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह, दिल्ली के पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज और विधायक दुर्गेश पाठक भी शामिल हैं।आप विधायक कुलदीप कुमार ने आज दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल और आप सांसद संजय सिंह को पुलिस मोदी सरकार के आदेश पर हिरासत में लेकर जा रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने पहुंच रही थी और इसी दौरान पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लिया।

Pic Credit : UNI

प्रदर्शन में शामिल होंगे केजरीवाल

नई दिल्ली। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन का समर्थन किया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की ओर से किए गए आंदोलन में केजरीवाल नहीं शामिल हुए थे। लेकिन उन्होंने कहा है कि शनिवार, 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल होंगे।

आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार को कहा कि वे 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर मंतर पर होने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में अपने परिवार के साथ शामिल होंगे। उन्होंने देश भर के लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में पहुंचने की अपील की। इस प्रदर्शन को वामपंथी पार्टियों और कुछ किसान संगठनों ने भी समर्थन दिया है।

क्या है भारत की आर्थिकी का इंजन?

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बेसिक सवाल है! इस सप्ताह रिजर्व बैंक के ब्याज दर फैसले, शेयर बाजार, जीडीपी की हवाबाजी, लुढ़कते रुपए, भारत से भागती पूंजी जैसे तथ्यों से बेसिक सवाल है कि तब देश की आर्थिकी भला चल कैसे रही है? वह प्लेटफॉर्म पर खड़ी है या वह उस छुक-छुक इंजन से बंधी है जो भाप छोड़ रहा है पर न कोयला है न बॉयलर में भभकती आग है?

आप भी सोचें, भारत के हर बंदे को सोचना चाहिए कि आखिर भारत की आर्थिकी के पहियों का मौजूदा इंजन है क्या?

पहले देश विशेष की ताक़त उसकी फ़ौज, कारखानों और खेतों से मापी जाती थी। अब पैसे से है। मतलब पूंजी, कमाई, बचत, श्रीवृद्धि, लक्ष्मी की चंचलता प्राथमिक कसौटी (वैश्विक भी) है। इस मायने में भारत की रियलिटी क्या है? क्या यह रियलिटी नहीं है कि देश के अमीर, देश की बुद्धि भारत छोड़ विदेश जा बस रही है? क्या यह खबर नहीं है कि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकाल कर दूसरे देशों के बाजारों में निवेश कर रहे हैं? मतलब भारत का शेयर बाजार जोखिम भरा, कम कमाई का है वही इंडोनेशिया हो या तुर्किये, आसियान देश वैश्विक पूंजी के लिए इसलिए कमाई वाले हैं क्योंकि इन देशों की इकोनॉमी सचमुच तेजी से बढ़ती हुई है।

सोचें, सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में अप्रैल-जून 2026 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत थी, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA) की बढ़ोतरी 8.2 प्रतिशत। सात अक्टूबर को रिज़र्व बैंक ने पूरे वित्त वर्ष 2026-27 की विकास दर का अनुमान बढ़ा कर 7.1 प्रतिशत किया। अब यदि भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत बढ़ रही है, तो उसकी करेंसी, रुपया और शेयर बाज़ार क्यों लगातार कमजोर होता हुआ है? गुरूवार को सेंसेक्स फिर भारी गिरा। तथ्य है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने वर्ष 2026 में अब तक लगभग 30.4 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे है। अकेले अक्टूबर के शुरुआती नौ दिनों में लगभग 47,000 करोड़ रुपए के भारतीय शेयरों को विदेशियों ने बेचा।

दुनिया के किसी भी पैमाने पर यह मामूली उतार-चढ़ाव नहीं है। सो, सीधा सवाल है एक तरफ भारत में उत्पादन बढ़ने के सरकारी आंकड़े हैं, वहीं विदेशी निवेशक भारत की कंपनियों के भविष्य को लेकर घबराए हुए हैं, उनके शेयर बेच भाग रहे हैं? ऐसे ही भारत की करेंसी विदेशी बाजार में कौड़ियों वाली हैसियत में है। इस वर्ष डॉलर के मुक़ाबले रुपए का मूल्य सात प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।

सरकारी दावा है कि आर्थिकी की रेलगाड़ी तेज़ विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह, कंक्रीटों में नजर आते बुनियादी ढांचे से दुनिया की सर्वाधिक तेज़ बुलेट ट्रेन है। वहीं रियलिटी में गाड़ी प्लेटफॉर्म पर छुक-छुक करते हुए है। बाज़ार की हकीकत, भारतीय करेंसी के घटते भाव, विदेशी पूंजी के भागने, अब नई ऊंची ब्याज दर, महंगा तेल-ईंधन, महंगे कर्ज व व्यापारियों, अमीरों का भागना या हाथ पर हाथ धरे बैठे होना है।

कह सकते हैं कि खेती, आईटी कंपनियां, सेवा क्षेत्र, मेक इन इंडिया के कारखानों की भाप से आर्थिकी का इंजन सरपट भागता हुआ है। पर खेती यदि खुशहाल होती तो किसानों के पेट नहीं भरे होते! किसान तब दो-दो हजार रुपए की प्रधानमंत्री की रेवड़ी पर टकटकी लगाए उसका इंतजार क्या करते हुए होते? सब्जी बाजार, आटे-तेल के दाम क्या आम आदमी का जीना हराम ऐसा किए हुए होते जो रिजर्व बैंक को महंगाई के हवाले ब्याज दर बढ़ाने का फैसला करना पड़ता? ऐसी ही आईटी कंपनियों, सेवा क्षेत्र की कंपनियों के शेयर बाजार में लुढ़कने का औसत है। भारत की आईटी कंपनियों की अमेरिका में हुई एआई क्रांति से लुटिया डूबती हुई है। इन कंपनियों में ही निवेशित पूंजी सर्वाधिक भाग रही है। और मेक इन इंडिया या इंफ्रास्ट्रक्चर की तो बात ही नहीं होनी चाहिए। अंबानी हो, अडानी हो, एयरलाइंस सेक्टर हो या टेक्सटाइल सेक्टर या बैंकिंग सब महंगाई बढ़ा रहे हैं या बांग्लादेश, वियतनाम, आसियान देशों से पिट रहे हैं या आर्थिकी का कर्जा बढ़ा रहे हैं। बट्टेखाते में भारत की पूंजी, बचत वैसे ही जा रही है जैसे शेयर बाजार के चक्कर में मध्यवर्गीय नौकरीपेशा नौजवानों ने म्यूचुअल फंड (एसआईपी) के जरिए अपनी बचत को शेयर बाज़ार में उड़ेला, जबकि खर्चों के लिए कर्ज लेकर अपने आपको ब्याज (जो महंगा होना ही है) के चक्रव्यूह में फंसाया।

सो, पूंजी देशी (कभी भारत में घर-परिवार रिकॉर्ड बचत किया करते थे) हो या विदेशी वह भारत की इकोनॉमी को दौड़ाती हुई नहीं है। न ही भारत की उत्पादकता (यदि होती तो चीन के आयातों पर क्या खतरनाक स्तर पर आश्रित होते?) का इंजन है। तो ले देकर पैसे की मालिक या तो सरकार, उसके खर्च और बाबुओं का भ्रष्टाचार है या सरकारी कृपाओं के क्रोनी खरबपति याकि अडानी-अंबानी जैसे देशी जगत सेठ हैं। इन सबकी ऊर्जा के इंजन का नाम क्या है? 140 करोड़ लोगों का पेट! हां, भारत के 140 करोड़ लोगों की बुनियादी भूख, जीने का संघर्ष ही 2026 की इंडियन इकोनॉमी की वह छुक-छुक रेलगाड़ी है, जिसमें फर्स्ट क्लास, मिडिल क्लास के कुछ डिब्बे हैं बाकी तो भूखे पेटों की आग, उसके हाथ-पांव मार कर जीने की जिजीविषा है!

क्या नहीं?